संग्रह पर लौटें









विष्णु पुराण
Vishnu Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 550स्थायी लिंक
५३९
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सर्वकालमुपस्थानम् | ३ | ११ | १०१ | स समावासितः सर्वः | ५ | ६ | ३० |
| सर्वथैव जगत्पर्थे | ५ | १ | ३३ | ससम्भ्रमस्तमालोक्य | १ | २० | १५ |
| सर्वभूतहितं कुर्यात् | ३ | ८ | २४ | ससृजुः पुष्पवर्षाणि | ५ | ३ | ६ |
| सर्वभूतान्यभेदेन | २ | १६ | २० | स सृष्ट्वा मनसा दक्षः | १ | १५ | ७७ |
| सर्वत्रगस्सुधर्मा च | ३ | २ | ३२ | सस्नौ स्वयं च तन्वंगी | ३ | १८ | ८६ |
| सर्वत्रातिप्रसन्नानि | ५ | १० | ११ | सहस्रमेकं निष्काणाम् | ५ | २८ | १३ |
| सर्वमन्वन्तरेष्वेवम् | ३ | ६ | ३२ | सहस्रवक्रो भगवन्महात्मा | ५ | ९ | २७ |
| सर्वमेव कलौ शास्त्रम् | ६ | १ | १४ | सहदेवात्सोमापिः | ४ | २३ | ४ |
| सर्वयादवसंहार० | ५ | ३७ | १० | सहदेवाच्च विजया | ४ | २० | ४७ |
| सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् | ४ | २ | १२६ | सह जाम्बवता सः | ४ | १३ | ५८ |
| सर्वस्यैव हि भूपाल | २ | १३ | ८२ | सहस्रजित्पुत्रश्शतजित् | ४ | ११ | ६ |
| सर्वस्वभूतो देवानाम् | ५ | ३ | २८ | सहस्रजिन्क्रोष्टुनल० | ४ | ११ | ५ |
| सर्वात्मकोऽसि सर्वेश | १ | १२ | ७२ | सहस्रशीर्षा पुरुषः | १ | १२ | ५६ |
| सर्वात्मन्सर्वभूतेश | १ | १२ | ७३ | सहस्रभागप्रथमा | २ | ६ | ३५ |
| सर्वाभावे वनं गत्वा | ३ | १४ | २९ | सहस्रसंहिताभेदम् | ३ | ६ | ३ |
| सर्वाणि तत्र भूतानि | ६ | ५ | ८० | सहस्रस्यापि विप्राणाम् | ३ | १५ | ५६ |
| सर्वार्थास्त्वमज विकल्पनाभिरैतैः | ५ | १८ | ५५ | सह ताभ्यां तदाक्रूरः | ५ | १८ | ४ |
| सर्वाभिश्च ताभिस्तथैव | ४ | २ | ११० | सहालापस्तु संसर्गः | ३ | १८ | १०० |
| सर्वात्मा सर्ववित्सर्वः | ५ | १७ | ९ | स हि संसिद्धकार्यकरणः | ४ | ८ | ९ |
| सर्वा यशोदया सार्द्धम् | ५ | ७ | २६ | स हि देवासुरे युद्धे | ५ | २३ | २२ |
| सर्वेश सर्वभूतात्मन् | १ | ९ | ५७ | साकृष्टा सहसा तेन | ५ | २५ | ११ |
| सर्वेष्वेतेषु वर्षेषु | २ | २ | ५६ | सा क्रीडमाना सुश्रोणी | १ | १५ | २० |
| सर्वे च देवा मनवः | ३ | १ | ४६ | सांख्यज्ञानवतां निष्ठा | ३ | ३ | २६ |
| सर्वे चैते वशं यान्ति | ३ | ७ | ५ | सांगांश्च चतुरो वेदान् | ५ | २१ | २३ |
| सर्वे तेऽभ्यागतज्ञाना | १ | ७ | १० | सागरं चात्मजप्रीतया | ४ | ४ | ३३ |
| सर्वेष्वेतेषु युद्धेषु | ५ | २२ | १२ | सा च बडवा शतयोजन० | ४ | १३ | ९३ |
| सर्वेषामेव भूतानाम् | ६ | ३ | १ | सा च तेनैवमुक्ता | ४ | ६ | २२ |
| सर्वं देहोपभोगाय | ६ | ७ | १६ | सा च कन्या पूर्णेऽपि | ४ | १३ | ११८ |
| सवनगतौ हि क्षत्रियवैश्यौ | ४ | १३ | १०९ | सा चावलोक्य राज्ञः | ४ | १२ | २५ |
