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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages
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१९४ [ तीसरी पञ्चिका में 'मद्'। इस प्रकार वह प्रातः और सायं दोनों सवनों में सविता का भाग देता है। प्रातः और सायं सवन में वायु के मंत्र बोले जाते हैं। प्रातः सवन में कई। और सायं सवन में केवल एक। क्योंकि शरीर के ऊपरी भाग में प्राण बहुत हैं और नीचे के भाग में कम। द्यावापृथिवी का मंत्र पढ़ता है। द्यावापृथिवी ही प्रतिष्ठा हैं। यहाँ पृथिवी प्रतिष्ठा है, वहाँ द्यौ। इस प्रकार द्यावापृथिवी के मंत्र बोल कर वह यजमान की द्यौ और पृथिवी दोनों में प्रतिष्ठा कर देता है। (५) ३०-वह ऋभु-सूक्त (ऋ० १-१११) को पढ़ता है। तक्षन् रथं सुवृतं—इत्यादि। देवों में ऋभुओं ने तप करके सोमपान का अधिकार पा लिया। उनके लिये देवों ने प्रातः सवन में स्थान देना चाहा। लेकिन अग्नि ने वसुओं की सहायता से उनको वहाँ से निकाल दिया। अब देवों ने दोपहर के सवन में उनको स्थान देना चाहा। तब इन्द्र ने रुद्रों से मिल कर उनको वहाँ से निकाल दिया। अब उन्होंने उनको सायंकाल के सवन में स्थान देना चाहा। विश्वेदेवों ने कोशिश की कि उनको वहाँ से निकाल दें और कहा, "यह यहाँ सोमपान नहीं कर सकते, नहीं कर सकते।" प्रजापति ने सविता से कहा, "यह तेरे शिष्य हैं, तू इनके साथ पीले।" वह मान गया और बोला, "तू भी ऋभुओं के दोनों ओर खड़ा हो कर पी।" प्रजापति ने उनके दोनों ओर खड़े होकर पान किया। इसीलिये ऋभु सूक्त के बाद दो धाय्य जो अनिरुक्त हैं (अर्थात् जिनमें विशेष देवों का उल्लेख नहीं है) और जो प्रजापति की हैं, एक के बाद दूसरी पढ़ी जाती हैं:—

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तीसरा अध्याय ] १९५ (१) सुरूप कृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे । जुहूमसि द्यवि द्यवि ॥ ( ऋ० १।४।१ ) (२) अयँ वेनश्चोदयत् पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने । इममपां सङ्गमे सूर्य्यस्य शिशुं न विप्रा मतिभी रिहन्ति ॥ ( ऋ० १०।१२३।१ ) इस प्रकार प्रजापति ने दोनों ओर खड़े होकर पिया । इसलिये श्रेष्ठी जिसको चाहता है पिला सकता है । देवों ने उन ऋभुओं से घृणा की क्योंकि उनमें मनुष्य की गंध आती थी । उन्होंने अपने और ऋभुओं के बीच में दो धाय्य और रख लीं :— (१) येभ्यो माता मधुमत् पिन्वते पयः पीयूषं द्यौरदितिरद्रिबर्हाः । उक्थ शुष्मान् वृषभराम् त्सवप्न सस्तॉँ आदित्याँ अनुमदा स्वस्तये ॥ ( ऋ० १०।६३।३ ) (२) एवा पित्रे विश्वदेवाय वृष्णे यज्ञैर्विधेम नमसा हविर्भिः । बृहस्पते सुप्रजा वीरवन्तो वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥ (ऋ० ४।५०।६) (६) ३१—अब वह वैश्वदेव सूक्त को पढ़ता है ( ऋ० ५।८९ ) वैश्वदेव शस्त्र प्रजा का संबन्ध बताने के लिये है । जैसे राज्य के अन्तर्गत जनता होती है उसी प्रकार शस्त्र के सूक्त हैं । धाय्य अरण्य पशुओं के समान हैं । इसलिये हर धाय्य के पहले और पीछे 'शोंसावोम्' कहना चाहिये । इस पर कुछ लोग कहते हैं कि धाय्य में जीवन है, वह अरण्य के समान कैसे हुई ? ऋषि ऐतरेय उत्तर देते हैं कि यह अरण्य भी अनरण्य के समान है क्योंकि अरण्य में हिरन और पक्षी पाये जाते हैं । वैश्वदेव शस्त्र पुरुष के समान है । इसके सूक्त उनके अंग हैं । जो धाय्य हैं वे पर्व या जोड़ हैं । इसीलिये होता हर धाय्य के पहले और पीछे 'शोंसावोम्' कहता है । क्योंकि पुरुष के जोड़ शिथिल होते हैं । ब्रह्म उनको दृढ़ करता है ।

