BharatKosha
Back to the archive

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages
Page 156Permalink

१४२ [ दूसरी पञ्चिका यजमान की जड़ खोदना चाहे वह "चुपचाप की प्रार्थना" न पढ़े क्योंकि इसके न पढ़ने से यज्ञ बिना जड़ के हो जाता है और यजमान यज्ञ के साथ ही नष्ट हो जाता है। इस पर कहते हैं कि होता को यह प्रार्थना पढ़नी ही चाहिये। यह ऋत्विज् के लाभ के लिये है, जो "तूष्णीं शंस" पढ़ी जाती है। ऋत्विज् में ही यज्ञ प्रतिष्ठित है। और यज- मान यज्ञ में प्रतिष्ठित है। इसलिये "चुपचाप प्रार्थना" पढ़नी चाहिये। (८) ऐतरेय ब्राह्मण की दूसरी पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त

Page 157Permalink

पाँचवाँ अध्याय ३३—आज्य शस्त्र के तीन भागों में से "आहाव" नामी पहला ब्राह्मण है। "निविद्" नामी दूसरा क्षत्रिय है। "सूक्त" ० नामी तीसरा वैश्य है। आहाव के बाद निविद् को कह कर होता ब्राह्मण को क्षत्रिय से मिला देता है। 'सूक्त' से पहले निविद् को कहकर क्षत्रिय से वैश्य को मिला देता है। यदि होता यजमान को क्षत्ररहित करना चाहे तो निविद् के मध्य में सूक्त कह दे। ऐसा करने से वह उसको क्षत्र-रहित कर देता है। यदि होता चाहे कि यजमान को वैश्य-रहित कर दे तो सूक्त के मध्य में निविद् कह दे। ऐसा करने से वह यजमान को वैश्य-रहित कर देता है। अगर चाहे कि यजमान को ठीक ठीक सब वर्णों से मुक्त रक्खे तो पहले आहाव कहे, फिर निविद्, फिर सूक्त। यही ठीक ठीक क्रम है। पहले अकेला प्रजापति ही था। उसने चाहा कि बहुत हो जाऊँ। उसने तप तपा। उसने मौन धारण कर लिया। एक ( १४३ )

Page 158Permalink

१४४ [ दूसरी पञ्चिका वर्ष के पश्चात् उसने बारह पद कहे, यही बारह निविद् के पद हैं। निविद् कहने के पश्चात् सब प्राणी उत्पन्न हुये। इसको (कुत्स) ऋषि ने नीचे का मन्त्र पढ़ते हुये देखा— स पूर्वया निविदा कव्यतायोरिमाः प्रजा अजनयन्मनूनाम्। विव- स्वता चक्षसा द्यामपश्च देवा अग्निं धारयन् द्रविणोदाम्॥ (ऋ० १।९६।२) "उस अग्नि ने पहले निविद् से और काव्य से मनुष्यों की प्रजा को उत्पन्न किया। हर जगह चमकते हुये प्रकाश से द्यौ और जलों को उत्पन्न किया। देवों ने धन देने वाले अग्नि को धारण किया।" इसीलिये जब होता सूक्त से पहले निविद् को कहता है तो उसे सन्तान का लाभ होता है। जो इस रहस्य को समझता है उसको सन्तान और पशु की प्राप्ति होती है। (१) ३४—होता कहता है : “अग्निर्देवेद्धः” "अग्नि देवों से प्रज्वलित की गई"। देवों की प्रज्वलित की हुई वह (स्वर्गीय) अग्नि है क्योंकि उसको देवों ने प्रज्वलित किया है। इसी के द्वारा वह उस लोक में इस अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है। अब कहता है : “अग्निर्मन्विद्धः” "अग्नि मनुष्यों द्वारा प्रज्वलित की गई।" मनुष्यों से प्रज्वलित की गई अग्नि यह (पृथ्वी) की अग्नि है। क्योंकि मनुष्यों ने इसे जलाया है। इसके द्वारा वह इस लोक की अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है। अब वह कहता है :— “अग्निः सुसमिद्” "अग्नि जो अच्छी तरह प्रज्वलित करता है"। यह "अग्निः