| सवनो द्युतिमान् भव्यः | ३ | २ | २३ | सा चैनं रसातलम् | ४ | ३ | ८ |
| सवरूथः सानुकर्षः | २ | १२ | १७ | सा तस्मै कथयामास | ५ | २७ | १६ |
| स वव्रे भगवन् कृत्या | ५ | ३४ | ३१ | सा तत्र पतिता दिक्षु | २ | २ | ३४ |
| सवर्णाधत्त सामुद्री | १ | १४ | ६ | सा तस्य भार्या चिताम् | ४ | ३ | ३० |
| स वा पूर्वमप्युदारविक्रमः | ४ | १४ | ४६ | सातिमुक्तकहारावा | ५ | ५ | १० |
| सविकारं प्रधानं च | १ | २२ | ७७ | सा तु निर्भर्त्सिता तेन | १ | १५ | ४६ |
| स विदेहपुरीं प्रविवेश | ४ | १३ | १०२ | सा तु जातिस्मरा जज्ञे | ३ | १८ | ६३ |
| सविलासस्मिताधारम् | ५ | १७ | २१ | सत्राजिती सत्यभामा | ५ | २८ | ५ |
| स विप्राशापव्याजेन | ५ | ३७ | ५ | सान्दीपनिमसम्भाव्यम् | ५ | २१ | २२ |
| स श्लाघ्यः स गुणी धन्यः | १ | ९ | १३१ | साद्रिद्वीपसमुद्राश्च | १ | २ | ५८ |
| स सर्वः सर्ववित्सर्व० | ६ | ८ | २७ | साधवः क्षीणदोषास्तु | ३ | ११ | ३ |
| स सर्वभूतप्रकृतिं विकारान् | ६ | ५ | ८३ | साधनालम्बनं ज्ञानम् | १ | २२ | ४६ |
पृष्ठ 551स्थायी लिंक
५४०
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| साधितं कृष्ण देवानाम् | ५ | १२ | १० | सीतामयौनिजां जनक० | ४ | ४ | ९३ |
| साधु साधु जगन्नाथ | ५ | १६ | १९ | सीता चालकनन्दा च | २ | ८ | ११३ |
| साधु साध्वस्य रूपम् | ४ | ६ | ७१ | सीमन्तोन्नयने चैव | ३ | १३ | ६ |
| साधु भो किमनन्तेन | १ | १८ | २० | सीरध्वजस्य भ्राता | ४ | ५ | २९ |
| साधु मैत्रेय धर्मज्ञ | १ | १ | १२ | सीरध्वजस्यापत्यम् | ४ | ५ | ३० |
| साध्या विश्वेऽथ मरुतः | ५ | ३० | ६३ | सुकुमारसंज्ञाय बालकाय | ४ | १३ | ३४ |
| साध्विदं ममापत्यरहितस्य | ४ | १२ | १९ | सुकुमारस्तनुर्गर्भे | ६ | ५ | १० |
| साध्वीविक्रयकृद्धन्ध० | २ | ६ | ११ | सुकुमारी कुमारी च | २ | ४ | ६५ |
| सानुरागश्च तस्यां बुधः | ४ | १ | १२ | सुक्षेत्रश्चोत्तमौजाश्च | ३ | २ | २८ |
| सान्तानिकादयो वा ते | ५ | ३८ | ३८ | सुखबुद्ध्या मया सर्वम् | ५ | २३ | ४१ |
| सापह्ननं मम मनः | ५ | २० | ९९ | सुखदुःखोपभोगौ तु | २ | १३ | ८१ |
| सापि द्वितीये सम्प्राप्ते | ३ | १८ | ७३ | सुखोदयस्थाननन्दः | २ | ४ | ४ |
| सापि तावता कालेन | ४ | १३ | १२३ | सुखं सिद्धियशः कीर्तिः | १ | ७ | ३१ |
| साफल्यमक्षणोर्युगमेतदत्र | ५ | १७ | २७ | सुगन्धमेतद्राजार्हम् | ५ | २० | ६ |
| सामवेदतरोश्शाखा | ३ | ६ | १ | सुतामजैस्ततनयैश्च भूयः | ४ | २ | १२२ |
| साम चोपप्रदानं च | १ | १९ | ३५ | सुताराख्या कन्या च | ४ | १४ | ९ |
| साम चोपप्रदानं च | ५ | २२ | १७ | सुतृप्तैस्तैरनुज्ञातः | ३ | १५ | ३९ |
| सामपूर्वं च दैतेयाः | १ | ९ | ७९ | सुत्रामाणः सुकर्माणः | ३ | २ | ३८ |
