भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

४- श्रीकृष्णका शंकरजीको बुलाकर देवी सिंहवाहिनीको ग्रहण करनेके लिये कहना तथा शंकरजीका अरुचि प्रकट करते हुए उनसे निरन्तर भजनके लिये वर माँगना ३७

(८) विषय पृष्ठ-संख्या ११- विष्णु आदि देवताओंद्वारा गणेशकी अग्रपूजा, पार्वतीकृत विशेषोपचारसहित गणेशपूजन, विष्णुकृत गणेशस्तवन और 'संसारमोहन' नामक कवचका वर्णन .................... ३४१ १२- पार्वतीको देवताओंद्वारा कार्तिकेयका समाचार प्राप्त होना, शिवजीका कृत्तिकाओंके पास दूतोंको भेजना, वहाँ कार्तिकेय और नन्दीका संवाद ................................. ३४५ १३- कार्तिकेयका नन्दिकेश्वरके साथ कैलासपर आगमन, स्वागत, सभामें जाकर विष्णु आदि देवोंको नमस्कार करना और शुभाशीर्वाद पाना ........................... ३४७ १४- कार्तिकेयका अभिषेक तथा देवताओंद्वारा उन्हें उपहार-प्रदान ............................. ३५० १५- गणेशके शिरश्छेदनके वर्णनके प्रसङ्गमें शंकरद्वारा सूर्यका मारा जाना, कश्यपका शिवको शाप देना, सूर्यका जीवित होना और माली-सुमालीकी रोगनिवृत्ति ........ ३५१ १६- ब्रह्माद्वारा माली-सुमालीको सूर्यके कवच और स्तोत्रकी प्राप्ति तथा सूर्यकी कृपासे उन दोनोंका नीरोग होना ..................... ३५२ १७- भगवान् नारायणके निवेदित पुष्पकी अवहेलनासे इन्द्रका श्रीभ्रष्ट होना, पुनः बृहस्पतिके साथ ब्रह्माके पास जाना, ब्रह्माद्वारा दिये गये नारायणस्तोत्र, कवच और मन्त्रके जपसे पुनः श्री प्राप्त करना ........... ३५४ १८- श्रीहरिका इन्द्रको लक्ष्मी-कवच तथा लक्ष्मी-स्तोत्र प्रदान करना ................ ३५६ १९- देवताओंके स्तवन करनेपर महालक्ष्मीका प्रकट होकर देवों और मुनियोंके समक्ष अपने निवास-योग्य स्थानका वर्णन करना........ ३५८ २०- गणेशके एकदन्त-वर्णन-प्रसङ्गमें जमदग्निके आश्रमपर कार्तवीर्यका स्वागत-सत्कार, कार्तवीर्यका बलपूर्वक कामधेनुको हरण करनेकी इच्छा प्रकट करना, कामधेनुद्वारा उत्पन्न की हुई सेनाके साथ कार्तवीर्यकी सेनाका युद्ध ................................. ३६० २१- जमदग्नि और कार्तवीर्यका युद्ध तथा ब्रह्माद्वारा उसका निवारण .................... ३६३ २२- जमदग्नि-कार्तवीर्य-युद्ध, कार्तवीर्यद्वारा दत्तात्रेयदत्त शक्तिके प्रहारसे जमदग्निका वध, विषय पृष्ठ-संख्या रेणुकाका विलाप, परशुरामका आना और क्षत्रियवधकी प्रतिज्ञा करना, भृगुका आकर उन्हें सान्त्वना देना ..................... ३६५ २३- रेणुका-भृगु-संवाद, रेणुकाका पतिके साथ सती होना, परशुरामका पिताकी अन्त्येष्टि क्रिया करके ब्रह्माके पास जाना और अपनी प्रतिज्ञा सुनाना, ब्रह्माका उन्हें शिवजीके पास भेजना ........................ ३६७ २४- परशुरामका शिवलोकमें जाकर शिवजीके दर्शन करके उनकी स्तुति करना ........... ३७० २५- परशुरामका शिवजीसे अपना अभिप्राय प्रकट करना, उसे सुनकर भद्रकालीका कुपित होना, परशुरामका रोने लगना, शिवजीका कृपा करके उन्हें नाना प्रकारके दिव्यास्त्र एवं शस्त्रास्त्र प्रदान करना ........ ३७३ २६- शिवजीका प्रसन्न होकर परशुरामको त्रैलोक्यविजय नामक कवच प्रदान करना .... ३७४ २७- शिवजीका परशुरामको मन्त्र, ध्यान, पूजाविधि और स्तोत्र प्रदान करना ........ ३७७ २८- पुष्करमें जाकर परशुरामका तपस्या करना, श्रीकृष्णद्वारा वर-प्राप्ति, आश्रमपर मित्रोंके साथ उनका विजय-यात्रा करना और शुभ शकुनोंका प्रकट होना, नर्मदापर रात्रिमें परशुरामको स्वप्नमें शुभ शकुनोंका दिखलायी देना ................................. ३८२ २९- परशुरामका कार्तवीर्यके पास दूत भेजना, दूतकी बात सुनकर राजाका युद्धके लिये उद्यत होना और रानी मनोरमासे स्वप्रदृष्ट अपशकुनका वर्णन करना, रानीका उन्हें परशुरामकी शरण ग्रहण करनेको कहना, परंतु राजाका मनोरमाको समझाकर युद्ध- यात्राके लिये उद्यत होना ..................... ३८५ ३०- राजाको युद्धके लिये उद्यत देख मनोरमाका योगद्वारा शरीर-त्याग, राजाका विलाप और आकाशवाणी सुनकर उसकी अन्त्येष्टि- क्रिया करना, युद्धयात्राके समय नाना प्रकारके अपशकुन देखना, कार्तवीर्य और परशुरामका युद्ध तथा कार्तवीर्यका वध, नारायणद्वारा शिव-कवचका वर्णन ........ ३८८ ३१- मत्स्यराजके वधके पश्चात् अनेकों राजाओंका आना और परशुरामद्वारा मारा जाना, पुनः

( ९ )

विषयपृष्ठ-संख्या
राजा सुचन्द्र और परशुरामका युद्ध, परशुरामद्वारा कालीस्तवन, ब्रह्माका आकर परशुरामको युक्ति बताना, परशुरामका राजा सुचन्द्रसे मन्त्र और कवच माँगकर उसका वध करना...३९३
३२- दशाक्षरी महाविद्या तथा काली-कवचका वर्णन .....३९४
३३- सुचन्द्र-पुत्र पुष्कराक्षके साथ परशुरामका युद्ध, पाशुपतास्त्र छोड़नेके लिये उद्यत परशुरामके पास विष्णुका आना और उन्हें समझाना, विष्णुका विप्रवेषसे पुत्रसहित पुष्कराक्षसे लक्ष्मीकवच तथा दुर्गाकवचको माँग लेना, लक्ष्मीकवचका वर्णन ...........३९६
३४- दुर्गाकवचका वर्णन ...................................३९९
३५- परशुरामद्वारा पुत्रसहित राजा सहस्राक्षका वध, कार्तवीर्य-परशुराम-युद्ध, परशुरामकी मूर्च्छा, शिवद्वारा उन्हें पुनर्जीवनदान, कार्तवीर्य-परशुराम-संवाद, आकाशवाणी सुनकर शिवका विप्रवेष धारण करके कार्तवीर्यसे कवच माँग लेना, परशुद्वारा कार्तवीर्य तथा अन्यान्य क्षत्रियोंका संहार, ब्रह्माका आगमन और परशुरामको गुरुस्वरूप शिवकी शरणमें जानेका उपदेश देकर स्वस्थानको लौट जाना .......४०१
३६- परशुरामका कैलास-गमन, वहाँ शिव-भवनमें पार्षदोंसहित गणेशको प्रणाम करके आगे बढ़नेको उद्यत होना, गणेशद्वारा रोके जानेपर उनके साथ वार्तालाप .........................४०४
३७- परशुरामका शिवके अन्तःपुरमें जानेके लिये गणेशसे अनुरोध, गणेशका उन्हें समझाना, न माननेपर उन्हें स्तम्भित करके अपनी सूँड़में लपेटकर सभी लोकोंमें घुमाते हुए गोलोकमें श्रीकृष्णका दर्शन कराकर भूतलपर छोड़ देना, होशमें आनेपर परशुरामका कुपित होकर गणेशपर फरसेका प्रहार करना, गणेशका एक दाँत टूट जाना, देवलोकमें हाहाकार, पार्वतीका रुदन और शिवसे प्रार्थना .........४०६
३८- पार्वतीकी शिवसे प्रार्थना, परशुरामको देखकर उन्हें मारनेके लिये उद्यत होना, परशुरामद्वारा इष्टदेवका ध्यान, भगवान्‌का वामनरूपसे पधारना, शिव-पार्वतीको समझाना और गणेशस्तोत्रको प्रकट करना ....................४०८
३९- परशुरामको गौरीका स्तवन करनेके लिये कहकर विष्णुका वैकुण्ठ-गमन, परशुरामका पार्वतीकी स्तुति करना.............................४१२
४०- सबका स्तवन-पूजन और नमस्कार करके परशुरामका जानेके लिये उद्यत होना, गणेश-पूजामें तुलसी-निषेधके प्रसङ्गमें गणेश-तुलसीके संवादका वर्णन तथा गणपति-खण्डका श्रवण-माहात्म्य .....................४१५

( श्रीकृष्णजन्मखण्ड )

विषयपृष्ठ-संख्या
१- नारदजीके प्रश्न तथा मुनिवर नारायणद्वारा भगवान् विष्णु एवं वैष्णवोंके माहात्म्यका वर्णन, श्रीराधा और श्रीकृष्णके गोकुलमें अवतार लेनेका एक कारण श्रीदाम और राधाका परस्पर शाप .........................४१८
२- पृथ्वीका देवताओंके साथ ब्रह्मलोकमें जाकर अपनी व्यथा-कथा सुनाना, ब्रह्माजीका उन सबके साथ कैलासगमन, कैलाससे ब्रह्मा, शिव तथा धर्मका वैकुण्ठमें जाकर श्रीहरिकी आज्ञासे गोलोकमें जाना और वहाँ विरजाटट, शतशृङ्गपर्वत, रासमण्डल एवं वृन्दावन आदिके प्रदेशोंका अवलोकन करना, गोलोकका विस्तृत वर्णन ........................४२१
३- श्रीराधाके विशाल भवन एवं अन्तःपुरकी शोभाका वर्णन, ब्रह्मा आदिको दिव्य तेजःपुञ्जके दर्शन तथा उनके द्वारा उन तेजोमय परमेश्वरकी स्तुति .................४२९
४- देवताओंद्वारा तेजःपुञ्जमें श्रीकृष्ण और राधाके दर्शन तथा स्तवन, श्रीकृष्णद्वारा देवताओंका स्वागत तथा उन्हें आश्वासन-दान, भगवद्भक्तके महत्त्वका वर्णन, श्रीराधासहित गोप-गोपियोंको ब्रजमें अवतीर्ण होनेके लिये श्रीहरिका आदेश, सरस्वती और लक्ष्मीसहित वैकुण्ठवासी नारायणका तथा क्षीरशायी विष्णुका शुभागमन, नारायण और विष्णुका श्रीकृष्णके स्वरूपमें लीन होना, संकर्षण तथा पुत्रों-सहित पार्वतीका आगमन, देवताओं और देवियोंको पृथ्वीपर जन्म ग्रहण करनेके लिये प्रभुका आदेश, किस देवताका कहाँ और किस रूपमें जन्म होगा—इसका विवरण, श्रीराधाकी चिन्ता तथा श्रीकृष्णका उन्हें सान्त्वना देते हुए अपनी और उनकी एकताका प्रति-पादन करना, फिर श्रीहरिकी आज्ञासे राधा और गोप-गोपियोंका नन्द-गोकुलमें गमन ..........४३६

