योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
१८० योगवासिष्ठ ।
होवेगी। हे रामजी! बोलने चालने का वर्जन नहीं, बोलिये, दान दीजिये अथवा लीजिये परन्तु भीतर चित्त को मत लगाओ इनका साक्षी जानने- वाला जो अनुभव आकाश है उसकी ओर वृत्ति हो। युद्ध करना हो तो भी करिये परन्तु वृत्ति साक्षी ही की ओर हो और उसी को अपना रूप जानिये और स्थित होइये। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, ये जो पाँच विषय इन्द्रियों के हैं इनको अङ्गीकार कीजिये परन्तु इनके जाननेवाले साक्षी में स्थित रहिये। जो निजस्वरूप वही चिदाकाश है, जब उसका अभ्यास बारम्बार करियेगा तब चित्त स्थित होगा और आत्मपद की प्राप्ति होगी। हे रामजी! जब तक चित्त आत्मपद में स्थित नहीं होता तब तक जगद्भ्रम भी निवृत्त नहीं होता। उस चित्त के संयोग से चेतन का नाम जीव है। जैसे घट के संयोग से आकाश को घटाकाश कहते हैं पर जब घट टूट जाता है तब महाकाश ही रहता है, तैसे ही जब चित्त का नाश होगा तब यह जीव चिदाकाश ही होगा। यह जगत् भी चित्त में स्थित है, चित्त के अभाव हुए जगद्भ्रम शान्त हो जावेगा। हे रामजी! जब तक चित्त है तब तक संसार भी है, जैसे जब तक मेघ हैं तब तक बूँदें भी हैं और जब मेघ नष्ट हो जावेगा तब बूँदें भी न रहेंगी। जैसे जब तक चन्द्रमा की किरणें शीतल हैं तब तक चन्द्रमा के मण्डल में तुषार है तैसे ही जब तक चित्त है तब तक संसारभ्रम है। जैसे मांस का स्थान श्मशान होता है और वहाँ पक्षी भी होते और ठौर इकट्ठे नहीं होते, तैसे ही जहाँ चित्त है वहाँ गगद्वेषादिक विचार भी होते हैं और जहाँ चित्त का अभाव है वहाँ विकार का भी अभाव है। हे रामजी! जैसे पिशाच आदिक की चेष्टा रात्रि में होती है, दिन में नहीं होती, तैसे ही राग, द्वेष, भय, इच्छा आदिक विकार चित्त में होते हैं। जहाँ चित्त नहीं वहाँ विकार भी नहीं-जैसे अग्नि बिना उष्णता नहीं होती, शीतलता बिना बर्फ नहीं होती, सूर्य बिना प्रकाश नहीं होता और जल बिना तरङ्ग नहीं होते तैसे ही चित्त बिना जगद्भ्रम नहीं होता। हे रामजी। शान्ति भी इसी का नाम है और शिवता भी वही है, सर्वज्ञता भी वही है जो चित्त नष्ट हो, आत्मा भी वही है और तृप्तता भी वही है पर जो चित्त नष्ट नहीं हुआ
उपशम प्रकरण । ६८१
तो इतने पदों में कोई भी नहीं है। हे रामजी! चित्त से रहित चेतन चैतन्य कहाता है और अमनशक्ति भी वही है, जब तक सब कलना से रहित बोध नहीं होता तबतक नाना प्रकार के पदार्थ भासते हैं और जब वस्तु का बोध हुआ तब एक अद्वैत आत्मसत्ता भासती है। हे रामजी! ज्ञान-संवित् की ओर वृत्ति रखना, जगत् की ओर न रखना और जाग्रत् की ओर न जाना। जाग्रत् के जाननेवाले की ओर जाना स्वप्न और सुषुप्ति की ओर न जाना। भीतर के जाननेवाली जो सच्ची सत्ता है उसकी ओर वृत्ति रखना ही चित्त के स्थित करने का परम उपाय है। सन्तों के सङ्ग और शास्त्रों में निर्णय किये अर्थ का जब अभ्यास हो तब चित्त नष्ट हो और जो अभ्यास न हो तो भी सन्तों का संग और सत्शास्त्रों को सुनकर बल कीजिये तो सहज ही चमत्कार हो आवेगा। मन को मन से मथिये तो ज्ञानरूपी अग्नि निकलेगी जो आशारूपी फाँसी को जला डालेगी। जबतक चित्त आत्मपद से विमुख है तबतक संसारभ्रम देखता है पर जब आत्मपद में स्थित होता है तब सब क्षोभ मिट जाते हैं। जब तुमको आत्मपद का साक्षात्कार होगा तब कालकूट विष भी अमृत समान हो जावेगा और विष का जो मारना धर्म है सो न रहेगा। जीव जब अपने स्वभाव में स्थित होता है तब संसार का कारण मोह मिट जाता है और जब निर्मल निरंश आत्मसंवित् से गिरता है तब संसार का कारण मोह आन प्राप्त होता है। जब निरंश निर्मल आत्मसंवित् में स्थित होता है तब संसारसमुद्र से तर जाता है। जितने तेजस्वी बलवान् हैं उन सबों से तत्त्ववेत्ता उत्तम है, उसके आगे सब लघु हो जाते हैं और उस पुरुष को संसार के किसी पदार्थ की अपेक्षा नहीं रहती, क्योंकि उसका चित्त सत्यपद को प्राप्त होता है। इससे चित्त को स्थित करो तब वर्तमानकाल भी भविष्यत्काल की नाईं हो जावेगा और जैसे भविष्यत्काल का रागद्वेष नहीं स्पर्श करता तैसे ही वर्तमान काल का रागद्वेष भी स्पर्श न करेगा। हे रामजी! आत्मा परम आनन्दरूप है, उसके पाने से विष भी अमृत के समान हो जाता है। जिस पुरुष को आत्मपद में स्थित हुई है वह सबसे उत्तम है जैसे सुमेरु पर्वत के निकट हाथी तुच्छ भासता है तैसे ही उसके
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निकट त्रिलोकी के पदार्थ सब तुच्छ भामते हैं वह ऐसे दिव्य नेत्र को प्राप्त होता है जिसको सूर्य भी नहीं प्रकाश कर सकता। वह परम प्रकाश-रूप सब कलना से रहित अद्वैततत्त्व है। हे रामजी ! तुम आत्मतत्त्व में स्थित हो रहो। जिस पुरुष ने ऐसे स्वरूप को पाया है उसने सब कुछ पाया है और जिसने ऐसे स्वरूप को नहीं पाया उसने कुछ नहीं पाया। ज्ञान-वान को देखकर हमको ज्ञान की वार्त्ता करते कुछ लज्जा नहीं आती और जो उस ज्ञान से विमुख है यद्यपि वह महाबाहु हो तो भी गर्दभवत् है। जो बड़े ऐश्वर्य से सम्पन्न है और आत्मपद से विमुख है उसको तू विष्ठा के कीट से भी नीच जान। जीना उनका श्रेष्ठ है जो आत्मपद के निमित्त यत्न करते हैं और जीना उनका वृथा है जो संसार के निमित्त यत्न करते। वे देखनेमात्र तो चेतन हैं परन्तु शव की नाईं हैं। जो तत्त्ववेत्ता हुए हैं वे अपने प्रकाश में प्रकाशते हैं और जिनको शरीर में अभिमान है वे मृतक समान हैं। हे रामजी ! इस जीव को चित्त ने दीन किया। ज्यों ज्यों चित्त बड़ा होता है