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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished810 pages

११४- चित्रलेखाका द्वारकामें श्रीहरिके भवनसे सोते हुए अनिरुद्धको उठा ले जाना

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७५६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

उनके दास्य कर्ममें ‘ण’ का प्रयोग होता है। उन दोनोंके दाता जो देवता हैं, उन्हें ‘कृष्ण’ कहा जाता है। भक्तोंके कोटिजन्मार्जित पापों और क्लेशोंमें ‘कृषि’ का तथा उनके नाशमें ‘ण’ का व्यवहार होता है; इसी कारण वे ‘कृष्ण’ कहे जाते हैं। सहस्र दिव्य नामोंकी तीन आवृत्ति करनेसे जो फल प्राप्त होता है; वह फल ‘कृष्ण’ नामकी एक आवृत्तिसे ही मनुष्यको सुलभ हो जाता है। वैदिकोंका कथन है कि ‘कृष्ण’ नामसे बढ़कर दूसरा नाम न हुआ है, न होगा। ‘कृष्ण’ नाम सभी नामोंसे परे है। हे गोपी! जो मनुष्य ‘कृष्ण-कृष्ण’ यों कहते हुए नित्य उनका स्मरण करता है; उसका उसी प्रकार नरकसे उद्धार हो जाता है, जैसे कमल जलका भेदन करके ऊपर निकल आता है। ‘कृष्ण’ ऐसा मङ्गल नाम जिसकी वाणीमें वर्तमान रहता है, उसके करोड़ों महापातक तुरंत ही भस्म हो जाते हैं। ‘कृष्ण’ नाम-जपका फल सहस्रों अश्वमेध-यज्ञोंके फलसे भी श्रेष्ठ है; क्योंकि उनसे पुनर्जन्मकी प्राप्ति होती है; परंतु नाम-जपसे भक्त आवागमनसे मुक्त हो जाता है। समस्त यज्ञ, लाखों व्रत, तीर्थस्नान, सभी प्रकारके तप, उपवास, सहस्रों वेदपाठ, सैकड़ों बार पृथ्‍वीकी प्रदक्षिणा—ये सभी इस ‘कृष्णनाम’-जपकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकते*। उन उपर्युक्त कर्मोंके लोभसे मनुष्योंको चिरकालके लिये स्वर्गरूप फलकी प्राप्ति होती है और उस स्वर्गसे पतन होना निश्चित है; परंतु जपकर्ता पुरुष श्रीहरिके परम पदको प्राप्त कर लेता है।

‘क’ जलको कहते हैं; उस जलमें तथा समस्त शरीरोंमें भी जो आत्मा शयन करता है; उस देवको सभी वैदिक लोग ‘केशव’ कहते हैं। ‘कंस’ शब्दका प्रयोग पातक, विघ्न, रोग, शोक और दानवके अर्थमें होता है, उनका जो ‘अरि’ अर्थात् हनन करनेवाला है; वह ‘कंसारि’ कहा जाता है। जो रुद्ररूपसे नित्य विघ्नोंका तथा भक्तोंके पातकोंका संहार करते रहते हैं, इसी कारण वे ‘हरि’ कहलाते हैं। जो ब्रह्मस्वरूपा ‘मा’ मूलप्रकृति, ईश्वरी, नारायणी, सनातनी विष्णुमाया, महालक्ष्मीस्वरूपा, वेदमाता सरस्वती, राधा, वसुन्धरा और गङ्गा नामसे विख्यात हैं, उनके स्वामी (धव) को ‘माधव’ कहते हैं।

यशोदे! ब्रह्मा, विष्णु, महेश और शेष आदि जिनकी वन्दना करते हैं; सनकादि मुनि ध्यानद्वारा जिनका कुछ भी रहस्य नहीं जान पाते और वेद-पुराण जिनका निरूपण करनेमें असमर्थ हैं; उन माखनचोरका भक्तिपूर्वक भजन करो। दूध, दही, घी, नया मथकर तैयार किया हुआ मट्ठा—ये सब कहाँ हैं, उनका चुरानेवाला कहाँ है, तुम कहाँ हो और तुम्हारा भवबन्धन कहाँ है? योगी,


* कृषिरुत्कृष्टवचनो णश्च सद्द्‌भक्तिवाचकः। अश्रापि दातृवचनः कृष्णं तेन विदुर्बुधाः॥
कृषिश्च परमानन्दे णश्च तद्दास्यकर्मणि। तयोर्दाता च यो देवस्तेन कृष्णः प्रकीर्तितः॥
कोटिजन्मार्जिते पापं कृषिः क्लेशे च वर्तते। भक्तानां णश्च निर्वाणे तेन कृष्णः प्रकीर्तितः॥
सहस्रनाम्नां दिव्यानां त्रिरावृत्त्या च यत्फलम्। एकावृत्त्या तु कृष्णस्य तत्फलं लभते नरः॥
कृष्णनाम्नः परं नाम न भूतं न भविष्यति। सर्वेभ्यश्च परं नाम कृष्णेति वैदिका विदुः॥
कृष्ण कृष्णेति हे गोपि यस्तं स्मरति नित्यशः। जलं भित्त्वा यथा पद्मं नरकादुद्धराम्यहम्॥
कृष्णेति मङ्गलं नाम यस्य वाचि प्रवर्तते। भस्मीभवन्ति सद्यस्तन्महापातककोटयः॥
अश्वमेधसहस्रेभ्यः फलं कृष्णजपस्य च। वरं तेभ्यः पुनर्जन्म नातो भक्तपुनर्भवः॥
सर्वेषामपि यज्ञानां लक्षाणि च व्रतानि च। तीर्थस्नानानि सर्वाणि तपांस्यनशनानि च॥
वेदपाठसहस्राणि प्रदक्षिण्यं भुवः शतम्। कृष्णनामजपस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥

८६- कन्याकी दुःशीलताका समाचार पाकर बाणका युद्धके लिये उद्यत होना; शिव, पार्वती, गणेश, स्कन्द और कोटरीका उसे रोकना; परंतु बाणका स्कन्दको सेनापति बनाकर युद्धके लिये नगरके बाहर निकलना, उषा-प्रदत्त रथपर सवार होकर अनिरुद्धका भी युद्धोद्योग करना, बाण और अनिरुद्धका परस्पर वार्तालाप

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श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७५७

सिद्धगण, मुनीन्द्र, भक्तसमुदाय, ब्रह्मा, शिव और शेष योगद्वारा जिन्हें बाँध नहीं सके; वह तुम्हारे ओखली-मूलसे कैसे बँध गया? अतः सति। भारतवर्षमें शीघ्र ही हृत्कमलके मध्यमें स्थित परमेश्वररूप अपने पुत्रका प्रेम, भक्ति, स्तवन, पूजन और यत्नपूर्वक ध्यान करते हुए भजन करो। गोपी! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, वह वरदान माँग लो। इस समय जगत्में जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ होगा, वह सब कुछ मैं तुम्हें प्रदान करूँगी।

यशोदाने कहा—राधे! श्रीहरिके चरणोंमें निश्चल भक्ति तथा उनकी दासता—यही मेरा अभीष्ट वर है। साथ ही तुम्हारे नामकी क्या व्युत्पत्ति है—यह भी मुझे बतलानेकी कृपा करो।

श्रीराधिका बोलीं—यशोदे! मेरे वरदानसे तुम्हारी श्रीहरिके चरणोंमें निश्चल भक्ति हो और तुम्हें श्रीहरिकी दुर्लभ दासता प्राप्त हो। अब उत्तम निर्णयका वर्णन करती हूँ, सुनो। पूर्वकालमें नन्दने मुझे भाण्डीर-वटके नीचे देखा था, उस समय मैंने व्रजेश्वर नन्दको वह रहस्य बतलाया था और उसे प्रकट करनेको मना कर दिया था। मैं ही स्वयं राधा हूँ और रायाण गोपकी भार्या मेरी छायामात्र है। रायाण श्रीहरिके अंश, श्रेष्ठ पार्षद और महान् हैं।

जिनके रोमकूपोंमें अनेकों विश्व वर्तमान हैं, वे महाविष्णु ही ‘रा’ शब्द हैं और ‘धा’ विश्वके प्राणियों तथा लोकोंमें मातृवाचक धाय है; अतः मैं इनकी दूध पिलानेवाली माता, मूलप्रकृति और ईश्वरी हूँ। इसी कारण पूर्वकालमें श्रीहरि तथा विद्वानोंने मेरा नाम ‘राधा’ रखा है*। इस समय मैं सुदामाके शापसे वृषभानुकी कन्या होकर प्रकट हुई हूँ। अब सौ वर्ष पूरे होनेतक मेरा श्रीहरिके साथ वियोग बना रहेगा। मेरे पिता वृषभानु श्रीकृष्णके श्रेष्ठ पार्षद और महान् हैं तथा मेरी माता कलावती पितरोंकी मानसी कन्या हैं। इस भारतवर्षमें मेरी माता तथा मैं—दोनों अयौनिजा हैं। पुनः तुमलोगोंके साथ श्रीहरिके परमपदको प्राप्त होंगी। व्रजेश्वरि! इस प्रकार मैंने तुम्हें सारा भक्त्यात्मक ज्ञान बतला दिया। सति! तब तुम अपने ज्ञानी स्वामी व्रजेश्वरके साथ व्रजको लौट जाओ; क्योंकि इस समय तुम्हीं मेरे ध्यानमें रुकावट डालनेवाली हो। सुन्दरि! ध्यानभङ्ग हो जानेपर मनुष्योंको महान् दोषका भागी होना पड़ता है।
(अध्याय १११)


प्रद्युम्नाख्यान-वर्णन, श्रीकृष्णका सोलह हजार आठ रानियोंके साथ विवाह और उनसे संतानोत्पत्तिका कथन, दुर्वासाका द्वारकामें आगमन और वसुदेव-कन्या एकानंशाके साथ विवाह, श्रीकृष्णके अद्भुत चरित्रको देखकर दुर्वासाका भयभीत होना, श्रीकृष्णका उन्हें समझाना और दुर्वासाका पत्नीको छोड़कर तपके लिये जाना

श्रीनारायण कहते हैं—मुने! द्वारकामें पहुँचकर वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण वसुदेवजीकी आज्ञासे रुक्मिणीके रत्ननिर्मित श्रेष्ठ भवनमें गये। वह भवन शुद्ध स्फटिकके समान उज्ज्वल, बहुमूल्य रत्नोंद्वारा रचित, सामने तथा चारों ओरसे रमणीय और नाना प्रकारके चित्रोंसे चित्रित था।


* राशब्दश्च महाविष्णुर्विश्वानि यस्य लोमसु । विश्वप्राणिषु विश्वेषु धा धात्री मातृवाचकः ॥
धात्री माताहमेतेषां मूलप्रकृतिरीश्वरी । तेन राधा समाख्याता हरिणा च पुरा बुधैः ॥
(१११ । ५७-५८)

८७- बाण और अनिरुद्धके संवाद-प्रसङ्गमें अनिरुद्धद्वारा द्रौपदीके पाँच पति होनेका वर्णन, बाणसेनापति सुभद्रका अनिरुद्धके साथ युद्ध और अनिरुद्धद्वारा उसका वध

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७५८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

उसपर अमूल्य रत्नोंके कलश चमक रहे थे और वह श्वेत चँवरों, दर्पणों तथा अग्निशुद्ध पवित्र वस्त्रोंद्वारा सब ओरसे सुशोभित था। तदनन्तर रुक्मिणीदेवीसे पूर्वकालमें शिवके द्वारा भस्मीभूत कामदेव प्रकट हुए। उन्होंने शम्बरासुरका वध करके अपनी पतिव्रता पत्नी रतिको प्राप्त किया। उस समय रति देवताके संकेतसे 'मायावती' नाम धारण करके शम्बरासुरके महलमें उसकी गृहिणी बनकर रहती थी; परंतु उसकी शय्यापर स्वयं न जाकर अपनी छायाको भेजती थी।

नारदने पूछा— महाभाग ! कामदेव (प्रद्युम्न)-ने किस प्रकार दैत्यराज शम्बरका वध किया था ? वह शुभ कथा विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।

