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व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ७७ वह प्रत्यापत्ति लिङ्ग के लिए होगी । तो वह कहनी होगी । (इससे गौरव होगा) । यद्यपि यह कहनी होगी तथापि इससे अनेक अनुबन्धों को नहीं कहना होगा, इत्संज्ञा नहीं कहनी पड़ेगी, लोप नहीं बताना पड़ेगा । जो (कार्य) अनुबन्धों से किया जाता है वह कलादि दोषों से कर लिया जायेगा । ऐसा किया तो जा सकता है, परन्तु यह अपाणिनीय होगा । उ०—पूर्वपक्षी सिद्धान्ती के इस समाधान से सहमत नहीं है कि गर्गादि बिदादि गणपाठों से संवृतादि दोषों की निवृत्ति हो जाती है । उसके अनुसार इन गणपाठों का प्रयोजन गर्ग आदि शब्दों से यञ् प्रत्यय करके निष्पन्न गार्ग्य आदि समुदायों के साधुत्व का प्रतिपादन है, अतः ये कलादि दोषों की निवृत्ति नहीं कर सकते । सिद्धान्ती इसका समाधान करता हुआ कहता है कि शास्त्र के अन्त में "अ अ" सूत्र का निर्माण करके जिस प्रकार अवर्ण से इस दोष का निवारण किया गया है, उसी प्रकार से अन्य इ, उ आदि वर्णों के दोषों की भी निवृत्ति कर दी जायेगी । कैयट के अनुसार अवर्ण यहाँ निदर्शनभूत है, अर्थात् 'अ' के समान ही अन्य वर्णों का भी ग्रहण स्वयं कर लेना चाहिए । परन्तु नागेश के अनुसार इसका अर्थ यह है कि 'अ' की जिस प्रकार से दोषनिवृत्ति की गई है, उसी प्रकार से अन्य वर्णों की भी की जायेगी । परन्तु इससे गौरव दोष आ जायेगा, अतः पूर्वपक्षी इस समाधान को स्वीकार नहीं करता । एक अन्य समाधान के रूप में पतञ्जलि ने एक नया प्रयोग करने का प्रयास किया है । उसका अभिप्राय यह है कि अब धातु आदि से जो अनुबन्ध लगाने पड़ते हैं, उनके स्थान पर कलादि को लिङ्ग रूप से समझा जा सकता है । अब जिस प्रकार से ङित् और अनुदात्तेत् की आत्मनेपद संज्ञा होती है, इसके स्थान पर 'कल' दोष वाली धातु की आत्मनेपद संज्ञा हो जायेगी । स्वरितेत् और ञित् के स्थान पर 'ध्मात' दोष से कार्य निष्पन्न किया जायेगा । इससे अनुबन्ध लगाने, उनकी इत्संज्ञा करने और उसका लोप करने की सारी शास्त्रीय प्रक्रिया की बचत हो जायेगी, अतः लाघव से शास्त्र प्रतिपादन भी हो सकेगा । परन्तु इस प्रकार से शास्त्रप्रक्रिया के सिद्ध होने पर भी यह पद्धति अपाणिनीय हो जायेगी और अपाणिनीय समाधान को स्वीकार नहीं किया जा सकता । और फिर असाधु प्रतिपादन का दोष भी इससे शास्त्र में आ जायेगा । अतः सिद्धान्ती का यह मत भी पूर्वपक्षी को अस्वीकार्य है ।

