अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
सूक्त-६ देवता—ब्रह्मणस्पति
सूक्त-६ देवता—ब्रह्मणस्पति यो ३ स्मान् ब्रह्मणस्पते ऽ देवो अभिमन्यते. सर्वं तं रन्धयासि मे यजमानाय सुन्वते.. (१) हे ब्रह्मणस्पति देव! जो देव विरोधी शत्रु हमें वध करने योग्य मानता है, उस को सोम रस निचोड़ने वाले मुझ यजमान के वश में करो. (१) यो नः सोम सुशंसिनो दुःशंस आदिदेशति. वज्रेणास्य मुखे जहि स संपिष्टो अपायति.. (२) हे सोम! दुर्वचन बोलने वाला जो शत्रु हमें बाधा पहुंचाता है और अपने कठोर वचनों से हमारा पराभव करता है, उस के मुख पर वज्र का प्रहार करो. वह शत्रु वज्र के आघात से छिन्नभिन्न हो कर भाग जाए. (२) यो नः सोमाभिदासति सनाभिर्यश्च निष्ट्यः. अप तस्य बलं तिर महीव द्यौर्वधत्मना.. (३) हे सोम! हमारा जो संबंधी हमारा अभिभव करना चाहता है तथा जो निकृष्ट शत्रु हमें बाधा पहुंचाता है, तुम उस को उसी प्रकार नष्ट कर दो, जिस प्रकार द्युलोक वज्र के द्वारा विनाश करता है. (३) सूक्त-७ देवता—सोम येन सोमादितिः पथा मित्रा वा यन्त्यद्रुहः. तेना नो ऽ वसा गहि.. (१) हे सोम! जिस मार्ग से, अदिति मित्र एवं उस के बारह पुत्र अनुग्रह करते हुए सरंचना करते हैं, उसी मार्ग से हमारा कल्याण करते हुए आओ. (१) येन सोम साहन्त्यासुरान् रन्धयासि नः. तेना नो अधि वोचत.. (२) हे सोम! जिस बल के द्वारा तुम हमारे शक्तिशाली शत्रुओं का विनाश करते हो, उसी शक्ति के द्वारा हमें आशीर्वाद वचन सुनाओ. (२) येन देवा असुराणामोजांस्यवृणीध्वम्. तेना नः शर्म यच्छत.. (३) हे देवो! तुम अपने जिस बल से शत्रुओं की शक्ति अपने में मिला लेते हो, उसी बल के द्वारा हमारे लिए सुख प्रदान करो. (३) सूक्त-८ देवता—कामात्मा ebook converter DEMO Watermarks*
यथा वृक्षं लिबुजा समन्तं परिषस्वजे. एवा परि ष्वजस्व मां यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः.. (१) हे पत्नी! जिस प्रकार लता चारों ओर से वृक्ष को लपेटती है, उसी प्रकार तू मेरा आलिंगन कर. जिस प्रकार तू मेरी कामना करती हुई मेरे समीप से कहीं न जाए, उसी प्रकार मैं तुझे अपने वश में करता हूं. (१) यथा सुपर्णः प्रपतन् पक्षौ निहन्ति भूम्याम्. एवा नि हन्मि ते मनो यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः.. (२) हे कामिनी! जिस प्रकार गरुड़ अपने निवास स्थान से उड़ता हुआ धरती पर अपने दोनों पंखों को पटकता है, उसी प्रकार मैं तेरे हृदय को पीड़ित करता हूं. जिस प्रकार तू मेरी कामना करती हुई मेरे समीप से कहीं न जाए, उसी प्रकार मैं तुझे अपने वश में करता हूं. (२) यथेमे द्यावापृथिवी सद्यः पर्येति सूर्यः. एवा पर्येमि ते मनो यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः.. (३) हे नारी! सब का प्रेरक सूर्य जिस प्रकार इस आकाश और धरती को शीघ्र व्याप्त कर लेता है, उसी प्रकार मैं तेरे मन को व्याप्त करूंगा. जिस प्रकार तू मेरी कामना करती हुई मेरे समीप से कहीं न जाए, उसी प्रकार मैं तुझे अपने वश में करता हूं. (३) सूक्त-९ देवता—कामात्मा वाञ्छ मे तन्वं १ पादौ वाञ्छाक्ष्यौ ३ वाञ्छ सक्थ्यौ. अक्ष्यौ वृषण्यन्त्याः केशा मां ते कामेन शुष्यन्तु.. (१) हे कामिनी! तू मेरे शरीर, पैरों, नेत्रों और जंघाओं की कामना कर. तू ऐसे पुरुष की कामना करती है, जो तुझे संतुष्ट कर सके. तेरी सुंदर आंखें और केश मेरे मन को व्याकुल करते हैं. (१) मम त्वा दोषणिश्लिषं कृणोमि हृदयश्लिषम्. यथा मम क्रतावसो मम चित्तमुपायसि.. (२) हे पत्नी! मैं तुझे अपनी बांहों और हृदय में आश्रय लेने वाली बनाता हूं. इस प्रकार तू मेरे संकल्प के अधीन होगी और मेरे चित्त को प्राप्त करेगी. (२) यासां नाभिरारेहणं हृदि संवननं कृतम्. गावो घृतस्य मातरो ऽ मूं सं वानयन्तु मे.. (३) जिन के अंग आनंद प्राप्ति के साधन होते हैं और जिन के हृदय में विधाता ने वशीकरण ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-१० देवता—अग्नि, वायु
की शक्ति प्रदान की है; घी, दूध देने वाली गाएं मेरे ऐसे अधिकार में रहें. (३) सूक्त-१० देवता—अग्नि, वायु पृथिव्यै श्रोत्राय वनस्पतिभ्यो ऽग्नये ऽ धिपतये स्वाहा.. (१) पृथ्वी के लिए, शब्द सुनने के साधन कान के लिए, भूमि पर स्थित वृक्षों के अधिष्ठाता देवों के लिए तथा धरती के स्वामी अग्नि के लिए हव्य शोभन आहुति वाला हो. (१) प्राणायान्तरिक्षाय वयोभ्यो वायवे ऽ धिपतये स्वाहा.. (२) वायु रूप प्राण के लिए, वायु से संबंधित अंतरिक्ष के लिए, पक्षियों के लिए तथा वायु के अधिपति देवता के लिए यह हव्य शोभन आहुति वाला हो. (२) दिवे चक्षुषे नक्षत्रेभ्यः सूर्यायाधिपतये स्वाहा.. (३) आकाश के लिए, नेत्र के लिए, नक्षत्र के लिए तथा द्युलोक के अधिपति सूर्य के लिए यह हव्य शोभन आहुति वाला हो. (३) सूक्त-११ देवता—वीर्य शमीमश्वत्थ आरूढस्तत्र पुंसुवनं कृतम्. तद् वै पुत्रस्य वेदनं तत् स्त्रीष्वा भरामसि.. (१) शमी