त्यों त्यों इसको दुःख होता है और जिसका चित्त क्षीण हुआ है उसका कल्याण हुआ है। जब आत्मभाव अनात्म में दृढ़ होता है और भोगों की तृष्णा होती है तब चित्त बड़ा हो जाता है और आत्मपद से दूर पड़ता है। जैसे बड़े मेघ के आवरण से सूर्य नहीं भामता तैसे ही अनात्म अभिमान से आत्मा नहीं भामता। जब भोगों की तृष्णा निवृत्त हो जाती है तब चित्त क्षीण हो जाता है। जैसे वसन्त ऋतु के गये से पत्र कृश हो जाते हैं तैसे ही भोग-वासना के अभाव से चित्त कृश हो जाता है। हे रामजी ! चित्तरूपी सर्प दुर्वासनारूपी दुर्गन्ध, भोगरूपी वायु और शरीर में दृढ़ आस्थारूपी मृत्तिका स्थान में बड़ा हो जाता है, और उन पदार्थों में जब बड़ा हुआ तब मोहरूपी विष से जीव को मारता है। हे रामजी ! ऐसे दुष्टरूपी सर्प को जब मारे तब कल्याण हो। देह में जो आत्म अभिमान हो गया है, भोगों की तृष्णा स्फूरती है और मोहरूपी विष चढ़ गया है, इससे यदि विचाररूपी गरुड़मन्त्र का चिन्तन करता रहे तो विष उतर जावे इसके शिवाय और उपाय विष उतरने का कोई नहीं। हे रामजी ! अनात्मा में
उपशम प्रकरण । ६८३
आत्माभिमान और पुत्र, दारा आदिक में ममत्व से चित्त बड़ा हो जाता है और अहंकाररूपी विकार, ममतारूपी कीड़ा और यह मेरा इत्यादि भावना से चित्त कठिन हो जाता है। चित्तरूपी विष का वृक्ष है जो देहरूपी भूमि पर लगा है, संकल्प विकल्प इसके टाम हैं, दुर्वासनारूपी पत्र हैं और सुखदुःख आधिव्याधि मृत्युरूपी इसके फल हैं, अहंकाररूपी कर्म जल है उसके सींचने से बढ़ता है और काम भोग आदि पुष्प हैं। चिन्तारूपी बड़ी बेल्लि को जब विचार और वैराग्यरूपी कुठार से काटै तब शान्ति हो—अन्यथा शान्ति न होगी। हे रामजी ! चित्तरूपी एक हाथी है उसने शरीररूपी तालाब में स्थित होकर शुभ वासनारूपी जल को मलीन कर डाला है और धर्म, सन्तोष, वैराग्यरूपी कमल को तृष्णारूपी सूँड़ से तोड़ डाला है। उसको तुम आत्मविचाररूपी नखों से देख नखों से छेदो। हे रामजी ! जैसे कौवा अपवित्र पदार्थों को भोजन करके सर्वदा काँ काँ करता है तैसे ही चित्त देहरूपी अपवित्र गृह में बैठा सर्वदा भोगों की ओर धावता है, उनके रस को ग्रहण करता है और मौन कभी नहीं रहता । दुर्वासना से वह काक की नाईं कृष्णरूप है—जैसे काक के एक ही नेत्र होता है तैसे ही चित्त एक विषयों की ओर धावता है। ऐसे अमङ्गलरूपी कौवे को विचाररूपी धनुष से मारो तब सुखी होगे। चित्तरूपी चील पखेरू है जो भोगरूपी मांस के निमित्त सब ओर भ्रमता है। जहाँ अमङ्गलरूपी चील आती है वहाँ से विभूति का अभाव हो जाता है। वह अभिमानरूपी मांस की ओर ऊँची होकर देखती है और नम्र नहीं होती। ऐसा अमङ्गलरूपी चित्त चील है उसको जब नाश करो तब शान्तिमान् होगे। जैसे पिशाच जिसको लगता है वह खेदवान् होता है और शब्द करता है, तैसे ही इसको चित्तरूपी पिशाच लगा है और तृष्णारूपी पिशाचिनी के साथ शब्द करता है उसको निकालो जो आत्मा से भिन्न अभिमान करता है। ऐसे चित्तरूपी पिशाच को वैराग्यरूपी मन्त्र से दूर करो तब स्वभावसत्ता को प्राप्त होगे। यह चित्तरूपी वानर महाचञ्चल है और सदा भटकता रहता है, कभी किसी पदार्थ में धावता है—जैसे वानर जिस वृक्ष पर बैठता है उसको ठहरने नहीं देता। हे रामजी ! चित्तरूपी
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रस्सी से सम्पूर्ण जगत् कर्त्ता, कर्म, क्रियारूपी गाँठ करके बँधा है। जैसे एक जंजीर के साथ अनेक बँधते हैं और एक तागे के साथ अनेक दाने पिरोये जाते हैं तैसे ही एक चित्त से सब देहधारी बाँधे हैं। उस रस्सी को असंग शस्त्र से काटे तब सुखी हो। हे रामजी! चित्तरूपी अजगर सर्प भोगों की तृष्णारूपी विष से पूर्ण है और उसने फुंकार के साथ बड़े-बड़े लोक जलाये हैं और शम, दम, धैर्यरूपी सब कमल जल गये हैं। इस दुष्ट को और कोई नहीं मार सकता, जब विचाररूपी गरुड़ उपजे तब इसको नष्ट करे और जब चित्तरूपी सर्प नष्ट हो तब आत्मरूपी निधि प्राप्त होगी। हे रामजी! यह चित्त शस्त्रों से काटा नहीं जाता, न अग्नि से जलता है और न किसी दूसरे उपाय से नाश होता है, केवल साधु के संग और सत्शास्त्रों के विचार और अभ्यास से नाश होता है। हे रामजी! यह चित्तरूपी गढ़े का मेघ बड़ा दुःखदायक है, भोगों की तृष्णारूपी बिजली इसमें चमकती है और जहाँ वर्षा इसकी होती है वहाँ बोधरूपी क्षेत्र और शम-दमरूपी कमलों को नाश करती है। जब विचाररूपी मन्त्र हो तब शान्त हो। हे रामजी! चित्त की चपलता को असंकल्प से त्यागो। जैसे ब्रह्मास्त्र से ब्रह्मास्त्र छिदता है तैसे ही मन से मन को भेदो अर्थात् अन्तर्मुख हो। जब तेरा चित्तरूपी वानर स्थित होगा तब शरीररूपी वृक्ष क्षोभ से रहित होगा। शुद्ध बोध से मन को जीतो और यह जगत् जो तृण से भी तुच्छ है उससे पार हो जाओ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे राघवसेवनवर्णन-नाम सप्तचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥४७॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! मन की वृत्ति ही इष्ट व अनिष्ट को ग्रहण करती है और खड्ग की धारवत् तीक्ष्ण है, इसमें तुम प्रीति मत करो बल्कि इसको मिथ्या जानकर त्याग करो। हे रामजी! बोधरूपी वेलि जो शुभक्षेत्र और शुभकाल से प्राप्त हुई है उसको विवेकरूपी जल से सींचो तब परमपद की प्राप्ति हो। हे रामजी! जब तक शरीर मलिनाता को प्राप्त नहीं हुआ और जबतक पृथ्वी पर नहीं गिरा तबतक बुद्धि को उदार करके संसार से मुक्त हो। मैंने जो वचन तुझसे कहे हैं उनको तुमने जाना
उपशम प्रकरण । ६८५
