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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

६८८ योगवाशिष्ट ।

का है। अंगुष्ठ से लेकर मस्तक पर्यन्त अहं वस्तु कुछ नहीं। यह शरीर तो अस्थि, मांस और रक्त का थैला है, यह तो अहंरूप नहीं और श्वास वायुरूप और पोल आकाशरूप है। यह पञ्चतत्त्वों का जो शरीर बना है उसमें अहंरूप वस्तु तो कुछ नहीं है। हे मूर्ख मन ! तू अहं अहं क्यों करता है ? यह जो तू कहता है। कि मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ, मैं सूँघता हूँ, मैं स्पर्श करता हूँ, मैं स्वाद लेता हूँ और इनके इष्ट अनिष्ट में राग द्वेष से जलता है सो वृथा कष्ट पाता है। रूप को नेत्र ग्रहण करते हैं, नेत्र रूप से उत्पन्न हुए हैं और तेज का अंश उनमें स्थित है जो अपने विषय को ग्रहण करता है, इसके साथ मिलकर तू क्यों तपायमान होता है ? शब्द आकाश में उत्पन्न हुआ है और आकाश का अंश श्रवण में स्थित है जो अपने शब्द गुण को ग्रहण करता है, इसके साथ मिलकर तू क्यों रागद्वेष कर तपायमान होता है ? स्पर्श इन्द्रिय वायु से उत्पन्न हुई है और वायु का अंश त्वचा में स्थित है वही स्पर्श को ग्रहण करता है, उससे मिलकर तू क्यों रागद्वेष से तपायमान होता है ? रसना इन्द्रिय जल से हुई है और जल का अंश जिह्वा है जो अग्रभाग में स्थित है वही रस ग्रहण करती है, इससे मिलकर तू क्यों वृथा तपायमान होता है ? और घ्राण इन्द्रिय गन्ध से उपजी है और पृथ्वी का अंश घ्राण में स्थित है वही गन्ध को ग्रहण करती है, उसमें मिलकर तू क्यों वृथा रागद्वेषवान् होता है ? मूर्ख मन ! इन्द्रियाँ तो अपने-अपने विषय को ग्रहण करती हैं पर तू इनमें अभिमान करता है कि मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ, मैं सूँघता हूँ, मैं स्पर्श करता हूँ और रस लेता हूँ। यह इन्द्रियाँ तो सब आत्मभर हैं अर्थात् अपने विषय को ग्रहण करती हैं और के विषय को ग्रहण नहीं करती कि नेत्र देखते हैं श्रवण नहीं करते और कान सुनते हैं देखते नहीं इत्यादि । सब इन्द्रियाँ अपना धर्म किसी को देती भी नहीं और न किसी का लेती हैं। वे अपने धर्म में स्थित हैं और विषय को ग्रहण कर इनको रागद्वेष कुछ नहीं होता। इनको ग्रहण करने की वासना भी कुछ नहीं होती और तू ऐसा मूर्ख है कि औरों के धर्म आपमें मानकर रागद्वेष से जलता है। जो

उपशम प्रकरण । ६८६

तू भी राग-द्वेष से रहित होकर चेष्टा करे तो तुझको दुःख कुछ न हो । जो वासना सहित कर्म करता है वह बन्धन का कारण होता है, वासना बिना कुछ दुःख नहीं होता । तू मूर्ख है जो विचार कर नहीं देखता । इसमें मैं तुझको त्याग करता हूँ। तेरे साथ मिलके मैं बड़े खेद पाता हूँ। जैसे भेडिये के बालक को सिंह चूर्ण करता है तैसे ही तूने मुझको चूर्ण किया है । तेरे साथ मिलकर में तुच्छ हुआ हूँ । अब तेरे साथ मेरा प्रयो-जन कुछ नहीं, मैं तो निर्विकल्प शुद्ध चिदानन्द हूँ। जैसे महाकाश घट से मिलकर घटाकाश होता है तैसे ही तेरे साथ मिलकर में तुच्छ हो गया हूँ । इस कारण में तेरा सङ्ग त्यागकर परम चिदाकाश को प्राप्त होऊँगा । मैं निर्विकार हूँ और अहं त्वं की कल्पना से रहित हूँ । तू क्यों अहं त्वं करता है ? शरीर में व्यर्थ अहं करनेवाला और कोई नहीं तू ही चोर है । अब मैंने तुझकी पकड़कर त्याग दिया है । तू तो अज्ञान से उपजा मिथ्या और असत्यरूप है जैसे बालक अपनी परछाहीं में वैताल जानकर आप भय पाता है तैसे ही तूने सबको दुःखी किया है । जब तेरा नाश होगा तब आनन्द होगा । तेरे उपजने से महादुःख है-जैसे कोई ऊँचे पर्वत से गिरके कूप में जा पड़े और कष्टवान् हो तैसे ही तेरे सङ्ग से में आत्मपद से गिरा देह अभिमानरूपी गढ़े में रागद्वेषरूपी दुःख पाता था, पर अब तुझको त्यागकर में निरहंकार पद को प्राप्त हुआ हूँ । वह पद न प्रकाश है, न तम है, न एक है, न दो है, न बड़ा है और न छोटा है, अहं त्वं आदि से रहित अचैत्य चिन्मात्र है । जरा मृत्यु राग द्वेष और भय सब तेरे संयोग से होते हैं । अब तेरे वियोग से मैं निर्वि-कार शुद्ध पद को प्राप्त होता हूँ। हे मन ! तेरा होना दुःख का कारण है। जब तू निर्वीज हो जावेगा तब मैं ब्रह्मारूप होऊँगा । तेरे सङ्ग से मैं तुच्छ हुआ हूँ, जब तू निवृत्त होगा तब मैं शुद्ध होऊँगा-जैसे मेघ और कुहिरे के होने से आकाश मलीन भासता है पर जब वर्षा हो जाती है तब शुद्ध और निर्मल हो रहता है, तैसे ही तेरे निवृत्त हुए निर्लेप अपना आप आत्मा भासता है । हे चित्त ! ये जो देह इन्द्रियादिक पदार्थ हैं सो भिन्न हैं, इनमें अहं वस्तु कुछ नहीं, इनको एक तूने ही इकट्ठी किया है । जैसे

६६० योगवासिष्ठ ।

एक तागा अनेक मणियों को इकट्ठा करता है तैसे ही सबको इकट्ठा करके तू अहं अहं करता है। तू मिथ्या रागद्वेष करता है इससे तू शीघ्र ही सब इन्द्रियों को लेकर निर्वाण हो जिससे तेरी जय हो।

इति श्रीयोगवासिष्ठे उपशमप्रकरणे उद्दालकविचारो नामाष्ट- चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४८ ॥