वृक्ष स्त्री है और अश्वत्थ अर्थात् पीपल का वृक्ष पुरुष है. अग्निरूप पुत्र उत्पन्न करने के लिए वह शमी वृक्ष पर आरूढ़ है. उसी पीपल वृक्ष से अरणियां बनाई जाती हैं, जो अग्नि उत्पादन के काम आती हैं. इस प्रकार के अश्वत्थ पर पुंसवन किया गया है. वह पुंसवन अर्थात् पुत्र प्राप्ति कर्म हम स्त्रियों में करते हैं. (१) पुंसि वै रेतो भवति तत् स्त्रियामनु षिच्यते. तद् वै पुत्रस्य वेदनं तत् प्रजापतिरब्रवीत्.. (२) पुरुषमय बीजरूप वीर्य होता है. वह गर्भाधान कर्म के द्वारा नारी के गर्भाशय में डाला जाता है. वही पुत्र प्राप्ति का साधन बनता है. यह पुंसवन कर्म प्रजापति ने बताया है. (२) प्रजापतिरनुमतिः सिनीवाल्य चीक्लृपत्. स्त्रैषूयमन्यत्र दधत् पुमांसमु दधदिह.. (३) प्रजापति ने, अमावस्या की देवी सिनीवाली ने और पूर्णमासी के देवता ने गर्भाशय में स्थित वीर्य के अंश से हाथ, पैर आदि की रचना की है. उन्होंने स्त्री के प्रसव संबंधी निमित्त ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-१२ देवता—विष निवारण
अर्थात् गर्भ को हम से पृथक् अर्थात् नारी में पुत्र रूपी संतान को एक वर्ष के पश्चात जन्म लेने योग्य बनाया. (३) सूक्त-१२ देवता—विष निवारण परि द्यामिव सूर्यो ऽ हीनां जनिमागमम्. रात्री जगदिवान्यूर्द्धसात् तेना ते वायरॆ विषम्.. (१) जिस प्रकार सूर्य अंतरिक्ष में व्याप्त होता है, उसी प्रकार मैं सर्पों के जन्म को जानता हूं. जिस प्रकार रात्रि अपने अंधकार से सारे संसार को व्याप्त कर लेती है, उसी प्रकार शरीर में व्याप्त विष को मैं ओषधि से दूर करता हूं. (१) यद् ब्रह्माभिर्यदृषिभिर्यद् देवैर्विदितं पुरा. यद् भूतं भव्यमासन्वत् तेना ते वायरॆ विषम्.. (२) जिस ओषधि को प्राचीन काल में मंत्रों ने, अगस्त्य, वसिष्ठ आदि ऋषियों तथा इंद्र आदि देवों ने जाना है, उन भूत, वर्तमान और भविष्यकाल की ओषधियों से मैं तेरे शरीर में स्थित विष का निवारण करता हूं. (२) मध्वा पृञ्चे नद्य १: पर्वता गिरयो मधु. मधु परुष्णी शीपाला शमास्ने अस्तु शं हृदे.. (३) गंगा आदि नदियां, हिमालय आदि विशाल पर्वत और छोटे पर्वत तेरे शरीर में विष नाशक अमृत सींचें. शैवाल से युक्त परुष्णी नाम की नदी तेरे शरीर पर अमृत चुपड़े. यह विषनाशक अमृत तेरे और मेरे हृदय के लिए सुखकारी हो. (३) सूक्त-१३ देवता—मृत्यु नमो देववधेभ्यो नमो राजवधेभ्यः. अथो ये विश्यानां वधास्तेभ्यो मृत्यो नमो ऽ स्तु ते.. (१) इंद्र आदि के हनन साधन वज्र आदि को नमस्कार है, जिस से वे हमारा त्याग कर दें. राजा से संबंधित आयुधों को नमस्कार है. हे मृत्यु! वैश्य जातियों के वध के जो साधन हैं, उन से बचाने के लिए हम तुझे नमस्कार करते हैं. (१) नमस्ते अधिवाकाय परावाकाय ते नमः. सुमत्यै मृत्यो ते नमो दुर्मत्यै त इदं नमः.. (२) हे मृत्यु! तेरा पक्षपात कर के वचन बोलने वाले दूत को तथा पराभव का वर्णन करने वाले के लिए नमस्कार है. हे मृत्यु! तेरी अनुग्रहकारिणी बुद्धि के लिए एवं निग्रह करने वाली ebook converter DEMO Watermarks*
दुर्बुद्धि के लिए नमस्कार है. (२) नमस्ते यातुधानेभ्यो नमस्ते भेषजेभ्य:. नमस्ते मृत्यो मूलेभ्यो ब्राह्मणेभ्य इदं नम:.. (३) हे मृत्यु! तुझ से संबंधित राक्षसों को नमस्कार है, जो लोगों को पीड़ा पहुंचाते हैं. तुझ से रक्षा करने वाली ओषधियों को नमस्कार है. तुझ से संबंधित मूल पुरुषों तथा शापानुग्रह समर्थ ब्राह्मणों के लिए नमस्कार है. (३) सूक्त-१४ देवता—बलास अस्थिस्रंसं परुस्रंसमास्थितं हृदयामयम्. बलासं सर्वं नाशयाङ्गेष्ठा यश्च पर्वसु.. (१) मंत्र की शक्ति से हड्डियों को कंपित करने वाले, शरीर के जोड़ों को ढीला करने वाले तथा सारे शरीर में व्याप्त श्लेष्मा द्वारा किए हुए हृदय रोग की शक्ति का विनाश करे. वह रोग खांसी और सांस से संबंधित है. (१) निर्बलासं बलासिनः क्षिणोमि पुष्करं यथा. छिनद्म्यस्य बन्धनं मूलमुर्वार्व्वा इव.. (२) जिस प्रकार सरोवर से कमल उखाड़ा जाता है, उसी प्रकार मैं इस रोगी पुरुष के श्लेष्मा रोग को जड़ से नष्ट करता हूं. जिस प्रकार पकी हुई ककड़ी अपने नाल से अपनेआप अलग हो जाती है, उसी प्रकार मैं इस रोगी के श्लेष्मा रोग का बंधन तोड़ता हूं. (२) निर्बलासेतः प्र पताशुङ्गः शिशूको यथा. अथो इट इव हायनो ऽ प द्राह्यवीरहा.. (३) हे श्लेष्मा रोग! जिस प्रकार भागा हुआ शुंशुकि हरिण दूर चला जाता है तथा गया हुआ संवत्सर फिर वापस नहीं आया, उसी प्रकार हमारे वीरों के विनाशकारी तू इस रोगी को छोड़ कर बुरी दिशा में चला जा. (३) सूक्त-१५ देवता—वनस्पति उत्तमो अस्योषधीनां तव वृक्षा उपस्तयः. उपस्तिरस्तु सो ३ स्माकं यो अस्मां अभिदासति.. (१) हे सोमपर्ण से उत्पन्न पलाश वृक्ष! तू वनस्पतियों में उत्तम है. सभी वृक्ष तेरे उपासक अर्थात् तुझ से निम्न स्थिति वाले हैं. तेरी कृपा से हमारा वह शत्रु हमारा उपासक बने जो हमें नष्ट करना चाहता है. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
