अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
सूक्त-४ देवता—जल
यथेषुका परापतदवसृष्टाधि धन्वन्:. एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्बालिति सर्वकम्.. (९) जैसे खिंची हुई डोरी वाले धनुष से छोड़ा हुआ बाण तेजी से लक्ष्य की ओर जाता है, वैसे तेरा रुका हुआ सारा मूत्र शब्द करता हुआ बाहर निकले. (९) सूक्त-४ देवता—जल अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम्. पृंचतीर्मधुना पय:.. (१) यज्ञ करने के इच्छुक जन अपनी माताओं और बहनों के समान जल, सोमरस, दूध एवं घृत आदि यज्ञ सामग्री ले कर आते हैं. (१) अमूर्या उप सूर्ये याभिर्वा सूर्य: सह. ता नो हिन्वन्त्वध्वरम्.. (२) जो जल सूर्य मंडल में स्थित है अथवा सूर्य जिस जल के साथ स्थित है, वह जल हमारे यज्ञ को फल देने में समर्थ बनाए. (२) अपो देवीरुप ह्वये यत्र गाव: पिबन्ति न:. सिन्धुभ्य: कृत्वं हवि:.. (३) मैं स्वच्छ एवं देवता रूप जलों का आह्वान करता हूं. जल से पूर्ण जलाशयों अर्थात् नदियों और तालाबों में हमारी गाएं जल पीती हैं. (३) अप्स्व १ न्तरमृतमप्सु भेषजम्. अपामुत प्रशस्तिभिरश्वा भवथ वाजिनो गावो भवथ वाजिनी:.. (४) जलों में अमृत है. जलों में ओषधियां निवास करती हैं. इन जलों के प्रभाव से हमारे घोड़े बलवान बनें, हमारी गाएं शक्ति संपन्न बनें. (४) सूक्त-५ देवता—जल आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन. महे रणाय चक्षसे.. (१) हे जल! आप सभी प्रकार का सुख देने वाले हैं. अन्न आदि सुखों का उपभोग करने के इच्छुक हम सब को आप उन के उपभोग की शक्ति प्रदान करें. आप हमें महान एवं रमणीय आनंद स्वरूप ब्रह्म के साक्षात्कार का सामर्थ्य दें. (१) यो व: शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह न:. उशतीरिव मातर:.. (२) जिस प्रकार माताएं अपनी इच्छा से दूध पिला कर बालकों को पुष्ट करती हैं, उसी ebook converter DEMO Watermarks*
प्रकार हे जल! आप अपने अत्यधिक कल्याणकारी रस का हमें अधिकारी बनाएं. (२) तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ. आपो जनयथा च न:.. (३) हे जल! हम जिस अन्न आदि को पा कर तृप्त होते हैं, उसे प्राप्त करने के लिए हम आप को पर्याप्त रूप में पाएं. हे जल! आप पर्याप्त रूप में आ कर हमें तृप्त करें. (३) ईशाना वार्याणां क्षयन्तीश्चर्षणीनाम्. अपो याचामि भेषजम्.. (४) मैं धनों के स्वामी एवं सुख साधन प्रदान कर के गतिशील मनुष्यों को एक स्थान पर बसाने वाले जल की ओषधि के रूप में याचना करता हूं. (४) सूक्त-६ देवता—जल शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये. शं योरभि स्रवन्तु न:.. (१) दिव्यगुणों वाला जल सभी ओर से हमारा कल्याण करने वाला हो. जल हमारे चारों ओर कल्याण की वर्षा करे एवं पीने के लिए उपलब्ध हो. (१) अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा. अग्निं च विश्वशम्भुवम्.. (२) मुझे सोम ने बताया है कि सारी ओषधियां एवं अग्नि जल में निवास करती हैं. अग्नि सारे संसार का कल्याण करने वाली है. (२) आप: पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे ३ मम. ज्योक् च सूर्यं दृशे.. (३) हे जल! तुम मेरे रोगों का निवारण करने के लिए ओषधियां प्रदान करो. अधिक समय तक सूर्य के दर्शन करने के लिए तुम मेरे शरीर को पुष्ट करो. (३) शं न आपो धन्वन्या ३: शमु सन्त्वनूप्या:. शं न: खनित्रिमा आप: शमु या: कुम्भ आभृता: शिवा न: सन्तु वार्षिकी:.. (४) जल हमें मरु भूमि में सुखकारी हों. जिन स्थानों में जल की प्राप्ति सुलभ है, वहां के जल हमारा कल्याण करें. कुआं, बावड़ी आदि खोद कर प्राप्त किए गए जल हमारे लिए कल्याणकारी हों. घड़े में भर कर लाया गया जल हमें सुख दे. वर्षा से प्राप्त होने वाला जल हमारे लिए सुखकारी हो. (४) सूक्त-७ देवता—अग्नि और इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*
स्तुवानमग्न आ वह यातुधानं किमीदिनम्. त्वं हि देव वन्दितो हन्ता दस्योर्बभूविथ.. (१) हे अग्नि! हम जिन देवों की स्तुति करते हैं, उन्हें तुम हमारे समीप लाओ एवं हमें मारने की इच्छा से घूमने वाले राक्षसों को हम से दूर भगाओ. हे दिव्य गुणों वाले अग्नि! हमारे नमस्कार आदि से प्रसन्न तुम दस्युजनों की हत्या कर देते हो. (१) आज्यस्य परमेष्ठिन् जातवेदस्तनूवशिन्. अग्ने तौलस्य प्राशान यातुधानान् वि लापय.. (२) हे स्वर्ग आदि उत्तम स्थानों में निवास करने वाले, हे जातवेद एवं हे जलशक्ति रूप में सब के शरीरों में स्थित अग्नि! हमारे द्वारा सुवा आदि से नाप कर दिए गए घृत का भोजन कीजिए एवं राक्षसों का विनाश भी कीजिए. (२) वि लपन्तु यातुधाना अत्रिणो ये किमीदिनः. अथेदमग्ने नो हविरिन्द्रश्च प्रति हर्यतम्.. (३) हे अग्नि! आप और परम ऐश्वर्य वाले इंद्र, हमारे दिए गए हवि को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करें. राक्षस, सब का भक्षण करने वाले दस्यु एवं इधरउधर घूमने वाले दुष्ट जन नष्ट हो जाएं. (३) अग्निः पूर्व आ रभतां प्रेन्द्रो नुदतु बाहुमान्. ब्रवीतु सर्वो यातुमान् अयमस्मीत्येत्य.. (४) सब से पहले अग्नि देव राक्षसों को दंड देना आरंभ करें. इस के पश्चात शक्तिशाली भुजाओं वाले इंद्र राक्षसों को दूर भगाएं. अग्नि और इंद्र से पीड़ित सभी