भारतकोश
वेद स्वरूप विमर्श (स्वामी करपात्री जी महाराज - अपौरुषेय वेद-प्रामाण्य एवं वैदिक समन्वय)

वेद स्वरूप विमर्श (स्वामी करपात्री जी महाराज - अपौरुषेय वेद-प्रामाण्य एवं वैदिक समन्वय)

Veda Swaroop Vimarsha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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ाऽपि न भवत्येव । L58: यादृग्विधेषु हि अप्रामाण्यसंभवः, तत्रैव दोषाशङ्का, न सर्वत्र ।

Let's re-verify Left page line 9: "ननु अप्रामाण्यमवस्तुत्वात्र दोषजन्यमिति चेन्न ।" Wait, let's look closely at "अवस्तुत्वात्र" vs "अवस्तुत्वान्न": In line 9: "ननु अप्रामाण्यमवस्तुत्वान्न दोषजन्यमिति चेन्न ।" Wait, look at "अवस्तुत्वान्न": The conjunct after त्वा has a vertical stem, a hook to the left, and another hook: it is definitely "न्न"! Yes, "अवस्तुत्वान्न"! Because in Sanskrit, अवस्तुत्वात् + न = अवस्तुत्वान्न.

Let's check line 17: "प्रमाणान्तरायत्तप्रमाण्यवत्" or "प्रामाण्यवत्"? Look at the character: it is definitely "प्रामाण्यवत्" - wait, there is an aa-stroke next to प्र! Wait, look at "प्रमाणान्तरायत्तप्रामाण्यवत्": The प्र has a slant to the right: "प्रा". Wait, look at "प्रमाणान्तरायत्त": the first प्र has no aa, the second has: "प्रामाण्यवत्". Yes, प्रामाण्यवत्!

Let's