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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ५८६

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष स्तन थे। उन स्तनों में चारों वेदों और शास्त्रों के अर्थरूपी दूध निकलता था। निदान जगत् की सब मर्यादा मुझको उसमें दिखाई दी। उसके नृत्य करने से ब्रह्माण्ड और अस्ताचल आदि पर्वत तृणों की नाईं नृत्य करते थे और सब कुछ उलटपलट होता दिखता था। उसके शरीर में नीचे आकाश ऊपर पृथ्वी थी। तारामण्डल सिद्ध, देवता, विद्याधर, गन्धर्व, किन्नर, दैत्य, स्थावर, जङ्गम सब उस शरीर में दृष्टिगोचर होता था—मानो सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों का आदर्श हो। भुजाओं के उछलने से चन्द्रमा की नाईं नखों का प्रकाश होता था। मन्दराचल, उदयाचल पर्वत कानों के भूषण से और हिमालय पर्वत बरफ के कण के समान दिखता था।

हे राम ! इस प्रकार उस देवी के शरीर में मुझको अनन्त सृष्टि दीखी। कहीं इकट्ठी और कहीं भिन्न-भिन्न, कहीं एक ही सी चेष्टा करे और कहीं भिन्न-भिन्न चेष्टा करे। मानों ब्रह्माण्डरूपी रत्नों का डब्बा है। हे राम ! जब मैं संकल्प-सहित देखता, तब मुझको सृष्टि दृष्टिगत होती और जब आत्मा की ओर देखता, तब केवल आत्मरूप ही दिखता और कुछ न दिखता। संकल्पदृष्टि से सम्पूर्ण जगत् नृत्य करता देख पड़ता, पर ऐसी सामर्थ्य किसी की न दिखती कि नृत्य न करे। जगत् की उत्पत्ति, स्थित और प्रलय सब उसी में दिखते और सम्पूर्ण क्रिया उसी से होती दिखतीं। उसी में सिद्ध, देवता, गन्धर्व, अप्सरा विमान पर आरूढ़ फिरते और नक्षत्रों के चक्र फिरते—मानों ब्रह्माण्ड फिर उदय हुए हैं। जब मैं फिर आत्मदृष्टि से देखता, तब ब्रह्मस्वरूप भासता और संकल्पदृष्टि से जगत् भासित होता। वह चित्तकला, जो संकल्परूप है उसमें सभी दिखते। हे राम ! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा आदि सब उसी में दृष्टिगत होते थे। जैसे मच्छर वायु से उड़ते हैं, वैसे ही अनन्त सृष्टि उसके शरीर में उड़ती दृष्टिगत होती। इससे मुझे महान् आश्चर्य हुआ। वह भैरव था और यह भैरवी उसकी शक्ति थी। दोनों मुझको विशालकाय देख पड़े। यह नित्य शक्ति सर्वात्मा थी और परमात्मा की क्रियाशक्ति सब विश्व को अपने

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आपमें जानती थी। जैसे समुद्र सब तरङ्गों को अपने में अपना रूप जानता है, वैसे ही सब ब्रह्माण्ड को वह अपने में अपना रूप जानती थी। वह तो सदाशिव से भी बड़े अहंकार को धारण किये थी, मानों सब ब्रह्माण्ड की माला कण्ठ में डाले है और यमादिक सब उसकी मर्यादा हैं।

हे राम! इस प्रकार मैंने रुद्र और काली भवानी को देखा। रुद्र के शिर पर जो जटा थी, वे मोर की पंख की नाईं थीं। काली को मैंने देखा कि नाना प्रकार के मृग उसके साथ हैं और वह डम-डम शब्द करती है। यह शब्द भी वह करती थी—"दिग्गंदिग्गं तुदिग्गं पंचमना वह संमंप्रलये नियतुयत्रिषंत्रो चीत्त्वं त्रीपलपलुमं पनुपं सुमंप मषमभिश्रु ही गुंहीगुंही उगुभियगुं दलुमददारी मीदातंदर्ता।" हे राम! इस प्रकार के शब्द करती हुई वह शमशानों में नृत्य करती थी। हे राम! ऐसी देवी तुम्हारी सहायक हो, जो सर्वशक्ति परमात्मा है और सब ब्रह्माण्ड उसके आश्रय है। क्षण में वह अंगुष्ठप्रमाण हो जाती थी और क्षण में बड़े दीर्घ आकार धारण करती थी। सब जगत् में जो क्रिया होती है, वे उसके आश्रय से होती है। कहीं उत्पत्ति होती है, कहीं युद्ध होते हैं। ऐसी नाना प्रकार की क्रिया उस देवी के आश्रय से होती हैं। जैसे आइने में प्रतिबिम्ब होता है, वैसे ही उस देवी में क्रिया होती हैं।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे देवीरुद्रोपाख्यानवर्णनन्नाम शताधिकषषण्णवतितमसर्गः ॥ १६६ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन्! यह जो तुमने रुद्र और कालिका का वर्णन किया, सो वे कौन थे? महाप्रलय में तो कुछ नहीं रहता। उनके शरीर में तुमने सृष्टि कैसे देखी और महाप्रलय होकर उनके शरीर में सृष्टि ने कैसे प्रवेश किया? उस काली के हाथ में शस्त्र क्या थे? कहाँ से आई थी और कहाँ गई? उसका आकार क्या था? वशिष्ठजी बोले, हे राम! न कोई रुद्र है, न काली है, न कोई पुरुष है, न कोई स्त्री है, न कोई नपुंसक है, न पुरुष। मिलकर कुछ नहीं हुआ है। न ब्रह्माण्ड है और न पिण्ड है केवल चिदाकाश है और संकल्प से उपजे सब

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

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आकार भासित होते हैं। जैसे स्वप्न में आकार भासित होते हैं वैसे ही वे आकार भी भासित होते हैं। वास्तव में केवल चिदाकाश ज्यों का त्यों है। हे राम! आत्मपद अनन्त, चैतन्य, सत्य, प्रकाशरूप, अविनाशी और अपने आपमें स्थित है। रुद्रदेव का आकार जो दिखा था, सो वह चैतन्य आत्मा-ही ऐसे होकर भासित हुआ था-कोई और आकार न था। जैसे सुवर्ण ही भूषण होकर दिखता है, वैसे ही परमदेव चिदाकाश ऐसे होकर भासित हुआ था, क्योंकि वह चैतन्यस्वरूप है। जैसे मधुरता पौड़े का स्वरूप है, वैसे ही आत्मा का स्वरूप चैतन्य है। हे राम! चैतन्यसत्ता अपने स्वरूप को नहीं त्यागती, आकार होकर भासित होती है और सदा अपने आपमें स्थित है। जैसे पौड़े के रस में मधुरता न हो तो उसको कोई रख नहीं सकता, वैसे ही आत्मसत्ता में चेतनता न हो तो उसे चैतन्य कोई न कहे। जो आत्मा चेतनता को त्यागे तो परिणामी हो और चैतन्य न कहावे; परन्तु वह तो सदा आप अपने स्वभाव में स्थित है और किसी और अवस्था को नहीं प्राप्त हुआ। इसी से कहा कि जो कुछ भासित होता है, वह आत्मा का किञ्चन है।