राक्षस आ कर आत्मसमर्पण करें और अपना परिचय दें कि मैं अमुक हूं. (४) पश्याम् ते वीर्यं जातवेदः प्र णो ब्रूहि यातुधानान् नृचक्षः. त्वया सर्वे परितप्ताः पुरस्तात् त आ यन्तु प्रब्रुवाणा उपेदम्.. (५) हे सब को जानने वाले अग्नि! हम आप का पराक्रम देखें. हे उपासना के योग्य अग्नि! हमारी इच्छानुसार राक्षसों से कहिए कि वे हमें दुःख न दें. आप के द्वारा सताए हुए राक्षस अपना परिचय देते हुए हमारी शरण में आएं. (५) आ रभस्व जातवेदो ऽ स्माकार्थाय जज्ञिषे. दूतो नो अग्ने भूत्वा यातुधानान् वि लापय.. (६) हे सब को जानने वाले अग्नि! तुम राक्षसों के विनाश का कार्य आरंभ करो, क्योंकि तुम हमारे प्रयोजन पूर्ण करने के लिए उत्पन्न हुए हो. हे अग्नि! तुम हमारे दूत बन कर राक्षसों को ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-८ देवता—बृहस्पति
दूर भगाओ. (६) त्वमग्ने यातुधानानुपबद्धाँ इहा वह. अथैषामिन्द्रो वज्रेणापि शीर्षाणि वृश्चतु.. (७) हे अग्नि! तुम रस्सी आदि से राक्षसों के हाथपैर बांध कर उन्हें यहां ले आओ. इस के पश्चात इंद्र अपने वज्र से उन के सिर काट दें. (७) सूक्त-८ देवता—बृहस्पति इदं हविर्यातुधानान् नदी फेनमिव वहत्. यं इदं स्त्री पुमानकरिह स स्तुवतां जनः.. (१) मेरे द्वारा अग्नि आदि देवों को दिया हुआ घृत आदि हवि दुष्ट राक्षसों को यहां से उसी प्रकार दूर हटा दे, जिस प्रकार नदी की धारा फेन को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है. मेरे प्रति अभिचार, जादू, टोना, टोटका करने वाले स्त्रीपुरुष अपने मनोरथ में असफल हो कर यहां मेरी शरण में आएं और मेरी स्तुति करें. (१) अयं स्तुवान आगमदिमं स्म प्रति हर्यत. बृहस्पते वशे लब्ध्वाग्नीषोमा वि विध्यतम्.. (२) हे बृहस्पति आदि देवो! आप की स्तुति करता हुआ जो यह मनुष्य आप की शरण में आया है, यह हमारा विरोधी शत्रु है. हे बृहस्पति, अग्नि एवं सोम! इन उपद्रवकारियों को वश में कर के अनेक प्रकार से दंडित करो. (२) यातुधानस्य सोमप जहि प्रजां नयस्व च. नि स्तुवानस्य पातय परमक्ष्युतावरम्.. (३) हे सोमरस पीने वाले अग्नि देव! तुम राक्षसों की संतानों के समीप पहुंच कर उन्हें समाप्त कर दो और हमारी संतान की रक्षा करो. हमारे जो शत्रु तुम से भयभीत हो कर तुम्हारी प्रार्थना करते हैं, तुम उन की दाईं और बाईं दोनों आंखें बाहर निकाल लो. (३) यत्रैषामग्ने जनिमानि वेत्थ गुहा सतामत्रिणां जातवेदः. तांस्त्वं ब्रह्मणा वावृधानो जह्येषां शततर्हमग्ने.. (४) हे सब के विषय में जानने वाले अग्नि! तुम गुहा में निवास करने वाले राक्षसों को जानते हो. हे मंत्र द्वारा वृद्धि पाते हुए अग्नि! इन राक्षसों द्वारा सैकड़ों प्रकार की हिंसा को रोको एवं संतान सहित इन का विनाश करो. (४) सूक्त-९ देवता—वसु ebook converter DEMO Watermarks*
अस्मिन् वसु वसवो धारयन्त्विन्द्रः पूषा वरुणो मित्रो अग्निः. इममादित्या उत विश्वे च देवा उत्तरस्मिन् यन्ज्योतिषि धारयन्तु.. (१) भांतिभांति की धन संपत्ति की कामना करने वाले इस पुरुष को वसु, इंद्र, पूषा, वरुण, मित्र, अग्नि एवं विश्वे देव धन प्रदान करें तथा ये देव इसे उत्तम ज्योति संपन्न बनाएं. (१) अस्य देवाः प्रदिशि ज्योतिरस्तु सूर्यो अग्निरुत वा हिरण्यम्. सपत्ना अस्मदधरे भवन्तूत्तमं नाकमधि रोहयेमम्.. (२) हे इंद्रादि देवो! ग्रामादि सुखों के इच्छुक इस पुरुष के अधिकार में सूर्य, अग्नि, चंद्र, स्वर्ग आदि की ज्योति पूर्ण रूप से रहे. इस के कारण शत्रु हमारे अधिकार में रहें. तुम हमें सभी प्रकार के दुःखों से हीन स्वर्ग में पहुंचाओ. (२) येनेन्द्राय समभरः पयांस्युत्तमेन ब्रह्मणा जातवेदः. तेन त्वमग्न इह वर्धयेमं सजातानां श्रैष्ठ्य आ धेह्येनम्.. (३) हे सब कुछ जानने वाले अग्नि! आप ने जिन उत्तम मंत्रों द्वारा इंद्र के लिए दुग्ध, घृत आदि रस हवि के रूप में प्राप्त कराए, हे अग्नि! उन्हीं मंत्रों के द्वारा इस पुरुष की वृद्धि करो एवं इसे अपनी जाति वालों में श्रेष्ठ बनाओ. (३) एषां यज्ञमुत वर्चो ददे ऽ हं रायस्पोषमुत चित्तान्यग्ने. सपत्ना अस्मदधरे भवन्तूत्तमं नाकमधि रोहयेमम्.. (४) हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से मैं इन शत्रुओं के स्वर्ग आदि लोकों के साधक यज्ञ, कर्म, तेज, धन एवं चित्त का हरण करता हूं. मेरे शत्रु मुझ से निम्न स्थिति में रहें. आप मुझ यजमान को सभी दुःखों से रहित एवं उत्तम स्वर्ग में पहुंचा दो. (४) सूक्त-१० देवता—वरुण अयं देवानामसुरो वि राजति वशा हि सत्या वरुणस्य राज्ञः. ततस्परि ब्रह्मणा शाशदान उग्रस्य मन्योरुदिमं नयामि.. (१) इंद्रादि देवों में वरुण पापियों को दंड देने वाले हैं. इस प्रकार के यह वरुण सब से उत्कृष्ट हैं. सभी पदार्थ तेजस्वी वरुण देव के वश में हैं. इसलिए मैं वरुण की स्तुति संबंधी मंत्रों से शक्ति प्राप्त कर के वरुण देव के प्रचंड कोप के कारण उत्पन्न जलोदर रोग वाले इस पुरुष को रोगमुक्त करता हूं. (१) नमस्ते राजन् वरुणास्तु मन्यवे विश्वं ह्युग्र निचिकेषि दृग्धम्. सहस्रमन्यान् प्र सुवामि साकं शतं जीवाति शरदस्तव्तायम्.. (२)