श्रीनारायणने कहा— नारद ! एक सप्ताहके व्यतीत होनेपर दैत्यराज शम्बर रुक्मिणीके सूतिकागृहसे बालकको लेकर वेगपूर्वक अपने वासस्थानको चला गया। वह दैत्यराज पुत्रहीन था; अतः उस पुत्रको पाकर उसे महान् हर्ष हुआ। फिर उसने प्रसन्नतासे वह बालक मायावतीको दे दिया। उसे पाकर सती मायावतीको भी बड़ी प्रसन्नता हुई। तदनन्तर सरस्वतीदेवीने आकर मायावती (रति)-को और श्रीकृष्ण-पुत्र (कामदेव)-को समझाया कि तुम दोनों पत्नी-पति हो। शिवके कोपसे भस्म हुए कामदेवने ही श्रीकृष्णके पुत्ररूपसे जन्म लिया है; अतएव तुम दोनों पति-पत्नीकी भाँति रहो।

तब वे पति-पत्नीकी भाँति रहने लगे। इस बातका शम्बरासुरको पता लग गया। तब वह दोनोंकी भर्त्सना करके उन्हें मारने दौड़ा। उसने शिवजीका दिया हुआ शूल चलाया। इसी बीच पवनदेवने चुपके-से दुर्गाका स्मरण करनेको कहा। दुर्गाका स्मरण करते ही शिव-शूल रमणीय और मनोहर मालाके रूपमें परिणत हो गया। तदनन्तर कामदेवने हर्षपूर्वक ब्रह्मास्त्रद्वारा उस दैत्यको मार डाला और रतिको लेकर वे विमानद्वारा द्वारकापुरीको चले गये। उनके पीछे समस्त देवगण स्वयं पार्वतीकी स्तुति करके चले। रुक्मिणीने मङ्गल-कार्य सम्पन्न करके रतिको और अपने पुत्रको ग्रहण किया। श्रीहरिने स्वस्त्ययनपूर्वक परम उत्सव कराया, ब्राह्मणोंको जिमाया और पार्वतीकी पूजा की।

तदनन्तर श्रीकृष्णने वेदोक्त शुभ दिन आनेपर

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श्रीकृष्णजन्मखण्ड

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क्रमशः सात रमणियोंका पाणिग्रहण किया। उनके नाम हैं—कालिन्दी, सत्यभामा, सत्या, सती, नाग्नजिती, जाम्बवती और लक्ष्मणा। उन्होंने क्रमशः इनके साथ विवाह किये और पुत्र उत्पन्न किये। उनमें एक-एकसे क्रमशः दस-दस पुत्र और एक-एक कन्या उत्पन्न हुई। तत्पश्चात् श्रीकृष्णने राजाधिराज नरकासुरको पुत्रसहित मारकर रणके मुहानेपर महाबली मुर दैत्यको भी यमलोकका पथिक बना दिया। वहाँ उसके महलमें श्रीकृष्णको सोलह हजार कन्याएँ दीख पड़ीं, जिनकी अवस्था सौ वर्षसे ऊपर हो चुकी थी; परंतु उनका यौवन सदा स्थिर रहनेवाला था। वे सब-की-सब रत्नाभूषणोंसे विभूषित थीं तथा उनके मुख प्रफुल्लित थे। माधवने शुभ मुहूर्तमें उन सबका पाणिग्रहण किया और शुभकालमें क्रमशः उन सबके साथ रमण किया उनमें भी प्रत्येकसे क्रमशः दस-दस पुत्र और एक-एक कन्याका जन्म हुआ। इस प्रकार श्रीहरिके पृथक्-पृथक् इतनी संतानें उत्पन्न हुईं।

नारद ! एक समयकी बात है। मुनिवर दुर्वासा अनायास घूमते-घूमते रमणीय द्वारकापुरीमें आये। उस समय उनके साथ तीन करोड़ शिष्य भी थे। उन्हें आया देखकर पुत्र और पुरोहितके साथ महाराज उग्रसेन, वसुदेव, श्रीकृष्ण, अक्रूर तथा उद्धवने षोडशोपचारद्वारा मुनिवरकी पूजा करके उन्हें प्रणाम किया। ब्रह्मन् ! तब मुनिवरने उन्हें पृथक्-पृथक् शुभाशीर्वाद दिये। तदनन्तर वसुदेवजीने अपनी कन्या एकानंशाको शुभ मुहूर्तमें महर्षि दुर्वासाको दान कर दिया और बहुत-से मोती, माणिक्य, हीरे तथा रत्न दहेजमें दिये। उन्होंने दुर्वासाको बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित एक सुन्दर आश्रम भी दिया।

एक बार मुनिश्रेष्ठ दुर्वासाने अपने मनमें विचारकर देखा कि कहीं तो श्रीकृष्ण रत्ननिर्मित मनोहर पलंगपर शयन कर रहे हैं, कहीं वे सर्वव्यापी प्रभु श्रद्धापूर्वक पुराणकी कथा सुन रहे हैं, कहीं सुन्दर आँगनमें महोत्सव मनानेमें संलग्न हैं, कहीं सत्याद्वारा भक्तिपूर्वक दिया गया ताम्बूल चबा रहे हैं, कहीं शय्यापर पौढ़े हैं और रुक्मिणी श्वेत चँवरोंद्वारा उनकी सेवा कर रही हैं, कहीं आनन्दपूर्वक शयन कर रहे हैं और कालिन्दी उनके चरण दबा रही हैं; फिर सुधर्मा-सभामें सुन्दर रूप धारण करके सत्समाजके मध्य विराज रहे हैं। ऐश्वर्यशाली मुनिने सर्वत्र उनके साथ समान रूपसे सम्भाषण किया। इस परम अद्भुत दृश्यको देखकर विप्रवर दुर्वासाको महान् विस्मय हुआ। तब वे पुनः रुक्मिणीके महलमें उन जगदीश्वरकी स्तुति करने लगे।

दुर्वासा बोले—जगदीश्वर ! आप सबपर विजय पानेवाले, जनार्दन, सबके आत्मस्वरूप, सर्वेश्वर, सबके कारण, पुरातन, गुणरहित, इच्छासे परे, निर्लिप्त, निष्कलङ्क, निराकार, भक्तानुग्रह-मूर्ति, सत्यस्वरूप, सनातन, रूपरहित, नित्य नूतन और ब्रह्मा, शिव, शेष तथा कुबेरद्वारा वन्दित हैं। लक्ष्मी आपके चरणकमलोंकी सेवा करती रहती हैं। आप ब्रह्मज्योति और अनिर्वचनीय हैं,

८८- गणेश-शिव-संवाद

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७६० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

वेद भी आपके रूप और गुणका थाह नहीं लगा पाते और आप महाकाशके समान सम्माननीय हैं; आपकी जय हो, जय हो। परमात्मन्! आपको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। श्रीहरिकी अनुमतिसे मन-ही-मन यों कहकर प्रियवर दुर्वासा श्रीकृष्णको प्रणाम करके वहीं उनके सामने खड़े हो गये। तब जगन्नाथ श्रीकृष्णने उन्हें वह ज्ञान बतलाना आरम्भ किया; जो हितकारक, सत्य, पुरातन, वेदविहित और सभी सत्पुरुषोंद्वारा मान्य था।

श्रीभगवान्‌ने कहा— विप्र! तुम तो शिवके अंश हो; अतः डरो मत। क्या ज्ञानद्वारा तुम्हें यह नहीं ज्ञात है कि मैं सबका उत्पत्तिस्थान हूँ और सभी मुझसे उत्पन्न होते हैं? मुने! मैं ही सबका आत्मा हूँ। मेरे बिना सभी शव Ocean... शवतुल्य हो जाते हैं। प्राणियोंके शरीरसे मेरे निकल जानेपर सभी शक्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। अकेला मैं ही उत्पन्न होकर पृथक्-पृथक्-रूपसे व्यक्त होता हूँ। जो भोजन करता है, उसीकी तृप्ति होती है; दूसरे कभी भी तृप्त नहीं होते। जीवादि समस्त प्राणियोंकी प्रतिमाएँ भिन्न-भिन्न होती हैं। गोलोक-स्थित रासमण्डलमें परिपूर्णतम मैं ही हूँ। राधा श्रीदामाके शापसे इस समय मेरा दर्शन नहीं कर सकती। सभी राधाके अंश-कलांशरूपसे उत्पन्न हुए हैं। रुक्मिणीके भवनमें राधाका अंश है और अन्य सभी रानियोंके महलोंमें कलाएँ हैं। मेरा भी शरीरधारियोंकी प्रतिमाओंमें कहीं अंश, कहीं कलाकी कला और कहीं कलाका कलांश वर्तमान है। इतना कहकर जगदीश्वर महलके भीतर चले गये और दुर्वासाजी अपनी प्रिया एकानंशाको त्यागकर श्रीहरिके लिये तप करने चले गये।

(अध्याय ११२)


पार्वतीद्वारा दुर्वासाके प्रति अकारण पत्नी-त्यागके दोषका वर्णन, दुर्वासाका पुनः लौटकर द्वारका जाना, श्रीकृष्णका युधिष्ठिरके राजसूययज्ञमें पधारना, शिशुपालका वध, उसके आत्माद्वारा श्रीकृष्णका स्तवन, श्रीकृष्ण-चरितका निरूपण

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! महर्षि दुर्वासा शिष्योंसहित द्वारकापुरीसे निकलकर भक्तिपूर्वक भगवान् शंकरका दर्शन करनेके लिये कैलासको चले। कैलासपर पहुँचकर मुनिने शिव और शिवाको नमस्कार किया तथा शिष्योंसहित पवित्रभावसे प्रणत होकर परम भक्तिके साथ उनकी स्तुति की। फिर श्रीहरिका वह सारा वृत्तान्त, अपनी तपस्याका तत्त्व तथा अपने मनके वैराग्यका वर्णन किया। मुनिकी बात सुनकर सती पार्वती हँस पड़ीं और साक्षात् शंकरजीके संनिकट मुनिसे हितकारक एवं सत्य वचन बोलीं।

पार्वतीने कहा— मुने! तुम्हें धर्मका तत्त्व तो ज्ञात है नहीं, किंतु अपनेको धर्मिष्ठ मानते हो। भला, तुम अपनी संतानहीना पत्नीका परित्याग करके कहाँ तपस्याके लिये जा रहे हो? जो अपनी कुलीना पतिव्रता युवती पत्नीको संतानहीन अवस्थामें त्यागकर संन्यासी, ब्रह्मचारी अथवा यति हो जाता है; व्यापार अथवा नौकर आदिके निमित्त चिरकालके लिये दूर चला जाता है, मोक्षके हेतु अथवा आवागमनका विनाश करनेके लिये तीर्थवासी अथवा तपस्वी हो जाता है, उसे पत्नीके शापसे मोक्ष तो मिलता नहीं; उलटे धर्मका नाश हो जाता है—परलोकमें उसे निश्चय ही नरककी प्राप्ति होती है और इस लोकमें उसकी कीर्ति नष्ट हो जाती है। ऐसा कमलजन्मा ब्रह्माने कहा है। इसलिये हे विप्र! इस समय

८९- मणिभद्रका शिवजीको सेनासहित श्रीकृष्णके पधारनेकी सूचना देना, शिवजीका बाणकी रक्षाके लिये दुर्गासे कहना, दुर्गाका बाणको युद्धसे विरत होनेकी सलाह देना

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श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७६१

