योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
१५४ योगवाशिष्ठ ।
नहीं। जैसे मरीचिका में जल भासता है वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है। हे रामजी! जब चित्तशक्ति स्पन्दरूप हो भासती है तब जगदाकार भासता है। और जब निस्पन्द होती है तब जगत् का अभाव होता है, पर आत्मसत्ता सदा एकरस रहती है। जैसे वायु स्पन्दरूप होता है तो भासता है और निस्पन्दरूप नहीं भासता परन्तु वायु एक ही है; वैसे ही जब चित्त संवेदनस्पन्दरूप होता है तब जगत् होकर भासता है और जब निस्पन्दरूप होता है तब जगत् मिट जाता है। हे रामजी! चेतन तब जाना जाता है जब संवेदनस्पन्दरूप होता है; जैसे सुगन्ध का ग्रहण आधार से होता है और आधाररूप द्रव्य के बिना सुगन्ध का ग्रहण नहीं होता। जैसे वस्त्र श्वेत होता है तब रङ्ग को ग्रहण करता है अन्यथा रङ्ग नहीं चढ़ता; वैसे ही आत्मा का जानना स्पन्द से होता है स्पन्द के बिना जानने की कल्पना भी नहीं होती। जैसे आकाश में शून्यता और अग्नि में उष्णता भासती है वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है—वह अनन्यरूप है। जैसे जल द्रवता से तरङ्गरूप होके भासता है वैसे ही आत्मसत्ता जगतरूप होके भासती है। वह आकाशवत् शुद्ध है और श्रवण, चक्षु, नासिका, त्वचा, देह और शब्द स्पर्श, रूप, रस, गन्ध से रहित है और सब ओर से श्रवण करता, बोलता, सूँघता, स्पर्श करता और रस लेता भी आप ही है। आत्मरूपी सूर्य की किरणों में जलरूपी त्रिलोकी फुरती भासती है। जैसे जल में चक्र आवृत्त फुरते भासते सो जल से इतर कुछ नहीं, जलरूप ही हैं; वैसे ही जगत् आत्मा से भिन्न नहीं आत्मरूप ही है। आत्म ही जगतरूप होकर भासता है। जिह्वा नहीं पर बोलता है; अभोक्ता है पर भोक्ता होके भासता है; अफुर है पर फुरता भासता है; अद्वैत है पर द्वैतरूप होकर भासता है और निराकार है पर साकाररूप होके भासता है। हेरामजी! आत्मसत्ता सब शब्दों से अतीत है पर वही सब शब्दों को धारती है और द्रष्टा होके भासती है, इतर कुछ है नहीं। कई सृष्टि समान होती हैं और कई विलक्षण होती हैं परन्तु स्वरूप में कुछ भिन्न नहीं सदा आत्म-रूप हैं जैसे सुवर्ण से भूषण समान आकार भी होते और विलक्षण भी
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होते हैं और कङ्गण से आदि लेके जो भूषण है सो सुवर्ण से इतर नहीं होते—सुवर्णरूप ही हैं वैसे ही जगत् आत्मस्वरूप है और शुद्ध आकाश से भी निर्मल बोधमात्र है । हे रामजी ! जब तुम उसमें स्थित होगे तब जगद्भ्रम मिट जावेगा । जगत् वास्तव में कुछ नहीं है सदा ज्यों का त्यों अपने आपमें स्थित है; केवल मन के फुरने से ही जगत् भासता है मन के फुरने से रहित होने पर सब कल्पना मिट जाती है और आत्मसत्ता ज्यों की त्यों भासती है । वह सत्ता ज्यों की त्यों ही है और सबका अधिष्ठानरूप है । यह सब जगत् उसी से हुआ है और वही रूप है । सबका कारण आत्मसत्ता है और उसका कारण कोई नहीं । अकारण, अद्वैत, अजर, अमर सब कल्पना से रहित शुद्ध चिन्मात्ररूप है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे परमकारण वर्णनन्नामाष्टमसर्गः ॥८॥
इतना सुनकर रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! जब महाप्रलय होता है और सब पदार्थ नष्ट हो जाते हैं उसके पीछे जो रहता है उसे शून्य कहिये वा प्रकाश कहिये, क्योंकि तम तो है नहीं; चेतन है अथवा जीव है, मन है वा बुद्धि है सत्, असत्, किञ्चन, अकिञ्चन, इनमें कोई तो होवेगा; आप कैसे कहते हैं कि वाणी की गम नहीं ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह तुमने बड़ा प्रश्न किया है । इस भ्रम को मैं बिना यत्न नाश करूँगा । जैसे सूर्य के उदय से अन्धकार नष्ट हो जाता है वैसे ही तुम्हारे संशय का नाश होगा । हे रामजी ! जब महाप्रलय होता है तब सम्पूर्ण दृश्य का अभाव हो जाता है पीछे जो शेष रहता है सो शून्य नहीं, क्योंकि दृश्याभास उसमें सदा रहता है और वास्तव में कुछ हुआ नहीं । जैसे थम्भ में शिल्पी पुतलियाँ कल्पता है कि इतनी पुतलियाँ इस थम्भ से निकलेंगी सो उस थम्भ में ही शिल्पी कल्पता है जो थम्भ न हो तो शिल्पी पुतलियाँ किसमें कल्पता ? वैसे ही आत्मरूपी थम्भे में मनरूपी शिल्पी जगतरूपी पुतलियाँ कल्पता है; जो आत्मा न हो तो पुतलियाँ किसमें कल्पे जैसे थम्भे में पुतलियाँ थम्भारूप हैं वैसे ही सब जगत् ब्रह्मरूप है—ब्रह्म से इतर जगत् का होना नहीं । जैसे पुतलियों का सद्भाव और असद्भाव थम्भ
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में है, क्योंकि अधिष्ठानरूप खम्भा है—खम्भे बिना पुतलियाँ नहीं होतीं, वैसे ही जगत् आत्मा के बिना नहीं होता । हे रामजी ! सद्भाव हो जाता है वह सत् से होता है असत् से नहीं और असद्भाव सिद्ध होता है वह सत् ही में होता है असत् में नहीं होता । इससे सत् शून्य नहीं; जो शून्य होता तो किसमें भामता जैसे सोझ जल में तरङ्ग का सद्भाव और असद्भाव भी होता है । असद्भाव इस कारण होता है कि तरङ्ग भिन्न कुछ नहीं और सद्भाव इस कारण से होता है कि जल ही में तरङ्ग होता है वैसे ही जगत् का सद्भाव असद्भाव आत्मा में होता है शून्य में नहीं । जैसे सोझ जल में कहनेमात्र को तरङ्ग है, नहीं तो जल ही है वैसे ही जगत् कहनेमात्र को है, हुआ कुछ नहीं-एक सत्ता ही है । और शून्य और अशून्य भी नहीं, क्योंकि शून्य और अशून्य ये दोनों शब्द उसमें कल्पित हैं; शून्य उसको कहते हैं जो सद्भाव से रहित अभानरूप हो और अशून्य उसको