सबन्धुश्चासबन्धुश्च यो अस्माँ अभिदासति. तेषां सा वृक्षाणामिवाहं भूयासमुत्तमः.. (२) हमारे गोत्र वाला अथवा हमारे गोत्र से भिन्न जो शत्रु हमें क्षीण करना चाहता है, उन सब में मैं उसी प्रकार उत्तम बनूं, जिस प्रकार तू सभी वृक्षों में श्रेष्ठ है. (२) यथा सोम ओषधीनामुत्तमो हविषां कृतः. तलाशा वृक्षाणामिवाहं भूयासमुत्तमः.. (३) जिस प्रकार पुरोडाश के प्रयोग के लिए सोमलता सभी लताओं और वनस्पतियों में श्रेष्ठ मानी जाती है, उसी प्रकार मैं अपने गोत्र वालों में श्रेष्ठ बनूं. (३) सूक्त-१६ देवता—मंत्र में उक्त आबयो अनाबयो रसस्त उग्र आबयो. आ ते करम्भमद्मसि.. (१) हे रोग निवृत्ति के लिए खाई जाने वाली सरसों एवं न खाए जाने वाले सरसों के तने! तेरा रस अर्थात् तेल रोग निवारण में सक्षम है. हे सरसों! हम तेरा करम्भ (साग) मंत्रों से युक्त कर के खाते हैं. (१) विहह्लो नाम ते पिता मदावती नाम ते माता. स हि न त्वमसि यस्त्वमात्मानमावयः.. (२) हे सरसों के साग! तेरा पिता विहह्वल तथा माता मदावती नाम की है. तू अपना साग मनुष्यों को खाने के लिए दे देती है, इसलिए तू अपने मातापिता के समान नहीं रहती. (२) तौविलिके ऽ वेलयावायमैलब ऐलयीत्. बभ्रुश्च बभ्रुकर्णश्चापेहि निराल.. (३) हे तौविलिक नाम की पिशाची! तू रोगों का कारण है. तू हमारे रोग को पराजित कर के लौटा दे. तेरे द्वारा होने वाला ऐलय नाम का नेत्र रोग दूर चला जाए. हे बभ्रु, बभ्रुवर्ण तथा निराल नामक रोग! तुम इस पुरुष के शरीर से भाग जाओ. (३) अलसालासि पूर्वा सिलाञ्जालास्युत्तरा. नीलागलसाला.. (४) पौधों की मंजरी अलसाला प्रथम उत्पन्न होने के कारण पूर्व है और बाद में उत्पन्न होने के कारण सिलांजाला उत्तरा है. नीलागलसाला इन के मध्य वाली है. (४) सूक्त-१७ देवता—गर्भ बृंहण ebook converter DEMO Watermarks*
यथेयं पृथिवी मही भूतानां गर्भमादधे. एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतं सवितवे.. (१) हे नारी! जिस प्रकार विशाल पृथ्वी प्राणियों के शरीर को धारण करती है, उसी प्रकार तेरा गर्भ भी प्रसव के समय जन्म लेने के लिए स्थित रहे. (१) यथेयं पृथिवी मही दाधारेमान् वनस्पतीन्. एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतं सवितवे.. (२) यह विशाल पृथ्वी जिस प्रकार वृक्षों को धारण करती है, उसी प्रकार तेरा गर्भ भी प्रसव के समय जन्म लेने के हेतु स्थित रहे. (२) यथेयं पृथिवी मही दाधार पर्वतान् गिरीन्. एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतं सवितवे.. (३) हे नारी! जिस प्रकार यह विशाल पृथ्वी पर्वतों को धारण करती है, उसी प्रकार तेरा गर्भ भी प्रसव के समय जन्म लेने के लिए स्थित रहे. (३) यथेयं पृथिवी मही दाधार विष्ठितं जगत्. एवा ते ध्रियतां गर्भो अनु सूतं सवितवे.. (४) हे नारी! यह विशाल पृथ्वी जिस प्रकार चराचर जगत् को धारण करती है. उसी प्रकार तेरा गर्भ भी प्रसव के समय जन्म लेने के लिए स्थित रहे. (४) सूक्त-१८ देवता—ईर्ष्या विनाशन ईर्ष्याया ध्राजिं प्रथमां प्रथमस्या उतापराम्. अग्निं हृदयं १ शोकं तं ते निर्वापयामसि.. (१) हे ईर्ष्या करने वाले पुरुष! तेरी ईर्ष्यापूर्ण मति यह है कि इस स्त्री को कोई देख न ले. इस मति को शांत करते हुए हम तेरे हृदय विदारक शोक एवं क्रोध को शांत करते हैं. (१) यथा भूमिर्मृतमना मृतान्मृतमनस्तरा. यथोत मम्रुषो मन एवेष्योर्मृतं मनः.. (२) सब प्राणियों से अधिष्ठित पृथ्वी शांत मन वाली और सब के शरीर से भी उदात्त मन वाली होती है. जिस प्रकार मृत पुरुष का मन ईर्ष्या रहित होता है, उसी प्रकार स्त्री विषयक ईर्ष्यायुक्त पुरुष का मन भी शांत हो जाए. (२) अदो यत् ते हृदि श्रितं मनस्कं पतयिष्णुकम्. ebook converter DEMO Watermarks*
ततस्त ईर्ष्यां मुञ्चामि निरूष्माणं दृतेरिव.. (३) हे ईर्ष्याग्रस्त पुरुष! लोहार जिस प्रकार भस्त्रा अर्थात् धौंकनी से सांस बाहर निकालता है, वैसे ही मैं तेरे हृदय से ईर्ष्या दूर करता हूं. (३) सूक्त-१९ देवता—मंत्र में उक्त पुनन्तु मा देवजनाः पुनन्तु मनवो धिया. पुनन्तु विश्वा भूतानि पवमानः पुनातु मा.. (१) देवगण मुझे पवित्र करें. मनुष्य मुझे बुद्धि अथवा कर्म के द्वारा पवित्र करें. सभी प्राणी मुझे पवित्र करें और अंतरिक्ष में विचरण करने वाली वायु मुझे पवित्र करे. (१) पवमानः पुनातु मा क्रत्वे दक्षाय जीवसे. अथो अरिष्टतातये.. (२) निचोड़ा जाता हुआ सोम मुझे यज्ञ कर्म के लिए, बल प्राप्ति के लिए, जीवन के लिए तथा अहिंसा करने के लिए पवित्र करे. (२) उभाभ्यां देव सवितः पवित्रेण सवेन च. अस्मान् पुनीहि चक्षसे.. (३) हे सब के प्रेरक सविता देव! तुम्हारा तेज पवित्र करने का साधन है. अपने तेज और प्रेरणा से हमें इहलोक और परलोक के सुख के साधन यज्ञ के लिए शुद्ध करो. (३) सूक्त-२० देवता—यक्ष्मा नाशक अग्नेरिवास्य दहत एति