तुम द्वारकाको लौट जाओ, अपने धर्मकी रक्षा करो और मेरी अंशभूता एकानंशाका धर्मपूर्वक पालन करो। वत्स! कल्पवृक्षस्वरूप परमात्मा श्रीकृष्णके चरणकमलका—जो पद्माद्वारा अर्चित और सबके लिये परम दुर्लभ है तथा शम्भु और सनकादि मुनीश्वर जिसका निरन्तर गुणगान करते रहते हैं—परित्याग करके कहाँ तपस्याके लिये जा रहे हो ? तुम्हारा यह कार्य तो मनोहर सुधाके त्यागके समान है। मुने ! जो स्वप्नमें भी श्रीकृष्णके चरणकमलका जप करता है, वह सौ जन्मोंमें किये हुए पापोंसे मुक्त हो जाता है—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। उसके द्वारा बचपन, कौमार, जवानी और वृद्धावस्थामें जानमें अथवा अनजानमें जो कुछ पाप किया होता है; वह सारा-का-सारा भस्म हो जाता है। इस भारतवर्षमें जो श्रीकृष्णके चरणकमलका साक्षात् दर्शन करता है; वह तुरंत ही पूजनीय और जीवन्मुक्त हो जाता है—यह ध्रुव है। वह करोड़ों जन्मोंके किये हुए संचित पापसे छूट जाता है और उससे सभी तीर्थ सदा पावन होते रहते हैं। जो श्रीकृष्णसे सम्बन्ध रखनेवाला है—वही व्रत, तप, सत्य, पुण्य और पूजन सफल है; क्योंकि उससे अपने जन्मचक्रका विनाश हो जाता है। वेदोंका पारगामी ब्राह्मण भी यदि श्रीकृष्णकी भक्तिसे विहीन है तो उसके सङ्गसे तथा उसके साथ वार्तालाप करनेसे भक्तोंकी भक्ति नष्ट हो जाती है। ब्राह्मण स्वयं श्रीकृष्णका स्वरूप होता है। जो श्रीकृष्णका प्रसाद खानेवाला है; उसके स्पर्शसे अग्निसे लेकर पवनतक पवित्र हो जाते हैं और वह सारे जगत्‌को पावन बनानेमें समर्थ हो जाता है। द्विजवर! श्रीकृष्णको छोड़कर कहाँ तपस्या करने जा रहे हो? अरे! सारी तपस्याओंका फल तो श्रीकृष्णके स्मरणसे ही प्राप्त हो जाता है। जिसके उपदेशसे परमात्मा श्रीकृष्णमें भक्ति न उत्पन्न हो, वह गुरु परम वैरी तथा जन्मको निष्फल करनेवाला है*।

पार्वतीके वचन सुनकर शंकर प्रेमविह्वल हो गये। उसके सर्वाङ्गमें रोमाञ्च हो आया और वे परमेश्वरी पार्वतीकी प्रशंसा करने लगे। उधर दुर्वासा शिव और दुर्गाके चरणकमलोंमें प्रणाम करके बारंबार श्रीकृष्णके चरणका स्मरण करते हुए पुनः द्वारकाको लौट गये। वहाँ जाकर उन्होंने श्रीहरिके दर्शन किये और उन परमेश्वरकी स्तुति की। फिर एकानंशाके महलमें जाकर उसके साथ निवास करने लगे। इधर युधिष्ठिरके ध्यान करनेसे श्रीकृष्ण हस्तिनापुरको प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने परमानन्दपूर्वक कुन्ती, राजा युधिष्ठिर तथा भाइयोंसे बातचीत की। फिर युक्तिपूर्वक जरासंध आदिका वध करके मुनिवरों तथा श्रेष्ठ नरेशोंके साथ मनोवाञ्छित राजसूययज्ञ कराया, जिसमें विधिपूर्वक दक्षिणा नियत थी। उस यज्ञके अवसरपर उन्होंने शिशुपाल और दन्तवक्रको भी यमलोकका पथिक बना दिया। जिस समय शिशुपाल उस देवताओं और भूपालोंकी सभामें श्रीकृष्णकी अतिशय निन्दा कर रहा था, उसी समय उसका शरीर धराशायी हो गया और जीव श्रीहरिके परम पदकी ओर चला गया; परंतु वहाँ उन सर्वेश्वरको न देखकर वह लौट आया और माधवकी स्तुति करने लगा।

शिशुपाल बोला— माधव! तुम वेदों, वेदाङ्गों, देवताओं, असुरों और प्राकृत देहधारियोंके जनक हो। तुम सूक्ष्म सृष्टिका विधान करके उसमें कल्पभेद करते हो। तुम्हीं मायासे स्वयं ब्रह्मा, शंकर और शेष बने हुए हो। मनु, मुनि, वेद और सृष्टिपालकोंके समुदाय तुम्हारे कलांशसे तथा दिक्पाल और ग्रह आदि कलासे उत्पन्न हुए हैं। तुम स्वयं ही पुरुष, स्वयं स्त्री, स्वयं नपुंसक, स्वयं


* तपसां फलमाप्नोति श्रीकृष्णस्मरणेन च ॥
यतो भक्तिश्च न भवेत् श्रीकृष्णे परमात्मनि । स गुरुः परमो वैरी करोति जन्म निष्फलम् ॥
(११३।१९-२०)

९०- शिवजीका कन्या देनेके लिये बाणको समझाना, बाणका उसे अस्वीकार करना, बलिका आगमन और सत्कार, बलिका महादेवजीका चरणवन्दन करके श्रीभगवान्‌का स्तवन करना, श्रीभगवान्‌द्वारा बलिको बाणके न मारनेका आश्वासन

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७६२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कार्य और कारण तथा स्वयं जन्म लेनेवाले और जनक हो*। यन्त्रके गुण-दोष यन्त्रीपर ही आरोपित होते हैं—ऐसा श्रुतिमें सुना गया है; अतः ये सभी प्राणी यन्त्र हैं और तुम यन्त्री हो। सब कुछ तुममें ही प्रतिष्ठित है। जगद्गुरो! मैं तुम्हारा दुर्बुद्धि एवं मूढ़ द्वारपाल हूँ; अतः मेरा अपराध क्षमा करो और ब्रह्मशापसे मेरी रक्षा करो, रक्षा करो।

यों कहकर जय और विजय (शिशुपाल और दन्तवक्र) चल पड़े और शीघ्र ही आनन्दपूर्वक वे दोनों वैकुण्ठके अभीष्ट द्वारपर जा पहुँचे। शिशुपालके इस स्तवनसे वहाँ उपस्थित सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये। उन लोगोंने श्रीकृष्णको परिपूर्णतम परमेश्वर माना। तत्पश्चात् राजसूययज्ञ पूर्ण कराकर ब्राह्मणोंको भोजनसे तृप्त किया। कौरवों और पाण्डवोंमें भेद उत्पन्न करके युद्ध कराया। इस प्रकार कृपालु भगवान्‌ने पृथ्वीका भार हल्का किया। पुनः द्वारकामें जाकर चिरकालतक निवास किया और राजा उग्रसेनकी आज्ञासे मृतवत्सा ब्राह्मणीके पुत्रोंको जीवन-दान दिया। उन्होंने उन पुत्रोंको मृतक-स्थानसे लाकर उनकी माताको समर्पित कर दिया। यह देखकर देवकीको परम संतोष हुआ; उन्होंने भी अपने मरे हुए पुत्रोंको लानेकी याचना की। तब श्रीकृष्णने अपने सहोदर भाइयोंको मृतक-स्थानसे लाकर माताको सौंप दिया।

तदनन्तर जो अपने घरसे शरणार्थी होकर द्वारकामें आये थे; उन सुदामा ब्राह्मणकी दरिद्रताको तत्काल ही दूर कर दिया। भक्तवत्सल भगवान्‌ने भक्तके चिउड़ोंकी कनीका स्वयं भोग लगाकर उन्हें सात पीढ़ीतक स्थिर रहनेवाली राजलक्ष्मी प्रदान की। जैसे इन्द्र अमरावतीमें राज्य करते हैं, उसी प्रकार उनका भूतलपर राज्य हो गया। वे ऐसे धनाढ्य हो गये, मानो धनके स्वामी कुबेर ही हों। तत्पश्चात् उन्होंने सुदामाको निश्चल हरिभक्ति, अपनी परम दुर्लभ दासता और अविनाशी गोलोकमें यथेष्ट उत्तम पद प्रदान किया।

मुने! फिर पारिजात-हरणके साथ-साथ उन्होंने इन्द्रके गर्वको दूर किया, सत्यभामासे मनोवाञ्छित पुण्यक-व्रतका अनुष्ठान कराया और सर्वत्र नित्य-नैमित्तिक कर्मोंकी उन्नति की। उस व्रतमें अपने-आपको महर्षि सनत्कुमारके प्रति दक्षिणारूपमें समर्पित कर दिया। ब्राह्मणोंको भोजनसे तृप्त करके उन्हें हर्षपूर्वक रत्नोंकी दक्षिणा दी। इस प्रकार सत्यभामाके उत्कृष्ट मानका सब ओर विस्तार किया। मुने! रुक्मिणी तथा अन्यान्य रानियोंके नये-नये सौभाग्यको, वैष्णवों, देवताओं और ब्राह्मणोंके पूजनको तथा नित्य-नैमित्तिक कर्मोंको सर्वत्र बढ़ाया। उन प्रभुने उद्धवको परम आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया। रणके अवसरपर अर्जुनको गीता सुनायी। कृपालु प्रभुने कृपापरवश हो पृथ्वीको निष्कण्टक करके युधिष्ठिरको राजलक्ष्मी प्रदान की। दुर्गाको वैष्णवी ग्रामदेवताके स्थानपर नियुक्त किया। रमणीय रैवतक पर्वतपर अमूल्य रत्ननिर्मित मन्दिरमें पार्वतीकी प्रसन्नताके लिये नाना प्रकारके नैवेद्यों और मनोहर धूप-दीपोंद्वारा करोड़ों हवनोंसे संयुक्त शुभ यज्ञ कराया। उसमें बहुत-से ब्राह्मणोंको भोजन कराया गया। परमेश्वर गणेशका पूजन किया; उस समय उन्हें नैवेद्यरूपमें अत्यन्त स्वादिष्ट, परम तुष्टिकारक तिलोंके पाँच लाख लड्डू, स्वस्तिकाकार अमृतोपम सात लाख मोदक, शक्करकी सैकड़ों राशियाँ, पके हुए केलेके फल, दस लाख पूये, मिष्टान्न, मनोहर स्वादिष्ट खीर, पूरी-कचौड़ी, घी, माखन, दही और अमृत-तुल्य दूध निवेदित किया। फिर धूप, दीप, पारिजात-पुष्पोंकी माला, सुगन्धित चन्दन, गन्ध और अग्निशुद्ध वस्त्र प्रदान किया। करोड़ों


* स्वयं पुमान् स्वयं स्त्री च स्वयमेव नपुंसकः। कारणं च स्वयं कार्यं जन्यश्च जनकः स्वयम् ॥
(११३।३१)

११५- श्रीशिवजीका बाणको (अनिरुद्धके साथ) कन्यादानके लिये समझाना

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श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७६३

हवनोंसे युक्त शुभ यज्ञ कराया, ब्राह्मणोंको जिमाया और गणेश्वरका स्तवन किया। उस समय दस प्रकारके बाजे बजवाये। साम्बने कुष्ठ-रोगके विनाशके लिये पूरे वर्षभरतक अनुपम उपहारोंद्वारा सूर्यका पूजन किया, उस समय मातासहित साम्बको हविष्यान्नका भोजन कराया गया। तब स्वयं सूर्यदेवने प्रकट होकर साम्बको वरदान दिया और अपना स्तोत्र प्रदान किया। (अध्याय ११३)

अनिरुद्ध और उषाका पृथक्-पृथक् स्वप्नमें दर्शन, चित्रलेखाद्वारा अनिरुद्धका अपहरण, अन्तःपुरमें अनिरुद्ध और उषाका गान्धर्व-विवाह

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! प्रद्युम्न श्रीकृष्णके पुत्र थे, जो महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे। उनके पुत्र अनिरुद्ध थे, जो विधाताके अंशसे उत्पन्न हुए थे। अनिरुद्ध एक दिन निर्जन स्थानमें पुष्प और चन्दनचर्चित पलंगपर सोये हुए थे। उन्होंने स्वप्नमें खिले हुए पुष्पोंके उद्यानमें सुगन्धिकुसुम-शय्यापर सोयी हुई एक अनन्य सुन्दरी नवयुवती रमणीको मधुर-मधुर मुस्कराते देखा। तब अनिरुद्धने 'मैं त्रिलोकीनाथ श्रीकृष्णका पौत्र तथा कन्दर्पका पुत्र हूँ'—यो अपना परिचय देते हुए उस तरुणीसे पतिरूपमें स्वीकार करनेका अनुरोध किया। इसपर उस तरुणीने यथाविधि विवाहित यज्ञपत्नी अर्थात् अग्निकी साक्षीमें जिससे विधिवत् विवाह किया जाता है और कामवृत्तिको चरितार्थ करनेके लिये स्वीकृत नैमित्तिक पत्नीका शुभाशुभ भेद बतलाते हुए कहा—

