योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
मुमुक्षु प्रकरण । १२७
करते हैं तो उनको आत्मतत्त्व की प्राप्ति होती है, क्योंकि वे सारग्राहक होते हैं और जो अपने बोध के अर्थ दृष्टान्त का एक अंश ग्रहण नहीं करते और वाद करते हैं उनको आत्मतत्त्व की प्राप्ति नहीं होती । इस से दृष्टान्त का एक अंश सारभूत ग्रहण करके दृष्टान्त के सर्वभाव से न मिलना चाहिये और पृथक् को देखकर तर्क न करना चाहिए । जैसे अन्धकार में पदार्थ पड़ा हो तो दीपक के प्रकाश से देख लेते हैं क्योंकि दीपक के साथ प्रयोजन है, ऐसा नहीं कहते कि दीपक किसका है और तेलबत्ती कैसी है और किस स्थान की है वैसे ही दृष्टान्त का एक अंश आत्मबोध के निमित्त अङ्गीकार करना । हे रामजी ! जिसके वाक्य में अर्थ सिद्ध हो और जो अनुभव को प्रकट करे वह वचन अङ्गीकार करना और जिससे वाक्यार्थ सिद्ध न हो उसका त्याग करना । जो पुरुष अपने बोध के निमित्त वचन को ग्रहण करता है वही श्रेष्ठ है और जो वाद के निमित्त ग्रहण करता है वह मूर्ख है । जो कोई अभिमान को लेकर ग्रहण करता है वह हस्ती के समान अपने शिर पर मिट्टी डालता है—उसका अर्थ सिद्ध नहीं होता और जो अपने बोध के निमित्त वचन को ग्रहण करके विचारपूर्वक उसका अभ्यास करता है उसका आत्मा शान्त होता है । हे रामजी ! आत्मपद पाने के निमित्त अवश्यमेव अभ्यास चाहिये । जब शम, विचार, सन्तोष और सन्त समागम से बोध को प्राप्त हो तब परम पद को पाता है । हे रामजी ! जो कोई दृष्टान्त देता है वह एक देश लेकर कहता है, सर्वमुख कहने से असङ्गतता का अभाव हो जाता है सर्वमुख दृष्टान्त मुख्य को जानिये वह सत्य-रूप होता है । ऐसे तो नहीं होता कि आत्मा तो सत्यरूप, कार्य कारण से रहित, शुद्ध और चैतन्य है उसके बताने के लिये कार्य कारण जगत् का दृष्टान्त कैसे दीजिये जो कोई जगत् का दृष्टान्त देता है वह केवल एक अंश लेके कहता है और बुद्धिमान् भी दृष्टान्त के एक अंश को ग्रहण करते हैं । श्रेष्ठ पुरुष अपने बोध के निमित्त सार को ही ग्रहण करते हैं । जैसे क्षुधार्थी को चावलपाक प्राप्त हो तो भोजन करने का प्रयोजन है वैसे ही जिज्ञासु को भी यही चाहिये कि अपने बोध के
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निमित्त सार को ग्रहण करके वाद न करे, क्योंकि उसकी उत्पत्ति और स्थिति का वाद करना व्यर्थ है । हे रामजी ! वाक्य वही है जो अनुभव को प्रकट करे और जो अनुभव को न प्रकट करे उसका त्याग करना चाहिये । कदाचित् स्त्री का वाक्य आत्मअनुभव को प्रत्यक्ष करनेवाला हो तो उसको भी ग्रहण करना चाहिये और जो परमगुरु के तथा वेद-वाक्य भी हों और अनुभव को प्रकट न करें तो उनका त्याग करना चाहिये । जब तक विश्राम न पावै तब तक विचार करना चाहिये । विश्राम का नाम तुरीयपद है । जैसे मन्दराचल पर्वत के क्षोभ से क्षीरसमुद्र शान्त हुआ था वैसे ही विश्राम की प्राप्ति होने में अक्षय शान्ति होती है । हे रामजी ! तुरीयपद संयुक्त पुरुष को श्रुति-स्मृति उक्त कर्मों के करने से कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता और न करने से कुछ प्रत्यवाय नहीं होता । वह सदेह हो चाहे विदेह हो गृहस्थ हो चाहे विरक्त हो उसको कुछ नहीं करना है । वह पुरुष संसारसमुद्र से पार ही है । हे रामजी ! उपमेय की उपमा एक अंश मे ग्रहण कर जानता है तब बोध की प्राप्ति होती है और बोध के बिना मुक्ति को प्राप्त नहीं होता, वह केवल व्यर्थ वाद करता है । हे रामजी ! जिसके घट में शुद्ध स्वरूप आत्मसत्ता विराजमान है वह जो उसकी त्यागकर और विकल्प उठाता है तो वह चोग चञ्चु और मूर्ख है । हे रामजी ! प्रत्यक्ष प्रमाण मानने योग्य है, क्योंकि अनुमान और अर्थापत्ति आदि प्रमाणों से उसकी सत्ता ही प्रकट होती है । जैसे सब नदियों का अधिष्ठान समुद्र है वैसे ही सब प्रमाणों का अधिष्ठान प्रत्यक्ष प्रमाण है । वह प्रत्यक्ष क्या है सो सुनिये । हे रामजी ! चक्षुजन्य ज्ञान संवित संवेदन है, जो उस चक्षु से विद्यमान होता है उसका नाम प्रत्यक्ष प्रमाण है । उन प्रमाणों को विषय करनेवाला जीव है । अपने वास्तव स्वरूप के अज्ञान से अनात्मारूपी दृश्य बना है उसमें अहंकृति से अभिमान हुआ है और अभिमान ही से सब दृश्य होता है उसमें हेयोपादेय बुद्धि होती है जिससे राग द्वेष करके जलता है और आपको कर्त्ता मानकर बहिर्मुख हुआ भटकता है । हे रामजी ! जब विचार करके संवेदन अन्तर्मुखी हो तब आत्मपद प्रत्यक्ष होकर निज भाव को प्राप्त होता है और फिर प्रच्छन्न
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भाव नहीं रहता, शुद्ध शान्ति को प्राप्त होता है। जैसे स्वप्न से जगकर स्वप्न का शरीर और दृश्यभ्रम नष्ट हो जाता है वैसे ही आत्मा के प्रत्यक्ष होने से सब भ्रम मिट जाता है और शुद्ध आत्मसत्ता भासती है। हे रामजी ! यह दृश्य और द्रष्टा मिथ्या है। जो द्रष्टा है सो दृश्य होता है और जो दृश्य है सो द्रष्टा होता है—यह भ्रम मिथ्या आकाशरूप है। जैसे पवन में स्पन्दशक्ति रहती है वैसे ही आत्मा में संवेदन रहती है। जब संवेदन स्पन्दरूप होती है तब दृश्यरूप होकर स्थित होती है। जैसे स्वप्न में अनुभवसत्ता दृश्य रूप होकर स्थित होती है वैसे ही यह दृश्य है। सब आत्मसत्ता ही है, ऐसा विचार करके आत्मपद को प्राप्त हो जावो और जो ऐसा विचार करके आत्मपद को प्राप्त न हो सको तो अहङ्कार का जो उल्लेख फुरता है उसका अभाव करो। पीछे जो शेष रहेगा सो शुद्धबोध आत्मसत्ता है। जब तुम शुद्धबोध को प्राप्त होगे तब ऐसी चेष्टा गहो जैसे यंत्र की पुतली संवेदन बिना चेष्टा करती है वैसे ही देहरूपी पुतली का चलानेवाला मनरूपी संवेदन है, उसके बिना पड़ी रहेगी और अहङ्कार का अभाव होगा। इससे यत्न करके उस पद के पाने का अभ्यास करो जो नित्य, शुद्ध और शान्तरूप है। हे रामजी ! "दैव" शब्द को त्यागकर अपना पुरुषार्थ करो और आत्मपद को प्राप्त हो। जो कोई पुरुषार्थ में शूरमा है सो आत्मपद को प्राप्त होता है और जो नीच पुरुषार्थ का आश्रय करता है सो संसारसमुद्र में डूबता है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे दृष्टान्त प्रमाणनामाष्टादशस्सर्गः ॥ १८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब सत्सङ्ग करके मनुष्य शुद्धबुद्धि करे तब आत्मपद पाने को समर्थ होता है। प्रथम सत्सङ्ग यह है कि जिसकी चेष्टा शास्त्र के अनुसार हो उसका संग करे और उसके गुणों को हृदय में धरे। फिर महापुरुषों के शम और संतोषादि गुणों का आश्रय करे। शम संतोषादिक से ज्ञान उपजता है। जैसे मेघ से अन्न उपजता है। अन्न से जगत् होता है और जगत् से मेघ होता है वैसे ही शम, सन्तोष और शमादिक गुण और आत्मज्ञान परस्पर सहकारी होते हैं। शमादिक गुणों से ज्ञान उपजता है आत्मज्ञान करने से शमा-
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दिक गुण स्थित होते हैं। जैसे बड़े ताल से मेघ और मेघ से ताल पुष्ट होता है वैसे ही शमादिक गुणों से आत्मज्ञान होता है और आत्मज्ञान से शमादि गुण पुष्ट होते हैं। ऐसा विचार करके शम सन्तोषादिक गुणों का अभ्यास करो तब शीघ्र ही आत्मतत्त्व को प्राप्त होगे। हे रामजी! ज्ञानवान पुरुष को शमादिक गुण स्वाभाविक प्राप्त होते हैं और जिज्ञासुको अभ्यास करने से प्राप्त होते हैं। जैसे धान्य की रक्षा जब स्त्री करती है और ऊँचे शब्द से पक्षियों को उड़ाती है तब फल को पाती है और उससे पुष्ट होती है वैसे ही शम सन्तोषादिक के पालने से आत्मतत्त्व की प्राप्ति होती है। हे रामजी! इस मोक्ष उपाय शास्त्र को आदि से लेकर अन्त पर्यन्त विचारे तो भ्रान्ति निवृत्ति होके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सर्व पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं। यह शास्त्र मोक्ष उपाय का परम कारण है। जो शुद्ध बुद्धिमान् पुरुष इसको विचारेगा उसको शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होगी। इससे इस मोक्ष उपाय शास्त्र का भले प्रकार अभ्यास करो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे आत्माप्तिवर्णनन्नामैकोन-विंशतितमस्सर्गः ॥ १९ ॥
समाप्तमिदं मुमुक्षुप्रकरणं द्वितीयम् ॥
श्रीपरमात्मने नमः ॥
श्रीयोगवाशिष्ठ
तृतीय उत्पत्ति प्रकरण प्रारम्भ ।
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ब्रह्म और ब्रह्मवेत्ता में "त्व" "इदं" "सः" इत्यादिक सर्व शब्द आत्मसत्ता के आश्रय स्फुरते हैं । जैसे स्वप्न में सब अनुभव सत्ता में शब्द होते हैं वैसे ही यह भी जानो और जो उसमें यह विकल्प होते हैं कि "जगत् क्या है" "कैसे उत्पन्न हुआ है" "और किसका है" इत्यादिक योगचक्षु हैं । हे रामजी ! यह सब जगत् ब्रह्मरूप है यहाँ स्वप्न का दृष्टान्त विचार लेना चाहिए । इसके पहिले मुमुक्षुप्रकरण मैंने तुमसे कहा है अब क्रम से उत्पत्तिप्रकरण कहता हूँ सो सुनिये—जो ज्ञान वस्तुस्वभाव है । हे रामजी ! जो पदार्थ उपजता है वही बढ़ता, घटता, मोक्ष और नीच, ऊँच होता है और जो उपजता न हो, उसका बढ़ना, घटना, बन्ध, मोक्ष और नीच, ऊँच होना भी नहीं होता । हे रामजी ! स्थावर-जंगम जो कुछ जगत् दीखता है सो सब आकाशरूप है । द्रष्टा का जो दृश्य के साथ संयोग है इसी का नाम बन्धन है और उसी संयोग के निवृत्त होने का नाम मोक्ष है । उसकी निवृत्ति का उपाय मैं कहता हूँ । देहरूपी जगत्चिन्मात्ररूप है और कुछ उपजा नहीं, जो उपजा भासता है सो ऐसा है जैसे सुषुप्ति में स्वप्न । जैसे स्वप्न में सुषुप्ति होती है वैसे ही जगत् का प्रलय होता है और जो प्रलय में शेष रहता है उसकी संज्ञा व्यवहार के निमित्त कहते हैं । नित्य सत्य, ब्रह्म, आत्मा, सच्चिदानन्द इत्यादिक जिसके नाम रखे हैं वह सबका अपना आप है । चेतनता से उसका नाम जीव हुआ है और शब्द अर्थों को ग्रहण करने लगा है । हे रामजी ! चैतन्य में जो स्पन्दता हुई है सो संकल्प विकल्परूपी मन होकर स्थित हुआ है । उसके संसरने से देश, काल, नदियाँ, पर्वत, स्थावर और जंगमरूप जगत् हुआ
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है। जैसे सुषुप्ति जैसे स्वप्न हो वैसे जगत् हुआ है। उसको कोई अविद्या, कोई जगत् कोई माया कोई संकल्प और कोई दृश्य कहते हैं; वास्तव में सब ब्रह्मस्वरूप है—इतर कुछ नहीं। जैसे सुवर्ण से भूषण बनता है तो भूषण सुवर्णरूप है; सुवर्ण से इतर भूषण कुछ वस्तु नहीं है वैसे ही जगत् और ब्रह्म में कुछ भेद नहीं है। भेद तो तब हो जब जगत् उपजा हो; जो उपजा ही नहीं तो भेद कैसे भासे और जो भेद भासता है सो मृगतृष्णा के जलवत् है—अर्थात् जैसे मृगतृष्णा की नदी के तरङ्ग भासते हैं पर वहाँ सूर्य की किरणें ही जल के समान भासती हैं, जल का नाम भी नहीं, वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है। चैतन्य के अणु अणु प्रति सृष्टि आभासरूप है कुछ उपजी नहीं। अद्वैतसत्ता सर्वदा अपने आप में स्थित है, फिर