संग्रह पर लौटें




















विष्णुधर्मोत्तर पुराण (तृतीय खण्ड - चित्रसूत्र, वास्तु, शिल्प व प्रतिमा लक्षण)
Vishnudharmottara Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (सम्पादक: डॉ. प्रियबाला शाह) द्वारा
स्रोत: Sri Vishnu Dharmottara Mahapuranam 1000p Classic Edition (उद्गम)
DevanagariHindipublished1,001 पृष्ठ
पृष्ठ 27स्थायी लिंक
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| २६५ | अयोध्यायां विरहिणीवर्णनम् | १६० | १ |
| २६६ | अयोध्यायां प्रेषितभर्तृकावर्णनम् | ” | २ |
| २६७ | भरतचमूं सैनिकानां निशाविहारवर्णनम् | ” | ” |
| २६८ | युद्धोद्योगान्वितसैन्यवर्णनम् | १६१ | १ |
| २६९ | भरतसैन्यनिर्याणम् | ” | ” |
| २६० | भरतगन्धर्वसैन्ययोः संकुलसमरवर्णनम् | ” | २ |
| २६१ | भरतशैलूषराजपुत्रयोर्युद्धवर्णनम् | १६३ | १ |
| २६२ | भरतस्य गन्धर्वैस्तृतीयदिवसयुद्धवर्णनम् | १६६ | १ |
| २६३ | चतुर्थदिवसयुद्धवृत्तान्तः | १६७ | १ |
| २६४ | पञ्चमदिवसयुद्धोदन्तः | ” | २ |
| २६५ | शैलूषे हतशरे भरते च तथाविधे भीषणयुद्धानन्तरं षष्ठदिवसयुद्धविरतिः | १६८ | १ |
| २६६ | नानामाययुद्धे भरतविहितशैलूषवधे सञ्जाते शैलूषपुत्राधिष्ठितान्त्रिकोडिगन्धर्वसेनानामपि नाशे शक्रस्य भरतसमीपे वरदानार्थं गमनम्, सिन्धुकुलयोः प्रदर्श्य तत्पुत्रयो राज्ये रत इत्याभिधाय स्वर्गगमनञ्च, भरतं सभाजयित्वा चित्ररथस्यापि नाकभ्रमणम् | ” | २ |
| २६७ | भरतयुधाजितोः स्वशिबिरं गच्छतोर्यथाजितकृतसमरसूक्ष्मवर्णनम् | १६९ | ” |
| २६८ | रणभूमी गतासुन्गन्धर्वान्विलोक्य हृदयद्रावकं गन्धर्वीविलपनम् | १७० | ” |
| २६९ | रणात्प्रतिनिवृत्तस्य भरतस्य रामसाक्षात्कारविर्जितगन्धर्वसत्त्वानां रामाय निवेदनम् | १७१ | ” |
॥ इति प्रथमखण्डः ॥
अथ द्वितीयखण्डः ।
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| १ | रामस्य पुष्करगृहगमनम् | १७४ | १ |
| २ | राष्ट्रराजप्रशंसा | ” | २ |
| ३ | राजलक्षणानि | ” | ” |
| ४ | सांवत्सरिकलक्षणानि | ” | ” |
| ५ | पुरोहितलक्षणानि | १७५ | १ |
| ६ | राजमन्त्रिलक्षणानि | ” | ” |
| ७ | राजामहिषीपत्निलक्षणानि | ” | ” |
| ८ | श्रेष्ठपुरुषलक्षणानि | १७६ | १ |
| ९ | श्रेष्ठस्त्रीलक्षणानि | १७७ | १ |
| १० | प्रशस्तहस्तिलक्षणानि | ” | २ |
| ११ | अश्वानांमशुभशुभलक्षणानि | ” | ” |
| १२ | चामरलक्षणम् | १७८ | १ |
| १३ | छत्रलक्षणम् | ” | ” |
| १४ | भद्रासनलक्षणम् | ” | २ |
| १५ | खड्गलक्षणानि तेषां विचित्रफलानि च | ” | ” |
| १६ | चापशरलक्षणानि | १७९ | १ |
| १७ | यज्ञेन यजतो ब्रह्मणः खे विप्रसम्भवावायां पावकत्वाद्वैद्रं स्वभोत्पत्तिः, ब्रह्मण तस्मिन् विष्णौ दत्ते तेन यज्ञोपद्रवकर्तृलोहदंष्ट्र्ये हते ब्रह्मयज्ञसमाप्तिः, | ” | २ |
पृष्ठ 28स्थायी लिंक
| वि० ध० | अनु० | |||||
|---|---|---|---|---|---|---|
| ॥१०॥ |
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १८ | राज्याभिषेककालिकनिर्णयः ... | १८० | २ | ३३ | साध्वीप्रशंसामिधानम् ... | १९६ | १ |
| १९ | पुरन्दरशान्तिवर्णनम् ... | ,, | ,, | ३४ | पतिव्रताकर्तव्यवर्णने मूलकर्म- (मन्त्रतन्त्रवशीकरणादि)-निन्दा | ,, | २ |
| २० | शुभलक्षणविप्रकथनम् ... | १८१ | १ | ३५ | स्त्रीदण्डताडनादिनिरूपणम् ... | १९७ | २ |
| २१ | राज्याभिषेकविविधवर्णनम् ... | ,, | ,, | ३६ | सावित्र्युपाख्याने सावित्रीसत्यवतोर्गन्धनार्थं वनगमनम् ... | १९९ | १ |
| २२ | अभिषेकमन्त्रवर्णनम् ... | १८२ | १ | ३७ | काष्ठानि पाटयतः सत्यवतः शिरोवेदनया पंचत्वे यमेन तस्य लिंगशरीरस्य नयनं सावित्र्याश्च तदनुगमनञ्चादर्श विलोक्य यमेन वरदानम् | ,, | ,, |
| २३ | तीर्थफलवर्णनम् ... | १८५ | २ | ३८ | सावित्रीपमोपाख्याने सावित्र्यै महोदरभ्रातृशतप्राप्तिवरदानम् ... | २०० | १ |
| २४ | शूरकुलीनबलवन्नाङ्गादिसम्पद्युक्तसहायवरणप्रसंगे सेनापतिप्रतीहारहस्तिक्षा निधिविग्रहकेलेखकखड्गधारिकोशध्यारि सारथिसदस्य क्षमधर्माध्यक्षादिराजकार्यसहायकनिरूपणम् | १८६ | १ | ३९ | सावित्र्यै यमेनशूरशतपुत्रप्राप्तिवरदानम् ... | २०१ | १ |
| २५ | राजानुजीविपवर्णनम् ... | १८७ | २ | ४० | सावित्रीस्तुतितुष्टयमेन सत्यवतः परित्यक्तगात्रस्या आयुर्वान्ते स्वर्गभोगप्राप्तिवरदानम् ... | ,, | ,, |
| २६ | दुर्गसम्पत्तिवर्णनम् ... | १८८ | १ | ४१ | प्राप्तजीवनः सत्यवान् सावित्र्या सह गृहं गतः, तंत्पिता लब्धचक्षुर्मूत्वा राज्यमपि लेभे ... | ,, | ,, |
| २७ | रक्षोघ्नविद्यौषधादिधारणम् ... | १९० | १ | ४२ | राज्ञा सदा गोपालनं कर्तव्यं, गोग्रासप्रदानगोप्रेमनतदनुगमनतदर्तिहरणादिमाहात्म्यवर्णनम् ... | ,, | ,, |
| २८ | विषदातृलक्षणं विषसंसृष्टान्नपरीक्षणादि ... | ,, | २ | ४३ | गोचिकित्सावर्णनम् ... | २०३ | |
| २९ | गृहादिनिर्माणाय भूमिपरीक्षणाग्निइत्यादिकरणावास्तुदेवतादिग्विभागवृक्षशुभाशुभविचारशालान्यासादिवास्तुविद्यावर्णनम् | १९२ | २ | ४४ | गोशान्तिकर्मभवेर्गोनाधवृक्चुद्कंपदंश्यप्रभृतिनिन्द्यागववर्णनम् | २०४ | |
| ३० | गृहोचितदिषु वृक्षरोपणसुद्यानकूपवाप्यादिनिर्माणं फलपुष्पसम्पत्तये भैषज्यदोहने वृक्षायुर्वेदादि च ... | १९३ | २ | ४५ | मन्थे अश्वप्रशंसा, अश्वितैषु तद्वैद्यवतःमङ्गलम | २०५ | |
| ३१ | देवतागृहेलेपनानन्तरंमाल्यानुलेपनपताकादानपूजनादिमाहात्म्यकथनपुरस्सरं देवद्रव्यापहरणादिदोषकथनम् | १९४ | १ | ४६ | अश्वचिकित्सा ... | ||
| ३२ | ब्राह्मणमाहात्म्यवर्णनम् ... | १९५ | १ | ४७ | अश्वशान्तिः ... | २०६ | |
| ४८ | गजप्रशंसा, हस्तिषु तेषु गजनाशः | २०७ | |||||
| ४९ | हस्तिचिकित्सा ... | ,, |
पृष्ठ 29स्थायी लिंक
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| ५० | गजशान्तिविधानम् .... | १०८ | २ |
| ५१ | राजपुरुषप्रशंसा .... | ११० | १ |
| ५२ | शोणितमदरक्तगुल्मौपशमतोदोषीकरणमासिलीकर्णपीततनीकरणादिपूर्वकं सुप्रसन्नत्यर्थं केशवाराधनेच्छाविमलनागौषधिविधेवणादिकथनम्, विष्णुमादुर्भावादि श्रवणगौदेवब्राह्मणपूजनपुरस्सरं धौम्यपरिचारिकाभिः सूतिकागृहं प्रविश्य सुसंतानार्थिनी नारी वातानुलोमनादि कृत्वा प्रसव्यमुदपं वलिकर्माद्याचरेत् । ततश्च जातनामकर्मनिष्क्रमणान्नप्राशनाङ्गदुन्तजनने शांत्यादि .... | ,, | २ |
| ५३ | पुत्रीयरोहिणीस्नानवर्णनम् .... | २१३ | २ |
| ५४ | पुत्रीयसप्तमीव्रतकथनम् .... | ,, | ,, |
| ५५ | पुत्रीयाष्टमीव्रतम् .... | ,, | ,, |
| ५६ | नानौषधैः पुत्रचिकित्साकथने विष्णुभक्तैः सर्वामयैकौषधित्वकथनम् | २१४ | १ |