Page 159Permalink

पांचवाँ अध्याय ] १४५ सुशमित्" वायु है । वायु अपने द्वारा अपने को और जो कुछ संसार में है उसको प्रज्वलित करता है । इसके द्वारा वह अन्त- रिक्ष में वायु पर आधिपत्य प्राप्त करता है । अब कहता है :- "होता देववृतः" "देवों से वरण किया हुआ होता" । देवों से वरण किया हुआ होता वह ( स्वर्गीय ) अग्नि है । क्योंकि वह हर जगह देवों से वरण किया हुआ है । इस प्रकार वह उस लोक में उस पर आधिपत्य प्राप्त करता है । अब वह कहता है :- "होता मनुवृतः" "मनुष्यों से वरण किया गया होता ।" मनुष्यों से वरण किया हुआ होता यह (इस लोक की) अग्नि है । क्योंकि यह अग्नि हर जगह मनुष्यों द्वारा वरण की जाती है । इस प्रकार होता इस लोक में इस अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है । अब वह कहता है :- "प्रणीर्यज्ञानाम्" "यज्ञों को ले जाने वाला" । वायु यज्ञों का ले जाने वाला है । जब वह चलता है तब यज्ञ होता है तभी अग्निहोत्र होता है । इस प्रकार अन्तरिक्ष में वायु पर आधिपत्य प्राप्त करता है । अब कहता है :- "रथीरध्वराणाम्" "अध्वरों का रथी ।" अध्वरों का रथी वह (सूर्य्य) है । क्योंकि वह रथी के समान चलता है । इस प्रकार होता इस अग्नि पर इस लोक में आधिपत्य प्राप्त करता है । १०

Page 160Permalink

१४६ [ दूसरी पञ्चिका अब वह कहता है :- "ऋतूर्तों होता" "अपराजित होता" । यह अग्नि अपराजित होता है। क्योंकि कोई इसका मुकाविला नहीं कर सकता। इस प्रकार होता इस लोक में इस अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है। अब वह कहता है :- "तूर्णिर्हव्यवाट्" "हव्य को ले जाने वाले वाहक" । हव्यों को ले जाने वाला वाहक वायु है। क्योंकि वायु सारे संसार में शीघ्रता से बहता है। वह हवियों को देवों तक ले जाता है। इस प्रकार वह अन्तरिक्ष में वायु पर आधिपत्य पाता है। अब वह कहता है :- "आ देवो देवान् वक्षत् ।" "देव देवों को लावें।" वह देव ( स्वर्गीय अग्नि ) है जो देवों को यहां लाता है। इस प्रकार वह उस लोक में उस अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है। अब वह कहता है :- "यक्षादग्निर्देवो देवान् ।" "अग्नि देव देवों के प्रति मन्त्र बोले।" देवों के प्रति मन्त्र बोलने वाला यह अग्नि है। इस प्रकार वह इस लोक में अग्नि पर आधिपत्य प्राप्त करता है। अब वह कहता है :- "सो अध्वराकरति जातवेदाः ।" "वह जातवेद पवित्र आहुति को बनावे।"

Page 161Permalink

पांचवाँ अध्याय ] १४७ वायु ही जातवेद है। वायु ही इस सब संसार को बनाता है। इस प्रकार वह अन्तरिक्ष में वायु पर आधिपत्य प्राप्त करता है। (निविद् के यह बारह पद हुये) । (२) ३५—अब होता इन अनुष्टुभ् मन्त्रों को पढ़ता है :— प्र वो देवायाग्नये बर्हिष्ठमर्चास्मै । गमद् देवेभिरा स नो यजिष्ठो बर्हिरा सदत् ॥ ऋतावा यस्य रोदसी दक्षं सचन्त ऊतयः । हविष्मन्तस्तमीलते तं सनिष्यन्तोऽवसे ॥ स यन्ता विप्र एषां स यज्ञानामथा हि षः । अग्निं तं वो दुवस्यत दाता यो वनिता मखम् ॥ स नः शर्माणि वीतयेऽग्निर्यच्छतु शन्तमा । यतो नः प्रुष्णवद् वसु दिवि क्षितिभ्यो अप्स्वा ॥ दीदिवांसमपूर्व्यं वस्वीभिरस्य धीतिभिः । ऋक्ववाणो अग्निमिन्धते होतारं विश्पतिं विशाम् ॥ उत नो ब्रह्मन्नविष उक्थेषु देवहूतमः । श नः शोचा मरुद् वृधोऽग्ने सहस्रसातमः ॥ नू नो रास्व सहस्रवत् तोकवत् पुष्टिमद् वसु । द्युमदग्ने सुवीर्यं वर्षिष्ठमनुपक्षितम् ॥ (ऋ० ३।१३।१-७) वह पहले पद को अलग करता है। क्योंकि स्त्री अपनी जांघों को अलग करती है। वह अन्तिम पदों को जोड़ता है। क्योंकि पुरुष जांघों को मिलाता है। यह मैथुन है। वह आज्य मंत्र को पढ़ने के आरम्भ में संतान-प्रजनन के लिये मैथुन करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह सन्तान और पशुओं से युक्त होता है। इस सूक्त को पढ़ते हुये पहले पदों को अलग करने से वज्र के पिछले भाग को मोटा कर देता है। और अन्तिम भागों को

