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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

पारम्परिक लोक संग्रह द्वारा

स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)

DevanagariHindipublished292 पृष्ठ

अकबर बीरबल विनोद २४२

अकबर बीरबल विनोद २४२ आपका नमक खाता हूँऔर अपना सब काम बराबर खैरख्वाही से करता आ रहा हूँ, फिर भी देखता हूँ कि आप एक कल के आये हुए छोकरे के सामने हम लोगों को कुछ भी नहीं समझते । आपको जो कुछ भी पूछना होता है बीरबल ही से पूछा करते हैं। इस बातकी हम लोगों को बड़ी चोट है।” बादशाह बोले-“आप लोग इसके लिये कोई चिन्ता न करें, अच्छा मौका है। इस समय बीरबल भी यहाँ मौजूद नहीं है। मैं एक जरूरी बात पूछना चाहता हूँ आप में से कोई भी बतलावे कि बनस्पति के बीज कहाँ हैं।” दरबारियों ने इसका अनुसन्धान करनेमें महीनों सिर तोड़ परिश्रम किया, परन्तु सब बेफायदा हुआ। लाचार होकर एक दिन भरी सभा में बादशाहने वही बात बीरबल से पूछा- “बीरबल तत्क्षण हाथ में गंगाजल लेकर जमीन पर छिड़क दिया और बोला- “बस पृथ्वीनाथ ! वह बीज इसी ठौर पर है।” लोगों का मुख मलीन हो गया और फिर बादशाह के सामने ऐसी बातें कभी जवान पर नहीं लाये ।

हौज के अण्डे

एक दिन बादशाह को बीरबल की हँसी उड़ाने की इच्छा जागृत हुई। अतएव वे बीरबल के आने के पूर्व ही बाजार से बहुत से मुर्गी के अण्डे मँगाकर अपने दरबारियों को एक एक कर बाँट दिया। केवल बीरबल ही खाली रह गया था। वह ज्योंही दरबार में हाजिर हुआ, बादशाह ने कहा-

२४३ अकवल बीरवल विनोद़

२४३ अकवल बीरवल विनोद़ “बीरबल ! मैंने आज रातमें एक अजीब सपना देखा है,उसका तात्पर्य यह निकलता है कि जो मनुष्य इस हौजमें डुबकी लगा कर एक अण्डा मुरगी का न निकाल लावे उसे दो बाप का समझना चाहिये। मैं केवल तुम्हारी ही बाट देख रहा था। बेहतर है कि सबकी वारी२ से परीक्षा ली जाय। देखें स्वप्न का क्या प्रभाव पड़ता है।” बादशाह की अनुमति से सभी दरबारी हौज में डुबकी मार कर हाथ में एक एक मुरगी का अण्डा लेकर बाहर निकले। जब बीरबल की ओसरी आई तो वह हौज में डुबकी मारकर खाली हाथ निकला। परन्तु उसके मुखारबिन्द से कुकड़ू कूं का शब्द निकल रहा था।” बादशाह ने कहा- मियाँ बीरबल तुम्हारा अण्डा कहाँ है, जल्दी दिखलाओ। बीरबल ने उत्तर दिया-“गरीबपरवर ! तमाम अण्डा देने वाली मुर्गियों के बीच एक मैं ही मुर्गा हूँ। विचारे दरबारी सहम गये और बादशाह के ओठों पर मुस्कुराहट आ गई। कोई धनी और कोई दरिद्र क्यों होता है एक दिन बीरबल और बादशाह में विज्ञान की बातें छिड़ीं थीं। दोनों अपनी अपनीवाली कहते थे, परन्तु उनका मन किसी सिद्धान्त पर स्थिर नहीं होता था इसी बीच बादशाह ने बीरबल से पूछा-“अच्छा बीरबल इसका विवेचन कर सिद्ध करो कि संसार में कोई तो धनी और कोई दरिद्री क्यों हो जाता है?” बीरबल ने तुरत उत्तर दिया-

अकबर बीरबल विनोद २४४

अकबर बीरबल विनोद २४४ राम झरोखे बैठ के, सब सौदा कर लेत । जो जैसा कर लावता, वाको वैसहिं देत ॥ अब मैं उसको भूल गया एक दिन बादशाह बीरबल से हँसी मजाक करते हुए पूछ बैठे-“बीरबल ! मैंने सुना है कि तुम्हारी स्त्री नितान्त सुन्दरी है दरअसल क्या है?” बीरबल ने उत्तर दिया- “पृथिवीनाथ ! मुझे भी ऐसा ही गुमान था, परन्तु बेगम साहिबा को देखकर अब मैं उसे एकदम भूल गया हूँ।” बीरबल को कुत्तों की हाकिमी एक दिन बादशाह अपने चुने २ दरबारियों के साथ बातांलाप कर रहे थे। इसी अन्तर्गत अब्दुलफजल नामी दरबारी को बीरबल की हँसी उड़ाने की सूझी। वह बीरबल को चिताकर बोला-“बीरबल ! आज से तुमको कुत्तों की हाकिमी प्रदान की जाती है।” बीरबल झट बोल उठा-“फिर तो आपको मेरी आज्ञा पालन करनी पड़ेगी। उलटे मुँह खाकर अब्दुलफजल शरमिन्दा हो गया। फिर कभी उससे बीरबल से ऐसी छेड़खानी नहीं करी। एक हजार जूते एक दिन बादशाह बीरबल को झिपाने की नीयत से उसके जूते गुम करा दिये। जब घर जाने का समय हुआ

