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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

by महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय

Source: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished592 pages
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चौथी पञ्चिका

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

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पहला अध्याय १-देवों ने पहले दिन ( की सोम-इष्टि ) द्वारा इन्द्र के लिये वज्र तैयार किया । दूसरे दिन के द्वारा ठंडा किया । तीसरे दिन के द्वारा इन्द्र को अर्पण किया और चौथे दिन के द्वारा उसने उससे शत्रुओं पर प्रहार किया । इसलिये होता चौथे दिन षोडशी शस्त्र को पढ़ता है । यह जो षोडशी है वह वज्र है । यह जो चौथे दिन षोडशी का पाठ करता है मानो वज्र का प्रहार करता है अपने शत्रु और अहित- चिन्तक पर और उस पर जिस का मारना ठीक हो । षोड़शी वज्र हैं । उक्थ्य पशु हैं । उस ( षोडशी ) को शस्त्रों के ढकने के तौर पर पढ़ता है । ऐसा करने से मानो षोडशी के शस्त्र से पशुओं को घेर लेता है । इसलिये षोडशी रूपी वज्र से जब पशु घेरे जाते हैं तो वे यजमान के पास लौट आते हैं । इसलिये घोड़ा हो या पुरुष हो या गौ हो या हाथी हो यदि ये जाते हों तो स्वयं ही लौट आते हैं यदि इनको पुकारा जाय । षोडशी रूपी वज्र को देखकर इस षोडशी वज्र से ही वश में आते हैं। क्योंकि वाणी वज्र है। षोडशी वज्र है। ( २२५ ) १५

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२२६ [ चौथी पञ्चिका प्रश्न होता है कि यह षोडशी नाम क्यों पड़ा । स्तोत्र १६ होते हैं । शस्त्र भी सोलह होते हैं । सोलह अक्षर ( अनुष्टु॒भ् ) के बाद ठहरता है और सोलह अक्षर के बाद 'ओ३म्' कहता है । इसमें १६ पदों का निविद् रक्खा जाता है । इसीलिये षोडशी नाम पड़ा । अब दो अक्षर बढ़े ( मंत्र के पिछले भाग में १६ के बजाय अठारह अक्षर होते हैं । ) क्योंकि षोडशी के अनुष्टुभ् में अठा- रह अक्षर हैं । यह वाणी के दो स्तन रूप हैं जो इस रहस्य को समझता है उसकी सत्य रक्षा करता है और झूठ उसको हानि नहीं पहुँचाने पाता । (१) २--तेज और ब्रह्मवर्चस् का इच्छुक षोडशी में गौरिवीत साम का पाठ करे । ( गौरिवीत साम-इन्द्र जुषस्व प्रवहाय··· साम वेद, उत्तरार्चिक ३।२२; आश्वलायन श्रौत सूत्र ६।२ ) । यह गौरिवीत साम तेज भी है और ब्रह्मवर्चस् भी । जो इस रहस्य को समझ कर गौरिवीत साम पढ़ता है वह तेजस्वी और ब्रह्म- वर्चस्वी होता है । कुछ लोग कहते हैं कि षोडशी में नानद साम पढ़ना चाहिये, ( नानद साम—प्रत्यस्मै पिपीषते इत्यादि, सामवेद ४।२।७।१-४ ) इन्द्र ने वृत्र के लियें वज्र उठाया, और उसे मारा, और उसे घायल किया । घायल होकर वह शोर करने लगा ( व्यनदत् ) । इसलिये नानद साम हो गया । इसीलिये इसको नानद साम कहते हैं । नानद साम को शत्रु का भय नहीं क्योंकि यह शत्रु का मारने वाला है। जो इस रहस्य को समझ कर षोडशी में नानद साम का पाठ करता है उसका शत्रु मर जाता है और वह शत्रुओं से अभय हो जाता है । यदि नानद साम पढ़ा जाय तो अविहृत पढ़ना चाहिये (अर्थात् एक मंत्र के पद दूसरे मंत्र के पद से नहीं मिलाने