| सामस्वरूपी भगवान् | १ | ८ | २२ | सुदासात्सौदासः | ४ | ४ | ४० |
| सामर्थ्ये सति तत्त्याज्यम् | ३ | ८ | ४० | सुद्युम्नस्तु स्त्रीपूर्वकत्वात् | ४ | १ | १५ |
| सामानि जगतीच्छन्दः | १ | ५ | ५५ | सुधनुर्ज्जन्तुपरीक्षित् | ४ | १९ | ७८ |
| सामान्यस्सर्वलोकस्य | ५ | ३० | ४६ | सुधनुषः पुत्रस्सुहोत्रः | ४ | १९ | ७९ |
| साम्प्रतं च जगत्स्वामी | ५ | १७ | ११ | सुधामानस्तथा सत्या | ३ | १ | १४ |
| साम्प्रतं महीतलेऽष्टाविंशति० | ४ | १ | ७६ | सुधामा शङ्कपाच्चैव | २ | ८ | ८३ |
| सा यदा धारणा तद्वत् | ६ | ७ | ८९ | सुनिवातेषु देशेषु | ५ | ११ | १८ |
| सारं समस्तगोष्ठस्य | ५ | १८ | १६ | सुनीथा नाम या कन्या | १ | १३ | ११ |
| सार्धकोटिस्तथा सप्त | २ | ८ | ३ | सुनीतिरपि ते माता | १ | १२ | ९४ |
| सार्टिमाष्टिशिशुसत्य० | ४ | १५ | २१ | सुनीतिर्नाम तन्माता | १ | १२ | १४ |
| सालम्बनो महायोगः | १ | २२ | ६२ | सुनीतिर्नाम या राज्ञः | १ | ११ | ३ |
| सावर्णिस्तु मनुर्योऽसौ | ३ | २ | १५ | सुपारात्पृथुः | ४ | १९ | ४२ |
| साशीतिमण्डलशतम् | २ | १० | १ | सुप्तांश्च तानृपीन्नैव | ४ | २ | ५२ |
| साश्वं च तं निहत्य | ४ | १३ | ३२ | सुप्तेषु तेषु अतीव | ४ | २ | ५१ |
| सितनीलादिभेदेन | २ | १६ | २२ | सुप्रभाताद्य रजनी | ५ | १८ | २४ |
| सितदीर्घादिनिशेष० | ५ | ३० | ८ | सुप्रसन्नादित्यचन्द्रादि० | ४ | १५ | ३२ |
| सिन्धवो निजशब्देन | ५ | ३ | ५ | सुबालस्तूनीतो भविता | ४ | २३ | ९ |
| सिन्धुतटदावीकोर्वी | ४ | २४ | ६९ | सुबाहुप्रमुखांश्च क्षयम् | ४ | ४ | ९० |
| सिसृक्षुरन्यदेहस्थः | १ | ५ | ३३ | सुभद्रायां चारुभक्त्वेऽपि | ४ | २० | ५१ |
| सिंहनादं ततश्चक्रे | ५ | १४ | ८ | सुभ्रु त्वामहम् | ४ | ६ | ४० |
| सिंहासनगतः शक्रः | १ | ९ | ११६ | सुमतिम्प्रतिरथं ध्रुवम् | ४ | १९ | ४ |
| सिंहिका चाभवत्कन्या | १ | १५ | १४१ | सुमतिः पुत्रसहस्राणि | ४ | ४ | ४ |
| सिंहः प्रसेनमवधीत् | ४ | १३ | ४२ | सुमतिश्चाग्निवर्चाश्च | ३ | ६ | १७ |
पृष्ठ 552स्थायी लिंक
५४१
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सुमहांच्छायमनावृष्टिः | ४ | १३ | १३३ | सृज्जयात् पुरूज्जयः | ४ | १८ | ४ |
| सुमन्तुस्तस्य पुत्रोऽभूत् | ३ | ६ | २ | सृज्जयात्सहदेवः | ४ | १ | ५४ |
| सुमतिर्भरतस्याभूत् | २ | १ | ३३ | सृष्टाः कालेन कालेन | ५ | ३८ | ५७ |
| सुमतस्तेजसस्तस्मात् | २ | १ | ३६ | सृष्टिस्थित्यन्तकालेषु | १ | २२ | ४१ |
| सुमेधा विरजाश्चैव | ३ | १ | २८ | सृष्टिस्थितिविनाशानाम् | १ | ७ | ४७ |
| सुयोधनस्य तनयाम् | ५ | ३५ | ४ | सृष्टिस्थित्यन्तकरणीम् | १ | २ | ६६ |
| सुरम्याणि तथा तासु | २ | २ | ४७ | सृष्टिं चिन्तयतस्तस्य | १ | ५ | ४ |