उसमें जन्म, मरण और बन्ध, मोक्ष कैसे हो जितनी कल्पना बन्ध-मोक्ष आदि भासती है सो वास्तविक कुछ नहीं है आत्मा के अज्ञान से भासती है। हे रामजी ! जगत् उपजा नहीं, अपनी कल्पना ही जगतरूप होकर भासती है और प्रमाद से सत् हो रही है निवृत्त होना कठिन है। अनियत और नियत शब्द जो कहे हैं सो भावनामात्र हैं, ऐसे वचनों से तो जगत् दूर नहीं होता। हे रामजी ! अर्थयुक्त वचनों के बिना दृश्यभ्रम नहीं निवृत्त होता। जो तर्क करके और तप, तीर्थ, दान, स्नान, ध्यानादिक करके जगत् के भ्रम को निवृत्त करना चाहे वह मूर्ख है, इस प्रकार से तो और भी दृढ़ होता है। क्योंकि जहाँ जावेगा वहाँ देश, काल और क्रिया सहित नित्य पाञ्चभौतिक सृष्टि ही दृष्टि आवेगी और कुछ दृष्टि न आवेगी, इससे इसका नाश न होगा और जो जगत् से उपराम होकर समाधि लगाके बैठेगा तब भी चिरकाल में उतरेगा और फिर भी जगत् का शब्द और अर्थ भास आवेगा। जो फिर भी अनर्थरूप संसार भासा तो समाधि का क्या सुख हुआ ? क्योंकि जब तक समाधि में रहेगा तभी तक वह सुख रहेगा। निदान इन उपायों से जगत् निवृत्त नहीं होता। जैसे कमल के डोड़े में बीज होता है और जब तक उस बीज का नाश नहीं होता तब तक फिर उत्पन्न होता रहता है और जैसे वृक्ष के पात तोड़िये तो भी बीज
उत्पत्ति प्रकरण । १३३
का नाश नहीं होता वैसेही तप, दानादिकों से जगत् निवृत्त नहीं होता और तभी तक अज्ञानरूपी बीज भी नष्ट नहीं होता। जब अज्ञानरूपी बीज नष्ट होगा तब जगतरूपी वृक्ष का अभाव हो जावेगा और उपाय करना मानो पत्तों को तोड़ना है। इन उपायों से अक्षय पद और अक्षय समाधि नहीं प्राप्त होती। हे रामजी! ऐसी समाधि तो किसी को नहीं प्राप्त होती कि शिला के समान हो जावै। मैं सब स्थान देख रहा हूँ कदाचित ऐसे भी समाधि हो तो भी संसारसत्ता निवृत्त न होगी, क्योंकि अज्ञानरूपी बीज निवृत्त नहीं हुआ। समाधि ऐसी है जैसे जाग्रत् से सुषुप्ति होती है, क्योंकि अज्ञानरूपी वासना के कारण सुषुप्ति से फिर जाग्रत् आती है वैसे ही अज्ञानरूपी वासना से समाधि से भी जाग जाता है क्योंकि उसको वासना खींच ले आती है। हे रामजी! तप, समाधि आदिकों से संसारभ्रम निवृत्त नहीं होता। जैसे कांजी से क्षुधा किसी की निवृत्त नहीं होती वैसे ही तप और समाधि से चित्त की वृत्ति एकाग्र होती है परन्तु संसार निवृत्त नहीं होता। जब तक चित्त समाधि में लगा रहता है तब तक सुख होता है और जब उत्थान होता है तब फिर नाना प्रकार के शब्दों और अर्थों से युक्त संसार भासता है। हे रामजी! अज्ञान से जगत् भासता है और विचार से निवृत्त होता है। जैसे बालक को अपनी अज्ञानता से परछाईं में वेताल की कल्पना होती है और ज्ञान से निवृत्त होती है वैसे ही यह जगत् अविचार से भासता है और विचार से निवृत्त होता है। हे रामजी! वास्तव में जगत् उपजा नहीं--असतरूप है। जो स्वरूप से उपजा होता तो निवृत्त न होता पर यह तो विचार से निवृत्त होता है इससे जाना जाता है कि कुछ नहीं बना। जो वस्तु सत्य होती है उसकी निवृत्ति नहीं होती और जो असत् है सो स्थिर नहीं रहनी। हे रामजी! सतस्वरूप आत्मा का अभाव कदाचित् नहीं होता और असतरूप जगत् स्थिर नहीं होता। जगत् आत्मा में आभासरूप है आरम्भ और परिणाम से कुछ उपजा नहीं। जहाँ चैतन्य नहीं होता वहाँ सृष्टि भी नहीं होती, क्योंकि सृष्टि आभासरूप है। आत्मा आदर्शरूप है उसमें अनन्त सृष्टियाँ प्रतिबिम्बत होती हैं।
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आदर्श में प्रतिबिम्ब भी तब होता है जब दूसरा निकट होता है, पर आत्मा के निकट दूसरा और कोई प्रतिबिम्ब नहीं होता, क्योंकि आभास-रूप है । एक ही आत्मसत्ता चैतन्यता से द्वैत की नाई होकर भासती है, पर कुछ बना नहीं । जैसे फूल में सुगन्ध होती है, तिलों में तेल होता है और अग्नि में उष्णता होती है और जैसे मनोराज की सृष्टि होती है वैसे ही आत्मा में जगत् है । जैसे मनोराज से मनोराज की सृष्टि भिन्न नहीं होती वैसे ही यह जगत् आत्मा से भिन्न नहीं ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे बोधहेतुवर्णनन्नाम प्रथमस्सर्गः ॥ १ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! एक आकाशज आख्यान जो श्रवण का भूषण और बोध का कारण है उसको सुनिये । आकाशज नामक एक ब्राह्मण शुद्धिचिद्देश से उत्पन्न हुए । वह धर्मनिष्ठ सदा आत्मा में स्थिर रहते थे, भले प्रकार प्रजा का पालन करते थे और चिरजीवी थे । तब मृत्यु विचार करने लगी कि मैं अविनाशिनी हूँ और जो जीव उपजते हैं उनको मारती हूँ परन्तु इस ब्राह्मण को में नहीं मार सकती । जैसे खड्ग की धार पत्थर पर चलाने से कुण्ठित हो जाती है वैसे ही मेरी शक्ति इस ब्राह्मण पर कुण्ठित हो गई है । हे रामजी ! ऐसा विचारकर मृत्यु ब्राह्मण को भोजन करने के निमित्त उठी और जैसे श्रेष्ठ पुरुष अपने आचार कर्म को नहीं त्याग करते वैसे ही मृत्यु भी अपने कर्मों को विचार कर चली । जब ब्राह्मण के गृह में मृत्यु ने प्रवेश किया तो जैसे प्रलय-काल में महातेज संयुक्त अग्नि सब पदार्थों को जलाने लगती है वैसे ही अग्नि इसके जलाने को उठी और आगे दौड़ के जहाँ ब्राह्मण बैठा था अन्तःपुर में जाकर पकड़ने लगा । पर जैसे बड़ा बलवान् पुरुष भी और के संकल्परूप पुरुष को नहीं पकड़ सकता वैसे ही मृत्यु ब्राह्मण को न पकड़ सकी । तब उसने धर्मराज के गृह में जाकर कहा, हे भगवन् ! जो कोई उपजा है उसको मैं अवश्य भोजन करती हूँ, परन्तु एक ब्राह्मण जो आकाश से उपजा है उसको मैं वश में नहीं कर सकी । यह क्या कारण है ? यम बोले, हे मृत्यो ! तुम किसी को नहीं मार सकतीं, जो कोई मरता है वह अपने कर्मों से मरता है । जो कोई कर्मों का कर्ता है उसके
