विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
प्रमाद-निन्दा ८९ विषयोंकी प्रवृत्तिसे मनुष्य आत्मस्वरूपसे गिर जाता है और जो एक बार स्वरूपसे गिर गया, उसका निरन्तर अधःपतन होता रहता है तथा पतित पुरुषका नाशके सिवा फिर उत्थान तो प्रायः कभी देखा नहीं जाता है। इसलिये सम्पूर्ण अनर्थोंके कारणरूप संकल्पको त्याग देना चाहिये। अतः प्रमादान्न परोऽस्ति मृत्यु- र्विवेकिनो ब्रह्मविदः समाधौ। समाहितः सिद्धिमुपैति सम्यक् समाहितात्मा भव सावधानः ॥ ३२९ ॥ इसलिये विवेकी और ब्रह्मवेत्ता पुरुषके लिये समाधिमें प्रमाद करनेसे बढ़कर और कोई मृत्यु नहीं है। समाहित पुरुष ही पूर्ण आत्म-सिद्धि प्राप्त कर सकता है; इसलिये सावधानतापूर्वक चित्तको समाहित (स्थिर) करो।
असत्-परिहार जीवतो यस्य कैवल्यं विदेहे स च केवलः। यत्किञ्चित्पश्यतो भेदं भयं ब्रूते यजुःश्रुतिः॥ ३३०॥ जिसने जीते हुए ही कैवल्यपद प्राप्त कर लिया है उसीकी देहपातके अनन्तर कैवल्यमुक्ति होती है, क्योंकि जो थोड़ा-सा भी भेद देखता है उसके लिये यजुर्वेदकी श्रुति भय बताती है। यदा कदा वापि विपश्चिदेष ब्रह्मण्यनन्तेऽप्यणुमात्रभेदम् । पश्यत्यथामुष्य भयं तदैव यद्वीक्षितं भिन्नतया प्रमादात् ॥ ३३१ ॥ जब कभी यह विद्वान् अनन्त ब्रह्ममें अणुमात्र भी भेद-दृष्टि करता है तभी इसको भयकी प्राप्ति होती है, क्योंकि स्वरूपके प्रमादसे ही अखण्ड आत्मामें भेदकी प्रतीति हुई है। श्रुतिस्मृतिन्यायशतैर्निषिद्धे दृश्येऽत्र यः स्वात्ममतिं करोति। उपैति दुःखोपरि दुःखजातं निषिद्धकर्ता स मलिम्लुचो यथा॥ ३३२ ॥ श्रुति, स्मृति और सैकड़ों युक्तियोंसे निषिद्ध हुए इस दृश्य (देहादि)- में जो आत्मबुद्धि करता है, वह निषिद्ध कर्म करनेवाले चोरके समान दुःख-पर-दुःख भोगता है। सत्याभिसन्धानरतो विमुक्तो महत्त्वमात्मीयमुपैति नित्यम्। मिथ्याभिसन्धानरतस्तु नश्येद् दृष्टं तदेतद्यदचोरचोरयोः ॥ ३३३ ॥ जो अद्वितीय ब्रह्मरूप सत्य पदार्थकी खोज करता है वही मुक्त होकर अपने
असत्-परिहार ९१ नित्य महत्त्वको प्राप्त करता है और जो मिथ्या दृश्य पदार्थोंके पीछे पड़ा रहता है वह नष्ट हो जाता है; ऐसा ही साधु और चोरके विषयमें * देखा भी गया है। यतिरसदनुसन्धिं बन्धहेतुं विहाय स्वयमयमहमस्मीत्यात्मदृष्ट्यैव तिष्ठेत् । सुखयति ननु निष्ठा ब्रह्मणि स्वानुभूत्या हरति परमविद्याकार्यदुःखं प्रतीतम् ॥ ३३४॥ यतिको चाहिये कि असत्-पदार्थोंका पीछा छोड़कर 'यह साक्षात् ब्रह्म ही मैं हूँ' ऐसी आत्मदृष्टिमें ही स्थिर होकर रहे। अपने अनुभवसे उत्पन्न हुई ब्रह्मनिष्ठा ही अविद्याके कार्यभूत इस प्रतीयमान प्रपंचके दुःखको दूर करके परम सुख देती है। बाह्यानुसन्धिः परिवर्धयेत्फलं दुर्वासनामेव ततस्ततोऽधिकाम् । ज्ञात्वा विवेकैः परिहृत्य बाह्यं स्वात्मानुसन्धिं विदधीत नित्यम् ॥ ३३५ ॥ बाह्य विषयोंका चिन्तन अपने दुर्वासनारूप फलको ही उत्तरोत्तर बढ़ाता है, इसलिये विवेकपूर्वक आत्मस्वरूपको जानकर बाह्य विषयोंको छोड़ता हुआ नित्य आत्मानुसन्धान ही करता रहे। बाह्ये निरुद्धे मनसः प्रसन्नता मनःप्रसादे परमात्मदर्शनम् । तस्मिन्सुदृष्टे भवबन्धनाशो बहिर्निरोधः पदवी विमुक्तेः ॥ ३३६ ॥
- इस प्रसंगका छान्दोग्योपनिषद् (६। १६। १-२)-में इस प्रकार वर्णन किया है कि जिस व्यक्तिपर चोरी करनेका सन्देह होता है उसे राजपुरुष तपाया हुआ परशु देते हैं। यदि उसने चोरी की होती है और वह 'मैंने चोरी नहीं की' ऐसा कहकर मिथ्या भाषण करता है तो उससे दग्ध हो जाता है और तब राजपुरुष भी उसे मार डालते हैं; और यदि वह वास्तवमें चोर नहीं होता तो सत्यसे सुरक्षित रहनेके कारण वह उस परशुसे दग्ध नहीं होता और उसे राजपुरुष भी छोड़ देते हैं।