| सुरभिर्विनता चैव | १ | १५ | १२५ | सृष्टं च पात्यनुयुगम् | १ | २ | ६२ |
| सुरसायां सहस्रं तु | १ | २१ | १९ | सेतुपुत्र आरब्धनामा | ४ | १७ | ३ |
| सुरासुरगन्धर्वयक्ष० | ४ | १३ | ५३ | सेन्द्रै रुद्रानिग्वसुभिः | ५ | ७ | ३७ |
| सुरापो ब्रह्महा हर्ता | २ | ६ | ९ | सेयं धात्री विधात्री च | २ | ४ | ९७ |
| सुरासमस्तास्सुरनाथ कार्यम् | ५ | १ | ५९ | सैन्धवान्मुञ्जिकेशश्च | ३ | ६ | १३ |
| सुराश्च सकलास्स्वांशैः | ५ | १ | ६२ | सैव च मित्रावरुणयोः | ४ | १ | १० |
| सुरामांसोपहारैश्च | ५ | १ | ८६ | सैष विष्णुः स्थितः स्थित्याम् | २ | ११ | ८ |
| सुरुचिर्दयिता राज्ञः | १ | ११ | २७ | सैष भ्रमन् भ्रामयति | २ | ९ | २ |
| सुरुचिः सत्यमाहेदम् | १ | ११ | १६ | सैषा धात्री विधात्री च | १ | १३ | ९२ |
| सुवर्चला तथैवोषाः | १ | ८ | ८ | सोऽतिकोपादुपालभ्य | ५ | १५ | ५ |
| सुवर्णमणिरत्नादौ | ६ | १ | १७ | सोऽधिरुह्य महानागम् | ५ | १२ | २ |
| सुवर्णाञ्जनचूर्णाभ्याम् | ५ | ९ | ५ | सोऽनपत्योऽभवत् | ४ | १६ | ४ |
| सुवृद्धेः केवलः | ४ | १ | ३८ | सोऽपि च तामतिशायितसकल० | ४ | ६ | ३७ |
| सुशर्माणं तु काण्वम् | ४ | २४ | ४३ | सोऽपि प्रविष्टो यवनः | ५ | २३ | १९ |
| सुशीलो भव धर्मात्मा | १ | ११ | २४ | सोऽपि तत्काल एवान्यैः | ४ | ५ | ६ |
| सुरोदकः परिवृतः | २ | ४ | ३४ | सोऽपि पौरवं यौवनम् | ४ | १० | १८ |
| सुहोत्राद्धस्ती य इदम् | ४ | १९ | २८ | सोऽपि कैशोरकवयः | ५ | १३ | ६० |
| सूक्ष्मातिसूक्ष्मातिबृहत्प्रमाण | ५ | १ | ५६ | सोऽप्यतीन्द्रियमालोक्य | ५ | २१ | २५ |
| सूतेनोक्तान् गुणानित्थम् | १ | १३ | ६४ | सोऽप्येनं ध्वजवज्राब्ज० | ५ | १८ | २ |
| सूदयाम्येव दैत्येन्द्र | १ | १९ | १६ | सोऽप्येनं मुष्टिना मूर्ध्नि | ५ | २० | ७८ |
| सूदयंतस्तपानुग्रः | ५ | १४ | ६ | सोमदतं शलं चैव | ५ | ३५ | २८ |
| सूर्यस्य वंशा भगवान् | ४ | ६ | १ | सोमदत्तः कृशाश्वाज्जज्ञे | ४ | १ | ५६ |
| सूर्यस्य पत्नी संज्ञाभूत् | ३ | २ | २ | सोमदत्तस्यापि भूरि० | ४ | २० | ३२ |
| सूर्यरश्मिः सुषुम्ना यः | २ | ११ | २२ | सोमकाज्जन्तुः | ४ | १९ | ७२ |
| सूर्याचन्द्रमसौ ताराः | २ | ९ | ३ | सोमसंस्था हविस्संस्थाः | ३ | ११ | २४ |
| सूर्यात्सोमात्तथा भौमात् | १ | १२ | ९१ | सोमस्य भगवान्वर्चाः | १ | १५ | ११२ |
| सूर्यादीनां द्विजश्रेष्ठ | १ | ८ | ९ | सोमार्कान्ग्र्म्बुवायूनाम | ३ | १२ | २७ |
| सूर्यादीनां च संस्थानम् | १ | १ | ७ | सोमाधारः पितृगणः | ३ | १५ | ५५ |
| सूर्याशुजनितं तापम् | ५ | १० | १३ | सोमं पञ्चदशे भागे | २ | १२ | ११ |
| सूर्येणाभ्युदितो यश्च | ३ | ११ | १०२ | सोऽयमेको यथा वेदः | ३ | ४ | १५ |
| सूर्यो द्वादशभिः शैघ्र्यान् | २ | ८ | ३४ | सोऽयं येन हता घोराः | ५ | २० | ४५ |