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पहला अध्याय ] २२७ चाहिये) क्योंकि इसको अविहृत ही पढ़ा जाता है। यदि षोडशी शस्त्र में 'गौरिवीत' का पाठ करे तो विहृत पढ़े (अर्थात् एक मंत्र के पद दूसरे मंत्र के पद से मिला देना चाहिये) क्योंकि उसको इसी प्रकार पढ़ा करते हैं। ३—यदि गौरिवीत पढ़ा जाय तो होता छन्द कं पदों को मिला जुला देता है (व्यतिषजति)। गायत्री और पंक्ति को मिला देता है "आत्वा वहन्तु" (ऋ० १।१६।१-३) और उप- सुश्रूणिहि (१।८२।१,३,४)। (पहला गायत्री है और दूसरा पंक्ति)। पुरुष गायत्री होता है और पशु पंक्ति। इस प्रकार वह पुरुष को पशुओं से मिलाता है और उनको पशुओं में स्थापित करता है। गायत्री और पंक्ति मिल कर दो अनुष्टुभ् होते हैं। इस प्रकार यजमान अनुष्टुभ् रूप वाणी से या वज्र से अलग नहीं होता। उष्णिग् और बृहती को मिला देता है जैसे "यदिन्द्र पृतनाज्ये" "अयन्तेते अस्तु हर्य्यत।" (ऋ० ४।२४।२५-२७ और ३।४४।१-३)। पुरुष उष्णिग् है और पशु बृहती। इस प्रकार वह पुरुष को पशुओं से मिला देता है और पशुओं में उसकी स्थापना कर देता है। उष्णिग् और बृहती मिल कर दो अनुष्टुभ् होते हैं। इस प्रकार वह अनुष्टुभ् रूपी वाणी से और वज्र से अलग नहीं होता। वह द्विपद को त्रिष्टुभ् से मिला देता है। जैसे "धूर्ध्वस्मै" और "ब्रह्मन् वीर" (ऋ० ७।३४।४ तथा ७।२९।२) पुरुष द्विपद् है और वीर्य त्रिष्टुभ्। इस प्रकार पुरुष को वीर्य से मिला देता है; और वीर्यवान् कर देता है। यही कारण है कि मनुष्य वीर्य- वान् होकर सब पशुओं से अधिक बल वाला हो जाता है।

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२२८ [ चौथी पञ्चिका बीस अक्षरों का द्विपद् और ४४ का त्रिष्टुभ् मिल कर ६४ अक्षर के दो अनुष्टुभ् होते हैं। इस प्रकार यजमान व अनुष्टुभ् रूपी वाणी से और वज्र से अलग नहीं होता। वह द्विपद् और जगती को मिला देता है जैसे एष ब्रह्मा (आश्व० श्रौतसूत्र ६।२) और प्रतेमहे (ऋ० १०।९६।१-३)। पुरुष द्विपद् हैं और पशु जगती हैं, इस प्रकार वह पुरुष को पशुओं से मिला देता है और पशुओं में उसकी स्थापना कर देता है। इसलिये पुरुष पशुओं में प्रतिष्ठित होकर उनसे दुग्धादि भोजन प्राप्त करता है। और उन पर शासन करता है क्योंकि यह उसके वश में होते हैं। सोलह अक्षरों के द्विपद् और अड़तालीस अक्षरों की जगती मिलकर चौंसठ अक्षरों के दो अनुष्टुभ् हो जाते हैं। इस प्रकार यजमान वाणी रूपी अनुष्टुभ् और वज्र से अलग नहीं होता। वह अब नीचे के मंत्र बोलता है जिनमें उन नियत छन्दों से अधिक अक्षर हैं :—( अति छन्द ) ( १ ) त्रिकद्रुकेषु महिषोयवाशिरं ( ऋ० २।२२।१-३ ) ( २ ) प्रोष्वस्मै पुरोरथम् । ( ऋ० १०।१३३।१-३ ) छन्दों में से जो रस बहा वह अतिच्छन्दों में चला गया। इसीलिये इनको "अतिच्छन्द" कहते हैं। षोडशी शस्त्र सब छन्दों से बना है, इसलिये अतिच्छन्दों का पाठ किया जाता है। इस प्रकार होता यजमान को सब छन्दों से युक्त कर देता है। जो इस रहस्य को समझता है वह सब छन्दों के षोडशी द्वारा फूलता फलता है। (३)

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पहला अध्याय ] २२९ · ४—महानाम्नी मंत्रों से कुछ टुकड़े लेकर उपसर्ग※ अर्थात् आधिक्य करता है :— पहली महानाम्नी यह ( भूलोक ) है, दूसरी अंतरिक्ष लोक, तीसरी वह ( स्वर्ग लोक )। इस प्रकार षोडशी में सब लोक आ गये । महानाम्नियों में से षोडशी में उपसर्ग करने का तात्पर्य यह है कि होता यजमान को सब लोकों में भाग देता है। जो इस रहस्य को समझता है वह षोडशी के सब लोकों से निर्मित होने के कारण फूलता फलता है। अब वह नीचे के प्रज्ञात अनुष्टुभों का पाठ करता है :— (१) प्र. प्रवनिष्टुभम्। (ऋ० ८।६६।१) (२) अर्चत प्रार्चत। (ऋ० ८।६६।८-१०) (३) यो न्यत्तौँफरांणायद् । (ऋ० ८।६६।१३-१५) प्रज्ञात अनुष्टुभों का पाठ ऐसा है जैसे कोई मार्ग से बहक गया हो और लौट-फेर कर ठीक मार्ग पर आ जाय । जो जो अपने को श्री वाला और संपन्न समझे उसको चाहिये कि होता से अविहृत पाठ कराये जिससे छन्दों को विहृत करने में जो उनकी क्षति होती है उस क्षति का उस पर भी प्रभाव न पड़ सके । अगर पाप नाश करने का प्रयोजन हो तो विहृत पाठ होना चाहिये।