हे राम! जैसे पौड़े के रस में मधुरता होती है, वैसे ही आत्मा में चेतनता है। चैतन्यमात्र में चेतनता लक्षण चेतनतारूप रहता है, इससे यह जगत् भावरूप है जो शुद्धचिन्मात्र में चित्त का उत्थान न होता तो जगद्भाव न लखाता। आत्मसत्ता दोनों अवस्थाओं में सदा ज्यों की त्यों है-जैसे वायु जब स्पन्दित होता है, तब उसका स्पर्शरूप लक्षण प्रतीत होता और जब निस्पन्द होता है, तब उसमें कोई शब्द नहीं प्रवेश कर सकता, पर वायु दोनों अवस्थाओं में तुल्य है, वैसे ही शुद्ध चैतन्य में किसी शब्द का प्रवेश नहीं; पर चेतननाभाव में है और आत्मसत्ता सदा एकरस है-इसमें वास्तव में यह जगत् ही नहीं है। हे राम! आदि, मध्य, अन्त, जगत्, आकाश, कल्प, महाकल्प, उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय, जन्म, मरण, सत्, असत्, प्रकाश, अन्धकार, पण्डित, मूर्ख, ज्ञानी, अज्ञानी, नामरूप, कर्मरूप, अवलोक, मनस्कार,

५६२ योगवाशिष्ठ

विद्या, अविद्या, दुःख, सुख, बन्धन, मोक्ष, जड़, चेतन, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, आना, जाना, जगत्, अजगत्, कुछ नहीं है बढ़ना, घटना, मैं, तुम, वेद, शास्त्र, पुराण, मन्त्र, आकार, उकार, मकार, जय, नाम आदिक स्थावर-जङ्गम सब जगत् ब्रह्मस्वरूप है, दूसरी वस्तु कुछ नहीं। जैसे समुद्र में तरङ्ग, बुलबुले और आवर्त सब जलरूप हैं, वैसे ही सब ब्रह्मस्वरूप है। ब्रह्म से भिन्न जगत् कुछ वस्तु नहीं। जैसे स्वप्न में जो पर्वत दिखते हैं, वे अनुभव से भिन्न नहीं होते, वैसे ही यह जगत् ब्रह्म से भिन्न नहीं। जैसे सूर्य की किरणों में जल जान पड़ता है, वैसे ही आत्मसत्ता जगत् रूप होकर भासित होती है।

हे राम! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, वरुण, कुबेर, यम, चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, जल, पृथ्वी, वायु, आकाश आदि जितने शब्द हैं, वे सब ब्रह्मसत्ता ही से होकर स्थित हुए हैं, परन्तु सत्ता अपने आपमें ज्यों की त्यों है, कभी परिणाम को नहीं प्राप्त हुई और वही सत्ता सब की आत्मा है। जैसे समुद्र अपने तरङ्गभाव को त्यागे तो अपने सौम्यभाव में स्थित होता है; वैसे ही ब्रह्मसत्ता फुर्ने को त्यागे तो अपने स्वभाव में स्थित हो, जो अनामय है अर्थात् दुःखों से रहित, परमशान्तिरूप, अनन्त और निर्विकार है। जब इस प्रकार बोध हो, तब जीव उस ब्रह्मसत्ता को प्राप्त हो। बोध, अबोध, विधि, निषेध भी वही है। जैसे जल और समुद्र की संज्ञा कही है और तरङ्ग शब्द कहने में विलक्षण भासित होता है, पर जब जल तरङ्ग-बुद्धि को त्यागे, तब केवल समुद्र-रूप है, वैसे ही यह जीव जब अपने जीवत्वभाव को त्यागे, तब आत्म-रूपी समुद्र को प्राप्त हो, अर्थात् जब दृश्य का सम्बन्ध त्याग करे, तब आत्मा हो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अन्तरगोपाख्यानवर्णनं नाम शताधिकसप्तनवतितमस्सर्गः ॥ १६७ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! तुमसे मैंने जो चिदाकाश कहा है, वह परमचिदाकाश है और सदा अपने आपमें स्थित है। हे राम! शुद्ध चिदाकाश जो मैंने तुमसे कहा है, वही यह रुद्ररूप है और वही नृत्य

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ५६३

करता था। वहाँ आकार कोई न था, केवल चिद्घनसत्ता थी और वही ऐसे होकर किञ्चन होती थी। हे राम! जब मैं आत्मदृष्टि से देखता था, तब मुझको चिदाकाशरूप ही भासित होता था। हे राम! जो मेरे जैसा हो, वही वैसा रूप देख सकता है और नहीं देख सकता। हे राम! जिसका नाम कृतान्त है वही रुद्र और वही भैरव है। वही कृतान्त की मूर्ति नृत्य करके अन्तर्धान हो गई। वास्तव में वह रूप मायामात्र था। यह चैतन्यसत्ता के आश्रय नाचते थे। हे राम! जैसे सोने में भूषण हैं, परन्तु वे सोने के बिना नहीं होते, वैसे ही चेतनता किञ्चन से जगत् भासित होता है और फिर वही प्रमाद से आधिभौतिक हो जाता है। वास्तव में शुद्ध चिदाकाशरूप ही है और चेतनता से वही जगतरूप दिखता है। राम ने पूछा, हे भगवन्! प्रथम तो आपने कहा कि अद्वैत आत्मतत्त्व में यह जगत् प्रमाद से कल्पित है और जो है तो कल्प के अन्त में नाश हो जाता है, केवल अद्वैतसत्ता रहती है, अब फिर आप-ही कहते हो कि चैत्यता से जगतरूप भासता है। अद्वैत में चैत्यता कैसे हुई और कौन चेतनेवाला हुआ? प्रलय के अनन्तर काली क्यों-कर भासित हुई? वशिष्ठजी बोले, हे राम! न कोई चैत्य है और न कोई चेतता है केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है, जो चैतन्यघन परम निर्मल और शान्तरूप है। उसी को शिवतत्त्व भी कहते हैं। वही शिवतत्त्व रुद्र आकार को धारण किये देख पड़ा था, दूसरा कुछ नहीं—केवल परम चिदाकाश है। वही चिदाकाश आकार रखकर भासित होता है। पर वास्तव में कोई आकार नहीं हुआ। न भैरव है, न भैरवी है, न काली है, न यह जगत् है। सब मायामात्र है।

जैसे स्वप्न में आत्मसत्ता चैत्यता के कारण जगतरूप दिखती है, पर स्वरूप से न कुछ चैत्यता है और न जगत् है, आत्मसत्ता ही अपने आप में स्थित है, वैसे ही उस जगत् को भी जानो। कुछ और नहीं हुआ, अद्वैतसत्ता ही है। इससे चैत्य और चेतनेवाला सब भ्रम से भासते हैं; आत्मा में ये नहीं उपजे, केवल स्वच्छ चिदाकाश है। मुझ-को तो सदा वही भासता है, पर अज्ञानी को नाना प्रकार का जगत्