उत्पत्ति प्रकरण । १३५
मारने को तुम भी समर्थ हो, पर जिसका कोई कर्म नहीं उसके मारने को तुम समर्थ नहीं हो। इससे तुम जाकर उस ब्राह्मण के कर्म खोजो जब कर्म पावोगी तब उसके मारने को समर्थ होगी—अन्यथा समर्थ न होगी। हे रामजी! जब इस प्रकार यम ने कहा तब कर्म खोजने के निमित्त मृत्यु चली। कर्म वासना का नाम है। वहाँ जाकर ब्राह्मण के कर्मों को ढूँढ़ने लगी और दशों दिशा में ताल, समुद्र बगीचे और द्वीप से द्वीपान्तर इत्यादिक सब स्थान देखती फिरी, परन्तु ब्राह्मण के कर्मों की प्रतिभा कहीं न पाई। हे रामजी! मृत्यु बड़ी बलवन्त है, परन्तु उस ब्राह्मण के कर्मों को उसने न पाया तब फिर धर्मराज के पास गई—जो सम्पूर्ण संशयों को नाश करनेवाले और ज्ञानस्वरूप हैं—और उनसे कहने लगी, हे संशयों के नाशकर्त्ता ! इस ब्राह्मण के कर्म मुझको कहीं नहीं दृष्टि आते, मैंने बहुत प्रकार से ढूँढ़ा। जो शरीरधारी हैं सो सब कर्म-संयुक्त हैं पर इसका तो कर्म कोई भी नहीं है इसका क्या कारण है? यम बोले, हे मृत्यो! इस ब्राह्मण की उत्पत्ति शुद्ध चिदाकाश से हुई है जहाँ कोई कारण न था। जो कारण बिना भासता है सो ईश्वररूप है। हे मृत्यो! शुद्ध आकाश से जो इसकी उत्पत्ति हुई है तो यह भी वही रूप है। यह ब्राह्मण भी शुद्ध चिदाकाशरूप है और इसका चेतन ही वपु है। इसका कर्म कोई नहीं और न कोई किया है। अपने स्वरूप से आप ही इसका होना हुआ है, इस कारण इसका नाम स्वयम्भू है और सदा अपने आपमें स्थित है। इसको जगत् कुछ नहीं भासता—सदा अद्वैत है। मृत्यु बोली, हे भगवन्! जो यह आकाशस्वरूप है तो साकाररूप क्यों दृष्टि आता है? यमजी बोले, हे मृत्यो! यह सदा निराकार चैतन्य वपु है और इसके साथ आकार और अहंभाव भी नहीं है इससे इसका नाश कैसे हो। यह तो अहं त्वं जानता ही नहीं और जगत् का निश्चय भी इसको नहीं है। यह ब्राह्मण अचेत चिन्मात्र है, जिसके मन में पदार्थों का सद्भाव होता है उसका नाश भी होता है और जिसको जगत् भासता ही नहीं उसका नाश कैसे हो? हे मृत्यो! जो कोई बड़ा बलिष्ठ भी हो और सैकड़ों जंजीरें भी हों तो भी आकाश को
१३६ | योगवाशिष्ठ ।
बांध न सकेगा वैसे ही ब्राह्मण आकाशरूप है इसका नाश कैसे हो ? इससे इसके नाश करने का उद्यम त्यागकर देहधारियों को जाकर मारो-यह तुमसे न मरेगा। हे रामजी ! यह सुनकर मृत्यु आश्चर्यवत् हो अपने गृह लौट आई। रामजी बोले, हे भगवन् ! यह तो हमारे बड़े पितामह ब्रह्मा की वार्त्ता तुमने कही है। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह वार्त्ता तो मैंने ब्रह्मा की कही है, परन्तु मृत्यु और यम के विवाद निमित्त यह कथा मैंने तुमको सुनाई है। इस प्रकार जब बहुत काल व्यतीत होकर कल्प का अन्त हुआ तब मृत्यु सब भूतों को भोजनकर फिर ब्रह्मा को भोजन करने गई। जैसे किसी का काम हो और यदि एक बार सिद्ध न हुआ तो वह उसे छोड़ नहीं देता फिर उद्यम करता है वैसे ही मृत्यु भी ब्रह्मा के सम्मुख गई। तब धर्मराज ने कहा, हे मृत्यो ! यह ब्रह्मा है। यह आकाशरूप है और आकाश ही इसका शरीर है। आकाश के पकड़ने को तुम कैसे समर्थ होगी ? यह तो पञ्चभूत के शरीर से रहित है। जैसे संकल्प पुरुष होता है तो उसका आकाश ही वपु होता है वैसे ही यह आकाशरूप आदि, अन्त मध्य और अहं त्वं, के उल्लेख से रहित और अचेत चिन्मात्र है इसके मारने को तू कैसे समर्थ होगी ? यह जो इसका वपु भासता है सो ऐसा है जैसे शिल्पी के मन में स्तम्भ की पुतली होती है पर वह कुद्य हुई नहीं वैसे ही स्वरूप से इतर इसका होना नहीं है। यह तो ब्रह्मस्वरूप है, हमारे तुम्हारे मन में इसकी प्रतिभा हुई है, यह तो निर्वपु है। जो पुरुष देहवन्त होता है उसको ग्रहण करना सुगम होता है और वन्ध्या के पुत्र के ग्रहण में श्रम होता है क्योंकि निर्वपु है वैसे यह भी निर्वपु है। इसके मारने की कल्पना को त्याग देहधारियों को जाकर मारो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे प्रथमसृष्टिवर्णनन्नामद्वितीयस्सर्गः ॥ २ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! शुद्ध चिन्मात्र सत्ता ऐसी सूक्ष्म है कि उसमें आकाश भी पर्वत के समान स्थूल है। उस चिन्मात्र में जो अहं अस्मि चैत्योन्मुखत्व हुआ है उसने अपने साथ देह को देखा । पर वह देह भी आकाशरूप है। हे रामजी ! शुद्ध चिन्मात्र में चैत्य का उल्लेख
उत्पत्ति प्रकरण । १३७
