विष्णुधर्मोत्तर पुराण (तृतीय खण्ड - चित्रसूत्र, वास्तु, शिल्प व प्रतिमा लक्षण)

विष्णुधर्मोत्तर पुराण (तृतीय खण्ड - चित्रसूत्र, वास्तु, शिल्प व प्रतिमा लक्षण)
Vishnudharmottara Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (सम्पादक: डॉ. प्रियबाला शाह) द्वारा
स्रोत: Sri Vishnu Dharmottara Mahapuranam 1000p Classic Edition (उद्गम)
DevanagariHindipublished1,001 पृष्ठ
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| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| २६५ | अयोध्यायां विरहिणीवर्णनम् | १६० | १ |
| २६६ | अयोध्यायां प्रेषितभर्तृकावर्णनम् | ” | २ |
| २६७ | भरतचमूं सैनिकानां निशाविहारवर्णनम् | ” | ” |
| २६८ | युद्धोद्योगान्वितसैन्यवर्णनम् | १६१ | १ |
| २६९ | भरतसैन्यनिर्याणम् | ” | ” |
| २६० | भरतगन्धर्वसैन्ययोः संकुलसमरवर्णनम् | ” | २ |
| २६१ | भरतशैलूषराजपुत्रयोर्युद्धवर्णनम् | १६३ | १ |
| २६२ | भरतस्य गन्धर्वैस्तृतीयदिवसयुद्धवर्णनम् | १६६ | १ |
| २६३ | चतुर्थदिवसयुद्धवृत्तान्तः | १६७ | १ |
| २६४ | पञ्चमदिवसयुद्धोदन्तः | ” | २ |
| २६५ | शैलूषे हतशरे भरते च तथाविधे भीषणयुद्धानन्तरं षष्ठदिवसयुद्धविरतिः | १६८ | १ |
| २६६ | नानामाययुद्धे भरतविहितशैलूषवधे सञ्जाते शैलूषपुत्राधिष्ठितान्त्रिकोडिगन्धर्वसेनानामपि नाशे शक्रस्य भरतसमीपे वरदानार्थं गमनम्, सिन्धुकुलयोः प्रदर्श्य तत्पुत्रयो राज्ये रत इत्याभिधाय स्वर्गगमनञ्च, भरतं सभाजयित्वा चित्ररथस्यापि नाकभ्रमणम् | ” | २ |
| २६७ | भरतयुधाजितोः स्वशिबिरं गच्छतोर्यथाजितकृतसमरसूक्ष्मवर्णनम् | १६९ | ” |
| २६८ | रणभूमी गतासुन्गन्धर्वान्विलोक्य हृदयद्रावकं गन्धर्वीविलपनम् | १७० | ” |
| २६९ | रणात्प्रतिनिवृत्तस्य भरतस्य रामसाक्षात्कारविर्जितगन्धर्वसत्त्वानां रामाय निवेदनम् | १७१ | ” |
॥ इति प्रथमखण्डः ॥
अथ द्वितीयखण्डः ।
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| १ | रामस्य पुष्करगृहगमनम् | १७४ | १ |
| २ | राष्ट्रराजप्रशंसा | ” | २ |
| ३ | राजलक्षणानि | ” | ” |
| ४ | सांवत्सरिकलक्षणानि | ” | ” |
| ५ | पुरोहितलक्षणानि | १७५ | १ |
| ६ | राजमन्त्रिलक्षणानि | ” | ” |
| ७ | राजामहिषीपत्निलक्षणानि | ” | ” |
| ८ | श्रेष्ठपुरुषलक्षणानि | १७६ | १ |
| ९ | श्रेष्ठस्त्रीलक्षणानि | १७७ | १ |
| १० | प्रशस्तहस्तिलक्षणानि | ” | २ |
| ११ | अश्वानांमशुभशुभलक्षणानि | ” | ” |
| १२ | चामरलक्षणम् | १७८ | १ |
| १३ | छत्रलक्षणम् | ” | ” |
| १४ | भद्रासनलक्षणम् | ” | २ |
| १५ | खड्गलक्षणानि तेषां विचित्रफलानि च | ” | ” |
| १६ | चापशरलक्षणानि | १७९ | १ |
| १७ | यज्ञेन यजतो ब्रह्मणः खे विप्रसम्भवावायां पावकत्वाद्वैद्रं स्वभोत्पत्तिः, ब्रह्मण तस्मिन् विष्णौ दत्ते तेन यज्ञोपद्रवकर्तृलोहदंष्ट्र्ये हते ब्रह्मयज्ञसमाप्तिः, | ” | २ |