२४५ Akbar Birbal Vinod \quad अकबर बीरबल विनोद

२४५ Akbar Birbal Vinod \quad अकबर बीरबल विनोद तो बीरबल अपने जूतों को तलाश करने लगा। जब वे न मिले तो बादशाहने कहा-"अच्छी बात है; बीरबलको हमारी तरफ से जूते दिये जायँ।" बीरबल नये जूतों को पहन कर ऊपरी प्रसन्नता दिखलाते हुए बोला- "मैं आपको आशीर्वाद देता हूँ कि ईश्वर इसके पहले आपको हरलोक परलोक सभी जगह ऐसे ही हजार जूते दे।" बीरबल के ऐसे हास्यपूर्ण आशीर्वाद को सुनकर बाद- शाह खिलखिला कर हँस पड़ा। दरबारी लोग चकित होकर बीरबल का मुँह देखते रह गये।

चोर की दाढ़ी में तिनका

बादशाहके यहाँ एक दिन चोरी होगई यानी आलमारी से एक कीमती जेवर गायब हो गया। बादशाह ने बीरबल को अन्वेषण करने की आज्ञा दी। तब बीरबल ने चाल चलने की एक नई तरकीब सोचकर निकाली। वह पहले आलमारी से बारी२ अपना दोनों कान सटाया, गोया कोई बात सुनने की चेष्टा कर रहा हो। बाद फिर कान हटाकर बादशाह से अर्ज किया- "पृथिवीनाथ ! वह आपकी आलमारी साफ बतला रही है कि चोर की दाढ़ी में तिनका है।" एक दरबारी सहम कर अपनी दाढ़ी से हाथ लगाया। बीरबलने झट उसे गिरफ्तार कर लिया। उस दरबारी ने थोड़ी देर बाद भरी सभा में अपना अपराध स्वीकार कर लिया।

अकबर बीरबल विनोद २४६

अकबर बीरबल विनोद २४६ सोया सो खोया एक दिन बीरबल किसी मसलहत से कुजड़े का भेष बनाकर बादशाहके महल का चक्कर काट रहा था। अचानक बादशाह की दृष्टि उस पर जा पड़ी। बादशाह ने उसे कुँजड़ा समझकर पूछा- "अरे ओ कुँजड़े, सोया किस भाव पर बेचेगा ?" कुँजड़ा भेषधारी बीरबल बोला- "टके का एक सेर ।" बादशाह उसका उत्तर सुनकर बोले- "तब तो और भी चूका ?" बीरबल ने कहा- "सोया सो खोया।" ऐसे उत्तर से बादशाह को सन्देह हो गया और भलीभाँति जाँच पड़ताल करने पर सोये वाले को बीरबल जानकर हँस पड़े। लड़ाई में जीत किसकी ? एक दिन कहीं संग्राम में जाने के लिये उद्यत होकर बादशाहने बीरबल से पूछा 'अच्छा बीरबल ! मैं तुमसे पूछता हूँ कि आज की लड़ाई में किसकी जीत होगी ?" बीरबल ने उत्तर दिया- "पृथिवीनाथ ! यह बात मैं यहाँ से नहीं बतला सकता । हाँ युद्ध का मैदान देखकर आपको बतला दूँगा।" बादशाह जब संग्रामांगण में पहुँचे तो फिर वही बात बीरबल से पूछा । बीरबल ने उत्तर दिया- "पृथिवीनाथ ! आपकी ही जीत होगी।" बादशाह बोले- "यह तुमने कैसे जाना ?" बीरबल ने "-सरकार ! मैं इससे कह रहा हूँ कि आपका शत्रु हाथी पर सवार होकर आया है और हाथी एक मनहूस

२४७ अकबर वीरबल विनोद

२४७ अकबर वीरबल विनोद जानवर है। यहाँतक कि वह अपनी सूँड से धूल उठाकर अपने ही शरीर पर फेका करता है और आप घोड़ेपर सवार हैं। घोड़ा बहादुर होता है। उसको लोग गाजीमर्द भी कहते हैं। बादशाह बीरबल के उत्तर से बड़ा प्रसन्न हुए और लड़ाई में जीत होने पर उसे भरपूर इनाम दिये। मूर्ख से पाला पड़े तो चुप रहना प्रकृति की समानता होने से बादशाह और बीरबल में उत्तरोत्तर प्रेम बढ़ता ही गया। जिस कारण बीरबल को गरीबों का हित करने के लिये अच्छा अवसर मिलता था। वह येनकेन प्रकारेण बादशाह को प्रेरित कर कुछ न कुछ नित्य गरीबों को दिला दिया करता था। एक दिन की ऐसी घटना घटी कि बादशाह के गुरु महाशय मक्का से चलकर दिल्ली आये। रास्ते में राह की जानकारी न रहने के कारण उन्हें बहुत भटकना पड़ा था। बादशाह ने अपने गुरु का भलीभाँति आदर सत्कार किया। जब वे प्रकार कुछ दिन रहकर तगड़े हो गये तो फिर मक्का शरीफ लौट जाने का विचार प्रगट किया। बादशाह ने बड़ी प्रसन्नता से उन्हें पर्याप्त वस्त्राभूषण तथा धन धान्यादि देकर विदा किया। कितने दिनों के पश्चात् एक दिन बादशाह ने बीरबल से पूछा-“क्यों बीरबल ! जैसे ये पीर साहब हमारे गुरु हैं, वैसे ही तुम्हारे भी कोई गुरु होंगे ?” यदि हैं तो वे कहाँ रहते हैं ?