शुष्मिण उतेव मत्तो विलपन्नपायति. अन्यमस्मदिच्छतु कं चिद्व्रतस्तपुर्वधाय नमो अस्तु तक्मने.. (१) गीले और सूखे सब को जलाने वाली दावाग्नि के समान अंगों को जलाने वाले इस ज्वर का दाह सारे शरीर में व्याप्त है. उस समय व्यक्ति उन्मत्त के समान विलाप करता हुआ इस लोक से चला जाता है. इस प्रकार का प्रबल पित्त ज्वर हमें त्याग कर किसी चरित्रहीन पुरुष के पास चला जाए. (१) नमो रुद्राय नमो अस्तु तक्मने नमो राज्ञे वरुणाय त्विषीमते. नमो दिवे नमः पृथिव्यै नम ओषधीभ्यः.. (२) ज्वर के अभिमानी देव रुद्र के लिए नमस्कार है. ज्वर के लिए नमस्कार है. दीप्तिशाली एवं स्वामी वरुण के लिए नमस्कार है. द्युलोक तथा पृथ्वी के लिए नमस्कार है. पृथ्वी पर उत्पन्न ओषधियों को नमस्कार है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
अयम् यो अभिशोचयिष्णुर्विश्वा रूपाणि हरिता कृणोषि. तस्मै ते ऽरुणाय बभ्रवे नमः कृणोमि वन्द्याय तक्मने.. (३) सभी ओर से पूरे शरीर को शोकयुक्त करता हुआ, जो यह पित्त ज्वर है, वह सभी प्राणियों का रक्त दूषित कर के उन्हें हल्दी के समान पीला बना देता है. उस रक्त वर्ण एवं पीत वर्ण तथा सेवा करने योग्य ज्वर को नमस्कार है. (३) सूक्त-२१ देवता—चंद्रमा इमा यास्तिस्रः पृथिवीस्तासां ह भूमिरुत्तमा. तासामधि त्वचो अहं भेषजं समु जग्रभम्.. (१) ये जो पृथ्वी आदि तीन लोक हैं, उन में यह पृथ्वी उत्तम है, जिस पर हम स्थित हैं. पृथ्वी की त्वचा के समान ऊपर वर्तमान जो भूमि है, मैं उस पर उत्पन्न ओषधियों का संग्रह करता हूं. (१) श्रेष्ठमसि भेषजानां वसिष्ठं वीरुधानाम्. सोमो भग इव यामेषु देवेषु वरुणो यथा.. (२) हे हरिद्रा! तू अमोघ शक्ति के कारण अन्य भेषजों में उसी प्रकार प्रशंसनीय है तथा वीरुधों में मुख्य है, जैसे रात्रि और दिन के काल विभाग के कारण चंद्रमा एवं सूर्य मुख्य हैं. (२) रेवतीरनाधृषः सिषासवः सिषासथ. उत स्थ केशदृंहणीरथो ह केशवर्धनीः.. (३) हे धनवती ओषधियो! तुम किसी के द्वारा हिंसित नहीं हो. तुम आरोग्य देने के लिए इच्छुक हो, इसलिए मुझे आरोग्य प्रदान करो. तुम केशों को दृढ़ बनाने वाली हो, इसलिए मेरे केशों को दृढ़ करो. (३) सूक्त-२२ देवता—आदित्य रश्मि, मरुत् कृष्णं नियानं हरयः सुपर्णा अपो वसाना दिवमुत् पतन्ति. त आववृत्रन्त्सदनादृतस्यादिद् घृतेन पृथिवीं व्यू दुः.. (१) कृष्ण वर्ण अंतरिक्ष को पा कर सूर्य की किरणें पृथ्वी के पदार्थों का रस ग्रहण करती हुई द्युलोक में पहुंच जाती हैं. वे सूर्य किरणें जल को सूर्य मंडल से वृष्टि के रूप में लाती हैं और बाद में धरती को जल से गीला कर देती हैं. (१) पयस्वतीः कृणुथाप ओषधीः शिवा यदेजथा मरुतो रुक्मवक्षसः. ebook converter DEMO Watermarks*
ऊर्जां च तत्र सुमतिं च पिन्वत यत्रा नरो मरुतः सिञ्चथा मधु.. (२) हे मरुद्गण! स्वर्ण से बने आभूषण वक्ष स्थल पर धारण कर के तुम जब चलते हो तो जलों को रसमय और ओषधियों को सुखकारी बनाते हो. हे नेता मरुद्गण! तुम जहां पर वर्षा का जल गिराते हो, उस देश में बल कारक अन्न और बुद्धियुक्त प्रजा का पोषण करो. (२) उदप्रुतो मरुतस्ताँ इयर्त वृष्ट्या विश्वा निवतस्पृणाति. एजाति ग्लहा कन्येव तुन्नैरुं तुन्दाना पत्येव जाया.. (३) हे मरुद्गण! तुम जल बरसाने वाले उन मेघों को प्रेरित करो, जिन से संबंधित वर्षा सभी फसलों को और सरिताओं को पुष्ट करती है. जिस प्रकार दरिद्र मातापिता अपनी कन्या को देख कर दुःखी होते हैं, मेघ उसी प्रकार अपनी गर्जना से लोगों को भयभीत और कंपित करते हैं. पत्नी जिस प्रकार पति से बातचीत करती हुई उसे अन्न आदि प्रदान करती है, मेघ गर्जन रूपी वाणी उसी प्रकार गमनशील मेघ से बात करती है. (३) सूक्त-२३ देवता—जल सस्रुषीस्तदपसो दिवा नक्तं च सस्रुषीः. वरेण्यक्रतुरहमपो देवीरुप ह्वये.. (१) उत्तम कर्म करने वाला मैं सभी प्राणियों के जीवन का रूप प्राप्त करने वाले, जगत् के रक्षक एवं सदैव बहने वाले जलों को अपने समीप बुलाता हूं. (१) ओता आपः कर्मण्या मुञ्चन्वित्त्वितः प्रणीतये. सद्य कृण्वन्त्वेतवे.. (२) सदैव बहने वाले, लौकिक और वैदिक कर्मों के साधन जल हमें उत्तम फल शीघ्र पाने के लिए सभी पापों से बचाएं. (२) देवस्य सवितुः सवे कर्म कृण्वन्तु मानुषाः. शं नो भवन्त्वप ओषधीः शिवाः.. (३) प्रकाशित होने वाले एवं सब के प्रेरक सूर्य की प्रेरणा होने पर मनुष्य लौकिक और वैदिक कर्म करे. जल हमारे लिए कल्याणकारी हों और ओषधियां हमारे पापों को शांत करें. (३) सूक्त-२४ देवता—जल हिमवतः प्रस्रवन्ति सिन्धौ समह संगमः. आपो ह मह्यं तद् देवीर्ददन् हृद्द्योतभेषजम्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