※यह उपसर्ग पाँच हैं ( १ ) प्रेचन ( २ ) प्रचेतय ( ३ ) आया- हिपिबमत्स्व ( ४ ) क्रतुश्छन्द ऋते वृहत् ( ५ ) सुम्न आवेहि नो वसो। यह महानाम्नी मंत्रों से लिये गये हैं। यदि इनको अविहृत बोलना हो तो लगातार बोलते हैं। इन का एक अनुष्टुभ् हो जाता है ।. यदि विहृत बोलना हो तो अतिच्छन्दों में जोड़ देते हैं ।

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२३० [चौथी पञ्चिका क्योंकि मनुष्य पाप से मिला है, षोडशी का विहृत पाठ करने से यजमान पाप से छूट जाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह इस पाप से छूट जाता है। नीचे के मंत्र से समाप्त करता है :— उद्यद् ब्रध्नस्य विष्टपम् । (ऋ० ८।६६।७) 'ब्रध्नस्य विष्टप' स्वर्ग है। इस प्रकार वह यजमान को स्वर्ग लोक में पहुँचाता है। वह नीचे के याज्य मंत्र को बोलता है :— अपाः पूर्वेषां हरिवः सुतानामथो इदं सवनं केवलं ते। ममद्धि सोमं मधुमन्तमिन्द्र सत्रा वृषम् जठर आ वृषस्व ॥ (ऋ० १०।६६।१३) इस याज्य मंत्र को पढ़ने से षोडशी में सभी सवन सम्मिलित हो जाते हैं। "अपाः" (तूने पिया है) से प्रातः सवन का तात्पर्य है। इस प्रकार षोडशी में प्रातः सवन आ गया। "अथो इदं सवनं केवलं ते" (अब यह सवन केवल तेरा ही है) इससे दोपहर का सवन आ गया। इससे षोडशी में दोपहर का सवन सम्मिलित हो गया। "ममद्धि सोम" (सोम को पी या सोम से आनन्द उठा) इससे सायंकाल का सवन आ गया। इससे षोडशी में तीसरा सवन सम्मिलित आ गया। "वृषन्" (बलवान) षोडशी का रूप है। इस याज्य मंत्र को पढ़ने से षोडशी सब सवनों से बन जाती है। इस प्रकार यह सब सवनों की हो जाती है। जो इस रहस्य को समझता है वह सब सवनों से बनी हुई षोडशी के द्वारा फूलता फलता है। याज्य मंत्र पढ़ने में हर ११ अक्षर के पद में महानाम्नियों में से पांच अक्षर का एक उपसर्ग* जोड़ देते हैं। इस प्रकार *यह उपसर्ग ये हैं:—(१) एवाह्ये व (२) एवहीन्द्र (३) एवाहि शक्रो (४) वशोहि शक्र ।

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पहला अध्याय ] २३१ षोडशी को सब छन्दों से युक्त कर देता है। जो इस रहस्य को समझता है वह सब छन्दों से युक्त षोडशी द्वारा फूलता फलता है। (४) ५—दिन का देवों ने आश्रय लिया और रात का असुरों ने। वे दोनों बराबर शक्ति के थे और कोई किसी से न दबता था। इन्द्र ने कहा "मेरे साथ रात में कौन घुसेगा कि असुरों को यहाँ से निकाल दें।" लेकिन उसे देवों में कोई न मिला जो उसकी बात मानता। क्योंकि वे डरते थे कि रात का अंधकार मृत्यु है । यही कारण है कि आजकल भी लोग रात के समय निकट स्थान में जाते हुये भी डरा करते हैं। क्योंकि रात अंधेरी होती है और अंधेरी मृत्यु के समान है। छन्द उसके साथ चले। चूंकि छन्द रात के देवता हैं। न निविद् पढ़ा जाता है न पुरोरुक, न धाय्य। न इन्द्र और छंदों के सिवाय कोई देवता हैं। उन्होंने पर्यायों (सोम पात्र को बार बार देने को पर्याय कहते हैं) द्वारा घूम घूम कर असुरों को निकाला। चूंकि पर्यायों द्वारा उनको निकाला इस'लिये उनको पर्याय कहते हैं। पहले पर्याय में उन्होंने असुरों को रात के पहले भाग से निकाला। दूसरे पर्याय में बीच की रात से। और अन्त के पर्याय में पिछले पहर से। छंदों ने कहा, "केवल हमीं रात में (अपिशर्वर्या) तेरा साथ देते हैं।" इस लिए (ऋषि ऐतरेय ने) छंदों का 'अपि- शर्वराणि' नाम रख दिया। क्योंकि वे इन्द्र को जो मृत्यु रूपी यह हर पद में इस प्रकार जोड़े जाते हैं :- (१) एवाह्य वापाः पूर्वेषां हरिवः सुतानाम् । (२) एवहीन्द्रापो इदं सवनं केवलं ते । (३) एवाहि शक्रो ममद्धि सोमं मधुमन्तमिन्द्र (४) वशो हि शक्र सत्रा वृषञ्जठर आ वृषस्व ॥