अकबर बीरबल विनोद २४८

यहाँ दिए गए पृष्ठ का सटीक पाठ्यान्तरण (transcription) प्रस्तुत है:

अकबर बीरबल विनोद २४८ वे कभी तुम्हारे यहाँ आते हैं वा तुम ही उनसे मिलने जाया करते हो?” बीरबल ने उत्तर दिया-“पृथिवी- नाथ ! मैं निगुरी नहीं हूँ, आपकी मेहरबानी से मेरे अनेकों गुरु हैं, परन्तु उसमें भेद केवल इतना ही है कि वे सबके सब बाहर रहते हैं। इसी कारण न कभी यहाँ आते हैं न हमको उनका दर्शन ही मिलता है। थोड़े दिन से मेरे सुनने में आया है कि हमारे एक गुरु यहाँ आ रहे हैं। मुझे उनके रहने का स्थान तक ज्ञात नहीं है, फिर वे बताने ही क्यों लगे उन्हें तो किसी के दाम टके की दरकार नहीं है। वैसे निस्प्रिय गुरु देखने में नहीं आते। यही कारण है कि इस दीनके द्वार पर कभी भी नहीं आने की कृपा करते। बादशाह को ऐसे गुरु से मिलने की इच्छा हुई और वे बीरबल से बोले- “दीवान जी ! जो तुम्हारे गुरु में इतनी विशेषता है तो मैं भी एकबार उनका दर्शन करना चाहता हूँ। हो सके तो जल्दी से जल्दी मुझे उनसे मिलाने का प्रबन्ध करो। बीरबल बोला- “पृथिवीनाथ ! जब आप उनसे मिलने की इच्छा प्रकट करते हैं तो मैं तत्परता से उनकी खोज कराऊँगा और यदि वे भी आपसे मिलने की इच्छा करेंगे तो मैं अवश्य आपसे उनका साक्षात् करा दूंगा।” बादशाह ने कहा-“मुझे अविलम्ब उनसे मिलाने की चेष्टा करो।” बीरबल बादशाह को तसल्ली देकर वहाँ से बिदा हुआ। घर जाते समय रास्ते में एक वृद्ध लकड़हारे से उसकी मुला- कात हो गई। वह विचारा तमाम परेशानी उठाकर भी आज अपनी सम्पूर्ण लकड़ियों को नहीं बेंच सका था। बीरबलने

२४६ अकबर बीरबल विनोद

२४६ अकबर बीरबल विनोद

उससे बची हुई लकड़ियों का मूल्य दर्याफ्त किया; फिर पैसा देने के मिस से उसको अपने घर लिवा ले गया। लकड़ो का मूल्य देकर बीरबल ने लकड़हारे से पूछा—"क्यों जी लकड़हारे! तुम हमें कोई सभ्य पुरुष जान पड़ते हो। समय के फेर से इस समय लकड़ियां बेचकर अपनी गुजर करते हो। मेरा तुमसे एक जरूरी काम है। यदि तुम उसके करने पर उद्यत होजावो तो मैं तत्काल तुम्हें पचीस रुपये दूँ। काम हो जाने पर तुम्हारी गुजर माफिक काफी रुपये दूँगा।" लकड़हारे ने मनमें सोचा—"यदि नहीं करूँगा तो यह दीवान है जबरन बेगार में करावेगा। बेहतर है, कि इसकी राजी करूँ तिसपर रुपये भी काफी देनेको कहता है। मनमें ऐसा ठहरा कर वह बीरबल से बोला—"मैं आपकी छोटीसे छोटी आज्ञाएँ पालन करने के लिये तत्पर हूँ, आपकी सभी आज्ञाएँ मुझे स्वी- कार होंगी।" बीरबल ने कहा—"अच्छा मैं तुम्हें कुछ कपड़े देता हूँ; इन्हें धारण कर हनुमान जी के मन्दिर के पिछवाड़े वाली कोठरी में जा बैठो, हाथ में माला लेकर बराबर जपते रहो। किसी की तरफ आँख उठाकर भी न देखना। तुमसे मिलने के लिये बहुत से अमीर उमराव आवेंगे। मुमकिन है स्वयं बादशाह भी आवें, परन्तु उनसे भी कदापि न बोलना। रुपयों के ढेर दें तब भी उधर नहीं देखना। देखो सावधान, मैं यहीं पर किसी जगह छिपकर तुम्हारी सारी बातें देखता रहूँगा, यदि मेरे कहने से जरा भी खिलाफ चलोगे तो तुम्हारी गरदन मार दी जावेगी।" बूढ़े लकड़हारे ने दृढ़ता पूर्वक उसकी आज्ञाओं का पालन करना स्वीकार किया।