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१९६ [ तीसरी पञ्चिका ये जो धाय्य और याज्य हैं वह यज्ञ की मूल हैं। अगर अन्य धाय्य और अन्य याज्य पढ़े जायं तो यज्ञ निर्मूल हो जाय । इसलिये वे समान होनी चाहिये । यह जो वैश्वदेव शस्त्र है वह पांचजन्य है । अर्थात् यह पाँचों का है, देव, मनुष्य, गंधर्व, अप्सरा, सर्पों तथा पितरों का । वैश्वदेव शस्त्र इन पाँचों में से सब का है । इन पाँचों में से सभी (वैश्वदेव शस्त्र के होता को ) जानते हैं । जो इस रहस्य को समझता है उसके पास इन पाँचों में से सभी हवी लोग (हवन करने में कुशल ) आते हैं । जो होता वैश्वदेव शस्त्र को पढ़ता है वह सब देवताओं का होता है । जब वह शस्त्र को पढ़ने लगे तो उसे सब दिशाओं का चिन्तन कर लेना चाहिये । इस प्रकार वह सब दिशाओं को रस युक्त कर देता है । परन्तु जिस दिशा में उसका शत्रु हो उसका चिन्तन न करें । ऐसा करने से वह उसे निर्बल देता है । इस मंत्र से समाप्त करता है :- अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः। विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् ॥ ( ऋ० १।८६।१० ) “अदिति द्यौ है, अंदिति अन्तरिक्ष है । अदिति माता है, वह पिता है । वह पुत्र है । यह मां है, बाप है, बेटा है। अदिति विश्वेदेव है । अदिति पांचजन्य है । इसी में विश्वेदेव है । इसी में पंचजन हैं। पैदा हुई वस्तु अदिति है । पैदा होनेवाली भी अदिति है ।” वह अन्तिम मंत्र को दो बार पढ़ता है, पादों पर ठहर-ठहर कर । पशुओं की प्राप्ति के लिये । क्योंकि पशु चार पैर के होते हैं । पहली बार वह आधे मंत्र पर ठहरता है, प्रतिष्ठा के लिये । मनुष्य के दो पैर होते हैं और पशु के चार । दो बार फिर दुहराने से मानों, दुपाये को चौपायों में स्थान देता है ।

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तीसरा अध्याय ] १९७ वैश्वदेव शस्त्र की समाप्ति पर पांचजन्य मंत्र (१।८९।१० के समान ) बोलना चाहिये और फिर भूमि का स्पर्श करना चाहिये । इस प्रकार वह जहाँ यज्ञ को रखना चाहता है वहाँ उसकी स्थापना कर देता है । वैश्वदेव-उक्थ को पढ़ने के उपरान्त वैश्वदेव याज्य मंत्र पढ़ता है । विश्वे देवाः शृणुतेमं हवं मे ये अन्तरिक्षं य उप द्यविष्ठ । ये अग्निजिह्वा उत वा यजत्रा आसद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्वम् ॥ ( ऋ० ६।५२।१३) इस प्रकार वह देवों को उनके भाग के अनुसार प्रसन्न करता है । (७) ३२—पहला घृत का याज्य मंत्र अग्नि का है । दूसरा सोम का ( चरु का ) याज्य सोम का । एक घृत का याज्य विष्णु का है । सोम का याज्य यह है :— त्वं सोम पितृभिः संविदानोऽनु द्यावापृथिवी आ ततन्थ । तस्मै त इन्दो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥ ( ऋ० ८।४८।१३) इस में पितर शब्द पड़ा है । जब सोम को निचोड़ते हैं तो इसका अर्थ यह है कि उसका हनन करते हैं । यह चरु ( भात का पिण्ड ) अनुस्तरणी ( वह गौ जो मृत यजमान को चिता पर रखने के बाद दी जाती है ) है । यह चरु सोम के लिये वही अर्थ रखता है जो अनुस्तरणी पितरों के लिये । इसी लिये होता 'पितर' शब्दों वाला याज्य मंत्र पढ़ता है । जिन्होंने सोम निचोड़ा उन्होंने उसका हनन कर दिया । अब वह उसको पुन- र्जीवित करते हैं, अब उस सोम को बढ़ाते हैं ( आप्यायन्ति ) उपसदों के रूप में । यह जो अग्नि, सोम और विष्णु देवता हैं वे उपसद् रूप हैं ।

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१९८ [ तीसरी पञ्चिका होता सोम के चरु को लेकर पहले अपनी ओर देखे, फिर सामगों की ओर। कुछ होता लोग पहले इस चरु को सामगों को अर्पण करते हैं। लेकिन ऐसा न करे। क्योंकि जो होता ‘वौषट्’ कहता है वह सब भत्तों का भक्षण करता है। ऐसा ऐतरेय ऋषि का कथन है। इसलिये “वौषट्” कहने वाले होता को पहले अपनी ओर देख लेना चाहिये। फिर वह उसे सामगों को अर्पण कर दे। (८) ३३—प्रजापति ने अपनी दुहिता से भोग करना चाहा। इसको कुछ 'द्यौ' कहते हैं और कुछ 'उषा' बताते हैं। उसने स्वयं रिश्य ( एक हिरन ) का रूप रख लिया। और दुहिता रोहित ( हिरनी ) बन गई। वह उसके पास गया। उसको देवों ने देखा और कहा, “अरे प्रजापति ‘-अकृत” काम करता है।” उन्होंने पूछा कि क्या कोई ऐसा है जो इस दोष की निवृत्ति कर दे। अपने लोगों में उनको इस काम के योग्य कोई न मिला। उनमें जो घोरतम अंश था उसको उन्होंने इकट्ठा किया। उनके इकट्ठा करने से एक देव पैदा हुआ जिसका नाम “भूतवान्” हुआ। जो इसके इस नाम को जानता है वही उत्पन्न होता है। देवों ने उससे कहा, “प्रजापति ने जो यह न करने योग्य काम किया है उस काम को बींध दे।” उसने ऐसा ही किया। फिर उसने कहा, “मैं एक वर माँगता हूं।” उन्होंने कहा, “माँग।” उसने पशुओं का आधिपत्य मांगा। इस लिये उसका नाम पशुमान पड़ा। जो उसके इस नाम को जानता है वह पशु वाला होता है। उस “भूतवान” ने प्रजापति के दुष्कर्म पर आक्रमण किया और उसको बींध दिया। वह बिंधा हुआ ऊपर उड़ गया। उसको मृग ( नक्षत्र ) कहते हैं। और जिसने मारा उसको मृग- व्याध। वह जो रोहित हिरनी ( प्रजापति की दुहिता ) थी वह रोहिणी हुई। यह जो बाण था जिसमें तीन फल (त्रि