९२ विवेक-चूडामणि बाह्य पदार्थोंका निषेध कर देनेपर मनमें आनन्द होता है और मनमें आनन्दका उद्रेक होनेपर परमात्माका साक्षात्कार होता है और उसका सम्यक् साक्षात्कार होनेपर संसारबन्धनका नाश हो जाता है। इस प्रकार बाह्य वस्तुओंका निषेध ही मुक्तिका मार्ग है। कः पण्डितः सन्सदसद्विवेकी श्रुतिप्रमाणः परमार्थदर्शी। जानन्हि कुर्यादसतोऽवलम्बं स्वपातहेतोः शिशुवन्मुमुक्षुः ॥ ३३७॥ सत्-असत् वस्तुका विवेकी, श्रुतिप्रमाणका जाननेवाला, परमार्थ-तत्त्वका ज्ञाता ऐसा कौन बुद्धिमान् होगा जो मुक्तिकी इच्छा रखकर भी जान-बूझकर बालकके समान अपने पतनके हेतु असत् पदार्थोंका ग्रहण करेगा। देहादिसंसक्तिमतो न मुक्ति- र्मुक्तस्य देहाद्यभिमत्यभावः। सुप्तस्य नो जागरणं न जाग्रतः स्वप्नस्तयोर्भिन्नगुणाश्रयत्वात् ॥ ३३८ ॥ जिसकी देह आदि अनात्मवस्तुओंमें आसक्ति है उसकी मुक्ति नहीं हो सकती और जो मुक्त हो गया है उसका देहादिमें अभिमान नहीं हो सकता। जैसे सोये हुए पुरुषको जागृतिका अनुभव नहीं हो सकता और जाग्रत् पुरुषको स्वप्नका अनुभव नहीं हो सकता, क्योंकि ये दोनों अवस्थाएँ भिन्न गुणोंके आश्रय रहती हैं। आत्मनिष्ठाका विधान अन्तर्बहिः स्वं स्थिरजङ्गमेषु ज्ञानात्मनाधारतया विलोक्य। त्यक्ताखिलोपाधिरखण्डरूपः पूर्णात्मना यः स्थित एष मुक्तः ॥ ३३९ ॥
आत्मनिष्ठाका विधान ९३ जो समस्त स्थावर-जंगम पदार्थोंके भीतर और बाहर अपनेको ज्ञानस्वरूपसे उनका आधारभूत देखकर समस्त उपाधियोंको छोड़कर अखण्ड-परिपूर्णरूपसे स्थित रहता है, वही मुक्त है। सर्वात्मना बन्धविमुक्तिहेतुः सर्वात्मभावान्न परोऽस्ति कश्चित्। दृश्याग्रहे सत्युपपद्यतेऽसौ सर्वात्मभावोऽस्य सदात्मनिष्ठया॥ ३४०॥ संसार-बन्धनसे सर्वथा मुक्त होनेमें सर्वात्म-भाव (सबको आत्मारूप देखनेके भाव)-से बढ़कर और कोई हेतु नहीं है। निरन्तर आत्मनिष्ठामें स्थित रहनेसे दृश्यका अग्रहण (बाध) होनेपर इस सर्वात्मभावकी प्राप्ति होती है। दृश्यस्याग्रहणं कथं नु घटते देहात्मना तिष्ठतो बाह्यार्थानुभवप्रसक्तमनसस्तत्तत्क्रियां कुर्वतः। संन्यस्ताखिलधर्मकर्मविषयैर्नित्यात्मनिष्ठापरै- स्तत्त्वज्ञैः करणीयमात्मनि सदानन्देच्छुभिर्यत्नतः॥ ३४१॥ जो लोग देहात्म-बुद्धिसे स्थित रहकर बाह्य पदार्थोंकी मनमें आसक्ति रखकर उन्हींके लिये निरन्तर काममें लगे रहते हैं उनको दृश्यकी अप्रतीति कैसे हो सकती है? इसलिये नित्यानन्दके इच्छुक तत्त्वज्ञानीको चाहिये कि वह समस्त धर्म, कर्म एवं विषयोंको त्यागकर निरन्तर आत्मनिष्ठामें तत्पर हो अपने आत्मामें प्रतीत होनेवाले इस दृश्य-प्रपंचका प्रयत्नपूर्वक बाध करे। सार्वात्म्यसिद्धये भिक्षोः कृतश्रवणकर्मणः। समाधिं विदधात्येषा शान्तो दान्त इति श्रुतिः॥ ३४२॥ 'शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः' (बृह० ४।४।२३) यह श्रुति यतिके लिये वेदान्त-श्रवणके अनन्तर सार्वात्म्यभावकी सिद्धिके लिये समाधिका विधान करती है।
९४ विवेक-चूड़ामणि आरूढशक्तेरहमो विनाशः कर्तुं न शक्यः सहसापि पण्डितैः । ये निर्विकल्पाख्यसमाधिनिश्चला- स्तानन्तरानन्तभवा हि वासनाः ॥ ३४३ ॥ अहंकारकी शक्ति जबतक बढ़ी-चढ़ी रहती है तबतक कोई विद्वान् उसका एकाएकी नाश नहीं कर सकता, क्योंकि जो महापुरुष निर्विकल्प- समाधिमें अविचल-भावसे स्थित हो गये हैं उनके अन्दर भी अनन्त जन्मोंकी वासनाएँ देखी जाती हैं। अहंबुद्ध्यैव मोहिन्या योजयित्वावृतेर्बलात् । विक्षेपशक्तिः पुरुषं विक्षेपयति तद्गुणैः ॥ ३४४ ॥ मोहित कर देनेवाली अहंबुद्धिके साथ अपनी आवरणशक्तिके द्वारा पुरुषका संयोग कराकर विक्षेपशक्ति उस (अहंबुद्धि)-के गुणोंसे मनुष्यको विक्षिप्त कर देती है। विक्षेपशक्तिविजयो विषमो विधातुं निःशेषमावरणशक्तिनिवृत्त्यभावे । दृग्दृश्ययोः स्फुटपयोजलवद्विभागे नश्येत्तदावरणमात्मनि च स्वभावात् । निःसंशयेन भवति प्रतिबन्धशून्यो विक्षेपणं न हि तदा यदि चेन्मृषार्थे ॥ ३४५ ॥ सम्यग्विवेकः स्फुटबोधजन्यो विभज्य दृग्दृश्यपदार्थतत्त्वम् । छिनत्ति मायाकृतमोहबन्धं यस्माद्विमुक्तस्य पुनर्न संसृतिः ॥ ३४६ ॥ आवरणशक्तिकी पूर्ण निवृत्तिके बिना विक्षेप-शक्तिपर विजय प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। दूध और जलके समान द्रष्टा और दृश्यके अलग-अलग होनेका स्पष्ट ज्ञान हो जानेपर आत्मामें छायी हुई वह
आत्मनिष्ठाका विधान ९५ आवरण-शक्ति अपने-आप ही नष्ट हो जाती है। यदि मिथ्या दीखनेवाले [ इन बुद्धि आदि] पदार्थोंमें द्रष्टा और दृश्य पदार्थोंके स्वरूपको पृथक्- पृथक् करके, स्पष्ट बोधके कारण होनेवाला निःसन्देहपूर्वक बाधरहित पूर्ण विवेक हो जाय तो फिर विक्षेप नहीं होता और वह विवेक मायाजनित मोहबन्धनको भी काट डालता है; जिससे मुक्त हुए पुरुषको फिर [ जन्म- मरणरूप ] संसारकी प्राप्ति नहीं होती। परावरैकत्वविवेकवह्नि- र्दहत्यविद्यागहनं ह्यशेषम्। किं स्यात्पुनः संसरणस्य बीज- मद्वैतभावं समुपेयुषोऽस्य ॥ ३४७ ॥ ब्रह्म और आत्माका एकत्वज्ञानरूप अग्नि अविद्यारूप समस्त वनको भस्म कर देता है। [ अविद्याके सर्वथा नष्ट हो जानेपर ] जब जीवको अद्वैत-भावकी प्राप्ति हो जाती है तब उसको पुनः संसार- प्राप्तिका कारण ही क्या रह जाता है ? आवरणस्य निवृत्ति- र्भवति च सम्यक्पदार्थदर्शनतः। मिथ्याज्ञानविनाश- स्तद्द्विक्षेपजनितदुःखनिवृत्तिः ॥ ३४८ ॥ आत्मवस्तुका ठीक-ठीक साक्षात्कार हो जानेसे आवरणका नाश हो जाता है तथा मिथ्याज्ञानका नाश और विक्षेप-जनित दुःखकी निवृत्ति हो जाती है।
अधिष्ठान-निरूपण एतत्त्रितयं दृष्टं सम्यग्रज्जुस्वरूपविज्ञानात् । तस्माद्वस्तु सतत्त्वं ज्ञातव्यं बन्धमुक्तये विदुषा ॥ ३४९ ॥ [रज्जुमें भ्रमके कारण सर्पकी प्रतीति होती है और उस मिथ्या प्रतीतिसे ही भय, कम्प आदि दुःखोंकी प्राप्ति होती है किन्तु दीपक आदिके द्वारा जिस प्रकार] रज्जुके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान होते ही [ रज्जुका अज्ञान (आवरण), अज्ञान-जन्य सर्प (मल) और सर्प-प्रतीतिसे होनेवाले भय, कम्प आदि (विक्षेप)] ये तीनों एक साथ निवृत्त होते देखे जाते हैं, [ उसी प्रकार आत्मस्वरूपका ज्ञान होनेपर आत्माका अज्ञान, अज्ञान-जन्य प्रपंचकी प्रतीति और उससे होनेवाले दुःखकी एक साथ ही निवृत्ति हो जाती है ] । इसलिये संसार-बन्धनसे छूटनेके लिये विद्वान्को तत्त्वसहित आत्मपदार्थका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। अयोऽग्नियोगादिव सत्समन्वयान् मात्रादिरूपेण विजृम्भते धीः। तत्कार्यमेतद्द्वितयं यतो मृषा दृष्टं भ्रमस्वप्नमनोरथेषु ॥ ३५० ॥ अग्निके संयोगसे जैसे लोहा [कुदाल आदि नाना प्रकारके रूपोंको धारण करता है] उसी प्रकार आत्माके संयोगसे बुद्धि [शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध आदि] नाना प्रकारके विषयोंमें प्रकाशित होती है। यह द्वैत- प्रपंच उस बुद्धिका ही कार्य है, इसलिये मिथ्या है; क्योंकि भ्रम, स्वप्न और मनोरथके समय इसकी प्रतीतिका मिथ्यात्व स्पष्ट देखा है। ततो विकाराः प्रकृतेरहंमुखा देहावसाना विषयाश्च सर्वे। क्षणेऽन्यथाभावितया ह्यमीषा- मसत्त्वमात्मा तु कदापि नान्यथा ॥ ३५१ ॥
