योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
उत्पत्ति प्रकरण। १४७
रूप है। रामजी बोले, हे भगवन्! यह तो अज्ञान बालक भी कहते हैं कि आत्मा चिन्मात्र है, तुम्हारे उपदेश से क्या सिद्ध हुआ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इस विश्व के चेतन जानने से तुम संसारसमुद्र को नहीं लाँघ सकते इस चेतन का नाम संसार है। चेतन जीव है, संसार नामरूप है इससे जरामरणरूप तरंग उत्पन्न होते हैं क्योंकि अहं से दुःख पाता है। हे रामजी! चैतन्य होकर जो चेतता है सो अनर्थ का कारण है और चेतन से रहित जो चैतन्य है वह परमात्मा है। उस परमात्मा को जानकर मुक्ति होती है सब चेतनता मिट जाती है। हे रामजी! परमात्मा के जानने से हृदय की चिदजड़ ग्रन्थि टूट पड़ती अर्थात् अहं मम नष्ट हो जाते हैं, तब संशय छेदे जाते हैं और सब कर्म क्षीण हो जाते हैं। रामजी ने पूछा, हे भगवन्! चित्त चैतन्योन्मुख होता है तब आगे दृश्य स्पष्ट भासता है, इसके होते चित्त के रोकने को क्योंकर समर्थ होता है और दृश्य किस प्रकार निवृत्त होता है? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! दृश्यसंयोगी चेतन जीव है, वह जन्मरूपी जंगल में भटकता भटकता थक जाता है। चैतन्य को जो चेतन अर्थात् चिदाभास जीवरूप प्रकाशी कहते हैं सो पंडित भी मूर्ख हैं। यह तो संसारी जीव है इसके जानने से कैसे मुक्ति हो। मुक्ति परमात्मा के जानने से होती है और सब दुःख नाश होते हैं। जैसे विसूचिका रोग उत्तम औषधि से ही निवृत्त होता है तैसे ही परमात्मा के जानने से मुक्ति होती है। रामजी ने यह पूछा, हे भगवन्! परमात्मा का क्या रूप है जिसके जानने से जीव मोहरूपी समुद्र को तरता है? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! देश से देशान्तर को दूर जो संवित् निमेष में जाता है उसके मध्य जो ज्ञानसंवित् है सो परमात्मा का रूप है और जहाँ संसार का अत्यन्त अभाव होता है उसके पीछे जो बोधमात्र शेष रहता है वह परमात्मा का रूप है। हे रामजी! वह चिदाकाश जहाँ द्रष्टा दर्शन दृश्य का अभाव होता है वही परमात्मा का रूप है और जो अशून्य है और शून्य की नाईं स्थित है और जिसमें सृष्टि का समूह शून्य है ऐसी अद्वैत सत्ता परमात्मा का रूप है। हे रामजी! महाचैतन्यरूप बड़े पर्वत की नाईं जो चैतन्य स्थित
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है और अजड़ है पर जड़ के समान स्थित है वह परमात्मा का रूप है और जो सबके भीतर बाहर स्थित है और सबको प्रकाशता है सो पर-मात्मा का रूप है। हे रामजी ! जैसे सूर्य प्रकाशरूप और आकाश शून्यरूप है वैसे ही यह जगत् आत्मरूप है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जो सब परमात्मा ही है तो क्यों नहीं भासता और जो सब जगत् भासता है इसका निर्वाण कैसे हो ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह जगत् भ्रम से उत्पन्न हुआ है—वास्तव में कुछ नहीं है। जैसे आकाश में नीलता भासती है वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है। जब जगत् का अत्यन्त अभाव जानोगे तब परमात्मा का साक्षात्कार होगा और किसी उपाय से न होगा। जब दृश्य का अत्यन्त अभाव करोगे तब दृश्य उसी प्रकार स्थित रहेगा, पर तुमको परमार्थ सत्ता ही भासेगी। हे रामजी ! चितरूपी आदर्श दृश्य के प्रतिबिम्ब बिना कदाचित् नहीं रहता। जब तक दृश्य का अत्यन्त अभाव नहीं होता तब तक परम बोध का साक्षात्कार नहीं होता। इतना सुनकर रामजी ने फिर पूछा कि हे भगवन् ! यह दृश्य-जाल आडम्बर मन में कैसे स्थित हुआ है ? जैसे सरसों के दानों में सुमेरु का आना आश्चर्य है वैसे ही जगत् का मन में आना भी आश्चर्य है। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! एक दिन तुम वेदधर्म की प्रवृत्ति सहित सकाम यज्ञ योगादिक त्रिगुण से रहित होकर स्थित हो और सत्संग और सतशास्त्रपरायण हो तब मैं एक ही क्षण में दृश्यरूपी मैल दूर करूँगा। जैसे सूर्य की किरणों के जाने से जल का अभाव हो जाता है वैसे ही तुम्हारे भ्रम का अभाव हो जावेगा। जब दृश्य का अभाव हुआ तब द्रष्टा भी शान्त होवेगा और दोनों का अभाव हुआ तब पीछे शुद्ध आत्मसत्ता ही भासेगी। हे रामजी ! जब तक द्रष्टा है तब तक दृश्य है और जब तक दृश्य है तब तक द्रष्टा है। जैसे एक की अपेक्षा से दो होते हैं—दो हैं तो एक है और एक है तब दो भी हैं—एक न हो तब दो कहाँ से हों—वैसे ही एक के अभाव से दोनों का अभाव होता है। द्रष्टा की अपेक्षा से ही दृश्य और दृश्य की अपेक्षा करके द्रष्टा है। एक के अभाव से दोनों का अभाव हो जाता है। हे रामजी ! अहंता
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से आदि लेकर जो दृश्य है सो सब दूर करूँगा। हे रामजी ! अनात्म से आदि लेके जो दृश्य है वही मल है इससे रहित होकर चित्तरूपी दर्पण निर्मल होगा। जो पदार्थ असत् है उसका कदाचित् भाव नहीं होता और जो पदार्थ सत् है सो असत् नहीं होगा। जो वास्तव में सत् न हो उसका मार्जन करना क्या कठिन है; हे रामजी ! यह जगत् आदि से उत्पन्न नहीं हुआ। जो कुछ दृश्य भासता है वह भ्रान्तिमात्र है। जगत् निर्मल ब्रह्म चैतन्य ही है। जैसे सुवर्ण से भूषण होता है तो वह सुवर्ण भूषण से भिन्न नहीं वैसे ही जगत् और ब्रह्म में कुछ भेद नहीं। हे रामजी ! दृश्यरूपी मल के मार्जन के लिये में बहुत प्रकार की युक्ति तुमसे विस्तारपूर्वक कहूँगा उससे तुमको अद्वैत सत्ता का भान होगा। यह जगत् जो तुमको भासता है वह किसी के द्वारा नहीं उपजा। जैसे मरुस्थल की नदी भासती है और आकाश में दूसरा चन्द्रमा भासता है वैसे ही यह जगत् बिना कारण भासता है। जैसे मरुस्थल में जल नहीं जैसे बन्ध्या का पुत्र नहीं और जैसे आकाश में वृक्ष नहीं वैसे ही यह जगत् है। जो कुछ देखते हो वह निरामय ब्रह्म है। यह वाक्य तुमको केवल वाणीमात्र नहीं कहे हैं किन्तु युक्तिपूर्वक कहे हैं हे रामजी ! गुरु की कही युक्ति को जो मूर्खता से त्याग करते हैं उनको सिद्धान्त नहीं प्राप्त होता।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे दृश्यअसत्य प्रतिपादनन्नाम षष्ठसर्गः ॥ ६ ॥