| ५७ | सर्वरोगनाशकशतभिषास्नानविधिः .... | २१६ | २ |
| ५८ | पौषशुक्लद्वितीया-(आरोग्यद्वितीया)-यां बालेन्दुद्विजब्राह्मणानां च पूजनादारोग्यपुष्टिदिलाभः .... | ,, | ,, |
| ५९ | आरोग्यप्राप्तिविधानं फलञ्च .... | २१७ | १ |
| ६० | आरोग्याव्रतविधानम् .... | ,, | ,, |
| ६१ | शमदमाशामशतममशिशिवेषशोवेक्षणादिप्रमन्वेन धनवृद्विपुरस्सरं प्रजारक्षणम् .... | ,, | २ |
| ६२ | धर्माधिरोधिकाभसेवोवाविचारपुरस्सरमन्तःपुरीचिन्तनम् .... | २१९ | १ |
| ६३ | भोज्यभक्ष्यलेह्यचोष्यपेयोति भोज्यकल्पनाकथनम् .... | २१९ | १ |
| ६४ | शोधनशमनविरेचनभावनापाकशोधनतृषनवासनादिगन्धयुक्तिकथनम् .... | २२० | २ |
| ६५ | राजधर्मवर्णनम् .... | २२१ | १ |
| ६६ | देवपादृश्यां रथकक्षांयोगि क्रियान्विल्लो समवतंवडापि पुष्पकारम्य श्रेष्ठत्वम् .... | ,, | २२२ २ |
| ६७ | माममाध्ययुक्पनिदेशः .... | ,, | ,, |
| ६८ | जयमिन्द्रांगसंज्ञं भेदविधानम् .... | ,, | २२३ १ |
| ६९ | दानमाहात्म्यम् .... | ,, | ,, |
| ७० | दण्डप्रशंसा .... | ,, | ,, |
| ७१ | दण्डप्रणयनपुरस्सरं राज्ञः सूर्य्यचन्द्रवाय्वयमपावककुबेरवरुणात्मकत्वम् | ,, | ,, |
| ७२ | विविधतापानानुसारं दण्डप्रणायनम् .... | २२४ | २ |
| ७३ | विविधनिषिद्धकर्ममेवनानेकृन्तकथनायश्चित्तानि .... | २२८ | २ |
| ७४ | रहस्यप्रायश्चित्ताव्हानम् .... | २३२ | २ |
| ७५ | मरणाशौचशुद्धिकालकथनम् .... | २३३ | १ |
| ७६ | प्रेतनिर्हरणादिसम्बन्ध्यनादिमतक्रियाशङ्ङ्खस्थितिशंगदापणव्याख्यादिप्रेतहितकृत्यम् .... | ,, | ,, |
| ७७ | सपिण्डीकरणश्राद्धम्.... .... | २३४ | २ |
| ७८ | संसारामार्गतास्यनपुग्ग्मदं धर्मनित्यताधश्चाभानम् .... | ,, | ,, |
| ७९ | द्रव्यशुद्ध्युपायान्कम्.... .... | २३७ | १ |
| ८० | वर्णानां सामान्यविशेपधर्मानुवर्णनम् .... | ,, | ,, |
पृष्ठ 30स्थायी लिंक
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ८१ | वर्णशरीररक्षोपदेशः | २३६ | १ | ९६ | सवस्त्रस्नानशक्त्याधिकस्नानवर्णनम् | २४४ | २ |
| ८२ | आपद्धर्मनिर्देशः | " | " | ९७ | भृणौकस्तिकैस्तोरुपवासपूर्वकवस्तुदेवपूजनं शत्रुनाशः | २४५ | १ |
| ८३ | व्यापारलाभकारके पूर्वाषाढालग्नवर्णनम् | २३७ | १ | ९८ | कायस्स्थानान्तु साधारणस्नानवर्णनम् | " | " |
| ८४ | मूलस्नानवर्णनम् | " | " | ९९ | गोपिचन्दनशस्त्रस्नानकथनम् | २४७ | २ |
| ८५ | गर्भाधानादिसंस्काराभिधानम् | " | २ | १०० | सर्वोपद्रवविनाशनमभिजिन्स्नानम् | " | " |
| ८६ | ब्राह्मचर्यवर्णनम् | २३८ | १ | १०१ | पुष्टिप्रदमाभिजित्स्नानम् | २४७ | २ |
| ८७ | वर्णानां पृथग्वि वाहकरणं, ब्राह्मादि विवाहभेदाः शचीयागविवाहार्थतिथिवारादि | " | २ | १०२ | जन्मर्क्षस्नानवर्णनम् | २४७ | २ |
| ८८ | ब्राह्मादिनिर्वचनवर्णनम् | २३९ | १ | १०३ | पुष्यस्नानवर्णनम् | " | " |
| ८९ | माल्यवस्त्रचन्दनोपानत्सूक्ष्मवस्त्राणां, हीनाधिकाङ्गादिभिः सहागमनं, मार्गे दक्षिणातः कर्त्तव्यपदार्थाः देयमार्गश्च, पशुप्रवृत्त्युद्योगेनदाद्यप्रवेशादिकर्त्तव्यकर्मसंग्रहः | २४० | १ | १०४ | दिक्पालस्नानवर्णनम् | २४८ | १ |
| ९० | देवाचामनमन्त्रीककथनम् | २४१ | २ | १०५ | विनायकस्नानवर्णनम् | २४९ | १ |
| ९१ | उदकाङ्गुलवस्त्रमरणपण्यादिवल्वपत्रदूर्वादिविनिवेद्यनिवेद्यवस्तुयोग्यताकथनम् | २४२ | १ | १०६ | स्नाते सर्वशत्रुक्षयकारि महेश्वरस्नानम् | " | " |
| ९२ | वैश्वदेवातिथिपूजनवर्णनम् | " | " | १०७ | वृतगोशकृद्दधिवभ्रोधकपलशार्विवल्वकपल्लवचामरादिक्षोदिकानम् | २४९ | २ |
| ९३ | चन्द्रसूर्योपराग भोजनवर्जनं बालकानां पूर्व दत्तेव गृहस्थस्य भोजनमित्यादिभोजननियमकथनम् | २४३ | २ | १०८ | प्रादुत्तमपादौदकस्नानम् | " | " |
| ९४ | शयनतद्देशशयनपुस्तरं रजस्वलादिभिः सङ्गतिनिषेधवर्णनम् | २४४ | १ | १०९ | मणिवस्त्रवर्णनम् | २५० | १ |
| ९५ | गृहस्थधर्मवर्णनम् | " | " | ११० | नानागंगामोदकविविधवल्लीच्छत्त्राद्यंगद्भगवदुपवेशनवर्णनम् | २५१ | १ |
| १११ | माघीश्रावणांगोण नक्तमासमादिदण्डिविधानम् | " | " | ||||
| ११२ | जीवस्य गमनक्रान्तिवर्णनम् | २५२ | १ | ||||
| ११३ | प्रेतलोक- जीवस्य क्रमानुमार्ग्यान्ताइनायनन्तरं भोगदण्डफलभोगः | " | " | ||||
| ११४ | गर्भ कललनीभूतांगनिर्माणमत्वक्वर्मोनुचित्पुत्रपुत्र गर्भव्यथादिकथनम् | २५३ | १ |
पृष्ठ 31स्थायी लिंक
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ११५ | शरीरविषयवर्णनम् ... ... ... | २५६ | २ | १३१ | यतिधर्मनिरूपणम् ... ... | .... | २७५ |
| ११६ | विविधदानकर्तॄणां धर्ममाचरतां च जीवोत्क्रमणानन्तरं ससुखं यमपुरे गमनं तद्विरुद्धानां तत्र विविधयातनासहनम् .... | २५८ | २ | १३२ | सर्वशान्तिसाधारणीशान्तिविधिः .... ... | .... | २७६ |
| ११७ | स्ववर्णाश्रमधर्ममनुरुन्धतां स्वर्गवासः ... | २५९ | २ | १३३ | भौमान्तरिक्षादिशान्तिषु, अद्भुताभ्यादि शान्तिकथनम् | .... | २७७ |
| ११८ | शास्त्रोक्तविरुद्धवर्णाश्रमधर्मकारिणां निरयगमनम् ... | २६० | १ | १३४ | विविधोत्पातकथनम् ... | .... | २७८ |
| ११९ | विविधनरकनामप्रदर्शनपूर्वकं पापिनां तेषुतेषु नरकेषु यातना वर्णनम् | २६१ | २ | १३५ | अथाविकारोपशमनवर्णनम् ... ... | .... | २७९ |
| १२० | पापकर्मानुसारं नारकयातना अनुभूय नारकाणां संसारे ब्रह्मराक्षसतिर्यगादिगोनुषु जन्म ... ... | २६२ | १ | १३६ | औत्पातिकशान्तिवर्णनम् ... ... | .... | ” |
| १२१ | नरकवेदनाभोगानन्तरं मणिमुक्तादिहर्तुः स्वर्णकाजातो, स्वर्णचोरस्य कुनखित्वं, सुरापस्य कृष्णदन्तता, गुरुप्रतिकूलस्यापस्मारित्वादिकपूर्वजन्म कर्मप्रकाशकविद्युक्तवपुस्त्वम् ... ... | ” | २ | १३७ | औत्पातिके वृक्षविकृत्यवर्णनम् ... ... | .... | ” |
| १२२ | वर्णाश्रमधर्मकारिणां भीत्यभावः (दुर्गतिितरणम्) ... | २६३ | १ | १३८ | ” वृष्टिविकृत्यवर्णनम् ... | .... | ” |
| १२३ | सर्वपापनाशक चान्द्रायणकृच्छ्रादिवर्णनम् ... | ” | २ | १३९ | ” जलवैकृत्यवर्णनम् ... | .... | २८० |
| १२४ | विविधपापनाशकनानाद्रव्य पूर्वक गोदानफलप्रदाने | २६५ | १ | १४० | कृमिस्रववर्णनम् ... ... | .... | ” |
| १२५ | वैदिकविहितमन्त्रैस्तत्तत्कार्यसाधक तन्त्रविधानम् ... | २६८ | २ | १४१ | वडवास्ति्यादिवसृमप्रसववैकृतादिशान्तिः | .... | ” |
| १२६ | अनेककामनासिद्धिकरसामप्रयोगकथनम् ... | २७१ | २ | १४२ | उपस्कवैकृतवर्णनम् ... | .... | ” |
| १२७ | अथर्वविहिनानेकप्रयोगसाधकविधिकथनम् ... | २७२ | १ | १४३ | आप्रव्यथ्याम्पश्व्वादीनां ग्रामारण्यगमनादिविकृतशान्तिः | .... | ” |