(१०) विषय पृष्ठ-संख्या ५- श्रीकृष्णजन्म-वृत्तान्त - आकाशवाणीसे प्रभावित हो देवकीके वधके लिये उद्यत हुए कंसको वसुदेवजीका समझाना, कंसद्वारा उसके छः पुत्रोंका वध, सातवें गर्भका संकर्षण, आठवें गर्भमें भगवान्का आविर्भाव-देवताओंद्वारा स्तुति, भगवान्का दिव्य रूपमें प्राकट्य, वसुदेवद्वारा उनकी स्तुति, भगवान्का पूर्वजन्मके वरदानका प्रसङ्ग बताकर अपनेको व्रजमें ले जानेकी बात बता शिशुरूपमें प्रकट होना, वसुदेवजीका व्रजमें यशोदाके शयनगृहमें शिशुको सुलाकर नन्द-कन्याको ले आना, कंसका उसे मारनेको उद्यत होना, परंतु वसुदेवजी तथा आकाशवाणीके कथनपर विश्वास करके कन्याको दे देना, वसुदेव-देवकीका सानन्द घरको लौटना ................................. ४४७ ६- जन्माष्टमी-व्रतके पूजन, उपवास तथा महत्त्व आदिका निरूपण ............................ ४५४ ७- श्रीकृष्णकी अनिर्वचनीय महिमा, धरा और द्रोणकी तपस्या, अदिति और कद्रूका पारस्परिक शापसे देवकी तथा रोहिणीके रूपमें भूतलपर जन्म, हलधर और श्रीकृष्णके जन्मका उत्सव ................................ ४५८ ८- आकाशवाणी सुनकर कंसका पूतनाको गोकुलमें भेजना, पूतनाका श्रीकृष्णके मुखमें विषमिश्रित स्तन देना और प्राणोंसे हाथ धोकर श्रीकृष्णकी कृपासे माताकी गतिको प्राप्त हो गोलोकमें जाना ............. ४६२ ९- तृणावर्तका उद्धार तथा उसके पूर्वजन्मका परिचय ......................................... ४६४ १०- यशोदाके घर गोपियोंका आगमन और उनके द्वारा उन सबका सत्कार, शिशु श्रीकृष्णके पैरोंके आघातसे शकटका चूर-चूर होना तथा श्रीकृष्ण-कवचका प्रयोग एवं माहात्म्य.... ४६५ ११- मुनि गर्गजीका आगमन, यशोदाद्वारा उनका सत्कार और परिचय-प्रश्न, गर्गजीका उत्तर, नन्दका आगमन, नन्द-यशोदाको एकान्तमें ले जाकर गर्गजीका श्रीराधा-कृष्णके नाम- माहात्म्यका परिचय देना और उनकी भावी लीलाओंका क्रमशः वर्णन करना, श्रीकृष्णके नामकरण एवं अन्नप्राशन-संस्कारका बृहद् आयोजन, ब्राह्मणोंको दान-मान, गर्गद्वारा विषय पृष्ठ-संख्या श्रीकृष्णकी स्तुति तथा गर्ग आदिकी विदाई ... ४६८ १२- यशोदाके यमुनास्नानके लिये जानेपर श्रीकृष्ण- द्वारा दही-दूध-माखन आदिका भक्षण तथा बर्तनोंको फोड़ना, यशोदाका उन्हें पकड़कर वृक्षसे बाँधना, वृक्षका गिरना, गोप-गोपियों तथा नन्दजीका यशोदाको उपालम्भ देना, नल-कूबर और रम्भाको शाप प्राप्त होने तथा उससे मुक्त होनेकी कथा ................... ४७९ १३- नन्दका शिशु श्रीकृष्णको लेकर वनमें गो- चारणके लिये जाना, श्रीराधाका आगमन, नन्दसे उनकी वार्ता, शिशु कृष्णको लेकर राधाका एकान्त वनमें जाना, वहाँ रत्नमण्डपमें नवतरुण श्रीकृष्णका प्रादुर्भाव, श्रीराधा-कृष्णकी परस्पर प्रेमवार्ता, ब्रह्माजीका आगमन, उनके द्वारा श्रीकृष्ण और राधाकी स्तुति, वर-प्राप्ति तथा उनका विवाह कराना, नवदम्पतिका प्रेम- मिलन तथा आकाशवाणीके आश्वासन देनेपर शिशुरूपधारी श्रीकृष्णको लेकर राधाका यशोदाजीके पास पहुँचाना ...................... ४८१ १४- वनमें श्रीकृष्णद्वारा बकासुर, प्रलम्बासुर और केशीका वध, उन सबका गोलोकधाममें गमन, उनके पूर्वजीवनका परिचय, पार्वतीके त्रैमासिक व्रतका सविधि वर्णन तथा नन्दकी आज्ञाके अनुसार समस्त व्रजवासियोंका वृन्दावनमें गमन ................................ ४८८ १५- विश्वकर्माका आगमन, उनके द्वारा पाँच योजन विस्तृत नूतन नगरका निर्माण, वृषभानु गोपके लिये पृथक् भवन, कलावती और वृषभानुके पूर्वजन्मका चरित्र, राजा सुचन्द्रकी तपस्या, ब्रह्माद्वारा वरदान, भनन्दनके यहाँ कलावतीका जन्म और वृषभानुके साथ उसका विवाह, विश्वकर्माद्वारा नन्द-भवनका, वृन्दावनके भीतर रासमण्डलका तथा मधुवनके पास रत्नमण्डपका निर्माण, 'वृन्दावन' नामका कारण, राजा केदारका इतिहास, तुलसीसे वृन्दावन नामका सम्बन्ध तथा राधाके सोलह नामोंमें 'वृन्दा' नाम, राधा नामकी व्याख्या, नींद टूटनेपर नूतन नगर देख व्रजवासियोंका आश्चर्य तथा उन सबका उन भवनोंमें प्रवेश ........... ४९७ १६- श्रीवनके समीप यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणोंकी पत्नियोंका ग्वालबालोंसहित श्रीकृष्णको भोजन

( ११ ) विषय पृष्ठ-संख्या विषय पृष्ठ-संख्या देना तथा उनकी कृपासे गोलोकधामको जाना, श्रीकृष्णकी मायासे निर्मित उनकी छायामयी स्त्रियोंका ब्राह्मणोंके घरोंमें जाना तथा विप्रपत्नियोंके पूर्वजन्मका परिचय...... ५०९ १७- श्रीकृष्णका कालियदहमें प्रवेश, नागराजका उनपर आक्रमण, श्रीकृष्णद्वारा उसका दमन, नागपत्नी सुरसाद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति, श्रीकृष्णकी उसपर कृपा, सुरसाका गोलोक- गमन, छायामयी सुरसाकी सृष्टि, कालियको वरदान, कालियद्वारा भगवान्‌की स्तुति, उस स्तुतिकी महिमा, नागका रमणक द्वीपको प्रस्थान, कालियका यमुनाजलमें निवासका कारण, गरुड़का भय, सौभरिके शापसे कालियदहतक जानेमें गरुड़की असमर्थता, श्रीकृष्णके कालियदहमें प्रवेश करनेसे ग्वालबालों तथा नन्द आदिकी व्याकुलता, बलरामका समझाना, श्रीकृष्णके निकल आनेसे सबको प्रसन्नता, दावानलसे व्रज- वासियोंकी रक्षा तथा नन्दभवनमें उत्सव ... ५१४ १८- मोहवश श्रीहरिके प्रभावको जाननेके लिये ब्रह्माजीके द्वारा गौओं, बछड़ों और बालकोंका अपहरण, श्रीकृष्णद्वारा उन सबकी नूतन सृष्टि, ब्रह्माजीका श्रीहरिके पास आना, सबको श्रीकृष्णमय देख उनकी स्तुति करके पहलेके गौओं आदिको वापस देकर अपने लोकको जाना तथा श्रीकृष्णका घरको पधारना ............. ५२४ १९- नन्दद्वारा इन्द्रयागकी तैयारी, श्रीकृष्णद्वारा इसके विषयमें जिज्ञासा, नन्दजीका उत्तर और श्रीकृष्णद्वारा प्रतिवाद, श्रीकृष्णकी आज्ञाके अनुसार इन्द्रका यजन न करके गोपोंद्वारा ब्राह्मणों और गिरिराजका पूजन, उत्सवकी समाप्तिपर इन्द्रका कोप, नन्दद्वारा इन्द्रकी स्तुति, श्रीकृष्णका नन्दको इन्द्रकी स्तुतिसे रोककर सब व्रजवासियोंको गौओंसहित गोवर्धनकी गुफामें स्थापित करके पर्वतको छातेके डंडेकी भाँति उठा लेना; इन्द्र, देवताओं तथा मेघोंका स्तम्भन कर देना, पराजित इन्द्रद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति, श्रीकृष्णका उन्हें विदा करके पर्वतको स्थापित कर देना तथा नन्दद्वारा श्रीकृष्णका स्तवन ..................... ५२७ २०- ग्वालबालोंका श्रीकृष्णकी आज्ञासे तालवनके फल तोड़ना, धेनुकासुरका आक्रमण, श्रीकृष्णके स्पर्शसे उसे पूर्वजन्मकी स्मृति और उसके द्वारा श्रीकृष्णका स्तवन, वैष्णवी मायासे पुनः उसे स्वरूपकी विस्मृति, फिर श्रीहरिके साथ उसका युद्ध और वध, बालकोंद्वारा सानन्द फल-भक्षण तथा सबका घरको प्रस्थान ................................................. ५३७ २१- धेनुकके पूर्वजन्मका परिचय, बलि-पुत्र साहसिक तथा तिलोत्तमाका स्वच्छन्द विहार, दुर्वासाका शाप और वर, साहसिकका गदहेकी योनिमें जन्म लेना तथा तिलोत्तमाका बाणपुत्री 'उषा' होना ........................... ५४१ २२- दुर्वासाका और्वकन्या कन्दलीसे विवाह, उसकी कटूक्तियोंसे कुपित हो मुनिका उसे भस्म कर देना, फिर शोकसे देह-त्यागके लिये उद्यत मुनिको विप्ररूपधारी श्रीहरिका समझाना, उन्हें एकानंशाको पत्नी बनानेके लिये कहना, कन्दलीका भविष्य बताना और मुनिको ज्ञान देकर अन्तर्धान होना तथा मुनिकी तपस्यामें प्रवृत्ति ................. ५४३ २३- महर्षि और्वद्वारा दुर्वासाको शाप, दुर्वासाका अम्बरीषके यहाँ द्वादशीके दिन पारणाके समय पहुँचकर भोजन माँगना, वसिष्ठजीकी आज्ञासे अम्बरीषका पारणाकी पूर्तिके लिये भगवान्‌का चरणोदक पीना, दुर्वासाका राजाको मारनेके लिये कृत्या-पुरुष उत्पन्न करना, सुदर्शनचक्रका कृत्याको मारकर मुनिका पीछा करना, मुनिका कहीं भी आश्रय न पाकर वैकुण्ठमें जाना, वहाँसे भगवान्‌की आज्ञाके अनुसार अम्बरीषके घर आकर भोजन करना तथा आशीर्वाद देकर अपने आश्रमको जाना .................................... ५४६ २४- एकादशीव्रतका माहात्म्य, इसे न करनेसे हानि, व्रतके सम्बन्धमें आवश्यक निर्णय, व्रतका विधान-छः देवताओंका पूजन, श्रीकृष्णका ध्यान और षोडशोपचार-पूजन तथा कर्ममें न्यूनताकी पूर्तिके लिये भगवान्‌से प्रार्थना .................................................. ५५२ २५- गोपकिशोरियोंद्वारा गौरी-व्रतका पालन, दुर्गा-स्तोत्र और उसकी महिमा, समाप्तिके दिन गोपियोंको नग्न-स्नान करती जान श्रीकृष्णद्वारा उनके वस्त्र आदिका अपहरण,

( १२ )