'मैं बाणासुरकी कन्या हूँ, मेरा नाम उषा है। त्रैलोक्यविजयी बाण शंकरजीके किंकर हैं और शंकर लोकोंके स्वामी हैं। नारी तीनों कालोंमें पराधीन रहती है, वह कभी स्वतन्त्र नहीं होती। जो नारी स्वतन्त्र होती है, वह नीच कुलमें उत्पन्न हुई पुंश्चली होती है। पिता ही कन्याको योग्य वरके हाथ सौंपता है। कन्या वरकी याचना नहीं करती—यही सनातन धर्म है। प्रभो! तुम मेरे योग्य हो और मैं तुम्हारे योग्य हूँ; अतः यदि तुम मुझे पाना चाहते हो तो बाणासुर, शम्भु अथवा सती पार्वतीसे मेरे लिये प्रार्थना करो।' यों कहकर वह सती-साध्वी सुन्दरी अन्तर्धान हो गयी। मुने! तब कामके वशीभूत हुए कामात्मज अनिरुद्धकी नींद सहसा टूट गयी। जागनेपर उन्हें स्वप्नका ज्ञान हुआ। उस समय उनका अन्तःकरण कामसे व्यथित था और वे अपनी उस प्राणवल्लभाको न देखकर व्याकुल और अशान्त हो रहे थे। इस प्रकार पुत्रको उद्विग्न तथा विकल देखकर सती देवकी, रुक्मिणी तथा अन्यान्य सभी महिलाओंने भगवान् श्रीकृष्णको सूचित किया। मधुसूदन श्रीकृष्ण तो परिपूर्णतम तथा सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता ही ठहरे, वे उनकी बात सुनकर ठठाकर हँस पड़े और बोले।

श्रीभगवान्ने कहा—महिलाओ! भगवती दुर्गाने बाणासुरकी कन्याका शीघ्र विवाह हो, इसके लिये अनिरुद्धको स्वप्नमें उसे दिखाया है। अब मैं बाणकन्या उषाको स्वप्नमें अनिरुद्धके दर्शन कराता हूँ। तुमलोग अनिरुद्धके लिये कोई चिन्ता न करो। तदनन्तर श्रीकृष्णके स्वप्नमें उषाको सर्वाङ्गसुन्दर कोटि-कोटि-कन्दर्प-दर्पहारी अनिरुद्धके दर्शन कराये। स्वप्न टूटते ही उषा अत्यन्त व्याकुल हो गयी। उसकी अन्यमनस्कता और विषण्णता देखकर सखी चित्रलेखाने कहा—

'कल्याणि! चेत करो। तुम्हारा यह नगर दुर्लङ्घ्य है। इसमें साक्षात् शम्भु और शिवा वास करती हैं; तब भला, तुम्हें यह भयंकर भय कहाँसे उत्पन्न हो गया? सखी! शिव ही मङ्गलोंके वासस्थान हैं; अतः उनका स्मरणमात्र कर लेनेसे सभी अरिष्ट दूर भाग जाते हैं और सर्वत्र मङ्गल ही होता है। दुर्गतिनाशिनी दुर्गाका ध्यान करनेसे

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७६४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सभी क्लेश नष्ट हो जाते हैं। वे सर्वमङ्गलमङ्गला हैं; अतः ध्यानकर्ताको मङ्गल प्रदान करती हैं।' चित्रलेखाका कथन सुनकर सती उषा फूट-फूटकर रोने लगी और बाण शंकरके निकट ही विषाद करते हुए मूर्च्छित हो गये। यह देखकर शंकर, दुर्गा, कार्तिकेय और गणेश हँसने लगे।

तब गणेश्वर बोले— स्वयं देवी पार्वतीने जाकर स्वप्नमें कामदेव-नन्दन अनिरुद्धको काममत्त बनाया है और इस समय ये शम्भुके वामपार्श्वमें मूक बनी बैठी हैं। भगवान् श्रीहरि तो सर्वज्ञ ही हैं; उन ईश्वरने सारा रहस्य जानकर बाणकन्या उषाको स्वप्नमें सुन्दर-वेषधारी पुरुषका दर्शन कराया है। अतः अब सुयोगिनी चित्रलेखा खेल-ही-खेलमें प्रमत्त अनिरुद्धको लानेके लिये शीघ्र ही द्वारकापुरीको प्रस्थान करे।

ऐसा सुनकर गणेशसे महादेवजीने कहा— बेटा! जिस प्रकार यह शुभ कार्य बाणके श्रवणगोचर न हो, वैसा ही प्रयत्न तुम्हें करना चाहिये।' इधर चित्रलेखा तुरंत ही द्वारकाको चल पड़ी। श्रीहरिका वह भवन यद्यपि सबके लिये दुर्लङ्घ्य था, तथापि वह अनायास ही उसमें प्रवेश कर गयी। वहाँ अनिरुद्ध नींदमें सो रहे थे। उसने योगबलसे हर्षपूर्वक उस नींदमें मते हुए बालकको उठाकर रथपर बैठा लिया। मुने! भद्रा चित्रलेखा मनके समान वेगशालिनी थी। वह उस बालकको लेकर शङ्खध्वनि करके दो ही घड़ीमें शोणितपुर जा पहुँची। तदनन्तर अनिरुद्धको न देखकर श्रीकृष्णके महलोंमें उदासी छा गयी। तब सर्वतत्त्ववेत्ता सर्वज्ञ श्रीकृष्णने सबको आश्वासन देकर शोणितपुरको सेनासहित प्रयाण किया।

इधर महर्षि दुर्वासाकी शिष्या योगिनी चित्रलेखाने—जो नारियोंमें धन्या, पुण्या, मान्या, शान्ता तथा योगसिद्ध होनेके कारण सिद्धिदायिनी थी, माताका स्मरण करके रोते हुए उस बालकको समझाया। फिर स्नान कराकर उसे पुष्पमाला और चन्दनसे विभूषित किया। इस प्रकार उस बालकका सुन्दर वेष बनाकर वह कन्याके अन्तःपुरमें—जो रक्षकोंद्वारा सुरक्षित था—योगबलसे प्रविष्ट हुई। वहाँ आहारका परित्याग कर देनेसे जिसका उदर सट गया था और जिसे सखियाँ चारों ओरसे घेरे हुए थीं; उस उषाको सुरक्षित देखकर शीघ्र ही उसे जगाया। उस समय उषाको भलीभाँति स्नान कराया गया और वस्त्र, माला, चन्दन तथा माङ्गलिक सिन्दूर-पत्रकोंद्वारा उसका श्रृङ्गार किया गया। फिर माहेन्द्र नामक शुभ मुहूर्त आनेपर उसने सखियोंकी गोष्ठीमें उन दोनोंका परस्पर वार्तालाप कराया। पतिको देखकर पतिव्रता उषाका कष्ट दूर हो गया और वह उनके साथ विहार करने लगी। तब प्रद्युम्ननन्दन अनिरुद्धने गान्धर्व-विवाहकी विधिसे उसका पाणिग्रहण कर लिया। विप्रवर! इस प्रकार जब बहुत दिन बीत गये; तब रक्षकद्वारा राजा बाणासुरको यह समाचार सुननेको मिला।

(अध्याय ११४)

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श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७६५

कन्याकी दुःशीलताका समाचार पाकर बाणका युद्धके लिये उद्यत होना; शिव, पार्वती, गणेश, स्कन्द और कोटरीका उसे रोकना; परंतु बाणका स्कन्दको सेनापति बनाकर युद्धके लिये नगरके बाहर निकलना, उषाप्रदत्त रथपर सवार होकर अनिरुद्धका भी युद्धोद्योग करना, बाण और अनिरुद्धका परस्पर वार्तालाप

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! तदनन्तर अन्तःपुरके रक्षकोंने भयभीत हो स्कन्द, गणेश और पार्वतीको दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर प्रणाम किया और अपने स्वामी बाणसे सारा वृत्तान्त कह सुनाया। उसे सुनकर बाणको बड़ी लज्जा हुई और वह क्रुद्ध हो उठा। उस समय शम्भु, गणेश, स्कन्द, पार्वती, भैरवी, भद्रकाली, योगिनियाँ, आठों भैरव, एकादश रुद्र, भूत, प्रेत, कूष्माण्ड, बेताल, ब्रह्मराक्षस, योगीन्द्र, सिद्धेन्द्र, रुद्र, चण्ड आदि तथा माताकी भाँति हितैषिणी करोड़ों ग्रामदेवियाँ—ये सभी उसके हितके लिये बराबर मना कर रहे थे; फिर भी उसने युद्ध करनेका ही विचार निश्चित किया। तब शंकरजी अपनेको पण्डित माननेवाले मूर्ख बाणसे हितकारक, सत्य, नीतिशास्त्रसम्मत और परिणाममें सुखदायक वचन बोले।

श्रीमहादेवजीने कहा— बाण! मैं इस पुरातनी कथाका वर्णन करता हूँ, सुनो। स्वयं परमेश्वर पृथ्वीका भार उतारनेके लिये भारतवर्षमें सभी नरेशोंका संहार करके द्वारकामें विराजमान हैं। जिनके रोमोंमें सारे विश्व वर्तमान हैं, उन वासुके भी वे ईश्वर हैं; इसीलिये विद्वान्‌लोग उन्हें 'वासुदेव' ऐसा कहते हैं। स्वयं भगवान् चक्रपाणि भूतलपर ब्रह्माके भी विधाता हैं। वे ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिके स्वामी हैं; प्रकृतिसे परे, निर्गुण, इच्छारहित, भक्तानुग्रहमूर्ति, परब्रह्म, परम धाम और देहधारियोंके परमात्मा हैं। जिनके शरीरसे निकल जानेपर जीव शवतुल्य हो जाता है; उनके साथ तुम्हारा संग्राम कैसे सम्भव हो सकता है? अनिरुद्ध उन्हींके पुत्र (पौत्र) हैं। वे महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं और क्षणभरमें अकेले ही तीनों लोकोंका संहार करनेमें समर्थ हैं। जितने महारथी बलवान् देवता और दैत्य हैं, वे सभी अनिरुद्धकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं। जिन दो व्यक्तियोंमें समान धन हो और जिनमें बलकी भी समानता हो; उन्हीं दोनोंमें विवाह और मैत्री शोभा देती है। बलवान् और निर्बलका सम्बन्ध उचित नहीं होता। तुम्हारे पिता महारथी बलि दैत्योंके सारभूत और श्रीहरिकी कला थे। उन्हें भी जिसने क्षणभरमें ही सुतल-लोकको भेज दिया; उन्हीं वृन्दावनेश्वर परम पुरुष परिपूर्णतम परमात्मा श्रीकृष्णके सभी जीव अंश-कलाएँ हैं।

पार्वतीजी बोलीं— बाण! ब्रह्मा, महेश, शेष और ध्याननिष्ठ भक्त रात-दिन अपने हृदयकमलमें उन सनातन भगवान्‌का ध्यान करते रहते हैं। सूर्य, गणेश और योगीन्द्रोंके गुरु-के-गुरु शिव उन ऐश्वर्यशाली सनातन परमात्माके ध्यानमें तल्लीन रहते हैं। सनत्कुमार, कपि, नर तथा नारायण अपने हृदय-कमलमें उन सनातन भगवान्‌का ध्यान लगाते हैं। मनु, मुनीन्द्र, सिद्धेन्द्र और योगीन्द्र ध्यानद्वारा अप्राप्य उन सनातन भगवान्‌के ध्यानमें निमग्न रहते हैं। जो सबके आदि, सबके कारण, सर्वेश्वर और परात्पर हैं; उन सनातन भगवान्‌का सभी ज्ञानी ध्यान करते हैं।