हे तेजस्वी वरुण! तुम्हारे क्रोध के लिए नमस्कार है. तुम सभी प्राणियों द्वारा किए गए अपराधों को जानते हो. मैं हजारों अपराधी पुरुषों को तुम्हारी सेवा में भेज रहा हूं. ये मनुष्य आप के प्रति निष्ठा वाले बन कर सौ वर्ष तक जीवित रहें. (२) यदुवक्थानृतं जिह्वया वृजिनं बहु. राज्ञस्तवा सत्यधर्मणो मुञ्चामि वरुणादहम्.. (३) हे जलोदर रोग से ग्रसित पुरुष! अपनी जिह्वा से तूने पाप का साधन असत्य भाषण अधिक किया है. मैं सत्य धर्म वाले एवं तेजस्वी वरुण के कोप से तेरी रक्षा करता हूं. (३) मुञ्चामि त्वा वैश्वानरादर्णवान् महतस्परि. सजातानुग्रहा वद ब्रह्म चाप चिकीहि न:.. (४) हे पुरुष! मैं तुझे जठराग्नि को मंद करने वाले महान जलोदर रोग से छुड़ाता हूं. हे परम शक्तिशाली वरुण! आप अपने सहचरों, भटों अर्थात् अपने सेवकों से कहिए कि वे बारबार आ कर इस मनुष्य को पीड़ा न दें. आप हमारे द्वारा दिए गए हवि रूप अन्न और स्तुति से प्रसन्न हो कर हमारे भय का विनाश कीजिए. (४) सूक्त-११ देवता—पूषा आदि वषट् ते पूषन्नस्मिन्त्सूतावर्यमा होता कृणोतु वेधा:. सिस्रतां नार्यृतप्रजाता वि पर्वाणि जिहतां सूतवा उ.. (१) हे पूषा देव! सुख उत्पन्न करने वाले इस यज्ञ कर्म में प्राणि समूह के प्रेरक देव अर्यमा होता बन कर आप को हवि प्रदान करें. संपूर्ण जगत् के निर्माता वेधा देव आप को वषट्कार के द्वारा हवि प्रदान करें. आप की कृपा से यह गर्भिणी नारी प्रसव संबंधी कष्ट से छुटकारा पा कर जीवित संतान को जन्म दे. सुखपूर्वक प्रसव के लिए इस के संधि बंध शिथिल हो जाएं. (१) चतस्रो दिवः प्रदिशश्चतस्रो भूम्या उत. देवा गर्भं समैरयन् तं व्यूर्णुवन्तु सूतवे.. (२) द्युलोक से संबंधित प्राची आदि चार दिशाओं एवं भूलोक की आग्नेयी आदि चार दिशाओं ने एवं इन दिशाओं के अधिष्ठाता इंद्र आदि देवों ने पहले गर्भ को पूर्ण किया था. वे सभी देव इस समय गर्भ को गर्भाशय से बाहर निकालें एवं जरायु के आच्छादन से मुक्त करें. (२) सूषा व्यूर्णोतु वि योनिं हापयामसि. श्रथया सूषणे त्वमव त्वं बिष्कले सृज.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
प्रसव की देवता पूषा गर्भ को जरायु के बंधन से अलग करें. हम भी सुखपूर्वक प्रसव के लिए योनि मार्ग को खोल रहे हैं. तुम भी सुखपूर्वक प्रसव के लिए योनि मार्ग को शिथिल करो. हे सूतिमारुत देव! आप भी गर्भ का मुख नीचे को कर के उसे बाहर निकलने हेतु प्रेरित करो. (३) नेव मांसे न पीवसि नेव मज्जस्वाहतम्. अवैतु पृश्नि शेवलं शुने जरायुक्त्तवे ऽ व जरायु पद्यताम्.. (४) हे प्रसव करने वाली नाड़ी! तू इस उदरगत जरायु से पुष्ट नहीं होगी, क्योंकि इस का संबंध मांस, मज्जा आदि से नहीं है. इसलिए उजले रंग की यह जरायु दोनों के ऊपर तैरने वाली काई के समान नीचे गिर जाए. इसे कुत्ते के खाने के लिए नीचे गिर जाने दें. (४) वि ते भिनद्मि मेहनं वि योनिं वि गवीनिके. वि मातरं च पुत्रं च वि कुमारं जरायुणाव जरायु पद्यताम्.. (५) हे गर्भिणी! मैं गर्भस्थ बालक को बाहर निकालने के लिए मूत्रमार्ग को फैलाता हूं तथा योनि के आसपास की नाड़ियों को भी फैलाता हूं. क्योंकि ये प्रसव में बाधा डालती हैं. मैं माता और पुत्र को अलगअलग करता हूं. इस के बाद मैं पुत्र को जरायु से अलग करता हूं. जरायु गर्भाशय से नीचे गिर जाए. (५) यथा वातो यथा मनो यथा पतन्ति पक्षिण:. एवा त्वं दशमास्य साकं जरायुणा पताव जरायु पद्यताम्.. (६) हे दशमास गर्भस्थ शिशु! जिस प्रकार वायु, मन एवं आकाश में उड़ने वाले पक्षी आकाश में बिना रोकटोक के विचरण करते हैं, उसी प्रकार तू जरायु के साथ गर्भ से बाहर आ. जरायु गर्भाशय से नीचे गिरे. (६) सूक्त-१२ देवता—यक्ष्मानाशन जरायुज: प्रथम उस्रिया वृषा वाताभ्रजा स्तनयन्नेति वृष्ट्या. स नो मृडाति तन्व ऋजुगो रुजन् य एकमोजस्त्रेधा विचक्रमे.. (१) नक्षत्रों को पराजित कर के प्रकट होने वाले, संसार में सब से प्रथम उत्पन्न एवं वायु के समान शीघ्रगामी सूर्य बादलों को गर्जन करने के लिए प्रेरित करते हुए वर्षा के साथ आते हैं. वे सूर्य त्रिदोष से उत्पन्न रोग आदि का विनाश करते हुए हमारी रक्षा करें. सीधे चलने वाले जो सूर्य एक हो कर भी अपने तेज को तीन प्रकार से प्रकाशित करते हैं, वे हमें सुख प्रदान करें. (१) अङ्गेअङ्गे शोचिषा शिश्रियाणं नमस्यन्तस्त्वा हविषा विधेम. eBook converter DEMO Watermarks*
अङ्कान्त्समङ्कान् हविषा विधेम यो अग्रभीत् पर्वास्या ग्रभीता.. (२) हे प्राणियों के प्रत्येक अंग में अपनी दीप्ति से वर्तमान सूर्य! हम तुम्हें नमस्कार करते हुए चरु आदि से तुम्हारी उपासना करते हैं. हम तुम्हारे अनुचर एवं परिवार रूप देवों की भी हवि से सेवा करते हैं. जिस ज्वर आदि रोग ने इस पुरुष के शरीर के अवयवों को जकड़ रखा है, हम उस की निवृत्ति के लिए हवि द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं. (२) मुञ्च शीर्षक्त्या उत कास एनं परुष्परूराविवेशा यो अस्य. यो अभ्रजा वातजा यश्च शुष्मो वनस्पतीन्त्सचतां पर्वतांश्च.. (३) हे सूर्य! इस पुरुष को सिर के रोग से छुटकारा दिलाओ. जो खांसी का रोग इस के जोड़जोड़ में प्रवेश कर गया है, उस से भी इसे मुक्त कराओ. वर्षा एवं जल से उत्पन्न जो पित्त के विकार से जनित आदि रोग हैं, उन से इस पुरुष को मुक्त कराइए. ये रोग इस पुरुष को छोड़ कर वनस्पति और पर्वतों में चले जाएं. (३) शं मे परस्मै गात्राय शमस्त्ववराय मे. शं मे चतुर्भ्यो अङ्गेभ्यः शमस्तु