५६४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

भानता है। आत्मा सदा एक है किञ्चन से उसमें आकार दिखते हैं। भैरव और काली सब निराकार हैं। भ्रान्ति में आकार प्रतीत होते हैं। जैसे मनोराज्य में युद्ध भासते हैं और जैसे कथा में अर्थ भासते हैं, वे असत्य ही संकल्प-विलास से हैं, वैसे ही चिदात्मा में यह जगत् भासित होता है। जैसे आकाश में तरुवर दिखते हैं, वैसे ही ये आकार दिखते हैं। हे राम ! ये जो जगत् प्रलय और महाप्रलय आदि शब्द हैं, उनका नाश करने के लिए मैं तुमको कहता हूँ। आत्मा एक अद्वैत चेतन्य है, उस चेतनता का अभाव कभी नहीं होता। वह अपने आपमें स्थित है और किञ्चन है। जैसे सूर्य की किरणें किञ्चनरूप होती हैं और उनमें जल भासता है, वैसे ही चित्त का किञ्चन जगत् भासता है। वही महाप्रलय में रुद्र और भैरवी होकर भासता है। वास्तव में न कुछ रुद्र है और न काली है, सब आत्मा ही है।

हे राम ! जो कुछ कहना-सुनना होता है सो वाच्य तथा वाचक से होता है, आत्मा में कहना और सुनना कुछ नहीं। वही चिदाकाश रुद्र संकल्प में नृत्य करता था। जैसे सुवर्ण भूषण होकर भासित होता है, वैसे ही चिदाकाश संकल्प में आकार होकर भासित होता है, दूसरा कुछ नहीं बना। मैं, तुम और जगत्, चेत्य और अचेत्य सब वही रूप है; उसमें कोई शब्द नहीं फुरा। जैसे स्वप्न में नाना प्रकार के शब्द भासित होते हैं सो कुछ वास्तव नहीं—पत्थर की नाईं मौन हैं—वैसे ही जाग्रत् जगत् में भी जितना शब्द होता है सो सब स्वप्न है; कुछ हुआ नहीं। केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है। जैसे आकाश अपनी शून्यता में स्थित है, वैसे ही आत्मसत्ता अपने आप भाव में स्थित है, जहाँ न एक है, न द्वैत है, न सत्य है, न असत्य है, न चित्त है, न चेत है, न मौन है, न अमौन है और न कोई चेतनेवाला है। चेत के अभावसा केवल अचेत चिन्मात्र आत्मसत्ता निर्विकल्परूप स्थित है। हे राम ! सबसे बड़ा शास्त्र का सिद्धान्त यही है; इस दृष्टि से तुम मौन में स्थित हो। हे राम ! सब सिद्धान्तों की समता है निर्विकल्प होना। जैसे पत्थर की शिला मौन होती है, वैसे ही चेत्य से रहित रहकर ही

❈ निर्वाण प्रकरण ❈ ५६५

जो कुछ प्रत्यक्ष आचार प्राप्त हो, उसमें वृत्त होना और सदा आत्म-निश्चय रखना, इसी का नाम परम मौन है। सब क्रिया होती रहें, पर अपने से कुछ न देखना—जैसे नट स्वाँग भरता है और उसके अनुसार विचरता है, परन्तु निश्चय उसका आदि शरीर में ही होता है, उससे वह चलायमान नहीं होता, वैसे ही जो कुछ अनिच्छित प्राप्त हो, उसको यथाशास्त्र करे, परन्तु अपने निर्गुण निष्क्रियस्वरूप में चलायमान न हो, उसी अद्वैत स्वरूप में स्थित रहे।

राम ने पूछा, हे भगवन्! वह रुद्र क्या था और वह काली शक्ति क्या थी? उनके अङ्गों का बढ़ना-घटना और नृत्य करना क्या था और वस्त्र क्या थे, सो कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे राम! शिवतत्त्व ही आकार होकर भासता है और कोई आकार नहीं। वह चिन्मात्र, अमल विद्या और अविद्या के कार्य से रहित, शान्त और अवाच्यपद है। यह संज्ञा भी संकल्प में तुमसे कही है, आत्मवेत्ता आत्मपद को अवाच्यपद कहते हैं, तथापि मैं कुछ कहता हूँ। हे राम केवल आत्मतत्त्वमात्र जो चिदाकाश है, वही शिव भैरव है। उसी के चमत्कार का नाम चित्तशक्ति है। उसी का नाम काली है। उस काली, आत्मा और शिवरूप में कुछ भेद नहीं। जैसे पवन और स्पन्दन में और अग्नि तथा उष्णता में कुछ भेद नहीं होता, वैसे ही चित्तकला और आत्मा में कुछ भेद नहीं। जैसे पवन निष्पन्द होता है, तब उसका लक्षण नहीं होता, अवाचकरूप होता है, और जब स्पन्दन होता है, तब उसका लक्षण भी होता है और उसमें शब्द प्रयोग होता है वैसे ही चित्तशक्ति में उसका लक्षण होता है। उसके अनेक नाम हैं। उसी का नाम स्पन्दन और इच्छा है। उसी को चैत्योन्मुखत्व से वासना कहते हैं। उसी के स्वाद की इच्छा से जब चित्तसंवित् में वासना फुरती है, तब उसका नाम वासना करने वाला वासक कहलाता है—फिर आगे दृश्य होता है। जब त्रिपुटी हुई अर्थात् वासना, वासक और वास्य हुए, तब वासक को जीव कहते हैं—जो जीवत्व भाव लेकर स्थित होता है। तब इसको यह भावना होती है कि मैं जीव हूँ और मेरा नाश कभी

५६६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

न हो, उस इच्छा में जीव कहलाता है । चित्शक्ति की जो ऐसी संज्ञा होती है, वह स्पन्दन से होती है । पर शिवतत्त्व अस्फुरण है और अचेत शक्ति में फुरने की नाईं स्थित है ।

जैसे सूर्य की किरणों में जल नहीं होता और हुए की नाईं भासता है, वैसे ही यह जगत् है नहीं और हुए की नाईं दिखता है, इससे उसको यह संज्ञा देते हैं । परमात्मा की क्रियाशक्ति काली प्रथम तो कारणरूप-प्रकृति है और उसी मे सब हैं—उसी मे प्रकृतिरूप है । वह विकृति अर्थात् किसी का कार्य नहीं है । महत्तत्त्व, पञ्चभूत, और अहंकार ये सात प्रकृति—विकृत हैं—अर्थात् कार्य भी हैं और कारण भी हैं । कार्य आदि देवी के हैं और कारण षोडश के हैं—पञ्चज्ञान इन्द्रियाँ, पञ्चकर्म इन्द्रियाँ, पञ्चप्राण और एक मन । इनके सप्तदश कार्य हैं । षोडश विकृति हैं अर्थात् कार्यरूप हैं, कारण किसी के नहीं । सत्रहवाँ पुरुष जो परमात्मा का अंश है वह अद्वैत, अचिन्त्य और चिन्मात्र है । न किसी का कारण है और न कार्य अपने आपमें स्थित है । इससे कारणकार्य में जितनी द्वैतकल्पना है, वह सब चित्तशक्ति में स्थित है । जब यह निस्पन्द होती है, तब तत्त्वरूप शिवपद में निर्वाण हो जाती है और कारण-कार्यरूपी सब भ्रम मिट जाता है, केवल आकाशवत् शेष रहता है । वह शुद्ध, अद्वैत, अचेत चिन्मात्र सदा अपने आप-भाव में स्थित है और उसकी स्पन्दनरूप क्रियाशक्ति की ये सब संज्ञा हैं । प्रथम तो सबका कारणरूप प्रकृति है, जो शोष है, अर्थात् जैसे बड़वाग्नि समुद्र को सुखाती है, वैसे ही वह जगत् को सुखाती है । वह सिद्ध है, अर्थात् साधक उसे आश्रय करके सेवते हैं । वह जयन्ती है, अर्थात् उसकी जय है । वह चण्डिका है अर्थात् उसके क्रोध से जगत् का प्रलय होता है और संसार डरता है । वह वीर्य है, अर्थात् उसका वीर्य अनन्त है । वह दुर्गा है, अर्थात् उसका रूप जानना कठिन है वह गायत्री है, अर्थात् उसके पाठ से संसार समुद्र से रक्षा होती है । वह सावित्री है, अर्थात् जगत् का पालन करती है । वह कुमारी अर्थात् कोमलस्वभाव है । वह गौरी अर्थात् गौर अङ्गवाली है । वह शिवा अर्थात्

