अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-६ देवता—दुःस्वप्ननाशन
हे स्वप्न! तुम जीवन का अंत करने वाली मृत्यु हो. (९) तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्ष्वप्न्यात् पाहि.. (१०) हे स्वप्न! मैं तुम्हें भलीभांति जानता हूं. तुम मुझे बुरे स्वप्नों से बचाओ. (१०) सूक्त-६ देवता—दुःस्वप्ननाशन अजैष्माद्यासनामाग्याभूमानागसो वयम्.. (१) हम आज विजय प्राप्त करें. हम आज खाद्य पदार्थ प्राप्त करें. आज हम पाप रहित हो जाएं. (१) उषो यस्माद् दुष्ष्वप्न्याद्भैष्माप तदुच्छतु.. (२) हे उषा देवी! जिस बुरे स्वप्न से हम डरते हैं, वह बुरा स्वप्न समाप्त हो जाए. (२) द्विषते तत् परा वह शपते तत् परा वह.. (३) हे देव! आप उसे भय को प्राप्त कराएं जो हमसे द्वेष करता है तथा हमारी निन्दा करता है. (३) यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तस्मा एनद् गमयामः.. (४) हम जिससे द्वेष करते हैं और जो हमसे द्वेष करता है, हम इस भय को उस के पास भेजते हैं. (४) उषा देवी वाचा संविदाना वाग् देव्यु १ षसा संविदाना.. (५) उषा देवी वाणी के साथ और वाणी की देवी उषा के साथ एकमत स्थापित करें. (५) उषस्पतिर्वाचस्पतिना संविदानो वाचस्पतिरुषस्पतिना संविदानः.. (६) उषा के पति वाचस्पति अर्थात् वाणी के स्वामी के साथ तथा वाचस्पति उषा देवी के पति के साथ एकमत स्थापित करें. (६) ते ३ मुष्मै परा वहन्त्वरायान् दुर्नाम्नः सदान्वाः.. (७) कुम्भीका दूषीकाः पीयकान्.. (८) वे इस दुष्ट शत्रु के लिए दूषित नाम वाले दुःखों को, आपत्तियों को घड़े के समान बढ़ने वाले उदर रोगों को, शरीर के दूषित रोगों को तथा प्राणघातक रोगों को प्राप्त कराएं. (७-८) ebook converter DEMO Watermarks*
जाग्रद्दुःष्वप्न्यं स्वप्नेदुःष्वप्न्यम्.. (९) अनागमिषमतो वरानवित्तेः संकल्पान्मुच्या द्रुहः पाशान्.. (१०) हम जाग्रत अवस्था में जो दुःस्वप्न देखते हैं और सोते हुए जो दुःस्वप्न देखते हैं, उनके बुरे फलों से तथा धनहीनता के अतीतकाल के संकल्पों से, न प्राप्त होने वाले उत्तम पदार्थों से और न छूटने वाले द्रोहजनित पाशों से मुक्त हों. (९-१०) तदमुष्मा अग्ने देवाः परा वहन्तु वध्रिर्यथासद विथुरो न साधुः.. (११) हे अग्नि देव! सभी देव सभी प्रकार की उन आपत्तियों को हमारे शत्रुओं की ओर ले जाएं, जिनके कारण हमारे शत्रु पौरुषहीन व्याधि और सज्जनों को प्राप्त होने वाले यज्ञ को न पाकर अपयश भोगें. (११) सूक्त-७ देवता—दुःस्वप्ननाशन तेनैनं विध्याम्यभूत्यैनं विध्यामि निर्भूत्यैनं विध्यामि पराभूत्यैनं विध्यामि ग्राह्यैनं विध्यामि तमसैनं विध्यामि.. (१) मैं इस अर्थात् बुरे स्वप्न को अभिचार कर्म अर्थात् जादू Node/टोने से, दुर्गति से, दरिद्रता से तथा रोग से विद्ध करता हूं. (१) देवानामैनं घोरैः क्रूरैः प्रैषैरभिप्रेष्यामि.. (२) मैं इस बुरे स्वप्न को देवताओं की भयंकर आज्ञाओं के सामने उपस्थित करता हूं. (२) वैश्वानरस्यैनं दंष्ट्रयोरपि दधामि.. (३) मैं इस बुरे स्वप्न को वैश्वानर अर्थात् अग्नि की दाढ़ों में डालता हूं. (३) एवानेवाव सा गरत्.. (४) वैश्वानर इस बुरे स्वप्न को निगल जाएं. (४) यो ३ स्मान् द्वेष्टि तमात्मा द्वेष्टु यं वयं द्विष्मः स आत्मानं द्वेष्टु.. (५) जो हम से द्वेष करता हो, उस से आत्मा द्वेष करे. जिस से हम द्वेष करते हैं, वह आत्मा से द्वेष करे. (५) निर्द्विषन्तं दिवो निः पृथिव्या निरन्तरिक्षाद् भजाम.. (६) जो हम से द्वेष करता है, उसे हम आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष से दूर भगाते हैं. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
सुयामंश्वाक्षुष.. (७) इदमह मामुष्यायणे ३ मुष्याः पुत्रे दुष्षप्न्यं मृजे.. (८) हे उत्तम नियामक और निरीक्षक! मैं बुरे स्वप्न से होने वाले फल को अमुक गोत्र वाले तथा अमुक स्त्री के पुत्र के पास भेजता हूं. (७-८) यददो अदो अभ्यगच्छन् यद् दोषा यत् पूर्वा रात्रिम्.. (९) यज्जाग्रद यत् सुप्तो यद् दिवा यन्नक्तम्.. (१०) यदहरहरभिगच्छामि तस्मादेनमव दये.. (११) मैं पहली रात में अमुकअमुक कर्म कर चुका हूं. जाग्रतावस्था में, सुषुप्तावस्था में, दिन में अथवा रात्रि में मैं नित्यप्रति जिस पाप और दोष को प्राप्त करता हूं, उन्हीं के द्वारा मैं उस बुरे स्वप्न को नष्ट करता हूं. (९-११) तं जहि तेन मन्दस्व तस्य पृष्टीरपि शृणीहि.. (१२) हे देव! उस शत्रु की हिंसा करो, उस के साथ चलो तथा उस की पसलियों को तोड़ दो. (१२) स मा जीवीत् तं प्राणो जहातु.. (१३) वह प्राणहीन हो जाए, वह जीवित न रहे. (१३) सूक्त-८ देवता—बुरे स्वप्न का नाश जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.. (१) हमारा उदय हो. हम सत्य को प्राप्त करें, हमारा तेज बढ़े. हमारा ज्ञान बढ़े तथा हमारे उत्तम प्रकाश में वृद्धि हो. हमारे यज्ञ सफल हों, हमारे अधिकार में पशु हों, हमारी संतान की वृद्धि हो. हमारे लोग वीर हों. (१) तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.. (२) इस अपराध के कारण हम शत्रु पर आक्रमण करते हैं. इस गोत्र वाला तथा इस का पुत्र हमारा शत्रु है. (२) स ग्राह्याः पाशान्मा मोचि.. (३) वह रोग के पाशों से न छूट सके. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (४) उस के तेज, बल, प्राण और आयु को मैं घेरता हूं. मैं इसे नीचे गिराता हूं. (४) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स निर्र्ऋत्याः पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (५) शत्रुओं को मार कर लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, प्रजा तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को, हम इस लोक से दूर करते हैं. मैं उस के तेज, बल, प्राण और आयु को घेरता हूं. वह दुर्गति के पाशों से न छूट सके. (५) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. सो ऽ भूत्याः पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (६) शत्रुओं को मार कर लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, प्रजा तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को, हम इस लोक से दूर करते हैं. मैं उस के तेज, बल, प्राण और आयु को घेरता हूं. वह दरिद्रता के पाशों से न छूटने पाए. (६) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स निर्भूत्याः पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (७) शत्रुओं को मार कर लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, प्रजा तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को, हम इस लोक से दूर करते हैं. मैं उस के तेज, बल, प्राण और आयु को घेरता हूं. वह बुरी अवस्था
के पाशों से न छूट सके. (७) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः स पराभूत्याः पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराज्वं पादयामि.. (८) शत्रुओं को मार कर लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, प्रजा तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को, हम इस लोक से दूर करते हैं. मैं उस के तेज, बल, प्राण और आयु को घेरता हूं. वह पराजय के पाशों से न छूटने पाए. (८) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स देवजामीनां पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराज्वं पादयामि.. (९) शत्रुओं को मार कर लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, प्रजा तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को, हम इस लोक से दूर करते हैं. मैं उस के तेज, बल, प्राण और आयु को घेरता हूं. वह इंद्रिय संबंधी दोषों से छूटने न पाए. (९) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स बृहस्पतेः पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराज्वं पादयामि.. (१०) शत्रुओं को मार कर लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, प्रजा तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को, हम इस लोक से दूर करते हैं. वह बृहस्पति के बंधन से मुक्त न हो. मैं उस के तेज, वर्च, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराता हूं. (१०)
जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स प्रजापतेः पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (११) शत्रुओं को मार कर और जीत कर लाए हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को हम इस लोक से दूर करते हैं, वह प्रजापति के बंधन से मुक्त न हो. मैं उस के तेज, वर्च, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराता हूं. (११) जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवोऽस्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स ऋषीणां पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (१२) शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए तथा जीते हुए सब पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, पशु, प्रजा तथा सब वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले और अमुक स्त्री के पुत्र को हम इस लोक से दूर करते हैं. वह ऋषियों के बंधन से मुक्त न हो. मैं उस के