इतना सुन रामजी ने पूछा, हे मुनीश्वर ! वह युक्ति कौन है और कैसे प्राप्त होती है जिसके धारण करने से पुरुष आत्मपद को प्राप्त होता है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मिथ्या ज्ञान से जो विसूचिकारूपी जगत् बहुत काल का दृढ़ हो रहा है वह विचाररूपी मन्त्र से शान्त होता है। हे रामजी ! बोध की सिद्धता के लिए मैं तुमसे एक आख्यान कहता हूँ उसको सुनके तुम मुक्तात्मा होगे और जो अद्धं प्रबुद्ध होकर तुम उठ जाओगे तब तिर्यगादिक योनि को प्राप्त होगे। हे रामजी ! जिस अर्थ के पाने की जीव इच्छा करता है उसके पाने के अनुसार यत्न भी
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करे और थककर फिरे नहीं तो अवश्य उसको पाता है, इससे सत्संगति और सत्शास्त्रपरायण हो जब तुम इनके अर्थ में दृढ़ अभ्यास करोगे तब कुछ दिनों में परमपद पावोगे । फिर रामजी ने पूछा हे भगवन् ! आत्मबोध का कारण कौन शास्त्र है और शास्त्रों में श्रेष्ठ कौन है कि उसके जानने से शोक न रहे ? वशिष्ठजी बोले, हे महामते, रामजी ! महाबोध का कारण शास्त्रों में परमशास्त्र में यह महारामायण है । इसमें बड़े-बड़े इतिहास हैं जिनसे परमबोध की प्राप्ति होती है । हे रामजी ! सब इतिहासों का सार में तुमसे कहता हूँ जिसको समझ कर जीवन्मुक्त हो तुमको जगत् न भासेगा, जैसे स्वप्न में जागे हुए को स्वप्न के पदार्थ भासते हैं । जो कुछ सिद्धान्त है उन सबका सिद्धान्त इसमें है और जो इसमें नहीं वह और में भी नहीं है इसको बुद्धिमान सब शास्त्र विज्ञान भण्डार जानते हैं । हे रामजी ! जो पुरुष श्रद्धासंयुक्त इसको सुने और नित्य सुनके विचारेगा उसकी बुद्धि, उदार होकर परमबोध को प्राप्त होगी—इसमें संशय नहीं । जिसको इस शास्त्र में रुचि नहीं है वह पापात्मा है । उसको चाहिए कि प्रथम और शास्त्रों को विचारे उसके अनन्तर इसको विचारे तो जीवन्मुक्त होगा । जैसे उत्तम औषध से रोग शीघ्र ही निवृत्त होता है वैसे ही इस शास्त्र के सुनने और विचारने से शीघ्र ही अज्ञान नष्ट होकर आत्मपद प्राप्त होगा । हे रामजी ! आत्मपद की प्राप्ति वर और शाप से नहीं होती जब विचाररूप अभ्यास करे तो आत्मज्ञान प्राप्त होता है । हे रामजी ! दान देने, तपस्या करने और वेद के पढ़ने से भी आत्मपद की प्राप्ति नहीं होती, केवल आत्मविचार से ही होती है । संसारभ्रम भी अन्यथा नष्ट नहीं होता ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे मच्छास्त्रनिर्णयोनाम सप्तसप्तमःसर्गः ॥ ७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जिस पुरुष के चित्त और प्राणों की चेष्टा और परस्पर बोधन आत्मा का है और जो आत्मा को कहता भी है; आत्मा से तोषवान् भी है और आत्मा ही में रमत्ता भी है ऐसा ज्ञाननिष्ठ जीवन्मुक्त होकर फिर विदेहमुक्त होता है । रामजी बोले हे मुनीश्वर जीवन्मुक्त और विदेहमुक्त का क्या लक्षण है कि उस दृष्टि को
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लेकर मैं भी वैसे ही विचरूँ ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जो पुरुष सब जगत् के व्यवहार करता है और जिसके हृदय में द्वैतभ्रम शान्त हुआ है वह जीवन्मुक्त है; जो शुभ क्रिया करता है और हृदय से आकाश की नाईं निर्लेप रहता है वह जीवन्मुक्त है; जो पुरुष संसार की दशा से सुषुप्त होकर स्वरूप में जाग्रत हुआ है और जिसका जगद्भ्रम निवृत्त हुआ है वह जीवन्मुक्त है। हे रामजी ! इष्ट की प्राप्ति में जिसकी कान्ति नहीं बढ़ती और अनिष्ट की प्राप्ति में न्यून नहीं होती वह पुरुष जीवन्मुक्त है और जो पुरुष सब व्यवहार करता है और हृदय से द्वेष रहित शीतल रहता है वह जीवन्मुक्त है। हे रामजी ! जो पुरुष राग द्वेषादिक संयुक्त दृष्टि आता है; इष्ट में रागवान् दिखता है और अनिष्ट में द्वेषवान् दृष्टि आता है पर हृदय से सदा शान्तरूप है वह जीवन्मुक्त है। जिस पुरुष को अहं ममता का अभाव है और जिसकी बुद्धि किसी में लिपायमान नहीं होती वह कर्म करे अथवा न करे परन्तु जीवन्मुक्त है। हे रामजी ! जिस पुरुष को मान अपमान, भय और क्रोध में कोई विकार नहीं उपजता और आकाश की नाईं शून्य हो गया है वह जीवन्मुक्त है । जो पुरुष भोक्ता भी हृदय से अभोक्ता है और सचित्त दृष्टि आता है पर अचित है वह जीवन्मुक्त है । जिस पुरुष से कोई दुःखी नहीं होता और लोगों से वह दुःखी नहीं होता और राग, द्वेष भय और क्रोध से रहित है वह जीवन्मुक्त है। हे रामजी ! जो पुरुष चित्त के फुरने से जगत् की उत्पत्ति जानता है और चित्त के अफुर होने से जगत् का प्रलय जानता है और सबमें समबुद्धि है वह जीवन्मुक्त है । जो पुरुष भोगों से जीता दृष्टि आता है और मृतक की नाईं स्थित और चेष्टा करता दृष्टि आता है, पर वास्तव में पर्वत के सदृश अचल है वह जीवन्मुक्त है। हे रामजी ! जो पुरुष व्यवहार करता दृष्टि आता है और जिसके हृदय में इष्ट अनिष्ट विकार कोई नहीं है वह जीवन्मुक्त है । जिस पुरुष को सब जगत् आकाशरूप दीखता है और जिसकी निर्वासनिक बुद्धि हुई है वह जीवन्मुक्त है, क्योंकि वह सदा आत्मस्वभाव में स्थित है और सब जगत् को ब्रह्मस्वरूप जानता है ।
