विष्णुधर्मोत्तर पुराण (तृतीय खण्ड - चित्रसूत्र, वास्तु, शिल्प व प्रतिमा लक्षण)

विष्णुधर्मोत्तर पुराण (तृतीय खण्ड - चित्रसूत्र, वास्तु, शिल्प व प्रतिमा लक्षण)
Vishnudharmottara Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (सम्पादक: डॉ. प्रियबाला शाह) द्वारा
स्रोत: Sri Vishnu Dharmottara Mahapuranam 1000p Classic Edition (उद्गम)
DevanagariHindipublished1,001 पृष्ठ
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| अध्यायाः | विषयाः | पत्रांकाः | पृष्ठांकाः |
|---|---|---|---|
| ७९ | अनैश्वर्यरूपिहिरण्याक्षशिरश्छेदोद्यतस्य धरणीद्विसनाथस्यैश्वर्यरूप-नृवराहस्य निर्माणम् .... | ३४७ | १ |
| ८० | हयग्रीवरूपनिर्माणम् .... | " | " |
| ८१ | शेषशायिरूपनिर्माणम् .... | " | २ |
| ८२ | विष्णोः पार्श्वे पृथक् च लक्ष्मीचित्रनिर्माणकारः | " | " |
| ८३ | हरिविश्वरूपवर्णनम् .... | " | " |
| ८४ | वैकुण्ठरूपनिर्माणम् .... | ३४८ | १ |
| ८५ | वासुदेवरूपनिर्मापणे सायुधसप्तर्षिसहितिकस्य विष्णोश्चतुर्मुखादिभेदेन रूपनिर्माणं तथा भार्गवरामादशस्थिरामादि (देवोद्यान) मूर्ति-निर्माणम् .... | " | २ |
| ८६ | हिमवदादिप्रभासादृदर्शनं तत्र च सर्वतोभद्र+केशवादिमूर्त्ति-स्थापनम् .... | ३५० | १ |
| ८७ | मण्डपद्वारशिखरादिषु क्रमासादे पूर्वाद्रिक्रमेण वासुदेवसङ्कर्षणार्दि-मूर्त्तिस्थापनम् .... | ३५२ | २ |
| ८८ | चतुःषष्टिपदे देवायतने (सामान्यप्रासादे) द्वारप्रतिमापिण्डिका-कवित्वसुधामंतरणीमदिधारिमितिवसुधाक्षरसोपानादिप्रमाणवर्णनम् | ३५४ | १ |
| ८९ | देवालयार्थं दारुपरीक्षणम् .... | " | " |
| ९० | दारुपरीक्षोक्तविधिंविधच्छेदुले दण्डपुरोहिताभ्यां देवाचैर्हिशिलार्पणक्षणं शिलानामुत्तममध्यमनिकृष्टतादिभेदेन तासां फलानि पाकेन तासां दार्ढ्यकरणञ्च .... | ३५५ | १ |
| ९१ | ब्राह्मणादिजातिभेदेन मृद्मानीय ब्राह्मणादिभिर्ब्रह्मतालादार्थामिष्टका-करणम् .... | " | २ |
| ९२ | बिन्दुकर्कटपिथाश्चाश्रमलीपपुष्पादिभिर्द्रव्यैश्चलेपकप्रकारणाः .... | ३५६ | १ |
| ९३ | सत्ययुगे देवानां प्रत्यक्षपूजनं त्रेताद्वापाययोः प्रत्यक्षपूजा प्रतिमासु च, तत्रापि त्रेतायुगे गृहे द्वापर चारण्ये कलौ च देवायतननिर्मितिर्नरेषु समारब्धा, भूमिदानं विधायैव देवायतनप्रतिष्ठा कार्या, देवालय-योग्यभूमिः .... | " | " |
| ९४ | ब्राह्मणादिपङ्क्तिक्रोर्मात् मृशोधननपुरस्सरं शल्योद्धारादि विधाय श्री-विष्णुवाराहुदेवाद्विपूजनं कार्यम्, ऐशान्यां शिलां विन्यस्य प्राग्दक्षिणयेन पुनस्तन्न्यासं समाचरेत् । तद्दहेव सूत्रन्यासनन्द्रादिशिलाचने विधाय चित्रकर्म विधेयं विष्ण्वादित्रासादे गरुडाद्रेक्षाभ्यान्मपि कर्त्तव्यानि... | ३५७ | १ |
| ९५ | वास्तुपुरुषे शल्यज्ञानं, शल्यं विहाय वास्तुदेवायतनं कर्त्तव्यम्, देवा-यतनदक्षिणादिभागेषु देवतार्कोशभवनादि, धनशल्ये लब्धे वृद्धिः | ३५८ | १ |
| ९६ | वैश्य, वालिदुगोर्वाञ्च्चिन्यादिक्षेत्रेषु संवत्सरादिषु वर्षेषु वसन्तादृऋतुषु |