काण्ड) थे वह आकाश में चमकने वाला तीन फल वाला बाण

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तीसरा अध्याय ] १९९ काण्ड) थे वह आकाश में चमकने वाला तीन फल वाला बाण हो गया। प्रजापति का जो वीर्य बहा वह एक सरोवर बन गया। देवों ने कहा, "प्रजापति का यह वीर्य्य दूषित न हो ( "मादुषत्" )। देवों ने 'मादुषत्' जो कहा तो "मादुषम्" हो गया। यह "मादुष" का "मादुषत्व" है । यह जो मादुषम् था यही मानुषम् हुआ । "मानुष" इसलिये कहते हैं कि वह दोष के योग्य नहीं है अर्थात् उसमें दोष नहीं आने चाहिये । "मादुष" परोक्ष शब्द है। देव लोग परोक्षप्रिय होते हैं। (९) ३४-देवों ने इस वीर्य को अग्नि से घेर दिया । मरुतों ने उसे हिलाया । परन्तु अग्नि ने उसको चलाया नहीं। उन्होंने उसको वैश्वानर अग्नि से घेर दिया। मरुतों ने उसे हिलाया, वैश्वानर अग्नि ने उसे चलाया । प्रजापति के वीर्य से जो पहली चिनगारी उठी उसका आदित्य बना। जो दूसरी उठी उसका भृगु बना। वरुण ने भृगु को लड़का मान लिया । इसीलिये भृगु को वारुणि कहते हैं । तीसरी जो चिनगारी उठी उसके आदित्य हो गये । जो अंगारे थे उनका आङ्गिरस हुआ । जो अंगारे पहले न शांत होकर फिर उदीप्त हो गये। वे बृह- स्पति हो गये। जो काली-काली अधजली राख रह गई वह काले पशु बन गई। जो भूमि का भाग लाल हो गया था उसके लाल पशु बन गये। जो भस्म रह गई उसका एक ऐसा व्यक्ति बना जो इधर उधर फिरा और बारहसिंगा, भैंसा, हिरन, ऊँट, गधा और जंगली जानवर बन गये । भूतवान ने इन पशुओं से कहा, "यह मेरा है। यह जो इस जगह छूटा हुआ है मेरा है।" उन्होंने इस रुद्र सम्बन्धी ऋचा को पढ़ कर उससे उसका भाग छुड़ा लिया :- आ ते पितर्मरुतां सुम्नमेतु मा नः सूर्य्यस्य सन्दृशो युयोथाः। अभि नो वीरो अर्व्वति क्षमेत प्र जायेमहि रुद्र प्रजाभिः। (ऋ० २।३३।१)

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२०० [ तीसरी पञ्चिका “हे मरुतों के पिता, ऐसा न हो कि हम सूर्य के दर्शन न कर सकें। हे वीर रुद्र, ऐसा कर कि हम प्रजाओं से युक्त हो जायें अर्थात् हमारे सन्तान उत्पन्न हों।” “अभि नो वीरो अर्वति क्षमेत” के स्थान में “त्वं नो वीरो अर्वति क्षमेथा” पढ़ना चाहिये। यदि “अभि” न कहेगा तो यह देवता प्रजा के विरुद्ध (अभि) न होगा। “रुद्र” के स्थान में 'रुद्रिय' कहना चाहिये जिससे इस नाम का भयानकपन न रहे। यदि इसको हानिकारक समझे तो केवल नीचे का मन्त्र पढ़ दे :— शं नः करत्यर्वते सुगं मेषाय मेष्ये । नृभ्यो नारिभ्यो गवे ॥ (ऋ० १।४३।६) यह मंत्र 'शं' से आरम्भ होता है और कल्याणकारक है। 'नृभ्यो' का अर्थ है “पुरुषों के लिये” “नारिभ्यो” से स्त्रियों से तात्पर्य है। यह सब के कल्याण के लिये हैं। यह रुद्र का मंत्र है परन्तु अनिरुक्त है अर्थात् इसमें रुद्र का नाम नहीं आया। इसलिये यह सौ वर्ष की आयु का दाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है। यह मंत्र गायत्री छन्द में है। गायत्री ब्राह्मण है। इस प्रकार वह ब्राह्मण द्वारा रुद्र की उपासना करता है (जिससे रुद्र का वीभत्सपन दूर हो जाय) । (१०) ३५—अग्नि-मारुत शस्त्र को वैश्वानरीय सूक्त से आरम्भ करता है। यह जो वीर्य बहा वह वैश्वानर है। इसलिये होता अग्नि-मारुत शस्त्र को वैश्वानरीय सूक्त से आरम्भ करता है। पहली ऋचा को बिना ठहरे हुये पढ़े। जो अग्नि-मारुत शस्त्र को पढ़ता है वह आग की भयानक लपटों को शांत कर देता है। सांस साध कर अग्नि को पार करे। कहीं कुछ शब्द