तब बीरबल ने उसके सारे बदन में खाक मलकर कोपीन वस्त्र पहनाया और हाथ में एक रुद्राक्ष की माला देकर मस्तक पर कृत्रिम जटा बाँध दी। फिर उसे हनुमानजी के मन्दिर में एक मृगचर्म पर बैठाकर आप बादशाह के पास पहुँचा। बादशाह का दरबार उमरावों से ठसाठस भरा हुआ था। बीरबल ने हाथ जोड़कर कहा—"पृथ्वीनाथ ! मेरे गुरुजी आये हुये हैं, आपके विषय में बातें करने पर उन्होंने आपसे मिलना स्वीकार किय है। परन्तु मुझे साथ जाने की मुमानियत करते हैं। यदि इतने पर भी आपके साथ जाऊँगा तो वे मुझसे बहुत नाराज होंगे। मुमकिन है कि चिढ़कर मुझे शाप भी दे दें। बादशाह ने पूछा—"इस समय वे कहाँ ठहरे हुये हैं?" बीरबल ने उत्तर दिया—"हनुमानजी के मन्दिर के बाहर की कोठरी में।" बादशाह अपने दरबारियों को साथ लेकर बीरबल के गुरु से मिलने गये। वहाँ पहुँचकर बड़े अदब से प्रणाम कर बाकायदे उन के सामने बैठ गये और फिर पूछा—"भगवन् ! कृपाकर आप अपना नाम तथा ठिकाना इस दास से बतलावें, मैं इस कृपा के लिये आपका चिर कृतज्ञ बना रहूँगा।" स्वामी जी तो पक्के गुरु के चेले थे। उन्होंने उनकी बातों का कुछ भी उत्तर न देकर बराबर अपना माला घुमाते ही रहे। बादशाह फिर बोले-"स्वामी जी ! मैं समस्त भारतवर्ष का अधिपति हूँ मैं आपकी सारी इच्छाओं की पूर्ति कर सकता हूँ। यदि आपको किसी बात की चाहना हो तो मुझसे कहें। परन्तु स्वामी जी फिर भी कुछ न बोले बल्कि आँख उठाकर उनकी तरफ देखा भी नहीं। तब बादशाह ने एक लाख का तोड़ा उनके सामने

२५१ अकबर बीरबल विनोद

२५१ अकबर बीरबल विनोद रखवा दिया। उन्होंने सोचा कि शायद रुपयों के प्रलोभन में आकर स्वामीजी फेर में आ जावेंगे परन्तु वे न कुछ आशी- र्वाद दिये और न रुपयों की तरफ देखा ही। बादशाहको स्वामीजी की ऐसी निष्ठुरता सहन न हो सकी और वे झल्ला कर बोले—"अरे ऐसे अज्ञानियों से माथापच्ची करना मूर्खता है। यह तो कोई अज्ञानी है, जो मनुष्य होकर भी पशुवत व्योहार करता है।" बादशाह रुपयों की थैली उठवाकर बीरबलके घर भेजवा दिये। उनका कस्द था कि दिये दानको फिर वापस नहीं लेते थे। वे सबभाँतिसे हारकर अपने महल को चले गये। दर्बार उठने के पश्चात् फिर जब बादशाह और बीरबल का एकान्त में समागम हुआ तो बाद- शाह ने स्वामी के पास जाने से लेकर लौटने तक का सारा समाचार कह सुनाया। अन्त में बादशाह ने कहा- "अच्छा बीरबल ! यदि किसी को मूर्ख का सामना करना पड़े तो उस समय क्या करना चाहिये।" बीरबल ने तत्काल उत्तर दिया- "पृथिवी नाथ ! एकदम चुप रह जाना चाहिये।" बादशाह को उल्टी तोहमत लगी। पहले उनका विचार था- "इस प्रकार समझा कर बीरबल के गुरु का मूर्ख होना साबित करूँगा। लेकिन उनकी उस आशा पर एकदम पानी फिर गया। बीरबल ने उन्हें ही मूर्ख बना दिया। बादशाहने कहा- "सन्यासी को मैंने इतनी दौलत देकर बहुतेरा चाहा कि उससे कुछ वार्तालापकरूँ, परन्तु उसने धनका कुछ भी लालच नहीं किया बल्कि उल्टे मुझको ही मूर्ख बना चुप रह गया। आज से कस्द करता हूँ कि अब भविष्यमें जब कभी किसी महात्मा से मिलने