| १२८ | श्रीसूक्तमाहात्म्यकथनम् ... ... | २७४ | १ | १४४ | प्रसादादीनांगोनानांनिमितपतनं ग्रहादीनां विरुद्धापत्वे गुरुमित्रदेवीहार्दानामुदये च शान्तिः ... ... | .... | २८१ |
| १२९ | पुरुषसूक्तमाहात्म्यवर्णनम् ... ... | ” | २ | १४५ | राज्यमण्डलवर्णने कुल्यादिभेदेन शत्रूवर्णनम् ... | .... | ” |
| १३० | वानप्रस्थाश्रमधर्मकथनम् ... ... | २७५ | १ | १४६ | शत्रुपु दण्डप्रणायनम् ... ... | .... | ” |
| १४७ | युद्धकरणे हानि विचार्योपेक्षीकरणम् ... | .... | २८२ | ||||
| १४८ | शत्रुव्याकुलीकरणाय तद्राज्ये गुप्ताल्योत्पादादिकम् | .... | ” | ||||
| १४९ | इन्द्रजालेन शत्रुराज्ये चतुरङ्गबलवृद्धिच्छिङ्गानि दर्शनीयानि | .... | ” |
पृष्ठ 32स्थायी लिंक
वि० ध० ॥ १२ ॥
| अध्यायाः | विषयाः | पत्रांकाः | पृष्ठांकाः |
|---|---|---|---|
| १५० | धातुपृथ्ववर्णनम् .... | २८१ | १ |
| १५१ | राज्याङ्गिकवर्णनम् .... | " | २ |
| १५२ | जन्मऋक्षक्षालनुष्पस्नानसूर्यप्रणमितिक्तर्कपूपूर्णत्वबालेंदुपू-नादीनि राजकर्म्माणि .... | २८३ | १ |
| १५३ | राज्ञश्छात्रोत्पत्तिविविधवर्णनम् .... | " | २ |
| १५४ | शक्रध्वजोत्थापितकन्यपुरस्सरं तन्महोत्सवकर्तुः संग्रामे जयः | २८४ | १ |
| १५५ | शक्रध्वजमहौत्सवकालोविधिकलादिकथनम् .... | " | २ |
| १५६ | इन्द्रध्वजपतनभङ्गदिशादिफलवर्णनम् .... | २८५ | २ |
| १५७ | शक्रध्वजारोपणप्रसङ्गेन स्तावकमन्त्राः | ||
| १५८ | आश्विनशुक्लारम्भ्यां निशिरीतरे भद्रकालीगृहं निर्म्माय पटे भद्रकालीं सम्पूज्याष्टम्यां छत्रचर्म्माद्यायुधानि पूजयेत् .... | २८६ | १ |
| १५९ | हस्त्यादीनांराजशान्तिविधिः .... | २८७ | २ |
| १६० | छत्राश्वध्वजपताकाखड्गवर्मदुन्दुभ्यादिमन्त्राः .... | २८८ | २ |
| १६१ | राज्याभिषेकिरणं वृत्तकन्यलशान्तिकर्म्म .... | ||
| १६२ | संवत्सराभिषेकः .... | २८९ | १ |
| १६३ | यात्रायां शकुनविधानम् .... | २९१ | १ |
| १६४ | " " " .... | २९१ | २ |
| १६५ | शुभाशुभस्वप्नफलम् .... | " | |
| १६६ | ज्योतिषशास्त्रेण शास्त्रज्ञाक्षणावर्णनम् .... | ||
| १६७ | कालमानादिग्राह्यं स्वरूपसमवर्गग्रहसैन्यादिनामितामसंज्ञाताजावबायवक्कथनम्, मासाधिपचलादिश्रवणादृष्टदोषग्रहेणाहार्विचारस्मरणाकारणादृष्टनगराजयोगोद्देश कथनम् .... | २९२ (पृष्ठांकः २) | |
| १६८ | सौरादिदिवससत्ययुगादिमानकल्पग्रहमन्दोच्चशीघ्रोच्चादिगतेरयनसंपाताद्ययनगत्यादिसाधनक्रान्तिशरासाधनलग्नमानयतनलग्नतद्भुक्तभोग्यादिस्फुटदिनकेन्द्रादिकेन्द्रिाद्वर्णनम् | २९० (पृष्ठांकः १) | |
| १६९ | इष्टकालान्मरीचितचन्द्राद्हस्साधनाहणगणनार्य्याधिपमासाधिपनादिनाधंष्यानगत्रकालपातकालमंषतग्णाद्दानयनतद्दोषविधिस्रपाचिश्रपाकोदयग्रहसुप्त्यादिवर्णनम् .... | २९१ (पृष्ठांकः २) | |
| १७० | नक्षत्रातिध्रुवगाणानयनप्रकारः .... | २९८ (पृष्ठांकः २) | |
| १७१ | छेदशंकुच्छायादिवसाध्नमस्र गतेशेषज्ञानम् | ||
| १७२ | लंबोदककालज्ञानवर्णनम् | ||
| १७३ | ग्रहोदयास्तग्रहागस्त्याद्यनप्रोतितंविदेसोस्मीत्यादिज्ञानम् | ||
| १७४ | ग्रहणाकालकर्णचन्द्रायांश्रुकृतलक्षणतद्भवनवार्ता स्फुटदशग्गम्म्भीद्रांसनीत्यादिसाधने ग्रहणिज्ञानानुभूतवर्णनञ्च .... | २९९ (पृष्ठांकः १) | |
| १७५ | पौष्यादिविद्यो यायिविधद्वले गजयात्रायाः श्रेष्ठा. शुक्राक्रान्तायां नविपेयः, यात्रांपश्चानिमाश्रदिवसनक्षत्राङ्गीहगान्त्रनिवारिणीयांडियांगक्तव्यमुत्तरं जन्मग्नशुपथयात्रायां यात्रायाः सिद्धिर्भवत्यस्य | ||
| १७६ | राज्ञां विजययात्रार्थं शुभवक्तं विधायं तद्दिनान्मन्नगरप्रवृतंवेदांयविधिवर्णनपुरस्सरं यात्रादिवसे त्रिविक्रमं सम्पूज्य होममानन्तरं घृतवेक्षणस्नादिपटनपूर्वकं दिङ्नक्षत्रयांतव्यं दत्त्वा किञ्चिभ्राम्य गायतून... | ३०० (पृष्ठांकः १) | |
| १७७ | वस्त्रशालोद्यरगणरत्नकश्च्यान्दिनिविन्यानुकर्म्मं युद्ववर्णनम् | ३०१ (पृष्ठांकः २) |
अनु० ॥ १२ ॥
पृष्ठ 33स्थायी लिंक
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १७८ | रथनागाश्वपत्तीनां पादानाश्चित्य धनुर्वेदस्य चतुष्पादता, यन्त्रमुक्त-प्राणिमुक्तमुक्तसन्धारितामुक्तविशेषाल्लक्षणसम्पत्त्या युद्धम् | ....<br>.... | ३०३<br>३०४ | २<br>१ | तत्रापि गद्यपद्यादिभेदपूर्वकं शब्दशास्त्रामृतवरषम् | .... | |
| ३ | गायत्र्युष्णिगादिछन्दोवर्णनम् ... | .... | '' | ||||
| १७९ | समपदवैशाखमण्डलाढीलमत्याख्यातसपुटादिधनुर्वेदवर्णनम् | .... | '' | २ | ४ | स्वयंवरचाकीर्त्तिमंत्रराजिदिदतादानवगन्धर्वग्रहाक्षसकिन्नरनागवचः-कथनपुरस्सरमृग्यन्त्रादिनिवारणमन्त्रवर्णनम् | .... |
| १८० | बाणव्यापारे कृतहस्तादिशिक्षणाभ्यासवर्णनम् | .... | ३०५ | १ | ५ | सूत्रलक्षणतद्वातुर्विध्यवाक्यार्थवाक्यपदार्थपंचवावयवहर्षिधूसूत्रध्या-ख्यामृत्यादितिविधप्रमाणातलक्षणनिरुक्तभेदगणाहितादिवर्णनम् | .... |
| १८१ | धनुर्वेदे ऽयुधविधिवर्णनम् | .... | '' | २ | ६ | अधिकरणयोग-पदार्थ-हेत्वर्थादेश-निर्देशादितन्त्रयुक्तिकविवरणम् ... | .... |
| १८२ | खड्गप्रासाद्यराशूलतोमरगदापरशुमुद्गरलघुडवज्रपदिशकृपाणक्षेप-णीगदानियुद्धकर्माणि | .... | ३०६ | १ | ७ | प्राकृतभाषालक्षणम् .... | .... |
| १८३ | स्वलनीपर्याणास्तारणादिद्युताक्षानाञ्च रश्मिसंग्रहकोविद्कृपान्तगणना-दिद्युक्तसारथे रथहस्तादीनां वर्णनम् | .... | ३०६ | १ | ८ | देवादिषट्कश्रपर्यायवर्णनाध्यायः | .... |
| ९ | अभिधानकोशवर्णनम् | .... | |||||
| इति विष्णुधर्मोत्तरेद्वितीयखण्डः । | १० | मनुष्यादिपर्यायवर्णनम् | .... | ||||
| ११ | अभिधानकोशे कीत्यादिवेलिंगशब्दानिर्देशः | .... | |||||
| अथ तृतीयखण्डः । | १२ | राजादिपर्यान्दानिर्देशः | .... | ||||
| १ | चित्रसूत्रविधानदेवतार्चानिर्माणपूजनेन देवतासान्निध्यं ततश्चाभीष्टच-तुर्वर्गफलम् | .... | ३०८ | १ | १३ | जलादिपुंस्कशब्दाभिधानम् | .... |
| २ | प्रतिमास्वरूपनिश्चायकचित्रसूत्रतालोद्यनृत्यशास्त्रावनातत्त्वज्ञानं तस्य च गीतशास्त्राधीनत्वं, गीतस्य तु संस्कृतप्राकृतापभ्रष्टाष्टविधेोदाहृत्यं | .... | '' | १४ | अनुप्रासमयमकश्लेषाद्यलंकारकथनम् | .... | |
| १५ | शास्त्रेतिहासकाव्यमहाकाव्यानां लक्षणवर्णनम् | .... | |||||
| १६ | प्रहेलिका लक्षणभेदकथनम् | .... |
पृष्ठ 34स्थायी लिंक
वि० ध०
॥३॥
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| १७ | मन्त्रब्राह्मणकल्पपुराणकथनपुरस्सरं नाटकनाटिकाप्रकरणप्रकरणीसमवकारोहामृगादिदशरूपकलक्षणकथनपुरस्सरं नायकानाथिकाभेदशृङ्गारादिरसवर्णनम् .... | ३१६ | १ |