| सृजत्येष जगत्सृष्टौ | १ | २२ | २२ | सोऽयं सोऽयमितीत्युक्ते | ५ | ३२ | २६ |
| सृज्यते भवता सर्वम् | ५ | ७ | ७२ | सोऽयं त्वयैव दत्तो मे | ५ | २९ | २४ |
| सृज्यस्वरूपगर्भासि | ५ | २ | ८ | सोऽयं सप्तगणः सूर्य० | २ | १० | २३ |
पृष्ठ 553स्थायी लिंक
५४२
| श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सोऽयं यः कालियं नागम् | ५ | २० | ४६ | स्त्रीभिर्नैरैश्च सानन्दम् | ५ | १९ | १३ |
| सोऽवगाहत निःशंकः | ५ | ९ | १० | स्त्रीवधे त्वं महापापम् | १ | १३ | ७३ |
| सोऽहमिच्छामि तच्छ्रोतुम् | ३ | ७ | ७ | स्त्रीसहस्राण्यनेकानि | ५ | ३८ | ५१ |
| सोऽहमिच्छामि धर्मज्ञ | १ | १ | ४ | स्थानभ्रंशं न चाप्नोति | १ | १२ | १०३ |
| सोऽहं त्वां शरणमपारमप्रमेयम् | ५ | २३ | ४७ | स्थानात्स्थानं दशगुणम् | ६ | ३ | ४ |
| सोऽहं गन्ता न चागन्ता | २ | १५ | २५ | स्थानेनेह न नः कार्यम् | ५ | ६ | २२ |
| सोऽहं न पापमिच्छामि | १ | १९ | ७ | स्थाप्यः कुवलयापीडः | ५ | २० | २३ |
| सोऽहं तथा यतिष्यामि | १ | ११ | २६ | स्थालीस्थमग्निसंयोगात् | २ | ४ | ८९ |
| सोऽहं वदाम्यशेषं ते | १ | १ | ३० | स्थावरान्ताः सुराद्यास्तु | १ | ५ | २९ |
| सोऽहं ते देवदेवेश | ५ | ७ | ७० | स्थावराः कृमयोऽब्जाश्च | २ | ६ | ३४ |
| सोऽहं यास्यामि गोविन्द | ५ | १६ | २७ | स्पर्शमात्रं तु वै वायुः | १ | २ | ४१ |
| सोऽहं साम्प्रतमायात: | ५ | २९ | ७ | स्थिते तिष्ठेद्व्रजेद्याते | ३ | ९ | ४ |
| सौम्यासौम्यैस्तदा शान्ता० | १ | ७ | १५ | स्थितौ स्थितस्य मे वध्याः | ३ | १७ | ४३ |
| सौराष्ट्रावन्ति० | ४ | २४ | ६८ | स्थूला मध्यास्तथा सूक्ष्माः | ५ | ३० | १३ |
| संख्यानं यादवानाम् | ४ | १५ | ४६ | स्थूलैः सूक्ष्मैस्तथा सूक्ष्मः | ३ | ७ | ३ |
| संजायते येन तदस्तदोषम् | ६ | ५ | ८७ | स्नातस्त्रग्गन्धधृक्प्रीतः | ३ | ११ | ११७ |
| संज्ञेयमित्यर्थकश्च | ३ | २ | ४ | स्नातस्य सलिले यस्याः | २ | ८ | ११६ |
| संवरणात्कुरुः | ४ | १९ | ७६ | स्नातो नांगानि सम्मार्जैत् | ३ | १२ | २४ |
| संवत्सरं क्रियाहानिः | ३ | १८ | ४१ | स्नातो यथावत्कृत्वा | ३ | ११ | ७७ |
| संवत्सरस्तु प्रथमः | २ | ८ | ७२ | स्नानमेव प्रसाधनहेतुः | ४ | २४ | ८७ |
| संवत्सरादयः पञ्च | २ | ८ | ७१ | स्नानाद्विधूतपापाश्च | २ | ८ | ११९ |
| संशोषकं तथा वायुम् | १ | १९ | २१ | स्नानावसानं ते तस्य | ६ | २ | ५ |
| संसारपतितस्यैकः | ५ | २३ | ३१ | स्नुषां सुतां चापि गत्वा | २ | ६ | १२ |
| संसिद्धायां तु वार्तायाम् | १ | ६ | ३२ | स्पृष्टे स्नानं सचैलस्य | ३ | १८ | ४२ |
| संस्तुतो भगवानित्थम् | ५ | ३१ | १ | स्पृष्टो नखाम्भसा वाथ | ५ | ३८ | ४१ |
| संस्तूयमानो गोपैस्तु | ५ | ९ | ३८ | स्पृष्टो यदंशुभिर्लोकः | ३ | ५ | २३ |