जाऊँगा तो उससे मुलायमियत का व्योहार करूँगा।” बाद- शाह को अपनी उच्छृंखलता पर बड़ा दुःख उत्पन्न हुआ और अपनी तरफ से बीरबलको उसके गुरुसे क्षमाप्रार्थी होनेके लिये भेजा। यह तो बीरबल की मनचाही बात थी। वह उसी क्षण हनुमान जी के मन्दिर में जा पहुँचा। सूर्यास्त का समय था और सब लोग वहाँ से चले गये थे। बीरबल लकड़हारे को अपने घर लिवा ले गया और उसकी बहुत प्रशंसा कर बोला-“सावधान ! यह बात कहीं प्रगट न करना, नहीं तो जान के लाले पड़ जायँगे। उसे एक सौ रुपये अपनी तरफ से और देकर बिदा किया। लकड़हारे ने इतना रुपया कभी नहीं देखा था। वह बीरबल के सामने उस बात को आजन्म गुप्त रखने की प्रतिज्ञा कर खुशी २ अपने घर चला गया। —❖— बादशाह का नाखून किसी देशके बादशाहका लड़ाईमें पैरका अँगूठा कट गया था। उस बादशाह के पास बहुतेरे हकीम इसी कामके लिये नियुक्त किये गये थे कि जब कोई लड़ाई में आहत होता तो हकीम लोग उसका इलाज किया करते थे। हकीमों ने बादशाह के अँगूठे पर फिर से मांस आ जाने का बहुतेरा प्रयास किया जिससे मांस तो बढ़ आया परन्तु नाखून नहीं उगा। इसलिये बादशाह हकीमों पर चिढ़कर उन्हें कैदकर लिया और विचारोंको जेलमें बन्द रहकर कैदकी यातना भुगतनी पड़ रही थी। बाद- शाह इतना करके भी सन्तुष्ट नहीं हुआ। उसने बहुतेरे हकीमों को

अकबर बीरबल विनोद

२५३ अकबर बीरबल विनोद


बारी २ से बुलवा कर अपने नाखून के जमने का इलाज पूछा परन्तु जब वे निरुत्तर रह जाते, तब उन्हें तुरत जेल का हवा खाने के लिये भेज देता।" बादशाह की इस निष्ठुरता का समाचार क्रमशः दूर दूर देशों में फैल गया। विचारे वैद्य हकीमों को बड़ी चिन्ता उत्पन्न हुई। कितनों ने तो इस पेशे को त्याग कर दूसरा पेशा अख्तियार कर लिया। बहुतेरों ने जंगल पहाड़ों में छिपकर अपनी आत्म रक्षा की। विचारे रोगी चिकित्सकों के अभाव में तड़प तड़पकर मरने लगे। यह घटना क्रमशः हिन्दुस्तान के वैद्यों ने भी सुनी। वे भी डरे और चाहते थे कि इस पेशे को त्यागकर आजीविका उपार्जन का कोई दूसरा मार्ग निकालें। इसी बीच यह बात फूटते २ अकबर बादशाह के कानों तक पहुँची। बादशाह को ऐसे अत्याचारों को सुनकर बड़ा कष्ट हुआ और वे अपनी सभा बुलवा कर लोगों से दीन प्रजाकी रक्षा का उपाय पूछे— बीरबल बोला-“पृथिवीनाथ ! यदि मैं किसी प्रकार बाद- शाह तक जापहुँचूँ तो कोई न कोई युक्ति लड़ाकर सब कैदियों को मुक्त करा दूँ।" बादशाह ने इस काम को करने के लिये बीरबल को एक मास की मुहलत दी। बीरबल वैद्य का सा रूप बनाकर उस शहर में जा पहुँचा और गरीबों की मुफ्त दवा करने लगा। धीरे २ वैद्यगी का सब सामान भी संग्रह कर लिया। इसकी दवा से बहुतेरे रोगी आरोग्य हो गये। जिस कारण इसका यश नगरमें बिजली की तरह फैलने लगा। शहर के कितने रईसों ने बीरबलको परोक्ष में समझाया-“इस नगर

अकबर बीरबल विनोद २५४

अकबर बीरबल विनोद २५४ को छोड़कर बाहर चले जावो, नहीं तो बादशाह आपको भी कैदकर मरवा डालेगा। बेगुनाह जान गँवाने से क्या लाभ।" परन्तु बीरबल ने उनकी बातों पर कान नहीं किया। वह बराबर अपना काम दत्तचित्त होकर करता ही रहा। क्रमशः यह बात धीरे २ बादशाह के कानों तक पहुँची। वह तो बराबर ऐसे हकीमों की फिराक में पड़ा ही रहता था। इसलिए दूसरे ही दिन अपन' सिपाही भेजकर बीरबलको अपनी सभा में बुलवा कर बोला-"हकीम जी ! मैंने आपका बड़ा नाम सुना है, यदि आप मेरा भी कुछ भला करें तो मैं आपका बड़ा उपकार मानूँगा। मेरे अँगूठे का नख लड़ाई में कट कर गिर गया है। मैंने उसको फिर से उगाने के लिये बहुतेरे हकीम और वैद्यों की दवाएँ की, पर कोई वैद्य अकृतकार्य नहीं हुए। यदि आपकी औषधि से लाभ होगा तो मैं सदैव आपका गुणगान करूँगा। बीरबल बोला-"बेशक मैं आपका इलाज करूँगा, मुझे इस रोग की दवा मालूम है। उसके लगाने से पाँच दिनों के अन्तर्गत आपके नख फिर से उग आयेंगे। मेरे गुरु का इस दवा पर बड़ा भरोसा है। उन्होंने मुझसे बतलाया था कि यह दवा कभी व्यर्थ नहीं जा सकती। आप मेहरबानी करके मेरे बतलाने के अनुसार दवाओं का संग्रह करा दीजिये। बाद- शाह प्रसन्न होकर बोला-"हकीमजी ! मुझे अब तक बहुतेरे हकीमों से पाला पड़ चुका है; परन्तु आपसा अपनी दवा में दृढ़ता रखने वाला एक भी न मिला।" बीरबल बोला-"यदि परमात्मा सहायक रहा तो मैं आपसे निश्चयपूर्वक कहता हूँ कि