तदनन्तर गणेश और स्कन्दने भी बाणको श्रीकृष्णकी महिमा भलीभाँति समझाकर युद्ध न करके अनिरुद्धके साथ उषाका विवाह कर देनेके लिये अनुरोध किया। अन्तमें कोटरी बोली— 'वत्स! धर्मानुसार मैं भी तुम्हारी माता हूँ; अतः

९१- बाणका यादवी सेनाके साथ युद्ध, बाणका धराशायी होना, शंकरजीका बाणको उठाकर श्रीकृष्णके चरणोंमें डाल देना, श्रीकृष्णद्वारा बाणको जीवन-दान, बाणका श्रीकृष्णको बहुत-से दहेजके साथ अपनी कन्या समर्पित करना, श्रीकृष्णका पौत्र और पौत्रवधूके साथ द्वारकाको लौट जाना और द्वारकामें महोत्सव

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७६६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

जो कुछ कहती हूँ, उसे श्रवण करो। दुष्ट पुत्रसे भी माता-पिताको पद-पदपर दुःख ही होता है। दूसरेके द्वारा ग्रहण की गयी वह कन्या उषा अब दूसरेको देनेके योग्य नहीं ही है; अतः जो श्रीकृष्णके पौत्र और प्रद्युम्नके पुत्र हैं; उन महान् बलशाली अनिरुद्धको स्वेच्छानुसार अपनी कन्या दान कर दो। इससे तुम भारतवर्षमें अपनी सात पीढ़ियोंके साथ पावन हो जाओगे। फिर भूतलपर महान् यशकी प्राप्तिके लिये अपना सर्वस्व दहेजमें समर्पित कर दो। अन्यथा माधव युद्धस्थलमें सुदर्शन-चक्रद्वारा तुम्हारा वध कर डालेंगे। उस समय कौन तुम्हारी रक्षा कर सकेगा?'

मुने! कोटरीकी बात सुनकर अभिमानी दैत्यश्रेष्ठ बाण कुपित हो उठा। वह रथपर आरूढ़ हो उस स्थानके लिये प्रस्थित हुआ जहाँ श्रीहरिके पौत्र अनिरुद्ध वर्तमान थे। उस समय भक्तवत्सल शंकरकी आज्ञासे स्कन्द सेनापति होकर उसके साथ चले। स्वयं शिव और गणेशने बाणके लिये स्वस्तिवाचन किया। पार्वती तथा कोटरीने उसे शुभाशीर्वाद दिया। आठों भैरव और एकादश रुद्र—ये सभी हाथोंमें शस्त्र धारण करके युद्धके लिये तैयार हुए। इस बीच एक दूतने, जिसे पार्वतीदेवी तथा बाणपत्नीने भेजा था, तुरंत ही जाकर अनिरुद्धको भी यह समाचार सूचित कर दिया।

दूत बोला—अनिरुद्ध! उठो और पार्वतीका यह मङ्गल-वचन श्रवण करो। (उन्होंने कहा है—) 'वत्स! कवच धारण कर लो और बाहर निकलकर युद्ध करो।' यह सुनकर उषा भयभीत हो गयी; वह डरके मारे रोती हुई सती पार्वतीका ध्यान करके बोली—'महामाये! मेरे मनोनीत प्राणेश्वरकी रक्षा करो, रक्षा करो। यद्यपि ये निर्भय हैं; तथापि इस महाभयंकर संग्राममें इन्हें अभयदान दो। तुम्हीं जगत्की माता हो; अतः तुम्हारा सबपर समान स्नेह है।'

तत्पश्चात् ऐश्वर्यशाली अनिरुद्धने कवच पहनकर हाथमें शस्त्र धारण किये और उषाद्वारा दिये गये रथको पाकर वे उसपर हर्षपूर्वक आरूढ़ हुए। शिविरसे बाहर निकलकर उन्होंने बाणको देखा, जो कवच पहनकर हाथोंमें शस्त्र धारण किये हुए था। उसके नेत्र क्रोधसे लाल हो रहे थे। अनिरुद्धको देखकर बाण क्रोधसे भर गया। वह उस घोर संग्रामके मध्य प्रज्वलित होता हुआ विषोक्तियाँ उगलने लगा। उसने भाँति-भाँतिसे श्रीकृष्णके चरित्रपर दोषारोपण करके उनकी निन्दा की और अनिरुद्धने उसका विवेकपूर्ण खण्डन करके श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन किया।

(अध्याय ११५)


बाण और अनिरुद्धके संवाद-प्रसङ्गमें अनिरुद्धद्वारा द्रौपदीके पाँच पति होनेका वर्णन, बाणसेनापति सुभद्रका अनिरुद्धके साथ युद्ध और अनिरुद्धद्वारा उसका वध

बाणने कहा—अनिरुद्ध! तुम बड़े बुद्धिमान् हो। तुम्हारा कथन सत्य ही है। शम्भुने भी ऐसा ही बतलाया था। अब तुमने जो यह कहा है कि महाभागा द्रौपदी शंकरजीके वरदानसे पाँच पतियोंकी प्रिया थीं, वह वृत्तान्त विस्तारपूर्वक मुझसे वर्णन करो। साथ ही यह भी बतलाओ कि पहले शम्बरने तुम्हारी माता रतिका किस प्रकार अपहरण किया था? उसने देवताओंको पराजित कैसे किया था? और देवगणोंने किस तरह रतिको उसे प्रदान किया था?

अनिरुद्ध बोले—बाण! एक समयकी बात है। पञ्चवटीमें श्रीरघुनाथजी सीता और लक्ष्मणके साथ सरोवरमें स्नान करके उसके रमणीय तटपर बैठे हुए थे। उस समय हेमन्तका समय था;

११६- बाणासुरका हजारों बाण चलाना

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श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७६७

अतः उन्होंने सीतासे कहा—'प्रिये! इस समय अत्यन्त स्वादिष्ट निर्मल जल, अन्न, मनोहर व्यञ्जन तथा सारी वस्तुएँ अत्यन्त शीतल हैं।' यों कहकर उन्होंने फल-संग्रह किया और हर्षपूर्वक उन्हें सीताको प्रदान किया। तत्पश्चात् लक्ष्मणको देकर पीछे स्वयं प्रभुने भोग लगाया। लक्ष्मणने वह फल और जल ले तो लिया, परंतु खाया नहीं; क्योंकि वे सीताका उद्धार करनेके लिये मेघनादका वध करना चाहते थे। (उनको यह पता था कि) जो चौदह वर्षतक न तो नींद लेगा और न भोजन करेगा; वही योगी पुरुष उस रावणकुमार मेघनादको मार सकेगा। इसी बीच कमललोचन रामका दर्शन करनेके लिये कृपानिधि अग्नि ब्राह्मणका वेष धारण करके वहाँ आये और कर्णकटु भविष्य-वचन कहने लगे।

अग्निदेव बोले—महाभाग राम! मेरी बात सुनो और सीताकी भलीभाँति रक्षा करो; क्योंकि प्राक्तन कर्मवश दुर्निवार्य एवं दुष्ट राक्षस रावण सात दिनके भीतर ही जानकीको हर ले जायगा। भला, विधाताने जिस प्राक्तन कर्मको लिख दिया है; उसे कौन मिटा सकता है? चारों देवताओंने भी यही कहा है कि दैवसे बढ़कर श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है।

तब श्रीरामजीने कहा—अग्निदेव! तब तो सीताको आप अपने साथ लेते जाइये और उसकी छाया यहीं रहेगी; क्योंकि पत्नीके बिना किया हुआ कर्म सभीके लिये निन्दित होता है। तब अग्निदेव रोती हुई सीताको साथ लेकर चले गये और सीताके सदृश जो छाया थी; वह रामके संनिकट रहने लगी। पूर्वकालमें रावणने खेल-ही-खेलमें उसी छायाका हरण किया था और श्रीरामने भाई-बन्धुओंसहित उस रावणका वध करके उस छायाका ही उद्धार किया था। अग्नि-परीक्षाके अवसरपर जो छाया अग्निमें प्रविष्ट हुई थी; उस छायाको अपने संरक्षणमें रखकर अग्निने रामको असली जानकी लौटा दी। तब श्रीराम जानकीको लेकर हर्षपूर्वक अपने आश्रमको चले गये और छाया दुःखित हृदयसे अग्निके पास रहने लगी। वही छाया नारायण-सरोवरमें जाकर तप करने लगी। उसने सौ दिव्य वर्षोंतक शंकरजीके लिये घोर तपस्या की; तब शंकरजी प्रकट होकर उससे बोले—'भद्रे! वर माँगो।' वह पतिके दुःखसे दुःखी थी; अतः व्यग्रतापूर्वक शिवजीसे बोली। उसने उस व्यग्रतामें ही त्रिनेत्रधारी शिवजीसे 'पतिं देहि'—पति दीजिये यों पाँच बार वर माँगा। तब सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके प्रदाता शिव प्रसन्न होकर उसे वर देते हुए बोले।

श्रीमहादेवजीने कहा—साध्वि! तुमने व्याकुल होकर 'पतिं देहि'—पति दीजिये यों पाँच बार कहा है; अतः श्रीहरिके अंशभूत पाँच इन्द्र तुम्हारे पति होंगे। वे ही सभी पाँचों इन्द्र इस समय पाँच पाण्डव हुए हैं और वह छाया द्रौपदीरूपमें यज्ञकुण्डसे उत्पन्न हुई है। यही छाया कृतयुगमें वेदवती, त्रेतामें जनकनन्दिनी और द्वापरमें द्रौपदी हुई है; इसी कारण यह त्रिहायणी कृष्णा कहलाती है। यह वैष्णवी तथा श्रीकृष्णकी भक्त है; इसलिये भी कृष्णा कही जाती है। वही पीछे चलकर महेन्द्रोंकी स्वर्गलक्ष्मी होगी। राजा द्रुपदने कन्याके स्वयंवरमें उसे अर्जुनको दिया। वीरवर अर्जुनने मातासे पूछा—'माँ! इस समय मुझे एक वस्तु मिली है।' तब माताने अर्जुनसे कहा—'उसे सभी भाइयोंके साथ बाँटकर ग्रहण करो।' इस प्रकार पहले शम्भुका वरदान था ही, पीछे माता कुन्तीकी भी आज्ञा हो गयी—इसी कारण पाँचों पाण्डव द्रौपदीके पति हुए। ये पाँचों पाण्डव चौदह इन्द्रोंमेंसे पाँच इन्द्र हैं।

माताद्वारा भर्त्सना किये जानेपर शंकरजीने मेरी माता रतिको शाप देते हुए कहा—'रति! तुम्हारा पति शंकरकी क्रोधाग्निसे जलकर भस्म हो जायगा। इस समय तुम शापित होकर दैत्यके

११८- शिवजीद्वारा बाणासुरको श्रीकृष्णके चरणमें समर्पित करना

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७६८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अधीन होओगी। शम्बरासुर इन्द्रसहित देवताओंको जीतकर तुम्हें हर ले जायगा।' यों कहकर उन्होंने पुनः वरदान भी दिया—'तुम्हारा सतीत्व नष्ट नहीं होगा। जबतक तुम्हारा पति जीवित नहीं हो जाता, तबतक तुम शम्बरासुरको अपनी छाया देकर उसके घरमें वास करो।' दैत्येन्द्र! इस प्रकार मैंने तुमसे वह सारा पुरातन इतिहास कह सुनाया; अब देवोंके गुप्त चरित्रको श्रवण करो।

इसी समय बाणका प्रधान सेनापति महाबली सुभद्रने, जो कुम्भाण्डका भाई, बलसम्पन्न और महारथी था, शस्त्रोंसे लैस होकर समरभूमिमें बाणकी निर्भर्त्सना करके श्रीकृष्णपौत्र अनिरुद्धपर प्रलयाग्निकी भाँति चमकीला त्रिशूल चलाया; परंतु प्रद्युम्नकुमारने एक अर्धचन्द्रद्वारा उस शूलके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। तब सुभद्रने सैकड़ों सूर्योंके समान प्रभावाली शक्ति फेंकी। अनिरुद्धने वैष्णवास्त्रद्वारा उस शक्तिको भी काट गिराया। फिर तो घोर संग्राम आरम्भ हो गया। अनिरुद्धने सुभद्रको मार गिराया। तदनन्तर बाणके साथ भयंकर युद्ध हुआ। जब अनिरुद्ध बाणासुरका वध करनेको उद्यत हुए, तब कार्तिकेयने उसे बचा लिया। फिर कार्तिकेयके साथ उनका महान् संग्राम हुआ।