पाप नाशक गंगा आदि नदियों का जल हिमालय से निकलता है और सागर में मिलता है. इस प्रकार का दिव्य जल हृदय की जलन मिटाने वाली ओषधियां प्रदान करे. (१) यन्मे अक्ष्योराद्योत पाष्ण्योः प्रपदोश्च यत्. आपस्तत् सर्व निष्करन् भिषजां सुभिषक्तमाः.. (२) जो रोग मेरी आंखों को व्यथित करते हैं, जो मेरे घुटनों और जांघों में आश्रय लेते हैं, व्याधि विनाशकों में कुशल दिव्य जल उन सब को नष्ट करें. (२) सिन्धुपत्नीः सिन्धुराज्ञीः सर्वा या नद्य १ स्थन. दत्त नस्तस्य भेषजं तेना वो भुनजामहै.. (३) हे जलो! सागर तुम्हारा पति है और तुम सागर रूपी राजा की पत्नियां हो. तुम सब नदी रूप हो जाओ. तुम सब मुझे उस रोग को दूर करने की ओषधि दो, जिस से मैं निरोग हो सकूं. (३) सूक्त-२५ देवता—गंडमालाविनाशन पञ्च च याः पञ्चाशच्च संयन्ति मन्या अभि. इतस्ताः सर्वा नश्यन्तु वाका अपचितामिव.. (१) गले के ऊपरी भाग में स्थित पचपन प्रकार की गंड मालाएं गले के ऊपरी भाग की धमनियों को व्याप्त करती हैं. वे सब इस प्रकार नष्ट हो जाएं, जिस प्रकार पतिव्रता को पा कर सभी दोष नष्ट हो जाते हैं. (१) सप्त च याः सप्ततिश्च संयन्ति ग्रैव्या अभि. इतस्ताः सर्वा नश्यन्तु वाका अपचितामिव.. (२) गरदन की नसों में स्थित सतहत्तर प्रकार की गंडमालाएं गरदन की धमनियों को व्याप्त करती हैं. वे सब इस प्रकार नष्ट हो जाएं, जिस प्रकार पतिव्रता को पा कर सभी दोष नष्ट हो जाते हैं. (२) नव च या नवतिश्च संयन्ति स्कन्ध्या अभि. इतस्ताः सर्वा नश्यन्तु वाका अपचितामिव.. (३) कंधों की नसों में स्थित निन्यानवे प्रकार की गंडमालाएं कंधों की धमनियों को व्याप्त करती हैं. वे सब इस प्रकार नष्ट हो जाएं, जिस प्रकार पतिव्रता को पा कर सभी दोष नष्ट हो जाते हैं. (३) सूक्त-२६ देवता—पाप्मा ebook converter DEMO Watermarks*
अव मा पाप्मन्त्सृज वशी सन् मृडयासि नः. आ मा भद्रस्य लोके पाप्मन् धेह्यविह्रतम्.. (१) हे पाप के अभिमानी देव! मुझे छोड़ दो. तुम सब को वश में करने वाले हो. तुम मुझे सुख दो. हे पाप्मा! पीड़ारहित मुझ को पुण्य के फल के रूप में प्राप्त होने वाले लोक में स्थापित करो. (१) यो नः पाप्मन् न जहासि तमु त्वा जाहिमो वयम्. पथामनु व्यावर्तनेऽन्यं पाप्मानु पद्यताम्.. (२) हे पाप्मा! यदि मुझे नहीं छोड़ोगे तो मैं इस अनुष्ठान द्वारा तुम्हें बलपूर्वक चार मार्गों के संगम रूप चौराहे पर छोडूंगा. वहां छोड़ा हुआ पाप हमारे शत्रुओं में प्रवेश करे. (२) अन्यत्रास्मन्न्युच्यतु सहस्राक्षो अमर्त्यः. यं द्वेषाम तमृच्छतु यमु द्विष्मस्तमिज्जहि.. (३) इंद्र के समान अमर रहने वाला एवं बली पाप उसी को प्राप्त हो, जिस से हम द्वेष करते हैं. हे पाप! जो हमारा शत्रु है, तू उसी के पास जा. (३) सूक्त-२७ देवता—यम देवाः कपोत इषितो यदिच्छन् दूतो निर्ऋत्या इदमाजगाम. तस्मा अर्चाम कृणवाम निष्कृतिं शं नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे.. (१) हे देवो! पाप देवता द्वारा भेजा गया दूत कबूतर हम को पीड़ित करने की इच्छा करता हुआ हमारे घर आया है. उसे लौटाने के लिए हम हवि के द्वारा तुम्हारी अर्चना करते हैं. हमारे दुपायों अर्थात् उत्तराधिकारियों और चौपायों अर्थात् पशुओं का कल्याण हो. (१) शिवः कपोत इषितो नो अस्त्वनागा देवाः शकुनो गृहं नः. अग्निर्हिं विप्रो जुषतां हविर्नः परि हेतिः पक्षिणी नो वृणक्तु.. (२) हे देवो! पाप देवता द्वारा भेजा हुआ कबूतर हमारे लिए सुखकारी हो तथा घरों को पीड़ित न करे, क्योंकि यह अनपराधक है. इस के लिए मेधावी अग्नि हमारे हवि को स्वीकार करें. उस की कृपा से पंखों वाला कबूतर नाम का आयुध हमें छोड़ दे. (२) हेतिः पक्षिणी न दभात्यस्मानाष्ट्री पदं कृणुते अग्निधाने. शिवो गोभ्य उत पुरुषेभ्यो नो अस्तु मा नो देवा इह हिंसीत् कपोतः.. (३) पंखों वाला आयुध अर्थात् कबूतर हमें न मारे. वह दावाग्नि से व्याप्त वन में चला जाए. हे देवो! वह कबूतर हमारी गायों और पुरुषों को सुख देने वाला हो. वह कबूतर हमारी हिंसा ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त-२८ देवता—यम
न करे. (३) सूक्त-२८ देवता—यम ऋचा कपोतं नुदत प्रणोदमिषं मदन्तः परि गां नयामः. संलोभयन्तो दुरिता पदानि हित्वा न ऊर्जं प्र पदात् पथिष्ठः.. (१) हे देवो! इस मंत्र के द्वारा कबूतर को हमारे घर से दूर जाने के लिए प्रेरित करो. हम अन्न को पा कर तृप्त होते हुए धरती पर गायों को सभी ओर चराएं. हम कबूतर के पंजों के चिह्नों को भली प्रकार धोएं और वह कबूतर हमारी पाकशाला के अन्न को त्याग कर पक्षियों में श्रेष्ठ हो तथा उड़ जाए. (१) परीमे ३ ग्निमर्षत परीमे गामनेषत. देवेष्वक्रत श्रवः क इमां आ दधर्षति.. (२) हे ऋत्विज्! लोग कबूतर के प्रवेश के दोष की शांति के लिए अग्नि को मेरे घर में ले आए हैं और घर में गाय को सभी ओर घुमा रहे हैं. इन्होंने अग्नि आदि देवों को हवि रूप में अर्पित किया है. अब हमारे पुरुषों को कौन पराजित कर सकता है. (२) यः प्रथमः प्रवतमाससाद बहुभ्यः पन्थामनुपस्पशानः. यो ३ स्येशे द्विपदो यश्चतुष्पदस्तस्मै यमाय नमो अस्तु मृत्यवे.. (३) यह आज मरने योग्य है, यह कल मरने योग्य है, इस प्रकार की गणना