२७५ अकबर बीरबल विनोद

२७५ अकबर बीरबल विनोद तीन दिन में फिर आपके नख पहले के समान उग आयेंगे। हाँ साथ ही इसके एक बात और है, मेरी दवा के नुसखे कुछ ऐसे आसान नहीं हैं, उनके एकत्रित करने में बड़ी कठिनता होगी । बादशाह बोला—“कोई कठिनता नहीं है; क्या मैं इतना बड़ा बादशाह होकर दवाओं को संग्रह न कर सकूँगा ?” वीर- बल ने कहा—“चाहे जो हो; संग्रह करना आपका काम है। मैं तो ऐसा कहता भी नहीं हूँ कि आप उसे संग्रह नहीं कर सकेंगे । परमात्मा की कृपा से सब कुछ हो सकता है। केवल आपको एक शर्त लिखनी पड़ेगी कि अगर एक मास के अन्तर्गत आप दवाओं का संग्रह न कर सकेंगे तो फिर आपका मुझपर कोई दावा नहीं रह जायगा और आपके यहाँ जितने हकीम और वैद्य कैदी हैं सबको छोड़ देना पड़ेगा। हाँ मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि जब कभी आप मेरी दवा मँगवा देंगे मैं बिला उज्र आपकी खिदमत में हाजिर होऊँगा ।” बादशाह ने अपने मन में अनुमान किया-“यह हकीम पहले पहल इस नगर में आया है इसलिये इसको मेरे खजाने का ज्ञान नहीं है। समझता है कि इतना द्रव्य बादशाह न खर्च कर सकेंगे कि जिससे दवा खरीदी जा सके। भला ऐसी वह कौनसी दवा होगी कि जिसे मैं न खरीद सकूँगा ?” वह अपने मन में खूब संकल्प विकल्प कर अपने को दृढ़ बना कर बीर- बल के कथनानुसार प्रतिज्ञा पत्र लिख दिया और फिर हकीम से दवा का नाम बतलाने की प्रेरणा की । बीरबल को भीतर २ बड़ी प्रसन्नता हुई । उसने जान लिया कि अब निरपराध हकीम और वैद्यों के मुक्त होने का समय नजदीक

अकबर बीरबल विनोद २५६

अकबर बीरबल विनोद २५६

आ गया है, हरि इच्छा। प्रगट में बादशाह को यह शेर पढ़कर सुनाया— “आना नहीं मुश्किल है कुछ नाखून का। फूल गर गूलर के हों वा रोम हो भल्लूक का ॥” उसके उपरोक्त शेर को सुनकर बादशाह अपने दीवान को दोनों वस्तुओं को यथाशीघ्र मँगवाने की आज्ञा दी। दीवान अपने निमक खाये भर परिश्रम करके थक गया; परन्तु उसे सफलता न मिली। उधर एक महीने की शर्त भी पूज गई। बादशाह को लाचार होकर सब कैदी वैद्य और हकीमों को जेल से मुक्त कर देना पड़ा। बादशाह ने कैद से छूटे हकीम वैद्यों को बुलवाकर उपरोक्त दवाका गुण पूछा- “बीरबल उन्हें पहलेही से सावधान कर चुका था इसलिये वैद्यों और हकीमों ने बीरबल की दवा की बड़ी तारीफ की। बादशाह को कहीं से बीरबल का छिद्रान्वेषण करने की जगह न मिली। अतएव वह उसे एक उत्तम कोटि का हकीम समझकर उस पर रुष्ट नहीं हुआ। बिचारे हकीम कैद से छूटकर उसे बहुत दुआ दिये और सभों ने आपस में सहयोग कर अपने प्राणरक्षक को एक अच्छी रकम भेट दीं। बीरबल वहाँ से चलकर कई दिनों के पश्चात दिल्ली पहुँचा और बादशाह के सामने वहाँ का आद्योपान्त समाचार कहकर सुनाया, बादशाह ने बीरबल के बुद्धिमानी की बड़ी प्रशंसा की ओर अन्य दरबारी भी सब तरफ से वाह वाह करने लगे।