है, अब इनका दृढ़ अभ्यास करो तब दृश्यभ्रम निवृत्त हो जावेगा । हे रामजी ! यह पाञ्चभौतिक शरीर जो तुमको भामता है सो तुम्हारा रूप नहीं है तुम शुद्ध चेतनरूप हो । शुद्ध बोध से विचार करके पाञ्चभौतिक अनात्म अभिमान को त्यागो । रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! किस क्रम और किस प्रकार से इसका अभिमान त्यागकर उद्दालक सुखी हुआ है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! पूर्व में जैसे उद्दालक भूतों के समूह को विचार करके परमपद को प्राप्त हुआ है सो तुम सुनो । हे रामजी ! जगत्रूपी जीर्णघर के वायव्यकोण में एक देश है जो पर्वत और तमालादि वृक्षों से पूर्ण है और महामणियों का स्थान है । उस स्थान में उद्दालक नाम एक बुद्धि-मान् ब्राह्मण मान करने के योग्य विद्यमान था परन्तु अर्धप्रबुद्ध था, क्योंकि परमपद को उसने न पाया था । वह ब्राह्मण यौवन अवस्था के पूर्व ही शुभेच्छा से शास्त्रोक्त यम, नियम और तप को साधने लगा तब उसके चित्त में यह विचार उत्पन्न हुआ कि हे देव ! जिसके पाने से फिर कुछ पाने योग्य न रहे, जिस पद में विश्राम पाने से फिर शोक न हो और जिसके पाने से फिर बन्धन न रहे ऐसा पद मुझको कब प्राप्त होगा ? कब मैं मन के मनन भाव को त्यागकर विश्रान्तिमान हूँगा—जैसे मेघ भ्रमने को त्यागकर पहाड़ के शिखर में विश्रान्ति करता है—और कब चित्त की दृश्यरूप वासना मिटेगी जैसे तरङ्ग से रहित समुद्र शान्तिमान् होता है तैसे ही कब मैं मन के संकल्प विकल्प से रहित शान्तिमान् हूँगा ? तृष्णारूपी नदी को बोधरूपी बेड़ी और सत्संग और सत्शास्त्र-रूपी मल्लाह से कब तरूँगा, चित्तरूपी हाथी जो अभिमानरूपी मद से उन्मत्त है उसको विवेकरूपी अंकुश से कब मारूँगा और ज्ञानरूपी सूर्य से अज्ञानरूपी अन्धकार कब नष्ट करूँगा ? हे देव ! सब आरम्भों को त्याग-कर मैं अलेप और अकर्ता कब होऊँगा ? जैसे जल में कमल अलेप रहता है तैसे ही मुझको कर्म कब स्पर्श न करेंगे ? मेरा परमार्थरूपी भास्वर वपु कब उदय होगा जिससे मैं जगत् की गति को देखकर हँसूँगा ? हृदय में सन्तोष पाऊँगा और पूर्णबोध विराट् आत्मा की नाईं होऊँगा ? वह समय कब होगा कि मुझ जन्मों के अन्धे को ज्ञानरूपी नेत्र प्राप्त होगा, जिससे
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में परमबोध पद को देखूँगा ? वह समय कब होगा जब मेरा चित्तरूपी मेघ वासनारूपी वायु से रहित आत्मरूपी सुमेरु पर्वत में स्थित होकर शान्तिमान् होगा ? अज्ञानदशा कब जावेगी और ज्ञानदशा कब प्राप्त होगी ? अब वह समय कब होगा कि मन और काया और प्रकृति को देख- कर हँसूँगा ? वह समय कब होगा जब जगत् के कर्मों को बालक की चेष्टावत् मिथ्या जानूँगा और जगत् मुझको सुषुप्ति की नाईं हो जावेगा । वह समय कब होगा जब मुझको पत्थर की शिलावत् निर्विकल्प समाधि लगेगी और शरीररूपी वृक्ष में पक्षी आलय करेंगे और निस्सङ्ग होकर छाती पर आन बैठेंगे ? हे देव ! वह समय कब होगा जब इष्ट अनिष्ट विषय की प्राप्ति में मेरे चित्त की वृत्ति चलायमान न होगी और विराट् की नाईं सर्वात्मा होऊँगा ? वह समय कब होवेगा जब मेरा सम असम आकार शान्त हो जावेगा और सब अर्थों में निर्पिच्छतरूप में हो जाऊँगा ? कब में उपशम को प्राप्त होऊँगा—जैसे मन्दराचल से रहित क्षीरसमुद्र शान्तिमान् होता है—और कब में अपना चेतन वपु पाकर शरीर को अशरीरवत् देखूँगा ? कब मेरी पूर्ण चिन्मात्र वृत्ति होगी और कब मेरे भीतर बाहर की सब कलना शान्त हो जावेगी और सम्पूर्ण चिन्मात्र ही का मुझे भान होगा ? में ग्रहण त्याग में रहित कब सन्तोष पाऊँगा और अपने स्वप्रकाश में स्थित होकर संसाररूपी नदी के जगमगणरूपी तरङ्गों से कब रहित होऊँगा और अपने स्वभाव में कब स्थित होऊँगा ? हे रामजी ! ऐसे विचारकर उद्दालक चित्त को ध्यान में लगाने लगा, परन्तु चित्तरूपी वानर दृश्य की ओर निकल जाये पर स्थित न हो । तब वह फिर ध्यान में लगावे और फिर वह भोगों की ओर निकल जावे । जैसे वानर नहीं ठहरता तैसे ही चित्त न ठहरे । जब उसने बाहर विषयों को त्यागकर चित्त को अन्तर्मुख किया तब भीतर जो दृष्टि आई तो भी विषयों को चिन्तने लगा, निर्विकल्प न हो और जब रोक रखे तब सुषुप्ति में लीन हो जावे। सुषुप्ति और लय जो निद्रा है उसी में चित्त रहे । तब वह वहाँ से उठ- कर और स्थान को चला—जैसे सूर्य सुमेरु की प्रदक्षिणा को चलता है और गन्धमादन पर्वत की एक कन्दग में स्थित हुआ जो फूलों से संयुक्त
उपशम प्रकरण । ६८७
सुन्दर और पशुपक्षी मृगों से रहित एकान्त स्थान था और जो देवता को भी देखना कठिन था । वहाँ अत्यन्त प्रकाश भी न था और अत्यन्त तम भी न था, न अत्यन्त उष्ण था और न शीत जैसे मधुर कार्तिक मास होता है तैसे ही वह निर्भय एकान्त स्थान था । जैसे मोक्षपदवी निर्भय एकान्तरूप होती है तैसे ही उस पर्वत में कुटी बना और उस कुटी में तमाल पर और कमलों का आसनकर और ऊपर मृगछाला बिछाकर वह बैठा और सब कामना का त्याग किया । जैसे ब्रह्माजी जगत् को उपजाकर छोड़ बैठे तैसे ही वह सब कलना को त्याग बैठा और विचार करने लगा कि अरे मूर्ख मन ! तू कहाँ जाता है, यह संसार मायामात्र है और इतने काल तू जगत् में भटकता रहा, पर कहीं तुझको शान्ति न हुई, वृथा धावता रहा। हे मूर्ख मन ! उपशम को त्यागकर भोगों की ओर धावता है सो अमृत को त्यागकर विष का बीज बोता है, यह सब तेरी चेष्टा दुःखों के निमित्त है। जैसे कुशवारी अपना घर बनाकर आप ही को बन्धन करती है तैसे ही तू भी आपकी आप संकल्प उठाकर बन्धन करता है। अब तू संकल्प के संसरने को त्यागकर