तन्वे ३ मम.. (४) मेरे शरीर के अवयव सिर का रोग शांति के रूप में कल्याणकारी हो. मेरे चरण आदि निम्न अंगों को सुख मिले. मेरे दोनों हाथों और दोनों चरणों को सुख प्राप्त हो. मेरे शरीर के मध्य भाग को नीरोगता प्राप्त हो. (४) सूक्त-१३ देवता—विद्युत् नमस्ते अस्तु विद्युते नमस्ते स्तनयित्नवे. नमस्ते अस्त्वश्मने येना दूडाशे अस्यसि.. (१) हे पर्जन्य! विद्युत को मेरा नमस्कार हो. गर्जन करते हुए वज्र को मेरा नमस्कार हो. आप आततायियों को दूर फेंक देते हैं. (१) नमस्ते प्रवतो नपाद् यतस्तपः समूहसि. मृडया नस्तनूभ्यो मयस्तोकेभ्यस्कृधि.. (२) हे पर्जन्य! आप सत्पुरुषों की रक्षा करते हैं. आप को नमस्कार है. आप जल को भीतर धारण किए रहते हैं और समय से पहले नीचे नहीं गिरने देते हैं. आप पाप विनाशक तप को एकत्र करते हैं एवं पापियों पर अपना वज्र फेंकते हैं. आप हमारे शरीर को सुख दें और हमारे पुत्र, पौत्र आदि का कल्याण करें. (२) प्रवतो नपान्नम एवास्तु तुभ्यं नमस्ते हेतये तपुषे च कृण्मः. विद्म ते धाम परमं गुहा यत् समुद्रे अन्तर्निहितासि नाभिः.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
हे ऊंचाई से नीचे की ओर गिरने वाले पर्जन्य! तुम्हारे लिए नमस्कार है. तुम्हारे संतापकारी आयुध वज्र को नमस्कार है. हम आप के गुफा के समान अगम्य एवं उत्तम निवास स्थान को जानते हैं. जिस प्रकार शरीर में नाभि मध्यस्थ है, उसी प्रकार तुम अंतरिक्ष के केंद्र सागर में स्थित हो. (३) यां त्वा देवा असृजन्त विश्व इषुं कृण्वाना असनाय धृष्णुम्. सा नो मृड विदथे गृणाना तस्यै ते नमो अस्तु देवि.. (४) हे अग्नि! सभी देवों के अप्रिय पुरुषों पर गिराने के लिए एवं शत्रुओं पर बाण के रूप में फेंकने के लिए तुम्हारी रचना की गई है. यज्ञ में तुम्हारी स्तुति भी की जाती है. तुम हमारी रक्षा करो. हे आकाश में चमकती हुई अग्नि! तुम्हारे लिए नमस्कार हो. (४) सूक्त-१४ देवता—यम भगमस्या वर्च आदिष्यधि वृक्षादिव स्रजम्. महाबुध्न इव पर्वतो ज्योक् पितृष्वास्ताम्.. (१) मनुष्य जिस प्रकार वृक्ष से माला बनाने हेतु फूल तोड़ता है, उसी प्रकार मैं इस स्त्री के भाग्य और तेज को स्वीकार करता हूं. धरती में भीतर तक धंसा हुआ पर्वत जिस प्रकार स्थिर रहता है, उसी प्रकार यह बुरे भाग्य वाली स्त्री चिरकाल तक पिता के घर रहे अर्थात् यह कभी पति का मुख न देखे. (१) एषा ते राजन् कन्या वधूर्नि धूयतां यम. सा मातुर्बध्यतां गृहे ऽ थो भ्रातुरथो पितुः.. (२) हे सुशोभित सोम! यह कन्या आप की पत्नी है, क्योंकि इस ने पहले आप को स्वीकार किया है, इसलिए यह पतिगृह से निकाल दी जानी चाहिए. यह कन्या चिरकाल तक अपने पिता एवं भाई के घर पड़ी रहे. (२) एषा ते कुलपा राजन् तामु ते परि दद्मसि. ज्योक् पितृष्वासाता आ शीर्षः शमोप्यात्.. (३) हे सुशोभित सोम! यह स्त्री पतिव्रता होने के कारण आप के कुल का पालन करने वाली है, इसलिए हम इसे रक्षा के लिए आप को देते हैं. यह तब तक अपने पिता के घर पर रहे. यह धरती पर सिर गिरने तक अर्थात् मरण पर्यंत अपने पिता के घर रहे. (३) असितस्य ते ब्रह्मणा कश्यपस्य गयस्य च. अन्तःकोशमिव जामयो ऽ पि नह्यामि ते भगम्.. (४) हे स्त्री! मैं तेरे भाग्य को असित, ब्रह्मा, कश्यप एवं गय ऋषियों के मंत्रों से इस प्रकार ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-१५ देवता—सिंधु आदि
सुरक्षित करता हूं, जिस प्रकार स्त्रियां घरों में अपना धन, वस्त्र आदि छिपा कर रखती हैं. (४) सूक्त-१५ देवता—सिंधु आदि सं सं स्रवन्तु सिन्धवः सं वाताः सं पतत्रिणः. इमं यज्ञं प्रदिवो मे जुषन्तां संस्राव्येण हविषा जुहोमि.. (१) नदियां हमारे अनुकूल बहें, पवन हमारे अनुकूल चले एवं पक्षी हमारी इच्छा के अनुसार (गति करें). पुरातन देव मेरे इस यज्ञ को स्वीकार करें, क्योंकि मैं घी, दूध आदि का संग्रह कर के यह यज्ञ कर रहा हूं. (१) इहैव हवमा यात म इह संस्रावणा उतेमं वर्धयता गिरः. इहैतु सर्वो यः पशुरस्मिन् तिष्ठतु या रयिः.. (२) हे देवो! आप सब को त्याग कर मेरे इस यज्ञ में पधारें. इस में आज्य आदि का होम है. हे स्तुतियों द्वारा बढ़ाए जाते हुए देवो! आप इस यजमान की वृद्धि करें. हे देवो! हमारी स्तुतियों को सुन कर प्रसन्न हुए आप की कृपा से हमारे घर में गाय, अश्व आदि पशु एवं अन्य संपत्ति निवास करे. (२) ये नदीनां संस्रवन्त्युत्सासः सदमक्षिताः. तेभिर्मे सर्वैः संस्रावैर्धनं सं स्रावयामसि.. (३) गंगा आदि नदियों की जो अक्षय धारा एवं झरने सदा बहते रहते हैं तथा ग्रीष्म ऋतु में कभी नहीं सूखते हैं, उन के कारण हमारा समस्त पशु धन सदैव समृद्ध हो. (३) ये सर्पिषः संस्रवन्ति क्षीरस्य चोदकस्य च. तेभिर्मे सर्वैः संस्रावैर्धनं सं स्रावयामसि.. (४) घी, दूध और जल के जो प्रवाह सदैव गतिशील रहते हैं, उन सभी न सूखने वाले प्रवाहों के कारण हमारी सभी संपत्ति बढ़ती रहे. (४) सूक्त-१६ देवता—अग्नि, वरुण आदि ये ऽ मावास्यां ३ रात्रिमुदुस्थुर्वाजमत्त्रिणः. अग्निस्तुरीयो यातुहा सो अस्मभ्यमधि ब्रवत्.. (१) मनुष्यों का भक्षण करने वाले जो राक्षस अमावस्या की अंधेरी रात में इधर उधर घूमते हैं. चौथे अग्नि देव उन राक्षसों एवं चोरों का संहार कर के हमारी रक्षा करें. (१) सीसायाध्याह वरुणः सीसायाग्निरुपावति.