कहते हैं जो विद्यमान हो । पर आत्मसत्ता इन दोनों से रहित है । अशून्य भी शून्य का प्रतियोगी है, जो शून्य नहीं तो अशून्य कहाँ से हो । ये दोनों ही अभावमात्र हैं । हे रामजी ! यह सूर्य, तारा, दीपक आदि भौतिक प्रकाश भी वहाँ नहीं, क्योंकि प्रकाश अन्धकार का विरोधी है; जो यह प्रकाश होता तो अन्धकार सिद्ध न होता । इससे वहाँ प्रकाश भी नहीं है और तम भी नहीं है, क्योंकि सूर्यादिक जिससे प्रकाशते हैं वह तम कैसे हो ? आत्मा के प्रकाश बिना सूर्यादिक भी तमरूप हैं । इससे वह शून्य है, न अशून्य है, न प्रकाश है, न तम है, केवल आत्मतत्त्वमात्र है । जैसे थम्भ में पुतलियाँ कुछ हैं नहीं वैसे ही आत्मा में जगत् कुछ हुआ नहीं । जैसे वेलि और वेलि की मज्जा में कुछ भेद नहीं वैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं और जैसे जल और तरङ्ग में मृत्तिका और घट में कुछ भेद नहीं वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं, नाममात्र भेद है । हे रामजी ! जल और मृत्तिका का जो दृष्टान्त दिया है ऐसा भी आत्मा में नहीं । जैसे जल में तरङ्ग होता है और मृत्तिका में घट होता है सो भी परिणामरूप होता है । आत्मा में जगत् भान नहीं है और
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जो मानसिक है तो आकाशरूप है । इससे जगत् कुछ भिन्न नहीं है रूप-अवलोकन मनस्कार जो कुछ भासता है वह सब आकाशरूप है । आत्म-सत्ता ही चित्त के फुरने से जगतरूप हो भासती है—जगत् कुछ दूसरी वस्तु नहीं । जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है । हे रामजी ! थम्भे में जो शिल्पकार पुतलियाँ कल्पता है सो भी नहीं होतीं और यहाँ कल्पनेवाला भी बीच की पुतली है वह भी होने बिना भासती है । हे रामजी ! जिससे यह जगत् भासता है, उसको शून्य कैसे कहिये और जो कहिये कि चेतन है तो भी नहीं, क्योंकि चेतन भी तब होता है जब चित्तकला फुरती है जहाँ फुरना न हो वहाँ चेतनता कैसे रहे ? जैसे जब कोई मिरच को खाता है तब उसकी तिखाई भासती है, खाये बिना नहीं भासती । वैसे ही चैतन्य जानना भी स्पन्दकला में होता है, आत्मा में जानना भी नहीं होता । चैतन्यता से रहित चिन्मात्र अद्वय सुषुप्तिरूप है उसको जो तुरीय कहता है वह ज्ञेय ज्ञानवान् से गम्य है । हे रामजी ! जो पुरुष उसमें स्थित हुआ है उसको संसाररूपी सर्प नहीं डस सकता, वह अद्वैत्य चिन्मात्र होता है और जिसको आत्मा में स्थिति नहीं होती उसको दृश्यरूपी सर्प डसता है । आत्मसत्ता में तो कुछ द्वैत नहीं हुआ आत्म-सत्ता तो आकाश से भी स्वच्छ है । इनका द्रष्टा, दर्शन, दृश्य स्वतः अनुभवसत्ता आत्मा का रूप है और वह अभ्यास करने से प्राप्त होती है । हे रामजी ! उसमें द्वैतकल्पना कुछ नहीं है । वह अद्वैतमात्र है वह न द्रष्टा है न जीव है, न कोई विकार और न स्थूल न सूक्ष्म है—एक शुद्ध अद्वैतरूप अपने आपमें स्थित है जो यह चैत्य का फुरना ही आदि में नहीं हुआ तो चेतनकलारूप जीव कैसे हो और जो जीव ही नहीं तो बुद्धि कैसे हो जो बुद्धि ही नहीं तो मन और इन्द्रियाँ कैसे हो; जो इन्द्रियाँ नहीं तो देह कैसे हो और जो देह न हो तो जगत् कैसे हो ? हे रामजी ! आत्मसत्ता में सब कल्पना मिट जाती हैं; उसमें कुछ कहना नहीं बनता वह तो पूर्ण, अपूर्ण, सत्, असत् से न्यारा है भाव और अभाव का कभी उसमें कोई विकार नहीं; आदि, मध्य, अन्त की कल्पना
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भी कोई नहीं वह तो अजर, अमर, आनन्द, अनन्त, चितस्वरूप, अचेत्य चिन्मात्र और अवाक्यपद है । वह सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, आकाश से भी अधिक शून्य और स्थूल से भी स्थूल एक अद्वैत और अनन्त चिद्रूप है । इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! यह अचिंत्य, चिन्मात्र और परमार्थसत्ता जो आपने कही उसका रूप बोध के निमित्त मुझसे फिर कहो । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब महाप्रलय होता है तब सब जगत् नष्ट हो जाता है, पर ब्रह्मसत्ता शेष रहती है उसका रूप मैं कहता हूँ । मनरूपी ब्रह्मा है मन की वृत्ति जो प्रवृत्त होती है वह एक प्रमाण, दूसरी विपर्यय, तीसरी विकल्प, चौथी अभाव और पाँचवीं स्मरण है । प्रमाणवृत्ति तीन प्रकार की है-एक प्रत्यक्ष, दूसरी अनुमान जैसे धुवाँ से अग्नि जानना और तीसरी शब्दरूप ये तीनों प्रमाणवृत्ति आसकामिका हैं । द्वितीय विपर्यय वृत्ति है-विपरीत भाव से तृतीय विकल्पवृत्ति है चेतन ईश्वररूप है और साक्षी पुरुषरूप है अर्थात् जैसे सीप पड़ी हो और उसमें संशय वृत्ति चाँदी की या सीपी की भासे तो उसका नाम विकल्प है । चतुर्थ निद्रा-अभाव वृत्ति है और पञ्चम स्मरणवृत्ति है यही पाँचों वृत्तियाँ हैं और इनका अभिमानी मन है जब तीनों शरीरों का अभिमानी अहंकार नाश हो तब पीछे जो रहता है सो निश्चल सत्ता अनन्त आत्मा है । मैं असत नहीं कहता हूँ । हे रामजी ! जाग्रत् के अभाव होने पर जब तक सुषुप्ति नहीं आती वह रूप परमात्मा का है अंगुष्ठ को जो शीत उष्ण का स्पर्श होता है उसको अनुभव करने-वाली परमात्मसत्ता है जिसमें द्रष्टा, दर्शन और दृश्य उपजता है और फिर लीन होता है वह परमात्मा का रूप है । उस सत्ता में चेतन भी नहीं है । हे रामजी ! जिसमें चेतन अर्थात् जीव और जड़ अर्थात् देहादिक दोनों नहीं हैं वह अचेत्य चिन्मात्र परमात्मारूप है । जब सब व्यवहार होते हैं उनके अन्तर आकाशरूप है-कोई क्षोभ नहीं ऐसी सत्ता परमात्मा का रूप है वह शून्य है परन्तु शून्यता से रहित है । हे रामजी ! जिसमें द्रष्टा, दर्शन और दृश्य तीनों प्रतिबिम्बित हैं और आकाशरूप है-ऐसा सत्ता परमात्मा का रूप है । जो स्थावर में स्थावरभाव और चेतन में चेतन