आत्मपद में स्थित हो कि तुझको शान्ति हो । हे मन ! जिह्वा के साथ मिलकर जो तू शब्द करता है वह दर्दुर के शब्दवत् व्यर्थ है। कानों के साथ मिलकर सुनता है तब शुभ अशुभ वाक्य ग्रहण करके मृग की नाईं नष्ट होता, त्वचा के साथ मिलकर जो तू स्पर्श की इच्छा करता है सो हाथी की नाईं नष्ट होता है, रसना के स्वाद की इच्छा से मछली की नाईं नष्ट होता है और गन्ध लेने की इच्छा से भँवरे की नाईं नष्ट हो जावेगा। जैसे भँवरा सुगन्ध के निमित्त फूल में फँस मरता है तैसे तू फँस मरेगा और सुन्दर स्त्रियों की वाञ्छा से पतङ्ग की नाईं जल मरेगा। हे मूर्ख मन ! जो एक इन्द्रिय का भी स्वाद लेते हैं सो नष्ट होते हैं तू तो पञ्चविषय का सेवनेवाला है, क्या तेरा नाश न होगा । इससे तू इनकी इच्छा त्याग कि तुझको शान्ति हो। जो इन भोगों की इच्छा न त्यागेगा तो में ही तुझको त्यागूँगा ! तू तो मिथ्या असत्यरूप है तुझको मेरा क्या प्रयोजन है विचार कर में तेरा त्याग करता हूँ। हे मूर्ख मन ! जो तू देह में अहं अहं करता है सो तेरा अहं किस अर्थ
६८८ योगवाशिष्ट ।
का है। अंगुष्ठ से लेकर मस्तक पर्यन्त अहं वस्तु कुछ नहीं। यह शरीर तो अस्थि, मांस और रक्त का थैला है, यह तो अहंरूप नहीं और श्वास वायुरूप और पोल आकाशरूप है। यह पञ्चतत्त्वों का जो शरीर बना है उसमें अहंरूप वस्तु तो कुछ नहीं है। हे मूर्ख मन ! तू अहं अहं क्यों करता है ? यह जो तू कहता है। कि मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ, मैं सूँघता हूँ, मैं स्पर्श करता हूँ, मैं स्वाद लेता हूँ और इनके इष्ट अनिष्ट में राग द्वेष से जलता है सो वृथा कष्ट पाता है। रूप को नेत्र ग्रहण करते हैं, नेत्र रूप से उत्पन्न हुए हैं और तेज का अंश उनमें स्थित है जो अपने विषय को ग्रहण करता है, इसके साथ मिलकर तू क्यों तपायमान होता है ? शब्द आकाश में उत्पन्न हुआ है और आकाश का अंश श्रवण में स्थित है जो अपने शब्द गुण को ग्रहण करता है, इसके साथ मिलकर तू क्यों रागद्वेष कर तपायमान होता है ? स्पर्श इन्द्रिय वायु से उत्पन्न हुई है और वायु का अंश त्वचा में स्थित है वही स्पर्श को ग्रहण करता है, उससे मिलकर तू क्यों रागद्वेष से तपायमान होता है ? रसना इन्द्रिय जल से हुई है और जल का अंश जिह्वा है जो अग्रभाग में स्थित है वही रस ग्रहण करती है, इससे मिलकर तू क्यों वृथा तपायमान होता है ? और घ्राण इन्द्रिय गन्ध से उपजी है और पृथ्वी का अंश घ्राण में स्थित है वही गन्ध को ग्रहण करती है, उसमें मिलकर तू क्यों वृथा रागद्वेषवान् होता है ? मूर्ख मन ! इन्द्रियाँ तो अपने-अपने विषय को ग्रहण करती हैं पर तू इनमें अभिमान करता है कि मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ, मैं सूँघता हूँ, मैं स्पर्श करता हूँ और रस लेता हूँ। यह इन्द्रियाँ तो सब आत्मभर हैं अर्थात् अपने विषय को ग्रहण करती हैं और के विषय को ग्रहण नहीं करती कि नेत्र देखते हैं श्रवण नहीं करते और कान सुनते हैं देखते नहीं इत्यादि । सब इन्द्रियाँ अपना धर्म किसी को देती भी नहीं और न किसी का लेती हैं। वे अपने धर्म में स्थित हैं और विषय को ग्रहण कर इनको रागद्वेष कुछ नहीं होता। इनको ग्रहण करने की वासना भी कुछ नहीं होती और तू ऐसा मूर्ख है कि औरों के धर्म आपमें मानकर रागद्वेष से जलता है। जो
उपशम प्रकरण । ६८६
तू भी राग-द्वेष से रहित होकर चेष्टा करे तो तुझको दुःख कुछ न हो । जो वासना सहित कर्म करता है वह बन्धन का कारण होता है, वासना बिना कुछ दुःख नहीं होता । तू मूर्ख है जो विचार कर नहीं देखता । इसमें मैं तुझको त्याग करता हूँ। तेरे साथ मिलके मैं बड़े खेद पाता हूँ। जैसे भेडिये के बालक को सिंह चूर्ण करता है तैसे ही तूने मुझको चूर्ण किया है । तेरे साथ मिलकर में तुच्छ हुआ हूँ । अब तेरे साथ मेरा प्रयो-जन कुछ नहीं, मैं तो निर्विकल्प शुद्ध चिदानन्द हूँ। जैसे महाकाश घट से मिलकर घटाकाश होता है तैसे ही तेरे साथ मिलकर में तुच्छ हो गया हूँ । इस कारण में तेरा सङ्ग त्यागकर परम चिदाकाश को प्राप्त होऊँगा । मैं निर्विकार हूँ और अहं त्वं की कल्पना से रहित हूँ । तू क्यों अहं त्वं करता है ? शरीर में व्यर्थ अहं करनेवाला और कोई नहीं तू ही चोर है । अब मैंने तुझकी पकड़कर त्याग दिया है । तू तो अज्ञान से उपजा मिथ्या और असत्यरूप है जैसे बालक अपनी परछाहीं में वैताल जानकर आप भय पाता है तैसे ही तूने सबको दुःखी किया है । जब तेरा नाश होगा तब आनन्द होगा । तेरे उपजने से महादुःख है-जैसे कोई ऊँचे पर्वत से गिरके कूप में जा पड़े और कष्टवान् हो तैसे ही तेरे सङ्ग से में आत्मपद से गिरा देह अभिमानरूपी गढ़े में रागद्वेषरूपी दुःख पाता था, पर अब तुझको त्यागकर में निरहंकार पद को प्राप्त हुआ हूँ । वह पद न प्रकाश है, न तम है, न एक है, न दो है, न बड़ा है और न छोटा है, अहं त्वं आदि से रहित अचैत्य चिन्मात्र है । जरा मृत्यु राग द्वेष और भय सब तेरे संयोग से होते हैं । अब तेरे वियोग से मैं निर्वि-कार शुद्ध पद को प्राप्त होता हूँ। हे मन ! तेरा होना दुःख का कारण है। जब तू निर्वीज हो जावेगा तब मैं ब्रह्मारूप होऊँगा । तेरे सङ्ग से मैं तुच्छ हुआ हूँ, जब तू निवृत्त होगा तब मैं शुद्ध होऊँगा-जैसे मेघ और कुहिरे के होने से आकाश मलीन भासता है पर जब वर्षा हो जाती है तब शुद्ध और निर्मल हो रहता है, तैसे ही तेरे निवृत्त हुए निर्लेप अपना आप आत्मा भासता है । हे चित्त ! ये जो देह इन्द्रियादिक पदार्थ हैं सो भिन्न हैं, इनमें अहं वस्तु कुछ नहीं, इनको एक तूने ही इकट्ठी किया है । जैसे