| संस्मृत्य प्रणिपत्यैनम् | ५ | २३ | २६ | स्फटिकगिरिशिलामलः क्व विष्णुः... | ३ | ७ | २३ |
| संहितात्रितयं चक्रे | ३ | ४ | २३ | स्मरतस्तस्य गोविन्दम् | १ | १७ | ४३ |
| संहादपुत्र आयुष्मान् | १ | २१ | १ | स्मराशेषजगद्वीज० | ५ | ९ | २४ |
| स्तम्भस्थदर्पणस्येव | २ | ११ | १९ | स्मर्यतां तन्महाराज | ३ | १८ | ६९ |
| स्तवं प्रचेतसो विष्णुः | १ | १४ | २१ | स्मारितेन यदा त्यक्तः | ३ | १८ | ७९ |
| स्तुतोऽहं यत्त्वया पूर्वम् | ५ | ३ | १४ | स्मृतजन्मक्रमस्सोऽथ | ३ | १८ | ८७ |
| स्तुवन्ति मुनयः सूर्यम् | २ | १० | २० | स्मृते सकलकल्याण० | ५ | १७ | १७ |
| स्तुवन्ति चैनं मुनयः | २ | ११ | १६ | स्यमन्तकमणिरत्नमपि | ४ | १३ | ५६ |
| स्तूयतामेष नृपतिः | १ | १३ | ५३ | स्यमन्तकं च सत्राजिते | ४ | १३ | ६२ |
| स्तोत्रस्य चावसाने ते | ३ | १७ | ३५ | स्रग्धरां पीतवसनम् | ५ | ३४ | १७ |
| स्तोत्रेण यस्तथैतेन | १ | ९ | १३७ | स्रष्टा सृजति चात्मानम् | १ | २ | ६७ |
| स्त्रियोऽनुकम्प्यास्साधूनाम् | ५ | ७ | ५४ | स्रष्टा विष्णुरियं सृष्टिः | १ | ८ | १९ |
| स्त्रियः कलौ भविष्यन्ति | ६ | १ | २१ | स्रुकुण्ड सामस्वरधीरनाद | १ | ४ | ३४ |
| स्त्रीत्वमेवोपभोगहेतुः | ४ | २४ | ७७ | स्वकीयं च यौवनम् | ४ | १० | १७ |
| स्त्रीत्वादगुरुचित्ताहम् | ५ | ३० | ७५ | स्वधर्मकवचं तेषाम् | ३ | १८ | ३५ |
पृष्ठ 554स्थायी लिंक
५४३
| श्लोका: | अंशा० | अध्या० | श्लो० | श्लोका: | अंशा० | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्वधर्मस्याविरोधेन | ६ | २ | २५ | हतेषु तेषु बाणोऽपि | ५ | ३३ | ८ |
| स्वपुरुषमभिवीक्ष्य पाशहस्तम् | ३ | ७ | १४ | हते तु नरके भूमि: | ५ | २९ | २२ |
| स्वपोषणपरा: क्षुद्रा: | ६ | १ | ३० | हत्वा च लवणं रक्ष: | १ | १२ | ४ |
| स्वयंवरे कृते सा तम् | ३ | १८ | ८९ | हत्वा तु केशिनं कृष्ण: | ५ | १६ | १६ |
| स्वयं शुश्रूषणाद्धर्म्यात् | १ | १२ | ९७ | हत्वादाय च वस्त्राणि | ५ | १९ | १७ |
| स्वर्गस्थधर्मिसङ्घर्म० | ३ | १७ | २१ | हत्वा कुवलयापीडम् | ५ | २० | ४२ |
| स्वर्गार्थं यदि वो वाञ्छा | ३ | १८ | १७ | हत्वा बलं सनागाश्वम् | ५ | २६ | १० |
| स्वर्गापवर्गव्यासेध० | १ | १ | १९ | हत्वा चिक्षेप चैवैनम् | ५ | २७ | ४ |
| स्वर्गापवर्गौ मानुष्यात् | १ | ६ | १० | हत्वा सैन्यमशेषं तु | ५ | २७ | १९ |
| स्वर्गाक्षयत्वमतुलम् | ३ | १८ | ९५ | हत्वा मुरं हयग्रीवम् | ५ | २९ | १९ |
| स्वर्गे च कृतप्रियै: | ४ | ४ | ७७ | हत्वा तं पौण्ड्रकं शौरि: | ५ | ३४ | २७ |
| स्वर्भानोस्तुरगा ह्यष्टौ | २ | १२ | २१ | हत्वा गर्वसमारूढ: | ५ | ३८ | १६ |
| स्वर्याते तु रजौ | ४ | ९ | १५ | हन्तव्यो हि महाभाग | ५ | २० | ३४ |