Page 162Permalink

१४८ [ दूसरी पञ्चिका मिलाकर अगले भाग को पतला कर देता है। यही हाल दण्ड या कुठार का है ! इस प्रकार वह अपने शत्रु पर प्रहार करता है। जिस शत्रु को दबाना हो, वज्र उसको दबा लेगा। (३) ३६—इन लोकों में देव और असुर लड़ते थे। देवों ने ( उत्तर वेदी के दक्षिण को ) ऋत्विजों के बैठने के स्थान (सदस् ) को ग्रहण किया। असुरों ने उनको वहाँ से उठा दिया। तब वे उत्तर वेदी के वांई ओर आग्नीध्र के स्थान पर चले गये। वहाँ वह पराजित न हो सके। इस लिये ऋत्विज् आग्नीध्र के पास बैठते हैं। सदस् पर नहीं। आग्नीध्र के पास बैठ कर वह अग्नि के पास घरे जाते हैं इसलिये उसे आग्नीध्र कहते हैं। आग्नीध्र का आग्नीध्रत्व यही है। असुरों ने देवों के सदस् की अग्नि को बुझा दिया। लेकिन देवों ने आग्नीध्र से अपने सदस् की अग्नि को जला लिया। इस प्रकार उन्होंने असुरों और राक्षसों को हरा दिया और बाहर निकाल दिया। इस लिए यजमान लोग आग्नीध्र से अग्नि लेकर असुरों और राक्षसों को हरा देते और निकाल देते हैं। उन्होंने प्रातःकाल के आज्यों द्वारा विजय पाई, और जीती हुई जगह पर आ गये। इसी लिये इनका नाम आज्य पड़ा। यही आज्यों का आज्यत्व है। उन विजय पाये हुये होताओं के शरीरों में से केवल अच्छा- वाक का शरीर न मिल सका क्योंकि इन्द्र और अग्नि उसमें घुस गये थे। देवों में इन्द्र और अग्नि ही बड़े और बलवान तथा जीतने वाले, उत्तम और अच्छे मित्रों वाले हैं। इस लिये प्रातः सवन में अच्छावाक इन्द्र और अग्नि की स्तुति करता है। क्योंकि इन्द्र और अग्नि ने ही अच्छावाक के शरीर में प्रवेश किया था। इस लिये अन्य होता अपने स्थान पर पहले जाते हैं और पीछे से अच्छावाक। जो पीछे आवे वही हीन

Page 163Permalink

पाँचवाँ अध्याय ] १४९ है। क्योंकि वह देर में पहुँचेगा। इसलिये जो ब्राह्मण बह्वृच ( बहुत ऋचायें जानने वाला ) और वीर्यवान हो, वही अच्छा- वाक का कार्य करे। क्योंकि तभी वह अहीन ( न खोया हुआ ) हो सकता है। (४) ३७—यह जो यज्ञ है वह देवों का रथ है। आज्य और प्रउग दो बीच की रस्सियां हैं। पवमान स्तोत्र के बाद आज्य पढ़ने और आज्य स्तोत्र के बाद प्र-उग पढ़ने से होता देवों के रथ की रस्सियों को थाम लेता है कि रथ टूट न जाय। उसी का अनुकरण करके मनुष्यों के रथों की रस्सियों को सारथी थामते हैं। जो इस रहस्य को समझता है उसका देवरथ या मनुष्यरथ टूटने नहीं पाता। यहाँ एक शंका होती है। नियम यह है कि शस्त्रस्तोत्र के अनुकूल होना चाहिये। सामगाओं के पवमान गाने पर होता अग्नि के आज्य स्तोत्र को कहता है। तो यह पवमान के अनुकूल कैसे हो जाता है ? इसका समाधान यह है कि “अग्नि पवमान” है। जैसे ऋषि ने कहा :— अग्निऋषिः पवमानः। (ऋ० ६।६६।२०) इसलिये अग्नि वाले मंत्रों से आज्य शस्त्र आरंभ होता है, वह पवमान स्तोत्र के अनुकूल हो जाता है। अब प्रश्न होता है कि जब नियम यह है कि स्तोत्र शस्त्र के अनुकूल हो तो सामगाओं का स्तोत्र गायत्री छन्द में और होता का आज्य-शस्त्र अनुष्टुभ् में क्यों होता है ? इसका उत्तर यह है कि योग तो ठीक ही है। आज्य शस्त्र के अनुष्टुभ् छन्द में सात मन्त्र हैं। पहले और पिछले मन्त्र को तीन बार बोलने से ११ हो जाते हैं। बारहवाँ याज्य मन्त्र विराट् में है। उसे भी गिन लेना चाहिये क्योंकि एक या दो अक्षरों के बढ़ने से छन्दो- भेद नहीं होता। यह बारह अनुष्टुभ् १६ गायत्री के बराबर