६६० योगवासिष्ठ ।
एक तागा अनेक मणियों को इकट्ठा करता है तैसे ही सबको इकट्ठा करके तू अहं अहं करता है। तू मिथ्या रागद्वेष करता है इससे तू शीघ्र ही सब इन्द्रियों को लेकर निर्वाण हो जिससे तेरी जय हो।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे उद्दालकविचारो नामाष्ट- चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४८ ॥
उद्दालक बोले, आत्मा जो सूक्ष्म से सूक्ष्म है, स्थूल से स्थूल है और शुद्ध, निर्विकार और शान्तरूप है सो में अचेत्य चिन्मात्र हूँ मेरे में कोई विकार नहीं और जितने जन्म-मरण आदिक विकार भासते हैं वे आत्मा में चित्त ने कल्पे हैं, वास्तविक आत्मा में कोई विकार नहीं । जन्म उसको कहते हैं जो पहले न हो और पीछे उपजे । आत्मा तो आगे ही सिद्ध है फिर जन्म कैसे कहिये ? और मृत्यु वह कहाती है जो पीछे न हो पहले का अभाव हो जावे, पर आत्मा तो जगत् के अन्त में भी सिद्ध है इससे सब विकारों से रहित है फिर मृत्यु रूप प्रध्वंसाभाव कैसे कहिये ? देह के आदि, मध्य, अन्त, तीनों कालों में आत्मा सिद्ध है, इससे वह सब विकारों से रहित है और चित्त के संयोग से विकारों सहित भासता है । हे चित्त ! तेरे संयोग से मैंने इतने भ्रम पाये थे और शरीर में व्यर्थ अहं अहं होता है सो जाना नहीं जाता कि कौन है । शरीर तो रक्त-मांस का पिण्ड है, इन्द्रियाँ मन आदिक सब जड़ हैं तो अहं करनेवाला कौन है ? जब अहं होता है तब भाव-अभाव पदार्थ को ग्रहण करता है पर जहाँ अहं का अभाव है वहाँ भाव-अभाव कैसे हो ? अहंकार झूठ है, इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों का ग्रहण करती हैं और मनादिक भी अपने स्वभाव में स्थित हैं। यह अहं करनेवाला नहीं पाया जाता कि कौन है ? अहं का रूप कुछ नहीं इससे निश्चय हुआ कि सब पदार्थ झूठ हैं। अहंकार का ग्रहण करनेवाला भी झूठ है और जितने पदार्थ हैं वे अहंकार से होते हैं । में इससे मिलकर देह इन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट में क्यों राग-द्वेष करूँ ? इसका और मेरा कुछ संयोग नहीं में तो निर्लेप और अद्वैत आत्मा हूँ, संयोग किससे हो ? मैं भाव रूप ब्रह्म हूँ मेरा संयोग किससे हो ? यह तो सब असत्यरूप है और जो कहिये देहादिक हैं तो भी संयोग नहीं बनता-
उपशम प्रकरण । ६६१
जैसे लोहे और ढेले (मिट्टी) का संयोग नहीं होता । यह बड़ा आश्चर्य है कि सबका अहं करनेवाला कौन था ? यह मिथ्या अहंकार अज्ञान से दुःख-दायक था । जैसे अज्ञान से बालक को वेताल भासकर दुःख देता है तैसे ही अविचार से दुःख होता है । जैसे पहाड़ पर बादल स्थित होता है तो पहाड़ बादल नहीं होता और बादल पहाड़ नहीं होता, तैसे ही आत्मा अनात्मा नहीं होता और अनात्मा आत्मा नहीं होता । जैसे सूर्य की किरणों में जल और रस्सी में सर्प भासता है तैसे ही आत्मा में अहंकार भासता है और विचार करने से अहंकार कुछ नहीं निकलता । जहाँ अहंकार होता है वहाँ दुःख भी आ स्थित होते हैं जैसे जहाँ मेघ होता है वहाँ बिजली भी होती है, तैसे ही जहाँ अहंकार होता है वहाँ शरीर-रूपी वृक्ष की मञ्जरी बढ़ती है । जैसे गरुड़ के विद्यमान होते सर्प नहीं रहता तैसे ही आत्मविचार के विद्यमान होते अहंकार नहीं रहता । इससे चित्तादिक सब झूठे हैं और अज्ञान से भासते हैं तो इनसे रचा हुआ जगत् कैसे सत्य हो । यह जगत् अकारण है इससे मिथ्याभ्रम से भासता है ! जैसे भ्रान्ति से आकाश में दूसरा चन्द्रमा भासता है, नौका में बैठे हुए को तट के वृक्ष चलते भासते हैं और गन्धर्वनगर भासता है । जब चित्त नष्ट होता है तब सब भ्रम का अभाव हो जाता है । देह में जो अभिमान है सो ही दुःख का कारण है । जबतक विचार नहीं उपजता तब तक भासता है—जैसे बरफ़ की पुतली तब तक होती है जब तक सूर्य का तेज नहीं लगा और जब सूर्य का तेज लगता है तब बरफ़ की पुतली गल जाती है । जैसे बालक को घूमने से पृथ्वी भ्रमती भासती है तैसे ही चित्त के भ्रम से यह जगत् भासता है और विचार के उपजे से अहंकार गल जाता है । हे मन ! तेरे साथ मिलने से बड़ा दुःख होता है । तुझसे रहित मैंने आपको देखा है, अब तू सब इन्द्रियों सहित निर्वाण हो । आत्मविचार से आत्म अग्नि में स्थित हो कि सब मल तेरा जलकर शुद्धता को प्राप्त हो । इस देह के साथ तेरा मिलाप दुःख के निमित्त है । मन और देह के भीतर से आपस में शत्रुभाव है पर बाहर से स्नेह भासता है । भीतर दोनों परस्पर नाश करने की इच्छा करते हैं । जो दुःख होता है
६६२ योगवाशिष्ठ ।
तो मन उसके नाश की इच्छा करता है, और देह कहती है मन न हो तो मेरे में कोई दुःख नहीं—इसका मिलना ही दुःख का कारण है । हे मूर्ख मन ! देह को तेरे संग से दुःख होता है । स्वतः नहीं । मन में देह का अभिमानन होतो भी कोई दुःख नहीं, इनके संयोग में ही दुःख होता है और बिछुरने से दुःख कुछ नहीं—तैसे ही मन और देह का संयोग कुछ नहीं । जैसे जहाँ अंगारों की वर्षा होती है वहाँ बुद्धिमान नहीं रहते तैसे ही इनमें मिलाप करना हमको योग्य नहीं । हे मूर्ख मन ! जितना कुछ दुःख तुझको होता है सो देह के मिलाप से होता है तो फिर इसके साथ तू किस निमित्त मिलता है और आपको सुखी जानता है । इसके मिलने से तुझको दुःख ही होता है परन्तु तू ऐसा मूर्ख है जो वारम्वार देह की ओर ही दौड़ता है और सुख जानता है पर तेरा नाश होता है । जैसे पतङ्ग दीपक को सुखरूप जानकर मिलने की इच्छा करता है पर जल मरता है और मछली मांस की इच्छा करती है सो बंसी में फँस मरती है तैसे ही तू देह