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भाव से व्याप रहा है और मन बुद्धि इन्द्रियाँ जिसको नहीं पा सकतीं ऐसी सत्ता परमात्मा का रूप है । हे रामजी ! ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र का जहाँ अभाव हो जाता है उसके पीछे जो शेष रहता है और जिसमें कोई विकल्प नहीं ऐसी अचेत चिन्मात्रसत्ता परमात्मा का रूप है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे परमात्मस्वरूप-वर्णन्ननाम नवमसर्गः ॥ ६ ॥
इतना सुन रामजी बोले, हे भगवन् ! यह दृश्य जो स्पष्ट भासता है सो महाप्रलय में कहाँ जाता है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! बन्ध्या स्त्री का पुत्र कहाँ से आता है और कहाँ जाता है और आकाश का बन कहाँ से आता और कहाँ जाता है ? जैसे आकाश का वन है वैसे ही यह जगत् है । फिर रामजी ने पूछा, हे मुनीश्वर ! बन्ध्या का पुत्र और आकाश का वन तो तीनों काल में नहीं होता शब्दमात्र है और उपजा कुछ नहीं पर यह जगत् तो स्पष्ट भासता है बन्ध्या के पुत्र के समान कैसे हो ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जैसे बन्ध्या का पुत्र और आकाश का वन उपजा नहीं वैसे ही यह जगत् भी उपजा नहीं । जैसे सङ्कल्पपुर होता है और जैसे स्वप्ननगर प्रत्यक्ष भासता है और आकाशरूप है, इनमें से कोई पदार्थ सत् नहीं वैसे ही यह जगत् भी आकाशरूप है और कुछ उपजा नहीं । जैसे जल और तरङ्ग में काजल और श्यामता में, अग्नि और उष्णता में, चन्द्रमा और शीतलता में, वायु और स्पन्द में आकाश और शून्यता में भेद नहीं वैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं—सदा अपने स्वभाव में स्थित है । हे रामजी ! जगत् कुछ बना नहीं, आत्मसत्ता ही अपने आप में स्थित है और उसमें अज्ञान से जगत् भासता है । जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा मरुस्थल में जल और आकाश में तरुवरे भासते हैं वैसे ही आत्मा में अज्ञान से जगत् भासता है । इतना सुन फिर रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! दृश्य के अत्यन्त अभाव बिना बोध की प्राप्ति नहीं होती और जगत् स्पष्टरूप भासता है। द्रष्टा और दृश्य जो मन से उदय हुए हैं सो भ्रम से हुए हैं। जो एक है तो दोनों भी हैं और जब दोनों में
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एक का अभाव हो तो दोनों मुक्त हों, क्योंकि जहाँ द्रष्टा है वहाँ दृश्य भी है और जहाँ दृश्य है वहाँ द्रष्टा भी है। जैसे शुद्ध आदर्श के बिना प्रतिबिम्ब नहीं होता वैसे ही द्रष्टा भी दृश्य के बिना नहीं रहता और दृश्य द्रष्टा के बिना नहीं। हे मुनीश्वर ! दोनों में एक नष्ट हो तो दोनों निर्वाण हों इससे वही युक्ति कहो जिससे दृश्य का अत्यन्त अभाव होकर आत्म-बोध प्राप्त हो। कोई ऐसा भी कहते हैं कि दृश्य आगे या अब नष्ट हुआ है तो उसको भी संसारभाव दिखावेगा और जिसको विद्यमान नहीं भासता और उसके अन्तर सद्भाव है तो फिर संसार देखेगा। जैसे सूक्ष्म बीज में वृक्ष का सद्भाव होता है वैसे ही स्मृति फिर संसार को दिखावेगा और आप कहते हैं कि जगत् का अत्यन्त अभाव होता है और जगत् का कारण कोई नहीं—आभासमात्र है—और उपजा कुछ नहीं ? हे मुनी-श्वर ! जिसका अत्यन्त अभाव होता है वह वस्तु वास्तव में नहीं होती और जो है ही नहीं तो बन्धन किसको हुआ तब तो सब मुक्तस्वरूप हुए पर जगत् तो प्रत्यक्ष भासता है ? इससे आप वही युक्ति कहो जिससे जगत् का अत्यन्त अभाव हो । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! दृश्य के अत्यन्त अभाव के निमित्त मैं एक कथा सुनाता हूँ; जिसका अर्थ निश्चयकर समझने से दृश्य शान्त होकर फिर संसार कदाचित् न उपजेगा। जैसे समुद्र में धूल नहीं उड़ती वैसे ही तुम्हारे हृदय में संसार न रहेगा । हे रामजी ! यह जगत् जो तुमको भासता है सो अकारणरूप है; इसका कारण कोई नहीं । हे रामजी । जिसका कारण कोई न हो और भासे उसको जानिये कि भ्रममात्र—है उसका उपजा कुछ नहीं जैसे स्वप्न में सृष्टि भासती है वह किसी कारण से नहीं उपजी केवल संवित्रूप है वैसे ही सर्ग आदि कारण से नहीं उपजा केवल आभास-रूप है—परमात्मा में कुछ नहीं । हे रामजी ! जो पदार्थ कारण बिना भासे तो जिसमें वह भासता है वही वस्तु उसका अधिष्ठानरूप है । जैसे तुमको स्वप्न में स्वप्न का नगर होकर भासता है पर वहाँ तो कोई पदार्थ नहीं केवल आभासरूप है और संवित् ज्ञान ही चैतन्यता से नगर होकर भासता है, वैसे ही विश्व अकारण आभास आत्मसत्ता में