उद्दालक बोले, आत्मा जो सूक्ष्म से सूक्ष्म है, स्थूल से स्थूल है और शुद्ध, निर्विकार और शान्तरूप है सो में अचेत्य चिन्मात्र हूँ मेरे में कोई विकार नहीं और जितने जन्म-मरण आदिक विकार भासते हैं वे आत्मा में चित्त ने कल्पे हैं, वास्तविक आत्मा में कोई विकार नहीं । जन्म उसको कहते हैं जो पहले न हो और पीछे उपजे । आत्मा तो आगे ही सिद्ध है फिर जन्म कैसे कहिये ? और मृत्यु वह कहाती है जो पीछे न हो पहले का अभाव हो जावे, पर आत्मा तो जगत् के अन्त में भी सिद्ध है इससे सब विकारों से रहित है फिर मृत्यु रूप प्रध्वंसाभाव कैसे कहिये ? देह के आदि, मध्य, अन्त, तीनों कालों में आत्मा सिद्ध है, इससे वह सब विकारों से रहित है और चित्त के संयोग से विकारों सहित भासता है । हे चित्त ! तेरे संयोग से मैंने इतने भ्रम पाये थे और शरीर में व्यर्थ अहं अहं होता है सो जाना नहीं जाता कि कौन है । शरीर तो रक्त-मांस का पिण्ड है, इन्द्रियाँ मन आदिक सब जड़ हैं तो अहं करनेवाला कौन है ? जब अहं होता है तब भाव-अभाव पदार्थ को ग्रहण करता है पर जहाँ अहं का अभाव है वहाँ भाव-अभाव कैसे हो ? अहंकार झूठ है, इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों का ग्रहण करती हैं और मनादिक भी अपने स्वभाव में स्थित हैं। यह अहं करनेवाला नहीं पाया जाता कि कौन है ? अहं का रूप कुछ नहीं इससे निश्चय हुआ कि सब पदार्थ झूठ हैं। अहंकार का ग्रहण करनेवाला भी झूठ है और जितने पदार्थ हैं वे अहंकार से होते हैं । में इससे मिलकर देह इन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट में क्यों राग-द्वेष करूँ ? इसका और मेरा कुछ संयोग नहीं में तो निर्लेप और अद्वैत आत्मा हूँ, संयोग किससे हो ? मैं भाव रूप ब्रह्म हूँ मेरा संयोग किससे हो ? यह तो सब असत्यरूप है और जो कहिये देहादिक हैं तो भी संयोग नहीं बनता-

उपशम प्रकरण । ६६१

जैसे लोहे और ढेले (मिट्टी) का संयोग नहीं होता । यह बड़ा आश्चर्य है कि सबका अहं करनेवाला कौन था ? यह मिथ्या अहंकार अज्ञान से दुःख-दायक था । जैसे अज्ञान से बालक को वेताल भासकर दुःख देता है तैसे ही अविचार से दुःख होता है । जैसे पहाड़ पर बादल स्थित होता है तो पहाड़ बादल नहीं होता और बादल पहाड़ नहीं होता, तैसे ही आत्मा अनात्मा नहीं होता और अनात्मा आत्मा नहीं होता । जैसे सूर्य की किरणों में जल और रस्सी में सर्प भासता है तैसे ही आत्मा में अहंकार भासता है और विचार करने से अहंकार कुछ नहीं निकलता । जहाँ अहंकार होता है वहाँ दुःख भी आ स्थित होते हैं जैसे जहाँ मेघ होता है वहाँ बिजली भी होती है, तैसे ही जहाँ अहंकार होता है वहाँ शरीर-रूपी वृक्ष की मञ्जरी बढ़ती है । जैसे गरुड़ के विद्यमान होते सर्प नहीं रहता तैसे ही आत्मविचार के विद्यमान होते अहंकार नहीं रहता । इससे चित्तादिक सब झूठे हैं और अज्ञान से भासते हैं तो इनसे रचा हुआ जगत् कैसे सत्य हो । यह जगत् अकारण है इससे मिथ्याभ्रम से भासता है ! जैसे भ्रान्ति से आकाश में दूसरा चन्द्रमा भासता है, नौका में बैठे हुए को तट के वृक्ष चलते भासते हैं और गन्धर्वनगर भासता है । जब चित्त नष्ट होता है तब सब भ्रम का अभाव हो जाता है । देह में जो अभिमान है सो ही दुःख का कारण है । जबतक विचार नहीं उपजता तब तक भासता है—जैसे बरफ़ की पुतली तब तक होती है जब तक सूर्य का तेज नहीं लगा और जब सूर्य का तेज लगता है तब बरफ़ की पुतली गल जाती है । जैसे बालक को घूमने से पृथ्वी भ्रमती भासती है तैसे ही चित्त के भ्रम से यह जगत् भासता है और विचार के उपजे से अहंकार गल जाता है । हे मन ! तेरे साथ मिलने से बड़ा दुःख होता है । तुझसे रहित मैंने आपको देखा है, अब तू सब इन्द्रियों सहित निर्वाण हो । आत्मविचार से आत्म अग्नि में स्थित हो कि सब मल तेरा जलकर शुद्धता को प्राप्त हो । इस देह के साथ तेरा मिलाप दुःख के निमित्त है । मन और देह के भीतर से आपस में शत्रुभाव है पर बाहर से स्नेह भासता है । भीतर दोनों परस्पर नाश करने की इच्छा करते हैं । जो दुःख होता है

६६२ योगवाशिष्ठ ।

तो मन उसके नाश की इच्छा करता है, और देह कहती है मन न हो तो मेरे में कोई दुःख नहीं—इसका मिलना ही दुःख का कारण है । हे मूर्ख मन ! देह को तेरे संग से दुःख होता है । स्वतः नहीं । मन में देह का अभिमानन होतो भी कोई दुःख नहीं, इनके संयोग में ही दुःख होता है और बिछुरने से दुःख कुछ नहीं—तैसे ही मन और देह का संयोग कुछ नहीं । जैसे जहाँ अंगारों की वर्षा होती है वहाँ बुद्धिमान नहीं रहते तैसे ही इनमें मिलाप करना हमको योग्य नहीं । हे मूर्ख मन ! जितना कुछ दुःख तुझको होता है सो देह के मिलाप से होता है तो फिर इसके साथ तू किस निमित्त मिलता है और आपको सुखी जानता है । इसके मिलने से तुझको दुःख ही होता है परन्तु तू ऐसा मूर्ख है जो वारम्वार देह की ओर ही दौड़ता है और सुख जानता है पर तेरा नाश होता है । जैसे पतङ्ग दीपक को सुखरूप जानकर मिलने की इच्छा करता है पर जल मरता है और मछली मांस की इच्छा करती है सो बंसी में फँस मरती है तैसे ही तू देह की इच्छा करता है और नाश को प्राप्त होता है, इससे इस अभिमान त्याग तो तुझको शान्ति हो । देह कुछ वस्तु नहीं केवल मन ही विकार है । पञ्चतत्त्वों की देह बनी हुई है सो भी कुछ वस्तु नहीं है, सब मन के फुरने से रचे हैं, इससे फुरने को त्यागकर आत्मपद में स्थित हो कि तुझको शान्ति हो । मैं तो इससे अतीत शुद्ध चिदानन्द-स्वरूप हूँ, मेरे पास न कोई मन है और न इन्द्रियाँ हैं । मैं अद्वैतरूप हूँ । जैसे राजा के समीप में कोई नहीं होता तैसे ही मेरे निकट मन और इन्द्रियाँ कोई नहीं—मैं शुद्ध आत्मतत्त्व हूँ । भोगों से मुझे क्या प्रयोजन है कि उनमें मिलकर दीनता को प्राप्त होऊँ । मुझको इनके साथ कुछ प्रयोजन नहीं चिरपर्यन्त रहें अथवा अबहीं नष्ट हो जावें, इनके नाश होने से मेरा नाश नहीं होता और ठहरने में प्रयोजन सिद्ध नहीं होता मैंने इनसे आपको भिन्न जाना है । जैसे तिलों से तेल निकाल लिया तब फिर तिलों में नहीं मिलता और दूध में माखन निकाल लिया तब फिर दूध में नहीं मिलता, तैसे ही विचार करके अपना आप निकाल लिया तब फिर इनके साथ नहीं मिलता । मैं शुद्ध चिदानन्द आत्मा हूँ,