| १८ | गीतकयोः कण्ठशिरःस्थानैर्यथा मन्द्रादिस्वरोत्पत्तिः, ग्रामत्रयं, सप्तस्वराः, एकविंशतिसूर्च्छनाः, एकोनपञ्चाशत्तानाः, वृत्तित्रयम्, शृङ्गारादिनवरसानां ग्रामविभागः, दशलक्षणा जातयश्चतारोह्यलंकाराः, अपरान्तकादिगीतानि चेतिगीतलक्षणवर्णनम् .... | ३१७ | १ |
| १९ | ततः सुप्रीतादिभेदेन चतुर्विधाताद्यस्वरतालचित्रादिद्विविधक्रमनिपुणानवदादिदणपुरस्सरं गायकवादिकादिसियातितमदर्शनम् .... | ” | ” |
| २० | नाट्यनृत्तनृत्यलास्यमण्डपदिग्दर्शनपूर्वकं देवदानवनृपतरुद्रुतमृगजीविषु विविधगतिगोदिलाक्षणतद्गुरुपञ्चाशल्लक्षणिकाभिनयकटिपार्दाद्याश्रितरेचकचारिमहागीतनामण्डलगाहारकरणावृत्तनृत्यादिवर्णनम् .... | ३१८ | १ |
| २१ | शय्यासनस्थानवर्णनम् .... | ३२५ | २ |
| २२ | स्वरस्तन्यदालक्तकान्तमभालसाह्यापञ्चाशत्स्थानकटाक्षदिदर्शनम् | ” | ” |
| २३ | वैष्णवसमपादादिभेदेन पुंस्थानकादिवर्णनम् .... | ३२६ | १ |
| २४ | अङ्गवर्णनम् .... | ” | ” |
| २५ | रसहास्यतम्प्रोगयुक्तकर्मतारकाकर्मनयनाचोकिनादिनर्त्तन दृष्टिकर्मतद्वृ- |
अनु०
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| ङ्गसूचकनासिकाकर्मजिह्वाधरोष्ठमर्द्दनदन्तकर्मगण्डपिण्डकर्मवर्णनम् | ३१९ | २ | |
| २६ | अर्धयुतसंतुतादिभेदेनपुरस्सरं तूर्ये करक्रियाम्, करकर्मलक्षणादि च | ३०१ | २ |
| २७ | वाचिकादिशौर्यकासिकोवकभेदेन चतुःप्रकाराभिनयमस्तकाङ्गिङ्गङ्गचनाङ्गुलीवदनादिबोधकप्रणवर्णनम् .... | ३२२ | २ |
| २८ | इन्द्रियार्थाभिनयप्रकाराः, दृष्टानिष्ठमध्यमभेदेन गात्रप्रवाङतादिना चेष्टानिष्ठ पणाम् प्रभातमागधगीतप्रबोधादिवर्तुवनस्वर्गजलशयादिङ्कनश्चयःअभिनयादिवर्णनम् .... | ३२८ | १ |
| २९ | जादूकर्दलक्षणंनाविकोक्तुङ्गमत्स्युडुमञ्चानांपर्वागौत्यूक्यादिषु नाबुकदीसमानादिनानागतिप्रचारवर्णनम् .... | ३३३ | २ |
| ३० | शृङ्गादिवन्नुवप्रक्रमकथनक्रमङ्गेन शृङ्गागढ्डास्यस्य रौद्रार्कणणस्य वीगतुङ्गम्य वैभन्माहृतनस्यश्रीयश्चिमिश्रिभाव नतहचनावर्णनभेदद्वयज्ञनादिदिग्दर्शनम् .... | ३२६ | १ |
| ३१ | हासनर्तकोक्तवेकापञ्चाशद्भावनिदिपणम् .... | ” | ” |
| ३२ | कर्णयुक्ताने विविधैर्वक्तव्यस्वभावौचित्यात्तत्तद्वस्तुभेदेनपुंभगवचूननिकोदिदन्तसमुदावर्णनम् .... | ३२७ | २ |
| ३३ | मन्त्र प्रज्ञानलक्षणप्रशंसा नवरोपंच्यदेवताविष्वादिदुतनुबलातुरवाचनान् | ३२८ | २ |
| ३४ | नवरंजनितचतुरङ्गमंत्रगद्यसर्वदुःखह्रणम् | ३३२ | २ |
॥१३॥
पृष्ठ 35स्थायी लिंक
| अध्यायाः | विषयाः | पत्रांकाः | पृष्ठांकाः | अध्यायाः | विषयाः | पत्रांकाः | पृष्ठांकाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ३५ | तपस्यता नारायेणाप्सरोदर्शमंगाय चित्रकर्मणाऽऽदर्शं निर्माय विश्वकर्मणे तत्कर्मांशार्पणं, तन्नानुसारं चित्रेपि त्रैलोक्यानुकर्षण-दृष्टिभावांगोपांगकरणविन्यासादिकरणम्, हंसादिपञ्चपुरुषलक्षणानि च | ३३१ | २ | ४३ | चित्रे शृंगारादिनवरसमदर्शनं, देवालयनृपसभामारोस्तद्मशं, निधिविद्याधरगुह्यकदिमंगलिहार्याचित्राणां गृहेषु यत्रालोहेवने स्वरंगरेनामसगृहे चित्रलेखनेनपिचित्रदंशेषगुणवर्णनम, चित्रसूत्रसमाप्तिः | ३३७ | १ |
| ३६ | चित्रसूत्रवर्णने सूर्यमवयवममान तदनुसारेण मधुकंसभाल्मल्यादिवर्णनम् | ३३२ | १ | ४४ | ब्रह्मविष्णुशंकरादिचित्रनिर्माणनियमवर्णनम् | ” | २ |
| ३७ | चित्रकर्मण्यंगप्रत्यंगमानेन स्त्रीणां निर्माणम् | ” | २ | ४५ | विष्णुप्रजाभ्योऽध्यक्षनिर्माणवर्णनम् | ३३८ | १ |
| ३८ | चित्रकर्मणि देवतानांनेत्राद्यंगवर्णनम् | ” | ” | ४६ | अष्टपस्यापि देवस्य विक्रितिवशात्साङ्गाता, तत्र च ब्रह्मणः संह्तुकं चतुर्वक्तादिभििरूपणम् | ” | २ |
| ३९ | नानावर्णोत्पत्ताः शुभाकारविहारा ऋजुवागतासाचीकृतदेहत्वोनेकोपवेधसहिताश्चित्रकर्मणो नव भेदाः ( वर्ण ) | ३३३ | १ | ४७ | विष्णुरूपनिर्माणॆ चतुर्बाहूनाम्बांतुरूपत्वं, चतुर्वक्राणामञ्च बलक्षानेश्वर्यशक्तिरूपता, वलस्यापि वासुदेवसङ्कर्षणप्रद्युम्नानिरुद्धा, वासुदेवस्य प्रमिक्तवे सूर्यचन्द्ररूपं काद्युद्गम्, संकर्षणदिरूपाणामपि मुसलाङ्गिलाद्यायुधतादिवर्णनम् | ” | ” |
| ४० | चित्रकर्मभूमिसंस्कारकथनपूर्वकं बहुसमयस्थायिरंग निर्माणं, कनकजातादिगद्रव्यकथनञ्च | ३३४ | २ | ४८ | महादेवस्य सद्योजातवामदेवादिभेदेन पञ्चरूपाणि प्रतिवक्रे सोमसूर्याग्निनेत्रत्रयत्वम्, सूक्ष्मादितत्त्वानि, विशुद्धज्ञानवैराग्यादीनामादर्शदिक्पती | ३३९ | १ |
| ४१ | सत्यवैणिकादिभेदेन सलक्षणं चित्रचातुर्विध्यम्, पत्राकृतिक्रान्तिविन्दुवर्तनादिचित्रदोषस्थानप्रमानमाणादिचित्रभूषणगुणासनादिचित्रनाशहेतुभूमादिवर्णनञ्च | ३३६ | १ | ४९ | नासत्यरूपनिर्माणम्.... | ” | २ |
| ४२ | चित्रे देवनृपपिंगोश्वदैत्यदानवादीनां सायुधानां सपरिच्छदानां निर्माणदेशविशेषावुरुवासनशयनयानवेशस्तित्सागरावरोहणशैलशिखरपक्षीभूमण्डलञ्चक्रप्रम्हादीनिधिसचन्द्रनक्षत्रराजिसन्ध्यादिनिर्माणम् | ” | २ | ५० | दक्षप्रजापतिनिर्माणं सहेतुकम् .... | ” | ” |
पृष्ठ 36स्थायी लिंक
वि० ध० ॥ १४ ॥ अनु० ॥ १४ ॥
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| ५१ | सहैके यमरूपनिरूपणं तस्य संकर्षणरूपता, तद्वाहनमहिषस्य मोह-रूपत्वं धूमोर्णारूपत्वं चित्रगुप्तस्वरूपकथनञ्चादि च .... | ३४० | १ |
| ५२ | सप्तशक्तिकायुधसवाहनवरुणस्वरूपं, तद्दक्षिणभागे मकरवाहनग-ङ्गास्वरूपम्, वामभागे सचामरकूर्मस्थयमुनास्वरूपम्, वरुणस्य प्रद्युम्नता तद्भार्याया रतिरूपतादिकथनञ्च .... | ” | २ |
| ५३ | धनदस्वरूपनिर्माणम्, तस्य वामभागे ऋद्धिः, शंखपद्मनिध्यादि तत्पार्श्वे, .... | ३४१ | १ |
| ५४ | गरुडरूपनिर्माणम् ... | ” | ” |
| ५५ | गौरीशप्रतिकृतिरचनम् ... | ” | २ |
| ५६ | स्वाहादिसहितोग्निप्रतिमार्निर्माणं चतुर्वेदषडङ्गयुक्ताग्निविचित्रसहितम् ... | ३४२ | १ |
| ५७ | विरूपाक्षरूपनिर्माणं सनिदृत्यादि .... | ” | ” |
| ५८ | आकाशवर्णस्य वायोः सप्तशक्तिकस्य निर्माणम् .... | ” | ” |
| ५९ | भैरवमहाकालयोः स्वरूपनिर्माणप्रकारः .... | ” | ” |
| ६० | एकवक्त्रद्विबाहुगदाचक्रधगविष्णुरूपमपरम् .... | ” | २ |
| ६१ | शुक्लं वर्णं चतुर्मुखं जगत्प्रसवाधिपं पञ्चहस्ततादिभूवर्णस्वरूपनिर्माणम् .... | ” | ” |
| ६२ | नीलोत्पलश्यामवर्णयुतमाकाशस्वरूपम् .... | ” | ” |
| ६३ | असिताभाग्निरूपयोगेश्वरः .... | ” | ” |
| ६४ | ध्यातुः सर्वार्थसाधकं सरस्वतरूपनिर्माणम् .... | ३४२ | २ |
| ६५ | अनन्त ( शेष ) रूपनिरूपणम् .... | ३४३ | १ |
| ६६ | जयविजयाख्यदत्त्वपराजितादेवीसहितस्य महादेवचम्बूरोंनिर्माणम् | ” | ” |