सीसं म इन्द्रः प्रायच्छत् तदङ्ग यातुचातनम्.. (२) वरुण देव ने फेन के विषय में कहा है. सीसे जस्ते के विषय में अग्नि ने भी यही कहा है. परम ऐश्वर्ययुक्त इंद्र ने मुझे सीसा प्रदान किया है. इंद्र ने कहा है कि हे प्रिय! यह सीसा राक्षसों का संहार करने वाला है. (२) इदं विष्कन्धं सहत इदं बाधते अत्रिणः. अनेन विश्वा ससहे या जातानि पिशाच्याः.. (३) यह सीसा राक्षस, पिशाच आदि द्वारा डाले जाने वाले विघ्नों को समाप्त करने वाला है. यह मनुष्यों का भक्षण करने वाले राक्षसों को नष्ट करता है. मैं इस सीसे के द्वारा सभी राक्षसों को पराजित करता हूं. वे राक्षस पिशाची से उत्पन्न हैं. (३) यदि नो गां हंसि यद्यश्वं यदि पूरुषम्. तं त्वा सीसेन विध्यामो यथा नो ऽ सो अवीरहा.. (४) हे शत्रु! यदि तू हमारी गायों, घोड़ों एवं सहायता करने वाले सेवकों की हत्या करता है तो मैं सीसे से तुझे मारूंगा. तू मेरे वीरों की हत्या नहीं कर सकेगा. (४) सूक्त-१७ देवता—स्त्रियां एवं धर्मपत्नियां अमूर्या यन्ति योषितो हिरा लोहितवाससः. अभ्रातर इव जामयस्तिष्ठन्तु हतवर्चसः.. (१) स्त्रियों की लाल रक्त प्रवाहिनी जो नाड़ियां रोग के कारण सदा प्रवाहित होती रहती हैं, वे रोग नष्ट हो जाने के कारण इस प्रकार रुक जाएं, जिस प्रकार बिना भाइयों वाली बहनें ससुराल न जा कर अपने पिता के घर में ही रुक जाती हैं. (१) तिष्ठावरे तिष्ठ पर उत त्वं तिष्ठ मध्यमे. कनिष्ठिका च तिष्ठति तिष्ठादिद्धमनिर्मही.. (२) हे शरीर के निचले भाग में वर्तमान नाड़ी! हे शरीर के ऊपरी भाग में स्थित नाड़ी! हे शरीर के मध्य भाग में वर्तमान नाड़ी! तू भी स्थिर हो जा. रुधिर का प्रवाह बंद करने के लिए छोटी और बड़ी सभी नाड़ियां स्थिर हो जाएं. (२) शतस्य धमनीनां सहस्रस्य हिराणाम्. अस्थूरिन्मध्यमा इमाः साकमन्ता अरंसत.. (३) हृदय संबंधी सैकड़ों धमनियां, हजारों शिराएं एवं उन की मध्यवर्ती रक्तवाहिनी नाड़ियां इस मंत्र के प्रभाव से खून बहाना बंद कर दें. शेष नाड़ियां पूर्ववत रक्त प्रवाह ebook converter DEMO Watermarks*
चालू रखें. (३) परि वः सिकतावती धनूर्बृहत्यक्रमीत्. तिष्ठतेलयता सु कम्.. (४) हे पथरी रोग उत्पन्न करने वाली नाड़ी! हे धनु और बृहती नाड़ी! तुम रुधिर प्रवाह के सभी मार्गों को चारों ओर से घेर कर फैली हुई हो. तुम रक्त स्राव रहित बनो तथा इस जन का सुख बढ़ाओ. (४) सूक्त-१८ देवता—सावित्री आदि निर्लक्ष्म्यं ललाम्यं १ निररातिं सुवामसि. अथ या भद्रा तानि नः प्रजाया अरातिं नयामसि.. (१) हम ललाट के असौभाग्य सूचक चिह्न को शत्रु के समान अपने शरीर से दूर करते हैं. जो सौभाग्य सूचक चिह्न हैं, वे हमारी संतान को प्राप्त हों. हम ने अपने शरीर से बुरे चिह्न दूर किए हैं, वे हमारे शत्रुओं को प्राप्त हों. (१) निररणिं सविता साविषक् पदोर्निहस्तयोर्वरुणो मित्रो अर्यमा. निरस्मभ्यमनुमती रराणा प्रेमां देवा असाविषुः सौभाग्याय.. (२) सब को प्रेरणा देने वाले सविता देव, वरुण देव, मित्र एवं अर्यमा देव हमारे हाथों और पैरों में स्थित असौभाग्य सूचक लक्षणों को दूर कर दें. अनुमति देवी, ‘भय मत करो’, कहती हुई हमारे शरीर में वर्तमान सभी बुरे लक्षणों को निकाल दें. इंद्र आदि देवों ने इस अनुमति देवी को हमें सौभाग्य देने के लिए प्रेरित किया है. (२) यत्त आत्मनि तन्वां घोरम् अस्ति यद्वा केशेषु प्रतिचक्षणे वा. सर्वं तद् वाचाप हन्मो वयं देवस्त्वा सविता सूदयतु.. (३) हे पुरुष! तेरे अपने शरीर, केशों एवं नेत्रों के जो बुरे लक्षण हैं, हम मंत्र रूपी वाणी से उन सभी बुरे लक्षणों का विनाश करते हैं. सविता देव तुझे कल्याण की प्रेरणा दें. (३) रिश्यपदीं वृषदतीं गोषेधां विधमामृत. विलीढ्यं ललाम्यं १ ता अस्मन्नाशयामसि.. (४) हम से संबंधित जो स्त्री हरिण के समान पैरों वाली, बैल के समान दांतों वाली, गाय के समान गति वाली एवं विकृत शब्द बोलने वाली है; हम मंत्रों के प्रभाव से उस के इन दुर्लक्षणों को दूर करते हैं. जिस स्त्री के माथे पर दुर्लक्षणों के प्रतीक उलटे रोम हैं, उन्हें भी हम अपने मंत्रों के प्रभाव से दूर करते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-१९ देवता—इंद्र आदि मा नो विदन् विव्याधिनो मो अभिव्याधिनो विदन्. आराच्छरव्या अस्मद्विषूचीरिन्द्र पातय.. (१) अस्त्रशस्त्र आदि से ताड़ित करने वाले जो शत्रु हैं, वे हमें प्राप्त न कर सकें. सामने आ कर हिंसा करने वाले हमें न पा सकें. हे परम ऐश्वर्य संपन्न इंद्र देव! शत्रुओं द्वारा बारबार छोड़े गए अनेक प्रकार के मुखों वाले जो बाण हैं, उन्हें हम से दूर स्थान में गिराओ. (१) विष्वञ्चो अस्मच्छरवः पतन्तु ये अस्ता ये चास्याः. दैवीर्मनुष्येषवो ममामित्रान् वि विध्यत्.. (२) जो बाण शत्रुओं द्वारा धनुष से छोड़े जा रहे हैं अथवा जो बाण छोड़ने के लिए तरकस में सुरक्षित हैं, वे हम से दूर रहें. जो दैवी एवं मानवीय अस्त्रशस्त्र हैं, वे जा कर हमारे शत्रुओं को वेध डालें. (२) यो नः स्वो यो अरणः सजात उत निष्ट्यो यो अस्माँ अभिदासति. रुद्रः शरव्य यैतान् ममामित्रान् वि विध्यतु.. (३) हमारी जाति का अधिक बली, शत्रु समान शक्ति वाला अथवा निकृष्ट बलशाली जो मनुष्य हमें दास बनाना चाहता है, हमारे