की इच्छा करता है और नाश को प्राप्त होता है, इससे इस अभिमान त्याग तो तुझको शान्ति हो । देह कुछ वस्तु नहीं केवल मन ही विकार है । पञ्चतत्त्वों की देह बनी हुई है सो भी कुछ वस्तु नहीं है, सब मन के फुरने से रचे हैं, इससे फुरने को त्यागकर आत्मपद में स्थित हो कि तुझको शान्ति हो । मैं तो इससे अतीत शुद्ध चिदानन्द-स्वरूप हूँ, मेरे पास न कोई मन है और न इन्द्रियाँ हैं । मैं अद्वैतरूप हूँ । जैसे राजा के समीप में कोई नहीं होता तैसे ही मेरे निकट मन और इन्द्रियाँ कोई नहीं—मैं शुद्ध आत्मतत्त्व हूँ । भोगों से मुझे क्या प्रयोजन है कि उनमें मिलकर दीनता को प्राप्त होऊँ । मुझको इनके साथ कुछ प्रयोजन नहीं चिरपर्यन्त रहें अथवा अबहीं नष्ट हो जावें, इनके नाश होने से मेरा नाश नहीं होता और ठहरने में प्रयोजन सिद्ध नहीं होता मैंने इनसे आपको भिन्न जाना है । जैसे तिलों से तेल निकाल लिया तब फिर तिलों में नहीं मिलता और दूध में माखन निकाल लिया तब फिर दूध में नहीं मिलता, तैसे ही विचार करके अपना आप निकाल लिया तब फिर इनके साथ नहीं मिलता । मैं शुद्ध चिदानन्द आत्मा हूँ,
उपशम प्रकरण । <span style="float:right;">६६३</span>
सब जगत् मेरे आश्रय है और सबमें मैं एक ही अनुस्यूत (व्यापा) हूँ । अब मैं उसी स्वरूप में स्थित होऊँ । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ऐसे विचारकर उद्दालक ब्राह्मण विषयों में वृत्ति और निवृत्त करके पद्मासन बाँध प्रणव अर्थात् अर्धमात्रा और आकार-उकार-मकार की क्रम से उपासना करने लगा और प्राणायाम करके मात्रा का ध्यान किया । अकार ब्रह्मा उकार विष्णु, मकार शिव और अर्धमात्रा, तुरीया इनकी क्रम सहित करने लगा । प्रथम रेचक प्राणायाम करने लगा और अकार की ध्वनि के साथ रेचक किया उससे सब प्राणवायु भीतर में निकले और हृदय शून्य और शुद्ध हुआ—जैसे अगस्त्यमुनि ने समुद्र को शून्य किया था—और आकाश में ऐसी ध्वनि हुई जो ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रपर्यन्त चली गई और देहा-भिमान को त्यागकर पुर्यष्टक को सुषुम्णा के मार्ग में प्राप्त किया । जैसे पक्षी आलय को त्यागकर आकाशमार्ग को उड़ता है तैसे ही उद्दालक ने पुर्यष्टक को ब्रह्मरन्ध्र में स्थित किया । हठ करने में दुःख होता है इस कारण जब तक सुख रहा तब तक स्थित रहा और जब थका और पुर्यष्टक का वायु अधः से आया तब उकार विष्णुरूप की ध्वनि और ध्यान के साथ कुम्भक किया । जब सब प्राणवायु की आधारचक्र में रोका—न नीचे आवे न ऊपर आवे—तो प्राण स्थित हुए और उससे अग्नि निकली जिसमें इसके सब पाप पुण्य जल गये । उसमें जबतक सुख रहा तब तक स्थित रहा क्योंकि हठयोग दुःखदायक है और फिर मकार की ध्वनि से रुद्र का ध्यान करके पूरक प्राणायाम किया । पूरक प्राणायाम करके सब स्थान वायु से पूर्ण किये और ऊर्ध्व को चित्तकला प्राप्त हुई उसमे यह औरों को पवित्र करनेवाला हुआ । जैसे धुआँ आकाश को जाता है और जल पाकर औरों को शीतल करनेवाला होता है तैसे ही इसका शरीर औरों को पवित्र करनेवाला हुआ । जैसे मन्दराचल में मथे हुए क्षीरसमुद्र में कल्पवृक्ष निकला तैसे ही इसके शरीर में प्राणवायु स्थित हुई और पद्मासन बाँधकर इन्द्रियों को रोका । जैसे हाथी बन्धनों से बँधता है तैसे ही इसने इन्द्रियों को रोका । अर्धमात्रा जो तुरीया-पद है उसके दर्शन के निमित्त यत्न करने लगा । उसने नेत्रों को आधा
६६४ | योगवाशिष्ठ ।
मूँदा और बाह्य विषयों को त्याग इन्द्रियों को भी त्याग किया और प्राण अपान को मूलचक्र में रोका जिससे नवों द्वार रोके गये । जैसे बालक के खेलने का पानी ओर होता है और उसके मूँदने से चलता पानी सब छिद्रों से रोका जाता है, तैसे ही मूल चक्र के रोकने से नवोंद्वार रोके गये । इस प्रकार उसने चित्त को रोका और जब मनरूपी चञ्चलमृग दौड़ा तब वैराग्य और अभ्यास के बल से फिर उसे रोका । जैसे बाँध से जल का वेग रुकता है तैसे ही उसने सब चित्त को स्थित किया तब अन्तःकरण की जो सात्त्विकी वृत्ति है उसको भी त्यागकर स्थित हुआ । जब मन की वृत्ति जो निद्रारूप है उसमें मन मूर्च्छित हो गया तब राजस-तामस का प्रवाह फिर फुरने लगा और उसको आत्मविवेक से निवृत्त किया । जैसे प्रकाश तम को निवृत्त करता है तैसे ही इस विकल्परूपी तम को उसने निवृत्त किया और विवेक के बल से चित्तकला में लगा और चित्त की वृत्ति से साक्षात्कार किया पर उसमें एक क्षण चित्त स्थित रहा और फिर बाहर निकल गया । जैसे बाँध को तोड़कर जल निकल जाता है । निदान उसने फिर अभ्यास के बल से उसे आत्मकला में लगाया तब उस परमशान्त आत्मपद में चित्त की वृत्ति स्थित हुई और परमआनन्द अमृत में मग्न हुई जो अशब्द, आनन्द और परिणाम से रहित है और जिस पद में देवता, ऋषीश्वर, ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र स्थित हैं । हे रामजी ! जो उस पद में एक क्षण भी स्थित हुआ है और जो वर्ष पर्यन्त हुआ है दोनों तुल्य हैं जिसको उस पद का अनुभव हुआ है वह भोगों की इच्छा नहीं करता । जैसे जिसने स्वर्ग का नन्दन वन देखा है वह कञ्ज के वन देखने की इच्छा नहीं करता, तैसे ही ज्ञानवान् भोगों की वाञ्छा नहीं करता और शोक कदाचित् नहीं उपजता । जैसे जिसको राज्य हुआ है वह दीनता को नहीं प्राप्त होता, तैसे ही जिसने आत्मपद में स्थिति पाई है उसको विषयों की तृष्णा और शोक नहीं उपजता । हे रामजी ! जब इस प्रकार उद्दालक स्थित था तब सिद्ध, गन्धर्व और विद्याधरों के गण जिनके मुख चन्द्रमा की नाईं थे उसके निकट आये और नमस्कार करके बोले, हे भगवन् ! स्वर्ग में चलके दिव्यभोग भोगो, तुमने बड़ी तपस्या