तेज, वर्च, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराना चाहता हूं. (१२) जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स आर्षेयाणां पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (१३) शत्रुओं को विदीर्ण कर के लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान तथा सभी वीर हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर भेजते हैं. वह ऋषियों से उत्पन्न पाशों से कभी छूटने न पाए. मैं उस के तेज, वर्च, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराता हूं. (१३) जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं ebook converter DEMO Watermarks*
यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. सो ऽ ङ्गिरसां पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (१४) शत्रुओं को विदीर्ण कर के लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह अंगिराओं के बंधन से मुक्त न हो. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (१४) जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स आङ्गिरसानां पाशान्मामोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (१५) शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान तथा सभी वीर हमारे हैं. अमुक गोत्र वाला तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को हम इस लोक से दूर करते हैं. वह आंगिरसों अर्थात् अंगिरा गोत्र वालों के बंधन से मुक्त न हो. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह डालते हैं. (१५) जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. सो ऽ थर्वणां पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (१६) शत्रुओं का वध कर के लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को लोक से दूर करते हैं. वह अथर्वा गोत्र वालों के बंधन से मुक्त न हो. हम उस के तेज, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (१६) जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. ebook converter DEMO Watermarks*
तस्मादमुं निर्भजामोऽमुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स आथर्वणानां पाशान्मामोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (१७) शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए और जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह अथर्वणों के बंधन से न छूटे. हम उस के तेज, ब्रह्म, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (१७) जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स वनस्पतीनां पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (१८) शत्रुओं को विदीर्ण कर के लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को हम इस लोक से दूर करते हैं. वह वनस्पतियों के बंधन से मुक्त न हो. हम उस के तेज, बल, प्राण तथा आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (१८) जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स वनस्पत्यानां पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (१९) शत्रुओं का वध कर के लाए गए और जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. हम सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान तथा सभी वीर पुरुषों के अधिकारी हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह वनस्पतियों के पाश से मुक्त न हो. हम उस के तेज, बल, स्वर्ग, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (१९) जितमस्माकमुद्धिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स ऋतूनां पाशान्मा मोचि. ebook converter DEMO Watermarks*
तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्ट्यामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२०) शत्रुओं का वध कर के लाए हुए तथा जीते हुए सभी पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान, स्त्री तथा वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह ऋतुओं के बंधन से मुक्त न होने पाए. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२०) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामोऽमुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स आर्तवानां पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्ट्यामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२१) शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए तथा जीत कर लाए हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान तथा सभी वीर पुरुष हमारे हैं. अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को हम इस लोक से दूर करते हैं. वह ऋतुओं के पदार्थों के बंधन से मुक्त न हो. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२१) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स मासानां पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्ट्यामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२२) शत्रुओं का वध कर के लाए हुए पदार्थ तथा जीत कर लाए हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान तथा सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह मासों के पाश से न छूटने पाए. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२२) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामोऽमुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. सो ऽ र्धमासानां पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्ट्यायीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२३) eBook converter DEMO Watermarks*
शत्रुओं को मार कर लाए हुए पदार्थ तथा जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह अर्धमास के बंधन से मुक्त न होने पाए. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२३) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामोऽमुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. सो ऽ होरात्रयोः पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२४) शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए पदार्थ और जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह दिन और रात्रियों के पाश से मुक्त न होने पाए. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२४) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामोऽमुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. सो ऽ ह्नोः संयतोः पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२५) शत्रुओं को नष्ट कर के लाए हुए पदार्थ और जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह रातदिन के संयत पाशों से मुक्त न होने पाए. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२५) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामोऽमुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स द्यावापृथिव्योः पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२६) शत्रुओं को विदीर्ण कर के लाए हुए पदार्थ तथा जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, प्रजा और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम ebook converter DEMO Watermarks*
वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह द्यावा पृथ्वी के पाश से छूट न सके. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२६) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजोऽस्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स इन्द्राग्न्योः पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२७) शत्रुओं को मार कर लाए हुए पदार्थ तथा जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, पशु, संतान और सभी वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह इंद्र और अग्नि के बंधन से मुक्त न होने पाए. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२७) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स मित्रावरुणयोः पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि.. (२८) शत्रुओं को विदीर्ण कर के लाए हुए पदार्थ और जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सब वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. वह मित्र और वरुण के बंधन से छूटने न पाए. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२८) जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्. तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः. स राज्ञो वरुणस्य पाशान्मा मोचि. तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराञ्चं पादयामि. (२९) शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए पदार्थ तथा जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सब वीर पुरुष हमारे हैं. हम अमुक गोत्र वाले और अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से मुक्त करते हैं. वह राजा वरुण के पाश से मुक्त न होने पाए. हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (२९) ebook converter DEMO Watermarks*
जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमृतमस्माकं तेजो ऽ स्माकं ब्रह्मास्माकं स्वरस्माकं यज्ञो ३ ऽ स्माकं पशवो ऽ स्माकं प्रजा अस्माकं वीरा अस्माकम्.. (३०) शत्रुओं को मार कर लाए हुए पदार्थ और जीत कर लाए हुए पदार्थ हमारे हैं. सत्य, तेज, ब्रह्म, स्वर्ग, पशु, संतान और सब वीर पुरुष हमारे हैं. (३०) तस्मादमुं निर्भजामो ऽ मुमामुष्यायणममुष्याः पुत्रमसौ यः.. (३१) हम अमुक गोत्र वाले तथा अमुक नाम वाली स्त्री के पुत्र को इस लोक से दूर करते हैं. (३१) स मृत्योः पड्वीशात् पाशान्मा मोचि.. (३२) वह मृत्यु के पाशों से कभी मुक्त न हो. (३२) तस्येदं वर्चस्तेजः प्राणमायुर्नि वेष्टयामीदमेनमधराज्चं पादयामि.. (३३) हम उस के तेज, बल, प्राण और आयु को लपेट कर उसे औंधे मुंह गिराते हैं. (३३) सूक्त-९ देवता—प्रजापति जितमस्माकमुद्भिन्नमस्माकमभ्यष्ठां विश्वाः पृतना अरातीः.. (१) शत्रुओं को घायल कर के लाए हुए पदार्थ तथा जीते हुए पदार्थ हमारे हैं. हम शत्रुओं की सेना पर अधिकार करें. (१) तदग्निराह तदु सोम आह पूषा मा धात् सुकृतस्य लोके.. (२) अग्नि और सोम इसी बात को कह रहे हैं. पूषा देव हमें पुण्य लोक में प्रतिष्ठित करें. (२) अगन्म स्व १: स्वरगन्म सं सूर्यस्य ज्योतिषागन्म.. (३) हमें स्वर्ग प्राप्त है, जो लोक सूर्य की ज्योति से उत्तम बना है, हम उसे प्राप्त करें. (३) वस्योभूयाय वसुमान् यज्ञो वसु वंशिषीय वसुमान् भूयासं वसु मयि धेहि.. (४) मैं सत्कार पाने के योग्य हूं. मैं परमधनी बनने के लिए धन पर अधिकार कर सकूं. हे देव! मेरे धन को पुष्ट करो. (४) eBook converter DEMO Watermarks*
ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-१ देवता—आदित्य
सत्रहवां कांड सूक्त-१ देवता—आदित्य विषासहिं सहमानं सासहानं सहीयांसम्. सहमानं सहोजितं स्वर्जितं गोजितं संधनाजितम्. ईड्यं नाम ह्व इन्द्रमायुष्मान् भूयासम्. (१) सहमान अर्थात् दूसरों को दबाने वाले तेज से युक्त, शत्रुओं के उस तेज को जीतने वाले, स्वर्ग के विजेता, शत्रुओं के गाय आदि पशुओं को जीतने वाले तथा जलों पर विजय प्राप्त करने वाले इंद्र रूप सूर्य को मैं प्रातः, मध्याह्न तक संध्या के कर्मों के द्वारा बुलाता हूं. उन इंद्र रूप सूर्य की कृपा से मैं अधिक आयु वाला बनूं. (१) विषासहिं सहमानं सासहानं सहीयांसम्. सहमानं सहोजितं स्वर्जितं गोजितं संधनाजितम्. ईड्यं नाम ह्व इन्द्रं प्रियो देवानां भूयासम् (२) सहमान अर्थात् दूसरों को दबाने वाले तेज से युक्त, शत्रुओं के उस तेज को जीतने वाले, स्वर्ग के विजेता, शत्रुओं के गाय आदि पशुओं को जीतने वाले तथा जलों पर विजय प्राप्त करने वाले इंद्र रूप सूर्य को बुलाता हूं. उन इंद्र की कृपा से मैं संतान आदि का प्रिय बनूं. (२) विषासहिं सहमानं सासहानं सहीयांसम्. सहमानं सहोजितं स्वर्जितं गोजितं संधनाजितम्. ईड्यं नाम ह्व इन्द्रं प्रियः प्रजानां भूयासम् (३) मैं सहमान अर्थात् दूसरों को दबाने वाले तेज से युक्त, शत्रुओं के उस तेज को जीतने वाले, स्वर्ग के विजेता, शत्रुओं के गाय आदि पशुओं को जीतने वाले तथा जलों पर विजय प्राप्त करने वाले इंद्र रूप सूर्य को मैं बुलाता हूं. उन इंद्र रूप सूर्य की कृपा से मैं प्रजाओं का प्रिय बनूं. (३) विषासहिं सहमानं सासहानं सहीयांसम्. सहमानं सहोजितं स्वर्जितं गोजितं संधनाजितम्. ईड्यं नाम ह्व इन्द्रं प्रियः पशूनां भूयासम् (४) सहमान अर्थात् दूसरों को दबाने वाले तेज से युक्त, शत्रुओं के उस तेज को जीतने वाले, ebook converter DEMO Watermarks*
स्वर्ग के विजेता, शत्रुओं के गाय आदि पशुओं को जीतने वाले तथा जलों पर विजय प्राप्त करने वाले इंद्र रूप सूर्य का मैं प्रातः, सायं तथा मध्याह्न के कर्मों के द्वारा आह्वान करता हूं. उन की कृपा से मैं गाय, भैंस आदि पशुओं का प्रिय बनूं. (४) विषासहिं सहमानं सासहानं सहीयांसम्. सहमानं सहोजितं स्वर्जितं गोजितं संधनाजितम्. ईड्यं नाम ह्व इन्द्रं प्रियः समानानां भूयासम् (५) सहमान अर्थात् दूसरों को दबाने वाले तेज से युक्त, शत्रुओं के उस तेज को जीतने वाले, स्वर्ग के विजेता, शत्रुओं के गाय आदि पशुओं को जीतने वाले तथा जलों पर विजय प्राप्त करने वाले सूर्य को मैं प्रातः, मध्याह्न और संध्या के कर्मों के द्वारा बुलाता हूं. उन इंद्र रूप सूर्य की कृपा से मैं अपने समान लोगों का प्रिय बनूं. (५) उदिह्युदिहि सूर्य वर्चसा माभ्युदिहि. द्विषंश्च मह्यं रध्यतु मा चाहं द्विषते रधं तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (६) हे सूर्य देव! आप उदित हैं और उदित हो कर अपने तेज से मुझे प्रकाशित करें. जो लोग मुझ से द्वेष करते हैं. वे मेरे वश में हो जाएं. मैं किसी भी प्रकार उन के वशीभूत न बनूं. हे व्यापनशील सूर्य देव! आप का पराक्रम सीमारहित है आप मुझे अमुक रूपों वाले अर्थात् गाय, घोड़ा, भैंस आदि पशुओं से पूर्ण करं तथा परमव्योम में जो अमृत है, उस में मुझे स्थापित करें. (६) उदिह्युदिहि सूर्य वर्चसा माभ्युदिहि. याश्चं पश्यामि याश्चं न तेषु मा सुमतिं कृधि तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (७) हे सूर्य देव! तुम उदय होओ. हे अपने तेज से दूसरों को दबाने वाले सूर्य देव! तुम उदय होओ. मैं जिन को देख रहा हूं और जिन्हें नहीं देख रहा हूं, उन के विषय में मुझे शोभन बुद्धि वाला बनाओ. हे व्यापनशील सूर्य! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अंतहीन हैं. तुम मुझे अनेक रूपों वाले अर्थात् गाय, अश्व, भैंस आदि पशुओं से पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो अमृत है उस में मुझे स्थापित करो. (७) मा त्वा दभन्त्सलिले अप्स्व १ न्तर्ये पाशिन उपतिष्ठन्त्यत्र. हित्वाशस्तिं दिवमारुक्ष एतां स नो मृड सुमतौ ते स्याम तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (८) हे पाशों को धारण करने वाले सूर्य! राक्षस तुम्हें जलों में प्रवेश करने से न रोकें. तुम उस ebook converter DEMO Watermarks*
निंदा को त्याग कर आकाश में आरोहण करो. तुम मुझ पर कृपा करो. हम तुम्हारी शोभन बुद्धि में रहें. हे व्याप्त होने वाले सूर्य! यहां तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनेक हैं. तुम गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से हमें पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (८) त्वं न इन्द्र महते सौभागायादब्धेभिः परि पाह्यक्तुभिस्तवैद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (९) हे परम ऐश्वर्य संपन्न सूर्य! ऐश्वर्य को प्राप्त करने के हेतु तुम बहुत से पराक्रम करते हो. तुम व्याधि, चोर, भूत, राक्षस, अग्निदाह आदि की हिंसा से रहित दिवसों के द्वारा हमारी रक्षा करो. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से मुझे पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा है, उस में मुझे स्थापित करो. (९) त्वं न इन्द्रोतिभिः शिवाभिः शांतमो भव. आरोहंस्त्रिदिवं दिवो गृणानः सोमपीतये प्रियधामा स्वस्तये तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१०) हे इंद्र! तुम अपनी मंगलमयी रक्षाओं के द्वारा हमारे लिए अधिक सुखकारी बनो. तुम अंतरिक्ष संबंधी स्वर्ग पर चढ़ते हुए सोम याग में सोमरस पीने के लिए आओ. हे प्रिय निवास स्थानों वाले इंद्र! तुम हमारे कल्याण के निमित्त पधारो. हे व्यापक इंद्र! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनंत हैं. तुम हमें गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो और परम व्योम में जो सुधा है. उस में हमें स्थापित करो. (१०) त्वमिन्द्रासि विश्वजित् सर्ववित् पुरुहूतस्त्वमिन्द्र. त्वमिन्द्रेमं सुहवं स्तोममेरयस्व स नो मृड सुमतौ ते स्याम तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (११) हे इंद्र! तुम विश्वविजयी एवं सभी को जीतने वाले हो. हे इंद्र! तुम बहुतों के द्वारा यज्ञों में बुलाए जाने वाले हो. हे इंद्र! तुम इस समय की जाती हुई शोभन ज्ञान की साधन स्तुतियों के लिए हमें प्रेरित करो. तुम हमारी रक्षा करो. हम तुम्हारी उत्तम बुद्ध में रहें अर्थात् हमारे प्रति तुम्हारी श्रेष्ठ भावना हो. हे व्यापक इंद्र! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम हमें गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो तथा हमें परम व्योम में स्थित सुधा में स्थापित करो. (११) ebook converter DEMO Watermarks*