उन अमित्रों को, सब को रुलाने वाले संहार कर्ता देव रुद्र अपने बाणों से बींध डालें. (३) यः सपत्नो यो ऽ सपत्नो यश्च द्विषञ्छपाति नः. देवास्तं सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म ममान्तरम्.. (४) जो हमारी जाति का अथवा भिन्न जाति का पुरुष हम से द्वेष रखने के कारण हमें शाप देता है, इंद्र आदि सभी देव उस का विनाश करें. मेरे द्वारा प्रयोग किए गए मंत्र उस के शाप से मेरी रक्षा करें. (४) सूक्त-२० देवता—सोम, मरुत् आदि अदारसृद् भवतु देव सोमास्मिन् यज्ञे मरुतो मृडता नः. मा नो विददभिभा मो अशस्तिर्मो नो विदद् वृजिना द्वेष्या या.. (१) हे सोम देव! हमारा शत्रु अपने स्थान से भागा हुआ होने के कारण कभी भी अपनी स्त्री के पास न पहुंच सके. हे मरुत् देव! इस यज्ञ में आप हमारी रक्षा करें. सामने से आता हुआ तेजस्वी शत्रु मुझे प्राप्त न कर सके. कीर्ति और उन्नति के मार्ग में विघ्न डालने वाले पाप भी हमें न पा सकें. (१) eBook converter DEMO Watermarks*
यो अद्य सेन्यो वधो ऽ घायुनामुदीरते. युवं तं मित्रावरुणावस्मद् यावतं परि.. (२) आज युद्ध में हिंसक और पापी शत्रुओं के हम पर चलाए गए जो आयुध हमारी ओर आ रहे हैं, हे वरुण देव! उन्हें आप हम से दूर रखो. हे मित्र और वरुण! युद्ध में शत्रु को हम से इस प्रकार दूर रखो कि वह हमें छू भी न सके. (२) इतश्च यदमुतश्च यद् वधं वरुण यावय. वि महच्छर्म यच्छ वरीयो यावया वधम्.. (३) हे वरुण! हमारे समीपवर्ती शत्रु द्वारा चलाया हुआ जो आयुध हम तक आता है अथवा दूरवर्ती शत्रु का जो आयुध हमारे ऊपर चलाया जाता है, उसे हम से दूर करो. हमें महान सुख प्रदान करो एवं मंत्र प्रयोग आदि के कारण असफल न होने वाले शस्त्रास्त्रों से हमें दूर रखो. (३) शास इत्था महाँ अस्यमित्रसाहो अस्तृत:. न यस्य हन्यते सखा न जीयते कदा चन.. (४) हे इंद्र! आप शासक और नियंता होने के कारण महान गुणों से युक्त हैं. आप शत्रुओं को पराजित करने वाले हैं. आप की मित्रता प्राप्त करने वाला पुरुष कभी पराजित नहीं होता. शत्रु कभी भी उस का अपमान नहीं कर पाते. (४) सूक्त-२१ देवता—इंद्र स्वस्तिदा विशां पतिर्वृत्रहा विमृधो वशी. वृषेन्द्रः पुर एतु नः सोमपा अभयङ्करः.. (१) विनाश रहित, क्षोभ न देने वाले, सभी प्रजाओं के पालनकर्ता, वृत्र नामक राक्षस अथवा जल के आधार मेघ को नष्ट करने वाले, शत्रुओं की विशेष रूप से हिंसा करने वाले, सभी प्राणियों को वश में रखने वाले, मनोकामनाओं की वर्षा करने वाले एवं सोमरस को पीने वाले इंद्र देव हमारे लिए अभय करने वाले बन कर संग्राम में हमारे नेता बनें. (१) वि न इन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः. अधमं गमया तमो यो अस्माँ अभिदासति.. (२) हे परम ऐश्वर्य युक्त इंद्र देव! हमारी विजय के लिए हम से संग्राम करने वाले शत्रुओं का विनाश करो. जो युद्ध का प्रयत्न करने वाले शत्रु हैं, उन को पराजित करो. हमारे खेत, धन आदि छीन कर हमें हानि पहुंचाने वाले शत्रु को अवनति रूपी अंधकार में पहुंचाओ. (२) वि रक्षो वि मृधो जहि वि वृत्रस्य हनू रुज. ebook converter DEMO Watermarks*
वि मन्युमिन्द्र वृत्रहन्नमित्रस्याभिदासतः.. (३) हे वृत्र राक्षस को मारने वाले इंद्र! तुम राक्षसों का विनाश करो एवं संग्रामों में विजय प्राप्त करो. तुम वृत्र के समान शक्तिशाली हमारे शत्रु के कपोलों को विदीर्ण करो. (३) अपेन्द्र द्विषतो मनो ऽ प जिज्यासतो वधम्. वि महच्छर्म यच्छ वरीयो यावया वधम्.. (४) हे परम ऐश्वर्य वाले इंद्र देव! हम से द्वेष करने वाले शत्रु के हिंसक मन को नष्ट कीजिए. जो शत्रु हमें समाप्त करने का इच्छुक है, उस के आयुध का विनाश करो. हमें महान सुख प्रदान करो एवं मंत्र प्रयोग के कारण असफल न होने वाले शस्त्रों को हम से दूर रखो. (४) सूक्त-२२ देवता—सूर्य और हृदय रोग अनु सूर्यमुदयतां हृद्द्योतो हरिमा च ते. गो रोहितस्य वर्णेन तेन त्वा परि दध्मसि.. (१) हे रोग ग्रसित पुरुष! तेरे हृदय को संताप पहुंचाने वाला हृदय रोग एवं कामला आदि रोग से उत्पन्न तेरे शरीर का पीलापन सूर्य की ओर चला जाए. हे रोगी! गाय के लाल वर्ण से पहचाने जाने वाले के रूप में मैं तुझे स्वस्थ कराता हूं. (१) परि त्वा रोहितैर्वर्णैर्दीर्घायुत्वाय दध्मसि. यथायमरपा असदथो अहरितो भुवत्.. (२) हे व्याधिग्रस्त पुरुष! तेरी दीर्घायु के लिए हम तुझे गाय के समान लाल रंग से ढकते हैं. यह पुरुष पापरहित हो कर कामला आदि रोगों के कारण होने वाले शरीर के पीले रंग से छूट जाए. (२) या रोहिणीर्देवत्या ३ गावो या उत रोहिणीः. रूपंरूपं वयोवयस्ताभिष्ट्वा परि दध्मसि.. (३) देवों की जो लाल रंग की कामधेनु आदि गाएं एवं मनुष्यों की जो लाल रंग की गाएं हैं, इन दोनों प्रकार के लाल रंग के रूप और यौवन को ले कर, हे रोगी पुरुष! हम तुझे ढकते हैं. (३) शुकेषु ते हरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि. अथो हारिद्रवेषु ते हरिमाणं नि दध्मसि.. (४) हे रोगी पुरुष! हम तेरे शरीर में रहने वाले रोग से उत्पन्न हरे रंग को स्रोतों में तथा रोपणक नामक पक्षियों में स्थापित करते हैं. हम तेरे हल्दी के समान पीले रंग को गोपीतनक ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-२३ देवता—वनस्पति