(अध्याय ११६)


गणेश-शिव-संवाद

**श्रीनारायण कहते हैं—**नारद! इसी समय गणेशने शिवजीके स्थानपर जाकर उन महेश्वरको नमस्कार किया और बाण-अनिरुद्धका युद्ध, सुभद्राका वध, स्कन्द और अनिरुद्धका युद्ध तथा अनिरुद्धका प्रबल पराक्रम—यह सारा वृत्तान्त क्रमशः पृथक्-पृथक् कह सुनाया। गणेशका कथन सुनकर भगवान् शंकर हँस पड़े और कोमल वाणीद्वारा परम गुप्त एवं वेदसम्मत वचन बोले।

**श्रीमहादेवजीने कहा—**महाभाग गणेश्वर! मेरा वचन, जो हितकारक, तथ्य, नीतिका साररूप तथा परिणाममें सुखदायक है, उसे श्रवण करो। असंख्य विश्वोंका समुदाय, कृष्णकुमार प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा जो कार्य और कारणोंका कारण है, वह सब कुछ श्रीकृष्णको ही जानो। गणेश्वर! ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सारा जगत् सनातन भगवान् श्रीकृष्णका स्वरूप है—इसे सत्य समझो। जो गोलोकमें दो भुजाधारी, शान्त, राधाके प्रियतम, मनोहर रूपवाले, शिशुरूप, गोप-वेषधारी, परिपूर्णतम प्रभु हैं; गोपियों, गोपसमुदायों तथा कामधेनुओंसे घिरे रहते हैं; पवित्र रमणीय वृन्दावनके रासमण्डलमें जो हाथमें मुरली लिये विचरते रहते हैं; ब्रह्मा, शिव, शेष जिनकी वन्दना करते हैं; जो शैलराज शतशृङ्गपर वटकी शान्त छायामें तथा भाण्डीरके निकट विरजा नदीके निर्मल तटपर स्थित गोष्ठमें विहार करते हैं; जिनके शरीरका वर्ण नूतन जलधरके समान श्याम है, पीताम्बरद्वारा जिनकी उसी प्रकार शोभा होती है, जैसे मेघोंकी नयी घटा बिजलीसे सुशोभित होती है। उस सबका गोलोकस्थित रासमण्डलमें आविर्भाव होता है। रमणीय गोकुल तथा पुण्य वृन्दावनमें जितने जीव हैं, वे सभी उस परम पुरुषकी अंशकलाएँ हैं; किंतु श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। परिपूर्णतम काम ब्रह्मशापके कारण अपनेको भूल गया है। अनिरुद्ध उसी कामके पुत्र हैं, जो महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं। इस अत्यन्त भयंकर महायुद्धमें मैंने ही स्कन्दको भेजा है। इस संग्राममें बाण मर चुका था; परंतु उस स्कन्दने ही उसे बचा लिया है। गणेश्वर! युद्धमें स्कन्द और अनिरुद्धकी समानता तो है,

९२- शृगालोपाख्यान

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श्रीकृष्णजन्मखण्ड

७६९

किंतु आठों भैरव, एकादश रुद्र, आठ वसु, इन्द्र आदि ये देवगण, द्वादश आदित्य, सभी दैत्यराज, देवताओंके अग्रणी स्कन्द तथा गणसहित बाण—ये सभी संग्राममें अनिरुद्धको पराजित नहीं कर सकते। अनिरुद्ध स्वयं ब्रह्मा, प्रद्युम्न कामदेव, बलदेव स्वयं शेषनाग और श्रीकृष्ण प्रकृतिसे परे

हैं। गणेश्वर ! इस प्रकार यह सारा रहस्य मैंने तुम्हें बता दिया। तुम तो स्वयं ही शुभस्वरूप और विघ्नोंका विनाश करनेवाले हो; अतः बाणकी रक्षा करो। श्रीहरि अस्त्रश्रेष्ठ सुदर्शनको, जो अमोघ और करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान् है, लेकर शीघ्र ही आयेंगे।

(अध्याय ११७)


मणिभद्रका शिवजीको सेनासहित श्रीकृष्णके पधारनेकी सूचना देना, शिवजीका बाणकी रक्षाके लिये दुर्गासे कहना, दुर्गाका बाणको युद्धसे विरत होनेकी सलाह देना

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! इस प्रकार गणेशको समझाकर शिवजी महलके भीतर गये। वहाँ दुर्गतिनाशिनी दुर्गा, भैरवी, भद्रकाली, उग्रचण्डा और कोटरी रमणीय सिंहासनोंपर विराजमान थीं। उन सबने सहसा उठकर जगदीश्वर शिवको नमस्कार किया। तत्पश्चात् गणेश, पराक्रमी कार्तिकेय, बाण, वीरभद्र, स्वयं नन्दी, सुनन्दक, महामन्त्री महाकाल, आठों भैरव, सिद्धेन्द्र, योगीन्द्र और एकादश रुद्र—ये सभी वहाँ आ गये। इसी बीच सिंहद्वारपर पहरा देनेवाला स्वयं मणिभद्र वहाँ आया और उन परमेश्वर शिवसे बोला।

मणिभद्रने कहा—महेश्वर ! बलदेव, प्रद्युम्न, साम्ब, सात्यकि, महाराज उग्रसेन, स्वयं भीम, अर्जुन, अक्रूर, उद्धव और शक्रनन्दन जयन्त तथा जो विधिके भी विधाता हैं, जिनकी कान्ति करोड़ों कामदेवोंकी शोभाको छीने लेती है, वनमाला जिनकी शोभा बढ़ा रही है, सात गोप-पार्षद श्वेत चँवरोंद्वारा जिनकी सेवा कर रहे हैं, जो करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान् अनुपम चक्र धारण करते हैं; वे परमेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण बहुमूल्य रत्नोंके सारभागसे निर्मित परम रमणीय उत्तम रथमें कौमोदकी गदा, अमोघ शूल और विश्वसंहारकारी महाशङ्ख पाञ्चजन्य रखकर यादवोंकी असंख्य

सेनाओंके साथ पधार गये हैं। प्रभो! बलदेवने हलके द्वारा लाखों मल्लोंका कचूमर निकाल दिया है और उद्यानोंकी चहारदीवारीको तोड़-फोड़ डाला है। वे द्वारपालोंका वध करके महाद्वारमें घुस आये हैं। ऐसा सुनकर महादेवजी उस सुर-समाजमें पार्वती, भद्रकाली, स्कन्द, गणपति, आठों भैरवों, एकादश रुद्रों, वीरभद्र, महाकाल, नन्दी तथा सभी नवों सेनापतियोंसे बोले।

श्रीमहादेवजीने कहा—सेनाध्यक्षो ! गोलोक-नाथ भगवान् चक्रपाणि आ गये हैं। वे क्षणभरमें विश्व-समूहका विनाश कर सकते हैं; फिर इस नगरकी तो बात ही क्या है। अतः तुम सब लोग सभी उपायोंद्वारा यलपूर्वक बाणकी रक्षा करो। अब बाण लम्बोदर गणेशका स्मरण करके संग्रामभूमिको जाय। उसके दक्षिणभागमें स्कन्द, आगे-आगे गणेश्वर और वामभागमें आठों भैरव, एकादश रुद्र, स्वयं महारथी नन्दी, महाकाल, वीरभद्र तथा अन्यान्य सैनिक उसकी रक्षा करें। ऊर्ध्वभागमें दुर्गा, भद्रकाली, उग्रचण्डा और कोटरीको रहना चाहिये। दुर्गतिनाशिनी दुर्गे! बाणकी रक्षा करो। महाभागे! तुम्हीं श्रीकृष्णकी शक्ति हो; इसीलिये 'नारायणी' कही जाती हो। विष्णुमाये! तुम जगज्जननी तथा सम्पूर्ण मङ्गलोंकी भी मङ्गलस्वरूपा हो; अतः चक्रोंके साररूप

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७७०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अमोघ सुदर्शनचक्रसे बाणको बचाओ; क्योंकि बाण मुझे गणेश, कार्तिकेय आदि सभीसे भी बढ़कर प्रिय है। अतः बाणके मस्तकपर तुम अपने चरणकमलकी रजके साथ-साथ अपना वरद हस्त स्थापित करो। शिवजीका कथन सुनकर दुर्गतिनाशिनी दुर्गा मुस्करायीं और समयोचित यथार्थ मधुर वचन बोलीं।

पार्वतीजीने कहा—बाण! तुम्हारे पास जो-जो उत्तम मणि, रत्न, मोती, माणिक्य और हीरे आदि हैं, उस सारे धनको तथा रत्नाभरणोंसे विभूषित अपनी कन्या उषाको रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित परम श्रेष्ठ अनिरुद्धको आगे करके परमात्मा श्रीकृष्णको सौंप दो और इस प्रकार अपने राज्यको निष्कण्टक बना लो। भला, जिसके निकल जानेपर इन्द्रियोंसहित सभी प्राण विलीन हो जाते हैं, उस जीवका आत्माके साथ युद्ध कैसा? मैं ही शक्ति हूँ, ब्रह्मा मन हैं और स्वयं शिव ज्ञानस्वरूप हैं। शिवका त्याग करके देह तुरंत ही गिर जाता है और शवरूप हो जाता है। शिवजी! भला, संग्राममें सुदर्शनचक्रके तेजके सामने कौन ठहर सकता है? श्रीकृष्ण सबके परमात्मा, भक्तानुग्रहमूर्ति, नित्य, सत्य, परिपूर्णतम प्रभु हैं। गणेश और कार्तिकेय तथा उन दोनोंसे भी परे आप मेरे लिये प्रिय हैं और किंकरोंमें बाण प्रिय है; किंतु श्रीकृष्णसे बढ़कर प्यारा दूसरा कोई नहीं है। मैं ही वैकुण्ठमें महालक्ष्मी, गोलोकमें स्वयं राधिका, शिवलोकमें शिवा और ब्रह्मलोकमें सरस्वती हूँ। पूर्वकालमें मैं ही दैत्योंका संहार करके दक्षकन्या सती हुई, फिर वही मैं आपकी निन्दाके कारण शरीरका त्याग करके शैलकन्या पार्वती बनी। रक्तबीजके युद्धमें मैंने ही मूर्तिभेदसे कालीका रूप धारण किया था। मैं ही वेदमाता सावित्री, जनकनन्दिनी सीता और भारतभूमिपर द्वारकामें भीष्मक-पुत्री रुक्मिणी हूँ। इस समय दैववश सुदामाके शापसे मैं वृषभानुकी कन्या होकर प्रकट हुई हूँ और पुण्यमय वृन्दावनमें श्रीकृष्णकी धर्मपत्नी हूँ। आप तो स्वयं सर्वज्ञ सनातन भगवान् शिव हैं। भला, मैं आपको क्या समयोचित कर्तव्य बतला सकती हूँ।

(अध्याय ११८)


शिवजीका कन्या देनेके लिये बाणको समझाना, बाणका उसे अस्वीकार करना, बलिका आगमन और सत्कार, बलिका महादेवजीका चरणवन्दन करके श्रीभगवान्‌का स्तवन करना, श्रीभगवान्‌द्वारा बलिको बाणके न मारनेका आश्वासन

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! पार्वतीकी बात सुनकर गणेश, कार्तिकेय, काली तथा स्वयं शिव उनकी प्रशंसा करने लगे। तदनन्तर जो परात्परा, ज्योतिःस्वरूपा, परमा, मूलप्रकृति और ईश्वरी हैं; उन जगज्जननी पार्वतीसे भगवान् शम्भु बोले।