उपशम प्रकरण । ६६५
की है। धर्म, अर्थ और पुण्य का सार काम है और काम का सार जो स्त्रियाँ हैं वे तुम्हारे भोगने के निमित्त हैं, जिनसे स्वर्ग भी शोभता है--जैसे वसन्त ऋतु की मञ्जरी और पुष्पों से पृथ्वी शोभती है। इससे तुम विमानों पर आरूढ़ होकर स्वर्ग में चलो और बहुत काल पर्यन्त भोग भोगो। हे रामजी ! जब सिद्धों ने इस प्रकार बहुत कहा तब उद्दालक ने उनको अतिथि जानकर निरादर तो न किया किन्तु यथायोग्य पूजा करके हँसा और कहा कि हे सिद्धो ! तुमको नमस्कार है, आओ। पर वह उनकी सिद्धता में आसक्त न हुआ, क्योंकि परमानन्द में स्थित था और विषयों के सुख तुच्छ जानता था। जैसे अमृत खानेवाला विष की इच्छा नहीं करता तैसे ही उद्दालक सुख को न चाहता था। कुछ दिन रहकर सिद्ध पुजते रहे और फिर उठ गये पर यह परमपद में स्थित रहकर अपने प्रकृत व्यवहार करता रहा। फिर मेरु और मन्दराचल पर्वत में विचरा और कन्दरा में ध्यान लगा बैठा। कहीं एक दिन भर बैठा रहे और कहीं वर्षों के समूह बीत जावें, इस प्रकार समाधि करके उतरा फिर समाधि लग गई। हे रामजी ! चित्तत्त्व के अभ्यास से चैतन्य तत्त्व को प्राप्त होता है। दिशा में जैसे चित्र का सूर्य होता है तैसे ही उदय अस्त से रहित हो उसने परम उपशम पद को पाया, चित्त भली प्रकार शान्त हो गया और जन्मरूपी फाँसी को तोड़ उसका देहरूपी भ्रम-क्षीण होकर शरत्काल के आकाशवत् निर्मल हुआ विस्तृत और उत्कृष्ट प्रकाशरूप उसका वपु हो गया। तब वह सत्ता सामान्य में स्थित होकर विचरने लगा और परमशान्ति को प्राप्त हुआ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे उद्दालक विश्रान्तिवर्णन-न्नामैकोनपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥४९॥
रामजी ने पूछा, हे आत्मरूप ! आप ज्ञान दिन के प्रकाशकर्ता सूर्य हैं, संशयरूपी तृणों के जलानेवाले अग्नि हैं और ज्ञानरूपी तापों के शान्ति कर्त्ता चन्द्रमा हैं। हे ईश्वर ! सत्ता सामान्य का रूप क्या है ?
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जगत् के अत्यन्त अभाव की भावना करके जब चित्त क्षीण हो और उससे जो शेष रहे सो सत्ता सामान्य है।
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जब चित्त से रहित आत्मसत्ता हो और उसमें चित्त लीन हो जावे तब सत्ता सामान्य उदय हो, जो सत्य है सो ही सत्ता सामान्य है । हे रामजी ! जब सब प्रपञ्च शान्त होकर शुद्धबोध हो भीतर बाहर का व्यवधान मिट जावे और सब जगत् एकरूप होकर समाधि और उत्थान एकसा हो जावे ऐसी दशा की जो प्राप्ति है सो ही सत्ता सामान्य है । वह देह के होते ही विदेहरूप है और उसको तुरीयातीत पद कहते हैं । समाधि में स्थित हो तो भी केवलरूप है और उत्थान हो तो भी केवलरूप है । अज्ञानी समाधि के योग्य नहीं, क्योंकि ज्ञान से उपजी समाधि उसको नहीं प्राप्ति हुई । हमसे आदि देवर्षि नारद, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदिक जिनको ज्ञानरूप दृष्टि पुष्ट हुई है वे सत्तासामान्य में स्थित हैं और उनको समाधि और उत्थान में तुल्यता है । जैसे आकाश में पवन का चलना और ठहरना समान है और जैसे पृथ्वी में जल स्थित है और अग्नि में उष्णता स्थित है, तैसे ही सत्ता सामान्य में वह स्थित हुआ । जब तक जगत् में विचरने को उसकी इच्छा थी तब तक वह ऐसे विचरता रहा और जब विदेहमुक्ति होने की इच्छा हुई तब पहाड़ की कन्दरा में पत्रों का आसन बनाकर पद्मासन बाँध और दाँतों से दाँतों को मिलाकर सब संकल्पों का त्याग किया और प्राणवायु को मूल आधारचक्र करके नव द्वार खेचरी मुद्रा से रोके । न भीतर, न बाहर, न अधः, न ऊर्ध्व सर्वभाव-अभाव विकल्पों को त्यागकर उसने जब आत्मतत्त्व में चित्त की वृत्ति को लगाया तब शुद्ध चिन्मात्र में चित्त की वृत्ति जा प्राप्त हुई और रोम खड़े हो आये । जब उस व्युत्थान को भी उसने त्याग किया तब सत्ता सामान्य विश्वम्भर पद को प्राप्त हुआ, जो परम विश्रान्त, अनादि, आनन्द और सुन्दररूप है । तब पुतली की नाईं उसका शरीर हो गया और जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल होता है तैसे ही निर्मल पद को प्राप्त हुआ । जैसे सूर्य की किरणों के द्वारा वृक्ष में रस होता है और सूर्य उसे खींच लेता है और जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजकर उसी में लीन होते हैं तैसे ही उसका चित्त जिससे उपजा था उसी में लीन हो गया, सम्पूर्ण उपाधि विलास से रहित होकर उस आनन्दपद को प्राप्त हुआ
उपशम प्रकरण । [६६७]
जिसमें इन्द्रादिकों का आनन्द भी तुच्छ भासता है। ऐसा विश्वम्भर आनन्द जो उत्तम पुरुषों से सेवने योग्य है और जो अद्वैत और अपशब्द सत्तामान्य है उसमें जब उद्दालक प्राप्त हुआ तो परम शान्तरूप हो गया। निदान कुछ काल पीछे उसका शरीर गिर पड़ा—जैसे रस सूखने से वृक्ष गिर पड़ता है। जैसे वीणा बजती है और उसका शब्द प्रकट होता है तैसे ही जब वायु चले और उसके शरीर में प्रवेश कर निकले तो शब्द प्रकट होता था। कुछ काल पीछे देवताओं की स्त्रियाँ, अश्विनीकुमार की शक्ति जिसका अग्नि की नाईं तेज है और देव देवी जो सब देवताओं में पूज्य हैं सखियों सहित आई और उस शरीर को सुगन्धित पुष्पों की माला पहिराकर उसकी पूजा करके नृत्य करने लगीं और लीला की। हे रामजी ! उद्दालक के चित्त को वृत्ति में कलना से रहित विवेकरूपी बेलि हुई और उसमें आत्मानन्दरूपी फल लगा। जिसके हृदय में ऐसे फूलों की सुगन्ध स्थित हो वह सब भ्रम से तर