समाधि-निरूपण ९७ इसलिये अहंकारसे लेकर देहतक प्रकृतिके जितने विकार अथवा विषय हैं वे सभी क्षण-क्षणमें बदलनेवाले होनेसे असत्य हैं, आत्मा तो कभी नहीं बदलता, वह तो सदा ही एकरस रहता है। नित्याद्वयाखण्डचिदेकरूपो बुद्ध्यादिसाक्षी सदसद्विलक्षणः। अहंपदप्रत्ययलक्षितार्थः प्रत्यक्सदानन्दघनः परात्मा॥ ३५२॥ जो 'अहम्' पदकी प्रतीतिसे लक्षित होता है वह नित्य आनन्दघन परमात्मा तो सदा ही अद्वितीय, अखण्ड, चैतन्यस्वरूप, बुद्धि आदिका साक्षी, सत्-असत्से भिन्न और प्रत्यक् (अन्तरतम) है। इत्थं विपश्चित्सदसद्विभज्य निश्चित्य तत्त्वं निजबोधदृष्ट्या। ज्ञात्वा स्वमात्मानमखण्डबोधं तेभ्यो विमुक्तः स्वयमेव शाम्यति॥ ३५३॥ विद्वान् पुरुष इस प्रकार सत् और असत्का विभाग करके अपनी ज्ञान-दृष्टिसे तत्त्वका निश्चय करके और अखण्ड-बोधस्वरूप आत्माको जानकर असत्पदार्थोंसे मुक्त होकर स्वयं ही शान्त हो जाता है। समाधि-निरूपण अज्ञानहृदयग्रन्थेर्निःशेषविलयस्तदा । समाधिनाविकल्पेन यदाद्वैतात्मदर्शनम्॥ ३५४॥ अज्ञानरूप हृदयकी ग्रन्थिका सर्वथा नाश तो तभी होता है जब निर्विकल्प समाधिद्वारा अद्वैत आत्मस्वरूपका साक्षात्कार कर लिया जाता है। त्वमहमिदमितीयं कल्पना बुद्धिदोषात् प्रभवति परमात्मन्यद्वये निर्विशेषे। प्रविलसति समाधावस्य सर्वो विकल्पो विलयनमुपगच्छेद्वस्तुतत्त्वावधृत्या ॥ ३५५॥ 133 विवेक-चूडामणि—4 A
९८ विवेक-चूडामणि अद्वितीय और निर्विशेष परमात्मामें बुद्धिके दोषसे 'तू, मैं, यह'—ऐसी कल्पना होती है और वही सम्पूर्ण विकल्प समाधिमें विघ्नरूपसे स्फुरित होता है; किन्तु तत्त्व-वस्तुका यथावत् ग्रहण होनेसे वह सब लीन हो जाता है। शान्तो दान्तः परमुपरतः क्षान्तियुक्तः समाधिं कुर्वन्नित्यं कलयति यतिः स्वस्य सर्वात्मभावम्। तेनाविद्यातिमिरजनितान्साधु दग्ध्वा विकल्पान् ब्रह्माकृत्या निवसति सुखं निष्क्रियो निर्विकल्पः॥ ३५६॥ योगी पुरुष चित्तकी शान्ति, इन्द्रियनिग्रह, विषयोंसे उपरति और क्षमासे युक्त होकर समाधिका निरन्तर अभ्यास करता हुआ अपने सर्वात्म- भावका अनुभव करता है और उसके द्वारा अविद्यारूप अन्धकारसे उत्पन्न हुए समस्त विकल्पोंका भलीभाँति ध्वंस करके निष्क्रिय और निर्विकल्प होकर आनन्दपूर्वक ब्रह्माकार वृत्तिसे रहता है। समाहिता ये प्रविलाप्य बाह्यं श्रोत्रादि चेतः स्वमहं चिदात्मनि। त एव मुक्ता भवपाशबन्धै- र्नान्ये तु पारोक्ष्यकथाभिधायिनः॥ ३५७॥ जो लोग श्रोत्रादि इन्द्रियवर्ग तथा चित्त और अहंकार इन बाह्य वस्तुओंको आत्मामें लीन करके समाधिमें स्थित होते हैं वे ही संसार-बन्धनसे मुक्त हैं, जो केवल परोक्ष ब्रह्मज्ञानकी बातें बनाते रहते हैं वे कभी मुक्त नहीं हो सकते। उपाधिभेदात्स्वयमेव भिद्यते चोपाध्यपोहे स्वयमेव केवलः। तस्मादुपाधेर्विलयाय विद्वान् वसेत्सदाकल्पसमाधिनिष्ठया ॥ ३५८ ॥ उपाधिके भेदसे ही आत्मामें भेदकी प्रतीति होती है और उपाधिका लय हो जानेपर वह केवल स्वयं ही रह जाता है, इसलिये उपाधिका लय करनेके लिये विचारवान् पुरुष सदा निर्विकल्प-समाधिमें स्थित होकर रहे। 133 विवेक-चूडामणि—4 B
समाधि-निरूपण ९९ सति सक्तो नरो याति सद्भावं ह्येकनिष्ठया। कीटको भ्रमरं ध्यायन्भ्रमरत्वाय कल्पते ॥ ३५९ ॥ एकाग्रचित्तसे निरन्तर सत्स्वरूप ब्रह्ममें स्थित रहनेसे मनुष्य ब्रह्मस्वरूप ही हो जाता है, जैसे भ्रमरका भयपूर्वक ध्यान करते-करते कीड़ा भ्रमरस्वरूप ही हो जाता है। क्रियान्तरासक्तिमपास्य कीटको ध्यायन्यथालिं ह्यलिभावमृच्छति। तथैव योगी परमात्मतत्त्वं ध्यात्वा समायाति तदेकनिष्ठया ॥ ३६० ॥ जिस प्रकार अन्य समस्त क्रियाओंकी आसक्तिको छोड़कर केवल भ्रमरका ही ध्यान करते-करते कीड़ा भ्रमररूप हो जाता है, उसी प्रकार योगी एकनिष्ठ होकर परमात्मतत्त्वका चिन्तन करते-करते परमात्मभावको ही प्राप्त हो जाता है। अतीव सूक्ष्मं परमात्मतत्त्वं न स्थूलदृष्ट्या प्रतिपत्तुमर्हति। समाधिनात्यन्तसुसूक्ष्मवृत्त्या ज्ञातव्यमार्यैरतिशुद्धबुद्धिभिः ॥ ३६१ ॥ परमात्मतत्त्व अत्यन्त सूक्ष्म है, उसे स्थूल दृष्टिसे कोई भी प्राप्त नहीं कर सकता, इसलिये अति शुद्ध बुद्धिवाले सत्पुरुषोंको उसे समाधिद्वारा अति सूक्ष्मवृत्तिसे जानना चाहिये। यथा सुवर्णं पुटपाकशोधितं त्यक्त्वा मलं स्वात्मगुणं समृच्छति। तथा मनः सत्त्वरजस्तमोमलं ध्यानेन सन्त्यज्य समेति तत्त्वम् ॥ ३६२॥ जिस प्रकार [ अग्निमें ] पुटपाक-विधिसे शोधा हुआ सोना सम्पूर्ण मलको त्यागकर अपने स्वाभाविक स्वरूपको प्राप्त कर लेता है, उसी 133 विवेक-चूडामणि—4 C
१०० विवेक-चूडामणि प्रकार मन ध्यानके द्वारा सत्त्व-रज-तमरूप मलको त्यागकर आत्मतत्त्वको प्राप्त कर लेता है। निरन्तराभ्यासवशात्तदित्थं पक्वं मनो ब्रह्मणि लीयते यदा। तदा समाधिः स विकल्पवर्जितः स्वतोऽद्वयानन्दरसानुभावकः ॥ ३६३ ॥ जिस समय रात-दिनके निरन्तर अभ्याससे परिपक्व होकर मन ब्रह्ममें लीन हो जाता है, उस समय अद्वितीय ब्रह्मानन्दरसका अनुभव करानेवाली वह निर्विकल्प-समाधि स्वयं ही सिद्ध हो जाती है। समाधिनानेन समस्तवासना- ग्रन्थेर्विनाशोऽखिलकर्मनाशः । अन्तर्बहिः सर्वत एव सर्वदा स्वरूपविस्फूर्तिरयत्नतः स्यात् ॥ ३६४ ॥ इस निर्विकल्प-समाधिसे समस्त वासना-ग्रन्थियोंका नाश हो जाता है तथा वासनाओंके नाशसे सम्पूर्ण कर्मोंका भी नाश हो जाता है और फिर बाहर- भीतर सर्वत्र बिना प्रयत्नके ही निरन्तर स्वरूपकी स्फूर्ति होने लगती है। श्रुतेः शतगुणं विद्यान्मननं मननादपि। निदिध्यासं लक्षगुणमनन्तं निर्विकल्पकम् ॥ ३६५ ॥ वेदान्तके श्रवणमात्रसे उसका मनन करना सौगुना अच्छा है और मननसे भी लाखगुना श्रेयस्कर निदिध्यासन (आत्मभावनाको अपने चित्तमें स्थिर करना) है तथा निदिध्यासनसे भी अनन्तगुना निर्विकल्प-समाधिका महत्त्व है [जिससे चित्त फिर आत्मस्वरूपसे कभी चलायमान ही नहीं होता]। निर्विकल्पकसमाधिना स्फुटं ब्रह्मतत्त्वमवगम्यते ध्रुवम्। नान्यथा चलतया मनोगतेः प्रत्ययान्तरविमिश्रितं भवेत् ॥ ३६६ ॥ 133 विवेक-चूडामणि—4 D
समाधि-निरूपण १०१ निर्विकल्प-समाधिके द्वारा निश्चय ही ब्रह्मतत्त्वका स्पष्ट ज्ञान होता है, और किसी प्रकार वैसा बोध नहीं हो सकता; क्योंकि अन्य अवस्थाओंमें चित्तवृत्तिके चंचल रहनेसे उसमें अन्यान्य प्रतीतियोंका भी मेल रहता है। अतः समाधत्स्व यतेन्द्रियः सदा निरन्तरं शान्तमनाः प्रतीचि। विध्वंसय ध्वान्तमनाद्यविद्यया कृतं सदेकत्वविलोकनेन॥ ३६७॥ इसलिये सदा संयतेन्द्रिय होकर शान्त मनसे निरन्तर प्रत्यगात्मा ब्रह्ममें चित्त स्थिर करो और सच्चिदानन्द ब्रह्मके साथ अपना ऐक्य देखते हुए अनादि अविद्यासे उत्पन्न अज्ञानान्धकारका ध्वंस करो। योगस्य प्रथमं द्वारं वाङ्निरोधोऽपरिग्रहः। निराशा च निरीहा च नित्यमेकान्तशीलता॥ ३६८॥ वाणीको रोकना, द्रव्यका संग्रह न करना, लौकिक पदार्थोंकी आशा छोड़ना, कामनाओंका त्याग करना और नित्य एकान्तमें रहना—ये सब योगका पहला द्वार हैं। एकान्तस्थितिरिन्द्रियोपरमणे हेतुर्दमश्चेतसः संरोधे करणं शमेन विलयं यायादहंवासना। तेनानन्दरसानुभूतिरचला ब्राह्मी सदा योगिन- स्तस्माच्चित्तनिरोध एव सततं कार्यः प्रयत्नान्मुनेः॥ ३६९॥ एकान्तमें रहना इन्द्रिय-दमनका कारण है, इन्द्रिय-दमन चित्तके निरोधका कारण है और चित्त-निरोधसे वासनाका नाश होता है तथा वासनाके नष्ट हो जानेसे योगीको ब्रह्मानन्दरसका अविचल अनुभव होता है; इसलिये मुनिको सदा प्रयत्नपूर्वक चित्तका निरोध ही करना चाहिये। वाचं नियच्छात्मनि तं नियच्छ बुद्धौ धियं यच्छ च बुद्धिसाक्षिणि। तं चापि पूर्णात्मनि निर्विकल्पे विलाप्य शान्तिं परमां भजस्व॥ ३७०॥