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२३२ [ चौथी पञ्चिका रात के अंधकार से डरता था वहाँ से निकाल लाये। इसीलिये इनको अपिशर्वराणि कहते हैं। (५) ६—होता ( अतिरात्र के जापक ) नीचे के अनुष्टुभ् छन्द के मंत्र से आरंभ करता है:— पान्तमा वो अन्धस इन्द्रमभि प्रगायत। विश्वासाहं शतक्रतुं मंहिष्ठं चर्षणीनाम्॥ (ऋ० ८।६२।१) इसमें 'अन्धस' (अंधेरा) शब्द पड़ा है। अनुष्टुभ् रात का है। रात्रि आनुष्टभी होती है। इन पर्यायों के याज्यों※ में 'अन्ध', (अंधेरा) 'पा' (पीना) और 'मद' (आनन्द करना) यह तीन शब्द अवश्य होते हैं। ※यह याज्य मंत्र यह हैं :— (१) अध्वर्यवो भरतेन्द्राय सोममामत्रेभिः सिञ्चता मद्यमन्धः। कामी हि वीरः सदमस्य पीतिं जुहोत वृष्णे तदिदेष वष्टि॥ (ऋ० २।१४।१) (२) अस्य मदे पुरु वर्षांसि विद्वांन्निन्द्रो वृत्रायप्रती चघान। तमु प्र ह षि मधुमन्तमस्मै सोमं वीराय शिप्रिणे पिबध्यै। (ऋ० ६।४४।१४) (३) अप्सु धूतस्य हरिवः पिबेह नृभिः सुतस्य जठरं पृणस्व। मिमिक्षुर्यमद्रय इन्द्र तुभ्यं तेभिर्वर्धस्व मदमुक्थवाहः। (ऋ० १०।१०४।२) (४) इन्द्र पिब तुभ्यं सुतो मदायांऽवस्य हरी वि मुचा सखाया। उत प्र गाय गणा आ निषद्याऽथा यज्ञाय गृणते वयो धाः॥ (ऋ० ६।४०।१) (५) अपाय्यस्यान्धसो मदाय मनीषिणः सुवानस्य प्रयसः। यस्मिन्निन्द्रः प्रदिवि वावृधान ओको दधे ब्रह्मरण्यन्तश्चनरः। (ऋ० २।१६।१)

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पहला अध्याय ] २३३ इससे याज्यों में रूप समृद्धता आ जाती है। जो रूप समृद्धता है वही यज्ञ में फलीभूत होती है। पहले पर्याय में पहले पद को बोलते हैं। इससे वे असुरों के जो घोड़े और गायें हैं उनको ले लेते हैं। बीच के पर्याय में बीच के पद को दो बार बोलते हैं। और ऐसा करके वह असुरों की गाड़ियों और रथों को छीन लेते हैं। अन्तिम पर्याय में अन्त के पद को दो बार बोलते हैं। ऐसा करके वे असुरों से उनके शरीरों पर जो वस्त्र, या सोना या रत्न होते हैं उनको छीन लेते हैं। जो इस रहस्य को समझता है वह अपने शत्रु को सब लोकों से निकाल देता है और उनसे सब कुछ छीन लेता है। यहाँ प्रश्न होता है कि पवमान स्तोत्र दिन के ही हैं, रात के नहीं, फिर इनका रात में क्यों पाठ होता है। दोनों के एक से ही भाग कैसे होते हैं ? इसका उत्तर यह है कि नीचे के मंत्रों से जो शस्त्र भी हैं और स्तोत्र भी :- इन्द्राय मद् बने सुतं परिष्टोभन्तु नो गिरः। अर्कमर्चन्तु कारवः ॥ (ऋ० ८।६२।१६) इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूर्णमुदरम्। अनाभयिन् ररिमा ते ॥ (ऋ० ८।२।१) इदं ह्यन्वोजसा सुतं राधानां पते। पिबा त्वस्य गिर्वणः ॥ (ऋ० ३।५१।१०) इस प्रकार रात भी पवमानवती हो जाती है। इस प्रकार दिन और रात दोनों पवमान युक्त हो जाते हैं। और उनके एक से भाग होते हैं। अब प्रश्न होता है कि जब १५ स्तोत्र दिन के लिये ही हैं