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तीसरा अध्याय ] २०१ बोलने में भूल न हो जाय इससे उसको चाहिये कि किसी दूसरे आदमी को शोधने के लिये नियत कर दे । मानो वह इस संशोधक को पुल के तौर पर मान कर अग्नि को पार करता है। इसमें कोई भूल होनी न चाहिये इसलिए जब होता मंत्र बोले तो कोई उसकी अशुद्धि को शुद्ध करने वाला होना चाहिये । जो वीर्य बहा वह मरुत है। उसको हिला कर इन्होंने बहाया । इसलिये वह मरुतों का सूक्त पढ़ता है । बीच में योनि (स्तोत्रिय) और अनुरूप प्रगाथ का पाठ करे । यज्ञायज्ञा वः समना तुतुर्वणिर्धियं धियं वो देवया उ दधिध्वे । आ वोऽर्वाचः सुविताय रोदस्योर्महे ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः ॥ वत्रासो न ये स्वजाः स्वतवस इषं स्वरभिजायन्त धूतयः । सहस्रि- यासो अपां नोर्मय आस्रा गावो वन्धासो नोक्षणः ॥ ( ऋ० १।१६८।१-२ ) यह योनि हुई । देवो वो द्रविणोदाः पूर्णां विवष्ट्वासिचम् । उद् वा सिञ्चध्वमुप पृणध्वमादिद्धो देव ओहते ॥ तं होतारमध्वरस्य प्रचेतसं वह्निं देवा अकृण्वत । दधाति रत्नं विधते सुवीर्यंमग्निर्जनाय दाशुषे ॥ ( ऋ० ७।१६।११-१२ ) यह अनुरूप हुआ । बीच में योनि कहने का कारण यह है कि स्त्रियों की योनि बीच में होती है । (वैश्वानरीय और अग्नि-मारुतीय) दो सूक्तों को पढ़ने के बाद योनि इसलिये पढ़ी जाती है कि उसमें पुरुष इन्द्रिय को स्थापित करता है, जिससे प्रजा उत्पन्न हो । जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और पशुओं वाला होता है । (११) ३६—जातवेद के सूक्त को पढ़ता है। जब प्रजापति ने

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri २०२ [ तीसरी पञ्चिका सृष्टि बनाई तो वे सब मुँह फेर कर चले गये और पीछे न लौटे। तब उसने इनको चारों ओर आग से घेर दिया। तब उन्होंने अग्नि की ओर मुख किया। जब उन्होंने अग्नि की ओर मुख किया तो प्रजापति ने कहा, "इन उत्पन्न हुये (जात) को मैंने इस अग्नि के द्वारा पाया (अविदम्) ।" इससे जात- वेद सूक्त हुआ। इसीलिये अंगिन को जातवेद कहते हैं। अग्नि से घिरे हुये प्राणी चल न सकते थे। वे अंगारों के बीच में खड़े थे। प्रजापति ने उन पर जल छिड़का। इसलिये जातवेद सूक्त को पढ़ने के बाद जल के सूक्त को पढ़ता है। “आपो हिष्ठा मयो भुवस्ता” इति (ऋ० १०।६) यह इसलिये पढ़ना चाहिये मानो अग्नि को शान्त कर रहा है। प्रजापति ने जल छिड़कने के बाद कहा कि यह प्राणी मेरे निज के हैं। उसने उनमें अहिर्बुध्न्य द्वारा परोक्ष तेज धारण करा दिया। यह अहिर्बुध्न्य गार्हपत्य अग्नि है। अहिर्बुध्न्य का मंत्र पढ़कर वह परोक्ष तेज धारण कराता है। इसीलिये कहते हैं कि जो आहुति देता है वह आहुति न देने वाले से अधिक तेज वाला है। (१२) ३७—गृहपति अग्नि के लिये ( अहिर्बुध्न्य मंत्र पढ़ कर ) देव पत्नियों के लिये मंत्र पढ़ता है। क्योंकि यजमान की पत्नी गार्हपत्य अग्नि के पीछे बैठती है। कुछ लोग कहते हैं कि पहले राका का मंत्र पढ़ना चाहिये क्योंकि सोमपान का पहला अधिकार बहिन का है। परन्तु यह नहीं चाहिये। पहले देवपत्नियों के लिये मंत्र पढ़ना चाहिये। ऐसा करने से गार्हपत्य अग्नि पत्नियों में वीर्य्य धारण कराता है। गार्हपत्य अग्नि के द्वारा होता ने पत्नियों को उत्पत्ति के अर्थ वीर्य से प्रत्यक्षरूप से सम्पन्न कर दिया । जो इस रहस्य को समझता है वह पशुओं और सन्तान से युक्त होता है। बहिन CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

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तीसरा अध्याय ] २०३ उसी पेट से जन्मती है और स्त्री दूसरे पेट से, इसलिये स्त्री को पहले भोजन देना चाहिये । अब वह राका का मंत्र पढ़ता है । राका ही पुरुष की इन्द्रिय की सीवन को सिया करती है । जो इस रहस्य को समझता है उसके पुत्र ( पुमान् सन्तान ) उत्पन्न होते हैं । अब पावीरवी मंत्र को पढ़ता है । वाणी ही सरस्वती पावीरवी है । इसको पढ़कर वह यजमान में वाणी धारण कराता है । इस पर प्रश्न होता है कि पहले यम का मंत्र पढ़ें या पितरों का । पहले यम का पढ़ाना चाहिये :— इमं यम प्रस्तर मा हि सीदाऽङ्गिरोभिः पितृभिः संविदानः । आ त्वा मंत्राः कविशस्ता वहन्त्वेना राजन् हविषा मादयस्व । ( ऋ० १०।१४।४ ) राजा को पहले पीने का अधिकार है । इसलिये यम का मंत्र ही पहले पढ़े । इसके बाद ही काव्यों का मंत्र पढ़े :— मातली कव्यैर्यमो अङ्गिरोभिर्बृहस्पति र्ऋक्वभिर्वावृधानः । यांश्चदेवा वावृधुर्यं च देवान् त्स्वाहान्ये स्वधयान्येमदन्ति ॥ ( ऋ० १०।१४।३ ) काव्य देवों से छोटे और पितरों से बड़े हैं । इसलिये काव्यों का मंत्र पढ़ने के बाद पितरों के तीन मंत्र पढ़ता है :— ( १ ) उदीरतामवर उत्परास उन् मध्यमाः पितरः सोम्यासः । असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु । ( ऋ० १०।१५।१ ) ( २ ) आहं पितॄन्त्सुविदत्राँ अवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः । बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वस्त इहागमिष्ठाः । ( ऋ० १०।१५।३ ) ( ३ ) इदं पितृभ्यो नमो अस्त्वद्य ये पूर्वासो य उपरास ईयुः । ये पार्थिवे रजस्या निषत्ता ये वा नूनं सुवृजनासु विक्षु । ( ऋ० १०।१५।२ )