विषयपृष्ठ-संख्या
श्रीराधाकी प्रार्थनासे भगवान्‌का सब वस्तुएँ लौटा देना, व्रतका विधान, दुर्गाका ध्यान, गौरी-व्रतकी कथा, लक्ष्मीस्वरूपा वेदवतीका सीता होकर इस व्रतके प्रभावसे श्रीरामको पतिरूपमें पाना, सीताद्वारा की हुई पार्वतीकी स्तुति, श्रीराधा आदिके द्वारा व्रतान्तमें दान, देवीका उन सबको दर्शन देकर राधाको स्वरूपकी स्मृति कराना, उन्हें अभीष्ट वर देना तथा श्रीकृष्णका राधा आदिको पुनः दर्शनसम्बन्धी मनोवाञ्छित वर देना .........५५५
२६- श्रीकृष्णके रास-विलासका वर्णन ..........५६६
२७- श्रीराधाके साथ श्रीकृष्णका वन-विहार, वहाँ अष्टावक्रमुनिके द्वारा उनकी स्तुति तथा मुनिका शरीर त्यागकर भगवच्चरणोंमें लीन होना....................................५६९
२८- भगवान् श्रीकृष्णद्वारा अष्टावक्र (देवल)-के शवका संस्कार तथा उनके गूढ़ चरित्रका परिचय ............................५७१
२९- ब्रह्माजीका मोहिनीके शापसे अपूज्य होना, इस शापके निवारणके लिये उनका वैकुण्ठ-धाममें जाना और वहाँ अन्यान्य ब्रह्माओंके दर्शनसे उनके अभिमानका दूर होना .......५७५
३०- गङ्गाकी उत्पत्ति तथा महिमा ...............५७६
३१- गङ्गा-स्नानसे ब्रह्माजीको मिले हुए शापकी निवृत्ति, गोलोकमें ब्रह्माजीको भारतीकी प्राप्ति, भारतीसहित ब्रह्माका अपने लोकमें प्रवेश, भगवान् शिवके दर्पभङ्गकी कथा, वृकासुरसे उनकी रक्षा, श्रीराधिकाके पूछनेपर श्रीकृष्णके द्वारा शिवके तत्त्व-रहस्यका निरूपण ......................................५७९
३२- देवी सती और पार्वतीके गर्व-मोचनकी कथा, सतीका देहत्याग, पार्वतीका जन्म, गर्ववश उनके द्वारा आकाशवाणीकी अवहेलना, शंकरजीका आगमन, शैलराजद्वारा उनकी स्तुति तथा उस स्तुतिकी महिमा............५८४
३३- गिरिराज हिमवान्‌द्वारा गणोंसहित शिवका सत्कार, मेनाको शिवके अलौकिक सौन्दर्यके दर्शन, पार्वतीद्वारा शिवकी परिक्रमा, शिवका उन्हें आशीर्वाद, शिवाद्बारा शिवका षोडशोपचार-पूजन, शंकरद्वारा कामदेवका
विषयपृष्ठ-संख्या
दहन तथा पार्वतीको तपस्याद्वारा शिवकी प्राप्ति .................................५८७
३४- पार्वतीकी तपस्या, उनके तपके प्रभावसे अग्निका शीतल होना, ब्राह्मण-बालकका रूप धारण करके आये हुए शिवके साथ उनकी बातचीत, पार्वतीका घरको लौटना और माता-पिता आदिके द्वारा उनका सत्कार, भिक्षुवेशधारी शंकरका आगमन, शैलराजको उनके विविध रूपोंके दर्शन, उनकी शिव-भक्तिसे देवताओंको चिन्ता, उनका बृहस्पतिजीको शिव-निन्दाके लिये उकसाना तथा बृहस्पतिका देवताओंको शिव-निन्दाके दोष बताकर तपस्याके लिये जाना........................................५९०
३५- ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवताओंका शिवजीसे शैलराजके घर जानेका अनुरोध करना, शिवका ब्राह्मण-वेषमें जाकर अपनी ही निन्दा करके शैलराजके मनमें अश्रद्धा उत्पन्न करना, मेनाका पुत्रीको साथ ले कोप-भवनमें प्रवेश और शिवको कन्या न देनेके लिये दृढ़ निश्चय, सप्तर्षियों और अरुन्धतीका आगमन तथा शैलराज एवं मेनाको समझाना, वसिष्ठ और हिमवान्‌की बातचीत, शिवकी महत्ता तथा देवताओंकी प्रबलताका प्रतिपादन, प्रसङ्गवश राजा अनरण्य, उनकी पुत्री पद्मा तथा पिप्पलादमुनिकी कथा .....................५९६
३६- अनरण्यकी पुत्री पद्माकी धर्मद्वारा परीक्षा, सती पद्माका उनको शाप देना तथा उस शापसे उनकी रक्षाकी भी व्यवस्था करना, वसिष्ठजीका हिमवान्‌को संक्षेपसे सतीके देह-त्यागका प्रसङ्ग सुनाना......................६०३
३७- शिवका सतीके शवको लेकर शोकवश समस्त लोकोंमें भ्रमण, भगवान् विष्णुका उन्हें समझाना और प्रकृतिकी स्तुतिके लिये कहना, शिवद्वारा की हुई स्तुतिसे संतुष्ट हुई प्रकृतिरूपिणी सतीका शिवको दर्शन एवं सान्त्वना देना......................................६०७
३८- पार्वतीके विवाहकी तैयारी, हिमवान्‌के द्वारपर दूल्हा शिवके साथ बारातमें विष्णु आदि देवताओंका आगमन, हिमालयद्वारा उनका सत्कार, वरको देखनेके लिये स्त्रियोंका

( १३ )

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
आगमन, वरके अलौकिक रूप-सौन्दर्यको देख मेनाका प्रसन्न होना, स्त्रियोंद्वारा दुर्गाके सौभाग्यकी सराहना, दुर्गाका रूप, दम्पतिका एक-दूसरेकी ओर देखना, गिरिराजद्वारा दहेजके साथ शिवके हाथमें कन्याका दान तथा शिवका स्तवन ..................................६११( उत्तरार्द्ध )<br><br>४४- श्रीकृष्णकी महत्ता एवं प्रभावका वर्णन.....६३२
३९- शिव-पार्वतीके विवाहका होम, स्त्रियोंका नव-दम्पतिको कौतुकागारमें ले जाना, देवाङ्गनाओंका उनके साथ हास-विनोद, शिवके द्वारा कामदेवको जीवन-दान, वर-वधू और बारातकी विदाई, शिवधाममें पति-पत्नीकी एकान्त वार्ता, कैलासमें अतिथियोंका सत्कार और विदाई, सास-ससुरके बुलानेपर शिव-पार्वतीका वहाँ जाना तथा पार्षदोंसहित शिवका श्वशुर-गृहमें निवास......................६१४४५- इन्द्रके दर्प-भङ्गकी कथा—नहुषकी शचीपर कुदृष्टि, शचीका धर्मकी बातें बताकर नहुषको समझाना और उसके न माननेपर बृहस्पतिजीकी शरणमें जाकर उनका स्तवन करना ........६३३
४०- इन्द्रके अभिमान-भङ्गका प्रसङ्ग—प्रकृति और गुरुकी अवहेलनासे इन्द्रको शाप, गौतम-मुनिके शापसे इन्द्रके शरीरमें सहस्र योनियोंका प्राकट्य, अहल्याका उद्धार, विश्वरूप और वृत्रके वधसे इन्द्रपर ब्रह्महत्याका आक्रमण, इन्द्रका मानसरोवरमें छिपना, बृहस्पतिका उनके पास जाना, इन्द्रद्वारा गुरुकी स्तुति, ब्रह्महत्याका भस्म होना, इन्द्रका विश्वकर्माद्वारा नगरका निर्माण कराना, द्विजबालकरूपधारी श्रीहरि तथा लोमश-मुनिके द्वारा इन्द्रका मान-भंजन, राज्य छोड़नेको उद्यत हुए विरक्त इन्द्रका बृहस्पतिजीके समझानेसे पुनः राज्यपर ही प्रतिष्ठित रहना...................................६१६४६- बृहस्पतिका शचीको आश्वासन एवं आशीर्वाद देना, नहुषका सप्तर्षियोंको वाहन बनाना और दुर्वासाके शापसे अजगर होना, बृहस्पति-का इन्द्रको बुलाकर पुनः सिंहासनपर बिठाना तथा गौतमसे इन्द्र और अहल्याको शापकी प्राप्ति ....................................६३७
४१- सूर्य और अग्निके दर्प-भङ्गकी कथा .......६२२४७- अहल्याके उद्धार एवं श्रीराम-चरित्रका संक्षेपसे वर्णन.....................................६४१
४२- धन्वन्तरिके दर्प-भङ्गकी कथा, उनके द्वारा मनसादेवीका स्तवन ............................६२४४८- कंसके द्वारा रातमें देखे हुए दुःस्वप्नोंका वर्णन और उससे अनिष्टकी आशङ्का, पुरोहित सत्यकका अरिष्ट-शान्तिके लिये धनुर्यज्ञका अनुष्ठान बताना, कंसका नन्दनन्दनको शत्रु बताना और उन्हें व्रजसे बुलानेके लिये वसुदेवजीको प्रेरित करना, वसुदेवजीके अस्वीकार करनेपर अक्रूरको वहाँ जानेकी आज्ञा देना, ऋषिगण तथा राजाओंका आगमन...........................................६४५
४३- श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेसे श्रीराधा और गोपियोंका दुःखसे रोदन, चन्दनवनमें श्रीकृष्णका उन्हें दर्शन देना, गोपियोंके प्रणय-कोपजनित उद्गार, श्रीकृष्णका उनके साथ विहार, श्रीराधा नामके प्रथम उच्चारणका कारण, श्रीकृष्णद्वारा श्रीराधाका शृङ्गार, गोपियोंद्वारा उनकी सेवा और श्रीकृष्णके मथुरागमनसे लेकर परमधामगमनतककी लीलाओंका संक्षिप्त परिचय.......................६२७४९- भगवद्दर्शनकी सम्भावनासे अक्रूरके हर्षाल्लास एवं प्रेमावेशका वर्णन...........................६४९
५०- श्रीराधाका श्रीकृष्णको अपने दुःस्वप्न सुनाना और उनके बिना अपनी दयनीय स्थितिका चित्रण करना, श्रीकृष्णका उन्हें सान्त्वना देना और आध्यात्मिक योगका श्रवण कराना ...६५०
५१- श्रीकृष्णको व्रजमें जाते देख राधाका विलाप एवं मूर्च्छा, श्रीहरिका उन्हें समझाना, श्रीराधाके सो जानेपर ब्रह्मा आदि देवताओंका आना और स्तुति करके श्रीकृष्णको मथुरा जानेके लिये प्रेरित करना, श्रीकृष्णका जाना, श्रीराधाका उठना और प्रियतमके लिये विलाप करके मूर्च्छित होना, श्रीकृष्णका लौटकर आना, रत्नमालाका श्रीकृष्णको राधाकी अवस्था बताना, श्रीकृष्णका राधाके लिये स्वप्नमें मिलनेका वरदान देकर व्रजमें जाना ........६५४
५२- अक्रूरजीके शुभ स्वप्न तथा मङ्गलसूचक शकुनका वर्णन, उनका रासमण्डल और

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विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
वृन्दावनका दर्शन करते हुए नन्दभवनमें जाना, नन्दद्वारा उनका स्वागत-सत्कार, उन्हें श्रीकृष्णके विविध रूपोंमें दर्शन, उनके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति तथा श्रीकृष्णको मथुरा चलनेकी सलाह देना, गोपियोंद्वारा अक्रूरका विरोध और उनके रथका भञ्जन, श्रीकृष्णका उन्हें समझाना और आकाशसे दिव्य रथका आगमन६५९वर्णन६८७
५३- शुभ लग्नमें यात्रासम्बन्धी मङ्गलकृत्य करके श्रीकृष्णका मथुरापुरीको प्रस्थान, पुरीकी शोभाका वर्णन, कुब्जापर कृपा, मालीको वरदान, धोबीका उद्धार, कुब्जाका गोलोकगमन, कंसका दुःस्वप्न, रङ्गभूमिमें कंसका पधारना, धनुर्भङ्ग, हाथीका वध, कंसका उद्धार, उग्रसेनको राज्यदान, माता-पिताके बन्धन काटना, वसुदेवजीद्वारा नन्द आदिका सत्कार और ब्राह्मणोंको दान६६३६१- गृहस्थ, गृहस्थ-पत्नी, पुत्र और शिष्यके धर्मका वर्णन, नारियों और भक्तोंके त्रिविध भेद, ब्रह्माण्ड-रचनाके वर्णन-प्रसङ्गमें राधाकी उत्पत्तिका कथन६९२
५४- श्रीकृष्णका नन्दको अपना स्वरूप और प्रभाव बताना; गोलोक, रासमण्डल और राधा-सदनका वर्णन; श्रीराधाके महत्त्वका प्रतिपादन तथा उनके साथ अपने नित्य सम्बन्धका कथन और दिव्य विभूतियोंका वर्णन६६९६२- चारों वर्णोंके भक्ष्याभक्ष्यका निरूपण तथा कर्मविपाकका वर्णन६९७
५५- श्रीकृष्णद्वारा नन्दजीको ज्ञानोपदेश, लोकनीति, लोकमर्यादा तथा लौकिक सदाचारसे सम्बन्ध रखनेवाले विविध विधि-निषेधोंका वर्णन, कुसङ्ग और कुलटाकी निन्दा, सती और भक्तकी प्रशंसा, शिवलिङ्ग-पूजन एवं शिवकी महत्ता६७३६३- केदार-कन्याके वृत्तान्तका वर्णन७०३
५६- जिनके दर्शनसे पुण्यलाभ और जिनके अनुष्ठानसे पुनर्जन्मका निवारण होता है, उन वस्तुओं और सत्कर्मोंका वर्णन तथा विविध दानोंके पुण्यफलका कथन६७६६४- सनत्कुमार आदिके साथ श्रीकृष्णका समागम, सनत्कुमारके द्वारा श्रीकृष्णके रहस्योद्घाटन करनेपर नन्दजीका पश्चात्तापपूर्ण कथन तथा मूर्च्छित होना७०८
५७- सुस्वप्न-दर्शनके फलका विचार६७९६५- श्रीकृष्णका नन्दको दुर्गा-स्तोत्र सुनाना तथा ब्रज लौट जानेका आदेश देना, नन्दका श्रीकृष्णसे चारों युगोंके धर्मका वर्णन करनेके लिये प्रार्थना करना७१०
५८- श्रीकृष्णके द्वारा नन्दको आध्यात्मिक ज्ञानका उपदेश, बाईस प्रकारकी सिद्धि, सिद्धमन्त्र तथा अदर्शनीय वस्तुओंका वर्णन६८१६६- श्रीकृष्णद्वारा चारों युगोंके धर्मादिका कथन, श्रीकृष्णको गोकुल चलनेके लिये नन्दका आग्रह७१३
५९- दुःस्वप्न, उनके फल तथा उनकी शान्तिके उपायका वर्णन६८४६७- श्रीकृष्णका उद्धवको गोकुल भेजना, उद्धवका गोकुलमें सत्कार तथा उनका वृन्दावन आदि सभी वनोंकी शोभा देखते हुए राधिकाके पास पहुँचना और राधास्तोत्रद्वारा उनका स्तवन करना७१७
६०- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, संन्यासी तथा विधवा और पतिव्रता नारियोंके धर्मका६८- राधा-उद्धव-संवाद७२१
६९- सखियोंद्वारा श्रीकृष्णकी निन्दा एवं प्रशंसा और उद्धवका मूर्च्छित हुई राधाको सान्त्वना प्रदान करना७२४
७०- उद्धवका कथन सुनकर राधाका चैतन्य होना और अपना दुःख सुनाते हुए उद्धवको उपदेश देकर मथुरा जानेकी आज्ञा देना७२६
७१- राधाका उद्धवको बिदा करना, बिदा होते समय उद्धवद्वारा राधा-महत्त्व-वर्णन तथा उद्धवके यशोदाके पास चले जानेपर राधाका मूर्च्छित होना७२९
७२- श्रीकृष्णद्वारा गोकुलका वृत्तान्त पूछे जानेपर उद्धवका उसे कहते हुए राधाकी दशाका विशेषरूपसे वर्णन करना७३१
७३- गर्गजीका आगमन और वसुदेवजीसे पुत्रोंके उपनयनके लिये कहना, उसी प्रसङ्गमें मुनियों और देवताओंका आना, वसुदेवजीद्वारा