उपशम प्रकरण । ६०५

हे महाभाग ! जो प्रपञ्च तुमको दृष्ट आता है वह जगद्भ्रम है, परमार्थ में न कोई जगत् है, न कोई मित्र है और न कोई बान्धव है जैसे मरु-स्थल में बड़ी नदी भासती है परन्तु उसमें जल का एक बूंद भी नहीं होता तैसे ही वास्तव में जगत् कुछ नहीं। बड़े बड़े लक्ष्मीवान् जो छत्र चामरों से सम्पन्न शोभते हैं वे विपर्यय होंगे क्योंकि यह लक्ष्मी तो चञ्चलस्वरूप है कोई दिनों में अभाव हो जाती है। हे भाई ! तू परमार्थ दृष्टि से विचार देख, न तू है और न जगत् है, यह दृश्य भ्रान्तिरूप है इसको हृदय से त्याग। इसी माया दृष्टि से बार बार उपजता है और विन-शता है। यह जगत् अपने संकल्प से उपजा है, इसमें सत्य पदार्थ कोई नहीं। अज्ञानरूपी मरुस्थल में जगतरूपी नदी है और उसमें शुभ-अशुभ-रूपी तरङ्ग उपजते और फिर नष्ट हो जाते हैं।

इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे पावनबोधवर्द्धन- न्नामैकोनविंशतितमसर्गः ॥ १९ ॥

पुण्यक बोले, हे भाई ! तेरे कई माता और कई पिता हो होकर मिट गये हैं। जैसे वायु में धूल के कणके उड़ते हैं तैसे बान्धव हैं, न कोई मित्र है, और न कोई शत्रु है सम्पूर्ण जगत् भ्रान्तिरूप है और उसमें जैसी भावना स्फुरती है, तैसे ही हो भासती है। बान्धव, मित्र, पुत्र आदिकों में जो स्नेह होता है सो मोह में कल्पित है और अपने मन से माता पितादिक संज्ञा कल्पी है। जगत् प्रपञ्च में जैसे संज्ञा कल्पता है तैसे ही हो भासती है, जहाँ बान्धव की भावना होती है वहाँ बान्धव भासता है और जहाँ और की भावना होती है वहाँ और ही हो भासता है। जो अमृत में विष की भावना होती है तो अमृत भी विष हो जाता है सो कुछ अमृत में विष नहीं भावना रूप भासता है, तैसे ही न कोई बान्धव है और न कोई शत्रु है, सर्वदाकाल विद्यमान एक सर्वगत सर्वात्मा पुरुषस्थित है उसमें अपने और और की कल्पना कोई नहीं और जो कुछ देहादि हैं वे रक्त मांसादि के समूह से रचे हैं उनमें अहंसत्ता कौन है और अहंकार, चित्त, बुद्धि और मन कौन है ? परमार्थदृष्टि से यह तो कुछ नहीं है, विचार किये से न तू है, न मैं हूँ, यह सब मिथ्या ज्ञान से भासते हैं। एक अनन्त चिदाकाश आत्मसत्ता सर्वदा है उसमें

६०६ | योगवाशिष्ठ ।

तेरी माता कौन है और पिता कौन है, यह सब मिथ्याभ्रम से भावना है वास्तव में कुछ नहीं। शरीर से देखिये तो जो कुछ शरीर है वह पञ्च-तत्त्वों से रचा जडरूप है, उनमें चैतन्य एकरूप है और अपना और पराया कौन है। इस भ्रमदृष्टि को त्याग के तत्त्व का विचार करो, मिथ्या भावना करके माता पिता के निमित्त क्यों शोकवान हुए हो ? जो सम्यकदृष्टि का आश्रय करके उस स्नेह का शोक करते हो तो और जन्मों के बान्धव और मित्रों का शोक क्यों नहीं करते ? अनेक पुष्पों और लताओं में तू मृगपुत्र हुआ था, उस जन्म के तेरे अनेक मित्र बान्धव थे उनका शोक क्यों नहीं करता ? अनेक कमलों संयुक्त तालाब में हाथी विचरते थे वहाँ तू हाथी का पुत्र था, उन हस्ति बान्धवों का शोक क्यों नहीं करता ? एक बड़े वन में वृक्ष लगे थे और तेरे साथ फल पत्र हुए थे और अनेक वृक्ष तेरे बान्धव थे उनका शोक क्यों नहीं करता ? फिर नदी तालाब में तुम मच्छ हुए थे और उनमें मत्स्ययोनि के बान्धव थे। उनका शोक क्यों नहीं करता ? दशार्णव देश में तू काक और वानर हुआ, तुषारदेश में तू गजपुत्र हुआ और फिर वनकाक हुआ, बङ्गदेश में तू हाथी हुआ, विराजदेश में तू गर्दभ हुआ, मालवदेश में सर्प और वृक्ष हुआ और बङ्गदेश में गृद्ध हुआ, मालवदेश के पर्वत में पुष्पलता हुआ और मन्दराचल पर्वत में गीदड़ हुआ, कोशलदेश में ब्राह्मण हुआ, बङ्गदेश में तीतर हुआ, तुषारदेश में घोड़ा हुआ, कीट अवस्था में हुआ, एक नीच ग्राम में बछरा हुआ और पन्द्रह महीने वहाँ रहा, एक वन में तड़ाग था वहाँ कमलपुष्प में भ्रमर हुआ और जम्बू-द्वीप में तू अनेक बार उत्पन्न हुआ है। हे भाई ! इस प्रकार वासनापूर्वक वृत्तान्त मैंने कहा है। जैसी तेरी वासना हुई है तैसे तूने जन्म पाये हैं। मैं सूक्ष्म और निर्मलबुद्धि से देखता हूँ कि ज्ञान बिना तूने अनेक जन्म पाये हैं। उन जन्मों को जानके तू किस किस बान्धव का शोक करेगा और किसका स्नेह करेगा ? जैसे वे बान्धव थे तैसे ही यह भी जान ले। मेरे भी अनेक बान्धव हुए हैं, जिन जिनमें मैंने जन्म पाया है और जो जो बीत गये हैं तैसे ही सब मेरे स्मरण में आते हैं और अब मुझको