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२०४ [ तीसरी पञ्चिका अवर, पर, मध्यम इन सोम्य पितरों को बुलाकर वह सब पितरों को प्रसन्न करता है, किसी को छोड़ता नहीं । दूसरे मंत्र में 'बर्हिषद्' से तात्पर्य यह है कि उनका प्रिय धाम है। इस को पढ़ कर वह प्रिय घास के द्वारा उनको प्रसन्न करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रिय धाम के द्वारा फूलता फलता है। "पितरों के नमस्कार" वाला मंत्र अन्त में पढ़ता है। इस लिये अन्त में पितरों को नमस्कार होता है "पितृभ्यो नमः"। यहां प्रश्न होता है कि इसके पहले आहाव अर्थात् 'शोंसावोम्' कहना चाहिये या मंत्र को बिना आहाव के पढ़ना चाहिये ? 'आहाव' के साथ पढ़ना चाहिये। पितृयज्ञ में जो बात अधूरी रह गई है उसे पूरा करना है। 'आहाव' पढ़ने से अधूरी क्रिया पूरी हो जाती है। इसलिये 'आहाव' पढ़ना आवश्यक है। (१३) ३८—अब इन्द्र के अनुपान के मंत्रों को पढ़ता है :-- स्वादुष्किलायं मधुमाँ उतायं तीव्रः किलायं रसवाँ उतायम्। उतोन्वस्य पपिवांसमिन्द्रं न कश्चन सहत आहवेषु ॥१॥ अयं स्वादुरिहमदिष्ट आस यस्येन्द्रो वृत्रहत्ये ममाद । पुरुणि यश्च्यौत्ना शम्बरस्य वि नवतिं नव च देह्योहन् ॥२॥ अयं मे पीत उदियर्ति वाचमयं मनीषामुशतीमजीगः । अयं षडुर्वीर- मिमीत धीरो न याभ्यो भुवनं कच्चनारे ॥३॥ अयं स यो वरिमार्णं पृथिव्या वर्ष्माणं दिवो अकृणोदयं सः । अयं पीयूपं तिसृषु प्रवत्सु सोमो दाधारोर्वन्तरिक्षम् ॥४॥ ( ६।४७।१-४) इन्हीं से इन्द्र ने तीसरे सवन के बाद सोम का अनुपान किया था। इसलिये यह अनुपानीय मंत्र कहलाते हैं। जब होता इन मंत्रों को पढ़ता है तो मानो देवता उस समय अनुपान करके प्रसन्न होते हैं। जब होता 'आहाव' कहता है तो अध्वर्यु 'मद्' धातु से निकला हुआ शब्द बोलता है।

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तीसरा अध्याय ] २०५ अब विष्णु और वरुण की ऋचा को पढ़ता है :- ययो रोजसा स्कभिता रजांसि वीर्यैर्भिर्वीरतमा । शविष्ठया पत्येते अप्रतीता सहोभिर्विष्णू अगन्वरुणा पूर्वहूतौ ॥ ֎ "वे दो जिन्होंने अन्तरिक्ष बनाया, जो बहुत बलवान और पराक्रमशील हैं, जो बिना किसी रोक टोक के राज करते हैं ऐसे विष्णु और वरुण पहले बुलावे पर आवें।" विष्णु यज्ञ के दोषों को दूर करता है और वरुण ठीक-ठीक यज्ञ के फल पर आधिपत्य रखता है। यह दोनों को शान्त करने के लिये है। अब वह विष्णु की ऋचा बोलता है :- विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि । यो अस्कभायदुत्तरं सधस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः ॥ (ऋ० १।१५४।१) विष्णु यज्ञ में मति के तुल्य है। जैसे किसान कृषि की भूल चूक को ठीक करता है, या जैसे राजा न्याय दरबार की भूल चूक को ठीक करता है, ऐसे ही होता इस मंत्र को पढ़ कर यज्ञ की भूल चूक को ठीक करता है। अब वह प्रजापति के इस मंत्र को पढ़ता है :- तन्तुं तन्वन् रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान् । अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम् ॥ (ऋ० १०।५३।६) इसको पढ़ कर होता यजमान के लिये सन्तान को तानता है। 'ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धियाकृतान्' यहाँ प्रकाशयुक्त मार्गों से तात्पर्य "देवयानों" का है। इन्हीं को वह यजमान के लिये ठीक करता है। ֎ पता नहीं कि यह मंत्र कहाँ का है।