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होके भासता है । जैसे जल में द्रवता; वायु में स्पन्द; जल में रस और तेज में प्रकाश है वैसे ही आत्मा में चित्तसंवेदन है । जब चित्तसंवेदन स्पन्दरूप होता है तब जगतरूप होकर भासता है- जगत् कोई वस्तु नहीं है । हे रामजी ! जैसे और तत्त्वों के अणु और ठौर भी पाये जाते हैं और आकाश के अणु और ठौर नहीं पाये जाते क्योंकि आकाश शून्यरूप है वैसे ही आत्मा से इतर इस जगत् का भाव कहीं नहीं पाते क्योंकि यह आभासरूप है और किसी कारण में नहीं उपजा । कदाचित् कहो कि पृथ्वी आदिक तत्त्वों से जगत् उपजा है तो ऐसे कहना भी असम्भव है । जैसे छाया से धूप नहीं उपजती वैसे ही तत्त्वों से जगत् नहीं उपजता, क्योंकि आदि आप ही नहीं उपजे तो कारण किससे हों ? इससे ब्रह्मसत्ता सर्वदा अपने आप में स्थित है । हे रामजी ! आत्मसत्ता जगत् का कारण नहीं; क्योंकि वह अभूत और अजइरूप है सो भौतिक और जड़ का कारण कैसे हो ? जैसे धूप परछाहीं का कारण नहीं वैसे ही आत्मसत्ता जगत् का कारण नहीं, इससे जगत् कुछ हुआ नहीं वही सत्ता जगतरूप होकर भासती है । जैसे स्वर्ण भूषणरूप होता है और भूषण कुछ उपजा नहीं वैसे ब्रह्मसत्ता जगत्- रूप होकर भासती है । जैसे अनुभव संवित् स्वप्ननगररूप ही भासता है वैसे ही यह सृष्टि किञ्चनरूप है दूसरी वस्तु नहीं । ब्रह्मसत्ता सदा अपने आप में स्थित है और जितना कुछ जगत् स्थावर जङ्गमरूप भासता है वह आकाशरूप है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे परमार्थरूपवर्णनन्नाम दशमस्सर्गः ॥ २० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आत्मसत्ता नित्य, शुद्ध, अजर, अमर और सदा अपने आपमें स्थित है । उसमें जिस प्रकार सृष्टि उदय हुई है वह सुनिये । उसके जानने से जगत् कल्पना मिट जावेगी । हे रामजी ! भाव-अभाव, ग्रहण-त्याग, स्थूल-सूक्ष्म, जन्म-मरण आदि पदार्थों से जीव खेदा जाता है उससे तुम मुक्त होगे । जैसे चूहे सुमेरु पर्वत को चूर्ण नहीं कर सकते वैसे ही तुमको संसार के भाव-अभाव पदार्थ
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चूर्ण न कर सकेंगे । हे रामजी ! आदि शुद्ध देव अचेत चिन्मात्र है, उनमें चेत्यभाव सदा रहता है, क्योंकि वह चैतन्यरूप है । जैसे वायु में स्पन्द शक्ति सदा रहती है वैसे ही चिन्मात्र में चैत्य का फुरना रहकर "अहमस्मि" भाव को प्राप्त हुआ है । इस कारण उसका नाम चैतन्य है । हे रामजी ! जब तक चैतन्य-संविद् अपने स्वरूप के ठौर नहीं आता तब तक इसका नाम जीव है और संकल्प का नाम बीज चित् संवित् है, उसी में सर्वभूत जाति उत्पन्न हुई है । इससे सबका जीव चित्-संविद् है । जब जीव संवित् चैत्य को चेतता है तब प्रथम शून्य होकर उसमें शब्दगुण होता है उस आदि शब्दतन्मात्रा से पद, वाक्य और प्रमाण सहित वेद उत्पन्न हुए । जितना कुछ जगत् में शब्द है उसका बीज तन्मात्रा है । जिससे वायु स्पर्श होता है । फिर रूपतन्मात्रा हुई, उससे सूर्य अग्नि आदि प्रकाश हुए । फिर रसतन्मात्रा हुई जिससे जल हुआ और सब जलों का बीज वही है । फिर गन्ध तन्मात्रा हुई जिससे सम्पूर्ण पृथ्वी हुई और सब पृथ्वी का बीज वही है । हे रामजी ! इसी प्रकार पाँचों भूत हुए हैं फिर पृथ्वी, अप तेज वायु और आकाश से जगत् हुआ है सो भूत पञ्चीकृत और अपञ्चीकृत है । यह भूत शुद्ध चिदाकाशरूप नहीं, क्योंकि संकल्प और मेलयुक्त हुए हैं । इस प्रकार चिदणु में सृष्टि भासी है । जैसे वटबीज में से वट का विस्तार होता है वैसे ही चिदणु में सृष्टि है । कहीं क्षण में युग और कहीं युग में क्षण भासता है । चिदणु में अनन्त सृष्टि फुरती है । जब चित् संवित् चैत्योन्मुख होता है तब अनेक सृष्टि होकर भासती है और जब चित्-संवित् आत्मा की ओर आता है तब आत्मा के साक्षात्कार होने से सब सृष्टि पिण्डाकार होती है अर्थात् सब आत्मरूप होती है इससे इस जगत् के बीज सूक्ष्मभूत हैं और इनका बीज चिदणु है । हे रामजी ! जैसा बीज होता है वैसा ही वृक्ष होता है । इससे सब जगत् चिदाकाशरूप है । संकल्प से यह जगत् आडम्बर होता है और संकल्प के मिटे सब चिदाकाश होता है । जैसे संकल्प आकाशरूप है वैसे ही जगत् भी आकाशरूप है; आत्मा अनुभव आकाशरूप है जिससे क्षण में अनेकरूप
उत्पत्ति प्रकरण । १६३
होते हैं। जैसे संकल्पनगर और स्वप्नपुर होता है वैसे ही यह जगत् है। हे रामजी ! इस जगत् का मूल पञ्चभूत है जिसका बीज संवित् और स्वरूप चिदाकाश है । इसी से सब जगत् चिदाकाश है; द्वैत और कुछ नहीं ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे जगदुत्पत्तिवर्णनन्ना- मकादशस्सर्गः ॥ ११ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! परब्रह्म सम, शान्त, स्वच्छ, अनन्त, चिन्मात्र और सर्वदाकाल अपने आप में स्थित है । उसमें सम-असम-रूप जगत् उत्पन्न हुआ है । सम अर्थात् सजातीयरूप और असम अर्थात् भेदरूप कैसे हुए सो भी सुनिये । प्रथम तो उसमें चेत्य का फुरना हुआ है; उसका नाम जीव हुआ और उसने दृश्य को चेता उससे तन्मात्र, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध उपजे । उन्हीं से पृथ्वी, अप, तेज, वायु और आकाश पञ्चभूतरूपी वृक्ष हुआ और उस वृक्ष में ब्रह्माण्डरूपी फल लगा । इसमें जगत् का कारण पञ्चतन्मात्रा हुई हैं और तन्मात्रा का बीज आदि संवित् आकाश है और इसी से सर्व जगत् ब्रह्मरूप हुआ । हे रामजी ! जैसे बीज होता है वैसा ही फल होता है । इसका बीज परब्रह्म है तो यह भी परब्रह्म हुआ जो आदि अचेत चिन्मात्र स्वरूप परमाकाश है और जिस चैतन्य संवित् में जगत् भासता है वह जीवाकाश है । वह भी शुद्ध निर्मल है, क्योंकि वह पृथ्वी आदि भूतों से रहित है । हे रामजी ! यह जगत् जो तुमको भासता है सो सब चिदाकाशरूप है और वास्तव में द्वैत कुछ नहीं बना । यह मैंने तुमसे ब्रह्माकाश और जीवाकाश कहा । अब जिससे इसको शरीर ग्रहण हुआ सो सुनिये । हे रामजी ! शुद्ध चिन्मात्र में जो चैत्योन्मुखत्व "अहं अस्मि" हुआ और उस अहंभाव से आपको जीव अणु जानने लगा । अपना वास्तव स्वरूप अन्य भाव की नाईं होकर जीव अणु में जो अहंभाव दृढ़ हुआ उसी का नाम अहंकार हुआ उस अहंकार की दृढ़ता मे निश्चयात्मक बुद्धि हुई और उसमें सङ्कल्परूपी मन हुआ जब मन इसकी ओर संसरने लगा तब सुनने की इच्छा की इससे श्रवण इन्द्रिय प्रकट हुई; जब रूप देखने की इच्छा