२५७ अकबर बीरबल विनोद

२५७ अकबर बीरबल विनोद

योगी का भेष

एक दिन बीरबल के स्पष्ट भाषण से बादशाह बहुत क्रुद्ध हो गये जिसकारण बीरबल गुप्त रूप से परदेश चला गया । वहाँ जाकर उसने वहाँ के लोगों पर अपना ऐसा प्रभाव जमाया कि उस नगर के लोग उसके सेवक होगये। एक तरफ सबका प्रेम और दूसरी तरफ बादशाह की नाराजगी को देख- कर बीरबल वहीं वर्षों गुप्त वास करता रहा। इधर बादशाह की बीरबल के बिना दिनोंदिन बेचैनी बढ़ने लगी। वे बीरबल की तलाश में सब तरफ अपने दूतों को भेजे, परन्तु बीरबल का किसीसे सच्चा समाचार नहीं मिला। उधर जब बीरबल को बादशाह के बेचैनी का समाचार मिला तो वह बादशाह से मिलने के लिये बहुत उत्सुक हुआ और योगी का वेष धारण कर स्वयं दिल्ली पहुँचा। नगर से बाहर एक मंदिर में आसन मार कर भजन भाव करने लगा। यह हनुमानजी का प्रसिद्ध मंदिर था, वहाँ नित्य सैकड़ों दर्शनार्थी आया करते थे। उनकी दृष्टि बराबर बीरबल पर पड़ती, परन्तु बीरबल किसी से कुछ बोलता नहीं था। वह चुपचाप आसनमार ईश्वर का गुण गान करता रहा। उसकी ईश्वर में ऐसी निष्ठा देख सबका ध्यान उस योगी के तरफ आकृष्ट हो गया और वे आते जाते बीरबल को दण्ड प्रणाम करने लगे।

बीरबल तो नगर के बहुतेरे गण्यमानों के नाम से परिचित ही था इसलिये प्रसंग चलने पर बड़ी सरलता से उनका नाम ले लेकर सम्बोधन करता, इससे लोगों पर उसके सिद्धताई

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अकबर बीरबल विनोद २६०

अकबर बीरबल विनोद २६० था। दूसरे वे बीरबल के रहते हिन्दू धर्म के प्रतिकूल कोई काम भी नहीं कर सकते थे जिस कारण वे भीतर भीतर बीर- बल से बहुत द्वेष रखते थे। एक दिन मुसलमानों ने गुट बाँध- कर बादशाह का बीरबल से अविश्वास कराने का प्रण किया। वे झूठा झूठा फरेब रचकर दावा दायर करने लगे, परन्तु बीरबल अपने बुद्धि और विचार के बल से उनकी किल्ली लगने नहीं देता था। ऐसा सोच समझकर न्याय करता कि मुसलमान लोग दाँतों तले अँगुली दाबकर रह जाते। बाद- शाह को मुसलमानों की ऐसी अनीति बहुत खलती थी, परन्तु फिर भी उनको छेड़ता नहीं था। एक दिन उसके मन में यह बात आई कि इन सब फसादों का एकमात्र कारण बीरबल का हिन्दू होना ही है, यदि वह किसी प्रकार समझा बुझाकर मुसलमान बना लिया जावे तो फिर उससे मुसल- मानों की बगावत मिट जावे। ऐसा निश्चय कर बादशाह ने बीरबल को मुसलमान बनाने की एक सरल युक्ति ढूँढ़ निकाली। वह जब महल में भोजन करने जाता तो बीरबल को भी भोजन करने के लिये आग्रह कर्ता, परन्तु बीरबल कोई न कोई युक्ति लड़ाकर उसे टाल देता था। इस प्रकार बादशाह को आग्रह करते और बीरबल को टालते कई महीने व्यतीत हो गये। न बीरबल उनके साथ भोजन करने जाता और न बादशाह की मंशा वर आती। एक दिन बीरबल अपने कामों में दत्तचित्त होकर लगा हुआ था इसी बीच बादशाह ने कहा- "बीरबल कल दोपहर में यहीं भोजन करना।" बीरबल ने सपर बिना विचार किये ही कामों की विशेषता के कारण

२६१ अकबर बीरबल विनोद

२६१ अकबर बीरबल विनोद हामी भर ली। वह उत्तर देने में चूक गया। बीरबल में इस बात की बड़ी विशेषता थी कि वह भरसक अपनी बातों को निभाने की कोशिश करता था। इस बात को बादशाह भी भलीभाँति जानते थे। "बीरबल ने मेरा निमन्त्रण स्वीकार कर लिया।" इस बात को सोचकर बादशाह को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे अपने बड़े २ मुसलमान दरबारियों को इसकी बधाई भेज दी। वे मुसलमान दरबारी भी ऐसा कह २ कर फूले नहीं समाते थे कि कल बीरबल मुसलमानी मजहब स्वीकार करेगा। इससे बढ़कर उन मुसलमान दरबारियों को और कौनसी शुभ सूचना हो सकती थी। दो घण्टे की कड़ी परिश्रम के पश्चात् बीरबल अपने कामों से अवकाश पाकर वही लेट गया। उसी समय उसके साथ का एक हिन्दू कर्मचारी बोला-“दीवान जी! आज आपने बिना विचार किये ही बादशाह के सामने ऐसी कठिन प्रतिज्ञा कैसे कर ली।" अब बीरबल का होश ठिकाने आया, उसके आँखों के सामने अन्धेरा छा गया। मन ही मन विचार करने लगा-“तो क्या कल मुझे मुसलमान बनना पड़ेगा? क्या मेरी इतनी दिनोंकी सब कीर्तियोंके विलीन होनेका समय आ गया? मैं अपने जात बिरादरी के लोगों की गालियाँ और तानाजनी को कैसे सहन कर सकूँगा। बादशाह के साथ भोजन कर लेने के पश्चात् हिन्दू जनता को फिर मैं अपना कौनसा मुँह दिखलाऊँगा।" ऐसी ही ऐसी अनेकों कल्पनाएँ एक साथ ही उत्पन्न होकर बीरबल को हतबुद्धि बना दीं और उसका दिमाग ऐसा व्यथित हो गया कि फिर काम