अध्याय समाप्त हुआ।

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२०६ [ तीसरी पञ्चिका “अनुल्बणं वयत” इत्यादि “अर्थात् उपासकों के लिये तानो। मनु हो और दिव्य सन्तान (दैव्य जन) उत्पन्न करो।” ऐसा कह कर वह मानवी सन्तान से उसे सम्पन्न करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह सन्तान और पशुओं से सम्पन्न होता है। इस नीचे के मंत्र से समाप्त करता है :- एवा न इन्द्रो मघवा विरप्शी करत् सत्या चर्षणी धृदनर्वा। त्वं राजा जनुषां धेह्यस्मे अधि श्रवो माहिनं यज्जरित्रे॥ (ऋ० ४।१७।२०) यह पृथ्‍वी ही “इन्द्र मघवा विरप्शी” (बहुत सी कारीगरी वाला मज़बूते इन्द्र) है। वह ‘सत्या’ है। वही “चर्षणी धृत्” (मनुष्यों को रखने वाली), अनर्वा (बेखटके) है। वही राजा है। ‘श्रवो माहिनं यज्जरित्रे’ में ‘माहिनं’ का अर्थ है पृथ्‍वी। ‘श्रवः’ है यज्ञ और ‘जरित्र’ है यजमान। इससे वह यजमान के लिये आशीर्वाद चाहता है। समाप्ति के समय पृथ्‍वी को छुये जिस पर यज्ञ करता है। इस पृथ्‍वी पर तो यज्ञ स्थापित होता है। अग्नि-मारुतीय शस्त्र को पढ़ कर याज्या पढ़ता है :- अग्ने मरुद्भिः शुभयद् भिर्ऋक्वभिः सोमं पिव मन्दसानो गण- भिभिः। पावकेभिर्विश्वमिन्वेभिरायुभिर्वैश्वानर प्रदिवा केतुना सजूः॥ (ऋ० ५।६०।८) इस प्रकार वह सब देवतों को भाग दे दे कर प्रसन्न करता है। (१४) ऐतरेय ब्राह्मण की तीसरी पञ्चिका का तीसरा अध्याय समाप्त हुआ।

ब्राह्मणांच्छांसि, अच्छावाक् । सायं सवन के दो वैश्वदेव और अग्नि-

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चौथा अध्याय ३९—देव विजय पाने के प्रयोजन से असुरों से लड़ने गये । अग्नि ने साथ देना न चाहा । देवों ने उससे कहा, “तू भी आ । तू हममें से एक है ।” अग्नि बोला, “बिना स्तुति कराये मैं नहीं जाऊँगा । मेरी स्तुति करो ।” उन्होंने कहा “अच्छा ।” उन्होंने उठ कर उसके सामने खड़े होकर उसकी स्तुति की । स्तुति किया जाकर वह उनके साथ चल दिया । और तीन श्रेणी बना कर उसने असुरों पर तीन पंक्तियों में विजय के लिये आक्रमण किया । तीन श्रेणियां तीन छन्द हैं (गायत्री, त्रिष्टुभ् और जगती) । तीन पंक्तियाँ हैं तीन सवन (प्रातःसवन, मध्य सवन और तृतीय सवन) । इससे असुरों को आशा से अधिक पराजय हुई । देवों ने असुरों को हरा दिया । जो इस रहस्य को समझता है उसका पापी शत्रु स्वयं ही नष्ट हो जाता है । अग्निष्टोम गायत्री ही है । गायत्री में चौबीस अक्षर होते हैं और अग्निष्टोम में चौबीस स्तोत्र* और शस्त्र हैं । *सामगों के १२ स्तोत्र और होताओं के १२ शस्त्र । एक-एक स्तोत्र के लिये एक-एक शस्त्र । १२ शस्त्र यह हैं:—प्रातः सवन के पाँच, अर्थात् आज्य, प्रउग, मैत्रावरुण शस्त्र, ब्राह्मणांच्छांसि, और अच्छावाक् । दोपहर के सवन के पाँच अर्थात् मरुत्वतीय, निष्केवल्य, मैत्रावरुण, ब्राह्मणांच्छांसि, अच्छावाक् । सायं सवन के दो वैश्वदेव और अग्नि- मारुत शस्त्र । ( १०७ )

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२०८ [ तीसरी पञ्चिका कहावत है कि अच्छा सधा हुआ (सुहित) घोड़ा सवार को आराम पहुँचाता है (सुधा)। यही हाल गायत्री का है। गायत्री कहीं ठहरती नहीं है, ऊपर चली ही जाती है और यजमान को स्वर्ग में पहुँचा देती है। अग्निष्टोम भी वैसा ही है। वह भी बीच में नहीं ठहरता। ऊपर चला ही जाता है और यजमान को स्वर्ग में पहुँचा देता है। अग्निष्टोम संवत्सर है। संवत्सर में २४ पक्ष होते हैं और अग्निष्टोम में २४ स्तोत्र और शस्त्र होते हैं। जैसे सभी जल सागर को जाते हैं, इसी प्रकार सभी यज्ञ अग्निष्टोम में मिल जाते हैं। (१) ४०—अगर दीक्षणीय इष्टि पूरी-पूरी हो गई तो और जो कोई इष्टियां होती हैं सब अग्निष्टोम में आ जाती हैं। जब वह इला कहता है तो इला में सभी पाकयज्ञ आ जाते हैं। वे सब अग्निष्टोम में जाकर मिल जाते हैं। सायं प्रातः अग्निहोत्र करता है। सायं प्रातः व्रत करता है। स्वाहा कह कर अग्निहोत्र करता है। स्वाहा कह कर व्रत करता है। स्वाहा युक्त अग्निहोत्र अग्निष्टोम में मिल जाता है। प्रायणीय इष्टि में १५ सामिधेनियां दी जाती हैं। दर्शपूर्ण- मास यज्ञ में भी १५ ही दी जाती हैं। इस प्रकार दर्शपूर्णमास प्रायणीय में शामिल हैं। इस प्रकार दर्श पूर्णमास भी अग्निष्टोम में शामिल है। सोमराजा को खरीदते हैं। सोमराजा औषध है। बीमार को औषध से ही चंगा करते हैं। सोम की खरीद में अन्य सब औषध भी आ जाती हैं। इसलिये सब औषध भी अग्निष्टोम में शामिल हैं। आतिथ्य इष्टि में अग्नि का मंथन करते हैं। चातुर्मास्य