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२३४ [ चौथी पञ्चिका रात के लिये नहीं तो दोनों के लिए १५ स्तोत्र कैसे हो गये ? और दोनों के समभाग कैसे हुये ? इसका उत्तर यह है 'अपिशर्वराणि' में १२ स्तोत्र होते हैं। इसके अतिरिक्त रथंतर स्वर में सन्धि स्तोत्र-पढ़ा जाता है जो तीन देवों के प्रति है। इस प्रकार रात के १५ स्तोत्र हो जाते हैं। इस प्रकार रात दिन के १५ स्तोत्र हो जाते हैं और वे सम- भाग भी हो जाते हैं। स्तोत्र परिमित हैं परन्तु पाठ (अनुशंसन) अपरिमित है। मानो भूतकाल परिमित है, भविष्य अपरिमित है। भविष्य के लिये ही अन्य मंत्र पढ़ता है। स्तोत्र से जो बढ़ा वह प्रजा है, जो अपने से बढ़ा वह पशु। इसमें अधिक मंत्रों के जाप से होता को उस सबकी प्राप्ति हो जाती है जो अपने से अधिक है (अर्थात् प्रजा, पशु, धन आदि)। (६) ऐतरेय ब्राह्मण की चौथी पंचिका का पहला अध्याय समाप्त हुआ।

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दूसरा अध्याय ७.-प्रजापति ने अपनी लड़की सूर्या सावित्री को सोम राजा को ब्याह दिया । सब देव मेहमान होकर आये । प्रजापति ने उनके लिये वहतु के रूप में ( मेहमानों को जो चीजें अर्पण की जाती हैं उनको 'वहतु' कहते हैं ) हज़ार मंत्रों का शस्त्र बनाया जिसे अश्विन-शस्त्र कहते हैं । जो एक हज़ार से कम रहे वह अश्विनों का नहीं है । इसलिये होता को चाहिये कि एक हज़ार मंत्र बोले या अधिक । घी को खाकर बोले । जैसे लोक में गाड़ी या रथ के पहियों में तेल लगाने से अच्छे चलते हैं इसी प्रकार ( घी खाने से ) वाणी भी अच्छी चलती है । शकुनि या बाज़ की तरह बैठकर आहाय पढ़े । देव आपस में यह निश्चय न कर सके कि यह हज़ार मंत्र किस के हों । हर एक ने कहा, "मेरे हों," "मेरे हों ।" जब एक मत न हो सके तो यह ठहरा कि एक दौड़ दौड़ें । जो जीते उसी के यह मंत्र हों । उन्होंने सूर्य्य को जो अग्नि के भी ऊपर है गृहपति और काष्ठ ( सीमा ) नियत किया ❁ । इसीलिये अश्विन शस्त्र का आरंभ इस अग्नि की ऋचा से होता है :- ❁ अर्थात् वह गार्हपत्य अग्नि से चलकर सूर्य्य तक दौड़े । ( २३५ )

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२३६ [ चौथी पञ्चिका अग्निर्होता गृहपतिः स राजा विश्वा वेद जनिमा जातवेदाः, देवना- मृत यो मर्त्यानां यजिष्ठः स प्र यजतामृतावा ॥ ( ऋ० ६।१५। १३ ) कुछ लोगों का कहना है कि इस मंत्र से अश्विन-शस्त्र का आरंभ करना चाहिये :- अग्निं मन्ये पितरमग्निमापिमग्निं भ्रातरं सदमित् सखायम् । अग्नेरनीकं बृहतः सपर्य दिवि शुक्रं यजतं सूर्यस्य । (ऋ० १०।७।३) उनका कहना है कि "दिवि शुक्रं यजतं सूर्यस्य" (मंत्र का चौथा पाद ) इन शब्दों से द्वारा वह यथेष्ट स्थान को पहुँच जायगा । परन्तु यह बात माननीय नहीं है। उन लोगों से कहा कि अगर मंत्र में 'अग्नि' शब्द बार बार आयेगा तो होता आग में गिर पड़ेगा । ऐसा ही हुआ करता है । इसलिये "अग्नि होता गृहपतिः" इससे आरंभ करना चाहिये । इसमें 'गृहपति' और जनिमा ( सन्तान ) शब्द हैं । इससे उसको पूर्ण आयु प्राप्त हो सकती है। जो इस रहस्य को समझता है उसकी आयु पूर्ण होती है । (१) ८—यह जो देवते दौड़ रहे थे उनमें से चलने के बाद अग्नि अपने मुख या लपटों द्वारा आगे था । अश्विन पीछे थे । और वे उससे बोले "हम दोनों जीत जायं"। अग्नि मान गया कि अश्विन शस्त्र में हम को भी भाग मिले । उन्होंने स्वीकार कर लिया और अश्विन-शस्त्र में अग्नि को स्थान दे दिया । इसीलिये अश्विन-शस्त्र में अग्नि के लिये कई मंत्र हैं । अश्विन उषा के पीछे थे । वे उससे बोले, "तू हट जा । हम जीत जायं" वह इस शर्त पर मान गई कि उसका भी भाग लगे । उन्होंने स्वीकार कर लिया और उसके लिये अश्विन- शस्त्र में जगह कर दी । इसीलिये अश्विन-शस्त्र में उषा के लिये कई मंत्र हैं ।