उपशम प्रकरण । ६०७

अद्वैत ज्ञान हुआ है। हे भाई! त्रिगगदेश में मैं तीता हुआ, तड़ाग के तट पर हंस हुआ, पक्षियों में काक हुआ, बैल हुआ, बङ्गदेश में वृक्ष हुआ, इन वन पर्वत में बड़ा उष्ट्र होकर विचरा, पौण्ड्रदेश में गजा हुआ और मह्यानल पर्वत की कन्दरा में भेडिया हुआ जहाँ तू मेरा बड़ा भाई था। फिर मैं दश वर्ष मृग होकर रहा, पाँच महीने तेरा भाई होकर मृग रहा सो तेरा बड़ा भ्राता हूँ। इस प्रकार ज्ञान से रहित वासना कर्म के अनुसार कितने जन्मों में हम भ्रमते फिरे हैं। मैंने तुझसे सब कहा है और सब मुझको स्मरण है। इस प्रकार जगतजाल की स्थिति मैंने तुझसे कही है। तेरे और मेरे अनेक जन्म के माता, पिता, भाई और मित्र हुए हैं उनका शोक तू क्यों नहीं करता? यह संसार दुःख सुख रूप अप्रमाण भ्रमरूप है, इस कारण सबको त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो जाओ। यह सब प्रपञ्च भ्रान्तिरूप है, इनकी वासना त्याग जब अहंकार वासना को त्याग करोगे तब उस पद को प्राप्त होगे जहाँ ज्ञानवान प्राप्त होता है। इससे हे भाई! यह जो जीवभाव अर्थात् जन्म, मरण, ऊर्ध्व जीना और फिर गिरना व्यवहार है उसमें बुद्धिमान शोक-वान् नहीं होते, वे दुःख की निवृत्ति के अर्थ अपना स्वरूप स्मरण करते हैं जो भाव, अभाव और जरामरण बिना नित्य शुद्ध परमानन्द है। तू उसको स्मरणकर, और मूढ़ मत हो, उसको न सुख है, न दुःख है, न जन्म है, न मरण है, न माता है, न पिता है, तू एक अद्वैत-रूप आत्मा है और किसी से सम्बन्ध नहीं रखता, क्योंकि कुछ भिन्न नहीं है, हे साधो! यह जो नाना प्रकार का विषय संयुक्त यन्त्र है इसको अज्ञानरूप नटुआ ग्रहण करता है और इष्ट अनिष्ट में बन्धाय-मान होता है। जो आत्मदर्शी पुरुष हैं उनको क्रिया स्पर्श नहीं करती, वे केवल सुखरूप हैं और जो अज्ञानी हैं वे देह इन्द्रियों के गुणों में तद्रूप हो जाते हैं और इष्ट अनिष्ट से सुखदुःख के भोक्ता होते हैं। जो ज्ञानवान् पुरुष हैं वे देखनेवाले साक्षीभूत होते हैं, करते हुए भी अकर्तारूप हैं और इष्ट अनिष्ट की प्राप्ति में राग द्वेष रहित हैं। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब आ पड़ता है परन्तु दर्पण भले बुरे रंग से रञ्जित नहीं

६०८ | योगवाशिष्ट ।

होता तैसे ही ज्ञानवान् राग द्वेष में रञ्जित नहीं होता । अब इच्छा और भय कल्पना से रहित स्वच्छ आत्मसत्ता सदा प्रफुल्लितरूप है और पुत्र, कलत्र, बान्धवों के स्नेह से रहित है और उसका हृदयकमल सर्व इच्छा और अहं मम से रहित अपने स्वरूप में सन्तुष्टवान् होता है । इससे मिथ्या देहादिकों की भावना को त्यागकर अपने नित्य, शुद्ध, शान्त और परमानन्दरूप में तू भी स्थित हो । तू तो परब्रह्म और निर्मलरूप है । इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे पावनबोधोनामविशांततमस्सर्गः ॥२०॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार पुण्यक ने पावन में बोध उपदेश किया तब पावन बोधवान् हुआ । तब दोनों ज्ञान के पारगामी और निरिच्छन्न आनन्दित पुरुष होकर चिरकाल पर्यन्त विचरते रहे और फिर दोनों विदेहमुक्त निर्वाण पद को प्राप्त हुए । जैसे तेल से रहित दीपक निर्वाण हो जाता है तैसे ही प्रारब्ध कर्म के क्षीण हुए दोनों विदेहमुक्त हुए । हे रामजी ! इसी प्रकार तू भी जान । जैसे वे मित्र, बान्धव, धना- दिक के स्नेह से रहित होकर विचरे तैसे ही तुम भी स्नेह से रहित होकर विचरो और जैसे उन्होंने विचार किया था तैसे ही तुम भी करो । इस मिथ्यारूप संसार में किसका इच्छा करें और किसका त्याग करें, ऐसे विचारकर अनन्त इच्छा और तृष्णा का त्याग करना, यही औषध है, तृष्णारूपी इच्छा का पालना औषध नहीं, क्योंकि पालने से पूर्ण कदा- चित् नहीं होती । जो कुछ जगत् है वह चित्त से उत्पन्न हुआ है और चित्त के नष्ट हुए संसार-दुःख नष्ट हो जाना है । जैसे काष्ठ के पाने से अग्नि बढ़ता जाता है और काष्ठ से रहित शान्त हो जाता है तैसे ही चित्त की चिन्तना से जगत् विस्तार पाता है और चिन्तना से रहित शान्त हो जाता है । हे रामजी ! ध्येय वासनावान त्यागोरूप रथ पर आरूढ़ होकर रहो, करुणा, दया और उदारतासंयुक्त होकर लोगों में विचरो और इष्ट अनिष्ट में राग द्वेष से रहित हो । यह ब्रह्मस्थिति मैंने तुमसे कही । निष्काम, निर्दोष और स्वच्छस्वरूप को पाकर फिर मोह को नहीं प्राप्त होता । परम आकाश ही इसका हृदयमात्र विवेक है और बुद्धि इसकी सखी है जिसके निकट विवेक और बुद्धि है वे परमव्यवहार करते भी संकट

उपशम प्रकरण । ६०६

को नहीं प्राप्त होते, इससे तुम परम विवेक और बुद्धि का संग लेकर जगत् में विचरोगे तब संकट और दुःख से मोहित न होगे । नाना प्रकार के दुःख, संकट, स्नेह आदिक विकाररूप जो समुद्र है उसके तरने के निमित्त एक अपना धैर्यरूपी बेड़ा है और कोई उपाय नहीं सो धैर्य क्या है-दृश्य जगत् मे वैराग्य और सत् शास्त्र का विचार । इन श्रेष्ठ गुणों के अभ्यास से आत्मपद की प्राप्ति होती है । वह आत्मपद त्रिलोकी के ऐश्वर्यरूपी रत्नों का भण्डार है । जो त्रिलोकी के ऐश्वर्य से भी नहीं प्राप्त होता, वह वैराग्य, विचार, अभ्यास और चित्त के स्थिर करने से होता है । जब तक मनुष्य जगत् कोष में उपजता है और मन तृष्णा-रूपी ताप से रहित नहीं होता तब तक कष्ट है और जब आत्मविवेक से मन पूर्ण होता है तब सब जगत् अमृतरूप भासता है । जैसे जूती के पहिरने से सब पृथ्वी चर्म से वेष्टितसी हो जाती है तैसे ही पूर्ण पद, इच्छा और तृष्णा के त्यागने से पाता है । जैसे शरदकाल का आकाश मेघों से रहित निर्मल होता है तैसे ही इच्छा से रहित पुरुष निर्मल होता है । जिन पुरुषों के हृदय में आशा फुरती है उनके वश हुए चित्त शून्य हो जाता है और जैसे अगस्त्य मुनि ने समुद्र को पान किया था तब समुद्र जल से रहित हो गया था तैसे ही आत्मजल से रहित समुद्रवत् चित्त शून्य हो जाता है । जिस पुरुष के चित्तरूपी वृक्ष में तृष्णारूपी चञ्चल मर्कटी रहती है उसको वह स्थिर होने नहीं देती और सदा शोभायमान होती है और जिसका चित्त तृष्णा से रहित है उस पुरुष को तीनों जगत् कमल की कली के समान हो जाते हैं योजनों के समूह गोपदवत् सुगम हो जाते हैं और महाकल्प अर्धनिमेषवत् हो जाता है । हे रामजी ! चन्द्रमा और हिमालय पर्वत भी ऐसा शीतल नहीं और केले का वृक्ष और चन्दन भी ऐसा शीतल नहीं जैसा शीतल चित्त तृष्णा से रहित होता है । पूर्णमासी का चन्द्रमा और क्षीरसमुद्र भी ऐसा सुन्दर नहीं और लक्ष्मी का मुख भी ऐसा नहीं जैसा इच्छा से रहित मन शोभायमान हो जाता है । जैसे चन्द्रमा की प्रभा को मेघ ढाँप लेता है और शुद्ध स्थानों को अपवित्र लेपन मलीन करता है तैसे ही अहंतारूपपिशाचिनी