जावे। जिसको ऐसा विवेक प्राप्त हो तो वह सब भ्रम से मुक्त हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे उद्दालकनिर्वाणवर्णन-नाम पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जिस प्रकार उद्दालक ऋषीश्वर आत्मपद को प्राप्त हुआ है उसी क्रम से अपने आपको विचार करके तू भी आत्म-पद को प्राप्त हो। हे कमलनयन ! कर्तव्य यही है कि गुरु और शास्त्रों के वचनों को धारण कर जगतभ्रम से मुक्त हो और आत्म अभ्यास से शान्त पद को प्राप्त हो। प्रथम गुरू और शास्त्रों के वाक्यों को समझिये और उससे जो विषयभूत अर्थ है उसके अभ्यास में बुद्धि को लगाइये। इस प्रकार जब दृढ़ता हो तब परमपद की प्राप्ति हो। अथवा बुद्धि में एक तीक्ष्ण अभ्यास हो और कलंक कल्पना से रहित ऐसा बोध हो तो साधनादि सामग्री मे रहित हो अथवा वैरागादिक सामग्री मे रहित हो तो भी अविनाशी पद को प्राप्त हो। रामजी ने पूछा, हे भूतभविष्य के ईश्वर ! एक ज्ञानवान् पुरुष तो समाधि में स्थित होता है और फिर जगत् व्यवहार में विचरता है और एक समाधि में स्थित है जगत् का व्यवहार नहीं करता
६६८ योगवाशिष्ठ ।
इन दोनों में श्रेष्ठ कौन है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! प्रथम समाधि का लक्षण सुनो कि समाधि किसको कहते हैं और व्युत्थान क्या है । यह गुणों का समूह अहंकार से लेकर पंच तत्त्वगुणात्मक है । जो इनको अनात्मरूप देखता है, आपको केवल इनका साक्षी चैतन्य जाना है और स्वाभाविक जिसका चित्त शीतल है उसको समाधि कहते हैं । जो मैत्री, करुणा, अमान्यता आदिक गुणों में स्थित हुआ है और जिसका मन आत्मविषय मे शान्ति को प्राप्त होता है उसको समाधि कहते हैं। हे रामजी ! जिसका ऐसा निश्चय होता है कि मैं शुद्ध चिदानन्दस्वरूप दृश्य के सम्बन्ध से रहित हूँ वह चाहे वन में रहे अथवा गृह में रहे दोनों स्थान उसको तुल्य हैं और वे दोनों पुरुष तुल्य हैं। अन्तःकरण का शीतल होना बड़े तपों का अनन्त फल है । हे रामजी ! जो इन्द्रियों का शमन करके बैठा है और मन से जगत् के पदार्थों की चिन्तना करता है उसकी समाधि मिथ्या है । वह उन्मत्त की नाईं नृत्य करता है । और जिसके मन में कोई वासना नहीं और व्यवहार करता है उसको बुद्धिमानों की समाधि के तुल्य जानो । कोई ज्ञानी व्यवहार करता है और कोई ज्ञान-वान् व्यवहार को त्यागकर वन में समाधि लगाकर स्थित हो बैठा है पर दोनों निश्चय से परमपद में प्राप्त होते हैं-इसमें संशय नहीं । ज्ञान-वान् निर्वाह हेतु पुरुषार्थ करता भी दृष्ट आता है तो भी अकर्ता है और अज्ञानी जो कर्त्ता भी नहीं परन्तु वासना से कर्तव्यभाव को प्राप्त होता है । जैसे कोई पुरुष कथा सुनने बैठा हो और उसका मन किसी और ठौर निकल गया हो तो सुनता भी नहीं सुनता, तैसे ही ज्ञानवान् का चित्त आत्मपद की ओर लगा है इससे वह कर्ता भी नहीं कर्ता, क्योंकि उसको कर्तृत्व का अभिमान नहीं होता । धन वासना सहित अज्ञानी सब इन्द्रियों को स्थित करके सो गया हो तो उसको स्वप्न आवे और पर्वत से गड्ढे में आपको गिरा देखता है और कष्टवान् होता है । इससे जहाँ वासना है वहाँ क्षोभ भी है और जहाँ कुछ वासना नहीं वहाँ शान्ति है । हे रामजी ! जिसमें कर्तृत्व का अभिमान नहीं और निश्चय से आपको अकर्ता जानता है उसको केवली भाव से समाधि में स्थित जानो और जिसमें
उपशम प्रकरण । ६६६
कर्तृत्व अभिमान है और समाधि में बैठा है तो भी उसको व्युत्थान जानो।
हे रामजी ! चित्त के चलाने का कारण स्मृति है जो स्मृति जगत् को लेकर
समाधि लगा बैठता है तो भी चित्त वासना से फैल जाता है। जैसे बीज
से अंकुर उपजता है और फैल जाता है तैसे ही मन में जो वासना होता है
उसमें चित्त फैल जाता है और जो जगत् की वासना मन से जाती रहती
है अर्थात् जगत् का सततभाव निवृत्त हो जाता है तब चित्त अचल हो जाता
है। हे रामजी ! जिस चित्त से वासना नष्ट होती है उसको अचल स्थिति
कहते हैं, वह ध्यान में केवलीभाव में स्थित होता है और जिसके चित्त
में सदा वासना फुरती है उसको सदा क्षोभ होता है । इससे निर्वासनिक
होकर तुम परमपद को प्राप्त हो । हे रामजी ! जिस चित्त में वासना
गन्ध होती है उसमें कर्तृत्व का अभिमान भी फुरता है और उससे सदा
दुःखी होता है । वासना के क्षीण हुए मुक्त होता है । जिस पुरुष के चित्त
से जगत् की आस्था निवृत्त हुई है और वीतशोक हुआ है वह स्वस्थ
आत्मा है उसको समाधि कहते हैं । हे रामजी ! जिसके हृदय से संसार
का राग द्वेष मिट गया है और शान्ति को प्राप्त हुआ है उसको सदिव्य
समाधि कहते हैं । इससे चित्त में जो पदार्थभावना है उसको त्यागकर
अपने स्वभाव में स्थित हो, तप गृह में रहो अथवा वन में जाओ दोनों
तुमको तुल्य हैं । हे रामजी ! जो गृह में स्थित है और चित्त समाहित है
और अहंकार के दोष से रहित है उसको कुटुम्ब और जनों के समूह भी वन
की नाईं हैं । ज्ञानवान् को गृह और वन तुल्य है और देह अभिमानी जो
अज्ञानी है वह वन में जाय और समाधि लगा बैठता है पर चित्त की वृत्ति
विषयों की ओर रहती है तब वह जगत् के समूह को देखता है अथवा
सुषुप्ति में जड़भूत हो जाती है । हे रामजी ! चित्त उत्थान में स्वरूप से गिरा
हुआ जगत्भ्रम दिखाता है और जब चित्त निर्वाण आत्मा में स्थित
होता है तब उपशम होता है । हे रामजी ! जो पुरुष सब भाव पदार्थों से
आत्मा को अतीत जानता है वह समाहित चित्त कहाता है और जिसको
जाग्रत् जगत् स्वप्नवत् भासता है वह समाहित चित्त कहाता है । वह पुरुष
जन के समूह में रहता है तो भी उसका सम्बन्ध किसी से नहीं । जैसे कोई