उपशम प्रकरण । <span style="float:right;">६६३</span>

सब जगत् मेरे आश्रय है और सबमें मैं एक ही अनुस्यूत (व्यापा) हूँ । अब मैं उसी स्वरूप में स्थित होऊँ । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ऐसे विचारकर उद्दालक ब्राह्मण विषयों में वृत्ति और निवृत्त करके पद्मासन बाँध प्रणव अर्थात् अर्धमात्रा और आकार-उकार-मकार की क्रम से उपासना करने लगा और प्राणायाम करके मात्रा का ध्यान किया । अकार ब्रह्मा उकार विष्णु, मकार शिव और अर्धमात्रा, तुरीया इनकी क्रम सहित करने लगा । प्रथम रेचक प्राणायाम करने लगा और अकार की ध्वनि के साथ रेचक किया उससे सब प्राणवायु भीतर में निकले और हृदय शून्य और शुद्ध हुआ—जैसे अगस्त्यमुनि ने समुद्र को शून्य किया था—और आकाश में ऐसी ध्वनि हुई जो ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रपर्यन्त चली गई और देहा-भिमान को त्यागकर पुर्यष्टक को सुषुम्णा के मार्ग में प्राप्त किया । जैसे पक्षी आलय को त्यागकर आकाशमार्ग को उड़ता है तैसे ही उद्दालक ने पुर्यष्टक को ब्रह्मरन्ध्र में स्थित किया । हठ करने में दुःख होता है इस कारण जब तक सुख रहा तब तक स्थित रहा और जब थका और पुर्यष्टक का वायु अधः से आया तब उकार विष्णुरूप की ध्वनि और ध्यान के साथ कुम्भक किया । जब सब प्राणवायु की आधारचक्र में रोका—न नीचे आवे न ऊपर आवे—तो प्राण स्थित हुए और उससे अग्नि निकली जिसमें इसके सब पाप पुण्य जल गये । उसमें जबतक सुख रहा तब तक स्थित रहा क्योंकि हठयोग दुःखदायक है और फिर मकार की ध्वनि से रुद्र का ध्यान करके पूरक प्राणायाम किया । पूरक प्राणायाम करके सब स्थान वायु से पूर्ण किये और ऊर्ध्व को चित्तकला प्राप्त हुई उसमे यह औरों को पवित्र करनेवाला हुआ । जैसे धुआँ आकाश को जाता है और जल पाकर औरों को शीतल करनेवाला होता है तैसे ही इसका शरीर औरों को पवित्र करनेवाला हुआ । जैसे मन्दराचल में मथे हुए क्षीरसमुद्र में कल्पवृक्ष निकला तैसे ही इसके शरीर में प्राणवायु स्थित हुई और पद्मासन बाँधकर इन्द्रियों को रोका । जैसे हाथी बन्धनों से बँधता है तैसे ही इसने इन्द्रियों को रोका । अर्धमात्रा जो तुरीया-पद है उसके दर्शन के निमित्त यत्न करने लगा । उसने नेत्रों को आधा

६६४ | योगवाशिष्ठ ।

मूँदा और बाह्य विषयों को त्याग इन्द्रियों को भी त्याग किया और प्राण अपान को मूलचक्र में रोका जिससे नवों द्वार रोके गये । जैसे बालक के खेलने का पानी ओर होता है और उसके मूँदने से चलता पानी सब छिद्रों से रोका जाता है, तैसे ही मूल चक्र के रोकने से नवोंद्वार रोके गये । इस प्रकार उसने चित्त को रोका और जब मनरूपी चञ्चलमृग दौड़ा तब वैराग्य और अभ्यास के बल से फिर उसे रोका । जैसे बाँध से जल का वेग रुकता है तैसे ही उसने सब चित्त को स्थित किया तब अन्तःकरण की जो सात्त्विकी वृत्ति है उसको भी त्यागकर स्थित हुआ । जब मन की वृत्ति जो निद्रारूप है उसमें मन मूर्च्छित हो गया तब राजस-तामस का प्रवाह फिर फुरने लगा और उसको आत्मविवेक से निवृत्त किया । जैसे प्रकाश तम को निवृत्त करता है तैसे ही इस विकल्परूपी तम को उसने निवृत्त किया और विवेक के बल से चित्तकला में लगा और चित्त की वृत्ति से साक्षात्कार किया पर उसमें एक क्षण चित्त स्थित रहा और फिर बाहर निकल गया । जैसे बाँध को तोड़कर जल निकल जाता है । निदान उसने फिर अभ्यास के बल से उसे आत्मकला में लगाया तब उस परमशान्त आत्मपद में चित्त की वृत्ति स्थित हुई और परमआनन्द अमृत में मग्न हुई जो अशब्द, आनन्द और परिणाम से रहित है और जिस पद में देवता, ऋषीश्वर, ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र स्थित हैं । हे रामजी ! जो उस पद में एक क्षण भी स्थित हुआ है और जो वर्ष पर्यन्त हुआ है दोनों तुल्य हैं जिसको उस पद का अनुभव हुआ है वह भोगों की इच्छा नहीं करता । जैसे जिसने स्वर्ग का नन्दन वन देखा है वह कञ्ज के वन देखने की इच्छा नहीं करता, तैसे ही ज्ञानवान् भोगों की वाञ्छा नहीं करता और शोक कदाचित् नहीं उपजता । जैसे जिसको राज्य हुआ है वह दीनता को नहीं प्राप्त होता, तैसे ही जिसने आत्मपद में स्थिति पाई है उसको विषयों की तृष्णा और शोक नहीं उपजता । हे रामजी ! जब इस प्रकार उद्दालक स्थित था तब सिद्ध, गन्धर्व और विद्याधरों के गण जिनके मुख चन्द्रमा की नाईं थे उसके निकट आये और नमस्कार करके बोले, हे भगवन् ! स्वर्ग में चलके दिव्यभोग भोगो, तुमने बड़ी तपस्या

उपशम प्रकरण । ६६५

की है। धर्म, अर्थ और पुण्य का सार काम है और काम का सार जो स्त्रियाँ हैं वे तुम्हारे भोगने के निमित्त हैं, जिनसे स्वर्ग भी शोभता है--जैसे वसन्त ऋतु की मञ्जरी और पुष्पों से पृथ्वी शोभती है। इससे तुम विमानों पर आरूढ़ होकर स्वर्ग में चलो और बहुत काल पर्यन्त भोग भोगो। हे रामजी ! जब सिद्धों ने इस प्रकार बहुत कहा तब उद्दालक ने उनको अतिथि जानकर निरादर तो न किया किन्तु यथायोग्य पूजा करके हँसा और कहा कि हे सिद्धो ! तुमको नमस्कार है, आओ। पर वह उनकी सिद्धता में आसक्त न हुआ, क्योंकि परमानन्द में स्थित था और विषयों के सुख तुच्छ जानता था। जैसे अमृत खानेवाला विष की इच्छा नहीं करता तैसे ही उद्दालक सुख को न चाहता था। कुछ दिन रहकर सिद्ध पुजते रहे और फिर उठ गये पर यह परमपद में स्थित रहकर अपने प्रकृत व्यवहार करता रहा। फिर मेरु और मन्दराचल पर्वत में विचरा और कन्दरा में ध्यान लगा बैठा। कहीं एक दिन भर बैठा रहे और कहीं वर्षों के समूह बीत जावें, इस प्रकार समाधि करके उतरा फिर समाधि लग गई। हे रामजी ! चित्तत्त्व के अभ्यास से चैतन्य तत्त्व को प्राप्त होता है। दिशा में जैसे चित्र का सूर्य होता है तैसे ही उदय अस्त से रहित हो उसने परम उपशम पद को पाया, चित्त भली प्रकार शान्त हो गया और जन्मरूपी फाँसी को तोड़ उसका देहरूपी भ्रम-क्षीण होकर शरत्काल के आकाशवत् निर्मल हुआ विस्तृत और उत्कृष्ट प्रकाशरूप उसका वपु हो गया। तब वह सत्ता सामान्य में स्थित होकर विचरने लगा और परमशान्ति को प्राप्त हुआ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे उद्दालक विश्रान्तिवर्णन-न्नामैकोनपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥४९॥