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चौथा अध्याय ] २०९ इष्टि में भी। चातुर्मास्य इष्टि आतिथ्य इष्टि के अन्तर्गत होकरं अग्निष्टोम में मिल गई । प्रवर्ग्य में दूध की आहुति देते हैं। दाक्षायन में भी। इस प्रकार दाक्षायन भी अग्निष्टोम में शामिल है । उपवसथ अर्थात् सोमयाग से एक दिन पूर्व पशु-बंधन होता है। इस प्रकार जो-जो पशुबंध हैं वे सब अग्निष्टोम में आजाते हैं । इलादध एक ऋतु होता है। उसे दही से करते हैं । (अग्निष्टोम के) दधिघर्म कृत्य में भी दही का ही प्रयोग होता है। इसलिये इलादधि भी अग्निष्टोम में शामिल है। (२) ४१—पहला भाग तो कह दिया गया। अब पिछला भाग लीजिये। इस कृत्य के बाद उक्थ्य के १५ स्तोत्र और १५ शस्त्र आते हैं। अगर वह साथ-साथ लिये जांय, तो महीनों के रूप में संवत्सर हो जाते हैं। (महीने में ३० दिन हुये) । अग्नि वैश्वानर संवत्सर है। अग्निष्टोम अग्नि है। संवत्सर के अनुगामी होने से उक्थ्य अग्निष्टोम में शामिल है। उक्थ्य के शामिल होते ही वाजपेय भी शामिल हो जाता है। क्योंकि उक्थ्य से यह (केवल दो स्तोत्र ही) अधिक है । अतिरात्र के बारह सोम के प्याले पंद्रह मंत्रों से सम्बद्ध हैं। दो-दो करके तीस हो जाते हैं। षोडशी साम में २१ भाग हैं। संधि में ९। इस प्रकार तीस हो गये । साल भर तक हर मास में ३० रातें होती हैं । अग्नि वैश्वानर संवत्सर है और अग्नि ही अग्निष्टोम है । अतिरात्र संवत्सर में शामिल हैं इसलिये अग्निष्टोम में शामिल हैं। जिस प्रकार अतिरात्र अग्निष्टोम में शामिल है उसी तरह अप्तोर्यामा भी। क्योंकि अप्तोर्यामा भी अतिरात्र ही हो जाता है। १४

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२१० [ तीसरी पञ्चिका इस प्रकार अग्निष्टोम के पहले और बाद को जितने कृत्य हैं वे सब अग्निष्टोम में शामिल हैं ॥ अग्निष्टोम के सब स्तोत्र १९० होते हैं । ९० बराबर हैं दश त्रिवृत के (९x१०) १० में ९ से एक अधिक है । शेष ९ यानी त्रिवृत हैं । २१ बार ९ लेकर १८९ हुये । एक हुआ सूर्य्य जो तपता है । यह विषुवत् है । दश त्रिवृत्त स्तोम इसके पहले हैं और दश पीछे । एक बीच में है जो इन के ऊपर घूमता और तपता है अर्थात् सूर्य्य । एक स्तोत्रिय जो अधिक है । इसके ऊपर ढकने के समान है । यह यजमान है । यह दिव्य छत्र है । जो किसी आक्रमण का निवारण कर सकता है । जो इस रहस्य को समझता है उसे दिव्य छत्र की प्राप्ति होती है । वह किसी आक्रमण का सहन कर सकता है । और उसको सायुज्य, सारूप्य और सालोक्य प्राप्त हो जाता है । (३) ४२—एक बार देवते असुरों से हार गये और ऊपर की ओर स्वर्ग लोक चले । अग्नि ने नीचे भूमि से स्वर्ग के ऊपर के हिस्से को छुआ और वहाँ पहुँचकर स्वर्ग लोक का द्वार बन्द कर दिया । अग्नि स्वर्ग लोग का अधिपति है । पहले वसु लोग उसके पास गये और कहा, “अपनी लपटों में होकर हमको आकाश अर्थात् स्थान दे कि हम ऊपर चले जा सकें”। उसने कहा, “बिना स्तुति किये मैं तुमको जाने न दूंगा । तुम मेरी स्तुति करो”। वह मान गये और नौ ऋचाओं (त्रिवृत स्तोम) से उसकी स्तुति की । जब उन्होंने ऐसा किया तो उसने उनको स्वर्ग में जाने दिया । अब रुद्र लोग आये और कहा कि अपनी लपटों में होकर हमको जगह दे कि हम स्वर्ग को जासकें । उसने कहा कि बिना स्तुति के मैं जाने न दूंगा । तुम मेरी स्तुति करो । वे मान गये