Page 164Permalink

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri १५० [ दूसरी पञ्चिका हैं। अनुष्टुभ् छन्द का शस्त्र इस प्रकार स्तोत्र के गायत्री छन्दों के बराबर हो जाता है। होता के आज्य शस्त्र का याज्य मन्त्र यह है। अग्न इन्द्रश्च दाशुषो दुरोणे सुता॒वतो य॒ज्ञमिहोप॑ यातम्। अमर्धन्ता सोम॑ पेयाय देवा ॥ (ऋ० ३।२५।४) (यहाँ 'इन्द्राग्नी' के बजाय अग्नि-इन्द्र कहा है। इसका कारण यह है कि) इन्होंने इन्द्राग्नी के रूप में विजय नहीं पाई किन्तु "अग्नीन्द्रौ" के रूप में। अग्नीन्द्र का याज्य वह विजय पाने के लिये पढ़ता है। यह मन्त्र विराट् छन्द में है जो तेतीस अक्षर का होता है। देव तेतीस हैं, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य ; एक प्रजापति और एक वषट्कार । इस प्रकार वह पहले ही शस्त्र में एक एक अक्षर एक एक देवता के लिये कह देता है। अक्षरों के क्रम से ही देव सोमपान करते हैं। इस प्रकार देवपात्र से देवता तृप्त हो जाते हैं। अब प्रश्न यह है कि जब याज्य मन्त्र शस्त्र के अनुकूल होना चाहिये तो आज्य शस्त्र केवल अग्नि का है, फिर याज्य मन्त्र अग्नीन्द्र का क्यों है ? इसका उत्तर यह है कि अग्नि-इन्द्र याज्य वही है जो इन्द्राग्नी याज्य है। यह इन्द्राग्नी का शस्त्र है जैसा ग्रह और तूष्णींशंस से प्रकट होता है। अध्वर्यु नीचे के मन्त्र से ग्रह को लेता है :– इन्द्राग्नी आ गतं सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम्। अस्य पातं धियेषि॒ता ॥ (ऋ० ३।१२।१) "हे इन्द्र और अग्नि, स्तुतियों के साथ बादल के समान पवित्र सोम के पास आओ। और बुद्धि से प्रेरित होकर इसको पियो"। होता की तूष्णीं-शंस या "चुपचाप प्रार्थना" यह है:–

Page 165Permalink

पांचवाँ अध्याय ] १५१ “भूरग्निज्योतिरग्निर्इन्द्रो ज्योतिर्भुवो ज्योतिरिन्द्रः सूर्योज्योतिर्ज्योतिः स्वः सूर्यः” । (५) ३८—होता का जप रेत या वीर्य है । वीर्य सिंचन चुपचाप होता है । इसी प्रकार जप भी चुपचाप होता है । यह भी वीर्य- सिंचन ही है । 'आहाव' से पहले जप होता है । आहाव से पीछे जो कुछ होता है वह शस्त्र है । होता 'आहाव' को अध्वर्यु के प्रति उस समय कहता है जब अध्वर्यु चारों पैरों पर ( पशु के समान ) भूमि पर पड़ा होता है । और उसका मुँह दूसरो ओर होता है । चौपाये मुँह को फेर कर वीर्यसिंचन करते हैं । अब अध्वर्यु दो पैरों पर खड़ा हो जाता है और सामने मुँह कर लेता है क्योंकि मनुष्य (दुपाये) सामने मुँह करके वीर्य सिंचन करते हैं । जप के भिन्न-भिन्न भाग यह हैं :— “पिता मातरिश्वा” प्राण पिता है । प्राण मातरिश्वा है । प्राण वीर्य है । इन शब्दों को कहकर मानो वीर्यसिंचन करता है । “अच्छिद्रा पदाद्या” वीर्य छिद्र-रहित है । इस लिये इस छिद्ररहित या पूर्ण का जन्म होता है । “अच्छिद्रोक्थाकवयः शंसन” जो पढ़े हुये हैं वह कवि हैं । उन्होंने इस पूर्ण वीर्य को उत्पन्न किया । अब कहता है :— “सोमो विश्वविन् नीथानिनेषदू बृहस्पतिरुक्था मदानि शंसिषदू ।” बृहस्पति ब्राह्मण है । स्तुति किया गया सोम क्षत्रिय है । “नीथानि” और “उक्था मदानि” शस्त्र हैं । दैवी ब्राह्मण और

