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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

३१- भगवती दक्षिणाके प्राकट्यका प्रसङ्ग, उनका ध्यान, पूजा-विधान तथा स्तोत्र-वर्णन एवं चरित्र-श्रवणकी फल-श्रुति

प्रकृतिखण्ड २४१

चूर्णसे तैयार किया हुआ यह मिष्टान्न है। गुड़ और घृतके साथ अग्निपर यह सिद्ध किया गया है। इसे आप स्वीकार करें। [पिष्टक—] देवि! धान्यके चूर्णसे बनाये गये स्वस्तिक आदि चिह्नोंसे युक्त इस पिष्टकको भक्तिपूर्वक आपकी सेवामें समर्पित किया है; स्वीकार कीजिये। [ईख—] देवि! ईख इस भूतलका एक विशिष्ट वृक्ष है, इससे गुड़ आदि अनेक पदार्थ तैयार किये जाते हैं; अतः यह सुस्वादु रससे युक्त ईख सेवामें अर्पित है। इसे ग्रहण करें। [व्यजन—] कमले! शीतल वायु प्रदान करनेवाला यह व्यजन तथा स्वच्छ चँवर उष्णकालके लिये परम सुखदायी है। इसे ग्रहण कीजिये। [ताम्बूल—] देवि! यह उत्तम ताम्बूल कर्पूर आदि सुगन्धित वस्तुओंसे सुवासित एवं जिह्वाको स्फूर्ति प्रदान करनेवाला है। इसे आप स्वीकार कीजिये। [जल—] देवि! प्यासको शान्त करनेवाला अत्यन्त शीतल, सुवासित एवं जगत्के लिये जीवन-स्वरूप यह जल स्वीकार कीजिये। [माल्य—] देवि! विविध ऋतुओंके पुष्पोंसे गूँथी गयी, असीम शोभाको देनेवाली तथा देवराजके लिये भी परम प्रिय इस पवित्र मालाको स्वीकार करें। [आचमनीय—] कृष्णकान्ते! यह पवित्र तीर्थ-जल, स्वयं शुद्ध तथा अन्यको भी सदा शुद्ध करनेवाला है। इसे आप रम्य आचमनीयके रूपमें स्वीकार करें। [शय्या—] देवि! यह अमूल्य रत्नोंसे बनी हुई सुन्दर शय्या वस्त्र और आभूषणोंसे सजायी गयी है, पुष्प और चन्दनसे चर्चित है। इसे आप स्वीकार करें। [अपूर्व द्रव्य—] देवि! यही नहीं, किंतु पृथ्वीपर जितने भी अपूर्व द्रव्य शरीरको सजानेके लिये परम उपयोगी हैं तथा देवराज इन्द्रके भी योग्य हैं, वे दुर्लभ वस्तुएँ आपकी सेवामें उपस्थित हैं। इन्हें स्वीकार करें*।'

मुने! देवराज इन्द्रने इस सूत्ररूप मन्त्रको


* प्रशस्यानि प्रकृष्टानि दुर्लभानि वराणि च। अमूल्यरत्नसारं च निर्मितं विश्वकर्मणा ॥
आसनं च विचित्रं च महालक्ष्मि प्रगृह्यताम् ॥
शुद्धं गङ्गोदकमिदं सर्ववन्दितमीप्सितम्। पापेन्धनवह्निरूपं च गृह्यतां कमलालये ॥
पुष्पचन्दनदूर्वादिसंयुतं जाह्नवीजलम्। शङ्खगर्भस्थितं शुद्धं गृह्यतां पद्मवासिनि ॥
सुगन्धिपुष्पतैलं च सुगन्धामलकीफलम्। देहसौन्दर्यबीजं च गृह्यतां श्रीहरेः प्रिये ॥
वृक्षनिर्यासस्वरूपं च गन्धद्रव्यादिसंयुतम्। श्रीकृष्णकान्ते धूपं च पवित्रं प्रतिगृह्यताम् ॥
मलयाचलसम्भूतं वृक्षसारं मनोहरम्। सुगन्धयुक्तं सुखदं चन्दनं देवि गृह्यताम् ॥
जगच्चक्षुःस्वरूपं च ध्वान्तप्रध्वंसकारणम्। प्रदीपं शुद्धरूपं च गृह्यतां परमेश्वरि ॥
नानोपहाररूपं च नानारससमन्वितम्। नानास्वादुकरं चैव नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥
अन्नं ब्रह्मस्वरूपं च प्राणरक्षणकारणम्। तुष्टिदं पुष्टिदं चैव देव्यन्नं प्रतिगृह्यताम् ॥
शाल्यक्षतसुपक्वं च शर्करागव्यसंयुक्तम्। स्वादुयुक्तं महालक्ष्मि परमान्नं प्रगृह्यताम् ॥
शर्करागव्यपक्वं च सुस्वादु सुमनोहरम्। मया निवेदितं लक्ष्मि स्वस्तिकं प्रतिगृह्यताम् ॥
नानाविधानि रम्याणि पक्वानि च फलानि च। स्वादुयुक्तानि कमले गृह्यतां फलदानि च ॥
सुरभिस्तनसम्भूतं सुस्वादु सुमनोहरम्। मर्त्यामृतं सुगव्यं च गृह्यतामच्युतप्रिये ॥
सुस्वादुरससंयुक्तमिक्षुवृक्षसमुद्भवम् । अग्निपक्वमतिस्वादु गुडं च प्रतिगृह्यताम् ॥
यवगोधूमशस्यानां चूर्णीणुसमुद्भवम्। सुपक्वं गुडगव्याक्तं मिष्टान्नं देवि गृह्यताम् ॥
शस्यचूर्णोद्भवं पक्वं स्वस्तिकादिसमन्वितम्। मया निवेदितं देवि पिष्टकं प्रतिगृह्यताम् ॥
पार्थिवो वृक्षभेदश्च विविधद्रव्यकारणम्। सुस्वादुरससंयुक्तं ईक्षुश्च प्रतिगृह्यताम् ॥

२४२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण पढ़कर भगवती महालक्ष्मीको उपर्युक्त द्रव्य समर्पण | रत्नमय भूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनके करनेके पश्चात् भक्तिपूर्वक विधिसहित उनके | मुखपर मुस्कान छायी थी। भक्तपर कृपा करनेके मूलमन्त्रका दस लाख जप किया, जिसके फलस्वरूप | लिये वे परम आतुर थीं। उनके गलेमें रत्नोंका हार उन्हें मन्त्रसिद्धि प्राप्त हो गयी। यह मूल-मन्त्र | शोभा पा रहा था। असंख्य चन्द्रमाके समान सभीके लिये कल्पवृक्षके समान है। ब्रह्माजीकी | उनकी प्रभा थी। ऐसी शान्तस्वरूपा जगदम्बा कृपासे यह उन्हें प्राप्त हुआ था। पूर्वमें श्रीबीज | भगवती महालक्ष्मीको देखकर देवराज इन्द्र उनकी (श्रीं), मायाबीज (ह्रीं), कामबीज (क्लीं) और | स्तुति करने लगे। उस समय इन्द्रके सर्वाङ्गमें वाणीबीज (ऐं) का प्रयोग करके 'कमलवासिनी' | पुलकावली छा गयी थी। उनके नेत्र आनन्दके इस शब्दके अन्तमें 'ङे' विभक्ति लगानेपर | आँसुओंसे पूर्ण थे और उनकी अञ्जलि बँधी थी। अन्तमें 'स्वाहा' शब्द जोड़ दिया जाय (श्रीं ह्रीं | ब्रह्माजीकी कृपासे सम्पूर्ण अभीष्ट प्रदान करनेवाला क्लीं ऐं कमलवासिन्यै स्वाहा) - यही इस मन्त्रराजका | वैदिक स्तोत्रराज उन्हें स्मरण था। इसीको पढ़कर स्वरूप है। कुबेरने इसी मन्त्रसे भगवती महालक्ष्मीकी | उन्होंने स्तुति आरम्भ की। आराधना करके परम ऐश्वर्य प्राप्त किया। | देवराज इन्द्र बोले- भगवती कमलवासिनीको इसी मन्त्रके प्रभावसे दक्षसावर्णि मनुको | नमस्कार है। देवी नारायणीको बार-बार नमस्कार राजाधिराजकी पदवी प्राप्त हुई है तथा मङ्गल सातों | है। संसारकी सारभूता कृष्णप्रिया भगवती पद्माको द्वीपोंके राजा हुए हैं। | अनेकशः नमस्कार है। कमलरत्नके समान नेत्रवाली नारद ! प्रियव्रत, उत्तानपाद तथा राजा केदार- | कमलमुखी भगवती महालक्ष्मीको नमस्कार है। इन सिद्धपुरुषोंको राजेन्द्र कहलानेका सौभाग्य | पद्मासना, पद्मिनी एवं वैष्णवी नामसे प्रसिद्ध भगवती इसी मन्त्रने दिया है। | महालक्ष्मीको बार-बार नमस्कार है। इस मन्त्रके सिद्ध हो जानेपर भगवती | सर्वसम्पत्स्वरूपिणी सर्वदात्री देवीको नमस्कार है। महालक्ष्मीने इन्द्रको दर्शन दिये। उस समय वे | सुखदायिनी, मोक्षदायिनी और सिद्धिदायिनी देवीको वरदायिनी सर्वोत्तम रत्नसे निर्मित विमानपर | बारंबार नमस्कार है। भगवान् श्रीहरिमें भक्ति उत्पन्न विराजमान थीं और अपनी प्रभासे सप्तद्वीपवती | करनेवाली तथा हर्ष प्रदान करनेमें परम कुशल पृथ्वीको आच्छादित कर रही थीं। उनकी | देवीको बार-बार नमस्कार है। भगवान् श्रीकृष्णके अङ्गकान्ति श्वेत चम्पाके पुष्पके समान थी। | वक्षःस्थलपर विराजमान एवं उनकी हृदयेश्वरी देवीको शीतवायुप्रदं चैव दाहे च सुखदं परम्। कमले गृह्यतां चेदं व्यजनं श्वेतचामरम्॥ ताम्बूलं च वरं रम्यं कर्पूरादिसुवासितम्। जिह्वाजाड्यच्छेदकरं ताम्बूलं देवि गृह्यताम्॥ सुवासितं शीतलं च पिपासानाशनकारणम्। जगज्जीवनरूपं च जीवनं देवि गृह्यताम्॥ देहसौन्दर्यबीजं च सदा शोभाविवर्धनम्। कार्पासजं च कृमिजं वसनं देवि गृह्यताम् ॥ रत्नस्वर्णविकारं च देहभूषाविवर्धनम्। शोभाधानं श्रीकरं च भूषणं प्रतिगृह्यताम्॥ नानाकुसुवनिर्माणं बहुशोभाप्रदं परम्। सुरभूपप्रियं शुद्धं माल्यं देवि प्रगृह्यताम्॥ पुण्यतीर्थोदकं चैव विशुद्धं शुद्धिदं सदा। गृह्यतां कृष्णकान्ते त्वं रम्याचमनीयकम्॥ रत्नसारादिनिर्माणं पुष्पचन्दनसंयुतम्। रत्नभूषणभूषाढ्यं सुतल्पं देवि गृह्यताम्॥ यद्यद् द्रव्यमपूर्वं च पृथिव्यामपि दुर्लभम् । देवभूपार्हभोग्यं च तद्द्रव्यं देवि गृह्यताम्॥ (प्रकृतिखण्ड ३९। १५-४०)

प्रकृतिखण्ड २४३ बारंबार प्रणाम है। रत्नपद्मे ! शोभने ! तुम श्रीकृष्णकी शोभास्वरूपा हो, सम्पूर्ण सम्पत्तिकी अधिष्ठात्री देवी एवं महादेवी हो; तुम्हें मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ। शस्यकी अधिष्ठात्री देवी एवं शस्यस्वरूपा हो, तुम्हें बारंबार नमस्कार है। बुद्धिस্বরূপा एवं बुद्धिप्रदा भगवतीके लिये अनेकशः प्रणाम है। देवि ! तुम वैकुण्ठमें महालक्ष्मी, क्षीरसमुद्रमें लक्ष्मी, राजाओंके भवनमें राजलक्ष्मी, इन्द्रके स्वर्गमें स्वर्गलक्ष्मी, गृहस्थोंके घरमें गृहलक्ष्मी, प्रत्येक घरमें गृहदेवता, गोमाता सुरभि और यज्ञकी पत्नी दक्षिणाके रूपमें विराजमान रहती हो। तुम देवताओंकी माता अदिति हो। कमलालयवासिनी कमला भी तुम्हीं हो। हव्य प्रदान करते समय 'स्वाहा' और कव्य प्रदान करनेके अवसरपर 'स्वधा' का जो उच्चारण होता है, वह तुम्हारा ही नाम है। सबको धारण करनेवाली विष्णुस्वरूपा पृथ्वी तुम्हीं हो। भगवान् नारायणकी उपासनामें सदा तत्पर रहनेवाली देवि ! तुम शुद्ध सत्त्वस्वरूपा हो। तुममें क्रोध और हिंसाके लिये किञ्चिन्मात्र भी स्थान नहीं है। तुम्हें वरदा, शारदा, शुभा, परमार्थदा एवं हरिदास्यप्रदा कहते हैं। तुम्हारे बिना सारा जगत् भस्मीभूत एवं निःसार है। जीते-जी ही मृतक है, शवके तुल्य है। तुम सम्पूर्ण प्राणियोंकी श्रेष्ठ माता हो। सबके बान्धवरूपमें तुम्हारा ही पधारना हुआ है। तुम्हारे बिना भाई भी भाई-बन्धुओंके लिये बात करने योग्य भी नहीं रहता है। जो तुमसे हीन है, वह बन्धुजनोंसे हीन है तथा जो तुमसे युक्त है, वह बन्धुजनोंसे भी युक्त है। तुम्हारी ही कृपासे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त होते हैं। जिस प्रकार बचपनमें दुधमुँहे बच्चोंके लिये माता है, वैसे ही तुम अखिल जगत्की जननी होकर सबकी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण किया करती हो। स्तनपायी बालक माताके न रहनेपर भाग्यवश जी भी सकता है; परंतु तुम्हारे बिना कोई भी नहीं जी सकता। यह बिलकुल निश्चित है। अम्बिके! सदा प्रसन्न रहना तुम्हारा स्वाभाविक गुण है। अतः मुझपर प्रसन्न हो जाओ। सनातनी ! मेरा राज्य शत्रुओंके हाथमें चला गया है, तुम्हारी कृपासे वह मुझे पुनः प्राप्त हो जाय। हरिप्रीये ! मुझे जबतक तुम्हारा दर्शन नहीं मिला था, तभीतक मैं बन्धुहीन, भिक्षुक तथा सम्पूर्ण सम्पत्तियोंसे शून्य था। सुरेश्वरि ! अब तो मुझे राज्य दो, श्री दो, बल दो, कीर्ति दो, धन दो और यश भी प्रदान करो। हरिप्रीये ! मनोवाञ्छित वस्तुएँ दो, बुद्धि दो, भोग दो, ज्ञान दो, धर्म दो तथा सम्पूर्ण अभिलषित सौभाग्य दो। इसके सिवा मुझे प्रभाव, प्रताप, सम्पूर्ण अधिकार, युद्धमें विजय, पराक्रम तथा परम ऐश्वर्यकी प्राप्ति भी कराओ।* नारद! इस प्रकार कहकर सम्पूर्ण देवताओंके

  • इन्द्र उवाच ॐ नमो महालक्ष्म्यै ॥ ॐ नमः कमलवासिन्यै नारायण्यै नमो नमः। कृष्णप्रियायै सारायै पद्मायै च नमो नमः ॥ पद्मपत्रेक्षणायै च पद्मास्यायै नमो नमः। पद्मासनायै पद्मिन्यै वैष्णव्यै च नमो नमः ॥ सर्वसम्पत्स्वरूपायै सर्वदात्र्यै नमो नमः। सुखदायै मोक्षदायै सिद्धिदायै नमो नमः ॥ हरिभक्तिप्रदात्र्यै च हर्षदात्र्यै नमो नमः। कृष्णवक्षःस्थितायै च कृष्णेशायै नमो नमः ॥ कृष्णशोभास्वरूपायै रत्नपद्मे च शोभने। सम्पत्त्यधिष्ठातृदेव्यै महादेव्यै नमो नमः ॥ शस्याधिष्ठातृदेव्यै च शस्यायै च नमो नमः। नमो बुद्धिस্বরূপायै बुद्धिदायै नमो नमः ॥ वैकुण्ठे या महालक्ष्मीर्या लक्ष्मीः क्षीरसागरे। स्वर्गलक्ष्मीरिन्द्रगेहे राजलक्ष्मीर्नृपालये ॥ गृहलक्ष्मीश्च गृहिणां गेहे च गृहदेवता। सुरभिः सा गवां माता दक्षिणा यज्ञकामिनी ॥ अदितिर्देवमाता त्वं कमला कमलालये। स्वाहा त्वं च हविर्दाने कव्यदाने स्वधा स्मृता ॥

३५- दक्षिणासे यज्ञपुरुषका अपने-आपको स्वामी बनानेके लिये निवेदन

२४४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

साथ देवराज इन्द्रने मस्तक झुकाकर भगवती महालक्ष्मीको बार-बार प्रणाम किया। उस समय उनकी आँखोंमें प्रेमानन्दके आँसू भर आये थे। देवताओंके कल्याणार्थ ब्रह्मा, शंकर, शेषनाग, धर्म तथा केशव—इन सभी महानुभावोंने भगवती महालक्ष्मीसे प्रार्थना की। तब उस देवसभामें शोभा पानेवाली भगवती प्रसन्न हो गयीं। उन्होंने देवताओंको वर दिया और भगवान् श्रीकृष्णको मनोहर पुष्पमाला समर्पण की। सभी देवता अपने-अपने स्थानपर चले गये। स्वयं भगवती महालक्ष्मी क्षीरशायी भगवान् श्रीहरिके वक्षःस्थलपर प्रसन्नतापूर्वक पधार गयीं। मुने! ब्रह्मा और शंकर भी देवताओंको शुभ आशीर्वाद देकर प्रसन्नता प्रकट करते हुए अपने-अपने धामको चले गये। यह स्तोत्र महान् पवित्र है। इसका त्रिकाल पाठ करनेवाला बड़भागी पुरुष कुबेरके समान राजाधिराज हो सकता है। पाँच लाख जप करनेपर मनुष्योंके लिये यह स्तोत्र सिद्ध होता है। यदि इस सिद्ध स्तोत्रका कोई निरन्तर एक महीनेतक पाठ करे तो वह महान् सुखी एवं राजेन्द्र हो जायगा—इसमें कोई संशय नहीं है।

(अध्याय ३८-३९)


भगवती स्वाहा तथा भगवती स्वधाका उपाख्यान, उनके ध्यान, पूजा-विधान तथा स्तोत्रोंका वर्णन

नारदजीने कहा—प्रभो! मुनिवर नारायण! आप रूप, गुण, यश, तेज एवं कान्तिमें साक्षात् भगवान् नारायणके ही समान हैं। मुने! आप ही ज्ञानियों, सिद्धों, योगियों, तपस्वियों और वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। आपकी कृपासे मुझे महालक्ष्मीका महान् अद्भुत उपाख्यान ज्ञात हो गया। अब आप उचित समझें तो भगवती स्वाहा, भगवती स्वधा और भगवती दक्षिणाके चरित्र तथा उनका महत्त्व सुनायें।

सूतजी कहते हैं—मुनियो! नारदजीकी बात सुनकर मुनिवर नारायण हँस पड़े और उन्होंने पुराणोक्त प्राचीन उपाख्यान कहना आरम्भ किया।


त्वं हि विष्णुस्वरूपा च सर्वधारा वसुंधरा। शुद्धसत्त्वस्वरूपा त्वं नारायणपरायणा॥
क्रोधहिंसावर्जिता च वरदा च शुभानना। परमार्थप्रदा त्वं च हरिदास्यप्रदा परा॥
यया विना जगत्सर्वं भस्मीभूतमसारकम्। जीवन्मृतं च विश्वं च शवतुल्यं यया विना॥
सर्वेषां च परा त्वं हि सर्वबान्धवरूपिणी। यया विना न सम्भाव्यो बान्धवैर्बान्धवः सदा॥
त्वया हीनो बन्धुहीनो त्वया युक्तः सबान्धवः। धर्मार्थकाममोक्षाणां त्वं च कारणरूपिणी॥
यथा माता स्तनन्धानां शिशूनां शैशवे सदा। तथा त्वं सर्वदा माता सर्वेषां सर्वरूपतः॥
मातृहीनः स्तनान्धश्च स चेज्जीवति दैवतः। त्वया हीनो जनः कोऽपि न जीवत्येव निश्चितम्॥
सुप्रसन्नस्वरूपा त्वं मां प्रसन्ना भवाम्बिके। वैरिग्रस्तं च विषयं देहि मह्यं सनातनि॥
वयं यावत् त्वया हीना बन्धुहीनाश्च भिक्षुकाः। सर्वसम्पद्विहीनाश्च तावदेव हरिप्रिये॥
राज्यं देहि श्रियं देहि बलं देहि सुरेश्वरि। कीर्तिं देहि धनं देहि यशो मह्यं च देहि वै॥
कामं देहि मतिं देहि भोगान् देहि हरिप्रिये। ज्ञानं देहि च धर्मं च सर्वसौभाग्यमीप्सितम्॥
प्रभावं च प्रतापं च सर्वाधिकारमेव च। जयं पराक्रमं युद्धे परमैश्वर्यमेव च॥

(प्रकृतिखण्ड ४९। ५१-७१)

३२- देवी षष्ठीके ध्यान, पूजन, स्तोत्र तथा विशद महिमाका वर्णन

प्रकृतिखण्ड २४५

भगवान् नारायण कहते हैं—मुने! सृष्टिके प्रारम्भिक समयकी बात है—देवता भोजनकी व्यवस्थाके लिये ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीकी मनोहारिणी सभामें गये। मुने! वहाँ जाकर उन्होंने अपने आहारके लिये ब्रह्माजीसे प्रार्थना की। उनकी बात सुनकर ब्रह्माजीने उन्हें भोजन देनेकी प्रतिज्ञा करके श्रीहरिके चरणोंकी आराधना की। तब भगवान् श्रीहरि अपनी कलासे यज्ञरूपमें प्रकट हुए। उस यज्ञमें जिस-जिस हविष्यकी आहुति दी गयी, वह सब ब्रह्माजीने देवताओंको दिया; किंतु ब्राह्मण और क्षत्रिय आदि वर्ण भक्तिपूर्वक जो हवन करते थे, वह देवताओंको उपलब्ध नहीं होता था। इसीसे सब उदास होकर ब्रह्मसभामें गये थे और वहाँ जाकर उन्होंने आहार न मिलनेकी बात बतलायी। ब्रह्माजीने देवताओंकी प्रार्थना सुनकर ध्यानके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी शरण ली। फिर भगवान्‌की आज्ञासे उन्होंने ध्यानके द्वारा ही मूलप्रकृतिकी पूजा की। तब सर्वशक्तिस्वरूपिणी भगवती प्रकृति अपनी कलाद्वारा अग्निकी दाहिकाशक्ति ‘स्वाहा’ के रूपमें प्रकट हुई। उन परम सुन्दरी देवीके विग्रहकी सुन्दर श्याम कान्ति थी। वे मनोहारिणी देवी मुस्करा रही थीं। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्यग्रचित्तवाली उन भगवती स्वाहाने ब्रह्माजीके सम्मुख उपस्थित होकर उनसे कहा—‘पद्मयोने! तुम वर माँगो!’ तदनन्तर ब्रह्माजीने भगवतीका वचन सुनकर सम्भ्रमपूर्वक कहा।

ब्रह्माजी बोले—तुम अग्निकी दाहिकाशक्ति तथा उनकी परम सुन्दरी पत्नी होनेकी कृपा करो। तुम्हारे बिना अग्नि आहुतियोंको भस्म करनेमें असमर्थ हैं। जो मानव मन्त्रके अन्तमें तुम्हारे नामका उच्चारण करके देवताओंके लिये हवनीय पदार्थ अर्पण करें, उनका वह हविष्य देवताओंको सहज ही उपलब्ध हो जाय। अम्बिके! तुम अग्निदेवकी सर्वसम्पत्स्वरूपा एवं श्रीरूपिणी गृहस्वामिनी बनो। देवता और मनुष्य सदा तुम्हारी पूजा करेंगे।

ब्रह्माजीकी बात सुनकर भगवती स्वाहा देवी उदास हो गयीं। उन्होंने स्वयं ब्रह्माजीसे अपना अभिप्राय इस प्रकार व्यक्त किया।

स्वाहा बोलीं—ब्रह्मन्! मैं दीर्घकालतक तपस्या करके भगवान् श्रीकृष्णकी सेवाका सौभाग्य प्राप्त करूँगी। उन परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णके अतिरिक्त जो कुछ भी है सब स्वप्नके समान भ्रममात्र है। तुम जो जगत्‌की सृष्टि करते हो, भगवान् शंकरने जो मृत्युपर विजय प्राप्त की है, शेषनाग जो अखिल विश्वको धारण करते हैं, धर्म जो समस्त देहधारियोंके साक्षी हैं, गणेशजी जो सम्पूर्ण देव-समाजमें सर्वप्रथम पूजा प्राप्त करते हैं तथा जगदम्बा प्रकृतिदेवी जो सर्वपूज्या हुई हैं—यह सब उन भगवान् श्रीकृष्णके कृपा-प्रसादका ही फल है। भगवान् श्रीकृष्णके सेवक होनेसे ही ऋषियों और मुनियोंका सर्वत्र सम्मान है। अतः पद्मज! मैं भी एकमात्र उन्हीं परम प्रभु श्रीकृष्णके चरण-कमलोंका सानुराग चिन्तन करती हूँ।

ब्रह्माजीसे यों कहकर वे कमलमुखी देवी स्वाहा निरामय भगवान् श्रीकृष्णके उद्देश्यसे तपस्या करनेके लिये चल दीं। फिर एक पैरसे खड़ी होकर उन्होंने श्रीकृष्णका ध्यान करते हुए बहुत वर्षोंतक तप किया। तब प्रकृतिसे परे निर्गुण परब्रह्म श्रीकृष्णके दर्शन उन्हें प्राप्त हुए। भगवान्‌के परम कमनीय सौन्दर्यको देखकर सुरूपिणी देवी स्वाहा मूर्च्छित-सी हो गयीं; क्योंकि वे उन कामेश्वर प्रभुको कान्तभावसे चाहने लगी थीं।

२४६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

चिरकालतक तपस्या करनेके कारण क्षीण शरीरवाली देवी स्वाहाके अभिप्रायको वे सर्वज्ञ प्रभु समझ गये। उन्होंने उन्हें उठाकर अपने अङ्कमें बैठा लिया और कहा।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— कान्ते! तुम वाराहकल्पमें अपने अंशसे मेरी प्रिया बनोगी। तुम्हारा नाम 'नाग्नजिती' होगा। राजा नग्नजित् तुम्हारे पिता होंगे। इस समय तुम दाहिकाशक्तिके रूपमें अग्निकी प्रिय पत्नी बनो। मेरे प्रसादसे तुम मन्त्रोंकी अङ्गभूता एवं परम पवित्र होओगी। अग्निदेव तुम्हें अपनी गृहस्वामिनी बनाकर भक्ति-भावके साथ तुम्हारी पूजा करेंगे। तुम परम रमणीया देवीके साथ वे सानन्द विहार करेंगे।

नारद! देवी स्वाहासे इस प्रकार सम्भाषण करके उन्हें आश्वासन दे भगवान् श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये। फिर ब्रह्माजीकी आज्ञाके अनुसार डरते हुए अग्निदेव वहाँ आये और सामवेदमें कही हुई विधिसे जगज्जननी भगवतीका ध्यान करके उन्होंने देवीकी भलीभाँति पूजा और स्तुति की। तत्पश्चात् अग्निदेवने मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्वाहादेवीका पाणिग्रहण किया। देवताओंके वर्षसे सौ वर्षतक वे उनके साथ आनन्द करते रहे। परम सुखप्रद निर्जन देशमें रहते समय देवी स्वाहा अग्निदेवके तेजसे गर्भवती हो गयीं। बारह दिव्य वर्षोंतक वे उस गर्भको धारण किये रहीं, तत्पश्चात् दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि और आहवनीयाग्निके क्रमसे उनके मनको मुग्ध करनेवाले परम सुन्दर तीन पुत्र उनसे उत्पन्न हुए। तब ऋषि, मुनि, ब्राह्मण तथा क्षत्रिय आदि सभी श्रेष्ठ वर्ण 'स्वाहान्त' मन्त्रोंका उच्चारण करके अग्निमें हवन करने लगे और देवताओंको वह आहाररूपसे प्राप्त होने लगा। जो पुरुष स्वाहायुक्त प्रशस्त मन्त्रका उच्चारण करता है, उसे केवल मन्त्र पढ़नेमात्रसे ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है। जिस प्रकार विषहीन सर्प, वेदहीन ब्राह्मण, पतिसेवाविहीन स्त्री, विद्याहीन पुरुष तथा फल एवं शाखाहीन वृक्ष निन्दाके पात्र हैं, वैसे ही स्वाहाहीन मन्त्र भी निन्द्य है। ऐसे मन्त्रसे किया हुआ हवन शीघ्र फल नहीं देता। फिर तो सभी ब्राह्मण संतुष्ट हो गये। देवताओंको आहुतियाँ मिलने लगीं। स्वाहान्त मन्त्रसे ही उनके सारे कर्म सफल होने लगे। मुने! भगवती स्वाहासे सम्बन्ध रखनेवाला इस प्रकार यह सारा श्रेष्ठ उपाख्यान कह सुनाया। यह सारभूत प्रसङ्ग सुख और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। अब और क्या सुनना चाहते हो ?

नारदजीने कहा— प्रभो! मुनीश्वर! अब मुझे भगवती स्वाहाकी पूजाका वह विधान, ध्यान एवं स्तोत्र बतानेकी कृपा कीजिये, जिससे अग्निदेवने उनकी पूजा करके स्तुति की थी।

भगवान् नारायण कहते हैं— ब्रह्मन्! मुनिवर! भगवती स्वाहाके ध्यान, स्तोत्र और पूजाका जो विधान सामवेदमें कहा गया है, वही मैं तुम्हें बताता हूँ, सावधान होकर सुनो। पुरुषको चाहिये कि फल प्राप्त करनेके लिये सम्पूर्ण यज्ञोंके आरम्भमें शालग्रामकी प्रतिमामें अथवा कलशपर यत्नपूर्वक भगवती स्वाहाका पूजन करके यज्ञ आरम्भ करे। ध्यान इस प्रकार करना चाहिये—'देवी स्वाहा मन्त्रोंकी अङ्गभूता होनेसे परम पवित्र हैं। ये मन्त्रसिद्धिरूपिणी हैं। सिद्ध एवं सिद्धिदायिनी हैं तथा मनुष्योंको उनके सम्पूर्ण कर्मोंका फल

तथा सुव्रतको उसे प्रदान करना

प्रकृतिखण्ड २४७

देनेवाली हैं। मैं उनका भजन करता हूँ।' मुने ! यों ध्यान करके मूलमन्त्रसे पाद्य आदि अर्पण करनेके पश्चात् स्तोत्रका पाठ करनेसे मनुष्यको सम्पूर्ण सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं। मूलमन्त्र यह है—'ॐ ह्रीं श्रीं वह्निजायायै देव्यै स्वाहा'। इस मन्त्रसे भक्तिपूर्वक जो भगवती स्वाहाकी पूजा करता है, उसके सारे मनोरथ अवश्य पूर्ण हो जाते हैं।

अग्निदेव बोले—स्वाहा, आद्या, प्रकृत्यंशा, मन्त्रतन्त्राङ्गरूपिणी, मन्त्रफलदात्री, जगद्धात्री, सती, सिद्धस्वरूपा, सिद्धा, सदा नृणां सिद्धिदा, हुताशदाहिकाशक्ति, हुताशप्राणाधिकरूपिणी, संसारसाररूपा, घोरसंसारतारिणी, देवजीवनरूपा और देवपोषणकारिणी—ये सोलह नाम भगवती स्वाहाके हैं। जो भक्तिपूर्वक इनका पाठ करता है, उसे इस लोक और परलोकमें भी सम्पूर्ण सिद्धियोंकी प्राप्ति होती है*। उसका कोई भी कर्म अङ्गहीन नहीं होता। उसे सब कर्मोंमें शुभ फलकी प्राप्ति होती है। इन सोलह नामोंके प्रभावसे पुत्रहीनको पुत्र तथा भार्याहीनको प्रिय भार्या प्राप्त हो जाती है।

भगवान् नारायण कहते हैं—मुने ! अब भगवती स्वधाका उत्तम उपाख्यान कहता हूँ, सुनो। यह पितरोंके लिये तृप्तिप्रद एवं श्राद्धोंके फलको बढ़ानेवाला है। जगत्स्रष्टा ब्रह्माने सृष्टिके आरम्भमें सात पितरोंका सृजन किया; उनमें चार तो मूर्तिमान् थे और तीन तेजःस्वरूप थे। उन सातों सिद्धस्वरूप मनोहर पितरोंको देखकर उनके भोजनके लिये श्राद्ध-तर्पणपूर्वक दिया हुआ पदार्थ निश्चित किया। तर्पणान्त स्नान, श्राद्धपर्यन्त देवपूजन तथा त्रिकालसंध्यान्त आह्निक कर्म—यह ब्राह्मणोंका परम कर्तव्य है। यह बात श्रुतिमें प्रसिद्ध है। जो ब्राह्मण नित्य त्रिकालसंध्या, श्राद्ध, तर्पण, बलिवैश्वदेव और वेदध्वनि नहीं करता, उसे विषहीन सर्पके समान शक्तिहीन समझना चाहिये। नारद ! श्रीहरिकी सेवासे वञ्चित तथा भगवान्‌को भोग लगाये बिना खानेवाला मनुष्य जीवनपर्यन्त अपवित्र रहता है। उसे कोई भी शुभकार्य करनेका अधिकार नहीं है। इस प्रकार ब्रह्माजी तो पितरोंके आहारार्थ श्राद्ध आदिका विधान करके चले गये; परंतु ब्राह्मण आदि उनके लिये जो कुछ देते थे, उसे पितर पाते नहीं थे। अतः वे सभी क्षुधा शान्त न होनेके कारण दुःखी होकर ब्रह्माजीकी सभामें गये। उन्होंने वहाँ जाकर ब्रह्माजीको सारी बातें बतायीं। तब उन महाभाग विधाताने एक परम सुन्दर मानसी कन्या प्रकट की।

सैकड़ों चन्द्रमाकी प्रभाके समान मुखवाली वह देवी रूप और यौवनसे सम्पन्न थी। उस साध्वी देवीमें विद्या, गुण, बुद्धि और रूप सम्यक् प्रकारसे विद्यमान थे। श्वेत चम्पाके समान उसका उज्ज्वल वर्ण था। वह रत्नमय भूषणोंसे विभूषित थी। मूलप्रकृति भगवती जगदम्बाकी अंशभूता वह शुद्धस्वरूपा देवी मन्द-मन्द मुस्करा रही थी। वर देनेवाली एवं कल्याणस्वरूपिणी उस सुन्दरीका नाम 'स्वधा' रखा गया। भगवती लक्ष्मीके सभी शुभ लक्षण उसमें विराजमान थे। उसके दाँत बड़े सुन्दर थे। वह अपने चरणकमलोंको शतदल


* वह्निरुवाच—
स्वाहाद्या प्रकृतेरंशा मन्त्रतन्त्राङ्गरूपिणी । मन्त्राणां फलदात्री च धात्री च जगतां सती ॥
सिद्धस्वरूपा सिद्धा च सिद्धिदा सर्वदा नृणाम् । हुताशदाहिकाशक्तिस्तत्प्राणाधिकरूपिणी ॥
संसारसाररूपा च घोरसंसारतारिणी । देवजीवनरूपा च देवपोषणकारिणी ॥
षोडशैतानि नामानि यः पठेद्भक्तिसंयुतः । सर्वसिद्धिर्भवेत्तस्य इहलोके परत्र च ॥
(प्रकृतिखण्ड ४०। ५१—५४)

२४८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कमलपर रखे हुए थी। उसके मुख और नेत्र विकसित कमलके सदृश सुन्दर थे। उसे पितरोंकी पत्नी बनाया गया। ब्रह्माजीने पितरोंको संतुष्ट करनेके लिये यह तुष्टिस्वरूपिणी पत्नी उन्हें सौंप दी। साथ ही अन्तमें 'स्वधा' लगाकर मन्त्रोंका उच्चारण करके पितरोंके उद्देश्यसे पदार्थ अर्पण करना चाहिये—यह गोपनीय बात भी ब्राह्मणोंको बतला दी। तबसे ब्राह्मण उसी क्रमसे पितरोंको कव्य प्रदान करने लगे। यों देवताओंके लिये वस्तुदानमें 'स्वाहा' और पितरोंके लिये 'स्वधा' शब्दका उच्चारण श्रेष्ठ माना जाने लगा। सभी कर्मों (यज्ञों)-में दक्षिणा उत्तम मानी गयी है। दक्षिणाहीन यज्ञ नष्टप्राय कहा गया है। उस समय देवता, पितर, ब्राह्मण, मुनि और मानव—इन सबने बड़े आदरके साथ उन शान्तस्वरूपिणी भगवती स्वधाकी पूजा एवं स्तुति की। देवीके वर-प्रसादसे वे सब-के-सब परम संतुष्ट हो गये। उनकी सारी मनःकामनाएँ पूर्ण हो गयीं।

मुने! इस प्रकार भगवती स्वधाके सम्पूर्ण उपाख्यानका वर्णन मैंने तुम्हारे सामने कर दिया। यह सबके लिये तुष्टिकारक है। पुनः क्या सुनना चाहते हो?

नारदजीने कहा— वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महामुने! अब मैं भगवती स्वधाकी पूजाका विधान, ध्यान और स्तोत्र सुनना चाहता हूँ। यत्नपूर्वक बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् नारायण कहते हैं— ब्रह्मन्! देवी स्वधाका ध्यान-स्तवन वेदोंमें वर्णित है, अतएव सबके लिये मान्य है। शरत्कालमें आश्विन मासके कृष्णपक्षकी त्रयोदशी तिथिको मघा नक्षत्रमें अथवा श्राद्धके दिन यत्नपूर्वक भगवती स्वधाकी पूजा करके तत्पश्चात् श्राद्ध करना चाहिये। जो अभिमानी ब्राह्मण स्वधा देवीकी पूजा न करके श्राद्ध करता है, वह श्राद्ध और तर्पणके फलका भागी नहीं होता—यह सर्वथा सत्य है। 'भगवती स्वधा ब्रह्माजीकी मानसी कन्या हैं, ये सदा तरुणावस्थासे सम्पन्न रहती हैं। पितरों और देवताओंके लिये सदा पूजनीया हैं। ये ही श्राद्धोंका फल देनेवाली हैं। इनकी मैं उपासना करता हूँ।' इस प्रकार ध्यान करके शालग्राम-शिला अथवा मङ्गलमय कलशपर इनका आवाहन करना चाहिये। तदनन्तर मूलमन्त्रसे पाद्य आदि उपचारोंद्वारा इनका पूजन करना चाहिये। महामुने! 'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा' इस मन्त्रका उच्चारण करके ब्राह्मण इनकी पूजा, स्तुति और इन्हें प्रणाम करें। ब्रह्मपुत्र विज्ञानी नारद! अब स्तोत्र सुनो। यह स्तोत्र मानवोंके लिये सम्पूर्ण अभिलाषा प्रदान करनेवाला है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इसका पाठ किया था।

ब्रह्माजी बोले— 'स्वधा' शब्दके उच्चारण-मात्रसे मानव तीर्थस्नायी समझा जाता है। वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर वाजपेय-यज्ञके फलका अधिकारी हो जाता है। 'स्वधा, स्वधा, स्वधा' इस प्रकार यदि तीन बार स्मरण किया जाय तो श्राद्ध, बलि और तर्पणके फल पुरुषको प्राप्त हो जाते हैं। श्राद्धके अवसरपर जो पुरुष सावधान होकर स्वधा देवीके स्तोत्रका श्रवण करता है, वह सौ श्राद्धोंका फल पा लेता है—इसमें संशय नहीं

३३- भगवती मङ्गलचण्डी और मनसादेवीका उपाख्यान

प्रकृतिखण्ड

२४९

है। जो मानव 'स्वधा, स्वधा, स्वधा' इस पवित्र नामका त्रिकाल संध्याके समय पाठ करता है, उसे विनीत, पतिव्रता एवं प्रिय पत्नी प्राप्त होती है तथा सद्गुणसम्पन्न पुत्रका लाभ होता है। देवि! तुम पितरोंके लिये प्राणतुल्या और ब्राह्मणोंके लिये जीवनस्वरूपिणी हो। तुम्हें श्राद्धकी अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। तुम्हारी ही कृपासे श्राद्ध और तर्पण आदिके फल मिलते हैं। तुम पितरोंकी तुष्टि, द्विजातियोंकी प्रीति तथा गृहस्थोंकी अभिवृद्धिके लिये मुझ ब्रह्माके मनसे निकलकर बाहर जाओ। सुव्रते! तुम नित्य हो, तुम्हारा विग्रह नित्य और गुणमय है। तुम सृष्टिके समय प्रकट होती हो और प्रलयकालमें तुम्हारा तिरोभाव हो जाता है। तुम ॐ, नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा एवं दक्षिणा हो। चारों वेदोंद्वारा तुम्हारे इन छः स्वरूपोंका निरूपण किया गया है, कर्मकाण्डी लोगोंमें इन छहोंकी बड़ी मान्यता है*।