किसी कारण से नहीं हुआ, स्वतः स्वाभाविक ही ऐसा उल्लेख आय फुरा है उसी का नाम स्वयंभू ब्रह्मा है । उस ब्रह्म को सदा ब्रह्मा ही का निश्चय है । ब्रह्मा और ब्रह्म में कुछ भेद नहीं है । जैसे समुद्र और तरङ्ग में आकाश और शून्यता में और फूल और सुगंध में कुछ भेद नहीं होता वैसे ही ब्रह्मा और ब्रह्म में भेद नहीं । जैसे जल द्रवता के कारण तरङ्गरूप होकर भासता है वैसे ही आत्मसत्ता चैतन्या मे ब्रह्मा होकर भासती है । ब्रह्मा दूसरी वस्तु नहीं, सदा चैतन्य आकाश है और पृथ्वी आदिक तत्त्वों से रहित है । हे रामजी ! न कोई इसका कारण है और न कोई कर्म है । रामजी बोले, हे भगवन् ! आपने कहा कि ब्रह्माजी का वपु पृथ्वी आदि तत्त्वों से रहित है और सङ्कल्पमात्र है तो इसका कारण स्मृतिरूप संस्कार क्यों न हुआ । जैसे हमको और जीवों की स्मृति है वैसे ही ब्रह्मा को भी होनी चाहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! स्मृति संस्कार उसी का कारण होता है जो आगे भी देखा हो । जो पदार्थ आगे देखा होता है उसकी स्मृति संस्कार से होती है और जो देखा नहीं होता उसकी स्मृति नहीं होती । ब्रह्माजी अद्वैत, अज और आदि, मध्य, अन्त से रहित हैं, उनकी स्मृति कारण कैसे हो ? वह शुद्ध बोधरूप है और आत्मतत्त्व ही ब्रह्मारूप होकर स्थित हुआ है । अपने आपसे जो इसका होना हुआ है इसी से इसका नाम स्वयंभू है । शुद्ध बोध में चैत्य का उल्लेख हुआ है—अर्थात चित्र चैतन्यस्वरूप का नाम है । अपना चित् संवित् ही कारण है और दूसरा कोई कारण नहीं—सदा निराकार और सङ्कल्परूप इसका शरीर है और पृथ्वी आदिक भूतों से शुद्ध अन्तवाहक वपु है । रामजी बोले, हे मुनीश्वर ! जितने जीव हैं उनके दो दो शरीर हैं—एक अन्तवाहक और दूसरा आधि-भौतिक । ब्रह्मा का एक ही अन्तवाहक शरीर कैसे है यह वार्ता स्पष्ट कर कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जो सकारणरूप जीव हैं उनके दो दो शरीर हैं पर ब्रह्माजी अकारण हैं इस कारण उनका एक अन्त-वाहक ही शरीर है । हे रामजी ! सुनिये, अन्य जीवों का कारण ब्रह्मा हैं इसी कारण यह जीव दोनों देहों को धरते हैं और ब्रह्मा जी का कारण
१३८= योगवाशिष्ठ ।
कोई नहीं यह अपने आप ही उपजे हैं इनका नाम स्वयम्भू है। आदि में जो इनका प्रादुर्भाव हुआ है सो अन्तवाहक शरीर है। इनको अपने स्वरूप का विस्मरण नहीं हुआ सदा अपने वास्तवस्वरूप में स्थित हैं इससे अन्तवाहक हैं और दृश्य को अपना संकल्पमात्र जानते हैं। जिनको दृश्य में दृढ़ प्रतीति हुई उनको आधिभौतिक कहते हैं। जैसे आधिभौतिक जड़ता से जल की बर्फ होती है वैसे ही दृश्य की दृढ़ता आधिभौतिक होते हैं। हे रामजी! जितना जगत् तुमको दृष्टि आता है सो सब आकाशरूप है पृथ्वी आदिक भूतों से नहीं हुआ केवल भ्रम से आधिभौतिक भासते हैं। जैसे स्वप्ननगर आकाशरूप होता है किसी कारण से नहीं उपजता और न किसी पृथ्वी आदिक तत्त्वों से उपजता है केवल आकाशरूप है और निद्रादोष से आधिभौतिक होकर भासता है वैसे ही यह जाग्रत् जगत् भी अज्ञान से आधिभौतिक आकाश भासता है। जैसे अज्ञान से स्वप्न अर्थाकार भासता है वैसे ही जगत् अज्ञान से अर्थाकार भासता है। हे रामजी! यह सम्पूर्ण जगत् संकल्पमात्र है और कुछ बना नहीं। जैसे मनोराज के पर्वत आकाशरूप होते हैं वैसे ही जगत् भी आकाशरूप है। वास्तव में कुछ बना नहीं सब पुरुष के संकल्प हैं और मन से उपजे हैं। जैसे बीज से देशकाल के संयोग से अंकुर निकलता है वैसे ही सब दृश्य मन से उपजता है। वह मनरूपी ब्रह्मा है और ब्रह्मादिक मनरूप है। उनके संकल्प में जो सम्पूर्ण जगत् स्थित है वह सब आकाशरूप है-आधिभौतिक कोई नहीं। हे रामजी! आधिभौतिक जो आत्मा में भासता है सो भ्रान्तिमात्र है। जैसे बालक को परछाहीं में वेताल भासता है वैसे ही अज्ञानी को जो आधिभौतिक भासते हैं सो भ्रान्तिमात्र है-वास्तव में कुछ नहीं है। हे रामजी! जितने भासते हैं वे सब अन्तवाहक हैं, परन्तु अज्ञानी को अन्तवाहकता निवृत्त होकर आधिभौतिकता दृढ़ हो गई है। जो ज्ञानवान पुरुष हैं सो अन्त वाहकरूप ही हैं। हे रामजी! जिन पुरुषों को प्रमाद नहीं हुआ वे सदा आत्मा में स्थित और अन्तवाहकरूप हैं और सब जगत् आकाशरूप है। जैसे संकल्प पुरुष, गन्धर्वनगर और स्वप्नपुर होते हैं वैसे ही यह
उत्पत्ति प्रकरण । १३६
जगत् है, जैसे शिल्पी कल्पता है कि इस थम्भ में इतनी पुतलियाँ हैं सो पुतलियाँ उपजीं नहीं थम्भा ज्यों का त्यों स्थित है पुतली का सद्भाव केवल शिल्पी के मन में होता है वैसे ही सब विश्व मन में स्थित है, उसका स्वरूप कुछ नहीं बना । जैसे तरङ्ग ही जलरूप और जल ही तरङ्गरूप है वैसे ही दृश्य भी मनरूप है और मन ही दृश्यरूप है । हे रामजी ! जब तक मन का सद्भाव है तब तक दृश्य है-दृश्य का बीज मन है । जैसे कमल का सद्भाव उसके बीज में होता है और उससे कमल के जोड़े की उत्पत्ति होती है वैसे ही जगत् का बीज मन है-सब जगत् मन से उत्पन्न होता है । हे रामजी ! जब तुमको स्वप्न आता है तब तुम्हारा ही चित्त दृश्य को चेतता जाता है और तो कोई कारण नहीं होता वैसे ही यह जगत् भी जानना । यह तुम्हारे अनुभव की वार्ता कही है, क्योंकि यह तुमको नित अनुभव होता है । हे रामजी ! मन ही जगत् का कारण है और कोई नहीं । जब मन उपशम होगा तब दृश्यभ्रम मिट जावेगा । जब तक मन उपशम नहीं होता तब तक दृश्यभ्रम भी निवृत्त नहीं होता और जब तक दृश्य निवृत्त नहीं होता तब तक शुद्ध बोध नहीं होता एवम् जब तक शुद्ध बोध नहीं होता तब तक आत्मानन्द नहीं होता ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे बोधहेतुवर्णनन्नाम तृतीयसर्गः ॥ ३ ॥
इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार मुनिशार्दूल वशिष्ठजी कहकर तूष्णीम् हुए और सर्व श्रोता वशिष्ठजी के वचनों को सुनके और उनके अर्थ में स्थित हो इन्द्रियों की चपलता को त्याग वृत्ति को स्थित करते भये । तरङ्गों के वेग स्थिर हो गये, पिंजरों में जो तोते थे सो भी सुनकर तूष्णीम् हो गये, ललना जो चपल थीं सो भी उस काल में अपनी चपलता को त्याग करती भईं और वन के पशु पक्षी जो निकट थे सो भी सुनकर तूष्णीम् हुए । निदान मध्याह्न का समय हुआ तब राजा के बड़े भृत्यों ने कहा, हे राजन् ! अब स्नान-सन्ध्या का समय हुआ उठकर स्नान सन्ध्या कीजिये । तब वशिष्ठजी बोले, हे राजन् ! अब जो कुछ कहना था सो हम कह चुके, कल फिर कुछ कहेंगे । राजा ने कहा, बहुत अच्छा और उठकर अर्ध्य पाद्य नैवेद्य से वशिष्ठजी का पूजन
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किया और जो ब्रह्मर्षि थे उनकी भी यथायोग्य पूजा की । तब वशिष्ठजी उठ खड़े हुए और परस्पर नमस्कार कर अपने-अपने स्थानों को चले आकाशचारी आकाश को, पृथ्वी पर रहनेवाले ब्रह्मर्षि और राजर्षि पृथ्वी पर, पातालवासी पाताल को और सूर्य भगवान् दिन रात्रि की कल्पना को त्यागकर स्थिर हो रहे और मन्द मन्द पवन सुगन्ध-सहित चलने लगी मानो पवन भी कृतार्थ होने आया है। इतने में सूर्य अस्त होकर और ठौर में प्रकाशने लगे, क्योंकि सन्त जन सब ठौर में प्रकाशते हैं । इतने में रात्रि हुई तो तारागण प्रकट हो गये और अमृत की किरणों को धारण किये चन्द्रमा उदय हुआ । उस समय अन्धकार का अभाव हो गया और राजा का द्वार भी चन्द्रमा की किरणों से शीतल हो गया—मानो वशिष्ठजी के वचनों को सुनकर इनकी तप्तता मिट गई । निदान सब श्रोताओं ने विचारपूर्वक रात्रि को व्यतीत किया जब सूर्य की किरण निकली तो अन्धकार नष्ट हो गया—जैसे सन्तों के वचनों से अज्ञानी के हृदय का तम नष्ट होता है—और सब जगत् की क्रिया प्रकट हो आई तब खेचर, भूचर और पाताल के वासी सब श्रोता स्नान-सन्ध्या कर अपने-अपने स्थानों में आये और परस्पर नमस्कार कर पूर्व के प्रसंग को उठाकर रामजी सहित बोले, हे भगवन् ! ऐसे मन का रूप क्या है ? जिससे कि संसाररूपी दुःखों की मञ्जरी बढ़ती हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस मन का रूप कुछ देखने में नहीं आता । यह मन नाममात्र है। वास्तव में इसका रूप कुछ नहीं है और आकाश की नाईं शून्य है। हे रामजी ! मन आत्मा में कुछ नहीं उपजा । जैसे सूर्य में तेज, वायु में स्पन्द, जल में तरङ्ग, सुवर्ण में भूषण, मरीचिका में जल है और आकाश में दूसरा चन्द्रमा है वैसे ही मन भी आत्मा में कुछ वास्तव नहीं है । हे रामजी ! यह आश्चर्य है कि वास्तव में कुछ उपजा नहीं, पर आकाश की नाईं सब घटों में वर्तता है और सम्पूर्ण जगत् मन से भासता है । असतरूपी जगत् जिससे भासता है उसी का नाम मन है । हे रामजी ! आत्मा शुद्ध और अद्वैत है द्वैतरूप जगत् जिसमें भासता है उसका नाम मन है और संकल्प विकल्प जो फुरता है वह
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मन का रूप है। जहाँ जहाँ संकल्प फुरता है वहाँ वहाँ मन है जैसे जहाँ जहाँ तरङ्ग फुरते हैं वहाँ वहाँ जल है वैसे ही जहाँ जहाँ संकल्प फुरता है वहाँ वहाँ मन है। मन के और भी नाम हैं—स्मृति, अविद्या, मलीनता और तम ये सब इसी के नाम ज्ञानवान् पुरुष जानते हैं। हे रामजी ! जितना जगज्जाल भासता है सो सब मन से उत्पन्न हुआ है और सब दृश्य मन-रूप हैं, क्योंकि मन का रचा हुआ है वास्तव में कुछ नहीं है। हे रामजी ! मनरूपी देह का नाम अन्तवाहक शरीर है वह संकल्परूप सब जीवों का आदि वपु है। उस संकल्प में जो दृढ़ आभास हुआ है उससे आधिभौतिक भासने लगा है और आदि स्वरूप का प्रमाद हुआ है। हे रामजी ! यह जगत् सब संकल्परूप है और स्वरूप के प्रमाद से पिण्डाकार भासता है। जैसे स्वप्नदेह का आकार आकाशरूप है उसमें पृथ्वी आदि तत्त्वों का अभाव होता है परन्तु अज्ञान से आधिभौतिकता भासती है सो मन ही का संसरना है वैसे ही यह जगत् है, मन के फुरने से भासता है। हे रामजी ! जहाँ मन है वहाँ दृश्य है और जहाँ दृश्य है वहाँ मन है। जब मन नष्ट हो तब दृश्य भी नष्ट हो। शुद्ध बोधमात्र में जो दृश्य भासता है सोई मन है। जब तक दृश्य भासता है तब तक मुक्त न होगा, जब दृश्यभ्रम नष्ट होगा तब शुद्ध बोध प्राप्त होगा। हे रामजी ! “द्रष्टा, दर्शन, दृश्य” यह त्रिपुटी मन से भासती है। जैसे स्वप्न में त्रिपुटी भासती है और जब जाग उठा तब त्रिपुटी का अभाव हो जाता है और आप ही भासता है वैसे ही आत्मसत्ता में जागे हुए को अपना आप अद्वैत ही भासता है। जब तक शुद्धबोध नहीं प्राप्त हुआ तब तक दृश्यभ्रम निवृत्त नहीं होता। वह बाह्य देखता है तो भी सृष्टि ही दृष्टि आती है, अन्तर देखेगा तो भी सृष्टि ही दृष्टि आती है और उसको सत्य जानकर राग-द्वेष कल्पना उठती है। जब मन आत्मपद को प्राप्त होता है तब दृश्यभ्रम निवृत्त हो जाता है। जैसे जब वायु की स्पन्दता मिटती है तब वृक्ष के पत्रों का हिलना भी मिट जाता है। इसमें मनरूपी दृश्य ही बन्धन का कारण है। रामजी बोले, हे भगवन् ! यह दृश्यरूपी विसूचिका रोग है, उसकी निवृत्ति कैसे हो सो कृपा करके कहो ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! संसाररूपी वेताल
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जिसको लगा है उसकी निवृत्ति इस प्रकार होती है कि प्रथम तो विचार करके जगत् का स्वरूप जानो, उसके अनन्तर जब आत्मपद में विश्रान्ति होगी तब तुम सर्व आत्मा होगे । हे रामजी ! दृश्यभ्रम जो तुमको भासता है उसको में उत्तर ग्रन्थ से निवृत्त करूँगा, इसमें सन्देह नहीं । सुनिये, यह दृश्य मन से उपजा है और इसका सद्भाव मन में ही हुआ है । जैसे कमल का उपजना कमल के बीज में है वैसे ही संसार का उपजना स्मृति से होता है । वह स्मृति अनुभव आकाश में होती है । हे रामजी ! स्मृति पदार्थ की होती है जिसका अनुभव पहिले होता है । जितना कुछ जगत् तुमको भासता है सो संकल्प रूप है—कोई पदार्थ सतरूप नहीं । जो वस्तु असतरूप है उसकी स्थिरता नहीं होती और जो वस्तु सतरूप है उसका अभाव कदाचित् नहीं होता । जितना कुछ प्रपञ्च भासता है सो असद्रूप है मन के चिन्तन से उत्पन्न हुआ है । जब फुरने से रहित हो तब जगत् भ्रम निवृत्त होता है । हे रामजी ! पृथ्वी, पर्वत आदिक जगत् असतरूप न होते तो मुक्त भी कोई न होता । मुक्त तो दृश्यभ्रम से होता है, जो दृश्यभ्रम से नष्ट न होता तो मुक्त भी कोई न होता; पर ब्रह्मर्षि, राजर्षि देवता इत्यादिक बहुतेरे मुक्त हुए हैं, इस कारण कहता हूँ कि दृश्य असतरूप मन के संकल्प में स्थित है । हे रामजी ! एक मन को स्थिरकर देखो, फिर अहं त्वं आदिक जगत् तुमको कुछ न भासेगा । चित्तरूपी आदर्श में संकल्परूपी दृश्य मलीनता है । जब मलीनता दूर होगी तब आत्मा का साक्षात्कार होगा । हे रामजी ! यह दृश्यभ्रम मिथ्या उदय हुआ है । जैसे गन्धर्वनगर और स्वप्नपुर वैसे ही यह जगत् भी है । जैसे शुद्ध आदर्श में पर्वत का प्रतिबिम्ब होता है वैसे ही चित्तरूपी आदर्श में यह दृश्य प्रतिबिम्ब है । मुकुर में जो पर्वत का प्रतिबिम्ब होता है सो आकाशरूप है उसमें कुछ पर्वत का सद्भाव नहीं वैसे ही आत्मा में जगत् का सद्भाव नहीं । जैसे बालक को भ्रम से परछाहीं में पिशाचबुद्धि होती है वैसे ही अज्ञानी को जगत् भासता है—वास्तव में जगत् कुछ नहीं है । हे रामजी ! न कुछ मन उपजा है और न कुछ जगत् उपजा है—दोनों असतरूप हैं, जैसे आकाश
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में दूसरा चन्द्रमा भासता है वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है। जैसे आकाश अपनी शून्यता से और समुद्र जल से पूर्ण है वैसे ही ब्रह्मात्मा अपने आप में स्थित और पूर्ण है और उसमें जगत् का अत्यन्त अभाव है। इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन्! यह तुम्हारे वचन ऐसे हैं जैसे कहिये कि बन्ध्या के पुत्र ने पर्वत चूर्ण किया शशे के शृंग अति सुन्दर हैं, रेत में तेल निकलता है और पत्थर की शिला नृत्य करती वा मूर्ति का मेघ गर्जन और पत्थर की पुतलियाँ गान करती है। तुम कहते हो कि दृश्य कुछ उपजा ही नहीं और है ही नहीं और मुझको ये जरा, मृत्यु आदिक विकारों सहित प्रत्यक्ष भासते हैं इससे मेरे मन में तुम्हारे वचनों का सद्भाव नहीं स्थित होता। कदाचित् तुम्हारे निश्चय में इसी प्रकार है तो अपना निश्चय मुझको भी बतलाइए। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! हमारे वचन यथार्थ हैं। हमने असत् कदाचित् नहीं कहा! तुम विचार के देखो यह जगत् आडम्बर बिना कारण हुआ है। जब महाप्रलय होता है तब शुद्ध चैतन्य संवित् रह जाता है और उसमें कार्य कारण कोई कल्पना नहीं रहती, उसमें फिर यह जगत् कारण बिना फुरता है। जैसे सुषुप्ति में स्वप्नसृष्टि फुर आती है और जैसे स्वप्नसृष्टि अकारण है वैसे ही यह सृष्टि भी अकारण है। हे रामजी! जिसका समवायकारण और निमित्तकारण न हो और प्रत्यक्ष भासे उसे जानिये कि भ्रान्तिरूप है। जैसे तुमको नित्य स्वप्न का अनुभव होता है और उसमें नाना प्रकार के पदार्थ कार्य कारण सहित भासते हैं पर कारण बिना हैं वैसे ही यह जगत् भी कारण बिना है। इसमें आदि कारण बिना ही जगत् उपजा है। जैसे गन्धर्वनगर, संकल्पपुर और आकाश में दूसरा चन्द्रमा भासता है वैसे ही यह जगत् भासता है—कोई पदार्थ सत् नहीं। जैसे स्वप्न में राजमहल और नाना प्रकार के पदार्थ भासते हैं सो किसी कारण से तो नहीं उपजे केवल आकाशरूप मन के संसरने से सब भासते हैं वैसे ही यह जगत् चित्त के संसरने से भासता है जैसे स्वप्न में और स्वप्ना भासता है और फिर उसमें और स्वप्न भासता है वैसे यह जगत् भासता है और वैसे ही जगत् जगज्जाल मन की कल्पना से
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भासता है। हे रामजी ! चलना, दौड़ना, देना, लेना, बोलना, सुनना, रुँधना इत्यादि विषय और रागद्वेषादिक विकार सब मन के फुरने से होते हैं-आत्मा में कोई विकार नहीं। जब मन उपशम होता है तब सब कल्पनाएँ निवृत्त हो जाती हैं इससे संसार का कारण मन ही है। इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे बोधहेतुवर्णनन्नाम चतुर्थस्सर्गः ॥ ४ ॥
रामजी बोले, हे भगवन् ! मन का रूप क्या है ? वह तो मायामय है इसका होना जिससे है सो कौन पद है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब महाप्रलय होता है तब सब जगत् का अभाव हो जाता है और पीछे जो शेष रहता है सो सद्रूप है। सर्ग के आदि में भी सद्रूप होता है उसका नाश कदाचित् नहीं होता, वह सदा प्रकाशरूप, परमदेव, शुद्ध, परमात्मतत्त्व, अज, अविनाशी और अद्वैत है। उसको वाणी नहीं कह सकती। वही पद जीवन्मुक्त पाता है। हे रामजी ! आत्म आदिक शब्द कल्पित हैं, स्वाभाविक कोई शब्द नहीं प्रवर्त्तता। शिष्य को बताने के लिए शास्त्रकारों ने देव के बहुत नाम कल्पे हैं। मुख्य तो देव को "पुरुष" कहते हैं। वेदान्तवादी उसी को "ब्रह्म" कहते और विज्ञानवादी उसी को विज्ञान से "बोध" कहते हैं। कोई कहते हैं कि "निर्मलरूप" है। शून्यवादी कहते हैं "शून्य" ही शेष रहता है कोई कहते हैं "प्रकाशरूप" है जिसके प्रकाश से सूर्यादिक प्रकाशते हैं। एक उसको "वक्ता" कहते हैं कि आदिदेव का "वक्ता" वही है और स्मृतिकर्त्ता कहते हैं कि सब कुछ वह स्मृति मे करनेवाला है और सब कुछ उसकी इच्छा से हुआ है, इससे सबका कर्त्ता "सर्व आत्मा" है। हे रामजी ! इसी तरह अनेक नाम शास्त्रकारों ने कहे हैं। इन सबका अधिष्ठान परमदेव है और अस्ति आदि षद्विकारों से रहित शुद्ध, चैतन्य और सूर्यवत् प्रकाशरूप है। वही देव सब जगत् में पूर्ण हो रहा है। हे रामजी ! आत्मारूपी सूर्य है और ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादिक उसकी किरणें हैं। ब्रह्मारूपी समुद्र में जगत्-रूपी तरंग बुद्बुदे उत्पन्न होकर लीन होते हैं और सब पदार्थ उस आत्मा के प्रकाश से प्रकाशते हैं। जैसे दीपक अपने आपमे प्रकाशता है और दूसरों को भी प्रकाश देता है वैसे ही आत्मा अपने प्रकाश से प्रकाशता
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है और सबको सत्ता देनेवाला है। हे रामजी ! शुद्ध आत्मसत्ता से उपजता है, आकाश में शून्यता उसी की है और अग्नि में उष्णता, जल में द्रवता और पवन में स्पर्श उसी की है। निदान सब पदार्थों की सत्ता वही है। मोरों के पंखों में रङ्ग आत्मसत्ता से ही हुआ है; पत्थर में मूँगा और पत्थरों में जड़ता उसी की है । और स्थावर-जंगम जगत् का अधिष्ठानरूप वही ब्रह्म है। हे रामजी ! आत्मरूपी चन्द्रमा की किरणों से ब्रह्माण्डरूपी त्रसरेणु उत्पन्न होती हैं। वह चन्द्रमा शीतलता और अमृत से पूर्ण है । ब्रह्मारूपी मेघ है उससे जीवरूपी बूँदें टपकती हैं । जैसे बिजली का प्रकाश होता है और छिप जाता है वैसे ही जगत् प्रकट होता है और छिप जाता है । सबका अधिष्ठान आत्मसत्ता और वह नित्य, शुद्ध, बुद्ध और परमानन्द है । सब सत्य असत्यरूप पदार्थ उसी आत्मसत्ता से होते हैं। हे रामजी ! उस देव की सत्ता से जड़पुर्य्यष्टक चैतन्य होकर चेष्टा करती है । जैसे चुम्बक पत्थर की सत्ता से लोहा चेष्टा करता है वैसे ही चैतन्यरूपी चुम्बक मणि से देह चेष्टा करती है । वह आत्मा नित्य चैतन्य और सबका कर्त्ता है उसका कर्त्ता और कोई नहीं । वह सबसे अभेदरूप समानसत्ता है और उदय अस्त से रहित है । हे रामजी ! जो पुरुष उस देव का साक्षात् करता है उसकी सब क्रिया नष्ट हो जाती है और चिदजड़ ग्रन्थि भिद जाती है और केवल बोधरूप होते हैं। जब स्वभावसत्ता में मन स्थित होता है तब मृत्यु को सम्मुख देख-कर भी विह्वल नहीं होता । इतना कहकर फिर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! वह देव किसी स्थान में नहीं रहता और कहीं दूर भी नहीं है वह तो अपने आप ही में स्थित है । हे रामजी ! घट-घट में वह देव है पर अज्ञानी को दूर भासता है। स्नान, दान, तप आदि से वह प्राप्त नहीं होता केवल ज्ञान से ही प्राप्त होता है—कर्त्तव्य से प्राप्त नहीं होता । जैसे मृगतृष्णा की नदी भासती है वह कर्त्तव्यता निवृत्त नहीं होती, केवल ज्ञातव्य से ही निवृत्त होती है वैसे ही जगत् की निवृत्ति आत्मज्ञान से ही होती है। हे रामजी ! कर्त्तव्य भी यही है जो ज्ञातव्यरूप है—अर्थात् यह कि जिससे ज्ञातव्यस्वरूप की प्राप्ति होती है। रामजी बोले, हे भगवन् ! जिस
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देव के जानने से पुरुष फिर जन्म-मरण को नहीं प्राप्त होता वह कहाँ रहता है और किस तप और क्लेश से उसकी प्राप्ति होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! किसी तप से उस देव की प्राप्ति नहीं होती केवल अपने पौरुष और प्रयत्न से ही उसकी प्राप्ति होती है । जितना कुछ राग, द्वेष, काम, क्रोध मत्सर और अभिमान सहित तप है वह निष्फल दम्भ है । इनसे आत्मपद की प्राप्ति नहीं होती । हे रामजी ! इसकी परम औषध सत्संग और सत्शास्त्रों का विचार है जिससे दृश्यरूपी विसूचिका निवृत्त होती है । प्रथम इसका आचार भी शास्त्र और लौकिक अविरुद्ध हो अर्थात् शास्त्रों के अनुसार हो और भोगरूपी गढे में न गिरे । दूसरे संतोष संयुक्त यथालाभ संतुष्ट होकर अनिच्छित भोगों को प्राप्त हो और जो शास्त्र अविरुद्ध हो उसका ग्रहण करे और जो विरुद्ध हो उसका त्याग करे—इनसे दीन न हो । ऐसे उदारात्मा को शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होती है। हे रामजी ! आत्मपद पाने का कारण सत्संग और सत्शास्त्र है। सन्त वह है जिसको सब लोग श्रेष्ठ कहते हैं और सत्शास्त्र वही है जिस में ब्रह्मनिरूपण हो । जब ऐसे सन्तों का संग और सत्शास्त्रों का विचार हो तो शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होती है । जब मनुष्य श्रुति विचार द्वारा अपने परम स्वभाव में स्थित होता है तब ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी उस पर दया करते हैं और कहते हैं कि यह पुरुष परब्रह्म हुआ है । हे रामजी ! सन्तों का संग और सत्शास्त्रों का विचार निर्मल करता और दृश्यरूप मैल का नाश करता है जैसे निर्मली, रेत से जल का मैल दूर होता है वैसे ही यह पुरुष निर्मल और चैतन्य होता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठेउत्पत्तिप्रकरणे प्रयत्नोपदेशोनामपञ्चमस्सर्गः ॥ ५ ॥
इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! वह देव जो तुमने कहा कि जिसके जानने से संसार बन्धन से मुक्त होता है कहाँ स्थित है और किस प्रकार मनुष्य उसको पाता है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! वह देव दूर नहीं शरीर ही में स्थिर है । नित्य चिन्मात्र सबसे पूर्ण और सर्व विश्व से रहित है । चन्द्रमा को मस्तक में धरनेवाले सदाशिव, ब्रह्माजी और विष्णु और इन्द्रादिक सब चिन्मात्ररूप है । बल्कि सब जगत्-चिन्मात्र