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विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
उनका सत्कार और गणेशका अग्र पूजन .....७३३८३- प्रद्युम्नाख्यान-वर्णन, श्रीकृष्णका सोलह हजार आठ रानियोंके साथ विवाह और उनसे संतानोत्पत्तिका कथन, दुर्वासाका द्वारकामें आगमन और वसुदेव-कन्या एकानंशाके साथ विवाह, श्रीकृष्णके अद्भुत चरित्रको देखकर दुर्वासाका भयभीत होना, श्रीकृष्णका उन्हें समझाना और दुर्वासाका पत्नीको छोड़कर तपके लिये जाना .....................७५७
७४- अदिति आदि देवियोंद्वारा पार्वतीका स्वागत-सत्कार, वसुदेवजीका देव-पूजन आदि माङ्गलिक कार्य करके बलराम और श्रीकृष्णका उपनयन करना, तत्पश्चात् नन्द आदि समागत अभ्यागतोंकी बिदाई और वसुदेव-देवकीका अनेकविध वस्तुओंका दान करना ..........७३६८४- पार्वतीद्वारा दुर्वासाके प्रति अकारण पत्नी-त्यागके दोषका वर्णन, दुर्वासाका पुनः लौटकर द्वारका जाना, श्रीकृष्णका युधिष्ठिरके राजसूययज्ञमें पधारना, शिशुपालका वध, उसके आत्माद्वारा श्रीकृष्णका स्तवन, श्रीकृष्ण-चरितका निरूपण .....................७६०
७५- बलरामसहित श्रीकृष्णका विद्या पढ़नेके लिये महर्षि सांदीपतिके निकट जाना, गुरु और गुरुपत्नीद्वारा उनका स्वागत और विद्याध्ययनके पश्चात् गुरुदक्षिणारूपमें गुरुके मृतक पुत्रको उन्हें वापस देकर घर लौटना .......७३८८५- अनिरुद्ध और उषाका पृथक्-पृथक् स्वप्नमें दर्शन, चित्रलेखाद्वारा अनिरुद्धका अपहरण, अन्तःपुरमें अनिरुद्ध और उषाका गान्धर्व-विवाह ................................................७६३
७६- द्वारकापुरीका निर्माण, उसे देखनेके लिये देवताओं और मुनियोंका आना और उग्रसेनका राज्याभिषेक ........................७४०८६- कन्याकी दुःशीलताका समाचार पाकर बाणका युद्धके लिये उद्यत होना; शिव, पार्वती, गणेश, स्कन्द और कोटरीका उसे रोकना; परंतु बाणका स्कन्दको सेनापति बनाकर युद्धके लिये नगरके बाहर निकलना, उषा-प्रदत्त रथपर सवार होकर अनिरुद्धका भी युद्धोद्योग करना, बाण और अनिरुद्धका परस्पर वार्तालाप ...................................७६५
७७- भीष्मकद्वारा रुक्मिणीके विवाहका प्रस्ताव, शतानन्दका उन्हें श्रीकृष्णके साथ विवाह करनेकी सम्मति देना, रुक्मीद्वारा उसका विरोध और शिशुपालके साथ विवाह करनेका अनुरोध, भीष्मकका श्रीकृष्ण तथा अन्यान्य राजाओंको निमन्त्रित करना ........७४४८७- बाण और अनिरुद्धके संवाद-प्रसङ्गमें अनिरुद्धद्वारा द्रौपदीके पाँच पति होनेका वर्णन, बाणसेनापति सुभद्रका अनिरुद्धके साथ युद्ध और अनिरुद्धद्वारा उसका वध .....७६६
७८- रेवती और बलरामके विवाहका वर्णन तथा रुक्मी, शाल्व, शिशुपाल और दन्तवक्रका श्रीकृष्णको कटुवचन कहना ...........७४६८८- गणेश-शिव-संवाद ...............................७६८
७९- रुक्मी आदिका यादवोंके साथ युद्ध, शाल्वका वध, रुक्मीकी सेनाका पलायन, बारातका पुरीमें प्रवेश और स्वागत-सत्कार, शुभ-लग्नमें श्रीकृष्णका बारातियों तथा देवोंके साथ राजाके आँगनमें जाना, भीष्मकद्वारा सबका सत्कार करके श्रीकृष्णका पूजन .......७४७८९- मणिभद्रका शिवजीको सेनासहित श्रीकृष्णके पधारनेकी सूचना देना, शिवजीका बाणकी रक्षाके लिये दुर्गासे कहना, दुर्गाका बाणको युद्धसे विरत होनेकी सलाह देना ...........७६९
८०- रुक्मिणी और श्रीकृष्णका विवाह, बारातकी बिदाई, भीष्मकद्वारा दहेज-दान और द्वारकामें मङ्गलोत्सव ........................................७५०९०- शिवजीका कन्या देनेके लिये बाणको समझाना, बाणका उसे अस्वीकार करना, बलिका आगमन और सत्कार, बलिका महादेवजीका चरणवन्दन करके श्रीभगवान्‌का स्तवन करना, श्रीभगवान्‌द्वारा बलिको बाणके न मारनेका आश्वासन ............................................७७०
८१- श्रीकृष्णके कहनेसे नन्द-यशोदाका ज्ञानप्राप्तिके लिये कदलीवनमें राधिकाके पास जाना, वहाँ अचेतनावस्थामें पड़ी हुई राधाको श्रीकृष्णके सन्देशद्वारा चैतन्य करना और राधाका उपदेश देनेके लिये उद्यत होना .......७५२
८२- राधिकाद्वारा 'राम' आदि भगवन्नामोंकी व्युत्पत्ति और उनकी प्रशंसा तथा यशोदाके पूछनेपर अपने 'राधा' नामकी व्याख्या करना.७५४

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विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
९१- बाणका यादवी सेनाके साथ युद्ध, बाणका धराशायी होना, शंकरजीका बाणको उठाकर श्रीकृष्णके चरणोंमें डाल देना, श्रीकृष्णद्वारा बाणको जीवन-दान, बाणका श्रीकृष्णको बहुत-से दहेजके साथ अपनी कन्या समर्पित करना, श्रीकृष्णका पौत्र और पौत्रवधूके साथ द्वारकाको लौट जाना और द्वारकामें महोत्सव ................................................७७४पूछनेपर श्रीकृष्णद्वारा अपना तथा राधाका रहस्योद्घाटन ........................................७८६
९२- शृगालोपाख्यान .....................................७७७९७- श्रीकृष्णका राधाके साथ विभिन्न स्थलोंमें विहार करके पुनः गोकुलमें जाना, वहाँ उनका स्वागत-सत्कार, यशोदाका राधासहित श्रीकृष्णको महलमें ले जाना और मङ्गल-महोत्सव करना ........................७८९
९३- गणेशके अग्रपूज्यत्व-वर्णनके प्रसङ्गमें राधाद्वारा गणेशकी अग्रपूजाका कथन .......७७९९८- श्रीकृष्णद्वारा नन्दको ज्ञानोपदेश और राधा-कलावती आदि गोपियोंका गोलोक-गमन .....७९०
९४- गणेशकृत राधा-प्रशंसा, पार्वती-राधा-सम्भाषण, पार्वतीके आदेशसे सखियोंद्वारा राधाका शृङ्गार और उनकी विचित्र झाँकी; ब्रह्मा, शिव, अनन्त आदिके द्वारा राधाकी स्तुति .....................................................७८०९९- श्रीकृष्णके गोलोक-गमनका वर्णन ...........७९१
९५- वसुदेवजीका शंकरजीसे भव-तरणका उपाय पूछना, शंकरजीका उन्हें ज्ञानोपदेश देकर राजसूय-यज्ञ करनेका आदेश देना, वसुदेवजीद्वारा राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान और यज्ञान्तमें सर्वस्व दक्षिणामें देकर उनका द्वारकाको लौटना .....७८५१००- नारायणके आदेशसे नारदका विवाहके लिये उद्यत हो ब्रह्मलोकमें जाना, ब्रह्माका दल-बलके साथ राजा सृंजयके पास आना, सृंजय-कन्या और नारदका विवाह, सनत्कुमारद्वारा नारदको श्रीकृष्ण-मन्त्रोपदेश, महादेवजीका उन्हें श्रीकृष्णका ध्यान और जप-विधि बतलाना, तपके अन्तमें नारदका शरीर त्यागकर श्रीहरिके पादपद्ममें लीन होना................................७९६
९६- राधा और श्रीकृष्णका पुनः मिलाप, राधाके१०१- पुराणोंके लक्षण और उनकी श्लोक-संख्याका निरूपण, ब्रह्मवैवर्तपुराणके पठन-श्रवणके माहात्म्यका वर्णन करके सूतजीका सिद्धाश्रमको प्रयाण ................................७९८

इकरंगे चित्र

१- भगवती लक्ष्मी (कथा-प्रसङ्ग पृष्ठ २३९) ... ३९४- सुतपा ब्राह्मण (कथा-प्रसङ्ग पृष्ठ २८६) ..... ८६
२- भगवती सरस्वती (कथा-प्रसङ्ग पृष्ठ १२१)...... ३९५- भगवती गङ्गा (कथा-प्रसङ्ग पृष्ठ १५६) ... १५५
३- शिशु नारद................................................ ८६६- श्रीतुलसी (कथा-प्रसङ्ग पृष्ठ १८७) ......... १५५

रेखा-चित्र

१- नैमिषारण्यमें शौनकके प्रश्न करनेपर सौतिद्वारा ब्रह्मवैवर्तपुराणका परिचय देते हुए इसका महत्त्व-निरूपण .......................................... २४नारदका रोना तथा उनसे दोनों हाथ जोड़कर क्रोध रोकनेकी प्रार्थना करना ....... ४४
२- गोलोककी ब्रह्मज्योतिमें स्थित श्यामसुन्दर ... २६६- पुष्करतीर्थमें गन्धर्वराजका भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये तप करना तथा भगवान् शिवका प्रत्यक्ष दर्शन होनेपर दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़कर प्रणाम करना ......... ५३
३- गोलोकस्थ रासमण्डलमें श्रीकृष्णके वामपार्श्वसे एक कन्या (श्रीराधा)-का प्रादुर्भाव ...... ३४७- मालावतीका अपने पतिके शवको छातीसे लगाकर योगासनसे बैठना तथा उसे बारम्बार शुभ दृष्टिसे देखना ...................... ५७
४- श्रीकृष्णका शंकरजीको बुलाकर देवी सिंहवाहिनीको ग्रहण करनेके लिये कहना तथा शंकरजीका अरुचि प्रकट करते हुए उनसे निरन्तर भजनके लिये वर माँगना ..... ३७८- परमात्मा श्रीकृष्णका अपनी शक्तियोंके साथ मालावतीके पति-गन्धर्व उपबर्हणके
५- जगत्पति ब्रह्माद्वारा शाप दिये जानेपर