Page 166Permalink

१५२ [ दूसरी पञ्चिका दैवी क्षत्रिय से प्रेरित होकर होता शस्त्र पढ़ता है। यह दोनों (बृहस्पति और सोम) समस्त जगत् या जो कुछ है उस पर शासन करते हैं। इन दोनों की प्रेरणा के बिना होता जो कुछ करता है वह न करने के बराबर है। जैसे कहा जाता है कि इसका किया बेकिया हो गया ! जो इस रहस्य को समझता है उसका सब किया हुआ सुकृत होता है, अकृत नहीं होता। अब कहता है :— “वागायुर्विश्वायुर्विश्वमायुः” आयु प्राण है। प्राण वीर्य है। वाणी योनि है। यह पढ़कर मानो वह योनि में वीर्य सींचता है। अब कहता है :— “क, इदं शंसिष्यति स इदं शंसिष्यति”। ‘कः’ प्रजापति है। इसके कहने का तात्पर्य यह है कि प्रजा- पति उत्पन्न करेगा। (६) ३९—'आहाव' के बाद तूष्णी-शंस (“चुपचाप प्रार्थना”) कहता है। मानो सींचे हुये वीर्य में विकार उत्पन्न करता है। पहले वीर्य सींचा जाता है फिर उसमें विकार उत्पन्न होता है। 'तूष्णी-शंस' चुपके-चुपके होती है। वीर्य सिंचन भी चुपके- चुपके होता है। जैसे चुपके से तूष्णी-शंस कही जाती है उसी प्रकार चुपके से वीर्य भी विकृत होते हैं। वह 'तूष्णी-शंस' को छः पदों में (ठहर-ठहर कर) कहता है। पुरुष छः वाला है अर्थात् उसके छः अङ्ग होते हैं। इस प्रकार वह आत्मा को छः वाला अर्थात् छः अंगों वाला बना देता है। 'तूष्णी-शंस' को कह कर वह “पुरोरुक्” कहाता है। इस प्रकार वह विकृत वीर्य को जन्म देता है। पहले विकार होता है फिर जन्म। 'पुरोरुक्' को उच्च स्वर से कहता है। इस प्रकार वह इसको उच्च स्वर से जन्म देता है (अर्थात् बच्चा पैदा होते ही रोता है) !

Page 167Permalink

पांचवाँ अध्याय ] १५३ 'पुरोरुक्' को बारह पदों में कहता है। बारह मास का संवत्सर होता है। संवत्सर प्रजापति है। वह सब सृष्टि को बनाता है। जो इस सब जगत् को उत्पन्न करता है वही यजमान को उत्पन्न करता है और वही उसको सन्तान और पशुओं से युक्त करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और पशुओं से युक्त होता है। वह 'पुरोरुक्' को जातवेद के लिये पढ़ता है। जातवेद का नाम अंतिम पद में आता है। इस पर प्रश्न उठाते हैं कि जब जातवेद तीसरे सवन का देवता है तो प्रातः सवन में जातवेद के प्रति 'पुरोरुक' क्यों पढ़ते हैं। इसका उत्तर यह है कि जातवेद प्राण हैं। जातवेद कहते हैं उसको जो उत्पन्न हुओं को जाने (जात = उत्पन्न हुआ; वेद = जाने)। जितने उत्पन्न हुओं को वह जानता है, उतने ही होते हैं। जिनको वह नहीं जानता वह कैसे हो सकते हैं? जिसने समझ लिया कि "आज्य शस्त्र" द्वारा मेरी आत्म- संस्कृति (आत्म-सुधार) हो गई वही ज्ञानी है। (७) ४०—अब वह इस आज्य सूक्त को पढ़ता है :— प्र वो देवायाग्नये बर्हिष्ठमर्चास्मै। गमद् देवेभिरा स नो यजिष्ठो बर्हिरा सदत् ॥१॥ शृतावा यस्य रोदसी दक्षं सचन्त ऊतयः। हविष्मन्तस्तमीलते तं सनिष्यन्तोऽवसे ॥२॥ स यन्ता विप्र एषां स यज्ञानामथा हि षः। अग्निं तं वो दुवस्यत दाता यो वनिता मघम् ॥३॥ स नः शर्माणि वीतयेऽग्निर्यच्छतु शन्तमा। यतो नः प्रुष्यावद् वसु दिवि क्षितिभ्यो अप्स्वा ॥४॥ दीदिवांसमपूर्व्यं वस्वीभिरस्य धीतिभिः। ऋक्वाणो अग्निमिन्धते होतारं विश्पतिं विशाम् ॥५॥