| स्वर्लोकादपि रम्याणि | २ | ५ | ५ | हन्ति यावच्च यत्किञ्चित् | १ | २२ | ३९ |
| स्वल्पमेतत्कारणं यदयम् | ४ | १३ | १३२ | हन्यतां हन्यतामेष: | १ | १२ | २७ |
| स्वल्पाम्बुवृष्टि: पर्जन्य: | ६ | १ | ५२ | हयाश्च सप्तच्छन्दांसि | २ | ८ | ५ |
| स्वल्पेनैव हि कालेन | ३ | १८ | २४ | हरति परधनं निहन्ति जन्तून् | ३ | ७ | २८ |
| स्वल्पेन हि प्रयत्नेन | ६ | २ | ३४ | हरश्च बहुरूपश्च | १ | १५ | १२२ |
| स्वल्पेनैव तु कालेन | ५ | ६ | १० | हरिणाक्रीडनं नाम | ५ | ९ | १२ |
| स्ववर्णधर्माभिरता: | ३ | १७ | ३९ | हरिशंकरयोर्युद्धम् | ५ | ३३ | २२ |
| स्वस्त्रीयं बालकं सोऽथ | ३ | ५ | ६ | हरिममवरचारिष्टाङ्घ्रिपद्मम् | ३ | ७ | १८ |
| स्वस्त्यस्तु ते गमिष्यामि | ५ | १६ | २४ | हरिणीं तां विलोक्याथ | २ | १३ | १८ |
| स्वस्थ: प्रशान्तचित्तस्तु | ३ | ११ | ९१ | हरिता रोहिता देवा: | ३ | २ | ३४ |
| स्वस्था: प्रजा निरातंका: | २ | २ | ५४ | हर्षश्वेष्वथ नष्टेषु | १ | १५ | ९६ |
| स्वाचान्तस्तु तत: कुर्यात् | ३ | ११ | २२ | हर्य्यङ्गाद्द्रथरथ: | ४ | १८ | २२ |
| स्वादूदकेनोदधिना | २ | ४ | ८६ | हर्षप्रायमसंसर्गि | ३ | १७ | २२ |
| स्वादूदकस्य परित: | २ | ४ | ९३ | हलं च बलभद्रस्य | ५ | २२ | ७ |
| स्वाध्यायगोत्राचरणम् | ३ | ११ | ६३ | हविर्धानात् षडाग्नेयी | १ | १४ | २ |
| स्वाध्यायसंयमाभ्यां स | ६ | ६ | १ | हविष्मान्सुकृतस्सत्य: | ३ | २ | २७ |
| स्वाध्यायाद्योगमासीत | ६ | ६ | २ | हविष्यमत्स्यमांसांस्तु | ३ | १६ | १ |
| स्वाध्यायशौचसन्तोष० | ६ | ७ | ३७ | हस्तसंस्पर्शमात्रेण | ५ | १३ | ३९ |
| स्वायम्भुवो मनु: पूर्वम् | ३ | १ | ६ | हस्तन्यस्ताग्रहस्तेयम् | ५ | १३ | ३८ |
| स्वायम्भुवं तु कथितम् | ३ | १ | ८ | हस्ते तु दक्षिणे चक्रम् | १ | १३ | ४५ |
| स्वारोचिषश्चोत्तमश्च | ३ | १ | २४ | हस्तेन गृह्य चैकैकाम् | ५ | १३ | ५० |
| स्वीकरणमेव विवाहेहेतु: | ४ | २४ | ८९ | हालाहलाप्तललक: | ४ | २४ | ४७ |
| स्वेनैव कृष्णो रूपेण | ५ | १० | ४८ | हालाहलं विषमहो | १ | १६ | १० |
| स्वं स्वं वै भुञ्जतां तेषाम् | ५ | ३७ | ४१ | हालाहलं विषं तस्य | १ | १८ | ३ |
| ह० | हालाहलं विषं घोरम् | १ | १८ | ५ | |||
| हतवीर्यो हतविष: | ५ | ७ | ७६ | हाहाकारो महाञ्जज्ञे | ५ | २० | ३३ |
| हतेषु तेषु कंसेन | ५ | १ | ७३ | हाहाकारो महाञ्जज्ञे | ५ | २० | ४४ |
| हतेषु तेषु देवेन्द्र | ५ | १२ | २२ | हा हा क्वासाविति जन: | ५ | ७ | २१ |
पृष्ठ 555स्थायी लिंक
५४४
| श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० | श्लोकाः | अंशाः | अध्या० | श्लो० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| हिडिम्बा घटोत्कचम् | ४ | २० | ४५ | हिंसाहिंसे मृदुक्रूरे | १ | ५ | ६१ |