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इतना सुनकर रामजी बोले, हे भगवन् ! जीवन्मुक्त की तो तुमने कठिन गति कही। इष्ट अनिष्ट में सम और शीतल बुद्धि कैसे होती है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इष्ट अनिष्टरूपी जगत् अज्ञानी को भासता है और ज्ञानी को सब आकाशरूप भासता है उसे राग द्वेष किसी में नहीं होता। और की दृष्टि में वह चेष्टा करता दृष्टि आता है, परन्तु जगत् की वार्ता से सुषुप्त है। हे रामजी ! जीवन्मुक्त कुछ काल रहकर जब शरीर को त्यागता है तब ब्रह्मपद को प्राप्त होता है। जैसे पवन स्पन्द को त्यागकर निस्पन्द होता है वैसे ही वह जीवन्मुक्त को त्यागकर विदेह-मुक्त होता है। तब वह सूर्य होकर तपता है, ब्रह्मा होकर सृष्टि उत्पन्न करता है, विष्णु होकर प्रतिपालन करता है, रुद्र होके संहार करता है, पृथ्वी होके सब भूतों को धरता और ओषधि अन्नादिकों को उत्पन्न करता है, पर्वत होके पृथ्वी को रखता है, जल होके रस देता है, अग्नि होके उष्णता को धारता है, पवन होके पदार्थों को सुखाता है, चन्द्रमा होके ओषधियों को पुष्ट करता है, आकाश होके सब पदार्थों को ठौर देता है, मेघ होके वर्षा करता है और स्थावर जंगम जितना कुछ जगत् है सबका आत्मा होके स्थित होता है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! विदेह-मुक्त शरीर को धारण कर क्षोभवान् होकर जगत् में आता है तो त्रिलोकी का भ्रम क्यों नहीं मिटता ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जगत् आडम्बर अज्ञानी के हृदय में स्थित है और ज्ञानवान् को सब चिदाकाशरूप है। विदेहमुक्त वही रूप होता है जहाँ उदय अस्त की कल्पना कोई नहीं केवल शुद्ध बोधमात्र है। हे रामजी ! यह जगत् आदि से उपजा नहीं केवल अज्ञान से भासता है। मैं तुम और सब जगत् आकाशरूप हैं। जैसे आकाश में नीलता और दूसरा चन्द्रमा भासते हैं। और जैसे मरुस्थल में जल भासता है वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है। हे रामजी ! जैसे स्वर्ण में भूषण कुछ उपजा नहीं और जैसे समुद्र में तरंगें होती हैं वैसे ही आत्मा में जगत् उपजा नहीं। यह सब जगज्जाल मन से फुरने से भासता है, स्वरूप से कुछ नहीं बना। ज्ञानी को सदा यही निश्चय रहता है, फिर जगत् का क्षोभ उसको कैसे भासे ? हे रामजी ! यह भी
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मैंने तुम्हारे जाननेमात्र को कहा है, नहीं तो जगत् कहाँ है जगत् का तो अत्यन्त अभाव है। इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जगत् के अत्यन्त अभाव हुए बिना आत्मबोध की प्राप्ति नहीं होती । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! दृश्य द्रष्टा का मिथ्याभ्रम उदय हुआ है । जब दोनों में से एक का अभाव हो तब दोनों का अभाव हो और जब दोनों का अभाव हो तब शुद्ध बोधमात्र शेष रहे । जिस प्रकार जगत् का अत्यन्त अभाव हो वह युक्ति मैं तुमसे कहता हूँ । हे रामजी ! चिरकाल का जो जगत् दृढ़ हो रहा है वह मिथ्याज्ञान विसूचिका है । वह विचाररूपी मन्त्र से निवृत्त होता है । जैसे पर्वत पर चढ़ना और उतरना शनैः शनैः होता है वैसे ही अविद्याक्रम चिरकाल का दृढ़ हो रहा है, विचार करके क्रम से उसकी निवृत्त होती है । जगत् के अत्यन्त अभाव हुए बिना आत्मबोध नहीं होता । उसके अत्यन्त अभाव के निमित्त में युक्ति कहता हूँ, उसके समझने से जगद्भ्रम नष्ट होगा और जीवन्मुक्त होकर तुम विचरोगे । हे रामजी ! बन्धन से वही बँधता है जो उपजा ही और मुक्त भी वही होता है जो उपजा हो । यह जगत् जो तुमको भासता है वह उपजा नहीं । जैसे मरुस्थल में नदी भासती है वह भी उपजी नहीं है भ्रम से भासती है वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है पर उपजा नहीं । जैसे अर्द्ध मीलित नेत्र पुरुष को आकाश में तरुवरे भासते हैं वैसे ही भ्रम से जगत् भासता है । हे रामजी ! जब महाप्रलय होता है तब स्थावर, जंगम, देवता, किन्नर, दैत्य, मनुष्य, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रादिक जगत् का अभाव होता है । इसके अनन्तर जो रहता है सो इन्द्रियग्राहक सत्ता नहीं और असत्य भी नहीं और न शून्य, न प्रकाश, न अन्धकार, न द्रष्टा, न दृश्य, न केवल, न अकेवल, न चेतन, न जड़, न ज्ञान, न अज्ञान, न साकार, न निराकार, न किञ्चन और न अकिञ्चन ही है। वह तो सर्वशब्दों से रहित है । उसमें वाणी की गम नहीं और जो है तो चेतन से रहित चैतन्य आत्मतत्त्वमात्र है जिसमें अहं त्वं की कोई ओर कल्पना नहीं । ऐसे शेष रहता है और पूर्ण, अपूर्ण, आदि, मध्य, अन्त से रहित है । सोई सत्ता जगतरूप होकर भासती है और कुछ जगत् बना
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नहीं। जैसे मरीचिका में जल भासता है वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है। हे रामजी! जब चित्तशक्ति स्पन्दरूप हो भासती है तब जगदाकार भासता है। और जब निस्पन्द होती है तब जगत् का अभाव होता है, पर आत्मसत्ता सदा एकरस रहती है। जैसे वायु स्पन्दरूप होता है तो भासता है और निस्पन्दरूप नहीं भासता परन्तु वायु एक ही है; वैसे ही जब चित्त संवेदनस्पन्दरूप होता है तब जगत् होकर भासता है और जब निस्पन्दरूप होता है तब जगत् मिट जाता है। हे रामजी! चेतन तब जाना जाता है जब संवेदनस्पन्दरूप होता है; जैसे सुगन्ध का ग्रहण आधार से होता है और आधाररूप द्रव्य के बिना सुगन्ध का ग्रहण नहीं होता। जैसे वस्त्र श्वेत होता है तब रङ्ग को ग्रहण करता है अन्यथा रङ्ग नहीं चढ़ता; वैसे ही आत्मा का जानना स्पन्द से होता है स्पन्द के बिना जानने की कल्पना भी नहीं होती। जैसे आकाश में शून्यता और अग्नि में उष्णता भासती है वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है—वह अनन्यरूप है। जैसे जल द्रवता से तरङ्गरूप होके भासता है वैसे ही आत्मसत्ता जगतरूप होके भासती है। वह आकाशवत् शुद्ध है और श्रवण, चक्षु, नासिका, त्वचा, देह और शब्द स्पर्श, रूप, रस, गन्ध से रहित है और सब ओर से श्रवण करता, बोलता, सूँघता, स्पर्श करता और रस लेता भी आप ही है। आत्मरूपी सूर्य की किरणों में जलरूपी त्रिलोकी फुरती भासती है। जैसे जल में चक्र आवृत्त फुरते भासते सो जल से इतर कुछ नहीं, जलरूप ही हैं; वैसे ही जगत् आत्मा से भिन्न नहीं आत्मरूप ही है। आत्म ही जगतरूप होकर भासता है। जिह्वा नहीं पर बोलता है; अभोक्ता है पर भोक्ता होके भासता है; अफुर है पर फुरता भासता है; अद्वैत है पर द्वैतरूप होकर भासता है और निराकार है पर साकाररूप होके भासता है। हेरामजी! आत्मसत्ता सब शब्दों से अतीत है पर वही सब शब्दों को धारती है और द्रष्टा होके भासती है, इतर कुछ है नहीं। कई सृष्टि समान होती हैं और कई विलक्षण होती हैं परन्तु स्वरूप में कुछ भिन्न नहीं सदा आत्म-रूप हैं जैसे सुवर्ण से भूषण समान आकार भी होते और विलक्षण भी
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होते हैं और कङ्गण से आदि लेके जो भूषण है सो सुवर्ण से इतर नहीं होते—सुवर्णरूप ही हैं वैसे ही जगत् आत्मस्वरूप है और शुद्ध आकाश से भी निर्मल बोधमात्र है । हे रामजी ! जब तुम उसमें स्थित होगे तब जगद्भ्रम मिट जावेगा । जगत् वास्तव में कुछ नहीं है सदा ज्यों का त्यों अपने आपमें स्थित है; केवल मन के फुरने से ही जगत् भासता है मन के फुरने से रहित होने पर सब कल्पना मिट जाती है और आत्मसत्ता ज्यों की त्यों भासती है । वह सत्ता ज्यों की त्यों ही है और सबका अधिष्ठानरूप है । यह सब जगत् उसी से हुआ है और वही रूप है । सबका कारण आत्मसत्ता है और उसका कारण कोई नहीं । अकारण, अद्वैत, अजर, अमर सब कल्पना से रहित शुद्ध चिन्मात्ररूप है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे परमकारण वर्णनन्नामाष्टमसर्गः ॥८॥
इतना सुनकर रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जब महाप्रलय होता है और सब पदार्थ नष्ट हो जाते हैं उसके पीछे जो रहता है उसे शून्य कहिये वा प्रकाश कहिये, क्योंकि तम तो है नहीं; चेतन है अथवा जीव है, मन है वा बुद्धि है सत्, असत्, किञ्चन, अकिञ्चन, इनमें कोई तो होवेगा; आप कैसे कहते हैं कि वाणी की गम नहीं ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह तुमने बड़ा प्रश्न किया है । इस भ्रम को मैं बिना यत्न नाश करूँगा । जैसे सूर्य के उदय से अन्धकार नष्ट हो जाता है वैसे ही तुम्हारे संशय का नाश होगा । हे रामजी ! जब महाप्रलय होता है तब सम्पूर्ण दृश्य का अभाव हो जाता है पीछे जो शेष रहता है सो शून्य नहीं, क्योंकि दृश्याभास उसमें सदा रहता है और वास्तव में कुछ हुआ नहीं । जैसे थम्भ में शिल्पी पुतलियाँ कल्पता है कि इतनी पुतलियाँ इस थम्भ से निकलेंगी सो उस थम्भ में ही शिल्पी कल्पता है जो थम्भ न हो तो शिल्पी पुतलियाँ किसमें कल्पता ? वैसे ही आत्मरूपी थम्भे में मनरूपी शिल्पी जगतरूपी पुतलियाँ कल्पता है; जो आत्मा न हो तो पुतलियाँ किसमें कल्पे जैसे थम्भे में पुतलियाँ थम्भारूप हैं वैसे ही सब जगत् ब्रह्मरूप है—ब्रह्म से इतर जगत् का होना नहीं । जैसे पुतलियों का सद्भाव और असद्भाव थम्भ
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में है, क्योंकि अधिष्ठानरूप खम्भा है—खम्भे बिना पुतलियाँ नहीं होतीं, वैसे ही जगत् आत्मा के बिना नहीं होता । हे रामजी ! सद्भाव हो जाता है वह सत् से होता है असत् से नहीं और असद्भाव सिद्ध होता है वह सत् ही में होता है असत् में नहीं होता । इससे सत् शून्य नहीं; जो शून्य होता तो किसमें भामता जैसे सोझ जल में तरङ्ग का सद्भाव और असद्भाव भी होता है । असद्भाव इस कारण होता है कि तरङ्ग भिन्न कुछ नहीं और सद्भाव इस कारण से होता है कि जल ही में तरङ्ग होता है वैसे ही जगत् का सद्भाव असद्भाव आत्मा में होता है शून्य में नहीं । जैसे सोझ जल में कहनेमात्र को तरङ्ग है, नहीं तो जल ही है वैसे ही जगत् कहनेमात्र को है, हुआ कुछ नहीं-एक सत्ता ही है । और शून्य और अशून्य भी नहीं, क्योंकि शून्य और अशून्य ये दोनों शब्द उसमें कल्पित हैं; शून्य उसको कहते हैं जो सद्भाव से रहित अभानरूप हो और अशून्य उसको कहते हैं जो विद्यमान हो । पर आत्मसत्ता इन दोनों से रहित है । अशून्य भी शून्य का प्रतियोगी है, जो शून्य नहीं तो अशून्य कहाँ से हो । ये दोनों ही अभावमात्र हैं । हे रामजी ! यह सूर्य, तारा, दीपक आदि भौतिक प्रकाश भी वहाँ नहीं, क्योंकि प्रकाश अन्धकार का विरोधी है; जो यह प्रकाश होता तो अन्धकार सिद्ध न होता । इससे वहाँ प्रकाश भी नहीं है और तम भी नहीं है, क्योंकि सूर्यादिक जिससे प्रकाशते हैं वह तम कैसे हो ? आत्मा के प्रकाश बिना सूर्यादिक भी तमरूप हैं । इससे वह शून्य है, न अशून्य है, न प्रकाश है, न तम है, केवल आत्मतत्त्वमात्र है । जैसे थम्भ में पुतलियाँ कुछ हैं नहीं वैसे ही आत्मा में जगत् कुछ हुआ नहीं । जैसे वेलि और वेलि की मज्जा में कुछ भेद नहीं वैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं और जैसे जल और तरङ्ग में मृत्तिका और घट में कुछ भेद नहीं वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं, नाममात्र भेद है । हे रामजी ! जल और मृत्तिका का जो दृष्टान्त दिया है ऐसा भी आत्मा में नहीं । जैसे जल में तरङ्ग होता है और मृत्तिका में घट होता है सो भी परिणामरूप होता है । आत्मा में जगत् भान नहीं है और
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जो मानसिक है तो आकाशरूप है । इससे जगत् कुछ भिन्न नहीं है रूप-अवलोकन मनस्कार जो कुछ भासता है वह सब आकाशरूप है । आत्म-सत्ता ही चित्त के फुरने से जगतरूप हो भासती है—जगत् कुछ दूसरी वस्तु नहीं । जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है । हे रामजी ! थम्भे में जो शिल्पकार पुतलियाँ कल्पता है सो भी नहीं होतीं और यहाँ कल्पनेवाला भी बीच की पुतली है वह भी होने बिना भासती है । हे रामजी ! जिससे यह जगत् भासता है, उसको शून्य कैसे कहिये और जो कहिये कि चेतन है तो भी नहीं, क्योंकि चेतन भी तब होता है जब चित्तकला फुरती है जहाँ फुरना न हो वहाँ चेतनता कैसे रहे ? जैसे जब कोई मिरच को खाता है तब उसकी तिखाई भासती है, खाये बिना नहीं भासती । वैसे ही चैतन्य जानना भी स्पन्दकला में होता है, आत्मा में जानना भी नहीं होता । चैतन्यता से रहित चिन्मात्र अद्वय सुषुप्तिरूप है उसको जो तुरीय कहता है वह ज्ञेय ज्ञानवान् से गम्य है । हे रामजी ! जो पुरुष उसमें स्थित हुआ है उसको संसाररूपी सर्प नहीं डस सकता, वह अद्वैत्य चिन्मात्र होता है और जिसको आत्मा में स्थिति नहीं होती उसको दृश्यरूपी सर्प डसता है । आत्मसत्ता में तो कुछ द्वैत नहीं हुआ आत्म-सत्ता तो आकाश से भी स्वच्छ है । इनका द्रष्टा, दर्शन, दृश्य स्वतः अनुभवसत्ता आत्मा का रूप है और वह अभ्यास करने से प्राप्त होती है । हे रामजी ! उसमें द्वैतकल्पना कुछ नहीं है । वह अद्वैतमात्र है वह न द्रष्टा है न जीव है, न कोई विकार और न स्थूल न सूक्ष्म है—एक शुद्ध अद्वैतरूप अपने आपमें स्थित है जो यह चैत्य का फुरना ही आदि में नहीं हुआ तो चेतनकलारूप जीव कैसे हो और जो जीव ही नहीं तो बुद्धि कैसे हो जो बुद्धि ही नहीं तो मन और इन्द्रियाँ कैसे हो; जो इन्द्रियाँ नहीं तो देह कैसे हो और जो देह न हो तो जगत् कैसे हो ? हे रामजी ! आत्मसत्ता में सब कल्पना मिट जाती हैं; उसमें कुछ कहना नहीं बनता वह तो पूर्ण, अपूर्ण, सत्, असत् से न्यारा है भाव और अभाव का कभी उसमें कोई विकार नहीं; आदि, मध्य, अन्त की कल्पना
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भी कोई नहीं वह तो अजर, अमर, आनन्द, अनन्त, चितस्वरूप, अचेत्य चिन्मात्र और अवाक्यपद है । वह सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, आकाश से भी अधिक शून्य और स्थूल से भी स्थूल एक अद्वैत और अनन्त चिद्रूप है । इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! यह अचिंत्य, चिन्मात्र और परमार्थसत्ता जो आपने कही उसका रूप बोध के निमित्त मुझसे फिर कहो । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब महाप्रलय होता है तब सब जगत् नष्ट हो जाता है, पर ब्रह्मसत्ता शेष रहती है उसका रूप मैं कहता हूँ । मनरूपी ब्रह्मा है मन की वृत्ति जो प्रवृत्त होती है वह एक प्रमाण, दूसरी विपर्यय, तीसरी विकल्प, चौथी अभाव और पाँचवीं स्मरण है । प्रमाणवृत्ति तीन प्रकार की है-एक प्रत्यक्ष, दूसरी अनुमान जैसे धुवाँ से अग्नि जानना और तीसरी शब्दरूप ये तीनों प्रमाणवृत्ति आसकामिका हैं । द्वितीय विपर्यय वृत्ति है-विपरीत भाव से तृतीय विकल्पवृत्ति है चेतन ईश्वररूप है और साक्षी पुरुषरूप है अर्थात् जैसे सीप पड़ी हो और उसमें संशय वृत्ति चाँदी की या सीपी की भासे तो उसका नाम विकल्प है । चतुर्थ निद्रा-अभाव वृत्ति है और पञ्चम स्मरणवृत्ति है यही पाँचों वृत्तियाँ हैं और इनका अभिमानी मन है जब तीनों शरीरों का अभिमानी अहंकार नाश हो तब पीछे जो रहता है सो निश्चल सत्ता अनन्त आत्मा है । मैं असत नहीं कहता हूँ । हे रामजी ! जाग्रत् के अभाव होने पर जब तक सुषुप्ति नहीं आती वह रूप परमात्मा का है अंगुष्ठ को जो शीत उष्ण का स्पर्श होता है उसको अनुभव करने-वाली परमात्मसत्ता है जिसमें द्रष्टा, दर्शन और दृश्य उपजता है और फिर लीन होता है वह परमात्मा का रूप है । उस सत्ता में चेतन भी नहीं है । हे रामजी ! जिसमें चेतन अर्थात् जीव और जड़ अर्थात् देहादिक दोनों नहीं हैं वह अचेत्य चिन्मात्र परमात्मारूप है । जब सब व्यवहार होते हैं उनके अन्तर आकाशरूप है-कोई क्षोभ नहीं ऐसी सत्ता परमात्मा का रूप है वह शून्य है परन्तु शून्यता से रहित है । हे रामजी ! जिसमें द्रष्टा, दर्शन और दृश्य तीनों प्रतिबिम्बित हैं और आकाशरूप है-ऐसा सत्ता परमात्मा का रूप है । जो स्थावर में स्थावरभाव और चेतन में चेतन
उत्पत्ति प्रकरण । १५६
भाव से व्याप रहा है और मन बुद्धि इन्द्रियाँ जिसको नहीं पा सकतीं ऐसी सत्ता परमात्मा का रूप है । हे रामजी ! ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र का जहाँ अभाव हो जाता है उसके पीछे जो शेष रहता है और जिसमें कोई विकल्प नहीं ऐसी अचेत चिन्मात्रसत्ता परमात्मा का रूप है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे परमात्मस्वरूप-वर्णन्ननाम नवमसर्गः ॥ ६ ॥
इतना सुन रामजी बोले, हे भगवन् ! यह दृश्य जो स्पष्ट भासता है सो महाप्रलय में कहाँ जाता है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! बन्ध्या स्त्री का पुत्र कहाँ से आता है और कहाँ जाता है और आकाश का बन कहाँ से आता और कहाँ जाता है ? जैसे आकाश का वन है वैसे ही यह जगत् है । फिर रामजी ने पूछा, हे मुनीश्वर ! बन्ध्या का पुत्र और आकाश का वन तो तीनों काल में नहीं होता शब्दमात्र है और उपजा कुछ नहीं पर यह जगत् तो स्पष्ट भासता है बन्ध्या के पुत्र के समान कैसे हो ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जैसे बन्ध्या का पुत्र और आकाश का वन उपजा नहीं वैसे ही यह जगत् भी उपजा नहीं । जैसे सङ्कल्पपुर होता है और जैसे स्वप्ननगर प्रत्यक्ष भासता है और आकाशरूप है, इनमें से कोई पदार्थ सत् नहीं वैसे ही यह जगत् भी आकाशरूप है और कुछ उपजा नहीं । जैसे जल और तरङ्ग में काजल और श्यामता में, अग्नि और उष्णता में, चन्द्रमा और शीतलता में, वायु और स्पन्द में आकाश और शून्यता में भेद नहीं वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं—सदा अपने स्वभाव में स्थित है । हे रामजी ! जगत् कुछ बना नहीं, आत्मसत्ता ही अपने आप में स्थित है और उसमें अज्ञान से जगत् भासता है । जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा मरुस्थल में जल और आकाश में तरुवरे भासते हैं वैसे ही आत्मा में अज्ञान से जगत् भासता है । इतना सुन फिर रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! दृश्य के अत्यन्त अभाव बिना बोध की प्राप्ति नहीं होती और जगत् स्पष्टरूप भासता है। द्रष्टा और दृश्य जो मन से उदय हुए हैं सो भ्रम से हुए हैं। जो एक है तो दोनों भी हैं और जब दोनों में
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एक का अभाव हो तो दोनों मुक्त हों, क्योंकि जहाँ द्रष्टा है वहाँ दृश्य भी है और जहाँ दृश्य है वहाँ द्रष्टा भी है। जैसे शुद्ध आदर्श के बिना प्रतिबिम्ब नहीं होता वैसे ही द्रष्टा भी दृश्य के बिना नहीं रहता और दृश्य द्रष्टा के बिना नहीं। हे मुनीश्वर ! दोनों में एक नष्ट हो तो दोनों निर्वाण हों इससे वही युक्ति कहो जिससे दृश्य का अत्यन्त अभाव होकर आत्म-बोध प्राप्त हो। कोई ऐसा भी कहते हैं कि दृश्य आगे या अब नष्ट हुआ है तो उसको भी संसारभाव दिखावेगा और जिसको विद्यमान नहीं भासता और उसके अन्तर सद्भाव है तो फिर संसार देखेगा। जैसे सूक्ष्म बीज में वृक्ष का सद्भाव होता है वैसे ही स्मृति फिर संसार को दिखावेगा और आप कहते हैं कि जगत् का अत्यन्त अभाव होता है और जगत् का कारण कोई नहीं—आभासमात्र है—और उपजा कुछ नहीं ? हे मुनी-श्वर ! जिसका अत्यन्त अभाव होता है वह वस्तु वास्तव में नहीं होती और जो है ही नहीं तो बन्धन किसको हुआ तब तो सब मुक्तस्वरूप हुए पर जगत् तो प्रत्यक्ष भासता है ? इससे आप वही युक्ति कहो जिससे जगत् का अत्यन्त अभाव हो । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! दृश्य के अत्यन्त अभाव के निमित्त मैं एक कथा सुनाता हूँ; जिसका अर्थ निश्चयकर समझने से दृश्य शान्त होकर फिर संसार कदाचित् न उपजेगा। जैसे समुद्र में धूल नहीं उड़ती वैसे ही तुम्हारे हृदय में संसार न रहेगा । हे रामजी ! यह जगत् जो तुमको भासता है सो अकारणरूप है; इसका कारण कोई नहीं । हे रामजी । जिसका कारण कोई न हो और भासे उसको जानिये कि भ्रममात्र—है उसका उपजा कुछ नहीं जैसे स्वप्न में सृष्टि भासती है वह किसी कारण से नहीं उपजी केवल संवित्रूप है वैसे ही सर्ग आदि कारण से नहीं उपजा केवल आभास-रूप है—परमात्मा में कुछ नहीं । हे रामजी ! जो पदार्थ कारण बिना भासे तो जिसमें वह भासता है वही वस्तु उसका अधिष्ठानरूप है । जैसे तुमको स्वप्न में स्वप्न का नगर होकर भासता है पर वहाँ तो कोई पदार्थ नहीं केवल आभासरूप है और संवित् ज्ञान ही चैतन्यता से नगर होकर भासता है, वैसे ही विश्व अकारण आभास आत्मसत्ता में
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होके भासता है । जैसे जल में द्रवता; वायु में स्पन्द; जल में रस और तेज में प्रकाश है वैसे ही आत्मा में चित्तसंवेदन है । जब चित्तसंवेदन स्पन्दरूप होता है तब जगतरूप होकर भासता है- जगत् कोई वस्तु नहीं है । हे रामजी ! जैसे और तत्त्वों के अणु और ठौर भी पाये जाते हैं और आकाश के अणु और ठौर नहीं पाये जाते क्योंकि आकाश शून्यरूप है वैसे ही आत्मा से इतर इस जगत् का भाव कहीं नहीं पाते क्योंकि यह आभासरूप है और किसी कारण में नहीं उपजा । कदाचित् कहो कि पृथ्वी आदिक तत्त्वों से जगत् उपजा है तो ऐसे कहना भी असम्भव है । जैसे छाया से धूप नहीं उपजती वैसे ही तत्त्वों से जगत् नहीं उपजता, क्योंकि आदि आप ही नहीं उपजे तो कारण किससे हों ? इससे ब्रह्मसत्ता सर्वदा अपने आप में स्थित है । हे रामजी ! आत्मसत्ता जगत् का कारण नहीं; क्योंकि वह अभूत और अजइरूप है सो भौतिक और जड़ का कारण कैसे हो ? जैसे धूप परछाहीं का कारण नहीं वैसे ही आत्मसत्ता जगत् का कारण नहीं, इससे जगत् कुछ हुआ नहीं वही सत्ता जगतरूप होकर भासती है । जैसे स्वर्ण भूषणरूप होता है और भूषण कुछ उपजा नहीं वैसे ब्रह्मसत्ता जगत्- रूप होकर भासती है । जैसे अनुभव संवित् स्वप्ननगररूप ही भासता है वैसे ही यह सृष्टि किञ्चनरूप है दूसरी वस्तु नहीं । ब्रह्मसत्ता सदा अपने आप में स्थित है और जितना कुछ जगत् स्थावर जङ्गमरूप भासता है वह आकाशरूप है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे परमार्थरूपवर्णनन्नाम दशमस्सर्गः ॥ २० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आत्मसत्ता नित्य, शुद्ध, अजर, अमर और सदा अपने आपमें स्थित है । उसमें जिस प्रकार सृष्टि उदय हुई है वह सुनिये । उसके जानने से जगत् कल्पना मिट जावेगी । हे रामजी ! भाव-अभाव, ग्रहण-त्याग, स्थूल-सूक्ष्म, जन्म-मरण आदि पदार्थों से जीव खेदा जाता है उससे तुम मुक्त होगे । जैसे चूहे सुमेरु पर्वत को चूर्ण नहीं कर सकते वैसे ही तुमको संसार के भाव-अभाव पदार्थ