अदब्धो दिवि पृथिव्यामुतासि न त आपुर्महिमानमन्तरिक्षे. अदब्धेन ब्रह्मणा वावृधानः स त्वं न इन्द्र दिवि षञ्छर्म यच्छ तवेद विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१२) हे इंद्र! तुम द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में तथा पृथ्वी पर किसी के द्वारा हिंसित नहीं हो. तात्पर्य यह है कि इन दोनों स्थानों पर कोई भी तुम्हारा विरोध करने का साहस नहीं करता है. आकाश में तुम्हारी महिमा को सहन करने में कोई समर्थ नहीं है. जिस की सामर्थ्य कुंठित नहीं होती है, ऐसे मंत्रों के द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हुए तुम हमारी रक्षा करो. हे व्यापक इंद्र! तुम्हारे वीर्य अर्थात् शक्तियां अनंत हैं. तुम हमें गाय, घोड़ा आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१२) या त इन्द्र तनूरप्सु या पृथिव्यां यान्तरग्नौ या त इन्द्र पवमाने स्वर्विदि. ययेन्द्र तन्वा३न्तरिक्षं व्यापिथ तया न इन्द्र तन्वा३ शर्म यच्छ तवेद विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१३) हे परम ऐश्वर्य वाले सूर्य! तुम्हारी जो विभूतियां जलों में, पृथ्वी पर, आकाश में हैं तथा तुम्हारी जो विभूति अंतरिक्ष में गतिशील वायु में है, हे इंद्र उन विभूतियों अथवा मूर्तियों के द्वारा हमें सुख प्रदान करो. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी शक्तियां अनंत हैं. तुम हमें गाय, भैंस आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो तथा परम व्योम में स्थित जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१३) त्वामिन्द्र ब्रह्मणा वर्धयन्तः सत्रं नि षेदुर्ऋषयो नाथमानास्तवेद विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१४) हे ऐश्वर्य वाले सूर्य! अंगिरा आदि प्राचीन ऋषि अपने मंत्रों के स्तोत्र आदि के द्वारा अपने सोमरस आदि के रूप वाले हवि से तुम्हारी वृद्धि करते हुए नियम से निवास करते रहें. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी ये शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम हमें गाय, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो एवं परमव्योम में व्याप्त जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१४) त्वं तृतं त्वं पर्येष्युत्सं सहस्रधारं विदथं स्वर्विदं तवेद विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१५) हे इंद्र! तुम विस्तृत अंतरिक्ष को व्याप्त करते हो. तुम अनेक धाराओं वाले जल को व्याप्त करते हो. तुम ज्ञान के साधन यज्ञ पर अधिकार करते हो. हे व्यापक इंद्र! तुम्हारे वीर्य ebook converter DEMO Watermarks*
अर्थात् शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम हमें गौ, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो तथा हमें परम व्योम में स्थित सुधा में स्थापित करो. (१५) त्वं रक्षसे प्रदिशश्चतस्रस्त्वं शोचिषा नभसी वि भासि. त्वमिमा विश्वा भुवनानु तिष्ठस ऋतस्य पन्थामन्वेषि विद्वांस्तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१६) हे सूर्य! तुम चारों दिशाओं की रक्षा करते हो और अपनी किरणों से आकाश को प्रकाशित करते हो. तुम इन सभी भुवनों को प्रकाशित करते हो. तुम सत्य अथवा यज्ञ की स्थिति जानते हुए उन के मार्गों को क्रम से व्याप्त करते हो. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी शक्तियां अनंत हैं. तुम हमें धेनु, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से पूर्ण करो एवं परम व्योम में जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१६) पञ्चभिः पराङ्तपस्येकयार्वाङशस्तिमेषि सुदिने बाधमानस्तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१७) हे सूर्य! तुम अपनी पांच किरणों से ऊपर की ओर मुख करके तपते हो तथा अपनी एक किरण से नीचे की ओर मुख करके पृथ्वी पर तपते हो. पाला, बादल आदि से रहित दिन की याचना करने पर तुम अपनी किरण से पृथ्वी पर तपते हो. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी ही शक्तियां अनंत हैं. तुम गौ, अश्व आदि अनेक रूपों वाले पशुओं से हमें पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा है, उस में हमें स्थापित करो. (१७) त्वमिन्द्रस्त्वं महेन्द्रस्त्वं लोकस्त्वं प्रजापतिः. तुभ्यं यज्ञो वि तायते तुभ्यं जुह्वति जुह्वतस्तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१८) हे ऐश्वर्य शाली सूर्य! तुम स्वर्ग के स्वामी एवं महत्त्वपूर्ण गुण से युक्त हो. स्वर्ग आदि लोक तुम ही हो तथा तुम ही प्रजाओं के स्वामी हो. तुम्हारे लिए यज्ञ विस्तृत किए गए. (१८) असति सत् प्रतिष्ठितं सति भूतं प्रतिष्ठितम्. भूतं ह भव्य आहितं भव्यं भूते प्रतिष्ठितं तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (१९) यह दृश्यमान जगत् निराकार ब्रह्म में प्रतिष्ठित है. इस दृश्यमान जगत् में पृथ्वी आदि पांच तत्त्व प्रतिष्ठित हैं. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी ही शक्तियां अनेक प्रकार की हैं. तुम हमें गौ, अश्व आदि सभी रूप के पशुओं से पूर्ण करो तथा परम व्योम में जो सुधा स्थित है, उस में हमें स्थापित करो. (१९) ebook converter DEMO Watermarks*