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की तब चक्षु इन्द्रिय प्रकट हुई; जब स्पर्श की इच्छा की तो त्वचा इन्द्रिय प्रकट हुई और जब रस लेने की इच्छा की तो जिह्वा इन्द्रिय प्रकट हुई । इसी प्रकार से देह इन्द्रियाँ चैतन्यता से भासीं और उसमें यह जीव अहंप्रतीति करने लगा । हे रामजी ! जैसे दर्पण में पर्वत का प्रतिबिम्ब होता है वह पर्वत से बाह्य है वैसे ही देह और इन्द्रियां बाह्य दृश्य हैं पर अपने में भासी हैं इससे उसमें अहं प्रतीति होती है । जैसे कूप में मनुष्य आपको देखे वैसे ही देह में आपको देखता है जैसे डब्बे में रत्न होता है वैसे ही देह में आपको देखता है । वही चिदअणु देह के साथ मिलकर दृश्य को रचता है । उस अहं से ही क्रिया भासने लगी । जैसे स्वप्न में दौड़े और जैसे स्थित में स्पन्द होती है वैसे ही आत्मा में जो स्पन्द क्रिया हुई वह चित्त-संवित् से ही हुई है और उसी का नाम स्वयम्भू ब्रह्मा हुआ । जैसे संकल्प से दूसरा चन्द्रमा भासता है वैसे ही मनोपम जगत् भासता है । जैसे शश के शृङ्ग होते हैं वैसे ही यह जगत् है । कुछ उपजा नहीं केवल चित्त के स्पन्द में जगत् फुरता है । जैसे-जैसे चित्त फुरता गया वैसे वैसे देश, काल, द्रव्य, स्थावर, जङ्गम, जगत् की मर्यादा हुई । इससे सब जगत् सङ्कल्परूप है, सङ्कल्प से इतर जगत् का आकार कुछ नहीं । जब सङ्कल्प फुरता है तब आगे जगत् दृश्य भासता है और संकल्प निस्पन्द होता है तब दृश्य का अभाव होता है । हे रामजी ! इस प्रकार से यह ब्रह्मा निर्वाण हो फिर और उपजते हैं इससे सब संकल्पमात्र ही है । जैसे नटवा नाना प्रकार के पट के स्वांग करके बाहर निकल आता है वैसे ही देखो यह सब मायामात्र है । हे रामजी ! जब चित्त की ओर संसरता है तब दृश्य का अन्त नहीं आता और जब अन्तर्मुख होता है तब सब जगत् आत्मरूप होता है । चित्त के निस्पन्द होने से एक क्षण में जगत् निवृत्त होता है क्योंकि सङ्कल्परूप ही है । इसमें यह जगत् आकाशरूप है उपजा कुछ नहीं और आत्मसत्ता ज्यों की त्यों अपने आप में स्थित है । जैसे स्वप्न में पर्वत और नदियाँ भ्रम में दीखते हैं वैसे ही यह जगत् भी भ्रम में भासता है । जैसे स्वप्न में आपको मुआ देखता है सो भ्रममात्र है वैसे ही यह जगत्
उत्पत्ति प्रकरण । १६५
भ्रममात्र है । हे रामजी ! यह स्थावर, जङ्गम जगत् सब चिदाकाश है । हमको तो सदा चिदाकाश ही भासता है । आदि विराट् रूप में ब्रह्मा भी वास्तव में कुछ उपजे नहीं तो जगत् कैसे उपजा जैसे स्वप्न में नाना प्रकार के देश काल और व्यवहार दृष्टि आते हैं सो अकारणरूप हैं; उपजे कुछ नहीं और आभासमात्र हैं, वैसे ही यह जगत् आभासमात्र है । कार्य-कारण भासते हैं तो भी अकारण हैं । हे रामजी ! हमको जगत् ऐसा भासता है जैसे स्वप्न में जागे मनुष्य को भासता है । जो वस्तु अकारण भासी है सो भ्रान्तिमात्र है । जो किसी कारण द्वारा जगत् नहीं उपजा तो स्वप्नवत् है । जैसे संकल्पपुर और गन्धर्वनगर भासते हैं वैसे ही यह जगत् भी जानो । आदि विराट् आत्मा अन्नवाहकरूप है और वह पृथ्वी आदि तत्त्वों से रहित आकाशरूप है तो यह जगत् आधि-भौतिक कैसे हो ! सब आकाशरूप है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे स्वयम्भूतस्यचित्तवर्णनोनाम द्वादशस्सर्गः ॥ १२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह दृश्य मिथ्या असतरूप है । जो है सो निरामय ब्रह्म है यह ब्रह्माकाश ही जीव की नाईं हुआ है । जैसे समुद्र द्रवता से तरङ्गरूप होता है वैसे ही ब्रह्म जीवरूप होता है । आदिसंवित् स्पन्दरूप ब्रह्मा हुआ है और उस ब्रह्मा में आगे जीव हुए हैं । जैसे एक दीपक से बहुत दीपक होते हैं और जैसे एक संकल्प से बहुत संकल्प होते हैं वैसे ही एक आदि जीव से बहुत जीव हुए हैं । जैसे थम्भे में शिल्पी पुतलियाँ कल्पता है पर वह पुतलियाँ शिल्पी के मन में होती हैं थम्भा ज्यों का त्यों ही स्थित है वैसे ही सब पदार्थ आत्मा में मन कल्पे हैं वास्तव में आत्मा ज्यों का त्यों ब्रह्म है । उन पुतलियों में बड़ी पुतली ब्रह्म है और छोटी पुतली जीव है । जैसे वास्तव में थम्भा है, पुतली कोई नहीं उपजी; वैसे ही वास्तव में आत्मसत्ता है जगत् कुछ उपजा नहीं; संकल्प से भासता है और संकल्प के मिटने से जगत्कल्पना मिट जाती है । इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! एक जीव में जो बहुत जीव हुए हैं तो क्या वे पर्वत में पाषाण की नाईं उपजते हैं वा
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कोई जीवों की खानि है ? जिससे इस प्रकार इतने जीव उत्पन्न हो आते हैं; अथवा मेघ की बूँदों वा अग्नि से विस्फुलिङ्गों की नाईं उपजते हैं सो कृपाकर कहिये ? और एक जीव कौन है जिससे सम्पूर्ण जीव उपजते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! न एक जीव है और न अनेक हैं। तेरे ये वचन ऐसे हैं जैसे कोई कहे कि मैंने शश के शृङ्ग उड़ते देखे हैं। एक जीव भी तो नहीं उपजा मैं अनेक कैसे कहूँ ? शुद्ध और अद्वैत आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। वह अनन्त आत्मा है, उसमें भेद की कोई कल्पना नहीं है। हे रामजी ! जो कुछ जगत् तुमको भासता है सो सब आकाशरूप है कोई पदार्थ उपजा नहीं। केवल संकल्प के फुरने से ही जगत् भासता है। जीवशब्द और उसका अर्थ आत्मा में कोई नहीं उपजा, यह कल्पना भ्रम से भासती है आत्म-सत्ता ही जगत् की