Page 168Permalink

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri १४५ [ दूसरी पञ्चिका उत नो ब्रह्मन्नविष उक्थेषु देवहूतमः । शं नः शोचा मरुद् वृधोऽग्ने सहस्रसातमः ॥६॥ नू नो रास्व सहस्रवत् तोकवत् पुष्टिमद् वसु । द्युमदग्ने सुवीर्यं वर्षिष्ठमनुपक्षितम् ॥७॥ (ऋ० ३।१३।१-७) 'प्र' का अर्थ है प्राण। सब जीव प्राण पाकर ही चलते फिरते हैं। इस प्रकार होता ( यजमान में ) प्राण धारण कराता है और प्राणों को सुसंस्कृत करता है। वह कहता है “दीदि- वांसमपूर्व्यं” (३।१३।५) क्योंकि मन ही चमकने वाला है। मन से पहले कुछ नहीं। इस प्रकार वह मन को उत्पन्न करता है और मन का सस्कार करता है। वह कहता है “स नः शर्माणि वीतये” (३।१३।४)। वाणी ही ही शर्म है। जो दूसरों की बात को दुहराता है, उसके लिये कहते हैं कि हमने इस को चुप कर दिया। इसको पढ़कर वह वाणी को उत्पन्न करता है और वाणी का संस्कार करता है। कहता है “उत नो ब्रह्मन्नविषः” (३।१३।६)। श्रोत्र ब्रह्म है। श्रोत्र से ही ब्रह्म को सुनता है। श्रोत्र में ब्रह्म प्रतिष्ठित है। इस प्रकार वह श्रोत्र को उत्पन्न करता है और श्रोत्र का संस्कार करता है। वह कहता है “स यन्ता विप्र एषां” ( ३।१३।३ ) अपान यंता (नियंता) है। क्योंकि प्राण अपान के द्वारा नियंत्रित होता है और पीछे नहीं लौट सकता। इस प्रकार वह अपान को उत्पन्न करता और अपान का संस्कार करता है। वह कहता है “ऋतवा यत्य रोदसी” ( ३।१३।२ ) । चक्षु ऋत है। अगर दो आदमियों में से एक कहे “मैंने स्वयं अपनी आँख से देखा है” तो उसका विश्वास कर लेते हैं। इस प्रकार चक्षु को उत्पन्न करता और चक्षु का संस्कार करता है। CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

Page 169Permalink

पाँचवाँ अध्याय ] १५५ “नूनो रास्व सहस्रवत् तोकवत् पुष्टिमत् वसु” (ऋ० ३।१३।७) यह पढ़कर समाप्त करता है। आत्मा ही 'समस्त' है, सहस्रवान् है तोकवान् है, पुष्टिमान् है। इस को पढ़कर वह 'समस्त आत्मा' को उत्पन्न करता और समस्त आत्मा को सुसंस्कृत करता है। अब वह एक याज्य संत्र पढ़ता है। याज्य पूर्ति है। याज्य पुण्य है। याज्य लक्ष्मी है। इस प्रकार पुण्य लक्ष्मी को उत्पन्न करता है और उसका संस्कार करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह छन्दों, देवताओं, ब्रह्म और अमृत से युक्त होकर देवताओं में मिल जाता है। जो जानता है कि मैं इस प्रकार छन्दों, देवताओं, ब्रह्म और अमृत से युक्त हो गया वही ज्ञानी है। यही अध्यात्म विद्या है। यही आधिदैवत विद्या है। (८) ४१—'तूष्णींशंस' को छः पदों में पढ़ता है। छः ऋतुएं होती हैं। इस प्रकार वह ६ ऋतुओं को बनाता और उन्हीं में प्रवेश करता है ! 'पुरोरुक्' को बारह पदों में पढ़ता है। बारह महीने होते हैं। इस प्रकार वह महीनों को बनाता और उनमें प्रवेश करता है। “प्रवो देवाय अग्नये” (ऋ० ३।१३।१) पढ़ता है। 'प्र' अन्तरिक्ष है। यह सब भूत अन्तरिक्ष में ही रहते हैं। वह अन्तरिक्ष को बनाता है और अन्तरिक्ष में प्रवेश करता है। “दीदिवांसमपूर्व्यं” (३।१३।५) पढ़ता है। यह सूर्य ही 'दीदिव' या चमकने वाला है। इससे पूर्व कोई नहीं है। वह इस प्रकार सूर्य को बनाता है और सूर्य्य में ही प्रवेश करता है। “स नः शर्माणि वीतये” (३।१३।४) पढ़ता है। अग्नि शर्माणि है। यही अन्न आदि को देती है। इस प्रकार अग्नि को ही बनाता है और उसी में प्रवेश करता है !