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दूसरा अध्याय ] २३७ अश्विन इन्द्र के पीछे चले और कहा, “मघवन् ! हम इस दौड़ में जीतना चाहते हैं।” उनका यह साहस न हुआ कि इन्द्र से कहते “हट जाओ”। इन्द्र ने इस शर्त पर मान लिया कि मुझे भी भाग दो। उन्होंने स्वीकार कर लिया और अश्विन- शस्त्र में इन्द्र को स्थान दिया। इसीलिये अश्विन-शस्त्र में कई मंत्र इन्द्र के हैं। इस प्रकार अश्विन जीत गये और उनको इनाम मिल गया। चूँकि अश्विन जीत गये और उनको इनाम मिला इसलिये इस शस्त्र को अश्विन-शस्त्र कहते हैं। जो इस रहस्य को समझता है उसकी कामना पूरी हो जाती है। कुछ लोग पूछते हैं कि जब इस शस्त्र में अग्नि, उषा और इन्द्र के मंत्र हैं तो इसको अश्विन-शस्त्र क्यों कहते हैं। इसका उत्तर यह है कि अश्विन जीत गये। उनको इनाम मिल गया। जो इस रहस्य को समझता है उसकी कामना पूरी हो जाती है। (२) ९—अग्नि ने दौड़ में अपने रथ में खच्चर (अश्वतरी) जोड़े। दौड़ में अग्नि ने खच्चरियों की योनियाँ जला दीं। इस- लिये उनके सन्तान नहीं होती। उषा लाल गायों के रथ में दौड़ी। इसीलिये उषाकाल में लाल रंग चमकता है। यह उषा का रूप है। इन्द्र ने घोड़े के रथों में दौड़ की। इसलिये क्षत्रियों का रूप यह है कि बहुत कोलाहल हो। यही इंद्र का रूप है। अश्विनों ने गधों के रथ में दौड़ की और जीत गये। और इनाम पा गये। (चूँकि बहुत दौड़ने से थक गये। इसलिये गधों की तेजी जाती रही। और दूध मारा गया और रथ के वाहनों में सबसे कम हो गये। लेकिन अश्विनों ने गधे के वीर्य को शक्ति रहित नहीं किया। इसलिये वाजी अर्थात् गधे में दो

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२३८ [ चौथी पञ्चिका, प्रकार का वीर्य होता है (द्विरेता) (एक घोड़ी में खच्चर उत्पन्न करने के लिए। दूसरा गधी में गधा उत्पन्न करने के लिये)। कुछ लोग कहते हैं कि "जैसे अग्नि, उषा और अश्विन के लिये होता मंत्र पढ़ता है उसी प्रकार सूर्य्या के लिये भी सात छंदों में मंत्र पढ़ने चाहिये। देवों के सात लोक हैं। वह सब लोकों में फूले फलेगा।" ऐसा माननीय नहीं है। तीन ही छंदों में पढ़ना चाहिये। तीन ही लोक हैं जो त्रिवृत हैं। इन लोकों के जीतने के लिये। कुछ लोग कहते हैं कि— उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्य्यम्॥" (ऋ० १।५०।१) से आरम्भ करे। यह भी माननीय नहीं है। मानो दौड़ने में उद्दिष्ट सीमा को ही भूल जाय। उसको इस मंत्र से आरम्भ करना चाहिये:— सूर्य्यो न दिवस्पातु वातो अन्तरिक्षात्। अग्निनः पार्थिवेभ्यः॥ (ऋ १०।१५८।१) मानो इससे वह उद्दिष्ट सीमा को पहुँच गया। अब दूसरा मंत्र "उदुत्यं" (१।५०।१) बोले। "चित्रंदेवानामुदगादनीकं" (१।११५) यह सूक्त त्रिष्टुभ् है। यह सूर्य्य "देवों में चित्र" है। इस लिये यह बोला जाता है। "नमो मित्रस्य वरुणस्य चक्षसेः" (ऋ० १०।३७।१) यह जगती सूक्त है। इसमें एक आशीर्वाद का पद है। इससे होता अपने लिये और यजमान के लिये आशीर्वाद कहता है। (३) १०—इस सम्बन्ध में कहते हैं कि सूर्य्य को न छोड़ जाय। बृहती को न छोड़ जाय। सूर्य्य को छोड़ जायगा तो ब्रह्मवर्चस्