रामजी ने पूछा, हे आत्मरूप ! आप ज्ञान दिन के प्रकाशकर्ता सूर्य हैं, संशयरूपी तृणों के जलानेवाले अग्नि हैं और ज्ञानरूपी तापों के शान्ति कर्त्ता चन्द्रमा हैं। हे ईश्वर ! सत्ता सामान्य का रूप क्या है ?

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जगत् के अत्यन्त अभाव की भावना करके जब चित्त क्षीण हो और उससे जो शेष रहे सो सत्ता सामान्य है।

६६६योगवाशिष्ठ ।

जब चित्त से रहित आत्मसत्ता हो और उसमें चित्त लीन हो जावे तब सत्ता सामान्य उदय हो, जो सत्य है सो ही सत्ता सामान्य है । हे रामजी ! जब सब प्रपञ्च शान्त होकर शुद्धबोध हो भीतर बाहर का व्यवधान मिट जावे और सब जगत् एकरूप होकर समाधि और उत्थान एकसा हो जावे ऐसी दशा की जो प्राप्ति है सो ही सत्ता सामान्य है । वह देह के होते ही विदेहरूप है और उसको तुरीयातीत पद कहते हैं । समाधि में स्थित हो तो भी केवलरूप है और उत्थान हो तो भी केवलरूप है । अज्ञानी समाधि के योग्य नहीं, क्योंकि ज्ञान से उपजी समाधि उसको नहीं प्राप्ति हुई । हमसे आदि देवर्षि नारद, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदिक जिनको ज्ञानरूप दृष्टि पुष्ट हुई है वे सत्तासामान्य में स्थित हैं और उनको समाधि और उत्थान में तुल्यता है । जैसे आकाश में पवन का चलना और ठहरना समान है और जैसे पृथ्वी में जल स्थित है और अग्नि में उष्णता स्थित है, तैसे ही सत्ता सामान्य में वह स्थित हुआ । जब तक जगत् में विचरने को उसकी इच्छा थी तब तक वह ऐसे विचरता रहा और जब विदेहमुक्ति होने की इच्छा हुई तब पहाड़ की कन्दरा में पत्रों का आसन बनाकर पद्मासन बाँध और दाँतों से दाँतों को मिलाकर सब संकल्पों का त्याग किया और प्राणवायु को मूल आधारचक्र करके नव द्वार खेचरी मुद्रा से रोके । न भीतर, न बाहर, न अधः, न ऊर्ध्व सर्वभाव-अभाव विकल्पों को त्यागकर उसने जब आत्मतत्त्व में चित्त की वृत्ति को लगाया तब शुद्ध चिन्मात्र में चित्त की वृत्ति जा प्राप्त हुई और रोम खड़े हो आये । जब उस व्युत्थान को भी उसने त्याग किया तब सत्ता सामान्य विश्वम्भर पद को प्राप्त हुआ, जो परम विश्रान्त, अनादि, आनन्द और सुन्दररूप है । तब पुतली की नाईं उसका शरीर हो गया और जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल होता है तैसे ही निर्मल पद को प्राप्त हुआ । जैसे सूर्य की किरणों के द्वारा वृक्ष में रस होता है और सूर्य उसे खींच लेता है और जैसे समुद्र में तरङ्ग उपजकर उसी में लीन होते हैं तैसे ही उसका चित्त जिससे उपजा था उसी में लीन हो गया, सम्पूर्ण उपाधि विलास से रहित होकर उस आनन्दपद को प्राप्त हुआ

उपशम प्रकरण । [६६७]

जिसमें इन्द्रादिकों का आनन्द भी तुच्छ भासता है। ऐसा विश्वम्भर आनन्द जो उत्तम पुरुषों से सेवने योग्य है और जो अद्वैत और अपशब्द सत्तामान्य है उसमें जब उद्दालक प्राप्त हुआ तो परम शान्तरूप हो गया। निदान कुछ काल पीछे उसका शरीर गिर पड़ा—जैसे रस सूखने से वृक्ष गिर पड़ता है। जैसे वीणा बजती है और उसका शब्द प्रकट होता है तैसे ही जब वायु चले और उसके शरीर में प्रवेश कर निकले तो शब्द प्रकट होता था। कुछ काल पीछे देवताओं की स्त्रियाँ, अश्विनीकुमार की शक्ति जिसका अग्नि की नाईं तेज है और देव देवी जो सब देवताओं में पूज्य हैं सखियों सहित आई और उस शरीर को सुगन्धित पुष्पों की माला पहिराकर उसकी पूजा करके नृत्य करने लगीं और लीला की। हे रामजी ! उद्दालक के चित्त को वृत्ति में कलना से रहित विवेकरूपी बेलि हुई और उसमें आत्मानन्दरूपी फल लगा। जिसके हृदय में ऐसे फूलों की सुगन्ध स्थित हो वह सब भ्रम से तर जावे। जिसको ऐसा विवेक प्राप्त हो तो वह सब भ्रम से मुक्त हो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे उद्दालकनिर्वाणवर्णन-नाम पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५० ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जिस प्रकार उद्दालक ऋषीश्वर आत्मपद को प्राप्त हुआ है उसी क्रम से अपने आपको विचार करके तू भी आत्म-पद को प्राप्त हो। हे कमलनयन ! कर्तव्य यही है कि गुरु और शास्त्रों के वचनों को धारण कर जगतभ्रम से मुक्त हो और आत्म अभ्यास से शान्त पद को प्राप्त हो। प्रथम गुरू और शास्त्रों के वाक्यों को समझिये और उससे जो विषयभूत अर्थ है उसके अभ्यास में बुद्धि को लगाइये। इस प्रकार जब दृढ़ता हो तब परमपद की प्राप्ति हो। अथवा बुद्धि में एक तीक्ष्ण अभ्यास हो और कलंक कल्पना से रहित ऐसा बोध हो तो साधनादि सामग्री मे रहित हो अथवा वैरागादिक सामग्री मे रहित हो तो भी अविनाशी पद को प्राप्त हो। रामजी ने पूछा, हे भूतभविष्य के ईश्वर ! एक ज्ञानवान् पुरुष तो समाधि में स्थित होता है और फिर जगत् व्यवहार में विचरता है और एक समाधि में स्थित है जगत् का व्यवहार नहीं करता