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चौथा अध्याय ] २११ और १५ ऋचाओं से स्तुति की । उसने उनको जाने दिया और वह यथेष्ट लोक को पहुँच गये । अब आदित्य लोग पहुँचे और कहा कि अपनी लपटों में होकर हमको जगह दे कि हम स्वर्ग को जा सकें। उसने कहा कि बिना स्तुति कराये मैं जाने न दूंगा । तुम मेरी स्तुति करो । उन्होंने मान लिया और १७ ऋचाओं से स्तुति की । तब उसने उनको जाने दिया और वे यथेष्ट लोक में पहुँच गये । अब विश्वेदेव आये और कहा कि अपनी लपटों में होकर हमको जगह दे कि हम स्वर्ग को जा सकें । उसने कहा कि मैं बिना स्तुति कराये तुमको जाने न दूंगा; तुम मेरी स्तुति करो । उन्होंने स्वीकार कर लिया और २१ स्तोमों से स्तुति की। और स्तुति करने के पश्चात् वह यथेष्ट लोक में पहुँच गये । इस प्रकार एक एक करके देवते गये और एक एक स्तोम से स्तुति कर करके यथेष्ट लोक को प्राप्त हो गये । जो यजमान चार स्तोमों से स्तुति करता है और जो ऋत्विज ( अग्निष्टोम को ) जानता है वह अग्नि को पार करके चला जाता है । जो इस रहस्य को समझता है अग्नि उसको जगह दे देता है और वह स्वर्ग लोक को प्राप्त हो सकता है । (४) ४३—अग्निष्टोम अग्नि ही है । देवों ने अग्नि की स्तोम से स्तुति की इसलिये अग्निष्टोम नाम पड़ा । अग्नि + स्तोम का परोक्ष रूप अग्निष्टोम हो गया । क्योंकि देव परोक्ष-प्रिय होते हैं । चार प्रकार के देवों ने चार स्तोमों से स्तुति की । इसलिये इसको "चतुःष्टोम' कहते हैं । यह परोक्ष रूप हैं। देव परोक्ष- प्रिय होते हैं । अग्नि की उस समय स्तुति की गई जब वह ऊपर को ज्योति के रूप में जा रहा था । इसलिये इसको "ज्योतिःस्तोम”

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२१२ [ तीसरी पञ्चिका या ज्योतिष्टोम कहते हैं। यह परोक्ष रूप है। देव परोक्षप्रिय होते हैं। यह जो अग्निष्टोम है इसका न पूर्व है न पर ( न आदि है, न अन्त )। यह जो अग्निष्टोम है वह रथ के अनन्त चक्र के समान है। प्रायणीय और उदयनीय उसके दो पहियों के समान हैं। इसके विषय में एक गाथा है कि:-अग्निष्टोम का जो आदि है वह अन्त है और जो अन्त है वह आदि है। जैसे शाकल नामी सर्प वृत्ताकार में चलता है। यह नहीं मालूम होता कि आदि कहाँ है और अन्त कहाँ है। क्योंकि इसका प्रायणीय अर्थात् आरंभ ही अन्त है। इस पर कुछ शंका करते हैं कि प्रायण यानी आरंभ त्रिवृत अर्थात् ९ मंत्रों से होता है और अन्त २१ स्तोमों से। फिर एक से कैसे हुये ? इसका उत्तर यह है कि इनमें यह समानता है कि २१ स्तोम भी त्रिवृत हैं क्योंकि इनमें तीन तीन ऋचायें होती हैं और तृचों के लक्षण पाये जाते हैं। (५) ४४-अग्निष्टोम तपने वाला अर्थात् सूर्य है। सूर्य भी दिन में तपता है और अग्निष्टोम भी दिन में ही समाप्त हो जाना चाहिये। अग्निष्टोम साह्न ( एक दिन में समाप्त हो जाने वाला या एकाह्निक ) है इसलिये इसे जल्दी से नहीं करना चाहिये, न पहले सवन में, न मध्य सवन में और न तीसरे सवन में। नहीं तो यजमान शीघ्र मर जायगा। अगर प्रातः और दोपहर के सवनों को जल्दी से नहीं करते तो पूर्व की ओर ग्राम फूलते फलते हैं और अगर सायंकाल का सवन जल्दी से कर देते हैं तो पश्चिम का गाँव जंगल हो जाता है और यजमान मर जाता है इसलिये प्रातः, दोपहर और

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चौथा अध्याय ] २१३ सायंकाल के सवनों को करने में जल्दी नहीं करनी चाहिये। तो यजमान शीघ्र न मरेगा। शस्त्रों के पढ़ने में सूर्य की चाल का अनुकरण करे। प्रातः- काल के समय यह शनैः-शनैः तपता है। इसलिये प्रातःकाल के समय शस्त्रों को धीरे धीरे पढ़े। दोपहर को तेज़ होता है इस- लिये दोपहर के सवन में तेज़ पढ़ना चाहिये। दोपहर के बाद मुँह के सामने बहुत तेज़ तपता है। इसलिये सायंकाल के सवन में बहुत तेज़ी से पढ़ना चाहिये। उस समय ऐसी तरह पढ़ना चाहिये मानो वाणी पर पूरा प्रभुत्व है। क्योंकि वाणी ही शस्त्र है। तृतीय सवन में जिस तेज़ी से आरंभ किया था अगर उसी तेज़ी से बराबर पढ़ता जाय तो बहुत ही अच्छा होता है। सूर्य न कभी अस्त होता है, न उदय होता है। जो इसको अस्त होता हुआ जानता है वह केवल दिन का अन्त करके फिर अपने को लौटा देता है। रात्रि इधर कर देता है और दिन उधर। और जो यह प्रातःकाल को उदय होता हुआ मानते हैं यह रात का अन्त करके अपने को लौटा देता है। दिन इधर करता है और रात उधर। सूर्य कभी अस्त नहीं होता। जो इस रहस्य को समझता है उस को सूर्य से सायुज्यता, सारूप्यता और सालोक्यता प्राप्त होती है। उसका कभी अस्त नहीं होता। (६) ऐतरेय ब्राह्मण की तीसरी पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त हुआ।