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दूसरा अध्याय ] २३९. को छोड़ जायगा और बृहती को छोड़ जायगा तो प्राणों को छोड़ जायगा । इन्द्र के इन प्रगाथों को पढ़ता है :— इन्द्र क्रतुं न आ भर पिता पुत्रेभ्यो यथा । शिक्षान्णो अस्मिन् पुरुहूत यामनि जीवा ज्योतिरशीमहि ॥ ( ऋ० ७।३२।२६) "हे इन्द्र, हमारे यज्ञ को पूरा कर जैसे पिता पुत्र की मदद करता है। हे पुरुहूत ( सब इसी को बुलाते हैं इस लिये इसको पुरुहूत कहा ) हमको इसमें शिक्षा दे, जिससे हम ज्योति को प्राप्त होवें" । यह जो ज्योति है उससे सूर्य्य का तात्पर्य है । इस मंत्र को पढ़कर वह सूर्य्य को भूलता नहीं । बार्हत प्रगाथ को पढ़कर वह बृहती को भूलने नहीं पाता । नीचे के मंत्र से राथंतरी योनि की स्तुति करता है :— अभि त्वा शूर नोनुमोऽदुग्धा इव धेनवः । ईशानमस्य जगतः स्व- दृ॑शमीशानमिन्द्र तस्थुषः ॥ (ऋ० ७।३२।२२ तथा सामवेद उत्त० १।१।११) राथंतर स्वर से अश्विन शस्त्र का सन्धि स्तोत्र पढ़ा जाता है । यह रथंतर योनि के लिये । ऊपर के मंत्र में "ईशानमस्यजगतः स्वदृ॑शम्" शब्द हैं । 'स्वदृक्' से सूर्य्य का तात्पर्य् है ( स्वर्ग का देखने वाला ) । इसके पाठ से वह सूर्य को नहीं भूलता । यह जो बार्हत प्रगाथ है उससे बृहती को नहीं भूलता । नीचे का मंत्र ओर वरुण का प्रगाथ पढ़ता है:— बहवः सूरचक्षसोऽग्निजिह्वा ऋतावृधः । त्रीणि ये येमुर्विदथानि धीतिभिर्विश्वानि परिभूतिभिः ॥ (ऋ०७।६६।१०) दिन मित्र है और रात वरुण । जो अतिरात्र करता है वह

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२४० [ चौथी पञ्चिका दिन और रात से शुरू करता है। मैत्रावरुण प्रगाथ को पढ़कर होता यजमान को दिन और रात में स्थापित कर देता है । "सूरचक्षसः" शब्द से सूर्य को नहीं भूलता। यह जो बार्हत प्रगाथ है उससे बृहती को नहीं भूलने पाता । द्यौ और पृथिवी के यह दो मंत्र पढ़ता है :— मही द्यौः पृथिवी च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम् । पिपृतां नो भरीमभिः ॥ (ऋ० १।२२।१३) ते हि द्यावा पृथिवी विश्वशम्भुव ऋतावरी रजसो धारयत् कवी । सुजन्मनी धिषणे अन्तरीयते देवो देवी धर्मणा सूर्य्यः शुचिः ॥ (ऋ० १।१६०।१) द्यौ और पृथिवी दो स्थान हैं । पृथिवी यहां और द्यौ वहाँ । द्यावापृथिवी के इन दो मंत्रों को बोलकर वह यजमान को द्यौ और पृथिवी में स्थापित कर देता है । ऊपर जो "देवो देवी धर्मणा सूर्य्यः शुचिः" शब्द आये हैं ( अर्थात् देव और शुचि-सूर्य दो देवियों को पार करता है ) उन से वह सूर्य को नहीं भूलता । इनमें से एक गायत्री है और दूसरा जगती । इन दोनों के मिलने से दो बृहती होते हैं। इस प्रकार वह बृहती को नहीं भूलने पाता । द्विपदों की स्तुति करता है :— विश्वस्य देवीमृचयस्य जन्मनो न यारोषति नग्नभत् "यह जो उत्पन्न हुआ या चलता फिरता जगत है उस सब की शासक देवी न हम पर क्रोध करे, न नाश करने के लिये हमारे पास आवे" ( यह मंत्र संहिता में नहीं है ) । लोग इस अश्विन-शस्त्र को चितैध (चिता का ईंधन कहते हैं। क्योंकि जब होता इस शस्त्र को समाप्त करने को होता है तो निर्ऋति अपना पाश लिये छिपी रहती हैं कि होता की गर्दन में डाल कर उसका नाश कर दे । बृहस्पति ने उसको बचाने के

