भारतकोश
वेद स्वरूप विमर्श (स्वामी करपात्री जी महाराज - अपौरुषेय वेद-प्रामाण्य एवं वैदिक समन्वय)

वेद स्वरूप विमर्श (स्वामी करपात्री जी महाराज - अपौरुषेय वेद-प्रामाण्य एवं वैदिक समन्वय)

Veda Swaroop Vimarsha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 218

"तदशक्तौ चानुरूपत्वात्" is actually Jaimini Sutra 1.3.28 in some editions! Wait, let's check: Jaimini 1.3.24 to 1.3.29 is the Apashabda-adhikarana / Shabda-prayoga: 1.3.24: प्रयोगोत्पत्त्यशास्त्रत्वाच्छब्देषु न व्यवस्था स्यात्। 1.3.25: शब्दप्रयत्ननिष्पत्तेरपराधस्य भागित्वम्। 1.3.26: अन्यायश्चानेकशब्दत्वम्। 1.3.27: तत्र तत्त्वमभियोगविशेषात् स्यात्। 1.3.28: तदशक्तौ चानुरूपत्वात्। 1.3.29: एकदेशत्वाच्चेति। YES! EXACT MATCH! Jaimini Sūtra 1.3.28 is precisely: "तदशक्तौ चानुरूपत्वात्" ! That is brilliant!

Now let's examine the right page in detail: Line 1: "पादकाधिकरणसंगतिः। शब्दशक्तेरुभयत्र तुल्यत्वे त्वसंगतिरेव ।" Wait, the left page ends with: "अत एव यव शब्देन दीर्घशूकविशेष एव ग्राह्यो न कङ्गुरित्येतत् प्रति-" Right page begins: "पाद