| ६७ | प्रकारद्वयेन पिंगलातिपिंगलगणयुक्तस्य रेवन्तादिचतुःपुत्रैश्च तत्प्रभिः पत्नीभिश्च सहितस्य रवे रूपनिर्माणम् .... | ” | ” |
| ६८ | सितचतुस्तुरङ्गरथस्थ कान्तितोषाभ्यां भार्याभ्यां सहितस्यानिवन्ध्याष्टा-विंशतिभार्याभिर्वा सहितस्य चन्द्रमसो निर्माणम् .... | ” | २ |
| ६९ | सायुधसवाहनभौमादिग्रहानेर्माणम् .... | ३४४ | १ |
| ७० | वर्तमानभविष्यन्मनुरूपनिर्माणम् .... | ” | ” |
| ७१ | स्कन्दविशाखमुखरुद्रकालोग्रिगणेशविश्वकर्मरूपनिर्माणम् .... | ” | ” |
| ७२ | धरादिसुतानां विष्ण्वब्जरूपादीनाञ्च रूपवर्णनम् .... | ” | ” |
| ७३ | कश्यपादिसप्तऋतुकाद्यादीनां ध्रुवागस्त्यभृगुप्रभृद्यनेकैदेवानां निर्माणम् .... | ” | ” |
| ७४ | लिङ्गरूपनिर्माणम् .... | ३४६ | १ |
| ७५ | व्योमरूपनिर्माणम् .... | ” | ” |
| ७६ | वदनेवृक्षमधु नगरानायपणरूपनिर्माणम् .... | ” | ” |
| ७७ | कीर्त्यादिचतुर्दशभार्यायुतधर्मरूपनिर्माणम् .... | ” | ” |
| ७८ | प्रकारत्रयेण नृसिंहमूर्तिनिर्माणम् .... | ” | ” |
पृष्ठ 37स्थायी लिंक
| अध्यायाः | विषयाः | पत्रांकाः | पृष्ठांकाः |
|---|---|---|---|
| ७९ | अनैश्वर्यरूपिहिरण्याक्षशिरश्छेदोद्यतस्य धरणीद्विसनाथस्यैश्वर्यरूप-नृवराहस्य निर्माणम् .... | ३४७ | १ |
| ८० | हयग्रीवरूपनिर्माणम् .... | " | " |
| ८१ | शेषशायिरूपनिर्माणम् .... | " | २ |
| ८२ | विष्णोः पार्श्वे पृथक् च लक्ष्मीचित्रनिर्माणकारः | " | " |
| ८३ | हरिविश्वरूपवर्णनम् .... | " | " |
| ८४ | वैकुण्ठरूपनिर्माणम् .... | ३४८ | १ |
| ८५ | वासुदेवरूपनिर्मापणे सायुधसप्तर्षिसहितिकस्य विष्णोश्चतुर्मुखादिभेदेन रूपनिर्माणं तथा भार्गवरामादशस्थिरामादि (देवोद्यान) मूर्ति-निर्माणम् .... | " | २ |
| ८६ | हिमवदादिप्रभासादृदर्शनं तत्र च सर्वतोभद्र+केशवादिमूर्त्ति-स्थापनम् .... | ३५० | १ |
| ८७ | मण्डपद्वारशिखरादिषु क्रमासादे पूर्वाद्रिक्रमेण वासुदेवसङ्कर्षणार्दि-मूर्त्तिस्थापनम् .... | ३५२ | २ |
| ८८ | चतुःषष्टिपदे देवायतने (सामान्यप्रासादे) द्वारप्रतिमापिण्डिका-कवित्वसुधामंतरणीमदिधारिमितिवसुधाक्षरसोपानादिप्रमाणवर्णनम् | ३५४ | १ |
| ८९ | देवालयार्थं दारुपरीक्षणम् .... | " | " |
| ९० | दारुपरीक्षोक्तविधिंविधच्छेदुले दण्डपुरोहिताभ्यां देवाचैर्हिशिलार्पणक्षणं शिलानामुत्तममध्यमनिकृष्टतादिभेदेन तासां फलानि पाकेन तासां दार्ढ्यकरणञ्च .... | ३५५ | १ |
| ९१ | ब्राह्मणादिजातिभेदेन मृद्मानीय ब्राह्मणादिभिर्ब्रह्मतालादार्थामिष्टका-करणम् .... | " | २ |
| ९२ | बिन्दुकर्कटपिथाश्चाश्रमलीपपुष्पादिभिर्द्रव्यैश्चलेपकप्रकारणाः .... | ३५६ | १ |
| ९३ | सत्ययुगे देवानां प्रत्यक्षपूजनं त्रेताद्वापाययोः प्रत्यक्षपूजा प्रतिमासु च, तत्रापि त्रेतायुगे गृहे द्वापर चारण्ये कलौ च देवायतननिर्मितिर्नरेषु समारब्धा, भूमिदानं विधायैव देवायतनप्रतिष्ठा कार्या, देवालय-योग्यभूमिः .... | " | " |
| ९४ | ब्राह्मणादिपङ्क्तिक्रोर्मात् मृशोधननपुरस्सरं शल्योद्धारादि विधाय श्री-विष्णुवाराहुदेवाद्विपूजनं कार्यम्, ऐशान्यां शिलां विन्यस्य प्राग्दक्षिणयेन पुनस्तन्न्यासं समाचरेत् । तद्दहेव सूत्रन्यासनन्द्रादिशिलाचने विधाय चित्रकर्म विधेयं विष्ण्वादित्रासादे गरुडाद्रेक्षाभ्यान्मपि कर्त्तव्यानि... | ३५७ | १ |
| ९५ | वास्तुपुरुषे शल्यज्ञानं, शल्यं विहाय वास्तुदेवायतनं कर्त्तव्यम्, देवा-यतनदक्षिणादिभागेषु देवतार्कोशभवनादि, धनशल्ये लब्धे वृद्धिः | ३५८ | १ |
| ९६ | वैश्य, वालिदुगोर्वाञ्च्चिन्यादिक्षेत्रेषु संवत्सरादिषु वर्षेषु वसन्तादृऋतुषु |
पृष्ठ 38स्थायी लिंक
| वि० ध० | अनु० |
|---|---|
| ॥१५॥ | ॥१५॥ |
| अध्यायः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मासादिमासेषु सूर्यादिवारेषु प्रतिपदादितिथिषु शकुनादिकरणेषु मेषादित्येषु सूर्यादिहोरासु प्रतिष्ठाफलानि .... | ३६१ | १ | १०७ | श्रीवासुदेवविवोधनमन्त्राः .... | ३७१ | २ | |
| ९७ | प्रतिष्ठाविधिकथने यजमानस्त्वृत्विग्भिः सह दीक्षाग्रहणं स्वस्तिवाचनपूर्वकं प्रतिसरकंकणबन्धनमासनमर्यादित्यागहविष्यप्राशनादिनियमवर्णनम् .... | ३६१ | २ | १०८ | व्यक्ताव्यक्तमूर्तीष्णोध्यानंसौख्यार्थ भोगमोक्षहेतवे च मूर्तिकल्पनावाहनं .... | ” | ” |
| ९८ | विधिर्बलिंम तामासोऽधिवासनस्थण्डिलपश्चिमादिभागेषु कल्पकादिवेशपुरस्सरं कलशस्थापनांतरीगणन्यासध्वजबितानघटिप्रतीहारस्थापनघटादर्पणादिना सुसजीकरणं रक्षोध्नमंत्रैश्चेश्वररक्षकरणञ्च | ३६२ | १ | १०९ | होमविधिवर्णनम् .... | ३७२ | १ |
| ९९ | पञ्चगव्यसंस्कारः .... | ३६३ | १ | ११० | श्रीभगवद्विबोधनमन्त्रवर्णनम् .... | ” | २ |
| १०० | अर्चाशौचादिविवर्णनम् .... | ” | २ | १११ | बृहत्तनपद्मव्योमन्त्रमाहात्म्यवर्णनम् .... | ३७३ | १ |
| १०१ | अधिवासनवर्णनम् .... | ” | ” | ११२ | गन्धानुलेपनताम्बूलनिवेदनदूतिं(भांगदान)-वर्णनम् .... | ” | २ |
| १०२ | समन्त्रतोकै जीवाधोधाववासनाविधिर्वर्णनम् ... | ३६४ | १ | ११३ | मधुपर्कनिवेदनम् .... | ” | ” |
| १०३ | नास्त्यादिदेवतानामावाहनानि .... | ” | २ | ११४ | श्रीविष्णोर्वस्त्राणिनिवेदनपुरस्सरं भक्ष्यभोज्यादि-(हव्या)-निवेदनम् | ३७४ | १ |
| १०४ | ब्रह्मादिदेवतानामावाहनाद्यर्ध्याद धूपोदियमन्त्रकथनम् | ” | ” | ११५ | शङ्करगीताधिकविधिना सास्वेतेज्यावर्णनम् .... | ” | ” |
| १०५ | लोकपालशूलनन्दीश्वराद्यावाहनम् .... | ३६७ | ११६ | तोरणोद्धारादिविधिवर्णनम् .... | ” | ” | |
| १०६ | श्रीविष्णुव्येवकतावतारिदेवानां युधिष्ठिरादिपाण्डवानां याज्ञसेनीसीतादेवकीयशोदारुक्मिणीप्रभृतीनामावाहनादिवर्णनम् .... | ३६८ | २ | ११७ | तत्तद्देवतातिथिषु प्रथमादिपञ्चमादिवसपर्यन्तं विनायकग्रहर्र्कशेनागममथब्राह्मणपूजनानि षष्ठेऽह्नि च बृहत्स्नपनं कर्तव्यम्। तत्र सर्वेषां नागार्दिकाणां गक्षा सह महता वाद्यघोषेण नृत्यगीर्तिादिमङ्गलैस्तुतिभिक्षातृग्ममं निर्मित्तदर्शनञ्च .... | ” | २ |
| ११८ | धर्मार्थकाममोक्षादिकमानानुरागेणार्तिनरुद्धमंकर्पणप्रद्युम्नवासुदेवाद्यर्चनानि .... | ३७५ | १ |
पृष्ठ 39स्थायी लिंक
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| ११९ | समुद्रयात्रानुष्ठानविचारम्भादिकामानुसारं मत्स्यवराहहयग्रीवादिपूजनम् | ३७५ | २ |
| १२० | हयग्रीवादिदेवानां पूजाकालनिर्णयः | " | " |
| १२१ | पुष्करप्रयागकालञ्जरादितीर्थेषु ब्रह्मयोगिशयिमहादेवशतकलादिव्रतपूजनानियमः | ३७६ | १ |
| १२२ | विष्णोर्वासुदेवादीनामेषु मोक्षादिद्वादशशक्तितर्पणम् | " | " |