१०२ विवेक-चूड़ामणि वाणीको मनमें लय करो, मनको बुद्धिमें और बुद्धिको बुद्धिके साक्षी आत्मामें तथा बुद्धि-साक्षी (कूटस्थ)-को निर्विकल्प पूर्णब्रह्ममें लय करके परमशान्तिका अनुभव करो। देहप्राणेन्द्रियमनोबुद्ध्यादिभिरुपाधिभिः । यैर्यैर्वृत्तेः समायोगस्तत्तद्भावोऽस्य योगिनः ॥ ३७१ ॥ देह, प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धि—इन उपाधियोंमेंसे जिस-जिसके साथ योगीकी चित्तवृत्तिका संयोग होता है उसी-उसी भावकी उसको प्राप्ति होती है। तन्निवृत्त्या मुनेः सम्यक्सर्वोपरमणं सुखम्। संदृश्यते सदानन्दरसानुभवविप्लवः ॥ ३७२ ॥ जब उस मुनिका चित्त इन सब उपाधियोंसे निवृत्त हो जाता है तो उसको पूर्ण उपरतिका आनन्द स्पष्टतया प्रतीत होने लगता है जिससे उसके चित्तमें सच्चिदानन्दरसानुभवकी बाढ़ आने लगती है। वैराग्य-निरूपण अन्तस्त्यागो बहिस्त्यागो विरक्तस्यैव युज्यते। त्यजत्यन्तर्बहिःसङ्गं विरक्तस्तु मुमुक्षया ॥ ३७३ ॥ विरक्त पुरुषका ही आन्तरिक और बाह्य दोनों प्रकारका त्याग करना ठीक है। वही मोक्षकी इच्छासे आन्तरिक और बाह्य संगको त्याग देता है। बहिस्तु विषयैः सङ्गं तथान्तरहमादिभिः । विरक्त एव शक्नोति त्यक्तुं ब्रह्मणि निष्ठितः ॥ ३७४ ॥ इन्द्रियोंका विषयोंके साथ बाह्य संग और अहंकारादिके साथ आन्तरिक संग—इन दोनोंका ब्रह्मनिष्ठ विरक्त पुरुष ही त्याग कर सकता है। वैराग्यबोधौ पुरुषस्य पक्षिवत् पक्षौ विजानीहि विचक्षण त्वम्। विमुक्तिसौधाग्रतलाधिरोहणं ताभ्यां विना नान्यतरेण सिध्यति ॥ ३७५ ॥
वैराग्य-निरूपण १०३ हे विद्वन्! वैराग्य और बोध—इन दोनोंको पक्षीके दोनों पंखोंके समान मोक्षकामी पुरुषके पंख समझो। इन दोनोंमेंसे किसी भी एकके बिना केवल एक ही पंखके द्वारा कोई मुक्तिरूपी महलकी अटारीपर नहीं चढ़ सकता [अर्थात् मोक्षप्राप्तिके लिये वैराग्य और बोध दोनोंकी ही आवश्यकता है]। अत्यन्तवैराग्यवतः समाधिः समाहितस्यैव दृढप्रबोधः। प्रबुद्धतत्त्वस्य हि बन्धमुक्ति- र्मुक्तात्मनो नित्यसुखानुभूतिः ॥ ३७६ ॥ अत्यन्त वैराग्यवान्को ही समाधि-लाभ होता है, समाधिस्थ पुरुषको ही दृढ़ बोध होता है तथा सुदृढ़ बोधवान्का ही संसार-बन्धन छूटता है और जो संसार-बन्धनसे छूट गया है उसीको नित्यानन्दका अनुभव होता है। वैराग्यान्न परं सुखस्य जनकं पश्यामि वश्यात्मन- स्तच्चेच्छुद्धतरात्मबोधसहितं स्वाराज्यसाम्राज्यधुक्। एतद्द्वारमजस्रमुक्तियुवतेर्यस्मात्त्वमस्मात्परं सर्वत्रास्पृहया सदात्मनि सदा प्रज्ञां कुरु श्रेयसे ॥ ३७७ ॥ जितेन्द्रिय पुरुषके लिये वैराग्यसे बढ़कर सुखदायक मुझे और कुछ भी प्रतीत नहीं होता और वह यदि कहीं शुद्ध आत्मज्ञानके सहित हो तब तो स्वर्गीय साम्राज्यके सुखका देनेवाला होता है। यह मुक्तिरूप कामिनीका निरन्तर खुला हुआ द्वार है; इसलिये हे वत्स! तुम अपने कल्याणके लिये सब ओरसे इच्छारहित होकर सदा सच्चिदानन्द ब्रह्ममें ही अपनी बुद्धि स्थिर करो। आशां छिन्धि विषोपमेषु विषयेष्वेवैष मृत्योः सृति- स्त्यक्त्वा जातिकुलाश्रमेष्वभिमतिं मुञ्चातिदूरात्क्रियाः। देहादावसति त्यजात्मधिषणां प्रज्ञां कुरुष्वात्मनि त्वं द्रष्टास्यमलोऽसि निर्द्वयपरं ब्रह्मासि यद्वस्तुतः॥ ३७८ ॥ विषके समान विषम विषयोंकी आशाको छोड़ दो, क्योंकि यह [स्वरूपविस्मृतिरूप] मृत्युका मार्ग है तथा जाति, कुल और आश्रम आदिका