Page 170Permalink

१५६ [ दूसरी पञ्चिका “उतनो ब्रह्मन्नविषः” (३।१३।६) पढ़ता है। चन्द्रमा ही ब्रह्म है, इस प्रकार चन्द्रमा को बनाता है और चन्द्रमा में ही प्रवेश करता है। “स यंता विप्र एषाम्” (३।१३।३) इसको पढ़ता है। वायु ही नियंता है। वायु से ही अन्तरिक्ष नियंत्रित है, और इधर उधर नहीं हो सकता। इसको पढ़कर वह वायु को बनाता और वायु में प्रवेश करता है। “ऋतावा यस्य रोदसी” ( ३।१३।२ ) इसको पढ़ता है। द्यौ और पृथिवी रोदसी हैं। इस प्रकार वह द्यौ और पृथिवी को बनाता है और उन्हीं में प्रवेश करता है। “नूनो रास्वसहस्रवत् तोकवत् पुष्टिमत् वसु” ( ३।१३।७ ) इसको पढ़ कर समाप्त करता है। संवत्सर ही ‘समस्त’ है “सहस्रवान्, तोकवान् और पुष्टिमान्” है। वह समस्त संवत्सर को बनाता है और उसी में प्रवेश करता है। “याज्य” पढ़ता है। वृष्टि याज्य है। विद्युत् ही याज्य है। क्योंकि विद्युत् ही वर्षा और अन्न को उत्पन्न करती है। इस प्रकार वह विद्युत् को बनाता और उसमें प्रवेश करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह इस सब से युक्त होकर देवतामय हो जाता है। (९) एतरेय ब्राह्मण की दूसरी पंचिका का पांचवां अध्याय समाप्त।

Page 171Permalink

तीसरी पञ्चिका

Page 172Permalink

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

Page 173Permalink

पहला अध्याय १— यह जो प्रउग शस्त्र है वह ग्रहों☸ में से सोम की आहु- तियां देने के लिये उपयुक्त है। प्रातः काल के नौ ग्रह हैं। बहिष्पवमान सूक्त के नौ मंत्रों से इनकी आहुति की जाती है। इस स्तुति के पश्चात् अध्वर्यु दसवें ग्रह को लेता है। हर एक मंत्र के साथ जो हिंकार बोली जाती हैं वह दसवां मंत्र मान लिया जाता है। इस प्रकार दश ग्रह और दश मंत्रों का समन्वय हो जाता है। होता वायु वाले तीन मंत्रों को पढ़ता है :— वायवा याहि दर्शतेमे सोमा अरंकृताः । तेषां पाहि श्रुधी हवम् ॥ वाय उक्थेभिर्जरन्ते त्वामच्छा जरितारः । सुतसो'मा अहर्विदः ॥ वायो तव प्रपृञ्चती धेना जिगाति दाशुषे । उरूची सोमपीतये ॥ ( ऋ० १।२।१-३ ) ☸ग्रह उस प्याले को कहते हैं जो पात्र अर्थात् कलश के ऊपर रक्खा जाता है, और जिसमें से लेकर सोम की आहुतियां दी जाती हैं। नौ ग्रह यह हुये —(१) उपांशु (२) अन्तर्याम (३) वायव (४) ऐन्द्र- वायव (५) मैत्रावरुण (६) अश्विन (७) शुक्र (८) मन्थी (६) आग्रायण । ( १५९ )