| १२३ | पूर्वादिदिक्सरलेन क्षमादिकामपरत्वेन च विष्णोश्चक्रादीनामस्मरणकीर्तनादिनाभीष्टसिद्धिः | " | " |
| १२४ | चैत्रादिमासपरत्वेन कृत्तिकादिनक्षत्रपरत्वेन च विष्ण्वादीनामस्मरणफलानि | ३७७ | १ |
| १२५ | अर्जुनावर्तेन पुष्करादिक्षेत्रेषु पुण्डरीकाक्षादिपञ्चपञ्चाशन्नामकीर्तनादिना पापक्षयपुरस्सरं महत्फलम् | " | " |
| १२६ | अष्टपत्रकमलकर्णिकायां ब्रह्मपूजनं पूर्वादिपत्रेषु च ऋगादिपूजनविधानम् | ३७८ | १ |
| १२७ | चैत्रशुक्लप्रतिपदादौ ब्रह्मादित्रिदेवपूजनविधानम् | " | " |
| १२८ | चैत्रशुक्लप्रतिपदि स्थले जले वा विष्णुपूजनेन सर्वपापक्षयमोक्षप्राप्तिः | " | २ |
| १२९ | अशीतिभागात्मकप्रकृतिमण्डलनिर्माणवार्तासुष्ठुत्वं, चैत्रशुक्लप्रतिपदि वेधोलक्ष्म्याश्च पूजनादिनियमाः | ३७९ | २ |
| १३० | नामत्रयपूजाचक्रव्रतप्रतिपादनम् | ३७८ | २ |
| १३१ | चैत्रशुक्लद्वितीयायां बालेन्दुव्रतवर्णनम् | ३७९ | १ |
| १३२ | अङ्गन्यासनिहतिप्रान्तम् | " | " |
| १३३ | ज्येष्ठशुक्लतृतीयायां त्रिविक्रमव्रतम् | " | " |
| १३४ | अस्यामेव तिथौ द्वितीयं त्रिविक्रमव्रतम् | " | " |
| १३५ | अस्यामेव तिथौ तृतीयं त्रिविक्रमव्रतम् | ३८० | २ |
| १३६ | वार्षिकश्चन्द्रेन्द्रस्य विष्णोरुक्त- ज्येष्ठशुक्लतृतीयायां तिथौ व्रताचरणपूर्वकमुक्तेनारत्नलोके यथेष्टसुखप्राप्तिः | " | " |
| १३७ | वह्निसूर्यसोमवरुणारुणविष्ण्वेषु श्रुतरश्मिव्रतवर्णनम् | " | " |
| १३८ | इन्द्रयमवरुणकुबेरचतुःसीतावतवर्णनम् | ३८१ | १ |
| १३९ | विष्णुभूमिमनोबलचतुर्भूतव्रतप्रतिधानम् | " | " |
| १४० | बलज्ञानैश्वर्यशक्तिरुचिमूर्तित्रितयवर्णनम् | " | " |
| १४१ | पञ्चमचतुर्भूतकल्पे वेदव्रतकथनम् | " | २ |
| १४२ | चैत्रशुक्लचतुर्थ्या वासुदेवस्य वैशाखे सङ्कर्षणस्य ज्येष्ठे प्रद्युम्नस्याप- | " | २ |
पृष्ठ 40स्थायी लिंक
वि० ध० | ॥ १६ ॥ | अनु०
[भाग १]
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| — | ठेऽनिरुद्धस्य चार्चनं विधाय योग्यब्राह्मणाय तत्तद्व्रतोक्तदक्षिणादिदानम् .... | ३८१ | २ |
| १४३ | सप्तमचतुर्मूर्त्तिकल्पेनेोद्विव्रतवर्णनम् .... | ३८२ | १ |
| १४४ | अष्टमचतुर्मूर्त्तिकल्पे चतुर्युगसूतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १४५ | श्रावणादिचतुर्मासेषु विष्णुरूपिचतुःसागरोपचरणंकुम्भपूजनहवनादिविधानम् .... | ” | ” |
| १४६ | वासुदेवादिचतुर्मूर्त्तिण्डमकरादिरुचिसहितस्य पूजनम् .... | ” | २ |
| १४७ | ईशानाद्यैविश्वरूपश्चाक्षुषरूपाणि निर्माय चैत्रशुक्लादिप्रतिपदि भौमनादेयताम्रकाजलस्नानादिपद्मदित्यल्यवबूद्यहोमादिकमारेण व्रतवर्णनम् .... | ३८३ | १ |
| १४८ | शंखचक्रगदापद्मानां वासुदेवानिरुद्धादिचतुर्द्दण्डालमकानां श्रावणादिचतुर्मासेषु वह्निस्नानभक्तभोजनादिनियमपुरस्सरमर्चनम् .... | ” | ” |
| १४९ | वासन्तिकविषुवद्दिने त्रिरात्रोपवासपुरस्सरं यथाशक्ति वासुदेवाचंनं विधाय पुरो मासतूयं च नित्यार्चनफलाहारविधिं कृत्वा वामरोक्तविषुवद्दिने व्रतं समापयेत् .... | ” | ” |
| १५० | पूर्वोक्त ( १४९ अध्यायोक्त ) व्रते विष्णोः स्यागेऽनंतपूजनं विधाय द्वितीयादिषु महीगंगनेवद्यप्रामेकत्रवर्णनं व्रतमाचरेच्चंडनरूपपुष्पादिव्याभाः .... | ” | ” |
[भाग २]
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| १५१ | नरनारायणहंसादिरूपचतुर्मूर्त्तिव्रतवर्णनम्, समाप्तं चतुर्मूर्त्तितत्त्वम् ॥<br>अथ पंचमूर्त्तितत्त्वम् | ३८३ | २ |
| १५२ | चैत्रशुक्लपंचम्यां पृथिव्यादिपंचभूतात्मकस्य विष्णोः शुक्लादिवर्णमण्डलेषु तत्तद्वर्णगन्धपुष्पादिभिरर्चनम् .... | ” | ” |
| १५३ | बन्धूकोदधिषुपवित्रस्तरपरिवेस्तरनदीनां सफललतावाविधिवर्णनम् | ” | ” |
| १५४ | सावित्रीलक्ष्मीव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १५५ | पंचमूर्त्तिव्रते शंखचक्रगदापद्मपूजनहवनादि .... | ३८४ | १ |
| १५६ | वसतऋतुषु मधुमाधवादियुग्मनामकपण्मूर्त्तितत्त्ववर्णनम् .... | ” | २ |
| १५७ | सप्तमूर्त्तिव्रते सुभास्त्रादिदीप्तव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १५८ | चैत्रमासादारभ्य कृष्णपक्षे प्रतिदिनं रुक्मभौमादित्यालत्र नवव्रतन्म् | ३८५ | १ |
| १५९ | चैत्रशुक्लपक्षादारभ्य प्रत्यहं सप्ताहपर्यन्तं जम्बूद्वीपादिममद्वीपवर्णनम् | ” | ” |
| १६० | चैत्रशुक्लपक्षादारभ्य लवणादिसप्तसमुद्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १६१ | महेंद्रादिसप्तकुलपर्वतपूजनविधिवानम् .... | ” | ” |
| १६२ | मन्वन्त्यादिसप्तमलोकव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १६३ | ह्रादिन्यादिनदीव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १६४ | नागसप्तव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १६५ | मोक्षप्राप्तिफलदं गताश्वव्रतकथनम् .... | ” | ३८६ |
पृष्ठ 41स्थायी लिंक
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १६६ | चैत्रशुक्लसप्तम्यां मरुत्प्लावितव्रतम् .... | ३८६ | १ | १८२ | मार्गशुक्लद्वादश्यां धातादित्यादिद्वादशादित्यव्रतवर्णनम् .... | ३८९ | २ |
| १६७ | ” मरुद्धूतेऽग्नौ गोपतिपूजनम्, तत्र चाष्टदलकमलकर्णिकायां विभावसुं संस्थाप्यर्तुकारिकादिगन्धवैिर्धूपजनैर्विधानम् .... | ” | २ | १८३ | वैशाखत्रयोदश्यां कामदेवव्रतम्.... | ” | ” |
| १६८ | वसन्ताद्यृतुनुसारं सर्षपार्चनार्चादिदेववर्णनम् .... | ३८७ | १ | १८४ | फाल्गुनशुक्लत्रयोदशीतो दम्पत्यर्च्चनं शुक्लत्रयोदश्यां धनव्रतम् .... | ” | २ |
| १६९ | अष्टदलकमले भास्करस्य तदंगदेवांनाञ्च पूजनम् .... | ” | २ | १८५ | ज्येष्ठशुक्लपक्षत्रयोदश्यां वायुलोंकप्रदं वापिकव्रतम् .... | ” | ” |
| १७० | रक्तसप्तमीव्रतवर्णनप्रसंगेन सांगदेवभास्करपूजनम् .... | ” | ” | १८६ | पौषमासिककृष्णचतुर्दशीषु वत्सरपर्यन्तं विरुपाक्षव्रतस्य कृष्णचतुर्दशीभ्यां यमव्रतम् .... | ” | ” |
| १७१ | संवत्सरपर्यन्तमुक्तविधिना सप्तमीव्रतकरणेन सूर्यप्रसादात्सतवार्थाभिष्टिसिद्धिः | ३८८ | १ | १८७ | फाल्गुनशुक्लपक्षचतुर्दश्यां शिवव्रतम् .... | ” | ” |
| १७२ | ब्रह्मसूर्यदिग्निभपालपुरस्सरस्याम्यश्वसुपूजामाहात्म्यम् .... | ” | ” | १८८ | चैत्रशुक्लपक्षादारभ्य वर्षपर्यन्तं प्रतिपञ्चदशीषु श्राद्धपापिनुव्रतम् | ३९० | १ |
| १७३ | सोमाष्टमी महेश्वरव्रतपूजोपवासस्नानप्रदानिकरणफलम् .... | ” | ” | १८९ | चैत्रकृष्णपञ्चदशीतो वर्षपर्यन्तं वह्निहुतदहनवानादिक्स .... | ” | ” |