नाईं भासती है, उसमें न एक जीव है और न अनेक जीव हैं। हे रामजी ! आदि विराट् आत्मा आकाशरूप है, उससे जगत् उपजा है। मैं तुमको क्या कहूँ ? जगत् विराट्रूप है, विराट् जीवरूप है और जीव आकाशरूप है, फिर और जगत् क्या रहा और जीव क्या हुआ ? सब चिदाकाशरूप है। ये जितने जीव भासते हैं वे सब ब्रह्मस्वरूप हैं, द्वैत कुछ नहीं और न इसमें कुछ भेद है। रामजी ने पूछा, हे मुनीश्वर ! आप कहते हैं कि आदि जीव कोई नहीं तो इन जीवों का पालनेवाला कौन है। वह नियामक कौन है जिसकी आज्ञा में ये विचरते हैं ? जो कोई हुआ ही नहीं तो ये सर्वज्ञ और अल्पज्ञ क्योंकर होते हैं और एक में कैसे हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जिसको तुम आदिजीवी कहते हो वह ब्रह्मरूप है ! वह नित्य, शुद्ध और अनन्त शक्तिमान् अपने आपमें स्थित है उसमें जगत् कल्पना कोई नहीं। हे रामजी ! जो शुद्ध चिदाकाश अनन्तशक्ति में आदिचित्त किञ्चन हुआ है वही शुद्ध चिदाकाश ब्रह्मसत्ता जीव की नाईं भासने लगी है। स्पन्दद्वारा हुए की नाईं भासती है। पर अपने स्वरूप से इतर कुछ हुआ नहीं। चैतन्य संवित् आदि स्पन्द से (विराट्) ब्रह्मारूप होकर स्थित हुआ है और उसने संकल्प करके जगत् रचा है। उर्मी ने
उत्पत्ति प्रकरण । १६७
शुभ अशुभ कर्म रचे हैं और उसी से नीति रची है—अर्थात् यह शुभ है और यह अशुभ है; वही आदि नीति महाप्रलय पर्यन्त ज्यों की त्यों चली जाती है । हे रामजी ! यह अनन्त शक्तिमान् देव जिससे आदि फुरना हुआ है वैसे ही स्थित है। जो आदि शक्ति फुरी है वह वैसे ही है जो अल्पज्ञ फुरा है सो अल्पज्ञ ही है । हे रामजी ! संसार के पदार्थों में नीतिशक्ति प्रधान है; उसके लाँघने को कोई भी समर्थ नहीं है । जैसे रचा है वैसे ही महाप्रलय पर्यन्त रहती है । हे रामजी ! आदि नित्य-विराट्पुरुष अन्तवाहक रूप पृथ्वी आदि तत्त्वों से रहित है और यह जगत् भी अन्तवाहक रूप पृथ्वी आदि तत्त्वों से नहीं उपजा—सब संकल्प-रूप है । जैसे मनोराज का नगर शून्य होता है वैसे ही यह जगत् शून्य है । हे रामजी ! इस सर्ग का निमित्त कारण और समवाय कारण कोई नहीं । जो पदार्थ निमित्त कारण और समवाय कारण बिना दृष्टि आवे उसे भ्रममात्र जानिये, वह उपजता नहीं । जो पदार्थ उपजता है वह इन्हीं दोनों कारणों से उपजा है, पर वह जगत् का कारण इनमें से कोई नहीं । ब्रह्मसत्ता नित्य, शुद्ध और अद्वैत सत्ता है उसमें कार्य कारण की कल्पना कैसे हो ? हे रामजी ! यह जगत् अकारण है केवल भ्रान्ति से भासता है । जब तुमको आत्मविचार उपजेगा तब दृश्य भ्रम मिट जावेगा । जैसे दीपक हाथ में लेकर अन्ध-कार को देखिये तो कुछ दृष्टि नहीं आता वैसे ही जो विचार करके देखोगे तो जगत् भ्रम मिट जावेगा । जगत् भ्रम मन के फुरने से ही उदय हुआ है इससे संकल्पमात्र है । इसका अधिष्ठान ब्रह्म है, सब नामरूप उस ब्रह्मसत्ता में कल्पित हैं और षट्विकार भी उसी ब्रह्मसत्ता में फुरे हैं पर सबसे रहित और शुद्ध चिदाकाशरूप है और जगत् भी वह रूप है जैसे समुद्र में द्रवता से तरङ्ग, बुद्बुदे और फेन भासते हैं वैसे ही आत्मसत्ता में चित्त के फुरने से जगत् भासता है । जैसे आदि चित्त में पदार्थसत्ता दृढ़ हुई है वैसे ही स्थित है और आत्मा के साथ अभेद है, इतर कुछ नहीं, सब चिदाकाश है । इच्छा, देवता, समुद्र, पर्वत ये सब आकाशरूप है । हे रामजी ! हमको सदा चिदाकाशरूप ही भासता है
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और आत्मसत्ता ही मन, बुद्धि, पर्वत, कन्दरा, सब जगत् होकर भासती है । जब चैत्योन्मुखत्व होती है सब जगत् भासता है । जैसे वायु स्पन्द-रूप होती है तो भासती है और निस्स्पन्दरूप होती है तो नहीं भासती वैसे ही चित्तसंवेदन स्पन्दरूप होता है तो जगत् भासता है और जब चित्तसंवेदन स्फुरणरूप होता है तो जगत् कल्पना मिट जाती है । हे रामजी ! चिन्मात्र में जो चैत्यभाव हुआ है इसी का नाम जगत् है, जब चैत्य से रहित हुआ तो जगत् मिट जाता है । जब जगत् ही न रहा तो भेदकल्पना कहाँ रही ? इससे न कोई कार्य है, न कारण है, और न जगत् है—सब भ्रममात्र कल्पना है । शुद्ध चिन्मात्र अपने आप में स्थित है । हे रामजी ! शुद्ध चिन्मात्र में चित्त सदा किञ्चन रहता है जैसे मिरचों के बीज में तीक्ष्णता सदा रहती है, परन्तु जब कोई खाता है तब तीक्ष्णता भासती है, अन्यथा नहीं भासता वैसे ही जब चित्त संवेदन चैत्योन्मुखत्व होता है तब जीव को जगत् भासता है और संवेदन से रहित जीव को जगत् कल्पना नहीं भासती । हे रामजी ! जब संवेदनके साथ परिच्छिन्न संकल्प मिलता है तब जीव होता है और जब इससे रहित होता है तो शुद्ध चिदात्मा ब्रह्म होता है । जिस पुरुष की सब कल्पना मिट गई है और जिसको शुद्ध निर्विकार ब्रह्मसत्ता का साक्षात्कार हुआ है वह पुरुष संसार भ्रम से मुक्त हुआ है । हे रामजी ! यह सब जगत् आत्मा का आभासरूप है । वह आत्मा अच्छेद्य, अदाह्य अक्लेद्य नित्य, शुद्ध, सर्वगत स्थाणु की नाईं अचल है अतः जगत् चिदाकाशरूप है । हमको तो सदा ऐसे ही भासता है पर अज्ञानी वाद विवाद किया करते हैं । हमको वाद विवाद कोई नहीं, क्योंकि हमारा सब भ्रम नष्ट हो गया है । हे रामजी ! यह सब जगत् ब्रह्मरूप है और द्वैत कुछ नहीं । जिसको यह निश्चय हो गया है उसको सब अङ्ग अपना स्वरूप ही है तो निराकार और निर्वपुसत्ता के अंग अपना स्वरूप क्यों न हो । यह सब प्रपञ्च चिदाकाशरूप है परन्तु अज्ञानी को भिन्न भिन्न और जन्म मरण आदि विकार भासते हैं और ज्ञानवान को सब आत्मरूप ही भासते हैं । पृथ्वी, अप, तेज, वायु और आकाश सब आत्मा के आश्रय फुरते