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चूर्ण न कर सकेंगे । हे रामजी ! आदि शुद्ध देव अचेत चिन्मात्र है, उनमें चेत्यभाव सदा रहता है, क्योंकि वह चैतन्यरूप है । जैसे वायु में स्पन्द शक्ति सदा रहती है वैसे ही चिन्मात्र में चैत्य का फुरना रहकर "अहमस्मि" भाव को प्राप्त हुआ है । इस कारण उसका नाम चैतन्य है । हे रामजी ! जब तक चैतन्य-संविद् अपने स्वरूप के ठौर नहीं आता तब तक इसका नाम जीव है और संकल्प का नाम बीज चित् संवित् है, उसी में सर्वभूत जाति उत्पन्न हुई है । इससे सबका जीव चित्-संविद् है । जब जीव संवित् चैत्य को चेतता है तब प्रथम शून्य होकर उसमें शब्दगुण होता है उस आदि शब्दतन्मात्रा से पद, वाक्य और प्रमाण सहित वेद उत्पन्न हुए । जितना कुछ जगत् में शब्द है उसका बीज तन्मात्रा है । जिससे वायु स्पर्श होता है । फिर रूपतन्मात्रा हुई, उससे सूर्य अग्नि आदि प्रकाश हुए । फिर रसतन्मात्रा हुई जिससे जल हुआ और सब जलों का बीज वही है । फिर गन्ध तन्मात्रा हुई जिससे सम्पूर्ण पृथ्वी हुई और सब पृथ्वी का बीज वही है । हे रामजी ! इसी प्रकार पाँचों भूत हुए हैं फिर पृथ्वी, अप तेज वायु और आकाश से जगत् हुआ है सो भूत पञ्चीकृत और अपञ्चीकृत है । यह भूत शुद्ध चिदाकाशरूप नहीं, क्योंकि संकल्प और मेलयुक्त हुए हैं । इस प्रकार चिदणु में सृष्टि भासी है । जैसे वटबीज में से वट का विस्तार होता है वैसे ही चिदणु में सृष्टि है । कहीं क्षण में युग और कहीं युग में क्षण भासता है । चिदणु में अनन्त सृष्टि फुरती है । जब चित् संवित् चैत्योन्मुख होता है तब अनेक सृष्टि होकर भासती है और जब चित्-संवित् आत्मा की ओर आता है तब आत्मा के साक्षात्कार होने से सब सृष्टि पिण्डाकार होती है अर्थात् सब आत्मरूप होती है इससे इस जगत् के बीज सूक्ष्मभूत हैं और इनका बीज चिदणु है । हे रामजी ! जैसा बीज होता है वैसा ही वृक्ष होता है । इससे सब जगत् चिदाकाशरूप है । संकल्प से यह जगत् आडम्बर होता है और संकल्प के मिटे सब चिदाकाश होता है । जैसे संकल्प आकाशरूप है वैसे ही जगत् भी आकाशरूप है; आत्मा अनुभव आकाशरूप है जिससे क्षण में अनेकरूप
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होते हैं। जैसे संकल्पनगर और स्वप्नपुर होता है वैसे ही यह जगत् है। हे रामजी ! इस जगत् का मूल पञ्चभूत है जिसका बीज संवित् और स्वरूप चिदाकाश है । इसी से सब जगत् चिदाकाश है; द्वैत और कुछ नहीं ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे जगदुत्पत्तिवर्णनन्ना- मकादशस्सर्गः ॥ ११ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! परब्रह्म सम, शान्त, स्वच्छ, अनन्त, चिन्मात्र और सर्वदाकाल अपने आप में स्थित है । उसमें सम-असम-रूप जगत् उत्पन्न हुआ है । सम अर्थात् सजातीयरूप और असम अर्थात् भेदरूप कैसे हुए सो भी सुनिये । प्रथम तो उसमें चेत्य का फुरना हुआ है; उसका नाम जीव हुआ और उसने दृश्य को चेता उससे तन्मात्र, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध उपजे । उन्हीं से पृथ्वी, अप, तेज, वायु और आकाश पञ्चभूतरूपी वृक्ष हुआ और उस वृक्ष में ब्रह्माण्डरूपी फल लगा । इसमें जगत् का कारण पञ्चतन्मात्रा हुई हैं और तन्मात्रा का बीज आदि संवित् आकाश है और इसी से सर्व जगत् ब्रह्मरूप हुआ । हे रामजी ! जैसे बीज होता है वैसा ही फल होता है । इसका बीज परब्रह्म है तो यह भी परब्रह्म हुआ जो आदि अचेत चिन्मात्र स्वरूप परमाकाश है और जिस चैतन्य संवित् में जगत् भासता है वह जीवाकाश है । वह भी शुद्ध निर्मल है, क्योंकि वह पृथ्वी आदि भूतों से रहित है । हे रामजी ! यह जगत् जो तुमको भासता है सो सब चिदाकाशरूप है और वास्तव में द्वैत कुछ नहीं बना । यह मैंने तुमसे ब्रह्माकाश और जीवाकाश कहा । अब जिससे इसको शरीर ग्रहण हुआ सो सुनिये । हे रामजी ! शुद्ध चिन्मात्र में जो चैत्योन्मुखत्व "अहं अस्मि" हुआ और उस अहंभाव से आपको जीव अणु जानने लगा । अपना वास्तव स्वरूप अन्य भाव की नाईं होकर जीव अणु में जो अहंभाव दृढ़ हुआ उसी का नाम अहंकार हुआ उस अहंकार की दृढ़ता मे निश्चयात्मक बुद्धि हुई और उसमें सङ्कल्परूपी मन हुआ जब मन इसकी ओर संसरने लगा तब सुनने की इच्छा की इससे श्रवण इन्द्रिय प्रकट हुई; जब रूप देखने की इच्छा
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की तब चक्षु इन्द्रिय प्रकट हुई; जब स्पर्श की इच्छा की तो त्वचा इन्द्रिय प्रकट हुई और जब रस लेने की इच्छा की तो जिह्वा इन्द्रिय प्रकट हुई । इसी प्रकार से देह इन्द्रियाँ चैतन्यता से भासीं और उसमें यह जीव अहंप्रतीति करने लगा । हे रामजी ! जैसे दर्पण में पर्वत का प्रतिबिम्ब होता है वह पर्वत से बाह्य है वैसे ही देह और इन्द्रियां बाह्य दृश्य हैं पर अपने में भासी हैं इससे उसमें अहं प्रतीति होती है । जैसे कूप में मनुष्य आपको देखे वैसे ही देह में आपको देखता है जैसे डब्बे में रत्न होता है वैसे ही देह में आपको देखता है । वही चिदअणु देह के साथ मिलकर दृश्य को रचता है । उस अहं से ही क्रिया भासने लगी । जैसे स्वप्न में दौड़े और जैसे स्थित में स्पन्द होती है वैसे ही आत्मा में जो स्पन्द क्रिया हुई वह चित्त-संवित् से ही हुई है और उसी का नाम स्वयम्भू ब्रह्मा हुआ । जैसे संकल्प से दूसरा चन्द्रमा भासता है वैसे ही मनोपम