| १७४ | हिमवदादिपर्वतेशशैलानां भद्रादिनववर्षाणां नवम्यां पूजनम् .... | ” | २ | १९० | अमावास्यायां चन्द्रसूर्यव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १७५ | भद्रकालीव्रतपूजाविधानम् .... | ” | ” | १९१ | कार्त्तिकरात्रौस्थितिप्रतिमासं कृत्तिकागोहिण्यादिनक्षत्रयुतचन्द्रमःपूजनाद्विवर्णनम् .... | ” | ” |
| १७६ | दशम्यां क्रत्यादिवेधदेवव्रतवर्णनं समाहात्म्यम् .... | ” | ” | १९२ | कात्तिकपूर्णिमायां षोडशदले पद्मे कर्णिकायां चन्द्रस्य केसरेष्वष्टाविंशतिनक्षत्राणां पत्रेषु च तिथिनिदेवतानां सचन्द्रिकाणां पूजनविधिः | ” | २ |
| १७७ | ” अङ्गिरोव्रतवर्णनम् .... | ” | ” | १९३ | प्रौष्ठपदपूर्णिमायां वरुणव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १७८ | धर्मव्रतवर्णनम् .... | ” | ” | १९४ | आश्वयुक्पूर्णिमायां शक्रव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
| १७९ | मार्गशीर्षमासमारभ्याऽसंवत्सरमेकादश्यां रुद्रमहद्रुद्रव्रतवर्णनम् .... | ३८९ | १ | १९५ | आश्वयुक्पूर्णिमायां शक्रव्रतम् .... | ” | ” |
| १८० | मार्गकृष्णद्वादशीषु संवत्सरपर्यन्तं शुचिव्रतवर्णनम् .... | ” | ” | ||||
| १८१ | मार्गशीर्षद्वादश्यां वत्सरपर्यन्तं साध्यव्रतवर्णनम् .... | ” | ” |
पृष्ठ 42स्थायी लिंक
वि० ध० | अनु०
॥ १७ ॥
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| १९७ | ब्रह्मकूर्च-(पञ्चगव्य) वर्णनम् .... .... .... | ३९० | २ |
| १९८ | पौर्णमामावास्यासु द्वादशवर्षपर्यन्तं महाव्रतम् .... | ,, | ,, |
| १९९ | तिर्यग्योनिसंरूढदशजन्मनि निवारकं मेषादिसंक्रान्तिषु पशुरामकृष्णादिव्रतम् .... .... .... .... | ,, | ,, |
| २०० | इष्टप्राप्त्यादिव्रतवर्णनम् .... .... .... | ,, | २ |
| २०१ | सत्कुलादिमित्रव्रतवर्णनम् .... .... .... | ,, | ,, |
| २०२ | रूपावाप्तिव्रतवर्णनम् .... .... .... | ,, | ,, |
| २०३ | इह लावण्यमदभन्ते च स्वर्गाप्तिकरं व्रतम् .... .... | ३९२ | १ |
| २०४ | सौभाग्यविधायकव्रतम् .... .... .... | ,, | ,, |
| २०५ | आश्वयुजप्रतिपद्मारभ्यास्यपर्यन्तमारोग्यसम्पदादिषड्विधव्रतविधानम् | ,, | ,, |
| २०६ | ज्ञानबुद्धिविवर्द्धनं वैशाखमासवतम् .... .... | ,, | ,, |
| २०७ | विद्याप्राप्तिव्रतवर्णनम् .... .... .... | ,, | २ |
| २०८ | शीलप्राप्तिव्रतवर्णनम् .... .... .... | ,, | ,, |
| २०९ | धर्मप्राप्तिकरं श्रावणमासवतम् .... .... | ,, | ,, |
| २१० | धनप्राप्तिकरं सङ्कर्षणव्रतम् .... .... | ,, | ,, |
| २११ | लक्ष्मीप्राप्तिकरं ज्येष्ठमासवतम् .... .... | ,, | ,, |
| २१२ | भोगावाप्तिकमाघाद्यष्टमासवतम् .... .... | ३९३ | १ |
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| २१३ | जयप्राप्तिविधायकं कार्तिकमासवतम् .... .... | ३९३ | २ |
| २१४ | कार्तिकपौर्णमासीतः श्रावणीपर्यन्तं प्रतिपद्दिनेषुजननव्रतविधानम् .... | ,, | ,, |
| २१५ | फाल्गुन्याद्याश्चतस्रऋक्षैरेकादशीषु विविक्तकृष्णेकशयनादिव्रतकथनादिह लोके श्रेष्ठाप्तिमृतिकालसमये च श्रीकृष्णस्मरणमाप्नोति जनः .... | ||
| २१६ | फाल्गुनपूर्णिमायां लक्ष्मीनारायणाविन्दुगोरात्रिरूपिणावभ्यर्च्य चैत्रवैशा-खज्येष्ठमासेषु चैतेयथासंख्यं पारणमा आपाढाश्रावणाभाद्रपदाश्विन-मासेषु श्रिया सह श्रीधरं सम्पूज्य चन्द्रमसः पूजनेन द्वितीयं पारणम् । कार्तिकादिमासेषु केशवमर्चयित्वा मुक्तिचन्द्रमसः पूजनेन तृतीयं तुरीये पारणम् । एतत्पारणत्रये प्रथमपारण पञ्चगव्यप्राशनं, द्वितीये कुशौदकं, तृतीये सुवर्णोदकप्राशनेति नियमनं लक्ष्मीनारायणौ सम्पूज्य नरो नैविद्ययुक्तैऽन्नफलैर् लभते च द्रुमस्मृतिं मुक्तिञ्च तत इति .... | ३९४ | १ |
| २१७ | चैत्रकृष्णाष्टम्यामुपवासपुरस्सरं कृष्णाष्टमीमर्च्य वशागव्यदुग्ध-योनिन्नमिश्रकपारणव्रतस्नानादिविधानेन सम्मस्तानायुरन्नदा स्यात् । | ,, | २ |
| २१८ | हरिशयनप्रबोधनयोर्मध्ये द्वादशव्रतविधानाव्रतनिर्देशनम् | ,, | ,, |
| २१९ | भाद्रशुक्लद्वादश्यां प्रारभ्य यावत्संवत्सरं द्वादशीव्रतव्रतवर्णनम् | ३९७ | ,, |
| २२० | पापशुद्धशर्वाणी दम्परत्नं प्रनहद्भावनेषु जगदर्चितनदानगोदत्र-प्राप्तानादिविधानम् .... .... .... | ,, | ,, |
॥ १७ ॥
पृष्ठ 43स्थायी लिंक
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २२१ | चैत्रशुक्लप्रतिपदादौ ब्रह्मादिदेवानां सहेतुफलं पूजनम् | ३९६ | २ | र्जन्मादिनियमपुरस्सरमाचारगतिकथनम् | ४०१ | १ | |
| २२२ | रोचेषु मासोपवासफलानिरूपणम् | ३९७ | " | २३४ | महापातकोपपातकादिनिर्देशपूर्वकं प्रायश्चित्तवर्णनम् | ४०३ | २ |
| २२३ | तत्तन्नक्षत्रेषु तत्तद्देवादिपूजनवर्णनम् | ३९८ | " | २३५ | रहस्यप्रायश्चित्तनिर्देशः | ४१० | " |
| २२४ | अष्टावक्रादिक्संवादे तया स्त्रीस्वभावादिवर्णनं भार्गवेण मुनिनिष्ठावक्त्राय स्वसुताया दिशो दानञ्च | ३९९ | १ | २३६ | पापप्रशमनाश्राद्धजपादिच्छिद्रच्छद्मवर्णनम् | " | " |
| २२५ | पुरुषसूक्तविधानेन संवत्सरपर्यन्तं हंसस्वरूपजनार्दनपूजनव्रतम् | ४०० | " | २३७ | दानतपोवृद्धगवादिकर्मदानं भोगिनस्त्वग्ज्यामालादिकल्पकथनम् | ४११ | |
| २२६ | ऋतुतुगस्यान्ते दाम्पत्यव्यवहारप्रवृत्तैर्लोभदंभादिदोषमाकुले लोके हंस-रूपिनारायणेन मुन्यनुरोधेन ज्ञानोपदेशकथनमभिहितमासीत् | " | " | २३८ | निधनसूचकाङ्गारिष्टयोगवर्णनम् | ४१२ | |
| अथ हंसगीता। | २३९ | अज्ञानेनापाज्ञानफलानि | ४१३ | ||||
| २२७ | वर्णाश्रमधर्मवर्णनम् | " | २ | २४० | पापफलदुःखवर्णनम् | " | २ |
| २२८ | ब्रह्मचर्यपालनपुरःसरं वेदस्वीकरणादन्यमावण्याद्गुरुकुले वासो गृहाश्रमस्वीकृतिर्वा | " | " | २४१ | कामासक्तिनिन्दाथार्थ्यपूर्वकं कामसेवनेन सुखम् | " | " |
| २२९ | गृहस्थधर्मवर्णनम् | ४०१ | १ | २४२ | चञ्चलं लक्ष्मीरस्वभावं निश्चित्य तन्नाशे न हृष्येत् | ४१४ | " |
| २३० | भिक्षाभक्ष्यवर्णनम् | " | " | २४३ | मानदोषवर्णनम् | " | " |
| २३१ | द्रव्यशुद्धिनिरूपणप्रसङ्गे मलमूत्रादीनां परिगणनम् | " | २ | २४४ | मददोषवर्णनम् | " | " |
| २३२ | अशौचविधिवर्णनम् | " | " | २४५ | लोभदोषवर्णनम् | " | " |
| २३३ | हस्ते देवादितर्पणानि जपादिकोले मनःप्रणिधानमक्रोधकार्याद्यावन्त- | २४६ | क्रोधदोषवर्णनम् | " | " | ||
| २४७ | नास्तिक्यस्य गुरुतरपापवर्णनम् | " | " | ||||
| २४८ | अहङ्कारस्य सर्वनाशकत्वम् | ४१५ | |||||
| २४९ | शौचवर्णनम् | " | " |
पृष्ठ 44स्थायी लिंक
वि० ध० ॥ १८ ॥ अनु० ॥ ३८ ॥