श्रीमहादेवजीने कहा—देवेशि! तुमने जो यह कहा है कि परमात्माके साथ युद्ध करना अयुक्त तथा उपहासास्पद है; अतः बाण अपनी कन्या उषाको स्वर्णनिर्मित आभूषणोंसे विभूषित करके श्रीकृष्णको दे दे। यही समस्त कर्मोंमें सामञ्जस्य, यशस्कर और शुभदायक है। तुम्हारा यह सारा कथन वेदसम्मत है; परंतु बाण हिरण्यकशिपुका वंशज है; अतः यदि वह कन्या दे देता है और भयभीत होकर युद्धसे पराङ्मुख हो जाता है तो यह तुम्हारे लिये ही अकीर्तिकर है। इसलिये शिवे! रणशास्त्रविशारद बाण कवच धारण करके आगे चले; तत्पश्चात् हमलोग भी कवचसे सुसज्जित हो उसका अनुगमन करेंगे। पार्वतीसे यों कहकर शंकरजीने बाणसे कन्या

९३- गणेशके अग्रपूज्यत्व-वर्णनके प्रसङ्गमें राधाद्वारा गणेशकी अग्रपूजाका कथन

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श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७७१

देनेके लिये कहा; किंतु उसने स्वीकार नहीं किया। तब दुर्गा उसे समझाने लगीं; परंतु उनकी उत्तम बात उसकी समझमें न आयी। इसी समय महाबली बलि—जो महान् धर्मात्मा, वैष्णवोंमें अग्रगण्य और परमार्थके ज्ञाता हैं—रत्ननिर्मित रथपर आरूढ़ हो उस मनोरम सभामें आये। उस समय सात प्रयत्नशील दैत्य श्वेत चँवरोंद्वारा उनकी सेवा कर रहे थे और सात लाख दैत्येन्द्र उन्हें घेरे हुए थे। वे तुरंत ही रथसे उतरकर शिव, पार्वती, गणेश और कार्तिकेयको प्रणाम करके उस सभामें अवस्थित हुए। उन्हें निकट आया देखकर शंकरजीके अतिरिक्त अन्य सभी सभासद् उठ खड़े हुए। तब महादेवजी कुशल-प्रश्नके बाद उनसे मधुर वचन बोले।

श्रीमहादेवजीने कहा—भगवन्! तुम बड़े चतुर तथा सम्पूर्ण सम्पत्तियोंके प्रदाता हो। ऐसे वैष्णवोंके साथ समागम होना ही परम लाभ है; क्योंकि वैष्णवके स्पर्शमात्रसे तीर्थ भी पवित्र हो जाते हैं। पवित्र ब्राह्मण सभी आश्रमोंके लिये पूजनीय होता है। उसमें भी यदि ब्राह्मण वैष्णव हो तो उससे भी अधिक पूज्य माना जाता है। मैं वैष्णव ब्राह्मणसे बढ़कर पवित्र किसीको नहीं देखता। वह पवन, अग्नि और समस्त तीर्थोंसे भी अधिक पावन है। उससे देवता भी डरते हैं। उसके शरीरमें पाप उसी प्रकार नहीं ठहरते; जैसे अग्निमें पड़ा हुआ सूखा घास-फूस।

तब बलि बोले—जगन्नाथ! आप मेरी प्रशंसा क्यों कर रहे हैं? महेश्वर! मैं तो आपका भृत्य हूँ न? नाथ! आपने ही तो मुझे अत्यन्त दुर्लभ परम ऐश्वर्य प्रदान किया है। सुरेश्वर! आप सर्वरूप तथा सर्वत्र वर्तमान हैं। इस समय दैववश आपने वामनरूप धारण करके मुझ भक्तसे ऐश्वर्य छीनकर इन्द्रको दे दिया है और मुझे सृष्टिके अधोभागमें स्थित सुतललोकमें स्थापित कर रखा है। अब मेरे औरस पुत्र बाणको, जिस प्रकार उसका कल्याण हो, शिक्षा दीजिये; क्योंकि आत्माके साथ युद्ध करना देवताओंमें भी निन्दित है। यों कहकर उन्होंने शिवजीको नमस्कार करके उनके चरणोंमें सिर रख दिया। उस समय उनका सारा शरीर पुलकित हो उठा। नेत्रोंमें आँसू छलक आये और वे अत्यन्त व्याकुल हो गये। तदनन्तर शुक्रद्वारा दिये गये एकादशाक्षरमन्त्रका जप करके वे सामवेदोक्त स्तोत्रद्वारा परमेश्वरकी स्तुति करने लगे।

बलिने कहा—प्रभो! पूर्वकालमें माता अदितिदेवीकी प्रार्थना तथा व्रतके फलस्वरूप आपने वामनरूप धारण करके मेरी वञ्चना की थी और सम्पत्तिरूपिणी महालक्ष्मीको मुझसे छीनकर मेरे पुण्यवान् भाई इन्द्रको, जो आपके भक्त हैं, दिया था। इस समय मेरा यह पुत्र बाण, जो शंकरजीका किङ्कर है; जिसकी भक्तोंके बन्धु उन शंकरजीने अपने पास रखकर रक्षा की है; माता पार्वतीने जिसका उसी भाँति पालन-पोषण किया है, जैसे माता अपने पुत्रका पालन करती है; उसी बाणकी सती-साध्वी युवती कन्याको (अनिरुद्धने) बलपूर्वक ग्रहण कर लिया

९४- गणेशकृत राधा-प्रशंसा, पार्वती-राधा-सम्भाषण, पार्वतीके आदेशसे सखियोंद्वारा राधाका शृङ्गार और उनकी विचित्र झाँकी; ब्रह्मा, शिव, अनन्त आदिके द्वारा राधाकी स्तुति

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७७२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

है और वे बाणको भी मारनेके लिये उद्यत थे; परंतु कार्तिकेयने उसे बचा लिया है। फिर आप भी अपने पौत्रका दमन करनेमें समर्थ बाणको मारनेके लिये पधारे हैं। जगदीश्वर! श्रुतिमें तो ऐसा सुना गया है कि आप सर्वात्माका सर्वत्र समभाव रहता है; फिर ऐसा व्यतिक्रम आप क्यों कर रहे हैं? भला, जिसका वध आप करना चाहते हैं, उसकी इस भूतलपर कौन रक्षा कर सकता है? सुदर्शनका तेज करोड़ों सूर्योंके समान परमोत्कृष्ट है। भला, किन देवताओंके अस्त्रसे उसका निवारण हो सकता है? जैसे सुदर्शन अस्त्रोंमें सर्वश्रेष्ठ है; उसी प्रकार आप भी समस्त देवताओंके परमेश्वर हैं। जैसे आप हैं; उसी तरह श्रीकृष्ण भी ब्रह्माके विधाता हैं। विष्णु सत्त्वगुणके आधार, शिव सत्त्वके आश्रयस्थान और स्वयं सृष्टिकर्ता पितामह रजोगुणके विधाता हैं। जो तमोगुणके आश्रय, एकादश रुद्रोंमें सर्वश्रेष्ठ, विश्वके संहार-कर्ता एवं महान् हैं; वे भगवान् कालाग्निरुद्र शंकरके अंश हैं। इनके अतिरिक्त अन्य रुद्रगण शंकरजीकी कलाएँ हैं। उन सबमें आप गुणरहित तथा प्रकृतिसे परे हैं। आप सबके परमात्मा हैं। सभी प्राणधारियोंके प्राण विष्णुके स्वरूप हैं; स्वयं ब्रह्मा मनरूप हैं और स्वयं शिव ज्ञानात्मक हैं। समस्त शक्तियोंमें श्रेष्ठ ईश्वरी प्रकृति बुद्धि है। समस्त देहधारियोंमें जो जीव है, वह आपके ही आत्माका प्रतिबिम्ब है। जीव अपने कर्मोंका भोक्ता है और स्वयं आप उसके साक्षी हैं। आपके चले जानेपर सभी उसी प्रकार आपका अनुगमन करते हैं, जैसे राजाके चलनेपर उसके अनुगामी। आपके निकल जानेपर शरीर तुरंत धराशायी हो जाता है और शवरूप होकर अस्पृश्य बन जाता है; परंतु आपकी मायासे वञ्चित होनेके कारण बुद्धिमान् संतलोग इसे नहीं जान पाते। जो संत आपका भजन करते हैं; वे ही इस मायासे तर पाते हैं। त्रिगुणा प्रकृति, दुर्गा, वैष्णवी, सनातनी परा नारायणी और ईशानी—ये सब आपकी मायाके स्वरूप हैं। इनसे पार पाना अत्यन्त कठिन है। प्रत्येक विश्वमें होनेवाले ब्रह्मा, विष्णु और शिव आपके ही अंश हैं। जैसे विश्वेश्वर श्रीकृष्ण गोकुलमें वास करते हैं; उसी तरह जो समस्त लोकोंके आश्रय हैं, वे महान् विराट् योगबलसे जलमें शयन करते हैं। वे ही भगवान् वासु हैं, जिनके परम देवता आप हैं; इसीसे ‘वासुदेव’ नामसे विख्यात हैं—ऐसा पुरातत्त्ववेत्ता कहते हैं। आप ही अपनी कलासे सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, पवन, वरुण, कुबेर, यम, महेन्द्र, धर्म, शेष, ईशान तथ निर्ऋतिके रूपमें विराजमान हैं। मुनिसमुदाय, मनुगण, फलदायक ग्रह और समस्त चराचर जीव आपकी कलाके कलांशसे उत्पन्न हुए हैं। आप ही परम ज्योतिः-स्वरूप ब्रह्म हैं। योगीलोग आपका ही ध्यान करते हैं। आपके भक्तगण अपने अन्तःकरणमें आपका ही आदर करते तथा ध्यान लगाते हैं। (ध्यानका प्रकार यों है—)

जिनके शरीरका वर्ण नूतन जलधरके समान श्याम है, पीताम्बर ही जिनका परिधान है, जिनके प्रसन्नमुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छायी हुई है, जो भक्तोंके स्वामी तथा भक्तवत्सल हैं, जिनका सर्वाङ्ग चन्दनसे अनुलिप्त है, जिनकी दो भुजाएँ हैं, जो मुरली धारण किये हुए हैं, जिनकी चूड़ामें मयूरपिच्छ शोभा दे रहा है; जो मालतीकी माला, अमूल्य रत्ननिर्मित बाजूबंद और कंकणसे विभूषित हैं, मणियोंके बने हुए दोनों कुण्डलोंसे जिनका गण्डस्थल उद्भासित हो रहा है, जो रत्नोंके सारभागसे बनी हुई अँगूठी और बजती हुई करधनीसे सुसज्जित हैं, जिनकी आभा करोड़ों कामदेवोंका उपहास कर रही है, जिनके नेत्र शारदीय कमलकी शोभाको पराजित कर रहे हैं, जिनकी मुख-छबि शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी निन्दा कर रही है और प्रभा करोड़ों चन्द्रमाओंके समान

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· श्रीकृष्णजन्मखण्ड · ७७३

समुज्ज्वल है; करोड़ों-करोड़ों गोपियाँ मुसकराती हुई जिनकी ओर निहार रही हैं, समवयस्क गोप-पार्षद श्वेत चँवर डुलाकर जिनकी सेवा कर रहे हैं, जिनका वेष गोपालकके सदृश है; जो राधाके वक्षःस्थलपर स्थित एवं ध्यानद्वारा असाध्य और दुराराध्य हैं; ब्रह्मा, शिव और शेष जिनकी वन्दना करते हैं और सिद्धेन्द्र, मुनीन्द्र तथा योगीन्द्र प्रणत होकर जिनका स्तवन करते हैं; जो वेदोंद्वारा अनिर्वचनीय, परस्वेच्छामय और सर्वव्यापक हैं एवं जिनका स्वरूप स्थूलसे स्थूलतम और सूक्ष्मसे सूक्ष्मतम है; जो सत्य, नित्य, प्रशस्त, प्रकृतिसे परे, ईश्वर, निर्लिप्त और निरीह हैं; उन सनातन भगवान्‌का इस प्रकार ध्यान करके वे पवित्र हो जाते हैं और पद्माद्वारा समर्चित चरणकमलोंमें कोमल दूर्वाङ्कुर, अक्षत तथा जल निवेदित करनेके लिये उत्सुक हो उठते हैं। भगवन् ! वेद, सरस्वती, शेषनाग, ब्रह्मा, शम्भू, गणेश, सूर्य, चन्द्रमा, महेन्द्र और कुबेर—ये सभी आप परमेश्वरका स्तवन करनेमें समर्थ नहीं हैं; फिर अन्य जडबुद्धि जीवोंकी तो गणना ही क्या है। ऐसी दशामें मैं आप गुणातीत, निरीह, निर्गुण परमेश्वरकी क्या स्तुति कर सकता हूँ? नाथ ! यह एक मूर्ख असुर है, सुर नहीं है; अतः आप इसे क्षमा करें। बलिक कथन सुनकर जगदीश्वर परिपूर्णतम भक्तवत्सल भगवान् श्रीहरि अपने उस भक्तसे बोले।

श्रीभगवान्‌ने कहा— वत्स! डरो मत। तुम मेरे द्वारा सुरक्षित अपने गृह सुतललोकको जाओ। मेरे वर-प्रसादसे तुम्हारा यह पुत्र भी अजर-अमर होगा। मैं इस मूर्ख अभिमानीके दर्पका ही विनाश करूँगा; क्योंकि मैंने प्रसन्नचित्तसे अपने तपस्वी भक्त प्रह्लादको ऐसा वर दे रखा है कि 'तुम्हारा वंश मेरे द्वारा अवध्य होगा।' मैं तुम्हारे पुत्रको मृत्युञ्जय नामक परम ज्ञान प्रदान करूँगा। तुमने जिस सामवेदोक्त अभीष्ट स्तोत्रद्वारा मेरा स्तवन किया है; इसे पूर्वकालमें ब्रह्माने सूर्य-ग्रहणके अवसरपर प्रशस्त पुण्यतम सिद्धाश्रममें सनत्कुमारको प्रदान किया था। गौरीने मन्दाकिनीके तटपर इसे गौतमको बतलाया था। दयालु शंकरने अपने भक्त शिष्य ब्रह्माको इसका उपदेश किया था। विरजाके तटपर मैंने इसे शिवको प्रदान किया था। पूर्वकालमें बुद्धिमान् सनत्कुमारने इसे महर्षि भृगुको बतलाया था। इस समय तुम इसे बाणको दोगे और बाण इसके द्वारा मेरा स्तवन करेगा। यह स्तोत्र महान् पुण्यदायक है। जो मनुष्य भलीभाँति स्नानसे शुद्ध हो वस्त्र, भूषण और चन्दन आदिसे गुरुका वरण और पूजन करके उनके मुखसे इस स्तोत्रका उपदेश ग्रहणकर नित्य पूजाके समय भक्तिपूर्वक इसका पाठ करेगा, वह अपने करोड़ों जन्मोंके संचित पापसे मुक्त हो जायगा—इसमें तनिक भी संशय नहीं है। यह स्तोत्र विपत्तियोंका विनाशक, समस्त सम्पत्तियोंका कारण, दुःख-शोकका निवारक, भयंकर भवसागरसे उद्धार करनेवाला, गर्भवासका उच्छेदक, जरा-मृत्युका हरण करनेवाला, बन्धनों और रोगोंका खण्डन करनेवाला तथा भक्तोंके लिये शृङ्गार-स्वरूप है। जो इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसने मानो समस्त तीर्थोंमें स्नान कर लिया, सभी यज्ञोंमें दीक्षा ग्रहण कर ली, सभी व्रतोंका अनुष्ठान कर लिया और सभी तपस्याएँ पूर्ण कर लीं। उसे निश्चय ही सम्पूर्ण दानोंका सत्य फल प्राप्त हो जाता है। इस स्तोत्रका एक लाख पाठ करनेसे मनुष्योंको स्तोत्रसिद्धि मिल जाती है। यदि स्तोत्र सिद्ध हो जाय तो उसे सारी सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं। वह इस लोकमें देवतुल्य होकर अन्तमें श्रीहरिके पदको प्राप्त हो जाता है। (अध्याय ११९)

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७७४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

बाणका यादवी सेनाके साथ युद्ध, बाणका धराशायी होना, शंकरजीका बाणको उठाकर श्रीकृष्णके चरणोंमें डाल देना, श्रीकृष्णद्वारा बाणको जीवन-दान, बाणका श्रीकृष्णको बहुत-से दहेजके साथ अपनी कन्या समर्पित करना, श्रीकृष्णका पौत्र और पौत्रवधूके साथ द्वारकाको लौट जाना और द्वारकामें महोत्सव

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने उद्धव और बलदेवके साथ शुभ मन्त्रणा करके बाणके पास दूत भेजा। तब उस दूतने—जहाँ शिव, गणपति, दुर्गतिनाशिनी दुर्गा, कार्तिकेय, भद्रकाली, उग्रचण्डा और कोटरी—ये सब विद्यमान थे, वहाँ आकर शिव, शिवा, गणेश और पूजनीय मानवोंको नमस्कार किया और यथोचित वचन कहा।

दूत बोला— महेश्वर! भगवान् श्रीकृष्ण बाणको युद्धके लिये ललकार रहे हैं; अतः वह या तो युद्ध करे अथवा अनिरुद्ध और उषाको लेकर उनके शरणापन्न हो जाय; क्योंकि रणके लिये बुलाये जानेपर जो पुरुष भयभीत होकर सम्मुख युद्धार्थ नहीं जाता है, वह परलोकमें अपने सात पूर्वजोंके साथ नरकगामी होता है। दूतकी बात सुनकर स्वयं पार्वतीदेवी सभाके मध्यमें शंकरजीके संनिकट ही यथोचित वचन बोलीं।

पार्वतीने कहा— महाभाग बाण! तुम अपनी कन्याको लेकर उनके पास जाओ और प्रार्थना करो। फिर अपना सर्वस्व दहेजमें देकर श्रीकृष्णकी शरण ग्रहण करो; क्योंकि वे सबके ईश्वर तथा कारण, समस्त सम्पत्तियोंके दाता, श्रेष्ठ, वरेण्य, आश्रयस्थान, कृपालु और भक्तवत्सल हैं। पार्वतीका वचन सुनकर सभामें उपस्थित सभी सुरेश्वरोंने धन्य-धन्य कहते हुए उनकी प्रशंसा की और बाणसे वैसा करनेके लिये कहा; परंतु बाण क्रोधसे आगबबूला हो उठा, उसका शरीर काँपने लगा और नेत्र लाल हो गये। फिर तो वह असुर सहसा उठ खड़ा हुआ और सबके मना करनेपर भी कवचसे सुसज्जित हो हाथमें धनुष ले शंकरजीको प्रणाम करके करोड़ों कवचधारी महाबली दैत्योंके साथ चल पड़ा। तब कुम्भाण्ड, कूपकर्ण, निकुम्भ और कुम्भ—इन प्रधान सेनापतियोंने भी कवच धारण करके उसका अनुगमन किया। फिर उन्मत्तभैरव, संहारभैरव, असिताङ्गभैरव, रुरुभैरव, महाभैरव, कालभैरव, प्रचण्डभैरव और क्रोधभैरव—ये सभी भी कवच धारण करके शक्तियोंके साथ गये। कवचधारी भगवान् कालाग्निरुद्रने भी रुद्रोंके साथ गमन किया। उग्रचण्डा, प्रचण्डा, चण्डिका, चण्डनायिका, चण्डेश्वरी, चामुण्डा, चण्डी और चण्डक पालिका—ये सभी आठों नायिकाएँ हाथमें खप्पर ले उसके पीछे-पीछे चलीं। शोणितपुरकी ग्रामदेवता कोटरीने भी रत्ननिर्मित रथपर सवार हो प्रस्थान किया। उस समय उसका मुख प्रफुल्लित था और वह खड्ग तथा खप्पर लिये हुए थी। चन्द्राणी, शान्तस्वरूपा वैष्णवी, ब्रह्मवादिनी ब्रह्माणी, कौमारी, नारसिंही, विकट आकारवाली वाराही, महामाया माहेश्वरी और भीमरूपिणी भैरवी—ये सभी आठों शक्तियाँ हर्षपूर्वक रथपर सवार हो नगरसे बाहर निकलीं। जो रक्तवर्णवाली और त्रिनेत्रधारिणी हैं तथा जीभ लपलपानेके कारण जो भयंकर प्रतीत होती हैं, वे भद्रकालिका हाथोंमें शूल, शक्ति, गदा, खड्ग और खप्पर धारण करके बहुमूल्य रत्नोंके सारभागसे बने हुए रथपर सवार होकर चलीं। फिर महेश्वर हाथमें त्रिशूल ले नन्दीश्वरपर चढ़कर तथा धनुर्धर स्कन्द हाथमें शस्त्र ले अपने वाहन मयूरपर सवार होकर चले। इस प्रकार गणेश और पार्वतीको छोड़कर शेष

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• श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७७५

सभी लोगोंने बाणका अनुगमन किया। इन सबसे युक्त महादेव और भद्रकालिकाको देखकर चक्रपाणि श्रीकृष्णने यथोचितरूपसे सम्भाषण किया। तदनन्तर बाणने शङ्खध्वनि करके पार्वतीश्वर शिवको प्रणाम किया और धनुषकी प्रत्यञ्चा चढ़ाकर उसपर दिव्यास्त्रका संधान किया।

इस प्रकार बाणको युद्धके लिये उद्यत देखकर शत्रु-वीरोंका संहार करनेवाले सात्यकि उपस्थित सभी लोगोंके द्वारा मना किये जानेपर भी कवच धारण करके हर्षपूर्वक आगे बढ़े। नारद! तब बाणने उनपर मञ्छन नामक दिव्यास्त्रका प्रयोग किया। वह अस्त्र अमोघ, ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक सूर्यके समान प्रकाशमान तथा अत्यन्त तीखा था। फिर तो घोर युद्ध होने लगा। परस्पर बड़े-बड़े घोर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग किया गया। भयानक समर होते-होते जब भगवान् कालाग्नि नामक रुद्रके महाबली हलधर बलदेवजीको बाणासुरका वध करनेके लिये तैयार देखा, तब उन्होंने उनको रोक दिया। इसपर बलदेवजीने क्रुद्ध होकर कालाग्निरुद्रके रथ, घोड़े और सारथिका नाश कर दिया। तब कालाग्निरुद्रने कोपमें भरकर भयंकर ज्वर छोड़ा। इससे श्रीहरिके अतिरिक्त अन्य सभी यादव ज्वरसे आक्रान्त हो गये। उस ज्वरको देखकर भगवान् श्रीकृष्णने वैष्णव-ज्वरकी सृष्टि की और उस रणके मुहानेपर माहेश्वर-ज्वरका विनाश करनेके लिये उसे चला दिया। फिर तो दो घड़ीतक उन दोनों ज्वरोंमें बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। अन्तमें उस रणाङ्गणमें वैष्णव-ज्वरसे आक्रान्त होकर माहेश्वर-ज्वर धराशायी हो गया, उसकी सारी चेष्टाएँ शान्त हो गयीं। पुनः चेतनामें आकर वह माधवकी स्तुति करने लगा।

ज्वर बोला— भक्तानुग्रहमूर्तिधारी भगवन्! आप सबके आत्मा और पूर्णपुरुष हैं; सबपर आपका समान प्रेम है, अतः जगन्नाथ! मेरे प्राणोंकी रक्षा कीजिये।

उस ज्वरके विनीत वचनको सुनकर श्रीकृष्णने अपने वैष्णव-ज्वरको लौटा लिया। तब माहेश्वर-ज्वर भयभीत होकर रणभूमिसे भाग खड़ा हुआ।

तत्पश्चात् बाणने पुनः आकर ऐसे हजारों बाण चलाये, जो प्रलयकालीन अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशमान तथा मन्त्रोंद्वारा पावन किये गये थे; परंतु अर्जुनने खेल-ही-खेलमें अपने बाणसमूहोंद्वारा उन्हें रोक दिया। तब बाणने