करते हुए देवों में मुख्य यमराज ने उत्तम मार्ग प्राप्त किया है. वे यम इस यजमान के दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं. मृत्यु को प्रेरित करने वाले उन यम को नमस्कार है. (३) सूक्त-२९ देवता—यम अमून् हेतिः पतत्रिणी न्येकतु यदुलूको वदति मोघमेतत्. यद् वा कपोतः पदमग्नौ कृणोति.. (१) यह पंखों वाला आयुध हमारे दूरस्थ शत्रुओं के पास जाए. यह उल्लू जो कहता है, वह असत्य हो. कबूतर ने अशुभ की सूचना के लिए जो हमारे चूल्हे की अग्नि के समीप पंजे का चिह्न बनाया है, वह भी प्रभावहीन हो जाए. (१) यौ ते दूतौ निर्ऋत इदमतो ऽ प्रहितौ प्रहितौ वा गृहं नः. कपोतोल्लूकाभ्यामपदं तदस्तु.. (२) हे पाप देवता निर्ऋति! तेरे द्वारा भेजे हुए जो कबूतर और उल्लू हैं. वे मेरे घर में आ कर भी आश्रय न पा सकें. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
अवैरहत्यायेदमा पपत्यात् सुवीरताया इदमा ससद्यात्. पराडेव परा वद पराचीमनु संवतम्. यथा यमस्य त्वा गृहे ऽ रसं प्रतिचाकशानाभूकं प्रतिचाकशान्.. (३) कबूतर और उल्लू के आने का जो अपशकुन है, वह हमारे वीरों की हिंसा न करे तथा हमारे वीरों के सद्भाव के निमित्त वह अपशकुन दूर चला जाए. हे यम के दूत कबूतर! तेरे स्वामी के घर में प्राणी जिस प्रकार तुझे प्रभावहीन समझते हैं, उसी प्रकार तुझे हम भी देखें. (३) सूक्त-३० देवता—शमी देवा इमं मधुना संयुतं यवं सरस्वत्यामधि मणावचर्कृषुः. इन्द्र आसीत् सीरपतिः शतक्रतुः कीनाशा आसन् मरुतः सुदानवः.. (१) देवों ने सरस्वती नदी के समीप मनुष्यों को शहद से युक्त जौ दिए. उस समय जोतने से भूमि में अन्न उत्पन्न करने के लिए इंद्र हल के स्वामी और शोभन दान वाले मरुत् किसान बने थे. (१) यस्ते मदो ऽ वकेशो विकेशो येनाभिहस्यं पुरुषं कृणोषि. आरात् त्वदन्या वनानि वृक्षि त्वं शमि शतवल्शा वि रोह.. (२) हे शमी नामक वृक्ष! तेरा जो मद मन चाहे केशों को उत्पन्न करने वाला और वृद्धि करने वाला है तथा जिस के द्वारा तुम पुरुष को सभी प्रकार प्रसन्न करते हो, मैं भी तुम से दूर स्थित वनों को काटता हूं. हे शमी! तू सौ शाखाओं वाला हो कर बढ़े. (२) बृहत्पलाशे सुभगे वर्षवृद्ध ऋतावरि. मातेव पुत्रेभ्यो मृड केशेभ्यः शमि.. (३) हे बड़ेबड़े पत्तों वाली, केवल वर्षा के जल से बढ़ने वाली एवं सौभाग्य सूचक शमी! माता जिस प्रकार पुत्रों को बढ़ाती है, तू उसी प्रकार हमारे केशों की वृद्धि कर. (३) सूक्त-३१ देवता—गौ आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः. पितरं च प्रयन्त्स्वः.. (१) ये अगमनशील और तेजस्वी सूर्य उदयाचल पर पहुंच कर पूर्व दिशा में दिखाई दे रहे हैं और अपनी किरणों से सभी प्राणियों की माता भूमि को व्याप्त कर रहे हैं. इन्होंने स्वर्ग और अंतरिक्ष को ढक लिया है. ये सूर्य वर्षा का जल देने के कारण गौ कहे जाते हैं. (१) अन्तश्चरति रोचना अस्य प्राणादपानतः. व्यख्यन्महिषः स्वः.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
प्राण वायु ग्रहण करने के पश्चात अपान वायु छोड़ते हुए इस प्राणिसमूह के शरीर में सूर्य की प्रभा वर्तमान है. वह महान सूर्य स्वर्ग तथा सभी ऊपर वाले लोकों को प्रकाशित करता है. (२) त्रिंशद् धामा वि राजति वाक् पतङ्गो अशिश्रियत्. प्रति वस्तोरहर्द्युभिः.. (३) दिवस एवं रात के अवयव तीस मुहूर्त तेज के स्थान हैं और इस सूर्य की चमक से विराजमान रहते हैं. तीनों वेदों के रूप वाली वाणी भी सूर्य के आश्रय में ही रहती है. (३) सूक्त-३२ देवता—अग्नि अन्तर्दावे जुहुता स्वे ३ तद् यातुधानक्षयणं घृतेन. आराद् रक्षांसि प्रति दह त्वमग्ने न नो गृहाणामुप तीतपासि.. (१) हे ऋत्विजो! राक्षसों का विनाश करने वाले इस हवि को घी के साथ अग्नि में हवन करो. हे अग्नि! उपद्रव करने वाले इन राक्षसों को भस्म करो तथा हमारे घरों को संताप युक्त मत करो. (१) रुद्रो वो ग्रीवा अशरैत् पिशाचाः पृष्टीर्वो ऽ पि शृणातु यातुधानाः. वीरुद् वो विश्वतोवीर्या यमेन समजीगमत्.. (२) हे पिशाचो! तुम्हारी गरदन को रुद्र देव काटें. हे यातुधानो! तुम्हारी पीठ की हड्डियों का ही विनाश करें. सभी प्रकार की शक्ति वाली ओषधि तुम यातुधानों को मृत्यु से मिला दे. (२) अभयं मित्रावरुणाविहास्तु नो ऽ र्चिषात्रिणो नुदतं प्रतीचः. मा ज्ञातारं मा प्रतिष्ठां विदन्त मिथो विघ्नाना उप यन्तु मृत्युम्.. (३) हे मित्र और वरुण! इस देश में हमें भय नहीं रहे. तुम अपने तेज से मानव भक्षी राक्षसों को हम से पराङ्मुख करो. दूर भागे हुए वे मुझ ज्ञानी को प्राप्त न करें तथा मेरी आवास भूमि को प्राप्त न कर सकें. वे एक दूसरे पर प्रहार करते हुए मृत्यु को प्राप्त करें. (३) सूक्त-३३ देवता—इंद्र यस्येदमा रजो युजस्तुजे जना वनं स्वः. इन्द्रस्य रन्त्यं बृहत्.. (१) हे मनुष्यो! जिस इंद्र का प्रसन्नताकारक प्रकाश शत्रु विनाश के लिए तत्पर करता है, उस इंद्र के रमणीय एवं सेवा के योग्य तेज को तुम ग्रहण करो. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