शुक्रो ऽ सि भ्राजो ऽ सि. स यथा त्वं भ्राजता भ्राजो ऽ स्येवाहं भ्राजता भ्राज्यासम्.. (२०) हे सूर्य! तुम शुक्ल अर्थात् अत्यधिक उज्ज्वल हो तथा तुम दीप्तिशाली हो. तुम जिस प्रकार की ज्योति से पूर्ण रहते हो, मैं तुम्हारे उसी ज्योति पूर्ण भाव की उपासना करता हूं. (२०) रुचिरसि रोचो ऽ सि. स यथा त्वं रुच्या रोचो ऽ स्येवाहं पशुभिश्च ब्राह्मणवर्चसेन च रुचिषीय.. (२१) हे सूर्य! तुम दीप्ति रूप हो तथा दूसरों को दीप्ति वाला बनाते हो. तुम जिस प्रकार दीप्ति से दीप्ति मग्न हो, उसी प्रकार मैं पशुओं तथा ब्राह्मणोचित तेज से संपन्न बनूं. (२१) उद्यते नम उदयते नम उदिताय नमः. विराजे नमः स्वराजे नमःसम्राजे नमः.. (२२) हे सूर्य! उदय होते हुए तुम को नमस्कार है तथा उदय के पश्चात ऊपर उठते हुए तुम को नमस्कार है. हे विराट् रूप वाले सूर्य! तुम को नमस्कार है! स्वयं प्रकाशित होने वाले तुम को नमस्कार है. अतिशय रूप से प्रकाशित होने वाले तुम को नमस्कार है. (२२) अस्तंयते नमो ऽ स्तमेष्यते नमो ऽ स्तमिताय नमः. विराजे नमः स्वराजे नमः सम्राजे नमः.. (२३) अस्त होने वाले, अस्त हो रहे और अस्त हो चुके सूर्य देव को मेरा नमस्कार है. विशेष तेजवान को नमस्कार है, शोभनीय तेज वाले को नमस्कार है तथा उत्तम तेज वाले को नमस्कार है. (२३) उदगादयमादित्यो विश्वेन तपसा सह. सपत्नान् मह्यं रन्धयन् मा चाहं द्विषते रधं तवेद् विष्णो बहुधा वीर्याणि. त्वं नः पृणीहि पशुभिर्विश्वरूपैः सुधायां मा धेहि परमे व्योमन्.. (२४) यह सूर्य पूर्ण विश्व को संतप्त करने वाली किरणों के साथ उदय हुए हैं. ये मेरे शत्रुओं को मेरे वश में करते हैं तथा मुझे किसी शत्रु के वशीभूत नहीं बनाते. हे व्यापक सूर्य! तुम्हारी ही शक्तियां अनंत हैं. तुम मुझे गाय, भैंस आदि सभी पशुओं से पूर्ण करो और परम व्योम में जो सुधा है, उस में मुझे स्थित करो. (२४) आदित्य नावमारुक्षः शतारित्रां स्वस्तये. अहर्मत्यपीपरो रात्रिं सत्राति पारय.. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*
हे आदित्य अर्थात् अदिति पुत्र सूर्य! तुम रथ के लक्षणों वाली नाव पर सवार हो. वह नाव सौ डांडों वाली है. उस नाव पर तुम्हारे चढ़ने का प्रयोजन सभी का कल्याण है. इस प्रकार की नाव पर आरूढ़ तुम मुझे अनेक आध्यात्मिक, अधिभौतिक तथा अधिदैविक विविध बाधाओं से पार कर के रात्रि और दिन के मध्य मार्गों के पार पहुंचाओ. (२५) सूर्य नावमारुक्षः शतारित्रां स्वस्तये. रात्रिं मात्मपीपरो ऽ हः सत्राति पारय.. (२६) सूर्य देव सब के कल्याण के लिए सौ डांडों वाली नाव पर सवार होते हैं. यह नाव रथ के लक्षणों वाली है. हे सूर्य! रात्रि में मुझे कोई बाधा न पहुंचाए तथा दिन के तीनों सत्रों अर्थात् प्रातः, मध्याह्न और संध्या से मुझे पार करो. (२६) प्रजापतेरावृतो ब्रह्मणा वर्मणाहं कश्यपस्य ज्योतिषा वर्चसा च. जरदष्टिः कृतवीर्यो विहायाः सहस्रायुः सुकृतश्रयेयम्.. (२७) वर्षा आदि के द्वारा प्रजाओं का पालन करने से सूर्य प्रजापति हैं. मैं प्रजापति सूर्य के कवच से तथा कश्यप ऋषि की ज्योति और तेज से घिरा हुआ हूं, सुरक्षित हूं. मैं जीर्ण अर्थात् वृद्ध हो कर भी दृढ़ अंगों वाला हूं तथा अनेक प्रकार के भोगों को भोगता हूं. मैं दीर्घ आयु प्राप्त करता हुआ तथा लौकिक और वेदों का कार्य करता हुआ सूर्य देव की कृपा का पात्र रहूं. (२७) परीवृतो ब्रह्मणा वर्मणाहं कश्यपस्य ज्योतिषा वर्चसा च. मा मा प्रापन्निषवो दैव्य या मा मानुषीरवसृष्टा वधाय.. (२८) मैं कश्यप रूपी सूर्य के मंत्र रूपी कवच से ढका हुआ हूं तथा सत्य और रक्षा करने वाली किरणों से आच्छादित हूं. इसलिए मनुष्य और देवता मेरी हिंसा करने के लिए जिन आयुधों का प्रयोग करते हैं, वे मुझे प्रभावित नहीं कर सकेंगे. (२८) ऋतेन गुप्त ऋतुभिश्च सर्वैभूतेन गुप्तो भव्येन चाहम्. मा मा प्राप्त पाप्मा मोत मृत्युरन्तर्दधे ऽ हं सलिलेन वाचः.. (२९) सत्य, सूर्यरूपी ब्रह्म और सभी ऋतुएं मेरी रक्षा कर रही हैं. इस कारण पाप मेरे समीप नहीं आ सकता जो नरक में निवास का कारण बनता है, मैं उसी प्रकार अदृश्य रहता हूं, जिस प्रकार अभिमंत्रित जल में छिपे प्राणी किसी को दिखाई नहीं देते. मैं पापों से सुरक्षित होने के लिए अपनेआप को अभिमंत्रित और पवित्र करता हूं. (२९) अग्निर्मा गोप्ता परि पातु विश्वत उद्यन्सूर्यो नुदतां मृत्युपाशान्. व्युच्छन्तीरुषसः पर्वता ध्रुवाः सहस्रं प्राणा मय्या यतन्ताम्.. (३०) अपने आश्रितों के रक्षक अग्नि देव मेरी रक्षा करें. उदय होते हुए सूर्य मृत्यु के पाशों से ebook converter DEMO Watermarks*