१०४ विवेक-चूडामणि अभिमान छोड़कर दूरसे ही कर्मोंको नमस्कार कर दो। देह आदि असत् पदार्थोंमें आत्मबुद्धिको छोड़ो और आत्मामें अहंबुद्धि करो, क्योंकि तुम तो वास्तवमें इन सबके द्रष्टा और मल तथा द्वैतसे रहित जो परब्रह्म है, वही हो। ध्यान-विधि लक्ष्ये ब्रह्मणि मानसं दृढतरं संस्थाप्य बाह्येन्द्रियं स्वस्थाने विनिवेश्य निश्चलतनुश्चोपेक्ष्य देहस्थितिम्। ब्रह्मात्मैक्यमुपेत्य तन्मयतया चाखण्डवृत्त्यानिशं ब्रह्मानन्दरसं पिबात्मनि मुदा शून्यैः किमन्यैर्भ्रमैः॥ ३७९॥ चित्तको अपने लक्ष्य ब्रह्ममें दृढ़तापूर्वक स्थिरकर बाह्य इन्द्रियोंको [उनके विषयोंसे हटाकर] अपने-अपने गोलकोंमें स्थिर करो, शरीरको निश्चल रखो और उसकी स्थितिकी ओर ध्यान मत दो। इस प्रकार ब्रह्म और आत्माकी एकता करके तन्मयभावसे अखण्ड-वृत्तिसे अहर्निश मन-ही-मन आनन्दपूर्वक ब्रह्मानन्दरसका पान करो और थोथी बातोंसे क्या लेना है ? अनात्मचिन्तनं त्यक्त्वा कश्मलं दुःखकारणम्। चिन्तयात्मानमानन्दरूपं यन्मुक्तिकारणम्॥ ३८०॥ दुःखके कारण और मोहरूप अनात्म-चिन्तनको छोड़कर आनन्दस्वरूप आत्माका चिन्तन करो, जो साक्षात् मुक्तिका कारण है। एष स्वयंज्योतिरशेषसाक्षी विज्ञानकोशे विलसत्यजस्रम्। लक्ष्यं विधायैनमसद्विलक्षण- मखण्डवृत्त्यात्मतयानुभावय ॥ ३८१॥ यह जो स्वयंप्रकाश सबका साक्षी निरन्तर विज्ञानमय कोशमें विराजमान है, समस्त अनित्य पदार्थोंसे पृथक् इस परमात्माको ही अपना लक्ष्य बनाकर इसीका [तैलधारावत्] अखण्ड-वृत्तिसे, आत्म-भावसे चिन्तन करो।
आत्म-दृष्टि १०५ एतमच्छिन्नया वृत्त्या प्रत्ययान्तरशून्यया। उल्लेखयन्विजानीयात्स्वस्वरूपतया स्फुटम्॥ ३८२॥ अन्य प्रतीतियोंसे रहित अखण्ड-वृत्तिसे इस एकहीका चिन्तन करते हुए योगी इसीको स्पष्टतया अपना स्वरूप जाने। अत्रात्मत्वं दृढीकुर्वन्नहमादिषु सन्त्यजन्। उदासीनतया तेषु तिष्ठेद्धटपटादिवत्॥ ३८३॥ इस प्रकार इस परमात्मामें ही आत्मभावको दृढ़ करता हुआ और अहंकारादिमें आत्मबुद्धि छोड़ता हुआ उनकी ओरसे शरीरसे भिन्न घट- पट आदि वस्तुओंके समान उदासीन हो जाय। आत्म-दृष्टि विशुद्धमन्तःकरणं स्वरूपे निवेश्य साक्षिण्यवबोधमात्रे। शनैः शनैर्निश्चलतामुपानयन् पूर्णं स्वमेवानुविलोकयेत्ततः॥ ३८४॥ सबके साक्षी और ज्ञानस्वरूप आत्मामें अपने शुद्ध चित्तको लगाकर धीरे- धीरे निश्चलता प्राप्त करता हुआ अन्तमें सर्वत्र अपनेहीको परिपूर्ण देखे। देहेन्द्रियप्राणमनोऽहमादिभिः स्वाज्ञानक्लृप्तैरखिलैरुपाधिभिः। विमुक्तमात्मानमखण्डरूपं पूर्णं महाकाशमिवावलोकयेत्॥ ३८५॥ अपने अज्ञानसे कल्पित देह, इन्द्रिय, प्राण, मन और अहंकार आदि समस्त उपाधियोंसे रहित अखण्ड आत्माको महाकाशकी भाँति सर्वत्र परिपूर्ण देखे। घटकलशकुशूलसूचिमुख्यै- र्गगनमुपाधिशतैर्विमुक्तमेकम् । भवति न विविधं तथैव शुद्धं परमहमादिविमुक्तमेकमेव ॥ ३८६॥
१०६ विवेक-चूड़ामणि जिस प्रकार आकाश घट, कलश, कुशूल (अनाजका कोठा), सूची (सूई) आदि सैकड़ों उपाधियोंसे रहित एक ही रहता है; नाना उपाधियोंके कारण वह नाना नहीं हो जाता। उसी प्रकार अहंकारादि उपाधियोंसे रहित एक ही शुद्ध परमात्मा है। ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्ता मृषामात्रा उपाधयः । ततः पूर्णं स्वमात्मानं पश्येदेकात्मना स्थितम् ॥ ३८७॥ ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब (तृण) पर्यन्त समस्त उपाधियाँ मिथ्या हैं, इसलिये अपनेको सदा एकरूपसे स्थित परिपूर्ण आत्मस्वरूप देखना चाहिये। यत्र भ्रान्त्या कल्पितं यद्विवेके तत्तन्मात्रं नैव तस्माद्विभिन्नम्। भ्रान्तेर्नाशे भ्रान्तिदृष्टाहितत्त्वं रज्जुस्तद्वद्विश्वमात्मस्वरूपम् ॥ ३८८॥ जिस वस्तुकी जहाँ (जिस आधारमें) भ्रमसे कल्पना हो जाती है उस आधारका ठीक-ठीक ज्ञान हो जानेपर वह कल्पित वस्तु तद्रूप ही निश्चित होती है, उससे पृथक् उसकी सत्ता सिद्ध नहीं होती। जिस प्रकार भ्रान्तिके नष्ट होनेपर रज्जुमें भ्रान्तिवश प्रतीत होनेवाला सर्प रज्जु-रूप ही प्रत्यक्ष होता है वैसे ही अज्ञानके नष्ट होनेपर सम्पूर्ण विश्व आत्मस्वरूप ही जान पड़ता है। स्वयं ब्रह्मा स्वयं विष्णुः स्वयमिन्द्रः स्वयं शिवः। स्वयं विश्वमिदं सर्वं स्वस्मादन्यन्न किञ्चन ॥ ३८९॥ आप ही ब्रह्मा है, आप ही विष्णु है, आप ही इन्द्र है, आप ही शिव है और आप ही यह सारा विश्व है, अपनेसे भिन्न और कुछ भी नहीं है। अन्तः स्वयं चापि बहिः स्वयं च स्वयं पुरस्तात्स्वमेव पश्चात्। स्वयं ह्यवाच्यां स्वममप्युदीच्यां तथोपरिष्टात्स्वयमप्यधस्तात् ॥ ३९०॥ आप ही भीतर है, आप ही बाहर है; आप ही आगे है, आप ही पीछे है; आप ही दायें है, आप ही बायें है; और आप ही ऊपर है, आप ही नीचे है।
आत्म-दृष्टि १०७ तरङ्गफेनभ्रमबुद्बुदादि सर्वं स्वरूपेण जलं यथा तथा। चिदेव देहाद्यहमन्तमेतत् सर्वं चिदेवैकरसं विशुद्धम्॥ ३९१॥ जैसे तरंग, फेन, भँवर और बुद्बुद आदि स्वरूपसे सब जल ही हैं, वैसे ही देहसे लेकर अहंकारपर्यन्त यह सारा विश्व भी अखण्ड शुद्धचैतन्य आत्मा ही है। सदेवेदं सर्वं जगदवगतं वाङ्मनसयोः सतोऽन्यन्नास्त्येव प्रकृतिपरसीम्नि स्थितवतः। पृथक् किं मृत्स्नायाः कलशघटकुम्भाद्यवगतं वदत्येष भ्रान्तस्त्वमहमिति मायामदिरया॥ ३९२॥ मन और वाणीसे प्रतीत होनेवाला यह सारा जगत् सत्स्वरूप ही है; जो महापुरुष प्रकृतिसे परे आत्मस्वरूपमें स्थित है, उसकी दृष्टिमें सत्से पृथक् और कुछ भी नहीं है। मिट्टीसे पृथक् घट, कलश और कुम्भ आदि क्या हैं? मनुष्य मायामयी मदिरासे उन्मत्त होकर ही 'मैं, तू'—ऐसी भेदबुद्धियुक्त वाणी बोलता है। क्रियासमभिहारेण यत्र नान्यदिति श्रुतिः। ब्रवीति द्वैतराहित्यं मिथ्याध्यासनिवृत्तये॥ ३९३॥ कार्यरूप द्वैतका उपसंहार करते हुए 'जहाँ और कुछ नहीं देखता' ऐसी अद्वैतपरक श्रुति* मिथ्या अध्यासकी निवृत्तिके लिये बारम्बार द्वैतका अभाव बतलाती है। आकाशवन्निर्मलनिर्विकल्प- निःसीमनिष्यन्दननिर्विकारम् । अन्तर्बहिःशून्यमनन्यमद्वयं स्वयं परं ब्रह्म किमस्ति बोध्यम्॥ ३९४॥
- 'यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा' (छान्दो० ७। २४। १)
१०८ विवेक-चूड़ामणि जो परब्रह्म स्वयं आकाशके समान निर्मल, निर्विकल्प, निःसीम, निश्चल, निर्विकार, बाहर-भीतर सब ओरसे शून्य, अनन्य और अद्वितीय है वह क्या ज्ञानका विषय हो सकता है? वक्तव्यं किमु विद्यतेऽत्र बहुधा ब्रह्मैव जीवः स्वयं ब्रह्मैतज्जगदाततं नु सकलं ब्रह्माद्वितीयं श्रुतेः। ब्रह्मैवाहमिति प्रबुद्धमतयः सन्त्यक्तबाह्याः स्फुटं ब्रह्मीभूय वसन्ति सन्ततचिदानन्दात्मनैव ध्रुवम्॥ ३९५॥ इस विषयमें और अधिक क्या कहना है? जीव तो स्वयं ब्रह्म ही हैं और ब्रह्म ही यह सम्पूर्ण जगत्-रूपसे फैला हुआ है, क्योंकि श्रुति भी कहती है कि ब्रह्म अद्वितीय है। और यह निश्चय है, जिनको यह बोध हुआ है कि मैं ब्रह्म ही हूँ वे बाह्य विषयोंको सर्वथा त्यागकर ब्रह्मभावसे सदा सच्चिदानन्दस्वरूपसे ही स्थित रहते हैं। जहि मलमयकोशेऽहंधियोत्थापिताशां प्रसभमनिलकल्पे लिङ्गदेहेऽपि पश्चात्। निगमगदितकीर्तिं नित्यमानन्दमूर्तिं स्वयमिति परिचीय ब्रह्मरूपेण तिष्ठ॥ ३९६॥ इस मलमय कोशमें अहंबुद्धिसे हुई आसक्तिको छोड़ो और इसके पश्चात् वायु-रूप लिंगदेहमें भी उसका दृढ़तापूर्वक त्याग करो, तथा जिसकी कीर्तिका वेद बखान करते हैं उस आनन्दस्वरूप ब्रह्मको ही अपना स्वरूप जानकर सदा ब्रह्मरूपसे ही स्थिर होकर रहो। शवाकारं यावद्भजति मनुजस्तावदशुचिः परेभ्यः स्यात्क्लेशो जननमरणव्याधिनिलयः। यदात्मानं शुद्धं कलयति शिवाकारमचलं तदा तेभ्यो मुक्तो भवति हि तदाह श्रुतिरपि ॥ ३९७ ॥ श्रुति भी यही कहती है कि मनुष्य जबतक इस मृतकतुल्य देहमें आसक्त रहता है तबतक वह अत्यन्त अपवित्र रहता है और जन्म, मरण तथा व्याधियोंका