६१०योगवासिष्ठ ।

पुरुषों को मलीन करती है । चित्तरूपी वृक्ष के बड़े बड़े टाम दिशा विदिशा में फैल रहे हैं सो आशारूप है, जब विवेकरूपी कुल्हाड़े से उनको काटेंगे तब अचित् पद की प्राप्ति होगी और तभी एक स्थानरूपी चित्त रहेगा अविवेक और अधैर्य तृष्णा शाखासंयुक्त है उनकी अनेक शाखा फिर होंगी इसलिए आत्मधैर्य को धरो कि चित्त की वृद्धि न हो । उत्तम धैर्य करके जब चित्त नष्ट हो जावेगा तब अविनाशी पद प्राप्त होगा । हे रामजी ! उत्तम हृदय क्षेत्र में जब चित्त की स्थित होती है तब आशारूपी दृश्य नहीं उपजने देती केवल ब्रह्मरूप शेष रहता है । तब तुम्हारा चित्त वृत्ति से रहित अचित्तरूप होगा तब मोक्षरूप विस्तृत पद प्राप्त होगा । चित्तरूपी उलूक पक्षी की तृष्णारूपी स्त्री है । ऐसा पक्षी जहाँ विचरता है वहाँ अमङ्गल फैलाता है । जहाँ उलूक पक्षी विचरते हैं वहाँ उजाड़ होता है विवेकादि जिससे रहित हो गये हैं ऐसे चित्त की वृत्ति से तुम रहित हो रहो । ऐसे होकर विचरोगे तब अचिन्त्य पद को प्राप्त होगे । जैसी जैसी वृत्ति फुरती है वैसा ही वैसा रूप जीव हो जाता है, इस कारण चित्त उपशम के निमित्त तुम वही वृत्ति धरो जिससे आत्म-पद की प्राप्ति हो । हे महात्मा पुरुष ! जिसको संसार के पदार्थों की इच्छा और ईषणा उपशम हुई है और जो भाव अभाव से मुक्त हुआ है वह उत्तम पद पाता है और जिसका चित्त आशारूपी फाँसी से बाँधा है वह मुक्त कैसे हो ? आशासंयुक्त कदाचित् मुक्त नहीं होता और सदा बन्धायमान रहता है ।

इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे तृष्णाचिकित्सोपदेशोनामेकविंशतितमसर्गः ॥ २१ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मैंने जो तुमको उपदेश किया है उसको बुद्धि में विचारो । रामजी बोले, हे भगवन् ! सर्वधर्मों के वेत्ता । तुम्हारे प्रसाद से जो कुछ जानने योग्य था वह मैंने जाना, पाने योग्य पद पाया और निर्मल पद में विश्राम किया, भ्रमरूपी मेघ से रहित शरत्काल के आकाशवत् मेरा चित्त निर्मल हुआ है, मोहरूपी अहंकार नष्ट हो गया है, अमृत से हृदय पूर्णमासी के चन्द्रवत् शीतल हुआ है और संशय-

उपशम प्रकरण। ६११

रूपी मेघ नष्ट हो गया है, परन्तु आपके वचनरूपी अमृत को पान करता मैं तृप्त नहीं होता। जिस प्रकार बलि को विज्ञानबुद्धि भेद प्राप्त हुआ है बोध की वृद्धि के निमित्त वह मुझसे ज्यों का त्यों कहिये। नम्रभूत शिष्यप्रति कहते हुए बड़े खेद नहीं मानते। वशिष्ठजी बोले, हे राघव ! बलि का जो उत्तम वृत्तान्त है वह मैं कहता हूँ, सुनो, उससे निरन्तर बोध प्राप्त होगा। हे रामजी ! इस जगत् के नीचे पाताल है। वह स्थान महाक्षीरसमुद्र की नाईं सुन्दर उज्ज्वल है और वहाँ कहीं महासुन्दर नागकन्या बिराजती हैं, कहीं विषधर सर्प, जिनके सहस्रशीश हैं बिराजते हैं, कहीं दैत्यों के पुत्र रहते और कट कट शब्द करते हैं, कहीं सुन्दर सुख के स्थान हैं, कहीं जीवों के परंपरा समूह नरकों में जलते हैं और कहीं दुर्गन्ध के स्थान हैं। सात पाताल हैं उन सबमें जीव स्थित हैं कहाँ रत्नों से खचित स्थान है, कहीं कपिलदेवजी, जिनके चरणकमलों पर देवता और दैत्य शीश धरते हैं, बिराजते हैं और कहीं सुगन्धित बाग लगे हैं। ऐसी दो भुजाओं से पाली हुई पृथ्वी में दानवों में श्रेष्ठ विरोचन का पुत्र राजा बलि रहता था जिससे सर्व देवताओं और विद्याधरों और किन्नरों को लीला करके जीता था और त्रिलोकी अपने वश की थी। सब देवताओं का राजा इन्द्र उसके चरण सेवन की वाञ्छा करता है, त्रिलोकी में जो जाति-जाति के रत्न हैं वे सब उसके विद्यमान रहते हैं और सब शरीरों की रक्षा करने और भावना के धर्मों के धरनेवाले विष्णुदेव द्वारपाल हैं। ऐरावत हाथी जिसके गण्ड-स्थल से मद झरता है उसकी वाणी सुन ऐसा भयवान् होता है जैसे मोर की वाणी सुनकर सर्प भयवान् होता है उसका ऐसा तेज था जैसे सप्तसमुद्रों का जल कुहीड़ शोष लेती है और जैसे प्रलयकाल के द्वादश सूर्यों से समुद्र सूखने लगता है। उसने ऐसे यज्ञ करे जिसके क्षीर घृत की आहुति का धुवाँ मेघ बादल होकर पर्वतों पर बिराजा। जिसकी दृढ़ दृष्टि देखकर कुलाचल पर्वत भी नम्रभूत होता था। जैसे फूलों से पूर्णलता नमती है तैसे ही लीला करके उसने भुवनों को विस्तार सहित जीता और त्रिलोकी को जीतकर दशकोटि वर्ष पर्यन्त राजा बलि