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दूसरा अध्याय ] २४१ लिये इस द्विपदा स्तुति का दर्शन किया । यह जो शब्द आये हैं “न यारोषातिनग्मथत्” ( न क्रोध कर, न नाश के लिये देख ) इन शब्दों को कहकर निर्ऋति से पाश छीन लिये और नीचे रख दिये । इसी प्रकार जब होता द्विपदों की स्तुति के मंत्र पढ़ता है तो निर्ऋति के हाथों से पाश छुड़ा लेता है और उनको नीचे रख देता है । और सुरक्षित निकल आता है । पूर्ण आयु की प्राप्ति के लिये । जो इस रहस्य को समझता है वह पूर्ण आयु प्राप्त कर लेता है । मंत्र में जो यह शब्द हैं “मृचयस्य जन्मनः” इनके पाठ से वह सूर्य को नहीं भूलता क्योंकि सूर्य्य चलता सा है ( मर्चयति ) । द्विपद मंत्र का छन्द मनुष्य का छन्द है ( क्योंकि इसके भी दो पाद होते हैं और मनुष्य के भी दो पद ) । इसलिये इसके अन्तर्गत सभी छन्द आ जाते हैं । इस प्रकार होता बृहती को भूलने नहीं पाता । (४) ११—ब्रह्मणस्पति के मंत्र से समाप्त करता है । ब्रह्म बृहस्पति है । वह ब्रह्म में उसको स्थापित करता है । जो पुत्र और पशु की कामना करे वह इस मंत्र से समाप्त करे :— “एवा पित्रे विश्वदेवाय वृष्णे यज्ञैर्विधेम नमसा हविर्भिः । बृहस्पते सुप्रजा वीरवन्तो वय स्याम पतयो रयीणाम्” ॥ ( ऋ० ४।५०।६ ) क्योंकि इस मंत्र के “बृहस्पते सुप्रजा वीरवन्तो वयं स्याम पतयो रयीणाम्” शब्दों के कहने से वह सन्तान, पशु, धन, वीर, वाला हो जाता है । यह जान कर कि इस मंत्र से आरम्भ करना चाहिये । तेज और ब्रह्मवर्चस् की कामना वाला नीचे के मंत्र से आरम्भ करे :— १६

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२४२ [ चौथी पञ्चिका बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद्द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु । यद् दीदयच्छवस ऋत प्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम् । ( ऋ० २।२३।१५ ) 'अति' का अर्थ यह है कि अन्यों की अपेक्षा अधिक ब्रह्म- वर्चस् वाला होता है। "द्युमत्" का अर्थ है ब्रह्मवर्चस् । 'विभाति' का अर्थ है कि ब्रह्मवर्चस् हर जगह चमकता सा है । "यद् दीदयच्छवस ऋत प्रजात" का अर्थ है कि ब्रह्मवर्चस् चमकता है। 'चित्र' का अर्थ है कि ब्रह्मवर्चस् साक्षात् मालूम होता है। जो जो इस रहस्य को समझ कर इस प्रकार समाप्त करता है वह ब्रह्मवर्चसी और ब्रह्मयशसी होता है। इसलिये इस रहस्य को समझने वाले होता को इसी ब्रह्मणस्पति के मंत्र से समाप्त करना चाहिये। ऐसा करने से वह सूर्य्य को नहीं भूलने पाता। तीन बार त्रिष्टुभ् में सभी छन्द आ जाते हैं। इस प्रकार वह बृहती को नहीं भूलता। गायत्री और त्रिष्टुभ् से वषट्कार करे। गायत्री ब्रह्म है और त्रिष्टुभ् वीर्य्य । इस प्रकार ब्रह्म और वीर्य्य को जोड़ता है। जो इस रहस्य को समझ कर गायत्री और त्रिष्टुभ् से वषट्कार करता है वह ब्रह्मवर्चसी और ब्रह्मयशसी होता है। ( त्रिष्टुभ् यह है ):- अश्विना वायुना युवं सुदक्षा नियुद्भिश्न सजोषा युवाना । नासत्या तिरो अह्नयं जुषाणा सोमं पिबतमस्रिधा सुदानू । ( ऋ० ६।५८।७ ) गायत्री यह है :- उभा पिब तमश्विनोभा नः शर्म यच्छतम् । अविद्रियाभिरूतिभिः । ( ऋ० १।४६।१५ ) गायत्री और विराट् से भी वषट्कार हो सकता है :- गायत्री ब्रह्म है और विराट् अन्न । इस प्रकार वह ब्रह्म को अन्न से जोड़ता है। जो इस रहस्य को समझ कर गायत्री और