उत्पत्ति प्रकरण । १६६
हैं और चित्तशक्ति ही ऐसे होकर भासती है । जैसे वसन्त ऋतु आती है तो रसाशक्ति से वृक्ष और बेलें सब प्रफुल्लित होकर भासती हैं वैसे ही चित्तशक्ति को स्पन्दता ही जगतरूप होकर भासती है । हे रामजी ! जैसे वायु स्पन्दता से भासती है वैसे ही जगत् फुरने से भासता है वैसे ही चित्तसंविद् जगतरूप होकर भासना है फुरने से ही जगत् है और कोई वस्तु नहीं है, इसी से जगत् कुछ नहीं है । जैसे समुद्र तरङ्गरूप होकर भासता है, वैसे ही आत्मा जगतरूप होकर भासता है । इससे जगत् दृश्य-भाव से भासता है पर संवित् से कुछ नहीं । वायु जड़ और आत्मा चैतन्य है और जल भी परिणाम से तरङ्गरूप होता है, आत्मा अच्युत और निराकार है । हे रामजी ! चैतन्यरूप रत्न है और जगत् उसका चमत्कार है अथवा चैतन्यरूपी अग्नि में जगतरूपी उष्णता है । हे रामजी ! चैतन्य प्रकाश ही भौतिक प्रकाशरूप होकर भासता है, इससे जगत् है, और वास्तव से नहीं । चैतन्य सत्ता ही शून्य आकाशरूप होकर भासती है ! इस भाव से जगत् है वास्तव में नहीं हुआ । इससे जगत् कुछ नहीं चेतनसत्ता ही पृथ्वीरूप होकर भासती है, दृष्टि में आता है इससे जगत् है पर आत्मसत्ता से इतर कुछ नहीं हुआ । चैतन्य रूप घन अन्धकार में जगतरूपी कृष्णता है, अथवा चैतन्यरूपी काजल का पहाड़ है और जगतरूपी उसका परमाणु भ्रम है और चैतन्यरूपी सूर्य में जगतरूपी दिन है, आत्मरूपी समुद्र में जगतरूपी तरङ्ग है, आत्मरूपी कुसुम में जगतरूपी सुगन्ध है, आत्मरूपी वरफ में शुक्लता और शीत-लतारूपी जगत् है, आत्मरूपी बेलि में जगतरूपी फूल है, आत्मरूपी स्वर्ण में जगतरूपी भूषण है; आत्मरूपी पर्वत में जगतरूपी जड़ सघनता है, आत्मरूपी अग्नि में जगतरूपी प्रकाश है, आत्मरूपी आकाश में जगतरूपी शून्यता है, आत्मरूपी ईख में जगतरूपी मधुरता है; आत्म-रूपी दूध में जगतरूपी घृत है, आत्मरूपी मधु में जगतरूपी मधुरता है अथवा आत्मरूपी सूर्य में जगतरूपी जलाभास है और नहीं है । हे रामजी ! इस प्रकार देखो कि जो सर्व, ब्रह्म, नित्य, शुद्ध, परमानन्द-स्वरूप है वह सर्वदा अपने आप में स्थित है-भेद कल्पना कोई नहीं ।
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जैसे जल द्रवता से तरङ्गरूप होके भासता है वैसे ही ब्रह्मसत्ता जगतरूप होके भासती है न कोई उपजता है और न कोई नष्ट होता है। हे रामजी ! आदि जो चित्तशक्ति स्पन्दरूप है वह विराड्रूप ब्रह्म वास्तव से चिदाकाशरूप है, आत्मसत्ता से इतरभाव को नहीं प्राप्त हुआ । जैसे पत्र के ऊपर लकीरें होती हैं सो पत्र से भिन्न वस्तु नहीं पत्ररूप ही हैं वैसे ही ब्रह्म में जगत् है कुछ इतर नहीं है, बल्कि पत्र के ऊपर लकीरें तो आकार हैं, पर ब्रह्म में जगत् कोई आकार नहीं। सब आकाशरूप मन से फुरता है, जगत् कुछ हुआ नहीं। जैसे शिला में शिल्पी पुतलियाँ कल्पता है वैसे ही आत्मा में मन ने जगत् कल्पना की है। वास्तव में कुछ हुआ नहीं शिला वज्र की नाईं दृढ़ है और सब जगत् को धरि रही है और आकाश की नाईं विस्ताररूप होकर शान्तरूप है! निदान हुआ कुछ नहीं जो कुछ है सो ब्रह्मरूप है और जो ब्रह्म ही है तो कल्पना कैसे हो? इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब मुनिशार्दूल वशिष्ठजी ने कहा तब सायंकाल का समय हुआ और सब सभा परस्पर नमस्कार करके अपने अपने आश्रम को गई। फिर सूर्य की किरणों के निकलते ही सब अपने-अपने स्थानों पर आ बैठे।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे सर्वब्रह्मप्रतिपादननाम त्रयोदशस्सर्गः ॥ १३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! आत्मा में कुछ उपजा नहीं भ्रम से भास रहा है। जैसे आकाश में भ्रम से तरुवरे और मुक्तमाला भासती हैं वैसे ही अज्ञान से आत्मा में जगत् भासता है। जैसे थम्भे की पुतलियाँ शिल्पी के मन में भासती हैं कि इतनी पुतलियाँ इस थम्भे में हैं सो पुतलियाँ कोई नहीं, क्योंकि किसी कारण से नहीं उपजीं वैसे ही चेतनरूपी थम्भे में मनरूपी शिल्पी त्रिलोकीरूपी पुतलियाँ कल्पता है ! परन्तु किसी कारण से नहीं उपजीं—ब्रह्मसत्ता ज्यों की त्यों ही स्थित है। जैसे सोमजल में त्रिकाल तरङ्गों का अभाव होता है इसी प्रकार जगत् का होना कुछ नहीं, चित् के फुरने से ही जगत् भासता है। जैसे सूर्य की किरणें झरोखों में आती हैं और उसमें सूक्ष्म त्रसरेणु होते हैं उनसे भी
उत्पत्ति प्रकरण । १७१
चिद्अणु सूक्ष्म है जैसे त्रसरेणु से सुमेरु पर्वत स्थूल है वैसे ही चिद्अणु से त्रसरेणु स्थूल हैं। ऐसे सूक्ष्म चिद्अणु से यह जगत् फुरता है सो वह आकाशरूप है, कुछ उपजा नहीं, फुरने से भासता है। हे रामजी! आकाश, पर्वत, समुद्र, पृथ्वी आदि जो कुछ जगत् भासता है सो कुछ उपजा नहीं तो और पदार्थ कहाँ उपजे हों? निदान सब आकाशरूप हैं वास्तव में कुछ उपजा नहीं और जो कुछ अनुभव में होता है वह भी असत् है। जैसे स्वप्नसृष्टि अनुभव में होती है वह उपजी नहीं, असद्रूप है वैसे ही यह जगत् भी असद्रूप है। शुद्ध निर्विकार सत्ता अपने आप में स्थित है। उस सत्ता को त्याग करके जो अवयव अवयवी के विकल्प उठाते हैं उनको धिक्कार है। यह सब आकाशरूप है और आधिभौतिक जगत् जो भासता है सो गन्धर्वनगर और स्वप्नसृष्टिवत् है। हे रामजी! पर्वतों सहित जो यह जगत् भासता है सो रत्तीमात्र भी नहीं। जैसे स्वप्न के पर्वत जाग्रत के रत्ती भर भी नहीं होते, क्योंकि कुछ हुए नहीं, वैसे ही यह जगत् आत्मरूप