भारतकोश
वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary

भट्ट नारायण द्वारा

DevanagariHindipublished355 पृष्ठ

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पृष्ठ 148

[Page Header] तृतीयाेऽङ्कः ] प्रबोधिनी-प्रकाशद्वयोपेतम् १२७

कृतपरिकरस्य भवादृशस्य त्रैलोक्यमपि न क्षमं परिपन्थीभवितुं किं पुनर्युधिष्ठिरबलम् । तदेव मन्ये परिकल्पिताभिषेकोपकरणः कौरवराजो नचिरात्वामेवाभ्यपेक्षमाणस्तिष्ठतीति । अश्वत्थामा - यद्येवं त्वरते मे परिभवानलदह्यमानमिदं चेतस्तत्प्रती- कारजलावगाहनाय । तदहं गत्वा तातवधविषण्णमानसं कुरुपतिं सेनाप- त्यस्वयंग्रहणप्रणयसमाश्वासनया मन्दसन्तापं करोमि । कृपः-वत्स, एवमिदम् । अतस्तमेवोद्देशं गच्छावः । ( इति परिक्रामतः । ) ( ततः प्रविशतः कर्णदुर्योधनौ । ) दुर्योधनः--अङ्गराज,

परिपन्थीभवितुम्=शत्रुर्भवितुम् 'दस्युशात्रवशत्रवः अभिघातिपरारातिप्रत्य- थिपरिपन्थिन' इत्यमरः । परिकल्पिताभिषेकोपकरणः=परिकल्पितं सङ्गृहीतं अभिषेकोपकारणं येन सः, कौरवराजः = दुर्योधनः, नचिरात् = शीघ्रम्, अभ्यपेक्ष- माणः = प्रतीक्षमाणः । सेनापत्यस्वयंग्रहणप्रणयसमाश्वासनया =सेनापत्यस्य यत्स्वयमेव ग्रहणम् तद्रू- पप्रणयः तेन यः समाश्वासना, आश्वासः तया । अङ्गराजः - अङ्गदेशानां राजा कर्णः । 'राजाऽहःसखिभ्यष्टच्'ति टच्प्रत्ययः ।

आप सदृश पुरुष के कवचादि के धारण कर लेने पर तीनों लोक भी शत्रु बनने में समर्थ नहीं हो सकता फिर पाण्डवीय सेना की क्या कथा ! अत एव ऐसा समझकर अभि- षेकसामग्री एकत्रित करके कौरवनरेश (सुयोधन) कब से आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं ? अश्वत्थामा-यदि यह बात है तो अपमान की ज्वाला से भस्म होता हुआ मेरा चित्त उसके प्रतिकार (बदला) रूप जल में प्रवेश करने के लिए व्याकुल हो रहा है । अतः मैं जाकर पिता के वध से खिन्नमन हुए कुरुराज के शोक को सेनानायक के पद को स्वयं ग्रहण करने की याचना रूप आश्वासन से, न्यून करूँगा अर्थात् स्वयं जाकर सेनापति का भार ग्रहण करूँगा और उन्हें कहना न पड़ेगा इससे उनका शोक कम हो जायगा । कृप-वत्स, बहुत ठीक । अतः उस स्थान पर चलना चाहिये । ( दोनों चल पड़ते हैं ) ( इसके अनन्तर कर्ण और दुर्योधन का प्रवेश ) दुर्योधन-अङ्गराज !