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विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
शरीरमें अधिष्ठित होना तथा उनके आवेशसे उसका उठ बैठना और ज्ञानके पश्चात् नवीन वस्त्र धारणकर देवसमूह और ब्राह्मणदेवताको प्रणाम कर उनके सामने नृत्य और गान करना....................................७४२०- लक्ष्मी, सरस्वती और गङ्गाके कलह और शापका मुख्य कारण सुनकर भगवान् हरि (विष्णु)-का उनसे समयानुकूल बातें कहना.....१३०
९- पुष्करतीर्थमें वसिष्ठजीद्वारा मालावतीको श्रीहरिके स्तोत्र, पूजन आदि तथा एक मन्त्रका उपदेश दिया जाना.........................७५२१- शतशृङ्ग पर्वतपर एक सहस्र दिव्य युगोंतक निराहार रहकर राधाकी तपस्यासे करुणासे द्रवित होकर श्रीकृष्णका उन्हें (अन्य लोगोंके लिये दुर्लभ) सारभूत वर देना......१३८
१०- भगवान् शंकरद्वारा बाणासुरके समक्ष संसारपावननामक (शिव) कवचका कथन........७८२२- भगवती पृथ्‍वी देवी ..................................१४०
११- एक हजार वर्षतक बिना कुछ खाये-पीये कठोर तपस्यामें तत्पर बालक नारदद्वारा ध्यानमें एक दिव्यलोकमें रत्नमय सिंहासनपर आसीन दिव्य बालक—नित्य नवकिशोरका दर्शन .....................................................८४२३- तपस्यामें लीन भगीरथको गोपवेशमें भगवान् श्रीकृष्णका प्रत्यक्ष दर्शन ..........................१४३
१२- गङ्गाजीके तटपर पीपलवृक्षके नीचे बैठकर तप करते हुए गोपी-बालक नारदका ध्यानमें दर्शन देनेवाले दिव्यबालकके अन्तर्धान हो जानेपर रोने लगना...............८५२४- भगवती गङ्गाका ध्यान-चित्रण..................१४६
१३- ब्रह्माजीका नारदको गृहस्थ-धर्मका महत्त्व बताते हुए उन्हें मनुवंशी सृञ्जयके घरमें उत्पन्न रत्नमाला (पूर्वजन्मकी पत्नी मालती)-से विवाह करनेके लिये राजी करना.........९०२५- शिवजीके संगीतसे रासमण्डलमें श्रीकृष्ण और राधाका द्रवभागको प्राप्त होना..........१४७
१४- अपनी चिन्मयी शक्तिद्वारा स्वर्गर्भसे उत्पन्न बालकको ब्रह्माण्ड-गोलकके अथाह जलमें छोड़ दिये जानेपर श्रीकृष्णका उसे संतानहीना हो जानेका शाप देना और उस (शक्ति) देवीकी जीभके अग्रभागसे सहसा वीणा-पुस्तकधारिणी एक मनोहर कन्याका प्रकट होना ......................................................११५२६- ब्रह्माद्वारा भगवती राधाका स्तवन............१५३
१५- गोलोकेश्वर भगवान् श्रीकृष्णके रोमकूपसे असंख्य गोपोंका प्रकट होना ......................११५२७- वैकुण्ठमें विष्णुके समक्ष आकर शंकरका उन्हें श्रद्धापूर्वक प्रणाम करना तथा ब्रह्मा और अत्यन्त भयभीत सूर्यद्वारा शंकरको प्रणाम-निवेदन .......................................१५८
१६- श्रीराधाके रोमकूपोंसे बहुत-सी गोप-कन्याओंका प्राकट्य .................................११६२८- तुलसीका बदरीवनमें जाकर दीर्घकालतक कठोर तपस्या करना ...............................१६३
१७- श्रीकृष्णके शरीरसे आविर्भूत देवी दुर्गाका उनकी स्तुति करना तथा श्रीकृष्णका इन्हें रत्नमय सिंहासन प्रदान करना.......................११६२९- शङ्खचूड़ और तुलसीको ब्रह्माजीका आशीर्वादरूपमें विवाहकी आज्ञा देना .......१६८
१८- विराट्मय बालकका श्रीकृष्णसे उनके चरणकमलोंमें अविचल भक्तिकी वर-याचना .......११९३०- विमानसे उतरकर शङ्खचूड़का भगवान्‌को भक्तिपूर्वक प्रणाम करना तथा शंकरजी, भद्रकाली और स्वामी कार्तिकेयका शङ्खचूड़को आशीर्वाद देना ....................१७५
१९- मुनिवर याज्ञवल्क्यका भगवती सरस्वतीको प्रणाम करना ............................................१२७३१- तुलसीके वचन सुनकर शापके भयसे श्रीहरिका लीलापूर्वक अपना सुन्दर स्वरूप प्रकट कर देना ........................................१८३
३२- वैकुण्ठमें श्रीहरिका देवताओंको समझाकर लक्ष्मीदेवीसे क्षीरसमुद्रके यहाँ जाकर जन्म धारण करनेको स्वीकार करनेके लिये कहना ...............................................२३९
३३- भगवती स्वाहाको श्रीकृष्णका प्रत्यक्ष दर्शन .....२४६
३४- पितरोंकी प्रार्थनापर ब्रह्माजीद्वारा मानसी कन्या (स्वधा)-को प्रकट करना तथा उसे पत्नीरूपमें पितरोंको सौंपना ...................२४८
३५- दक्षिणासे यज्ञपुरुषका अपने-आपको स्वामी बनानेके लिये निवेदन ................................२५२
३६- देवी देवसेना (षष्ठी)-का प्रियव्रतसे अपनी पूजा कराने और करनेके लिये आदेश देना

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विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
तथा सुव्रतको उसे प्रदान करना.......................२५५प्रणाम करना .........................................३४९
३७- मनसा देवीका व्याकुल होकर शंकर, ब्रह्मा, श्रीहरि तथा कश्यपजीका स्मरण करना और उनके आनेपर मुनि जरत्कारुद्वारा स्तुति और प्रणाम करके आगमनका कारण पूछा जाना ....................................२६२५२- पुष्करमें तप करते हुए इन्द्रको श्रीविष्णुका प्रकट होकर मनोवाञ्छित वर, कवच और मन्त्र प्रदान करना ...........................३५५
३८- पुण्य वृन्दावनमें गोपाङ्गनाओंसे घिरे तथा राधाके साथ विहार करते समय दूध पीनेकी इच्छा जाग उठनेपर श्रीकृष्णद्वारा अपने वामपार्श्वसे सुरभी गौको प्रकट करना तथा सुदामाका रत्नमय पात्रमें उसका दूध दुहना .....२६६५३- राजा कार्तवीर्यद्वारा—'युद्ध कीजिये अथवा मेरी अभीष्ट गौ समर्पित कीजिये' कहनेपर जमदग्निमुनिका उसे घर लौटने और सनातन धर्मकी रक्षा करनेके लिये निर्देश देना .......३६४
३९- श्रीपार्वतीद्वारा शंकरजीसे श्रीराधाके प्रादुर्भाव एवं महत्त्व आदिका वर्णन करनेका निवेदन ......२६८५४- माताद्वारा युद्ध न करनेका अनुरोध किये जानेपर भी भार्गव परशुरामकी इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियहीन करनेकी प्रतिज्ञा .........३६६
४०- राजा उत्कल (सुयज्ञ)-का यज्ञ-अनुष्ठान ......२७३५५- परशुरामका शिवजीसे अपना अभिप्राय प्रकट करना और शिवजीका उन्हें गुह्यमन्त्र और 'त्रैलोक्यविजय' कवच प्रदान करना .....३७३
४१- ब्राह्मणद्वारा राजा उत्कल(सुयज्ञ)-को शाप .....२७४५६- पुष्करमें परशुरामकी तपस्या और श्रीकृष्णसे वर प्राप्ति ...........................................३८३
४२- पुलह, पुलस्त्य, प्रचेता आदि मुनियोंका ब्राह्मणके पीछे-पीछे चलना तथा समझाना और एक स्थानपर ठहराकर नीतिकी बातें करना...........................................२७४५७- परशुरामका राजराजेश्वर कार्तवीर्यसे हितकारक, सत्य एवं नीतयुक्त वचन कहना ...........३८९
४३- राजा सुयज्ञको ब्राह्मण (सुतपा)-द्वारा सर्वदुर्लभ परमतत्त्वका उपदेश....................२७९५८- परशुरामका कुपित होकर गणेशपर फरसेका प्रहार करना और उनका एक दाँत टूट जाना .................................................४०७
४४- नित्य वैकुण्ठधाममें वनमालाधारी चतुर्भुज नारायणदेवका लक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा तथा तुलसी और सुनन्द, नन्द तथा कुमुद आदि पार्षदोंके साथ निवास ................................२८२५९- परशुरामकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर दुर्गाका उन्हें अभय वरदान देना ..........................४१४
४५- सुयज्ञद्वारा श्रीराधाका उत्कृष्ट मन्त्रजप करते हुए दुष्कर तपस्या तथा आकाशमें रथपर बैठी हुई परमेश्वरी श्रीराधाका उन्हें दर्शन.....२८७६०- आकाशवाणीसे प्रभावित हो देवीके वधके लिये उद्यत हुए कंसको वसुदेवजीका समझाना ..............................................४४८
४६- दिव्य सुन्दर गोलोकमें राजा सुयज्ञको रत्नसिंहासनपर विराजमान श्रीकृष्णका दर्शन .....२८८६१- धर्म, ब्रह्मा तथा शिव आदि देवेश्वरगणद्वारा देवकीके गर्भमें स्थित परमेश्वरकी स्तुति......४४९
४७- रासेश्वर श्रीकृष्णसहित श्रीराधाका ध्यान-चित्रण...................................................२९०६२- भगवान् श्रीकृष्णका दिव्य रूप धारणकर देवकीके हृदय-कमलके कोशसे प्रकट होना तथा वसुदेवजीका अपनी पत्नी देवकीके साथ भक्तिभावसे उनकी स्तुति करना ......४५१
४८- शिवजीका श्रीपार्वतीको पुण्यक-व्रतके अनुष्ठानके लिये प्रेरित करना ....................३१६६३- वसुदेवजीका नन्दगाँवमें पहुँचकर शय्यापर यशोदाजीको निद्रित अवस्थामें देखकर तुरंत ही पुत्र (श्रीकृष्ण)-को शय्यापर सुलाकर तथा उनके बदले सुवर्णके समान गौर कान्तिवाली एक बालिकाको गोदमें लेकर मथुराके लिये प्रस्थान करना .........४५३
४९- पार्वतीजीके निवेदन करनेपर शिवजीका प्रियतमा (पार्वती)-के साथ घरमें जाकर अपने पुत्रको देखना................................३३५६४- मायास्वरूपिणी बालिकाको लेकर पत्थरपर दे मारनेके लिये कंसका आगे बढ़ना तथा वसुदेव और देवकीका उसे समझाकर
५०- पार्वतीजीके कहनेपर शनैश्चरका गणेशपर दृष्टिपात करना तथा शिशुके मस्तकका धड़से अलग हो जाना ............................३३९
५१- कार्तिकेयजीका श्रीपार्वतीको सिर झुकाकर

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विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
फूट-फूटकर रोने लगना ........................४५३७९- नन्दद्वारा इन्द्रयज्ञकी तैयारी देखकर श्रीकृष्णका विस्मित होकर उनसे पूजनके स्वरूप आदिके विषयमें प्रश्न करना .................................५२८
६५- बालक श्रीकृष्णको गोपीका प्रसन्नतापूर्वक देखना .............................................४६१८०- गोवर्धन-पूजाके समय श्रीकृष्णका लोगोंसे वर माँगनेके लिये कहना .........................५३१
६६- बालक श्रीकृष्णको गोदमें लेकर पूतनाका बारम्बार उनका मुख चूमना तथा सुखपूर्वक बैठकर उनके (श्रीहरिके) मुखमें अपना स्तन देना...........................................४६३८१- श्रीहरि (कृष्ण)-का गोवर्धन पर्वतको बायें हाथमें छातेके डंडेकी भाँति धारण कर लेना ..................................................५३३
६७- श्रीकृष्णके पैरोंके आघातसे शकटका चूर-चूर होना तथा उसकी बिखरी हुई लकड़ियोंके भीतर दबे बालक (श्रीकृष्ण)-को यशोदाजीका गोदमें उठा लेना ..........४६६८२- इन्द्रके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णका स्तवन ....५३४
६८- शिष्योंसहित मुनि गर्गका आगमन तथा यशोदाद्वारा उनका सत्कार और श्रीकृष्णको उन्हें प्रणाम करवाना ............................४६९८३- श्रीकृष्णका सुदर्शनचक्रसे दैत्यराज धेनुकासुरको काट डालना .........................................५४०
६९- श्रीकृष्णद्वारा दैत्यराज प्रलम्बका वध ........४८९८४- ब्रह्मा, शिव, पार्वती, धर्म, इन्द्र, रुद्र, दिक्पाल, ग्रह, अत्रि, लक्ष्मी, सरस्वती आदिका वैकुण्ठलोकमें आकर दुर्वासाके अपराधको क्षमाकर उनकी रक्षा करनेके लिये भगवान् विष्णुसे करुण प्रार्थना करना .....................५५०
७०- श्रीकृष्णके तेजसे दग्ध होकर दैत्यराज केशीका प्राण-परित्याग करना ..........................४९०८५- अपने घरपर आये हुए दुर्वासाको देखकर राजा अम्बरीषका उनके चरणोंमें हाथ जोड़कर प्रणाम करना ........................................५५१
७१- श्रीकृष्ण, बलदेव और अन्य गोप-गोपियोंका गोकुल छोड़कर वृन्दावनके लिये प्रस्थान .....४९६८६- गौरीव्रतके पूर्ण होनेपर आकाशसे प्रकट होकर भगवती दुर्गाका मुस्कराते हुए मुखारविन्दसे राधिकाको सम्बोधित कर कहना .................................................५६३
७२- विश्वकर्माद्वारा नन्दभवन और राजमार्ग आदिका निर्माण ..................................५०३८७- रासमण्डलमें मधुसूदनद्वारा मुरलीवादन .....५६७
७३- ब्राह्मणपत्नियोंद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति ..........५१०८८- वंशीनादको सुनते ही गोपियोंका अपने घरसे लाखोंकी संख्यामें निकल पड़ना .....५६७
७४- श्रीकृष्णका विषमिश्रित यमुना-जल पीकर मरी हुई गौओंको जीवित करना ..............५१४८९- श्रीराधाके साथ श्रीकृष्णका वनविहार तथा अष्टावक्रमुनिके द्वारा उनकी स्तुति .......५७०
७५- भगवान् श्रीकृष्णका रक्तरञ्जित मुखवाले कालियनागके मस्तकपर चढ़ना तथा उनके भारसे आक्रान्त हो कालियनागका प्राण त्याग देनेको उद्यत होना; नागपत्नी सुरसा तथा दूसरी नागिनियोंका श्रीहरिके सामने आकर रोना और उन्हें प्रणामकर अपनी बात कहना ..........................................५१५९०- वैकुण्ठधाममें श्रीशिवजीका जाकर कमलाकान्त श्रीहरिको प्रणामकर उनके वामभागमें बैठ जाना ................................................५७६
७६- श्रीकृष्णके विरहसे संतप्त कालियदहमें प्रवेश करनेके लिये उद्यत यशोदा, राधा और मूर्च्छित हुए नन्दराय आदि गोप-गोपियोंको बलरामजीद्वारा समझाया जाना .................५२१९१- ब्राह्मणबालकका रूप धारणकर शंकरजीका तपस्या करती हुई पार्वतीके पास आना और उनसे बातचीत ................................५९१
७७- व्रजवासियों और व्रजाङ्गनाओंका कालियदहके जलसे ऊपर उछलते हुए श्रीकृष्णको देखना ......५२२९२- शिवद्वारा की हुई स्तुतिसे संतुष्ट होकर प्रकृतिरूपिणी सतीका प्रकट होना और उन्हें सान्त्वना देना ..........६१०
७८- भाण्डीरवटके नीचे रत्नमय सिंहासनपर विराजमान श्रीकृष्णको अत्यन्त विस्मित होकर तथा हाथ जोड़कर ब्रह्माजीका प्रणाम करना ................................................५२५९३- मायासे शिशुरूपधारी जनार्दनद्वारा अग्निकी दाहिकाशक्तिका हरण तथा उसका दर्प भङ्ग करना ..........................................६२४
९४- सप्तर्षियोंद्वारा वाहित शिबिकापर बैठे नहुषका

( २० )

विषयपृष्ठ-संख्याविषयपृष्ठ-संख्या
अभीष्ट स्थानपर पहुँचनेमें विलम्ब होते देखकर उन्हें डाँटना-फटकारना ..........६४०मरे पुत्रको (जीवित अवस्थामें) समर्पित करना ...................................................७४०
९५- श्रीराम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्नकी बालक्रीडा ....६४११०७- भीष्मकको शतानन्दका रुक्मिणीका श्रीकृष्णके साथ विवाह करनेकी सम्मति देना....७४४
९६- रातमें कंसद्वारा दुःस्वप्न देखा जाना .........६४५१०८- राजकुमार रुक्मीका श्रीकृष्णकी सेनाका अवलोकन कर कुपित होना तथा निष्ठुर वचन कहना ..........................................७४७
९७- कंसका अक्रूरसे नन्द-व्रजमें जानेके लिये कहना ....................................................६४८१०९- रुक्मिणी और श्रीकृष्णका विवाह ............७५१
९८- श्रीकृष्णकी दृष्टि पड़ते ही कुब्जाका सहसा अनुपम शोभा और रूप-यौवनसे लक्ष्मीके समान रमणीय हो जाना ..........................६६५११०- श्रीकृष्णके कहनेसे नन्द-यशोदाका ज्ञानप्राप्तिके लिये कदलीवनमें राधाके पास जाना और अचेतन अवस्थामें पड़ी राधाको चैतन्य करना .........................................७५३
९९- मथुरामें मालीको श्रीकृष्णका दास्यभावका वरदान देना ............................................६६६१११- सरस्वती देवीका आकर मायावती (रति)-को समझाना...........................७५८
१००- श्रीकृष्णद्वारा कंस-वध ...............................६६७११२- कामदेवद्वारा दैत्य शम्बरासुरका वध ......७५८
१०१- श्रीकृष्णका पुत्रवियोगसे कातर नन्दजीको अपना स्वरूप और प्रभाव बताना .........६६९११३- नरकासुरके राजमहलमें श्रीकृष्णका सोलह हजार कन्याओंसे पाणिग्रहण ..................७५९
१०२- वृन्दाद्वारा धर्मको अपनी गोदमें कर जीवनदानकी चेष्टा तथा धर्मपत्नी मूर्तिका उसे (धर्मको) जीवित करनेकी श्रीविष्णुसे प्रार्थना ................................................७०७११४- चित्रलेखाका द्वारकामें श्रीहरिके भवनसे सोते हुए अनिरुद्धको उठा ले जाना ......७६४
१०३- विरहविदग्धा राधाको उद्धवका प्रणाम करना .................................................७१९११५- श्रीशिवजीका बाणको (अनिरुद्धके साथ) कन्यादानके लिये समझाना ................७७१
१०४- मथुरा लौटकर श्रीकृष्णसे उद्धवका व्रजसमाचार-निवेदन .............................७३२११६- बाणासुरका हजारों बाण चलाना ..........७७५
१०५- माता देवकीद्वारा दिये गये आभूषणोंसे विभूषित श्रीबलराम और कृष्णका देवताओं और मुनियोंकी सभामें पधारना और ब्रह्मा, शम्भु, शेषनाग आदिद्वारा उनकी स्तुति......७३६११७- सुदर्शनचक्रद्वारा श्रीकृष्णका बाणासुरके हजारों हाथोंको काट डालना...................७७५
१०६- श्रीकृष्णद्वारा अपने गुरु सांदीपनिको उनके११८- शिवजीद्वारा बाणासुरको श्रीकृष्णके चरणमें समर्पित करना .....................................७७६
११९- श्रीराधाद्वारा गणेश-स्तवन ........................७८०

श्रीगणेशाय नमः श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः

संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

ब्रह्मखण्ड

मङ्गलाचरण, नैमिषारण्यमें आये हुए सौतिसे शौनकके प्रश्न तथा सौतिद्वारा ब्रह्मवैवर्तपुराणका परिचय देते हुए इसके महत्त्वका निरूपण

गणेशब्रह्मेशसुरेशशेषाः
सुराश्च सर्वे मनवो मुनीन्द्राः।
सरस्वतीश्रीगिरिजादिकाश्च
नमन्ति देव्यः प्रणमामि तं विभुम्॥ १॥
गणेश, ब्रह्मा, महादेवजी, देवराज इन्द्र, शेषनाग आदि सब देवता, मनु, मुनीन्द्र, सरस्वती, लक्ष्मी तथा पार्वती आदि देवियाँ भी जिन्हें मस्तक झुकाती हैं, उन सर्वव्यापी परमात्माको मैं प्रणाम करता हूँ।

स्थूलास्तनूर्विदधतं त्रिगुणं विराजं
विश्वानि लोमविवरेषु महान्तमाद्यम्।
सृष्ट्युन्मुखः स्वकलयापि ससर्ज सूक्ष्मं
नित्यं समेत्य हृदि यस्तमजं भजामि॥ २॥
जो सृष्टिके लिये उन्मुख हो तीन गुणोंको स्वीकार करके ब्रह्मा, विष्णु और शिव नामवाले तीन दिव्य स्थूल शरीरोंको ग्रहण करते तथा विराट् पुरुषरूप हो अपने रोमकूपोंमें सम्पूर्ण विश्वको धारण करते हैं, जिन्होंने अपनी कलाद्वारा भी सृष्टि-रचना की है तथा जो सूक्ष्म (अन्तर्यामी आत्मा)-रूपसे सदा सबके हृदयमें विराजमान हैं, उन महान् आदिपुरुष अजन्मा परमेश्वरका मैं भजन करता हूँ।

ध्यायन्ते ध्याननिष्ठाः सुरनरमनवो योगिनो योगरूढाः
सन्तः स्वप्नेऽपि सन्तं कतिकतिजनिभिर्यं न पश्यन्ति तप्त्वा।
ध्याये स्वेच्छामयं तं त्रिगुणपरमहो निर्विकारं निरीहं
भक्तध्यानैकहेतोर्निरुपमरुचिरश्यामरूपं दधानम्॥ ३॥

ध्यानपरायण देवता, मनुष्य और स्वायम्भुव आदि मनु जिनका ध्यान करते हैं, योगारूढ़ योगिजन जिनका चिन्तन करते हैं, जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति सभी अवस्थाओंमें विद्यमान होनेपर भी जिन्हें बहुत-से साधक संत कितने ही जन्मोंतक तपस्या करके भी देख नहीं पाते हैं तथा जो केवल भक्त पुरुषोंके ध्यान करनेके लिये स्वेच्छामय अनुपम एवं परम मनोहर श्यामरूप धारण करते हैं, उन त्रिगुणातीत निरीह एवं निर्विकार परमात्मा श्रीकृष्णका मैं ध्यान करता हूँ।

वन्दे कृष्णं गुणातीतं परं ब्रह्माच्युतं यतः।
आविर्बभूवुः प्रकृतिब्रह्मविष्णुशिवादयः॥ ४॥
जिनसे प्रकृति, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदिका आविर्भाव हुआ है, उन त्रिगुणातीत परब्रह्म परमात्मा अच्युत श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ।

हे भोले-भाले मनुष्यो! व्यासदेवने श्रुतिगणोंको बछड़ा बनाकर भारतीरूपिणी कामधेनुसे जो अपूर्व, अमृतसे भी उत्तम, अक्षय, प्रिय एवं मधुर दूध दुहा था, वही यह अत्यन्त सुन्दर ब्रह्मवैवर्तपुराण है। तुम अपने श्रवणपुटोंद्वारा इसका पान करो, पान करो।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

ॐ नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
परम पुरुष नारायण, नरश्रेष्ठ नर, इनकी

२२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

लीलाओंको प्रकट करनेवाली देवी सरस्वती तथा उन लीलाओंका गान करनेवाले वेदव्यासको नमस्कार करके फिर जयका उच्चारण (इतिहास-पुराणका पाठ) करना चाहिये।

भारतवर्षके नैमिषारण्य तीर्थमें शौनक आदि ऋषि प्रातःकाल नित्य और नैमित्तिक क्रियाओंका अनुष्ठान करके कुशासनपर बैठे हुए थे। इसी समय सूतपुत्र उग्रश्रवा अकस्मात् वहाँ आ पहुँचे। आकर उन्होंने विनीत भावसे मुनियोंके चरणोंमें प्रणाम किया। उन्हें आया देख ऋषियोंने बैठनेके लिये आसन दिया। मुनिवर शौनकने भक्तिभावसे उन नवागत अतिथिका भलीभाँति पूजन करके प्रसन्नतापूर्वक उनका कुशल-समाचार पूछा। शौनकजी शम आदि गुणोंसे सम्पन्न थे, पौराणिक सूतजी भी शान्त चित्तवाले महात्मा थे। अब वे रास्तेकी थकावटसे छूटकर सुस्थिर आसनपर आरामसे बैठे थे। उनके मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। उन्हें पुराणोंके सम्पूर्ण तत्त्वका ज्ञान था। शौनकजी भी पुराण-विद्याके ज्ञाता थे। वे मुनियोंकी उस सभामें विनीत भावसे बैठे थे और आकाशमें ताराओंके बीच चन्द्रमाकी भाँति शोभा पा रहे थे। उन्होंने परम विनीत सूतजीसे एक ऐसे पुराणके विषयमें प्रश्न किया, जो परम उत्तम, श्रीकृष्णकी कथासे युक्त, सुननेमें सुन्दर एवं सुखद, मङ्गलमय, मङ्गलयोग्य तथा सर्वदा मङ्गलधाम हो, जिसमें सम्पूर्ण मङ्गलोंका बीज निहित हो; जो सदा मङ्गलदायक, सम्पूर्ण अमङ्गलोंका विनाशक, समस्त सम्पत्तियोंकी प्राप्ति करानेवाला और श्रेष्ठ हो; जो हरिभक्ति प्रदान करनेवाला, नित्य परमानन्ददायक, मोक्षदाता, तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति करानेवाला तथा स्त्री-पुत्र एवं पौत्रोंकी वृद्धि करनेवाला हो।

शौनकजीने पूछा—सूतजी! आपने कहाँके लिये प्रस्थान किया है और कहाँसे आप आ रहे हैं? आपका कल्याण हो। आज आपके दर्शनसे हमारा दिन कैसा पुण्यमय हो गया। हम सभी लोग कलियुगमें श्रेष्ठ ज्ञानसे वञ्चित होनेके कारण भयभीत हैं। संसार-सागरमें डूबे हुए हैं और इस कष्टसे मुक्त होना चाहते हैं। हमारा उद्धार करनेके लिये ही आप यहाँ पधारे हैं। आप बड़े भाग्यशाली साधु पुरुष हैं। पुराणोंके ज्ञाता हैं। सम्पूर्ण पुराणोंमें निष्णात हैं और अत्यन्त कृपानिधान हैं। महाभाग! जिसके श्रवण और पठनसे भगवान् श्रीकृष्णमें अविचल भक्ति प्राप्त हो तथा जो तत्त्वज्ञानको बढ़ानेवाला हो, उस पुराणकी कथा कहिये। सूतनन्दन! जो मोक्षसे भी बढ़कर है, कर्मका मूलोच्छेद करनेवाली तथा संसाररूपी कारागारमें बँधे हुए जीवोंकी बेड़ी काटनेवाली है, वह कृष्ण-भक्ति ही जगत्-रूपी दावानलसे दग्ध हुए जीवोंपर अमृत-रसकी वर्षा करनेवाली है। वही जीवधारियोंके हृदयमें नित्य-निरन्तर परम सुख एवं परमानन्द प्रदान करती है।*

आप वह पुराण सुनाइये, जिसमें पहले सबके बीज (कारणतत्त्व)-का प्रतिपादन तथा परब्रह्मके स्वरूपका निरूपण हो। सृष्टिके लिये उन्मुख हुए उस परमात्माकी सृष्टिका भी उत्कृष्ट वर्णन हो। मैं यह जानना चाहता हूँ कि परमात्माका स्वरूप साकार है या निराकार? ब्रह्मका स्वरूप कैसा है? उसका ध्यान अथवा चिन्तन कैसे करना चाहिये? वैष्णव महात्मा किसका ध्यान करते हैं? तथा शान्तचित्त योगीजन किसका चिन्तन किया करते हैं? वेदमें किनके गूढ़ एवं प्रधान


* श्रीकृष्णो निश्चला भक्तिर्यतो भवति शाश्वती। तत् कथ्यतां महाभाग पुराणं ज्ञानवर्द्धनम्॥
गरीयसी या मोक्षाच्च कर्ममूलनिकृन्तनी। संसारसंनिबद्धानां निगडच्छेदकर्तरी॥
भवदावाग्निदग्धानां पीयूषवृष्टिवर्षिणी। सुखदाऽऽनन्ददा सौते शश्वच्चेतसि जीविनाम्॥
(ब्रह्मखण्ड १। १२—१४)

ब्रह्मखण्ड २३

मतका निरूपण किया गया है ?

वत्स! जिस पुराणमें प्रकृतिके स्वरूपका निरूपण हुआ हो, गुणोंका लक्षण वर्णित हो तथा ‘महत्’ आदि तत्त्वोंका निर्णय किया गया हो; जिसमें गोलोक, वैकुण्ठ, शिवलोक तथा अन्यान्य स्वर्गादि लोकोंका वर्णन हो तथा अंशों और कलाओंका निरूपण हो, उस पुराणको श्रवण कराइये। सूतनन्दन ! प्राकृत पदार्थ क्या हैं? प्रकृति क्या है तथा प्रकृतिसे परे जो आत्मा या परमात्मा है, उसका स्वरूप क्या है? जिन देवताओं और देवाङ्गनाओंका भूतलपर गूढ़रूपसे जन्म या अवतरण हुआ है, उनका भी परिचय दीजिये। समुद्रों, पर्वतों और सरिताओंके प्रादुर्भावकी भी कथा कहिये। प्रकृतिके अंश कौन हैं? उसकी कलाएँ और उन कलाओंकी भी कलाएँ क्या हैं? उन सबके शुभ चरित्र, ध्यान, पूजन और स्तोत्र आदिका वर्णन कीजिये। जिस पुराणमें दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी और सावित्रीका वर्णन हो, श्रीराधिकाका अत्यन्त अपूर्व और अमृतोपम आख्यान हो, जीवोंके कर्मविपाकका प्रतिपादन तथा नरकोंका भी वर्णन हो, जहाँ कर्मबन्धनका खण्डन तथा उन कर्मोंसे छूटनेके उपायका निरूपण हो, उसे सुनाइये। जिन जीवधारियोंको जहाँ जो-जो शुभ या अशुभ स्थान प्राप्त होता हो, उन्हें जिस कर्मसे जिन-जिन योनियोंमें जन्म लेना पड़ता हो, इस लोकमें देहधारियोंको जिस कर्मसे जो-जो रोग होता हो तथा जिस कर्मके अनुष्ठानसे उन रोगोंसे छुटकारा मिलता हो, उन सबका प्रतिपादन कीजिये।

सूतनन्दन ! जिस पुराणमें मनसा, तुलसी, काली, गङ्गा और वसुन्धरा पृथ्वी—इन सबका तथा अन्य देवियोंका भी मङ्गलमय आख्यान हो, शालग्राम-शिलाओं तथा दानके महत्त्वका निरूपण हो अथवा जहाँ धर्माधर्मके स्वरूपका अपूर्व विवेचन उपलब्ध होता हो, उसका वर्णन कीजिये। जहाँ गणेशजीके चरित्र, जन्म और कर्मका तथा उनके गूढ़ कवच, स्तोत्र और मन्त्रोंका वर्णन हो, जो उपाख्यान अत्यन्त अद्भुत और अपूर्व हो तथा कभी सुननेमें न आया हो, वह सब मन-ही-मन याद करके इस समय आप उसका वर्णन करें। परमात्मा श्रीकृष्ण सर्वत्र परिपूर्ण हैं तथापि इस जगत्में पुण्य-क्षेत्र भारतवर्षमें जन्म (अवतार) लेकर उन्होंने नाना प्रकारके लीला-विहार किये। मुने ! जिस पुराणमें उनके इस अवतार तथा लीला-विहारका वर्णन हो, उसकी कथा कहिये। उन्होंने किस पुण्यात्माके पुण्यमय गृहमें अवतार ग्रहण किया था? किस धन्या, मान्या, पुण्यवती सती नारीने उनको पुत्ररूपसे उत्पन्न किया था? उसके घरमें प्रकट होकर वे भगवान् फिर कहाँ और किस कारणसे चले गये? वहाँ जाकर उन्होंने क्या किया और वहाँसे फिर अपने स्थानपर कैसे आये? किसकी प्रार्थनासे उन्होंने पृथ्वीका भार उतारा? तथा किस सेतुका निर्माण (मर्यादाकी स्थापना) करके वे भगवान् पुनः गोलोकको पधारे? इन सबसे तथा अन्य उपाख्यानोंसे परिपूर्ण जो श्रुतिदुर्लभ पुराण है, उसका सम्यक् ज्ञान मुनियोंके लिये भी दुर्लभ है। वह मनको निर्मल बनानेका उत्तम साधन है। अपने ज्ञानके अनुसार मैंने जो भी शुभाशुभ बात पूछी है या नहीं पूछी है, उसके समाधानसे युक्त जो पुराण तत्काल वैराग्य उत्पन्न करनेवाला हो, मेरे समक्ष उसीकी कथा कहिये। जो शिष्यके पूछे अथवा बिना पूछे हुए विषयकी भी व्याख्या करता है तथा योग्य और अयोग्यके प्रति भी समभाव रखता है, वही सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ सद्गुरु है।

सौति बोले—मुने! आपके चरणारविन्दोंका दर्शन मिल जानेसे मेरे लिये सब कुशल-ही-कुशल है। इस समय मैं सिद्धक्षेत्रसे आ रहा हूँ और नारायणाश्रमको जाता हूँ। यहाँ ब्राह्मणसमूहको

२४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

उपस्थित देख नमस्कार करनेके लिये चला आया हूँ। साथ ही भारतवर्षके पुण्यदायक क्षेत्र नैमिषारण्यका दर्शन भी मेरे यहाँ आगमनका उद्देश्य है। जो देवता, ब्राह्मण और गुरुको देखकर वेगपूर्वक उनके सामने मस्तक नहीं झुकाता है, वह ‘कालसूत्र’ नामक नरकमें जाता है तथा जबतक चन्द्रमा और सूर्यकी सत्ता रहती है, तबतक वह वहीं पड़ा रहता है। साक्षात् श्रीहरि ही भारतवर्षमें ब्राह्मणरूपसे सदा भ्रमण करते रहते हैं। श्रीहरि-स्वरूप उस ब्राह्मणको कोई पुण्यात्मा ही अपने पुण्यके प्रभावसे प्रणाम करता है। भगवन्! आपने जो कुछ पूछा है तथा आपको जो कुछ जानना अभीष्ट है, वह सब आपको पहलेसे ही ज्ञात है, तथापि आपकी आज्ञा शिरोधार्य कर मैं इस विषयमें कुछ निवेदन करता हूँ। पुराणोंमें सारभूत जो ब्रह्मवैवर्त नामक पुराण है, वही सबसे उत्तम है। वह हरिभक्ति देनेवाला तथा सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञानकी वृद्धि करनेवाला है। यह भोग चाहनेवालोंको भोग, मुक्तिकी इच्छा रखनेवालोंको मोक्ष तथा वैष्णवोंको हरिभक्ति प्रदान करनेवाला है। सबकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये यह साक्षात् कल्पवृक्ष-स्वरूप है। इसके ब्रह्मखण्डमें सर्वबीजस्वरूप उस परब्रह्म परमात्माका निरूपण है जिसका योगी, संत और वैष्णव ध्यान करते हैं तथा जो परात्पर-रूप है। शौनकजी! वैष्णव, योगी और अन्य संत महात्मा एक-दूसरेसे भिन्न नहीं हैं। जीवधारी मनुष्य अपने ज्ञानके परिणामस्वरूप क्रमशः संत, योगी और वैष्णव होते हैं। सत्संगसे मनुष्य संत होते हैं। योगियोंके संगसे योगी होते हैं तथा भक्तोंके संगसे वैष्णव होते हैं। ये क्रमशः उत्तरोत्तर श्रेष्ठ योगी हैं।

ब्रह्मखण्डके अनन्तर प्रकृतिखण्ड है, जिसमें देवताओं, देवियों और सम्पूर्ण जीवोंकी उत्पत्तिका कथन है। साथ ही देवियोंके शुभ चरित्रका वर्णन है। जीवोंके कर्मविपाक और शालग्राम-शिलाके महत्त्वका निरूपण है। उन देवियोंके कवच, स्तोत्र, मन्त्र और पूजा-पद्धतिका भी प्रतिपादन किया गया है। उस प्रकृतिखण्डमें प्रकृतिके लक्षणका वर्णन है। उसके अंशों और कलाओंका निरूपण है। उनकी कीर्तिका कीर्तन तथा प्रभावका प्रतिपादन है। पुण्यात्माओं और पापियोंको जो-जो शुभाशुभ स्थान प्राप्त होते हैं, उनका वर्णन है। पापकर्मसे प्राप्त होनेवाले नरकों तथा रोगोंका कथन है। उनसे छूटनेके उपायका भी विचार किया गया है।

प्रकृतिखण्डके पश्चात् गणपतिखण्डमें गणेशजीके जन्मका वर्णन है। उनके उस अत्यन्त अपूर्व चरित्रका निरूपण है, जो श्रुतियों और वेदोंके लिये भी परम दुर्लभ है। गणेश और भृगुजीके संवादमें सम्पूर्ण तत्त्वोंका निरूपण है। गणेशजीके गूढ़ कवच और स्तोत्र, मन्त्र तथा तन्त्रोंका वर्णन है। तत्पश्चात् श्रीकृष्णजन्मखण्डका कीर्तन हुआ है। भारतवर्षके पुण्यक्षेत्रमें श्रीकृष्णके दिव्य

ब्रह्मखण्ड २५

जन्म-कर्मका वर्णन है। उनके द्वारा पृथ्वीके भार उतारने जानेका प्रसंग है। उनके मङ्गलमय क्रीडा-कौतुकोंका वर्णन है। सत्पुरुषोंके लिये जो धर्मसेतुका विधान है, उसका निरूपण भी श्रीकृष्णजन्मखण्डमें ही हुआ है।

विप्रवर शौनक! इस प्रकार मैंने उत्तम पुराणशिरोमणि ब्रह्मवैवर्तका परिचय दिया। यह ब्रह्म आदि चार खण्डोंमें बँटा हुआ है। इसमें सम्पूर्ण धर्मोंका निरूपण है। यह पुराण सब लोगोंको अत्यन्त प्रिय है तथा सबकी समस्त आशाओंको पूर्ण करनेवाला है। इसका नाम ब्रह्मवैवर्त है। यह सम्पूर्ण अभीष्ट पदोंको देनेवाला है। पुराणोंमें सारभूत है। इसकी तुलना वेदसे की गयी है। भगवान् श्रीकृष्णने इस पुराणमें अपने सम्पूर्ण ब्रह्मभावको विवृत (प्रकट) किया है, इसीलिये पुराणवेत्ता महर्षि इसे ब्रह्मवैवर्त कहते हैं। पूर्वकालमें निरामय गोलोकके भीतर परमात्मा श्रीकृष्णने ब्रह्माजीको इस पुराणसूत्रका दान दिया था। फिर ब्रह्माजीने महान् तीर्थ पुष्करमें धर्मको इसका उपदेश दिया। धर्मने अपने पुत्र नारायणको प्रसन्नतापूर्वक यह पुराण प्रदान किया। भगवान् नारायण ऋषिने नारदको और नारदजीने गङ्गाजीके तटपर व्यासदेवको इसका उपदेश दिया। व्यासजीने उस पुराणसूत्रका विस्तार करके उसे अत्यन्त विशाल रूप देकर पुण्यदायक सिद्धक्षेत्रमें मुझे सुनाया। यह पुराण बड़ा ही मनोहर है। ब्रह्मन्! अब मैं आपके सामने इसकी कथा आरम्भ करता हूँ। आप इस सम्पूर्ण पुराणको सुनें। व्यासजीने इस पुराणको अठारह हजार श्लोकोंमें विस्तृत किया है। सम्पूर्ण पुराणोंके श्रवणसे मनुष्यको जो फल प्राप्त होता है, वह निश्चय ही इसके एक अध्यायको सुननेसे मिल जाता है।

(अध्याय १)


परमात्माके महान् उज्ज्वल तेजःपुञ्ज, गोलोक, वैकुण्ठलोक और शिवलोककी स्थितिका वर्णन तथा गोलोकमें श्यामसुन्दर भगवान् श्रीकृष्णके परात्पर स्वरूपका निरूपण

**शौनकजीने पूछा—**सूतनन्दन! आपने कौन-सा परम अद्भुत, अपूर्व और अभीष्ट पुराण सुना है, वह सब विस्तारपूर्वक कहिये। पहले परम उत्तम ब्रह्मखण्डकी कथा सुनाइये।

**सौतिने कहा—**मैं सर्वप्रथम अमित तेजस्वी गुरुदेव व्यासजीके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ। तत्पश्चात् श्रीहरिको, सम्पूर्ण देवताओंको और ब्राह्मणोंको प्रणाम करके सनातन धर्मोंका वर्णन आरम्भ करता हूँ। मैंने व्यासजीके मुखसे जिस सर्वोत्तम ब्रह्मखण्डको सुना है, वह अज्ञानान्धकारका विनाशक और ज्ञानमार्गका प्रकाशक है। ब्रह्मन्! पूर्ववर्ती प्रलयकालमें केवल ज्योतिष्पुञ्ज प्रकाशित होता था, जिसकी प्रभा करोड़ों सूर्योंके समान थी। वह ज्योतिर्मण्डल नित्य है और वही असंख्य विश्वका कारण है। वह स्वेच्छामय रूपधारी सर्वव्यापी परमात्माका परम उज्ज्वल तेज है। उस तेजके भीतर मनोहर रूपमें तीनों ही लोक विद्यमान हैं। विप्रवर! तीनों लोकोंके ऊपर गोलोक-धाम है, जो परमेश्वरके समान ही नित्य है। उसकी लम्बाई-चौड़ाई तीन करोड़ योजन है। वह सब ओर मण्डलाकार फैला हुआ है। परम महान् तेज ही उसका स्वरूप है। उस चिन्मय लोककी भूमि दिव्य रत्नमयी है। योगियोंको स्वप्नमें भी उसका दर्शन नहीं होता। परंतु वैष्णव भक्तजन भगवान्की कृपासे उसको प्रत्यक्ष देखते और वहाँ जाते हैं। अप्राकृत

२६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण आकाश अथवा परम व्योममें स्थित हुए उस श्रेष्ठ धामको परमात्माने अपनी योगशक्तिसे धारण कर रखा है। वहाँ आधि, व्याधि, जरा, मृत्यु तथा शोक और भयका प्रवेश नहीं है। उच्चकोटिके दिव्य रत्नोंद्वारा रचित असंख्य भवन सब ओरसे उस लोककी शोभा बढ़ाते हैं। प्रलयकालमें वहाँ केवल श्रीकृष्ण रहते हैं और सृष्टिकालमें वह गोप-गोपियोंसे भरा रहता है। गोलोकसे नीचे पचास करोड़ योजन दूर दक्षिणभागमें वैकुण्ठ और वामभागमें शिवलोक है। ये दोनों लोक भी गोलोकके समान ही परम मनोहर हैं। मण्डलाकार वैकुण्ठलोकका विस्तार एक करोड़ योजन है। वहाँ भगवती लक्ष्मी और भगवान् नारायण सदा विराजमान रहते हैं। उनके साथ उनके चार भुजावाले पार्षद भी रहते हैं। वैकुण्ठलोक भी जरा-मृत्यु आदिसे रहित है। उसके वामभागमें शिवलोक है, जिसका विस्तार एक करोड़ योजन है। वहाँ पार्षदोंसहित भगवान् शिव विराजमान हैं। गोलोकके भीतर अत्यन्त मनोहर ज्योति है, जो परम आह्लादजनक तथा नित्य परमानन्दकी प्राप्तिका कारण है। योगीजन योग एवं ज्ञानदृष्टिसे सदा उसीका चिन्तन करते हैं। वह ज्योति ही परमानन्ददायक, निराकार एवं परात्पर ब्रह्म है। उस ब्रह्म-ज्योतिके भीतर अत्यन्त मनोहर रूप सुशोभित होता है, जो नूतन जलधरके समान श्याम है। उसके नेत्र लाल कमलके समान प्रफुल्ल दिखायी देते हैं। उसका निर्मल मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाला है। उसके रूप-लावण्यपर करोड़ों कामदेव निछावर किये जा सकते हैं। वह मनोहर रूप विविध लीलाओंका धाम है। उसके दो भुजाएँ हैं। एक हाथमें मुरली सुशोभित है। अधरोंपर मन्द मुसकान खेलती रहती है। उसके श्रीअङ्ग दिव्य रेशमी पीताम्बरसे आवृत हैं। सुन्दर रत्नमय आभूषणोंके समुदाय उसके अलङ्कार हैं। वह भक्तवत्सल है। उसके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित तथा कस्तूरी और कुङ्कुमसे अलङ्कृत हैं। उसका श्रीवत्सभूषित वक्षःस्थल कान्तिमान् कौस्तुभसे प्रकाशित है। मस्तकपर उत्तम रत्नोंके सार-तत्त्वसे रचित किरीट-मुकुट जगमगाते रहते हैं। वह श्याम-सुन्दर पुरुष रत्नमय सिंहासनपर आसीन है और आजानुलाम्बिनी वनमाला उसकी शोभा बढ़ाती है। उसीको परब्रह्म परमात्मा एवं सनातन भगवान् कहते हैं। वे भगवान् स्वेच्छामय रूपधारी, सबके आदिकारण, सर्वाधार तथा परात्पर परमात्मा हैं। उनकी नित्य किशोरावस्था रहती है। वे सदा गोप-वेष धारण करते हैं। करोड़ों पूर्ण चन्द्रमाओंकी शोभासे सम्पन्न हैं तथा अपने भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये आकुल रहते हैं। वे ही निरीह, निर्विकार, परिपूर्णतम तथा सर्वव्यापी परमेश्वर हैं तथा वे ही रासमण्डलमें विराजमान, शान्तचित्त, परम मनोहर रासेश्वर हैं; मङ्गलकारी, मङ्गल-योग्य, मङ्गलमय तथा मङ्गलदाता हैं; परमानन्दके बीज, सत्य, अक्षर और अविनाशी

ब्रह्मखण्ड २७ हैं; सम्पूर्ण सिद्धियोंके स्वामी, सर्वसिद्धिस্বরূপ तथा सिद्धिदाता हैं; प्रकृतिसे परे विराजमान, ईश्वर, निर्गुण, नित्य-विग्रह, आदिपुरुष और अव्यक्त हैं। बहुत-से नामोंद्वारा उन्हींको पुकारा जाता है। बहुसंख्यक पुरुषोंने विविध स्तोत्रोंद्वारा उन्हींका स्तवन किया है। वे सत्य, स्वतन्त्र, एक, परमात्मस्वरूप, शान्त तथा सबके परम आश्रय हैं। शान्तचित्त वैष्णवजन उन्हींका ध्यान करते हैं। ऐसा उत्कृष्ट रूप धारण करनेवाले उन एकमात्र भगवान्‌ने प्रलयकालमें दिशाओं और आकाशके साथ सम्पूर्ण विश्वको शून्यरूप देखा। (अध्याय २) श्रीकृष्णसे सृष्टिका आरम्भ, नारायण, महादेव, ब्रह्मा, धर्म, सरस्वती, महालक्ष्मी और प्रकृति (दुर्गा)-का प्रादुर्भाव तथा इन सबके द्वारा पृथक्-पृथक् श्रीकृष्णका स्तवन सौति कहते हैं - भगवान्‌ने देखा कि सम्पूर्ण विश्व शून्यमय है। कहीं कोई जीव-जन्तु नहीं है। जलका भी कहीं पता नहीं है। सारा आकाश वायुसे रहित और अन्धकारसे आवृत्त हो घोर प्रतीत होता है। वृक्ष, पर्वत और समुद्र आदिसे शून्य होनेके कारण विकृताकार जान पड़ता है। मूर्ति, धातु, शस्य और तृणका सर्वथा अभाव हो गया है। ब्रह्मन् ! जगत्‌को इस शून्यावस्थामें देख मन-ही-मन सब बातोंकी आलोचना करके दूसरे किसी सहायकसे रहित एकमात्र स्वेच्छामय प्रभुने स्वेच्छासे ही सृष्टि- रचना आरम्भ की। सबसे पहले उन परम पुरुष श्रीकृष्णके दक्षिणपार्श्वसे जगत्‌के कारणरूप तीन मूर्तिमान् गुण प्रकट हुए। उन गुणोंसे महत्तत्त्व, अहङ्कार, पाँच तन्मात्राएँ तथा रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द - ये पाँच विषय क्रमशः प्रकट हुए। तदनन्तर श्रीकृष्णसे साक्षात् भगवान् नारायणका प्रादुर्भाव हुआ, जिनकी अङ्गकान्ति श्याम थी, वे नित्य-तरुण, पीताम्बरधारी तथा वनमालासे विभूषित थे। उनके चार भुजाएँ थीं। उन्होंने अपने चार हाथोंमें क्रमशः- शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर रखे थे। उनके मुखारविन्दपर मन्द मुस्कानकी छटा छा रही थी। वे रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित थे, शार्ङ्गधनुष धारण किये हुए थे। कौस्तुभमणि उनके वक्षःस्थलकी शोभा बढ़ाती थी। श्रीवत्सभूषित वक्षमें साक्षात् लक्ष्मीका निवास था। वे श्रीनिधि अपूर्व शोभाको प्रकट कर रहे थे; शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी प्रभासे सेवित मुख-चन्द्रके कारण वे बड़े मनोहर जान पड़ते थे। कामदेवकी कान्तिसे युक्त रूप- लावण्य उनका सौन्दर्य बढ़ा रहा था। वे श्रीकृष्णके सामने खड़े हो दोनों हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे। नारायण बोले- जो वर (श्रेष्ठ), वरेण्य (सत्पुरुषोंद्वारा पूज्य), वरदायक (वर देनेवाले) और वरकी प्राप्तिके कारण हैं; जो कारणोंके भी कारण, कर्मस्वरूप और उस कर्मके भी कारण हैं; तप जिनका स्वरूप है, जो नित्य-निरन्तर तपस्याका फल प्रदान करते हैं, तपस्वीजनोंमें सर्वोत्तम तपस्वी हैं, नूतन जलधरके समान श्याम, स्वात्माराम और मनोहर हैं, उन भगवान् श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ। जो निष्काम और कामरूप हैं, कामनाके नाशक तथा कामदेवकी उत्पत्तिके कारण हैं, जो सर्वरूप, सर्वबीजस्वरूप, सर्वोत्तम