विक्रमोर्वशीयम् (महाकवि कालिदास - संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Vikramorvashiyam of Kalidasa with Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / पं. विश्वनाथ शास्त्री द्वारा
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११८ विक्रमोर्वशीये राजा—अथ विष्टरोऽनुगृह्यताम् । (नारद उपविशति । सर्वे यथायोगमुपविशन्ति ।) राजा—(सविनयं ।) भगवन्, किमागमनप्रयोजनम् । नारद—राजन्, श्रूयतां महेन्द्रसन्देशः । राजा—आहितोऽस्मि । नारदः—यन्मापत्यां मय्या वनगमनाय कृतबुद्धिर्भवतमनु- कम्पि । राजा—किमाज्ञापयति । नारदः—त्रिकालदर्शिभिरृषिभिः सुरासुरविमर्दो भावी । स चोध धनुर्धरः सहायः । तेन न त्वया शस्त्रत्यागः कार्यः । इयं चोर्वशी यावदायुस्तव सहधर्मचारिणी भवत्विति । उर्वशी—(आत्मगतम् ।) ओणे विअ हियआदो आणन्दिरम् । राजा—परमनुगृहीतोऽस्मि वज्रधरेण । नारदः—युक्तम् । त्वयि रथे च निषण्णे धनुषा च समाहिताग्रेण । सुरपतिना प्रतिमल्लो गूढो भवता ॥ २० ॥ नारद उपविशति, नारद, उर्वशी तथा राजा कुशाण्डिका विधाय
- गम्भीर दृष्टि से । और भगवान् ने कहा - इन्द्र का सन्देश यह है कि इस कुमारी को अपना कर वन में जाने के लिये कृतसङ्कल्प हुए आपको कृपा के विचार से मना किया गया है । अतएव कृपा कर के न जायें । क्योंकि भविष्य में होने वाले देवासुर संग्राम में आपको ही इन्द्र का सहायक होना उचित है । इसलिए शस्त्र न छोड़ें इत्यादि । उर्वशी - यह सुन कर आनन्दित हुई और बोली कि मेरे मन का शल्य दूर हो गया ॥ २० ॥ राजा । भगवन्