जगत् भासता है । जैसे शश के शृङ्ग होते हैं वैसे ही यह जगत् है । कुछ उपजा नहीं केवल चित्त के स्पन्द में जगत् फुरता है । जैसे-जैसे चित्त फुरता गया वैसे वैसे देश, काल, द्रव्य, स्थावर, जङ्गम, जगत् की मर्यादा हुई । इससे सब जगत् सङ्कल्परूप है, सङ्कल्प से इतर जगत् का आकार कुछ नहीं । जब सङ्कल्प फुरता है तब आगे जगत् दृश्य भासता है और संकल्प निस्पन्द होता है तब दृश्य का अभाव होता है । हे रामजी ! इस प्रकार से यह ब्रह्मा निर्वाण हो फिर और उपजते हैं इससे सब संकल्पमात्र ही है । जैसे नटवा नाना प्रकार के पट के स्वांग करके बाहर निकल आता है वैसे ही देखो यह सब मायामात्र है । हे रामजी ! जब चित्त की ओर संसरता है तब दृश्य का अन्त नहीं आता और जब अन्तर्मुख होता है तब सब जगत् आत्मरूप होता है । चित्त के निस्पन्द होने से एक क्षण में जगत् निवृत्त होता है क्योंकि सङ्कल्परूप ही है । इसमें यह जगत् आकाशरूप है उपजा कुछ नहीं और आत्मसत्ता ज्यों की त्यों अपने आप में स्थित है । जैसे स्वप्न में पर्वत और नदियाँ भ्रम में दीखते हैं वैसे ही यह जगत् भी भ्रम में भासता है । जैसे स्वप्न में आपको मुआ देखता है सो भ्रममात्र है वैसे ही यह जगत्
उत्पत्ति प्रकरण । १६५
भ्रममात्र है । हे रामजी ! यह स्थावर, जङ्गम जगत् सब चिदाकाश है । हमको तो सदा चिदाकाश ही भासता है । आदि विराट् रूप में ब्रह्मा भी वास्तव में कुछ उपजे नहीं तो जगत् कैसे उपजा जैसे स्वप्न में नाना प्रकार के देश काल और व्यवहार दृष्टि आते हैं सो अकारणरूप हैं; उपजे कुछ नहीं और आभासमात्र हैं, वैसे ही यह जगत् आभासमात्र है । कार्य-कारण भासते हैं तो भी अकारण हैं । हे रामजी ! हमको जगत् ऐसा भासता है जैसे स्वप्न में जागे मनुष्य को भासता है । जो वस्तु अकारण भासी है सो भ्रान्तिमात्र है । जो किसी कारण द्वारा जगत् नहीं उपजा तो स्वप्नवत् है । जैसे संकल्पपुर और गन्धर्वनगर भासते हैं वैसे ही यह जगत् भी जानो । आदि विराट् आत्मा अन्नवाहकरूप है और वह पृथ्वी आदि तत्त्वों से रहित आकाशरूप है तो यह जगत् आधि-भौतिक कैसे हो ! सब आकाशरूप है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे स्वयम्भूतस्यचित्तवर्णनोनाम द्वादशस्सर्गः ॥ १२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह दृश्य मिथ्या असतरूप है । जो है सो निरामय ब्रह्म है यह ब्रह्माकाश ही जीव की नाईं हुआ है । जैसे समुद्र द्रवता से तरङ्गरूप होता है वैसे ही ब्रह्म जीवरूप होता है । आदिसंवित् स्पन्दरूप ब्रह्मा हुआ है और उस ब्रह्मा में आगे जीव हुए हैं । जैसे एक दीपक से बहुत दीपक होते हैं और जैसे एक संकल्प से बहुत संकल्प होते हैं वैसे ही एक आदि जीव से बहुत जीव हुए हैं । जैसे थम्भे में शिल्पी पुतलियाँ कल्पता है पर वह पुतलियाँ शिल्पी के मन में होती हैं थम्भा ज्यों का त्यों ही स्थित है वैसे ही सब पदार्थ आत्मा में मन कल्पे हैं वास्तव में आत्मा ज्यों का त्यों ब्रह्म है । उन पुतलियों में बड़ी पुतली ब्रह्म है और छोटी पुतली जीव है । जैसे वास्तव में थम्भा है, पुतली कोई नहीं उपजी; वैसे ही वास्तव में आत्मसत्ता है जगत् कुछ उपजा नहीं; संकल्प से भासता है और संकल्प के मिटने से जगत्कल्पना मिट जाती है । इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! एक जीव में जो बहुत जीव हुए हैं तो क्या वे पर्वत में पाषाण की नाईं उपजते हैं वा
१६६ योगवाशिष्ठ ।
कोई जीवों की खानि है ? जिससे इस प्रकार इतने जीव उत्पन्न हो आते हैं; अथवा मेघ की बूँदों वा अग्नि से विस्फुलिङ्गों की नाईं उपजते हैं सो कृपाकर कहिये ? और एक जीव कौन है जिससे सम्पूर्ण जीव उपजते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! न एक जीव है और न अनेक हैं। तेरे ये वचन ऐसे हैं जैसे कोई कहे कि मैंने शश के शृङ्ग उड़ते देखे हैं। एक जीव भी तो नहीं उपजा मैं अनेक कैसे कहूँ ? शुद्ध और अद्वैत आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। वह अनन्त आत्मा है, उसमें भेद की कोई कल्पना नहीं है। हे रामजी ! जो कुछ जगत् तुमको भासता है सो सब आकाशरूप है कोई पदार्थ उपजा नहीं। केवल संकल्प के फुरने से ही जगत् भासता है। जीवशब्द और उसका अर्थ आत्मा में कोई नहीं उपजा, यह कल्पना भ्रम से भासती है आत्म-सत्ता ही जगत् की नाईं भासती है, उसमें न एक जीव है और न अनेक जीव हैं। हे रामजी ! आदि विराट् आत्मा आकाशरूप है, उससे जगत् उपजा है। मैं तुमको क्या कहूँ ? जगत् विराट्रूप है, विराट् जीवरूप है और जीव आकाशरूप है, फिर और जगत् क्या रहा और जीव क्या हुआ ? सब चिदाकाशरूप है। ये जितने जीव भासते हैं वे सब ब्रह्मस्वरूप हैं, द्वैत कुछ नहीं और न इसमें कुछ भेद है। रामजी ने पूछा, हे मुनीश्वर ! आप कहते हैं कि आदि जीव कोई नहीं तो इन जीवों का पालनेवाला कौन है। वह नियामक कौन है जिसकी आज्ञा में ये विचरते हैं ? जो कोई हुआ ही नहीं तो ये सर्वज्ञ और अल्पज्ञ क्योंकर होते हैं और एक में कैसे हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जिसको तुम आदिजीवी कहते हो वह ब्रह्मरूप है ! वह नित्य, शुद्ध और अनन्त शक्तिमान् अपने आपमें स्थित है उसमें जगत् कल्पना कोई नहीं। हे रामजी ! जो शुद्ध चिदाकाश अनन्तशक्ति में आदिचित्त किञ्चन हुआ है वही शुद्ध चिदाकाश ब्रह्मसत्ता जीव की नाईं भासने लगी है। स्पन्दद्वारा हुए की नाईं भासती है। पर अपने स्वरूप से इतर कुछ हुआ नहीं। चैतन्य संवित् आदि स्पन्द से (विराट्) ब्रह्मारूप होकर स्थित हुआ है और उसने संकल्प करके जगत् रचा है। उर्मी ने