Page 174Permalink

१६० [ तीसरी पञ्चिका इससे वायु के ग्रह की स्तुति की जाती है । नीचे के तीन इन्द्र-वायु वाले मंत्र पढ़ता है :- इन्द्रवायू इमे सुता उप प्रयोभिरा गतम्। इन्दवो वामुशन्ति हि ॥ वायविन्द्रश्च चेतथः सुतानां वाजिनीवसू। तावा यातमुप द्र॒वत् ॥ वायविन्द्रश्च सुन्वत आ यातमुप निष्कृतम्। मक्ष्वित्था धिया नरा ॥ ( ऋ० १।२।४-६ ) यह इन्द्र-वायु के ग्रह की स्तुति हुई । नीचे के तीन मित्रा-वरुण के मंत्र पढ़ता है :- मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम्। धियं घृताचीं साधन्ता ॥ ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा । क्रतुं बृहन्तमाशाथे ॥ कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया । दक्षं दधाते अपसम् ॥ ( ऋ० १।२।७-६ ) इससे मित्रावरुण के ग्रह की स्तुति हुई । नीचे के तीन मंत्र दो अश्विनों के लिये पढ़े गये :- अश्विना यज्वरीरिषो द्रवत् पाणी शुभस्पती । पुरुभुजा चनस्यतम् ॥ अश्विना पुरुदंससा नरा शवीरया धिया । धिष्ण्या वनतं गिरः ॥ दस्रा युवाकवः सुता नासत्या वृक्तबर्हिषः । आ यातं रुद्रवर्तनी ॥ ( ऋ० १।३।१-३ ) इससे अश्विनों के ग्रहों की स्तुति की गईँ । नीचे के तीन इन्द्र के मंत्र पढ़ता है :- इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता इमे त्वायवः । अण्वीभिस्तना पूतासः ॥ इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावतः । उप ब्रह्माणि वाघतः ॥ इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः । सुते दधिष्व नश्चनः ॥ ( ऋ० १।३।४-६ ) इससे शुक्र और मन्थी ग्रह की स्तुति हुई । अब विश्वेदेवों के तीन मंत्र पढ़ता है :- ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वेदेवास आ गत । दाश्वांसो दाशुषः सुतम् ॥

Page 175Permalink

पहला अध्याय ] १६१ विश्वे देवासो अप्तुरः सुतमा गन्त तूर्णयः । उस्रा इव स्वसराणि ॥ विश्वे देवासो अस्निध एहि मायासो अद्रुहः । मेधं जुषन्त वह्नयः ॥ ( ऋ० १।३।७-९ ) इससे आग्रायण ग्रह की स्तुति हुई । अब सरस्वती के तीन मंत्र पढ़ता है :— पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञं वष्टु धियावसुः ॥ चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनां । यज्ञं दधे सरस्वती ॥ महो अर्णः सरस्वती प्र चेतयति केतुना । धियो विश्वा वि राजति ॥ ( ऋ० १।३।१०-१२ ) कोई सरस्वती का ग्रह ही नहीं । सरस्वती वाणी है । वाणी से जो कोई ग्रह लिये जाते हैं उन्हीं की इन शब्दों से स्तुति हो जाती है । जो इस रहस्य को समझता है वह कीर्ति पाता है । (१) २—यह जो प्रउग है इससे अन्न की प्राप्ति करता है । प्रउग में अन्य देवता की स्तुति होती है । और प्रउग में अन्य का ही कृत्य होता है । जो इस रहस्य को समझता है वह ग्रहों में अन्यान्य खाद्य पदार्थों को रखता है । यह जो प्रउग शस्त्र है वह यजमान का सबसे निकटस्थ सम्बन्धी है । इस लिये उसको इसका बहुत ध्यान रखना चाहिये । ऐसा कहा जाता है, क्योंकि इसी से होता संस्कार करता है । वह वायु के तीन मंत्रों को पढ़ता है । इसीलिये कहते हैं कि वायु प्राण है । प्राण वीर्य है । शरीर में वीर्य पहले उत्पन्न होता है, फिर मनुष्य पैदा होता है । यह जो वायु के मंत्रों को पढ़ता है उससे यजमान में प्राण का संस्कार करता है । इन्द्र और वायु के तीन मंत्र इसलिये पढ़ता है कि जहाँ प्राण है, वहाँ अपान है । इनके पढ़ने से यजमान में प्राण और अपान का संस्कार करता है । ११