नाधृष आ दधृषते धृषाणो धृषितः शवः. पुरा यथा व्यथिः श्रव इन्द्रस्य नाधृषे शवः.. (२) वह इंद्र दूसरों से तिरस्कृत नहीं होते तथा अपना तिरस्कार करने वाले की शक्ति को पराजित करते हैं. प्राचीन काल में वृत्रासुर के वध के समय इंद्र के बल को कोई पराजित नहीं कर सका, उसी प्रकार अब भी उन का बल पराजित न हो. (२) स नो ददातु तां रयिमुरुं पिशङ्गसंदृशम्. इन्द्रः पतिस्तुविष्टमो जनेष्वा.. (३) हे इंद्र! हमें पीले रंग का धन अर्थात् स्वर्ण अधिक मात्रा में प्रदान करो. इंद्र सभी मनुष्यों के स्वामी तथा सभी प्रकार के उत्कर्ष वाले हैं. (३) सूक्त-३४ देवता—अग्नि प्राग्नये वाचमीरय वृषभाय क्षितीनाम्. स नः पर्षदति द्विषः.. (१) हे स्तोता! मनुष्यों की कामनाएं पूरी करने वाले तथा राक्षसों के हंता अग्नि की स्तुति करो. वे अग्नि हमें राक्षस, पिशाच आदि से छुड़ाएं. (१) यो रक्षांसि निजूर्वत्यग्निस्तिग्मेन शोचिषा. स नः पर्षदति द्विषः.. (२) जो अग्नि, अपने तीक्ष्ण तेज से राक्षसों का विनाश करते हैं, वह अग्नि हमें राक्षस, पिशाच आदि से बचाएं. (२) यः परस्याः परावतस्तिरो धन्वातिरोचते. स नः पर्षदति द्विषः.. (३) जो अग्नि अत्यंत दूर देश से जल रहित मरु भूमि में छिप जाते हैं और बहुत सुंदर लगते हैं, वह अग्नि हमें राक्षस, पिशाच आदि से छुड़ाएं. (३) यो विश्वाभि विपश्यति भुवना सं च पश्यति. स नः पर्षदति द्विषः.. (४) जो अग्नि सभी भुवनों को संपूर्ण रूप से देखते हैं और सूर्य रूपी एक साधन से प्रकाशित करते हैं, वह हमें राक्षस, पिशाच आदि से बचाएं. (४) यो अस्य पारे रजसः शुक्नो अग्निरजायत. स नः पर्षदति द्विषः.. (५) इस भूलोक के ऊपर जो अंतरिक्ष है, उस में जो निर्मल सूर्य रूपी अग्नि उत्पन्न हुई थी, वह हमें शत्रुओं से बचाए. (५) सूक्त-३५ देवता—वैश्वानर ebook converter DEMO Watermarks*
वैश्वानरो न ऊतय आ प्र यातु परावतः. अग्निर्नः सुष्टुतीरुप.. (१) सभी मनुष्यों के हितकारी अग्नि हमारी रक्षा के लिए दूर देश से आएं. वह अग्नि हमारी सुंदर स्तुतियों को ग्रहण करें. (१) वैश्वानरो न आगमदिमं यज्ञं सजूरुप. अग्निरुक्थेष्वंहसु.. (२) सभी मनुष्यों के हितकारी अग्नि हमारे समीप आएं और आ कर हमारे द्वारा की जाती हुई स्तुतियों से प्रसन्न होते हुए इस यज्ञ को स्वीकार करें. (२) वैश्वानरो ऽ ङ्गिरसां स्तोममुक्थं च चाकॢपत्. ऐषु द्युम्नं स्वर्यमत्.. (३) वैश्वानर अग्नि ने महर्षियों द्वारा किए गए स्तोत्रों और शस्त्रों को समर्थ बनाया है तथा प्रसिद्ध यश एवं अन्न प्राप्त कराया है अथवा इन्हें स्वर्ग प्राप्त कराया है. (३) सूक्त-३६ देवता—अग्नि ऋतावानं वैश्वानरमृतस्य ज्योतिषस्पतिम्. अजस्रं घर्ममीमहे.. (१) हम यज्ञात्मक ज्योति के स्वामी एवं सतत दीप्तिशाली वैश्वानर अग्नि की आराधना करते हैं. हम उन से उत्तम फल की याचना करते हैं. (१) स विश्वा प्रति चाकॢप ऋतून्रूतून् सृजते वशी. यज्ञस्य वय उत्तिरन्.. (२) वैश्वानर अग्नि सभी प्रजाओं को सभी फल देने में समर्थ हैं. स्वतंत्र अग्नि सूर्य के रूप में वसंत आदि ऋतुओं का निर्माण करते हैं. वे यज्ञ का अन्न देवों को प्राप्त कराते हैं. (२) अग्निः परेषु धामसु कामो भूतस्य भव्यस्य. सम्राडेको वि राजति.. (३) उत्तम स्थानों में अग्नि सम्राट्, भूत और भविष्यत काल में कामनापूर्ण करने वाला हो कर विराजता है. (३) सूक्त-३७ देवता—चंद्रमा ebook converter DEMO Watermarks*
उप प्रागात् सहस्राक्षो युक्त्वा शपथ्यो रथम्. शप्तारमन्विच्छन् मम वृक इवाविमतो गृहम्.. (१) हजार आंखों वाले इंद्र शाप क्रिया के कर्ता होते हुए अपने रथ में घोड़े जोड़ कर हमारे समीप आएं. जिस प्रकार भेड़ों के स्वामी के घर में भेड़िया जाता है, उसी प्रकार वह मुझे शाप देने वाले शत्रु को मारें. (१) परि णो वृङ्ग्धि शपथ हृदमग्निरिवा दहन्. शप्तारमत्र नो जहि दिवो वृक्षमिवाशनिः.. (२) हे शपथ! तू हमारा वध मत कर. तू अग्नि के समान हमारे शत्रुओं के कुल को जला. आकाश से गिरा हुआ वज्र जिस प्रकार वृक्ष को नष्ट कर देता है, उसी प्रकार तू इस देश में हमें शाप देने वाले शत्रु का विनाश कर. (२) यो नः शपादशपतः शपतो यश्च नः शपात्. शुने पेष्ट्रमिवावक्षां तं प्रत्यस्यामि मृत्यवे.. (३) जो शत्रु हम शाप न देने वालों को कठोर वचनों के द्वारा शाप दे तथा जो हम शाप देने वालों को शाप दे, उन दोनों को हम इस प्रकार मृत्यु के आगे फेंकते हैं, जैसे कुत्ते के आगे रोटी डाली जाती है. (३) सूक्त-३८ देवता—बृहस्पति सिंहे व्याघ्र उत या पृदाकौ त्विषिरग्नौ ब्राह्मणे सूर्ये या. इन्द्रं या देवी सुभगा जजान सा न ऐतु वर्चसा संविदाना.. (१) सिंह, बाघ और सर्प में जो आक्रमण के रूप में तेज है, अग्नि में दाह के रूप में, ब्राह्मण में शाप के रूप में और सूर्य में ताप के रूप में जो तेज है, उसी सौभाग्यशाली तेज ने इंद्र को जन्म दिया है. वह तेजस्वरुप देवी हमारे तेज से एक होती हुई हमारे समीप आए. (१) या हस्तिनि द्वीपिनि या हिरण्ये त्विषिरप्सु गोषु या पुरुषेषु. इन्द्रं या देवी सुभगा जजान सा न ऐतु वर्चसा संविदाना.. (२) जो तेज गजेंद्र में बल की अधिकता के रूप में, चीते में हिंसा के रूप में तथा सोने में आह्लाद के रूप में है, जलों में, गायों में और मनुष्यों में जो तेज है, उसी सौभाग्यशाली तेज ने इंद्र को जन्म दिया है. वह तेजस्वरूपा देवी हमारे तेज से एक होती हुई हमारे समीप आए. (२) रथे अक्षेष्वृषभस्य वाजे वाते पर्जन्ये वरुणस्य शुष्मे. इन्द्रं या देवी सुभगा जजान सा न ऐतु वर्चसा संविदाना.