अकबर बीरबल विनोद २६२

अकबर बीरबल विनोद २६२ करने का उसे साहस न हुआ । घर पहुँच कर भी उसका मन 'चल ही रहा । इस चिन्ता के गहरे आघात से उसे शामको क्षुधा भी न लगी और न रात्रि में खूँखार निद्रा ही आई । एकदम अचेतन अवस्था में ही तमाम रात व्यतीत हो गई। मारे लज्जा के अपने घर वालों से भी कुछ कहते नहीं बना । दूसरे दिन सबेरा होते ही बादशाह बीरबल के जेवनार की तय्यारी कराने लगे । भिन्न २ प्रकार के जेवनार तय्यार कराये गये । इस खुशहाली में नगर के बहुतेरे अमीर उमराव मुसलमान आमंत्रित किये गये । जब जेवनार का समय हो गया और अन्य मेजमान लोग एकत्रित हुए तो बादशाह ने अपने एक कर्मचारी द्वारा बीरबल को बुलवा भेजा । खाद्य पदार्थ भलीभाँति सजाकर सोने और चाँदी के बासनों में परसे गये और सब अमीर उमराव यथास्थान बैठ गये । उधर जब बादशाह का दूत बीरबल के पास पहुँचा तो उसका मुख मलीन हो गया। वह अपने दरबारी कपड़े पहन कर उस दूतके साथ हो लिया। रास्ते में वह बराबर अगल बगल के मार्ग की भूमि का संशोधन करता हुआ चलता था। दैवात् उसके मन में एक युक्ति अचानक समा गई। वह एक सुनार को सूअर की कूँची से आभूषणों को साफ करते हुए देखा। वह तुरत सुनार के पास जा पहुँचा और आग्रह करके उससे सूअर के बाल की कूँची मँगनी माँग ली । महल में पहुँच कर बीरबल ने देखा कि सब लोग यथास्थान बैठकर केवल उसकी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं। बादशाह बड़े प्रसन्न दिखलाई पड़ते थे । आज उन्होंने

२६३ \hfill अकबर बीरबल विनोद

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बीरबल का और दिनों से अधिक सत्कार किया। बड़े २ अमीर मुसलमानों ने भी उठ २ कर बीरबल का स्वागत किया। मारे खुशी के बादशाह ने बीरबल को अपनी बगल में बैठने का प्रबंध किया। जब यह सब हो चुका तो बीरबल विनम्रता पूर्वक बोला-“पृथिवीनाथ ! मैं तो भोजन करने आया ही हूँ; परन्तु आपसे थोड़ी आग्रह है। यदि मुझे अपने साम्प्रदायिक नियम के अनुसार भोजन करने को अनुमति दी जावे तो अति उत्तम हो।” बादशाह ने कहा-“अच्छी बात है, तुम अपने सम्प्रदाय के नियमानुसार ही भोजन करो।” बीरबल बोला-“तो इन सब थालियों पर थोड़ा २ पानी छिड़कना पड़ेगा। यदि मैं ऐसा करूँ और कोई नाराज हो तब क्या करना होगा। आप पहले ही से इसपर विचार कर लीजिये। बादशाह बोले-“तुम अपने सम्प्रदाय की रस्म पूरी करके भोजन करो। इसमें हम सबों को कोई आपत्ति न होगी।” फिर बादशाह ने अपने अन्य मुसलमान मेजमानों की तरफ दृष्टि फेर कर देखा, सबों ने अपनी गर्दन हिलाकर बादशाह का फर्मान स्वीकार किया। तब बीरबल सबको वाक्यबद्ध करके मस्त हो गया और उसकी साम्प्रदायिक प्रथा शुरू हुई। एक कटोरोमें पानी भरकर उसी सूअर के बाल की कूँची को उसमें डुबा २ कर खाद्य पदार्थ से सुसज्जित थालियों पर छिड़कने लगा। सब थालियों पर छींटे डाल चुकने के पश्चात् बीरबल ने बादशाह की थालीपर भी थोड़ा सा पानी छिड़क दिया। एक अमीर जो बाद- शाहके पास बैठा हुआ बीरबलका सारा चरित्र देख रहा था बोला “ओफ ! यह, तो बड़ा कठिन हुआ, यह कूची तो बाल की है।”