६१२ | योगवाशिष्ठ ।

राज्य करता रहा। राजा बलि ने युगों के समूह व्यतीत हुए देखे थे और अनेक देवता और दैत्य भी उपजते मिटते अनेक बार देखे थे। त्रिलोकी के अनेक भोग भी उसने भोगे थे। निदान उनसे उद्वेग पाकर सुमेरु के शिखर पर एक ऊंचे झरोखे में अकेला जा बैठा और संसार की स्थिति का चिन्तना करने लगा कि इस बड़े चक्रवर्ती राज्य से मुझको क्या प्रयोजन है ? यद्यपि त्रिलोकी का राज्य बड़ा है तो भी इसमें आश्चर्य क्या है। इसमें मैं चिरकाल भोग भोगता रहा हूँ परन्तु शान्ति न हुई। ये भोग उपजकर फिर नष्ट हो जाते हैं, इन भोगों से मुझे शान्ति सुख प्राप्त नहीं हुआ पर बारम्बार मैं वही कर्म और वही व्यवहार करता हूँ और दिन रात्रि वही क्रिया करने में लज्जा भी नहीं आती वही स्त्री आलिङ्गन करना, फिर भोजन करना, पुष्पों की शय्या पर शयन करना और क्रीड़ा करना, ये कर्म बड़ों को लज्जा के कारण हैं। वही निरस व्यवहार फिर करना जो एक बार निरस हुआ और उस काल में तृप्त करता है, फिर बारम्बार दिन दिन करते हैं। यह मैं मानता हूँ कि यह काम बुद्धिमानों को हँसने योग्य और लज्जा का कारण है। जीवों के चित्त में वृथा संकल्प विकल्प उठते हैं—जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजते और मिटते हैं तैसे ही यह संकल्प और इच्छा जाल जो उठते और मिटते हैं सो उन्मत्त की नाईं जीवों की चेष्टा है। यह तो हँसी करने योग्य बालकों की लीला है और मूर्खता से अनर्थ फैलाती है। इसमें जो कुछ बड़ा उदार फल हो वह मैं नहीं देखता बल्कि इसमें भोगों से भिन्न कार्य कुछ नहीं मिलता, इसलिये जो कुछ इससे रमणीय और अविनाशी हो उसको शीघ्र ही चिन्तन करूँ। ऐसे विचारकर कहने लगा कि मैंने प्रथम भगवान् विरोचन से पूछा था। मेरा पिता विरोचन आत्मतत्त्व का ज्ञाता था और सब लोकों में गया था। उससे मैंने प्रश्न किया था कि हे भगवन्, महात्मन्! जहाँ सब दुःखों और सुखों का अन्त हो जाता है और सब श्रम शान्त हो जाता है वह कौन स्थान है ? वह पद मुझसे कहिये जहाँ मन का मोह नष्ट हो जाता है, सब इच्छा से मुक्त होता है और राग द्वेष से रहित जिसमें सर्वदा विश्राम होता है फिर कुछ क्षोभ नहीं रहता।

उपशम प्रकरण । ६१३

हे तात ! वह कौन पद है जिसके पाने से और कुछ पाना नहीं रहता और जिसके देखने से और कुछ देखना नहीं रहता ? यद्यपि जगत् के अत्यन्त भोग पदार्थ हैं तो भी सुखदायक नहीं भासते हैं, क्योंकि क्षोभ करते हैं और उनसे योगीश्वरों के मन भी मोहित होकर गिर पड़ते हैं। हे तात ! जो सुख सुन्दर विस्तीर्ण आनन्द है वह मुझसे कहिये । उसमें स्थित हुआ मैं सदा विश्राम पाऊँगा ।

इति श्रीयोगवाशिष्टे उपशमप्रकरणे विरोचनवर्णनन्नाम द्वाविंशतितमस्सर्गः ॥ २२ ॥

विरोचन बोले, हे पुत्र ! एक अति विस्तीर्ण विपुल देश है उसमें अनेक सहस्र त्रिलोकीयाँ भासती हैं। वहाँ समुद्र, जल, धारा, पर्वत, वन, तीर्थ, नदियाँ, तालाब, पृथ्वी, आकाश, नन्दनवन, पवन, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्यलोक, देश, देवता, दैत्य, यक्ष, राक्षस, कमलों की शोभा, काष्ठ, तृण, चर, अचर, दिशा, ऊर्ध्व, अधः, मध्य, प्रकाश, तम, अह्र, विष्णु, इन्द्र, रुद्रादिक नहीं हैं, केवल एक ही है—जो महानता नाना प्रकार प्रकाश को धारनेवाला है, सबका कर्त्ता, सर्वव्यापक है और सर्वरूप तूष्णींभाव में स्थित है। उसने सब मन्त्रियों सहित एक मन्त्री संकल्प किया। वह मन्त्री जो न बने उसको शीघ्र ही बना लेता है और जो बने उसको न बनाने को भी समर्थ है वह आपसे कुछ नहीं माँगता और सब जानने को समर्थ है केवल राजा के अर्थ वह सब कार्यों को करता है। यद्यपि वह आप जड़ है तो भी राजा के बल से तनुता से ज्ञाता और कार्य करता है। यह सब कार्यों को करता है और उसका राजा एकता में केवल अपने आप में स्थित है। बलि ने पूछा, हे प्रभो ! आधि व्याधि दुःखों से रहित जो प्रकाशवान् है वह देश कौन है, उसकी प्राप्ति किस साधन से होती है और आगे किसने पाया है ? ऐसा मन्त्री कौन है और वह महाबली राजा कौन है जो जगन् जाल संयुक्त हमने भी नहीं जाता ? हे देव ! यह अपूर्व आख्यान तुमने कहा है जो आगे मैंने नहीं सुना था । मेरे हृदयाकाश में संशयरूपी बादल उदय हुआ है सो वचन रूपी पवन से निवृत्त करो । विरोचन बोले, हे पुत्र ! उस देश का मन्त्री