है और भ्रान्ति करके भासता है। जैसे सङ्कल्प का मेघ सूक्ष्म होता है, वैसे ही यह जगत् आत्मा में तुच्छ है। जैसे शशे के शृङ्ग असत् होते हैं वैसे ही यह जगत् असत् है और जैसे मृगतृष्णा की नदी असत् होती है वैसे ही यह जगत् असत् है। असम्यक् ज्ञान से ही भासती है और विचार करने से शान्त हो जाती है। जब शुद्ध चैतन्यसत्ता में चित्तसंवेदन होता है तब वही संवेदन जगद्रूप होकर भासता है परन्तु जगत् हुआ कुछ नहीं। जैसे समुद्र अपनी द्रवता के स्वभाव से तरङ्गरूप होकर भासता है परन्तु तरङ्ग कुछ और वस्तु नहीं है जलरूप ही है वैसे ही ब्रह्मसत्ता जगद्रूप होकर फुरती है। जो जगत् कोई भिन्न पदार्थ नहीं है ब्रह्मसत्ता ही किञ्चन द्वारा ऐसे भासती है। जैसा बीज होता है वैसा ही अंकुर निकलता है, इसलिए जैसे आत्मसत्ता है वैसे ही जगत् है दूसरी वस्तु कोई नहीं आत्मसत्ता अपने आप में ही स्थित है पर चित्तसंवेदन के स्पन्द से जगत्-रूप होता है। हे रामजी! इसी पर मण्डप आख्यान तुमको सुनाता हूँ, वह श्रवण का भूषण है और उसके समझने में सब संशय मिट जावेंगे
१७२ योगवाशिष्ठ ।
और विश्राम प्राप्त होगा । इतना सुन रामजी बोले, हे भगवन् ! मेरे बोध की वृत्ति के निमित्त मण्डपाख्यान जिस विधि में हुआ है सो संक्षेप से कहो । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस पृथ्वी में एक महातेजवान् राजा पद्म हुआ था । वह लक्ष्मीवान्, सन्तानवान्, मर्यादा का धारनेवाला अति सतोगुणी और दोषों का नाशकर्त्ता एवं प्रजापालक, शत्रुनाशक और मित्रप्रिय था और सम्पूर्ण राजसी और सात्त्विकी गुणों से सम्पन्न मानो कुल का भूषण था । लीला नाम उसकी स्त्री बहुत सुन्दरी और पतिव्रता थी मानो लक्ष्मी ने अवतार लिया था । उसके साथ राजा कभी बागों और तालों और कभी कदम्बवृक्षों और कल्पवृक्षों में जाया करता था, कभी सुन्दर-सुन्दर स्थानों में जाके क्रीड़ा करता था; कभी बरफ का मन्दिर बनवाके उसमें रहता था और कभी रत्नमणि के जड़े हुए स्थानों में शय्या विछावाके विश्राम करता था । निदान इसी प्रकार दोनों दूर और निकट के ठाकुरद्वारों और तीर्थों में जाके क्रीड़ा करते और राजसी और सात्त्विकी स्थानों में विचरते थे । वे दोनों परस्पर श्लोक भी बनाते थे एक पद कहे दूसरा उसको श्लोक करके उत्तर दे और श्लोक भी ऐसे पढ़ें कि पढ़ने में तो संस्कृत परन्तु समझने में सुगम हो । इसी प्रकार दोनों का परस्पर अति स्नेह था । एक समय रानी ने विचार किया कि राजा मुझको अपने प्राणों की नाईं प्यारे और बहुत सुन्दर हैं इसलिये कोई ऐसा यत्न, यज्ञ वा तप-दान करूँ कि किसी प्रकार इनकी सदा युवावस्था रहे और अजर अमर हो इसका और मेरा कदाचित् वियोग न हो । ऐसा विचार कर उसने ब्राह्मणों, ऋषीश्वरों और मुनीश्वरों से पूछा कि हे विप्रो ! नर किस प्रकार अजर-अमर होता है ? जिस प्रकार होता हो हमसे कहो ? विप्र बोले, हे देवि ! जप, तप आदि से सिद्धता प्राप्त होती है परन्तु अमर नहीं होता । सब जगत् नाशरूप है इस शरीर से कोई स्थिर नहीं रहता । हे रामजी ! इस प्रकार ब्राह्मणों से सुन और भर्त्ता के वियोग से डरकर रानी विचार करने लगी कि भर्त्ता से मैं प्रथम मरूँ तो मेरे बड़े भाग हों और सुखवान् होऊँ और जो यह प्रथम मृतक हो तो वही उपाय करूँ जिससे राजा का जीव मेरे अन्तःपुर में ही रहे-
उत्पत्ति प्रकरण । १७३
बाह्य न जावे—और मैं दर्शन करती रहूँ। इसमें मैं सरस्वती की सेवा करूँ। हे रामजी! ऐसा विचार शास्त्रानुसार तपरूप सरस्वती का पूजन करने लगी। निदान तीन रात्र और दिनपर्यन्त निराहार रह चतुर्थदिन में व्रतपारण करे और देवताओं, ब्राह्मणों, पण्डितों गुरु और ज्ञानियों की पूजा करके स्नान, दान, तप, ध्यान नित्यप्रति कीर्त्तन करे पर जिस प्रकार आगे रहती थी उसी प्रकार रहे भर्त्ता को न जनावे। इसी प्रकार नेमसंयुक्त क्लेश से रहित तप करने लगी। जब तीन सौ दिन व्यतीत हुए तब प्रीतियुक्त हो सरस्वती की पूजा की और वागीश्वरी ने प्रसन्न होकर दर्शन दिया और कहा, हे पुत्रि! तूने भर्त्ता के निमित्त निरन्तर तप किया है, इससे मैं प्रसन्न हुई, जो वर तुझे अभीष्ट हो सो माँग। लीला बोली, हे देवि! तेरी जय हो। मैं अनाथ तेरी शरण हूँ मेरी रक्षा करो। इस जन्म को जरारूपी अग्नि जो बहुत प्रकार से जलाती है उसके शान्त करने को तुम चन्द्रमा हो और हृदय के तम नाश करने को तुम सूर्य हो। हे माता! मुझको दो वर दो—एक यह कि जब मेरा भर्त्ता मृतक हो तब उसका पुर्यष्टक बाह्य न जावे अन्तःपुर ही में रहे और दूसरा यह कि जब मेरी इच्छा तुम्हारे दर्शन की हो तब तुम दर्शन दो। सरस्वती ने कहा ऐसा ही होगा। हे रामजी! ऐसा वरदान देकर जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजके लीन होते हैं वैसे ही देवी अन्तर्धान हो गई और लीला वरदान पाकर बहुत प्रसन्न हुई। कालरूपी चक्र में क्षणरूपी आरे लगे हुए हैं और उसकी तीनसौ साठ कीलें हैं वह चक्र वर्ष पर्यन्त फिरकर फिर उसी ठौर आता है। ऐसे कालचक्र के वर्ग से राजा पद्म रणभूमि में घायल होकर घर में आकर मृतक हो गया। पुर्यष्टक के निकलने से राजा का शरीर कुम्हिला गया और रानी उसके मरने से बहुत शोकवान हुई। जैसे कमलिनी जल बिना कुम्हिला जाती है वैसे ही उसके मुख की कान्ति दूर हो गई और विलाप करने लगी। कभी ऊँचे स्वर में रुदन करे और कभी चुप रह जावे। जैसे चकवे के वियोग से चकवी शोकवान होती है और जैसे सर्प की फुत्कार लगने से कोई मूर्च्छित होता है वैसे ही राजा के वियोग से लीला मूर्च्छित