| अध्यायः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः | अध्यायः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| २५० | अशौचदोषाः | ४१५ | १ | २६७ | शूरशौर्यवर्णनम् | ४२० | १ |
| २५१ | अनृतदोषवर्णनम् | ,, | २ | २६८ | अहिंसागुणहिंसादोषवर्णने | ४२१ | १ |
| २५२ | हिंसादोषकथनम् | ४१६ | १ | २६९ | क्षमागुणवर्णनम् | ,, | ,, |
| २५३ | कायवाङ्मनोजनितपापफलनिर्देशवर्णनम् | ,, | २ | २७० | कृतज्ञता (आनृशंस्य) गुणवर्णनम् | ४२२ | १ |
| २५४ | ज्ञानमहत्त्ववर्णनम् | ४१७ | १ | २७१ | आचारगुणवर्णनम् | ,, | ,, |
| २५५ | धर्मप्रशंसावर्णनम् | ,, | ,, | २७२ | शौचप्रशंसा | ,, | २ |
| २५६ | गृहस्थाश्रममाहात्म्यम् | ४१८ | १ | २७३ | तीर्थानुसरणप्रशंसनम् | ,, | ,, |
| २५७ | स्वाध्यायप्रशंसा | ,, | ,, | २७४ | उपवासप्रशंसावर्णनम् | ४२३ | १ |
| २५८ | ब्रह्मचर्यप्रशंसावर्णनम् | ,, | २ | २७५ | मनःशौचिनिरूपणम् | ,, | २ |
| २५९ | सन्तानप्रशंसा | ,, | ,, | २७६ | श्रद्धावर्णनम् | ,, | ,, |
| २६० | कीर्तिप्रशंसावर्णनम् | ,, | ,, | २७७ | ज्ञानमाहात्म्यवर्णनम् | ,, | ,, |
| २६१ | यशःप्रशंसावर्णनम् | ,, | ,, | २७८ | जपप्रशंसावर्णनम् | ४२४ | १ |
| २६२ | यज्ञप्रशंसावर्णनम् | ४१९ | १ | २७९ | जलान्तर्जपमाहात्म्यवर्णनम् | ,, | २ |
| २६३ | शीलप्रशंसावर्णनम् | ,, | ,, | २८० | प्राणायाममाहात्म्यवर्णनम् | ,, | ,, |
| २६४ | दम (जितेन्द्रियत्व) प्रशंसनम् | ,, | ,, | २८१ | प्रत्याहारवर्णनम् | ,, | ,, |
| २६५ | सत्यप्रशंसावर्णनम् | ,, | २ | २८२ | धारणातिरूपणम् | ४२५ | १ |
| २६६ | तपःप्रशंसावर्णनम् | ,, | ,, | २८३ | ध्यानवर्णनम् | ,, | ,, |
पृष्ठ 45स्थायी लिंक
| अध्यायाः | विषयाः | पत्रांकाः | पृष्ठांकाः |
|---|---|---|---|
| २८४ | समाधिनिरूपणं सफलम् | ४२६ | २ |
| २८५ | व्यवसायाववर्णनम् | ४२६ | १ |
| २८६ | संकल्पवर्णनम् | ,, | ,, |
| २८७ | होमविधिवर्णनम् | ,, | ,, |
| २८८ | देवपितृपूजाफलवर्णनम् | ,, | २ |
| २८९ | आतिथ्यपूजामहत्त्वकथनम् | ४२७ | २ |
| २९० | ब्राह्मणमहत्त्ववर्णनपुरस्सरं तच्छुश्रूषाफलम् | ४२८ | १ |
| २९१ | गोमहत्त्वप्रदर्शनपुरस्सरं तच्छुश्रूषणम् | ,, | २ |
| २९२ | दयामहत्त्ववर्णनम् | ४२९ | १ |
| २९३ | दाक्षिण्यनिरूपणम् | ,, | २ |
| २९४ | प्रियंवदप्रशंसा | ,, | ,, |
| २९५ | आलस्यदोषप्रकटनपुरस्सरं यत्नस्य कार्यसाधकतावर्णनम् | ,, | ,, |
| २९६ | उदकमहत्त्वप्रदर्शनपुरस्सरं तडागादिनिर्माणफलम् | ,, | ,, |
| २९७ | वृक्षारोपणपुण्यफलारामदिनिर्माणकर्तृणां तत्तल्लोके सुखनिवास-निरूपणम् | ४३० | १ |
| २९८ | प्रपानिर्माणतज्जलाभ्यां पथिकतृषितजनितानि प्रपाकर्तृपञ्चारकयोः फलानि | ४३१ | १ |
| २९९ | तामसादिविभेदेन पुण्यफलोपदेशः, शुक्लकृष्णशबलव्याप्तिभेदेन धर्मादि-चाराश्च | ४३१ | २ |
| ३०० | दानकालसम्पद्दानफलादिकथनम् | ४३२ | १ |
| ३०१ | प्रतिग्राह्यपदार्थमितमहत्त्वमयतद्देवतादिवर्णनम् | ,, | ,, |
| ३०२ | अभयप्रदानप्रशंसावर्णनम् | ,, | २ |
| ३०३ | वेदापवेदाङ्गधर्मशास्त्रार्थव्याख्यानस्य दुस्सङ्गिनिवारणस्य च फलम् | ४३४ | १ |
| ३०४ | कन्यादानफलम् | ,, | २ |
| ३०५ | आरामजलाशयदेवताया विधिविशिष्टोप्रकारकर्मोविविधान्नमलाक्तसु-वस्त्र दाने फलानि | ४३५ | १ |
| ३०६ | गोप्रदानशक्तपरमाह्लादिकफलानिरूपणम् | ,, | २ |
| ३०७ | घृतधेनुकल्पवर्णनम् | ४३७ | १ |
| ३०८ | तिलधेनुविविधदानवर्णनम् | ,, | २ |
| ३०९ | जलधेनुविविधदानवर्णनम् | ४३८ | १ |
| ३१० | सुवर्णतिलादिविधाननिरूपणम् | ,, | ,, |
| ३११ | आसनशय्यावितानच्छत्रोपानत्तथादिदानफलवर्णनम् | ,, | २ |
| ३१२ | नृवाहशिविकादासदास्यादिदानमाहात्म्यम् | ४३९ | १ |
| ३१३ | रूपलावण्यधनसौभाग्यादिमदशमकापरसेविकादिदानवर्णनम् | ,, | २ |
पृष्ठ 46स्थायी लिंक
वि० ध० | अनु०
[भाग १]
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| ३१४ | सूर्य्याश्वदर्शकलैकादिमापकरफंशालियुगपञ्चकलामादिधान्यदानवर्णनम् .... | ४४० | १ |
| ३१५ | प्राणानामन्नमयत्वात्सर्वेषामपि जीवाना मन्नाधिकारित्वदाविर्विशेषेणान्नदानस्य माहात्म्यं तत्रापि भोजने ब्राह्मणानांगुणबाहुल्यम् .... | ” | ” |
| ३१६ | पात्रविशेषेण दानविशेषफलवर्णनम् .... | ” | २ |
| ३१७ | कालविशेषे दानविशेषफलवर्णनम् .... | ४४१ | १ |
| ३१८ | तद्दानफलं नक्षत्रव्रतवर्णनम् .... | ४४२ | १ |
| ३१९ | चैत्रादिपूर्णिमासु द्वादशीषु च व्रतोपवासदानादिफलवर्णनम् .... | ” | २ |
| ३२० | चैत्रपञ्चदश्यामुपवासादिचित्रवस्त्रादिपुरस्सरं नक्तैकभक्तादिनियमपालनपूर्वकं मासव्रतविधानम् .... | ४४३ | २ |
| ३२१ | गृहीतविष्णुपञ्जरश्रवणादिना यमकुवेरादित्याद्यष्टकेषु प्रतिद्यत्सुखादिप्राप्तितत्तल्लोकान्त्यानुभावविवर्णनम् .... | ४४४ | २ |
| ३२२ | पातिव्रत्यादिकर्म्मयनिरूपणम् .... | ४४५ | १ |
| ३२३ | वर्णानां स्वेस्वे धर्मे स्थापनान्निरोग्यधर्मनिरूपणम् .... | ” | २ |
| ३२४ | कुलश्रवणाद्याधिकृतगणानिर्याणपुरस्सरं वृद्धब्राह्मणैः सह गतो व्यवहारदर्शनवर्णनम् .... | ४४६ | २ |
| ३२५ | विशुद्धागमपूर्वकस्य भूम्यादिभागस्य प्रामाण्यवचनम् .... | ४४७ | १ |
[भाग २]
| अध्यायाः | विषयाः | पत्राङ्काः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| ३२६ | व्यवहारेषु पौरुषद्दिव्ययोर्निर्णयोधौर्लिखितसाक्षिभेदेन द्विविधपौरुषेऽपि राजसाक्षिकससाक्षिकस्वहस्तलिखितभेदेर्कोविध्यं तत्र स्थावराणां लेख्येनैव सिद्धिरलेख्यस्य सोपध्ये दिव्यधैर्व्यव्यवस्था .... | ” | ” |
| ३२७ | कृताकृतभेदेन साक्षिणामेकादशविधता, पूर्वपक्षीणां साक्षिषु पूर्वं प्रक्षा, साक्षिभेदवृत्तसाक्षिणोनिर्णयः, नृपतिशिल्पिश्रोत्रियादीनां साक्ष्यनिषेधः, आसानां सर्वेषांच साक्षित्वम् देवद्विजातिसन्निधावुदङ्मुखेन पूर्व्वाहे सशौचं साक्षिग्रहणम्, साक्ष्यारम्भे ब्राह्मणादीनां सत्यादिना शपनम् .... | ४४८ | १ |
| ३२८ | कोशाद्यादिभेदेन दिव्यानामष्टविधता, तत्र कोशस्याशिरस्कता, विप्रवर्ज्यं वर्णानां कोशादानम्, देशकालाबधुभयं दिव्यदानम्, गजाश्वदेशकाण्टककानां निस्सारणं कर्त्तव्यम्, दिव्याहिर्डनऋनयम्, तुलायोग्यशुस्तलक्षणनिर्माणिप्रकारातद्वेक्षणशान्तिपुरस्सरं तदुपविष्टस्य शुद्धिज्ञानम्, वह्निसाध्यादिव्यद्यानां विधानप्रकारः .... | ” | ” |
| ३२९ | ब्राह्मणादिवर्णानामष्टौ विवाहाः, कन्यादायोपच्छ्लोकांगपक्कोपदण्डा, ज्ञातिबलाद्विक्रयमंत्रिणोणिग्याः कटीरमाणदण्डः, भार्याया व्यभिचारे दण्डः, एकवगाय कन्यां दत्त्वाऽन्यस्मै क्षात्रे विनवृत्तयोंशाद्दण्डो राजा देयः। ऋतौ भार्यामगच्छतो भतृर्मातातथा अगच्छन्त्या भा- |
॥११॥
॥१२॥