७८ महाभाष्यम् मूलम् — यथान्यासमेवास्तु । ननु चोक्तम् — "आकृत्युपदेशात्सिद्धमिति चेत्संवृतादीनां प्रतिषेध इति ।" परिहृतमेतत् — "गर्गादिबिदादिपाठात्संवृतादीनां निवृत्तिर्भविष्यतीति । ननु चान्यद् गर्गादिबिदादिपाठे प्रयोजनम् । किम् ? समुदायानां साधुत्वं यथा स्यादिति । एवं तर्ह्युभयमनेन क्रियते—पाठश्चैव विशेष्यते, कलादयश्च निवर्त्यन्ते । कथं पुनरेकेन यत्नेनोभयं लभ्यम् ? लभ्यमित्याह । कथम् ? द्विर्गता अपि हेतवो भवन्ति । तद्यथा—आम्राश्च सिक्ताः पितरश्च प्रीणिता इति । तथा वाक्यानि द्विष्ठानि भवन्ति—श्वेतो धावति, अलम्बुसानां यातेति । प्रदीपः — उभयमिति । यथाभूता गर्गादिस्था अकारादयस्तथाभूता एव सर्वत्र प्रयोक्तव्या इति प्रतिपाद्यत इत्यर्थः । द्विर्गता इति । द्वावर्थौ गताः प्रयोजनद्वय- सम्पादका इत्यर्थः । तथा वाक्यान्त्यपीति । शब्दस्याप्यर्थवद् द्विगतत्वमित्यर्थः । अनुवाद — जैसे पहले कहा था । (आकृत्युपदेशात्सिद्धमिति) (वही) हो । और (हमारी ओर से) कहा गया था कि आकृत्युपदेश से ही यदि सिद्धि मानी जाये तो संवृतादि (दोषों में) प्रतिषेध करना होगा । इसका तो परिहार कर दिया गया था कि गर्गादि बिदादि पाठ से संवृतादि की निवृत्ति हो जायेगी । और जो गर्गादि बिदादि पाठ का तो अन्य ही प्रयोजन है । क्या ? जिससे (तत्तत्) समुदायों का साधुत्व हो । तो फिर दोनों ही (कार्य) उसके द्वारा किये जाते हैं—पाठ को विशिष्ट किया जाता है और कलादि दोष निवृत्त किये जाते हैं । एक ही यत्न से दोनों प्राप्तियाँ कैसे हो सकती हैं ? हो सकती हैं, ऐसा कहते हैं । कैसे ? द्विष्ठ हेतु भी होते हैं । जैसे कि (आम्रवृक्ष के नीचे पितृतर्पण करने से) आम भी सिक्त हो जाते हैं और पितृतर्पण भी हो जाता है । इसी से वाक्य भी द्विष्ठ होते हैं—"श्वेतो धावति" = (श्वेत गुण वाला दौड़ता है, कुत्ता यहां से दौड़ता है) ।"

प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ७९ “अलम्बुसानां याता” (अलम्बुस) (देश को) जाने वाला, बुसों को प्राप्त करने वाला समर्थ है। उद्वा -- अन्य सम्भावनाओं पर विचार करने के अनन्तर सिद्धान्ती पुनः अपने पूर्व निरूपित पक्ष का आश्रय लेता है। अर्थात् अवर्णादि की आकृति अपने से सम्बद्ध अन्य आकृति रूपों का भी ग्रहण करवायेगी। इससे प्रसक्त होने वाले संवृतादि दोषों की निवृत्ति गर्गादि बिदादि गणपाठों से हो जायेगी। इन गणपाठों का अतिरिक्त प्रयोजन होने पर भी सिद्धान्त पक्ष में कोई दूषण उत्पन्न नहीं होता। एक ही यत्न से दो फलों की प्राप्ति लोक में देखी जाती है। आम्रवृक्ष के मूल में पितरों को जल प्रदान करने से आम्रसिंचन भी हो जाता है और पितृतर्पण भी। अर्थ की तरह से शब्दों में भी द्व्यर्थकता देखी जाती है। “श्वेतो धावति” उदाहरण में ‘श्वेत’ पद के दो प्रकार से अर्थ किये जा सकते हैं—(१) श्वेत गुण वाला और (२) श्वा + इतः इत्यादि; उसी प्रकार इन गणपाठों से समुदायों के साधुत्व का भी प्रतिपादन हो सकेगा और कलादि दोषों की निवृत्ति भी हो जायेगी। मूलम् — अथवा इदं तावदयं प्रष्टव्यः — “क्वेमे संवृतादयः श्रूयेरन्निति ।” आगमेषु । आगमाः शुद्धाः पठ्यन्ते । विकारेषु तर्हि । विकारा अपि शुद्धाः पठ्यन्ते । प्रत्ययेषु तर्हि । प्रत्यया अपि शुद्धाः पठ्यन्ते । धातुषु तर्हि । धातवोऽपि शुद्धाः पठ्यन्ते । प्रातिपदिकेषु तर्हि । प्रातिपदिकान्यपि शुद्धानि पठ्यन्ते । यानि तर्ह्यग्रहणानि प्रातिपदिकानि । एतेषामपि स्वरवर्णानुपूर्वीज्ञानार्थ उपदेशः कर्त्तव्यः । शशः षष इति मा भूत् । पलाश इति मा भूत् । मञ्चको मञ्जक इति मा भूत् ।— आगमाश्च विकाराश्च प्रत्ययाः सह धातुभिः । उच्चार्यन्ते ततस्तेषु नेमे प्राप्ताः कलादयः ॥ (इति श्रीमद्भगवत्पतञ्जलिविरचिते महाभाष्ये प्रथमाध्यायस्य प्रथमपादे प्रथमाह्निकम्) प्रदीपः — अथवेति । केवलानां वर्णानां लोके प्रयोगाभावाद्धात्वादीनां च शुद्धानां पाठात् तत्स्थत्वाच्च वर्णानां न कश्चिद्दोषः । यानि तर्हीति । डित्थादीनि ।

८० महाभाष्यम् एतेषामपीति । शिष्टप्रयुक्तत्वेनोणादीनां पृषोदरादीनां च साधुत्वाभ्यनुज्ञानात् सर्वेषामत्र सङ्ग्रहः सिद्धः । इत्युपाध्यायजैयटपुत्रकैयटकृते महाभाष्यप्रदीपे प्रथमाध्यायस्य प्रथमपादे प्रथममाह्निकम् अनुवाद—अथवा या इससे (संवृतादि दोषों की प्रसक्ति बताने वाले से) यह पूछना चाहिए कि ये संवृत आदि कहाँ सुने जाते हैं । आगमों में । आगम तो शुद्ध पढ़े गये हैं । तो विकारों में । विकार भी शुद्ध पढ़े गये हैं । तो प्रत्ययों में । प्रत्यय भी शुद्ध पढ़े गये हैं । तो धातुओं में । धातुएँ भी शुद्ध पढ़ी गई हैं । तो प्रातिपदिकों में । प्रातिपदिक भी शुद्ध पढ़े गये हैं । तो प्रातिपदिकों का उपदेश नहीं किया गया है । इनका भी स्वर वर्णानुपूर्वी के ज्ञान के लिए उपदेश करना चाहिए (जिससे) शश (के स्थान पर) षष न हो जाये, पलाश (के स्थान पर) पलाष न हो जाये, मञ्चक (के स्थान पर) मञ्जक न हो जाये । आगम, आदेश और प्रत्ययों सहित धातुएं शुद्ध पढ़ी गई हैं, अतः (इनमें) इन कलादि (दोषों) का प्रसङ्ग नहीं है । (इस प्रकार श्रीमान् भगवान् पतञ्जलि विरचित महाकाव्य में प्रथमाध्याय के प्रथम पाद में प्रथम आह्निक का अनुवाद समाप्त हुआ) उषा—"छिन्ने मूले नैव पत्रं न शाखा ।" इस समस्त विवेचन के अनन्तर भाष्यकार ने पूर्वपक्षी के मूल सिद्धान्त पर ही प्रहार किया है ! सिद्धान्ती के अनुसार आगम, आदेश, प्रत्यय, धातु आदि सभी का शुद्ध उच्चारण किया गया है । अतः इनमें कहीं भी कलादि दोषों की प्रसक्ति प्राप्त नहीं होती । अतः इन दोषों की सम्भावना करना ही व्यर्थ है । एवं च सिद्धान्ती के द्वारा पूर्वप्रतिपादित इष्टबुद्ध्यर्थ वर्णोपदेश का पक्ष सिद्ध होता है । (इस प्रकार श्रीमान् भगवान् पतञ्जलि विरचित महाभाष्य में प्रथमाध्याय के प्रथम पाद में प्रथम आह्निक पर उषा व्याख्या समाप्त हुई)

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