| हितं मितं प्रियं काले | ३ | १२ | ३४ | हृदयस्थस्ततस्तस्य | १ | १९ | २४ |
| हिमवान्हेमकूटश्च | २ | २ | ११ | हृदि नारायणस्तस्य | २ | ९ | २४ |
| हिमालयं स्थावराणाम् | १ | २२ | ८ | हृदि यदि भगवाननादिरास्ते | ३ | ७ | २७ |
| हिमाह्वयं तु वै वर्षम् | २ | १ | २७ | हृदि संकल्प्य यद्रूपम् | ५ | ७ | ६९ |
| हिमाम्बुघर्मवृष्टीनाम् | ३ | ५ | २० | हृदि नारायणश्चास्ते | २ | १२ | ३२ |
| हिरण्यधान्यतनय० | ६ | ५ | ३८ | हे दिग्गजाः संकटदन्तमिश्राः | १ | १७ | ४१ |
| हिरण्यगर्भादिषु च | ६ | ७ | ५१ | हे दैत्यपतयो ब्रूत | ३ | १८ | ३ |
| हिरण्यकशिपोः पुत्राः | ५ | १ | ७० | हे प्रलम्ब महाबाहो | ५ | ४ | २ |
| हिरण्यकशिपोः पुत्राः | १ | १५ | १४२ | हेमचन्द्रश्च विशालस्य | ४ | १ | ५० |
| हिरण्यकशिपुत्वे च | ४ | १५ | १ | हेमकूटं तथा वर्षम् | २ | १ | १९ |
| हिरण्यनाभस्य पुत्रः | ४ | ४ | १०८ | हे राम हे कृष्ण सदा | ५ | ८ | ४ |
| हिरण्यनाभशिष्यस्तु | ३ | ६ | ७ | हे विप्रचित्ते हे राहो | १ | १९ | ५२ |
| हिरण्यनाभात्तावत्यः | ३ | ६ | ५ | हे सूदा मम पुत्रोऽसौ | १ | १८ | २ |
| हिरण्यनाभः कौसल्यः | ३ | ६ | ४ | हे हर्यश्वा महावीर्याः | १ | १५ | ९२ |
| हिरण्मयं रथं यस्य | ३ | ५ | २५ | हे हे शालिनि मद्गेहे | २ | १५ | १४ |
| हिरण्यकशिपुः श्रुत्वा | १ | १९ | १ | हैहयपुत्रो धर्मस्तस्यापि | ४ | ११ | ८ |
| हिरण्यगर्भपुरुष० | १ | ११ | ५५ | होमदेवार्चनाद्यासु | ३ | १२ | २० |
| हिरण्यगर्भवचनम् | २ | १३ | ४४ | होमैर्जपैस्तथा दानैः | ३ | १८ | ५६ |
| हिरण्यरोमा वेदश्रीः | ३ | १ | २२ | हंसकुन्देन्दुधवलम् | ५ | १७ | २३ |
| हिरण्यगर्भदेवेन्द्र० | ६ | ८ | २२ | ह्रस्वदीर्घप्लुतैर्यत्तु | ६ | ४ | ४४ |
| हिरण्यगर्भो भगवान् | ६ | ७ | ५६ | ह्रासवृद्धी त्वहर्भागैः | २ | ८ | ६० |
| हिंसा भार्या त्वधर्मस्य | १ | ७ | ३२ | ह्लादिनी सन्धिनी संवित् | १ | १२ | ६८ |
पृष्ठ 556स्थायी लिंक
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
पृष्ठ 557स्थायी लिंक
प० गीताप्रेस — २७३००५
मोरखपुर, फोन (०५५१) २३३४७२१
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharada Peeth
पृष्ठ 558स्थायी लिंक
गीताप्रेस गोरखपुर
GITA PRESS, GORAKHPUR [SINCE 1923]
गीताप्रेस, गोरखपुर — २७३००५
फोन : (०५५१) २३३४७२१, २३३१२५०, २३३१२५१
e-mail : booksales@gitapress.org — थोक पुस्तकोंसे सम्बन्धित सन्देश भेजें।
Gita Press website : www.gitapress.org/gitapressbookshop.in — सूची-पत्र तथा पुस्तकोंका विवरण पढ़ें एवं गीताप्रेसकी खुदरा पुस्तकें Online डाकसे/कूरियरसे मँगवायें।
Code 48
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth