भारतकोश
वेद स्वरूप विमर्श (स्वामी करपात्री जी महाराज - अपौरुषेय वेद-प्रामाण्य एवं वैदिक समन्वय)

वेद स्वरूप विमर्श (स्वामी करपात्री जी महाराज - अपौरुषेय वेद-प्रामाण्य एवं वैदिक समन्वय)

Veda Swaroop Vimarsha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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पृष्ठ 170

: णबुद्धिशब्दयोः । तच्चाज्ञातादेव ज्ञानात् स्वत एव गृहीतमित्यनपेक्षकं (Left page ends with प्रमा-, right page starts with णबुद्धिशब्दयोः ।) L2: प्रमाणान्तरम् । अप्रमाणं तु न स्वीयमप्रामाण्यं स्वतो गमयति; तस्यापि L3: स्वरूपेणैव स्वानुरूपार्थग्राहकत्वात् । रजतज्ञानं हि शुक्तिशकलं रजत- L4: मित्येव गृह्णाति । न पुनर्नेंदं रजतमिति, तेनाप्रमाणज्ञानमपि स्वतः- (Notice पुनर्नेंदं - is it पुनर्नेंदं or पुनर्नैदं or पुनर्न चेदं? In text: न पुनर्नेंदं रजतमिति - the print has पुनर्नेंदं with an anusvara/e-matra, i.e., पुनर्नेंदं or पुनर्नैदं? It has नें with e-matra and dot: पुनर्नेंदं.) L5: प्रामाण्यमेवात्मनोऽविद्यमानमपि गृहीतनिबन्धनं तद्व्यवहारमपि प्रवर्त- Wait, look at प्रामाण्यमेवात्मनोऽ: Does L5 start with प्रामाण्य