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*
गमन के साधन रथ में, उस के पहियों में, गर्भाधान करने में समर्थ बैल के शीघ्र गमन में, वायु में, वर्षा करने वाले जल में एवं वरुण के बल में जो तेज है, उसी सौभाग्यशाली तेज ने इंद्र को जन्म दिया है. वह तेजरूपा देवी हमारे तेज से एक होती हुई हमारे समीप आए. (३) राजन्ये दुन्दुभावायतायामश्वस्य वाजे पुरुषस्य मायौ. इन्द्रं या देवी सुभगा जजान सा न ऐतु वर्चसा संविदाना.. (४) राजकुमार में, बजाई जाती हुई दुंदुभी में, घोड़े के शीघ्र गमन में एवं पुरुष की उच्च घोषणा में जो तेज है, उसी सौभाग्यशाली तेज ने इंद्र को जन्म दिया है. वह तेज रूपी देवी हमारे तेज से एक होती हुई हमारे समीप आए. (४) सूक्त-३९ देवता—बृहस्पति यशो हविर्वर्धतामिन्द्रजूतं सहस्रवीर्यं सुभृतं सहस्कृतम्. प्रस्र्षणमनु दीर्घाय चक्षसे हविष्मन्तं मा वर्धय ज्येष्ठतातये.. (१) हमारे द्वारा इंद्र के उद्देश्य से दी हुई अपरिमित सामर्थ्य से युक्त, भलीभांति वर्तमान एवं हजारों को पराजित करने वाले बल को देने वाली हवि की वृद्धि हो. हे इंद्र! उस हवि की वृद्धि के पश्चात मुझ हवि देने वाले यजमान को चिरकाल तक होने वाले दर्शन और श्रेष्ठता के लिए बढ़ाओ. (१) अच्छा न इन्द्रं यशसं यशोभिर्यशस्विनं नमसाना विधेम. स नो रास्व राष्ट्रमिन्द्रजूतं तस्य ते रातौ यशसः स्याम.. (२) सामने वर्तमान, यश देने वाले एवं अधिक यशस्वी इंद्र को हम नमस्कार आदि के द्वारा पूजते हुए उन की सेवा करते हैं. हे इंद्र! तुम हमें अपने द्वारा प्रेरित राज्य प्रदान करो. तुम्हारे उस दान से हम यशस्वी बनें. (२) यशा इन्द्रो यशा अग्निर्यशाः सोमो अजायत. यशा विश्वस्य भूतस्याहमस्मि यशस्तमः.. (३) इंद्र, अग्नि और सोम यश की इच्छा करते हुए उत्पन्न हुए. यश का इच्छुक मैं भी समस्त प्राणियों की अपेक्षा अतिशय यशस्वी बनूं. (३) सूक्त—४० देवता—इंद्र अभयं द्यावापृथिवी इहास्तु नो ऽ भयं सोमः सविता नः कृणोतु. अभयं नो ऽ स्तूर्व १ न्तरिक्षं सप्तऋषीणां च हविषाभयं नो अस्तु.. (१) हे द्यावा पृथ्वी! तुम्हारी कृपा से हम निर्भय हैं. चंद्रमा एवं सूर्य हमें निर्भय करें. द्यावा ebook converter DEMO Watermarks*
और पृथ्वी के मध्य में वर्तमान अंतरिक्ष हमारे लिए अभय करे. हमारे द्वारा सप्त ऋषियों को दिया जाता हुआ हवि हमें अभय देने वाला हो. (१) अस्मै ग्रामाय प्रदिशश्चतस्र ऊर्जं सुभूतं स्वस्ति सविता नः कृणोतु. अशत्र्विन्द्रो अभयं नः कृणोत्वन्यत्र राज्ञामभि यातु मन्युः.. (२) सूर्य देव हमारे निवास के गांव में और उस की चारों दिशाओं में अन्न उत्पन्न करें एवं कुशल प्रदान करें. हमारे मित्र इंद्र हमें अभय प्रदान करें तथा राजा का क्रोध हमें त्याग कर हम से दूर चला जाए. (२) अनमित्रं नो अधरादनमित्रं न उत्तरात्. इन्द्रानमित्रं नः पश्चादनमित्रं पुरस्कृधि.. (३) हे इंद्र! हमारी दक्षिण दिशा को शत्रुरहित करो. हमारी उत्तर दिशा को शत्रुविहीन बनाओ. हमारी पश्चिम और पूर्व दिशाओं को भी शत्रुहीन बनाओ. (३) सूक्त-४१ देवता—मन मनसे चेतसे धिय आकूतय उत चित्तये. मत्यै श्रुताय चक्षसे विधेम हविषा वयम्.. (१) हे पुरुष! सुख का अनुभव कराने वाले मन के लिए, ज्ञान के साधन चित्त के लिए, ध्यान के साधन बुद्धि के लिए, स्मृति के साधन संकल्प के लिए, ज्ञान के साधन चेतना के लिए, अतीत की स्मृति के कारण मति के लिए, सुनने से उत्पन्न ज्ञान के लिए एवं चक्षु से उत्पन्न ज्ञान के लिए हम आज्य से सेवा करते हैं. (१) अपानाय व्यानाय प्राणाय भूरिधायसे. सरस्वत्या उरुव्यचे विधेम हविषा वयम्.. (२) अपान वायु को, व्यान वायु को, प्राण वायु को, प्राणापान व्यान वायुओं को धारण करने वाले प्राणियों की, अत्यधिक व्याप्ति वाली सरस्वती की हम आज्य आदि के द्वारा सेवा करते हैं. (२) मा नो हासिषुर्ऋषयो दैव्या ये तनूपा ये नस्तन्वस्तनूजाः. अमर्त्या मर्त्याँभि नः सचध्वमायुर्धत्त प्रतरं जीवसे नः.. (३) प्राण के अधिष्ठाता देव एवं दिव्य गुणों वाले सप्त ऋषि हमें नहीं त्यागें. शरीरों के रक्षक ऋषि हमें सभी ओर से प्राप्त हों. वे हमें जीवन के लिए अत्यधिक आयु प्रदान करें. (३) सूक्त-४२ देवता—मन्यु ebook converter DEMO Watermarks*