६६८ योगवाशिष्ठ ।

इन दोनों में श्रेष्ठ कौन है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! प्रथम समाधि का लक्षण सुनो कि समाधि किसको कहते हैं और व्युत्थान क्या है । यह गुणों का समूह अहंकार से लेकर पंच तत्त्वगुणात्मक है । जो इनको अनात्मरूप देखता है, आपको केवल इनका साक्षी चैतन्य जाना है और स्वाभाविक जिसका चित्त शीतल है उसको समाधि कहते हैं । जो मैत्री, करुणा, अमान्यता आदिक गुणों में स्थित हुआ है और जिसका मन आत्मविषय मे शान्ति को प्राप्त होता है उसको समाधि कहते हैं। हे रामजी ! जिसका ऐसा निश्चय होता है कि मैं शुद्ध चिदानन्दस्वरूप दृश्य के सम्बन्ध से रहित हूँ वह चाहे वन में रहे अथवा गृह में रहे दोनों स्थान उसको तुल्य हैं और वे दोनों पुरुष तुल्य हैं। अन्तःकरण का शीतल होना बड़े तपों का अनन्त फल है । हे रामजी ! जो इन्द्रियों का शमन करके बैठा है और मन से जगत् के पदार्थों की चिन्तना करता है उसकी समाधि मिथ्या है । वह उन्मत्त की नाईं नृत्य करता है । और जिसके मन में कोई वासना नहीं और व्यवहार करता है उसको बुद्धिमानों की समाधि के तुल्य जानो । कोई ज्ञानी व्यवहार करता है और कोई ज्ञान-वान् व्यवहार को त्यागकर वन में समाधि लगाकर स्थित हो बैठा है पर दोनों निश्चय से परमपद में प्राप्त होते हैं-इसमें संशय नहीं । ज्ञान-वान् निर्वाह हेतु पुरुषार्थ करता भी दृष्ट आता है तो भी अकर्ता है और अज्ञानी जो कर्त्ता भी नहीं परन्तु वासना से कर्तव्यभाव को प्राप्त होता है । जैसे कोई पुरुष कथा सुनने बैठा हो और उसका मन किसी और ठौर निकल गया हो तो सुनता भी नहीं सुनता, तैसे ही ज्ञानवान् का चित्त आत्मपद की ओर लगा है इससे वह कर्ता भी नहीं कर्ता, क्योंकि उसको कर्तृत्व का अभिमान नहीं होता । धन वासना सहित अज्ञानी सब इन्द्रियों को स्थित करके सो गया हो तो उसको स्वप्न आवे और पर्वत से गड्ढे में आपको गिरा देखता है और कष्टवान् होता है । इससे जहाँ वासना है वहाँ क्षोभ भी है और जहाँ कुछ वासना नहीं वहाँ शान्ति है । हे रामजी ! जिसमें कर्तृत्व का अभिमान नहीं और निश्चय से आपको अकर्ता जानता है उसको केवली भाव से समाधि में स्थित जानो और जिसमें

उपशम प्रकरण । ६६६

कर्तृत्व अभिमान है और समाधि में बैठा है तो भी उसको व्युत्थान जानो। 
हे रामजी ! चित्त के चलाने का कारण स्मृति है जो स्मृति जगत् को लेकर 
समाधि लगा बैठता है तो भी चित्त वासना से फैल जाता है। जैसे बीज 
से अंकुर उपजता है और फैल जाता है तैसे ही मन में जो वासना होता है 
उसमें चित्त फैल जाता है और जो जगत् की वासना मन से जाती रहती 
है अर्थात् जगत् का सततभाव निवृत्त हो जाता है तब चित्त अचल हो जाता 
है। हे रामजी ! जिस चित्त से वासना नष्ट होती है उसको अचल स्थिति 
कहते हैं, वह ध्यान में केवलीभाव में स्थित होता है और जिसके चित्त 
में सदा वासना फुरती है उसको सदा क्षोभ होता है । इससे निर्वासनिक 
होकर तुम परमपद को प्राप्त हो । हे रामजी ! जिस चित्त में वासना 
गन्ध होती है उसमें कर्तृत्व का अभिमान भी फुरता है और उससे सदा 
दुःखी होता है । वासना के क्षीण हुए मुक्त होता है । जिस पुरुष के चित्त 
से जगत् की आस्था निवृत्त हुई है और वीतशोक हुआ है वह स्वस्थ 
आत्मा है उसको समाधि कहते हैं । हे रामजी ! जिसके हृदय से संसार 
का राग द्वेष मिट गया है और शान्ति को प्राप्त हुआ है उसको सदिव्य 
समाधि कहते हैं । इससे चित्त में जो पदार्थभावना है उसको त्यागकर 
अपने स्वभाव में स्थित हो, तप गृह में रहो अथवा वन में जाओ दोनों 
तुमको तुल्य हैं । हे रामजी ! जो गृह में स्थित है और चित्त समाहित है 
और अहंकार के दोष से रहित है उसको कुटुम्ब और जनों के समूह भी वन 
की नाईं हैं । ज्ञानवान् को गृह और वन तुल्य है और देह अभिमानी जो 
अज्ञानी है वह वन में जाय और समाधि लगा बैठता है पर चित्त की वृत्ति 
विषयों की ओर रहती है तब वह जगत् के समूह को देखता है अथवा 
सुषुप्ति में जड़भूत हो जाती है । हे रामजी ! चित्त उत्थान में स्वरूप से गिरा 
हुआ जगत्भ्रम दिखाता है और जब चित्त निर्वाण आत्मा में स्थित 
होता है तब उपशम होता है । हे रामजी ! जो पुरुष सब भाव पदार्थों से 
आत्मा को अतीत जानता है वह समाहित चित्त कहाता है और जिसको 
जाग्रत् जगत् स्वप्नवत् भासता है वह समाहित चित्त कहाता है । वह पुरुष 
जन के समूह में रहता है तो भी उसका सम्बन्ध किसी से नहीं । जैसे कोई

७०० | योगवाशिष्ट ।

उपज और संशयरूपीवायु से उसकी बुद्धिरूपी पद्मिनी डोलायमान हुई कि बड़ा अनर्थ है कि मैं जीवों को कष्ट देता हूँ । इससे मैं इनको धन देऊँ और कष्ट न देऊँ । जैसे तिलों को तेली पेरता है तैसे ही में पापियों को कष्ट देता हूँ । दुष्टों को कष्ट दिये बिना राज्य नहीं चलता-जैसे जल बिना नदी का प्रवाह नहीं चलता-और यदि दण्ड देता हूँ तो वे दुःख पावते हैं । मैं क्या करूँ दोनों बातों में कष्ट है । हे रामजी ! ऐसे विचार में राजा बहुत भ्रमता रहा । निदान एक दिन उसके गृह में माण्डव मुनि आये-जैसे इन्द्र के घर में नारद आवें-तब राजा ने भली प्रकार उनका पूजन किया और संदेहवान् होकर पूछा, हे भगवन् ! तुम सर्व धर्मगत हो, तुम्हारे आने से मैं बड़े आनन्द को प्राप्त हुआ हूँ जैसे वसन्त ऋतु मे पृथ्वी प्रफुल्लित होती है तैसे ही में प्रफुल्लित हुआ हूँ में भी अब आपको पुण्यवान् जानता हूँ कि मैं भी पुण्यवानों में प्रसिद्ध होऊँगा, क्योंकि तुम मेरे गृह में आये हो । जैसे सूर्य के उदय हुये प्रकाश हो आता है तैसे ही में तुम्हारे दर्शन से प्रसन्न भया हूँ । हे भगवन् ! मुझको एक संशय उसके निवारण करने को आपही योग्य हो । जैसे सूर्य के उदय हुए अन्धकार नष्ट हो जाता है तैसे ही तुमसे मेरा संशय निवृत्त होगा । जो कोई महापुरुषों का संग करता है उसका संशय अवश्य निवृत्त होता है । संशय ही सब दुःखों का कारण है इससे मेरे संशय को तुम दूर करो । मुझे यह संशय है कि यदि कोई दुष्ट कर्म करता है तो उसको मैं दण्ड देता हूँ और जब उसको दुःखी देखता हूँ तो दया उपजती है । जैसे सिंह नख मे हाथी को खैंचता है तैसे यह संशय मुझको खैंचता है । इससे वही उपाय कहो जिससे मुझको समता प्राप्त हो । जैसे सूर्य की किरणें सब ठौर में सम होती हैं तैसे ही इष्ट-अनिष्ट में मैं सम होऊँ । कृपा करके मुझसे वही उपाय कहिये । माण्डव बोले, हे राजन् ! यह तो बहुत सुगम है और अपने अधीन है, आपही से सिद्ध होता है और अपने ही गृह में है । हे राजन् ! सब उपाधि मन में उठती है वह मन तुच्छ है और विचार किये से निवृत्त हो जाता है । जैसे उष्णता से बरफ जलमय हो जाता है तैसे ही विचार किये से सब मननभाव लीन हो जाता

उपशम प्रकरण । ७०१

है परन्तु हर्ष शोक के वश नहीं होता वह समाहित चित्त कहाता है। जो पुरुष सबको आत्मरूप देखता है, चित्त को नहीं चितवता, भविष्यत् की इच्छा नहीं करता और वर्तमान में राग द्वेष से रहित होकर विचरता है वह समाहितचित्त कहाता है। हे रामजी! जो पुरुष जगत् की पूर्वापर गति को देखकर हँसता है, समपद में स्थित होता है और किसी में ममता नहीं करता वह समाहितचित्त कहाता है। जो पुरुष अहंममता से और जगत् की विभाग कल्पना मे रहित है और जिससे चेतन अचेतन-भाव नहीं फुरता वह पुरुष सत्य है और आकाश की नाईं स्वच्छ निर्मल है और राग, द्वेष, क्रोध विकारों से काष्ठ लोष्ट समान हो रहता है। वह सब भूतों को अपने समान देखता है और अन्यों के द्रव्य को देखकर ईर्षा नहीं करता। वह स्वभाव ही से उसे नहीं चाहता द्वन्द्व के भय से नहीं त्यागता। ऐसे जो देखता है और अहंकार से रहित होता है वह न जगत् के सत्यभाव को देखता है, न असत्य भाव को देखता है, न ज्ञात को देखता है, न अज्ञात को देखता है, न जड़ को देखता है, न चेतन को देखता है, वह तो केवल अद्वैततत्त्व देखता है। वह महाशान्तपद में स्थित है, वह उठ खड़ा हो अथवा बैठा रहे, उदय हो अथवा अस्त हो, बड़े भोगों में रहे अथवा वन में जा बैठे, अथवा मद्यपान से उन्मत्त हो और नृत्य करे और गयादिक तीर्थों में निवास करे अथवा कन्दरा में निवास करे, शरीर को अगर चन्दन का लेपन करे अथवा कीचड़ के साथ लपेटे, देह अभी गिर पड़े अथवा कल्पपर्यन्त रहे, उस पुरुष को कदाचित् कुछ कलङ्क नहीं लगता। जैसे सुवर्ण को कीचड़ के मिलाप से दोष नहीं लगता तैसे ही ज्ञानवान् को कर्तृत्व का दोष नहीं लगता। हे रामजी! इस संवित् को अहन्ता ही कलङ्क है। महापुरुष अहंकार से रहित है इससे उनको कर्तृत्व स्पर्श नहीं करता। जैसे सीपी को रूप का आभास नहीं स्पर्श करता तैसे ही ज्ञानवान् को क्रिया स्पर्श नहीं करती। हे रामजी! अहन्ता ही से जीव दीन होता है। जब अहन्ता फुरती है तब अनेक प्रकार के दुःख सुख देखता है और परम्परा जन्मों को देखता है और भय पाता है। जैसे किसी को रस्सी में सर्प भासता है और भय पाता है पर जब भली प्रकार दीपक के प्रकाश से

७०२ योगवाशिष्ठ ।

देखता है तब सर्प भय निवृत्त होता है, तैसे ही अहंता से यह दुःख पाता है और अहंता के शान्त हुए शान्तिमान् होता है। हे रामजी ! ज्ञानवान् जो कुछ कर्म करता, खाता, पीता, लेता, देता, हवन करता है उसमें अहन्ता का अभिमान नहीं करता इससे करने में उसका कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता और जो नहीं करता उसमें भी कुछ अभिमान नहीं इससे करने से उसको कुछ हानि नहीं होती वह अपने स्वभाव में स्थित है और जगत् को द्वैतभावसे नहीं देखता, सबको आत्मभाव से देखता है इससे उसे कर्म स्पर्श नहीं करते।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे ध्यानविचारो नामैकपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५१ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! चित्त आदिक जो जगत् है सो वास्तव में आत्मा से भिन्न नहीं है। आत्मरूपी मिरच है उससे चित्त अहंतारूपी देश, काल, तीक्ष्णता भिन्न नहीं जैसे ईख से मधुरता भिन्न नहीं तैसे आत्मा से जगत् भिन्न नहीं। जैसे पत्थर में कठोरता है तैसे ही आत्मा में जगत् है, जैसे पर्वत में जड़ता होती है तैसे ही आत्मा में अहन्ता होती है जैसे जल में द्रवता होती है तैसे ही आत्मा में अहन्ता आदिक होते हैं। जैसे फूल, फल, टास वृक्ष से भिन्न नहीं होते तैसे ही आत्मा में अहन्ता आदिक अभेद होते हैं, जैसे तीक्ष्णता मिरचों से भिन्न नहीं होता तैसे ही चित्त अहन्तारूपी देशकाल आत्मा से भिन्न नहीं। जैसे अग्नि में उष्णता बर्फ में शीतलता, सूर्य में प्रकाश और गुड़ में मधुरता होती है, तैसे ही आत्मा में जगत् होता है। जैसे अमृत में स्वादवेदना होती है तैसे ही आत्मा में देश कालवेदना होती है। हे रामजी ! जैसे मणि में प्रकाश होता है तैसे आत्मा में अहन्ता होती है और जैसे जल से तरङ्ग भिन्न नहीं होता तैसे ही आत्मा में अहन्ता आदिक भिन्न नहीं होते। जो कुछ जगत् भासता है सो आत्मतत्त्व का प्रकाश है जो अनन्त आत्मा सबमें पूर्ण है और एक ही ईश्वरभाव में स्थित महाघन शिला की नाईं स्थित है—उससे भिन्न कुछ नहीं। जैसे आकाश अपने भाव में स्थित है तैसे ही सत्य केवल आत्मा में स्थित है और अपने आपसे निर्वेद है पर वेदना भी उससे नहीं। जैसे जल ही तरङ्गरूप हो भासता है तैसे ही आत्मा वेदनारूप हो

उपशम प्रकरण । ७०३

भासता है और जैसे जल में द्रवता और पवन में चलना भासता है तैसे ही ज्ञानरूप आत्मा में अहन्ता से देश काल, जगत् भासता है । हे रामजी ! जीवों का जीना ज्ञान से होता है और ज्ञानसत्ता चैतन्यरूप है । चिन्मात्र और जीवों में रश्कमात्र भी कुछ भेद नहीं । जैसे ज्ञान चैतन्यसत्ता और जीव में भेद नहीं तैसे ही ज्ञाता और जगत् में कुछ भेद नहीं—एक ही अखण्डसत्ता ज्यों की त्यों स्थित है । हे रामजी ! सर्वसत्ता एक, अज, अनादि और आदि अन्त, मध्य से रहित, प्रकाशरूप, चिन्मात्र अद्वैततत्त्व अपने आप में स्थित है । वह अवाच्यपद है उसमें वाणी प्रवेश नहीं कर सकती और जितने वाक्य हैं वह उसके जताने के निमित्त कहे हैं । वास्तव में द्वैत वस्तु कुछ नहीं है, एक आत्मतत्त्व को अपने हृदय में धारण कर स्थित हो ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे भेदनिराशावर्णनन्नाम द्विपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५२ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! एक आगे पुरातन इतिहास हुआ है उसको तुम सुनो । उत्तर दिशा में एक सुगन्धित पृथ्वी है वह मानो कपूर से लिपी हुई है और वहाँ सदाशिव के हंस स्थित हैं । हिमालय के शिखर पर वह कैलास पर्वत है जो सब पर्वतों से उत्तम और उज्ज्वल है वह रुद्र के रहने का स्थान है, वहाँ कल्पवृक्ष लगे हैं और गङ्गा का प्रवाह चलता है । और भी बहुतसी बड़ी नदियाँ वहाँ चलती हैं और कमलों सहित बहुत महासुन्दर तालाब स्थित हैं जहाँ बहुत मृग पक्षी हैं । उस हिमालय के नीचे स्वर्णवत् जटावाले क्रान्त रहते हैं—जैसे वृक्ष के मूल में पिपीलिका रहती हैं । उस कान्त देश का राजा सुरध मानो प्रत्यक्ष लक्ष्मीमूर्ति धारे हुए, वेगवान् ऐसा मानो पवन की मूर्ति, वैराग्यवान् मानो गजेन्द्र, बुद्धिमान् मानो वृहस्पति और शुक्र के समान कवि था । राजा ऐसा था मानो इन्द्र है, और धनी ऐसा मानो कुबेर था । राजा होकर वह राज्य करता था और भली प्रकार प्रजा की पालना करता था । जो भले मार्ग में चलें उनकी वह रक्षा करे और जो पापकर्म चोरी आदिक करें उनको दण्ड दे और जैसा कर्म प्राप्त हो उसमें द्वेष से रहित होकर व्यतीत करे । एक समय वह अपने ध्यान में बैठा था तब चित्त में विचार

उपशम प्रकरण । ७०५

तब ताप भी निवृत्त हो जाता है । जैसे शरत्काल के आये से कुहिरा नष्ट हो जाता है तैसे ही विचार किये से मननभाव नष्ट हो जाता है । विचारो कि मैं कौन हूँ, इन्द्रियाँ क्या हैं, जगत् क्या है और जन्म-मरण किसको कहते हैं ? इस विचार से जब तुम अपने स्वभाव में स्थित होगे तब तुमको हर्ष, शोक, क्रोध और राग-द्वेष चलायमान न कर सकेगा । जैसे वायु से पर्वत चलायमान नहीं होता तैसे ही तुम अचल रहोगे । हे राजन् ! जब आत्मबोध होगा तब मन अपने मननभाव को त्याग देगा और तुम सन्ताप से रहित अपने स्वरूप को प्राप्त होगे। जैसे तरङ्गभाव मिटने से जल निर्मल होता है तैसे ही तुम अचल होगे और मनधर्म भी रहेगा परन्तु मध्य से अज्ञान नष्ट हो जावेगा और आत्मसत्ताभाव होगा । जैसे काल वही रहता है परन्तु ऋतु और हो जाती है तैसे ही मन वही होगा परन्तु स्वभाव और हो जावेगा । तेरे नौकर और प्रजा भी साधु हो जावेंगे और तेरी आज्ञा में चलेंगे और तुझको देखकर प्रसन्न होंगे । हे राजन् ! जब तुझको विवेकरूपी दीपक से आत्मारूपी मणि मिलेगा तब तेरी बड़ाई सुमेरु और समुद्र और आकाश से भी अधिक होगी । जब तुझको विवेक से आत्मतत्त्व का प्रकाश होगा तब तू संसार की तुच्छ वृत्ति में न डूबेगा । जैसे गोपद के जल में हाथी नहीं डूबता तैसे ही तू राग द्वेष में न डूबेगा । जिसको देह में अभिमान है और चित्त में वासना है और वह तुच्छ संसार की वृत्ति में डूबता है, इससे जितना अनात्मभाव दृश्य है उसका त्यागकर, पीछे जो शेष रहे सो परमतत्त्व आत्मा है । हे राजन् ! जो कुछ सत्य वस्तु है उसको हृदय में धरो और जो असत्य है उसको त्याग करो । जैसे जब तक कल्लर को सोनार धोता है तब तक सुवर्ण नहीं निकलता और जब सुवर्ण निकलता है तब धोने का त्याग करता है, तैसे ही तब तक आत्मविचार कर्तव्य है जब तक आत्मा का साक्षात्कार नहीं हुआ । जब आत्मतत्त्व का साक्षात्कार होता है तब विचार से प्रयोजन नहीं रहता । हे राजन् ! सबमें, सब प्रकार, सब काल, सब आत्मा की भावना करो अथवा जितना दृश्यभाव है सो सब त्याग करोगे तो जो शेष रहेगा सो तुमको भासि आवेगा । जब

७०६ | योगवाशिष्ठ ।

तक सब दृश्य का त्याग न करोगे तब तक आत्मपद का लाभ न होगा । सर्व दृश्य के त्याग से आत्मपद भासेगा । हे राजन ! जब किसी वस्तु के पाने का यत्न करता है तो और का त्यागकर उसी का यत्न करिये तो प्राप्त होता है तो आत्मतत्त्व अनन्य हुए बिना कैसे प्राप्त होगा । जब अपना सम्पूर्ण यत्न एक ही ओर लगाता है तब उस पद की प्राप्ति होती है। इससे आत्मपद के पाने के लिये सब दृश्य को त्यागकर सबके त्याग किये में जो शेष रहे सो परमपद है । हे राजन ! सबके त्याग किये से जो सत्ता अधिष्ठान रहेगा सो तुझको आत्मभाव से प्राप्त होगा ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे सुरघवृत्तान्तमाण्डव्योपदेशोनाम त्रिपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार कहकर जब माण्डवमुनि अपने स्थान को गये तब सुरघ राजा एकान्त में बैठकर विचार करने लगा कि मैं कौन हूँ ? न मैं सुमेरु हूँ, न मेरा सुमेरु है, न मैं जगत हूँ, न मेरा जगत् है, न मैं पृथ्वी हूँ, न मेरी पृथ्वी है, न मैं क्रान्तमण्डल हूँ और न मेरा क्रान्तमण्डल है, क्योंकि यह अपने भाव में स्थित है मेरे भाव में तो नहीं । जो मैं न होऊँ तो भी यह ज्यों का त्यों स्थित है, तो यह मेरे कैसे होवे और मैं इनका कैसे होऊँ ? न मैं नगर हूँ और न मेरा नगर है । हाथी, घोड़ा, मन्दिर, धन स्त्री पुत्रादिक जो कुछ पदार्थ हैं सो न मेरे हैं और न मैं इनका हूँ । इनमें आसक्त होना वृथा है, इनमें मेरा कुछ सम्बन्ध नहीं । जितने भोगों के समूह हैं ये न मैं हूँ, और न ये मेरे हैं । नौकर, भृत्य और कलत्र सब अपने भाव से सिद्ध हैं, मेरा इनमें सम्बन्ध कुछ नहीं । न मैं राजा हूँ, न मेरा राज्य है । में एकाएकी शरीरमात्र हूँ और इनमें में ममत्व करता हूँ सो वृथा है । शरीर में जो में अहँ करता हूँ सो भी व्यर्थ है, क्योंकि हाथ-पाँव आदिक का स्वरूप भिन्न है, न यह मैं हूँ और न ये मेरे हैं । इनमें मेरा शब्द कुछ नहीं । यह रक्त, मांस, हाड़ आदिकरूप है सो मैं नहीं । यह जड़ है और मैं चेतन हूँ, इनके साथ मेरा कैसे सम्बन्ध हो । जैसे जल का स्पर्श कमल को नहीं होता तैसे ही इनका स्पर्श मुझको नहीं । न में कर्मइन्द्रियाँ हूँ और न मेरी कर्म-

उपशम प्रकरण । ७०७

इन्द्रियाँ हैं । यह जड़ है, मैं चैतन्य हूँ । न मैं ज्ञानेन्द्रिय हूँ, न मेरी ज्ञान इन्द्रियाँ हैं । इनसे परे मन है सो भी मैं नहीं, क्योंकि यह जड़ है । मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार ये सब अनात्मरूप हैं । मेरा इनके साथ अविद्या का सम्बन्ध है । भ्रान्ति से में इनको अपना स्वरूप जानता था पर यह सब भूतों का कार्य है । इनके पीछे चेतन जीव है जो चेतन दृश्य को चेतनेवाला है सो चेतन चेतना भी मैं नहीं । इन सबमें शेष अचेत चिन्मात्रसत्ता मेरा स्वरूप है । बड़ा कल्याण हुआ जो मैंने अपना आप पाया । अब मैं जागा हूँ । बड़ा आश्चर्य है कि में वृथा देहादिक को अपना जानकर शोक और मोह को प्राप्त होता था । मैं तो एक निर्विकल्प चेतन और अनन्त आत्मा सबमें व्याप रहा हूँ और ब्रह्मरूप आत्मा हूँ । इन्द्रियों से आदि जितने भूतगण हैं उन सबका में आत्मा हूँ । यह भगवान् आत्मा सबके भीतर व्यापा है । जैसे सबके भीतर पाँचतत्त्व होते हैं तैसे ही यह चेतनरूप सर्व भाव को भर रहा है और सर्व भावों में व्याप रहा है । भेदरूप और उदय अस्त भाव आदि विकारों से वह रहित है । ब्रह्मा से आदि तृण पर्यन्त सबका आत्मा यही है । सब प्रकाशों का प्रकाशनेवाला दीपक वही है और संसाररूपी मोतियों के पिरोनेवाला तागा और सबका कारण कार्य यही है । वह साकार से रहित है और शरीरादिक सब उसी की सत्ता मे उपलब्ध होते हैं । शरीररूपी रथ इसी से चलता है वास्तव में शरीरादिक कुछ वस्तु नहीं । यह जगत् चित्तरूपी नट की नृत्यलीलारूप है । चित्त में जगत् फुरता है वास्तव में और कुछ वस्तु नहीं । बड़ा कष्ट है कि में वृथा संग्रह असंग्रह की चिन्ता करता था । यह गुणों का प्रवाह है इसमें में क्यों शोकवान् होता था ? बड़ा आश्चर्य है कि असत्यभ्रम सत्य हो मुझको दीखता था । अब मैं निश्चय करके मम प्रबोध हुआ हूँ और दुर्दृष्टि मेरी दूर हुई है । दृष्टि की जो अलभ्य दृष्टि है सो अब मैंने देखी है और जो कुछ पाने योग्य था सो मैंने पाया है और अचेत्य चिन्मात्र को प्राप्त हुआ हूँ । जो कुछ दृश्य है उसको में स्वरूप से देखता हूँ और अहँ मम दुःख मेरा नष्ट हुआ है । मैं चिदानन्द पूर्ण और नित्य शुद्ध अनन्त आत्मा अपने आप में स्थित हूँ । ग्रहण क्या और त्याग

७०८ | योगवाशिष्ठ ।

क्या ? यह क्लेश कोई नहीं और न कोई दुःख है, न सुख है, सर्व ब्रह्म है और दूसरी वस्तु कुछ नहीं। में राग किसका करूँ और द्वेष किसका हो ? मैं मिथ्या मूढ़ता को प्राप्त होकर दुःखी होता था, अब कल्याण हुआ कि में अमूढ़ होकर अपने आप स्वभाव में स्थित हुआ हूँ। ऐसे आत्मा के साक्षात्कार बिना में दुःखी था। इसके देखे से अब किसका शोक करूँ और मोह को कैसे प्राप्त होऊँ। अब में क्या देखूँ, क्या करूँ और कहाँ स्थित होऊँ ? यह सब जगत् आत्मा के प्रकाश से है और सब आत्मरूप है। हे अतत्त्वरूप ! अर्थात् जिसमें तत्त्वों की उपाधि कुछ नहीं तेरी दृष्टि निष्कलङ्क है। में अब सम्यक् ज्ञानवान् हुआ हूँ। मेरा तुझको नमस्कार है। में अनन्त आत्मा, अनुभवरूप, निष्कलङ्क, सर्व इच्छा भ्रमरहित, सुषुप्ति की नाईं शान्तरूप, अचैत्य, चिन्मात्र सदा अपने आपमें स्थित हूँ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे सुरघवृत्तान्तवर्णन-नाम चतुष्पञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५४ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! क्रान्त जो सुवर्णरूप देश है उसका राजा परमानन्द को प्राप्त हुआ। वह इस प्रकार विचार अभ्यास से ब्रह्मरूप हुआ जैसे गाधि का पुत्र विश्वामित्र तपस्या करके उसी शरीर में क्षत्रिय से ब्राह्मण हुआ था तैसे ही राजा सुरघ अभ्यास करके ब्रह्मरूप ब्रह्मबोध हुआ और जैसे सूर्य इष्ट अनिष्ट में सम है और विगतज्वर होकर दिनों को व्यतीत करता है तैसे ही राग द्वेष से रहित वह राज्य का कार्य करता रहा। जैसे जल ऊँची नीची ठौर में जाता है और अपना जलभाव नहीं त्यागता सम रहता है, तैसे ही राजा हर्षशोक से रहित होकर राज्य कार्य करता रहा और स्वभाव को न त्यागा। आत्मविचार का धार सुषुप्ति की नाईं उसकी वृत्ति हो गई और संसार भाव का स्फुरना रुक गया। जैसे वायु से रहित दीपक प्रकाशता है तैसे ही वह शुद्ध प्रकाश धारता भया। हे रामजी ! वह दया करता भी दृष्टि आवे परन्तु उसकी दृष्टि में कुछ दया नहीं और दया से रहित भी औरों को दीखे परन्तु उसकी दृष्टि में निर्दयता नहीं। न कुछ सुख, न दुःख, न अर्थ, न अनर्थ सब पदार्थों में एक समभाव आत्मा देखे और हृदय से पूर्णमासी के चन्द्रमावत् शीतल