नामक पीले रंग के पक्षियों में स्थापित करते हैं. (४) सूक्त-२३ देवता—वनस्पति नक्तंजातास्योषधे रामे कृष्णे असिक्नि च. इदं रजनि रजय किलासं पलितं च यत्.. (१) हे हरिद्रा! हल्दी नामक ओषधि! तू रात में उत्पन्न हुई है. इसलिए तू शरीर की सफेदी दूर करने में समर्थ है. हे भृंगराज (भागरा) नामक ओषधि! रंग काला कर देने वाली इंद्रावारुणि नामक ओषधि! एवं असित वर्ण करने वाली नील नामक ओषधि! तुम कुष्ठ रोग के कारण विकृत रंग वाले इस अंग को अपने रंग में रंग दो. वृद्धावस्था के कारण जो बाल श्वेत हो गए हैं, उन्हें भी अपने रंग में रंग दो. (१) किलासं च पलितं च निरितो नाशया पृषत्. आ त्वा स्वो विशतां वर्णः परा शुक्लानि पातय.. (२) हे ओषधि! कुष्ठ रोग और असमय में केश श्वेत होने के रोग को शरीर से दूर कर के नष्ट करो. हे रोगी! तुम्हें अपने बालों का पहले वाला रंग पुनः प्राप्त हो. हे ओषधि! तू इस के श्वेत रंग को दूर कर दे. (२) असितं ते प्रलयनमास्थानमसितं तव. असिक्न्यस्योषधे निरितो नाशया पृषत्.. (३) हे नील नामक ओषधि! तेरे उत्पन्न होने का स्थान काले रंग का होता है. तू काले रंग की होती है, इसलिए तू कुष्ठ रोग के कारण दूषित अंग के सफेद रंग और बालों के पकने को दूर कर. (३) अस्थिजस्य किलासस्य तनूजस्य च यत् त्वचि. दूष्या कृतस्य ब्रह्मणा लक्ष्म श्वेतमनीनशम्.. (४) हड्डियों से उत्पन्न, त्वचा से उत्पन्न एवं इन दोनों के मध्यवर्ती मांस से उत्पन्न कुष्ठ रोग के कारण जो श्वेत चिह्न शरीर पर उत्पन्न हो गए हैं, उन्हें मैं मंत्र के प्रभाव से नष्ट करता हूं. (४) सूक्त-२४ देवता—आसुरी वनस्पति सुपर्णो जातः प्रथमस्तस्य त्वं पित्तम् आसिथ. तद् आसुरी युधा जिता रूपं चक्रे वनस्पतीन्.. (१) हे ओषधि! सब से पहले गरुड़ उत्पन्न हुए. तू उन के शरीर में पित्त दोष के रूप में थी. ebook converter DEMO Watermarks*
आसुरी माया ने गरुड़ से युद्ध कर के पित्त को जीत लिया एवं विजय के कारण प्राप्त उस पित्त को ओषधि का रूप दे दिया. (१) आसुरी चक्रे प्रथमेदं किलासभेषजम् इदं किलासनाशनम्. अनीनशत् किलासं सरूपाम् अकरत् त्वचम्.. (२) आसुरी माया रूपी स्त्री ने सब से पहले कुष्ठ रोग दूर करने की ओषधि बनाई थी. नीली आदि ओषधियों ने कुष्ठ रोग को नष्ट कर के त्वचा को पहले के समान स्वस्थ बनाया. (२) सरूपा नाम ते माता सरूपो नाम ते पिता. सरूपकृत् त्वमोषधे सा सरूपमिदं कृधि.. (३) हे ओषधि! तेरी माता तेरे समान ही काले रंग वाली है. तेरा पिता आकाश भी तेरे ही समान नीले रंग का है. हे नील नामक ओषधि! तू अपने संपर्क में आने वाले पदार्थ को अपने समान रंग वाला बना देती है. इसलिए कुष्ठ रोग से दूषित इस अंग को अपने समान रंग वाला अर्थात् काला कर दे. (३) श्यामा सरूपंकरणी पृथिव्या अध्युद्भृता. इदमू षु प्र साधय पुना रूपाणि कल्पय.. (४) हे काले रंग की एवं अपने संपर्क में आने वाले को अपने समान बना देने वाली ओषधि! तू आसुरी माया द्वारा धरती से उत्पन्न की गई है. तू कुष्ठ रोग से आक्रांत इस अंग को पुनः पहले के समान रंग वाला बना दे. (४) सूक्त-२५ देवता—यक्ष्मानाशक अग्नि यदग्निरपो अदहत् प्रविश्य यत्राकृण्वन् धर्मधृतो नमांसि. तत्र त आहुः परमं जनित्रं स नः संविद्वान् परि वृङ्ग्धि तक्मन्.. (१) हे जीवन को कष्ट पूर्ण बनाने वाले ज्वर! जिस अग्नि ने प्रवेश कर के जलों को जलाया अर्थात् गरम किया, यश, दान आदि धार्मिक कृत्य करने वालों ने जिस अग्नि में होम किया है, उसी उत्तम अग्नि में से तेरा जन्म बताया गया है. यह सब जानता हुआ तू गरम जल से स्नान करने वाले हमारे शरीर को त्याग कर अग्नि में प्रवेश कर. (१) यद्यर्चिर्यदि वासि शोचिः शकल्येषि यदि वा ते जनित्रम्. हूडुर्नामासि हरितस्य देव स नः संविद्वान् परि वृङ्ग्धि तक्मन्.. (२) हे जीवन को दुःखमय बनाने वाले ज्वर! तू यद्यपि उष्णता कारक एवं सुखाने वाला है. यद्यपि तेरा जन्म अग्नि से हुआ है, तथापि हे दीप्तिशाली ज्वर! तू मनुष्य के शरीर में पीले रंग को उत्पन्न करने वाला है. इसलिए तू हूड नाम से प्रसिद्ध है. तू हमारे गरम जल से भीगे हुए ebook converter DEMO Watermarks*
शरीर को अपना जन्म स्थान अग्नि जान कर हमारे शरीर से बाहर निकल जा. (२) यदि शोको यदि वाभिशोको यदि वा राज्ञो वरुणस्यासि पुत्रः. हूडुर्नामासि हरितस्य देव स नः संविद्वान् परि वृङ्ग्धि तक्मन्.. (३) हे शीत ज्वर! तुम शरीर को शोकाकुल करने वाले, शरीर को सभी प्रकार से सुखाने वाले एवं तेजस्वी वरुण के पुत्र हो. तुम हूड नाम से प्रसिद्ध हो. तुम हमारे गरम जल से भीगे हुए शरीर को अपना जन्म स्थान अग्नि जान कर हमारे शरीर से बाहर निकल जाओ. (३) नमः शीताय तक्मने नमो रूराय शोचिषे कृणोमि. यो अन्येद्युरुभयद्युरभ्येति तृतीयकाय नमो अस्तु तक्मने.. (४) मैं शीत उत्पन्न करने वाले ज्वर को नमस्कार करता हूं. मैं ठंड लगने के बाद चढ़ने वाले एवं शोककारक ज्वर को प्रणाम करता हूं. जो ज्वर प्रतिदिन दूसरे दिन एवं तीसरे दिन आता है, मैं उस के लिए नमस्कार करता हूं. (४) सूक्त-२६ देवता—इंद्र आदि आरे ३ सावस्मदस्तु हेतिर्देवासो असत्. आरे अश्मा यमस्यथ.. (१) हे देवो! आप की कृपा से शत्रु द्वारा प्रयुक्त