६१४ योगवाशिष्ठ ।

भगवान् और अनेक कल्प के देवता और असुरगणों से वश नहीं होता, सहस्रनेत्र जो इन्द्र है उसके वश भी नहीं होता, यम, कुबेर उसे वश कर नहीं सकते और देवता और असुरों से भी जीता नहीं जाता । मुसल, वज्र, चक्र, गदादिक खड्ग उस पर चलाये कुण्ठित हो जाते हैं—जैसे पाषाण पर चलाने से कमले कुण्ठित हो जाते हैं । वह मन्त्री अस्त्र और शस्त्र से वश नहीं होता और बड़े युद्धकर्मों से भी नहीं पाया जाता । देवता और दैत्य सबको उसने वश किया है, विष्णु पर्यन्त देवता और हिरण्यकशिपु आदिक असुर उसने डाल दिये हैं । जैसे प्रलयकाल का पवन सुमेरु के कल्पवृक्ष को गिरा देता है । प्रमाद से इस त्रिलोकी को वशकर चक्रवर्ती राजावत् वह स्थित है और सुर असुरों के समूह उससे भासते हैं । यद्यपि वह गुह्य और गुणहीन है तो भी दुर्मति, दुष्ट अहंकार और क्रोध उससे उदय होते हैं । देवता और दैत्य के समूह फिर फिर उपजता है सो इसकी क्रीड़ा है । ऐसा मन्त्रों से संयुक्त मन्त्री है । हे पुत्र ! जब उसके राजा को वश कीजिये तब उसके मन्त्री को वश करना सुगम होता है । राजा को वश किये बिना मन्त्री वश नहीं होता, कभी भीतर रहता है कभी बाहर जाता है । जिस काल में राजा की इच्छा होती है कि मन्त्री अपने को जीते तब यत्न बिना जीत लेना है । वह ऐसा बली मल्ल है जिससे तीनों जगत् उल्लास को प्राप्त हुए हैं । वह मन्त्री मानों सूर्य है जिसके उदय होने से त्रिलोकीरूपी कमलों की खानि विकाश को प्राप्त होती है और जिसके लय होने से जगतरूपी कमल लय हो जाते हैं । हे पुत्र ! यदि उसके जीतने की तुझको शक्ति है तब तो तू पराक्रमवान् है और यदि मोह से रहित एकत्रबुद्धि हो उनमें से एक को जीत सकेगा तब तू धैर्यवान् है और तेरी सुन्दर वृत्ति है क्योंकि उसके जीतने जो से नहीं जीता उस पर भी जीत पाता है और जो उसको नहीं जीता पर और और लोक सब जीते हैं तो भी जीते अजीत हो जावेंगे । इस कारण जो तू अनन्त सुख चाहता है तो जो नित्य अविनाशी है उसके जीतने के निमित्त यत्न से स्थित हो और बड़े कष्ट और चेष्टा करके भी उसको वश कर । देवता, दैत्य, यक्ष, मनुष्य

उपशम प्रकरण । ६१५

महासर्प और किन्नरों संयुक्त अति बली हैं तो भी सब ओर से यत्न करने से वश होते हैं । इससे उसको वश कर ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे बलिवृत्तान्तविरोचनगाथानाम त्रयोविंशतितमसर्गः ॥ २३ ॥

बलि ने पूछा, हे भगवन् ! किस उपाय से वह जीता जाता है और ऐसा महावीर्यवान् मन्त्री कौन है और राजा कौन है ? यह वृत्तान्त सब मुझको शीघ्र ही कहिये कि उपाय करूँ । विरोचन बोले, हे पुत्र ! स्थित हुआ भी त्यागने योग्य है । ऐसा मन्त्री जिस उपाय से जीतीये सो भली प्रकार कहता हूँ सुन । उस युक्ति के ग्रहण करने से शीघ्र ही वश होता है, युक्ति बिना नाश नहीं होता । जैसे बालक को युक्ति से वश करते हैं तैसे ही जो पुरुष युक्ति से उस मन्त्री को वश करता है उसको राजा का दर्शन होता है और उससे परमपद पाता है । जब राजा का दर्शन होता है तब मन्त्री वश हो जाता है और उस मन्त्री के वश करने से फिर राजा का दर्शन होता है जब तक राजा को न देखा तब तक मन्त्री वश नहीं होता और जब तक मन्त्री को वश नहीं किया तब तक राजा का दर्शन नहीं होता । राजा के देखे बिना मन्त्री का जीतना कठिन है और मन्त्री के जीते बिना राजा को देखना कठिन है । इस कारण दोनों का इकट्ठा अभ्यास कर । राजा का दर्शन और मन्त्री का जीतना अपने पुरुष प्रयत्न और शनैःशनैः अभ्यास से होता है और दोनों के सम्पादन से मनुष्य शुभता को प्राप्त होता है । जब तू अभ्यास करेगा तब उस देश को प्राप्त होगा, यह अभ्यास का फल है । हे दैत्यराज ! जब उसको पावेगा तब रञ्चक भी शोक तुमको न रहेगा और सब यत्नों से शान्त होकर नित्य प्रफुल्लित और प्रसन्न रहेगा । जो साधुजन हैं वे सब संशयों से रहित उस देश में स्थित होते हैं । हे पुत्र ! सुन, वह देश अब मैं तुझसे प्रकट करके कहता हूँ । देश नाम मोक्ष का है जहाँ सब दुःख नष्ट हो जाते हैं और राजा उस देश का आत्म भगवान् है जो सब पदों से अतीत है । उस महाराज ने मन्त्री मन को किया है सो मन परिणाम को पाकर सर्व ओर से विश्वरूप हुआ है । जैसे मृत्तिका का पिण्ड घट-

६१६योगवाशिष्ठ ।

भाव को प्राप्त होता है और जैसे धूम्र बादल को धरता है तैसे ही मन ने विश्वरूप धरा है । उस मन को जीतने से सब विश्व जीत जाता है । मन का जीतना कठिन परन्तु युक्ति से वश होता है । बलि ने पूछा हे भगवन् ! उस मन के वश करने की युक्ति मुझसे कहिये । विरोचन बोले, हे पुत्र ! शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध के रस की सर्वदा सब ओर से आस्था त्यागना अर्थात् नाशवन्त और भ्रमरूप जानना, यही मन के जीतने की परम युक्ति है । मनरूपी हाथी विषयरूपी मद से मस्त है वह इस युक्ति से शीघ्र ही दमन हो जाता है । यह युक्ति कठिन है और अति दुःख से प्राप्त होती है परन्तु अभ्यास से सुलभ ही प्राप्त हो जाती है । ब्रह्म के अभ्यास किये से और विरक्तता से यह युक्ति सब ओर से प्रकट होती है-जैसे रसवान् पृथ्वी में लता उपजती है तैसे ही जो जो शठ जीव हैं इसकी वाञ्छा करते हैं परन्तु अभ्यास बिना उन्हें नहीं प्राप्त होती और अभ्यासवान् को प्रकट होती है । इससे तुम भी अभ्यास सहित युक्ति का आश्रय करो । जब तक विषयों से विरक्तता नहीं उपजती तब तक संसाररूपी वन के दुःखों में भ्रमना है, पर विषयों से विरक्तता अभ्यास बिना किसी को नहीं प्राप्त होती । जैसे अभ्यास बिना नहीं पहुँचता तैसे ही जब आत्मा ध्येय को पुरुष निरन्तर धरता है तब अभ्यासवान् की वृत्ति विषयों में अमंत होती है । जैसे जल के अभ्यास से बेलि को सींचते हैं तब लता वृद्धि होती है, ऐसे ही पुरुषार्थ से सब कार्यों की प्राप्ति होती है, अन्यथा नहीं होती । यह निश्चय किया है कि जो क्रिया आपही करिये उसका फल अवश्य प्राप्त होता है । वही पुरुषार्थ कहाता है । जो अवश्य होना है उसकी जो नीति है वह दूर नहीं होती उसे ही दैवशब्द कहिये वा नीति कहिये पर अपने ही पुरुषार्थ का फल पाता है-जैसे मरुस्थल में भ्रम से जल भासता है और सम्यक्‌ज्ञान से भ्रम निवृत्त हो जाता है । इस दैव और नीति को अपने पुरुषार्थ से जीतो । जैसा पुरुषार्थ में सङ्कल्प दृढ़ करता है वैसा ही भासता है । जैसे आकाश को नीलता ग्रहण करती है पर वह नीलता कुछ है नहीं, तैसे ही सुख दुःख देनेवाला और कोई नहीं, जैसा सङ्कल्प करता