खड्ग आदि आयुध हमारे शरीर से दूर हो जाएं. हे शत्रुओ! तुम यंत्र आदि के द्वारा जो पत्थर फेंकते हो, वे भी हम से दूर रहें. (१) सखासावस्मभ्यमस्तु रातिः सखेन्द्रो भगः सविता चित्रराधाः.. (२) आकाश में दिखाई देते हुए सूर्य देव हमारे मित्र हों. संपत्ति देने वाले सविता देव हमारे मित्र हों. सविता देव अनेक प्रकार के धनों के स्वामी हैं. वे तथा इंद्र देव हमारे मित्र हैं. (२) यूयं नः प्रवतो नपान्मरुतः सूर्यत्वचसः. शर्म यच्छाथ सप्रथाः.. (३) हे सूर्य द्वारा पृथ्वी से सोखे हुए जल को न गिराने वाले पर्जन्य देव! हे सात गणों वाले मरुत् देव! आप सब सूर्य के समान तेज वाले हैं. आप सब हमारा विस्तार से कल्याण करें. (३) सुषूदत मृडत मृडया नस्तनूभ्यो मयस्तोकेभ्यस्कृधि.. (४) हे इंद्र आदि देवो! आप शत्रुओं द्वारा छोड़े जाने वाले आयुधों को हम से दूर करो तथा हमें सुख दो. हे इंद्र आदि देवो! आप हमारे शरीरों को सुख दें एवं हमारी संतान को सुखी बनाएं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-२७ देवता—ब्रह्मणस्पति
सूक्त-२७ देवता—ब्रह्मणस्पति अमूः पारे पृदाक्वस्त्रिषप्ता निर्जरायवः. तासां जरायुभिर्वयमक्ष्या ३ वपि व्ययामस्यघायोः परिपन्थिनः.. (१) सांपों की ये इक्कीस जातियां देवों के समान बुढ़ापे से रहित हैं एवं नागलोक में निवास करती हैं. इन सांपों की केंचुली जरायु के समान उन से लिपटी रहती है. सांपों की उस केंचुली के द्वारा हम दूसरों का अहित सोचने वाले शत्रुओं की आंखों को ढकते हैं. (१) विषूच्येतु कृन्तती पिनाकमिव बिभ्रती. विष्वक् पुनर्भूवा मनो ऽ समृद्धा अघायवः.. (२) शिव के धनुष पिनाक के समान शत्रुओं के मारने में सक्षम आयुध धारण करती हुई, खड्ग आदि आयुधों से शत्रुओं को फाड़ती हुई हमारी सेना मारकाट मचाती हुई आगे बढ़े. यदि शत्रु सेना उस का सामना करने के लिए एकत्र हो, तो शत्रु सैनिकों का मन कुछ सोचने और निश्चय करने में समर्थ न हो. ऐसी स्थिति में हमारे शत्रु राष्ट्र, कोश आदि से रहित हो जाएं. (२) न बहवः समशकन् नार्भका अभि दाधृषुः. वेणोरद्गा इवाभितो ऽ समृद्धा अघायवः.. (३) हाथी, घोड़े और रथों से युक्त बहुत से शत्रु सैनिक हमें जीतने में असमर्थ हो कर हार जाएं. अल्प संख्या वाले शत्रु हमारे सामने आने का साहस न कर सकें. बांस की ऊपरी शाखाएं जिस प्रकार दुर्बल होती हैं, हम से पराजित हो कर धनहीन बने शत्रु उसी प्रकार समृद्धि रहित हो जाएं. (३) प्रेतं पादौ प्र स्फुरतं वहतं पृणतो गृहान्. इन्द्राण्येतु प्रथमाजीतामुषिता पुरः.. (४) हे चलने के इच्छुक व्यक्ति के चरणो! तुम आगे बढ़ो एवं शीघ्र चलने के लिए गति करो. तुम हमें इच्छित फल देने वाले पुरुष के निवास स्थान तक पहुंचाओ. किसी से पराजित न होने वाले इंद्र की पत्नी हमारी सेना की देवता हैं. वह हमारी सेना की रक्षा के लिए आगेआगे चलें. (४) सूक्त-२८ देवता—अग्नि उप प्रागाद् देवो अग्नी रक्षोहामीवचातनः. दहन्नप द्वयाविनो यातुधानान् किमीदिनः.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
राक्षसों के विनाशक और रोगों को दूर करने वाले अग्नि देव उन्हें नष्ट करने के लिए उन के समीप चलें. अग्नि देव मायामय, सौम्य, हिंसक एवं भयावह रूप धारण करने वाले, दूसरों के दोष खोजने वाले, पीड़ादायक एवं परेशान करने वाले राक्षसों को भस्म करते हुए इस पुरुष के समीप आ रहे हैं. (१) प्रति दह यातुधानान् प्रति देव किमीदिनः. प्रतीचीः कृष्णवर्तने सं दह यातुधान्यः.. (२) हे अग्नि देव! आप इन राक्षसों और दूसरों के दोष देखने वाले पिशाचों को भस्म कर दो. हे काले मार्ग वाले अग्नि! दूसरों के प्रतिकूल आचरण करने वाली राक्षसियों को भी आप भस्म कर दें. (२) या शशाप शपनेन याघं मूरमादधे. या रसस्य हरणाय जातमारेभे तोकमत्तु सा.. (३) जिन राक्षसियों ने कठोर वचनों के द्वारा हमें शाप दिया है, जिन राक्षसियों ने सभी पापों की जड़ हिंसा को स्वीकार कर लिया है तथा जो हमारी संतान, रस, सौंदर्य एवं पुष्टि का विनाश करती हैं, वे सभी अपने अथवा हमारे शत्रुओं के बालकों का भक्षण करें. (३) पुत्रमत्तु यातुधानीः स्वसारमुत नप्त्यम्. अधा मिथो विकेश्यो ३ वि घ्नतां यातुधान्यो ३ वि तृहन्तामराय्यः.. (४) राक्षसियां अपने पुत्र, बहन और नाती को खा जाएं. राक्षसियां एकदूसरे के केश खींच कर लड़ने के कारण बाल बिखेरें तथा मृत्यु को प्राप्त हों. दान न करने वाली राक्षसियां आपस में लड़ कर मर जाएं. (४) सूक्त-२९ देवता—ब्रह्मणस्पति अभीवर्तेन मणिना येनेन्द्रो अभिवावृधे. तेनास्मान् ब्रह्मणस्पते ऽ भि राष्ट्राय वर्धय.. (१) हे ब्रह्मणस्पति! समृद्धि एवं शक्ति प्रदान करने वाली जिस मणि को धारण कर के इंद्र उन्मत्त हुए हैं, उसी मणि के द्वारा शत्रुओं से पीड़ित हमारे राष्ट्र की संपन्नता बढ़ाओ. आप की कृपा से हम संपन्न जनों द्वारा सुरक्षित राष्ट्र में शत्रुओं के भय से रहित हों. (१) अभिवृत्य सपत्नानभि या नो अरातयः. अभि पृतन्यन्तं तिष्ठाभि यो नो दुरस्यति.. (२) हे अभीवर्त मणि! तुम हमारे शत्रुओं के सामने डट कर उन्हें पराजित करो. जो हमारे राष्ट्र, धन आदि का अपहरण कर के हमारे प्रति शत्रुता का व्यवहार करते हैं, उन के सामने ebook converter DEMO Watermarks*