इस प्रकार देवी स्वधाकी महिमा गाकर ब्रह्माजी अपनी सभामें विराजमान हो गये। इतनेमें सहसा भगवती स्वधा उनके सामने प्रकट हो गयीं। तब पितामहने उन कमलनयनी देवीको पितरोंके प्रति समर्पण कर दिया। उन देवीकी प्राप्तिसे पितर अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे आनन्दसे विह्वल हो गये। यही भगवती स्वधाका पुनीत स्तोत्र है। जो पुरुष समाहित-चित्तसे इस स्तोत्रका श्रवण करता है, उसने मानो सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर लिया। उसको वेदपाठका फल मिलता है।

(अध्याय ४०-४१)


भगवती दक्षिणाके प्राकट्यका प्रसङ्ग, उनका ध्यान, पूजा-विधान तथा स्तोत्र-वर्णन एवं चरित्र-श्रवणकी फल-श्रुति

**भगवान् नारायण कहते हैं—**मुने! भगवती स्वाहा और स्वधाका परम मधुर उत्तम उपाख्यान सुना चुका। अब मैं भगवती दक्षिणाके आख्यानका वर्णन करूँगा। तुम सावधान होकर सुनो। प्राचीन कालकी बात है, गोलोकमें भगवान् श्रीकृष्णकी प्रेयसी एक गोपी थी। उसका नाम सुशीला था। उसे श्रीराधाकी प्रधान सखी होनेका सौभाग्य प्राप्त था। वह धन्य, मान्य एवं मनोहर अङ्गवाली गोपी परम सुन्दरी थी। सौभाग्यमें वह लक्ष्मीके समान थी। उसमें पातिव्रत्यके सभी शुभ लक्षण संनिहित थे। वह साध्वी गोपी विद्या, गुण और उत्तम रूपसे सदा सुशोभित थी। कलावती, कोमलाङ्गी, कान्ता, कमललोचना, सुश्रोणी, सुस्तनी, श्यामा और न्यग्रोधपरिमण्डला—ये सभी विशेषण उसमें उपयुक्त थे। उसका प्रसन्न मुख सदा मुस्कानसे भरा रहता था। रत्नमय अलंकार उसकी शोभा बढ़ाते थे। उसके शरीरकी कान्ति श्वेत चम्पाके समान गौर थी। बिम्बाफलके समान लाल-लाल ओष्ठ तथा मृगके सदृश मनोहर नेत्र थे। हंसके समान मन्दगतिसे चलनेवाली उस कामिनी


* स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः। प्रियां विनीतां स लभेत् साध्वीं पुत्रं गुणान्वितम्॥
पितॄणां प्राणतुल्या त्वं द्विजजीवनरूपिणी। श्राद्धाधिष्ठातृदेवी च श्राद्धादीनां फलप्रदा॥
...........................................................................
नित्या त्वं नित्यरूपासि गुणरूपास सुव्रते। आविर्भावस्तिरोभावः सृष्टौ च प्रलये तव॥
ॐ स्वस्तिश्च नमः स्वाहा स्वधा त्वं दक्षिणा तथा। निरूपिताश्चतुर्वेदैः षट् प्रशस्ताश्च कर्मिणाम्॥
(प्रकृतिखण्ड ४१। ३०-३१, ३३-३४)

२५० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सुशीलाको काम-शास्त्रका सम्यक् ज्ञान था। वह सम्पूर्ण भावसे भगवान् श्रीकृष्णमें अनुरक्त थी। उनके भावको जानती और उनका प्रिय किया करती थी।

एक समय परमेश्वरी श्रीराधाने सुशीलाको कह दिया—‘आजसे तुम गोलोकमें नहीं आ सकोगी।’

तदनन्तर श्रीकृष्ण वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तब देवदेवेश्वरी भगवती श्रीराधा रासमण्डलके मध्य रासेश्वर भगवान् श्रीकृष्णको जोर-जोरसे पुकारने लगीं; परंतु भगवान्ने उन्हें दर्शन नहीं दिये। तब तो श्रीराधा अत्यन्त विरहकातर हो उठीं। उन साध्वी देवीको विरहका एक-एक क्षण करोड़ों युगोंके समान प्रतीत होने लगा। उन्होंने करुण प्रार्थना की—‘श्रीकृष्ण! श्यामसुन्दर! आप मेरे प्राणनाथ हैं। मैं आपके प्रति प्राणोंसे भी बढ़कर प्रेम करती हूँ। आप शीघ्र यहाँ पधारनेकी कृपा कीजिये। भगवन्! आप मेरे प्राणोंके अधिष्ठाता देव हैं। आपके बिना अब ये प्राण नहीं रह सकते। स्त्री पतिके सौभाग्यपर गर्व करती है। पतिके साथ प्रतिदिन उसका सुख बढ़ता रहता है। अतएव साध्वी स्त्रीको धर्मपूर्वक पतिकी सेवामें ही सदा तत्पर रहना चाहिये। पति ही कुलीन स्त्रियोंके लिये बन्धु, अधिदेवता, नित्य-आश्रय, परम सम्पत्तिस्वरूप तथा मूर्तिमान् सुख है। पति ही धर्म, सुख, निरन्तर प्रीति, सदा शान्ति, सम्मान एवं मान देनेवाला है। वही उसके लिये माननीय है, वही उसके मान (प्रणयकोप)-को शान्त करनेवाला है। स्वामी ही स्त्रीके लिये सारसे भी सारतम वस्तु है। वही बन्धुओंमें बन्धुभावको बढ़ानेवाला है। सम्पूर्ण बान्धवजनोंमें पतिके समान दूसरा कोई बन्धु नहीं दिखायी देता। वह स्त्रीका भरण करनेसे ‘भर्ता’, पालन करनेसे ‘पति’, शरीरका मालिक होनेसे ‘स्वामी’ तथा कामनाकी पूर्ति करनेसे ‘कान्त’ कहलाता है।

सुखकी वृद्धि करनेसे ‘बन्धु’, प्रीति प्रदान करनेसे ‘प्रिय’, ऐश्वर्यका दाता होनेसे ‘ईश’, प्राणका स्वामी होनेसे ‘प्राणनाथ’ तथा रति-सुख प्रदान करनेसे ‘रमण’ कहलाता है। अतः स्त्रियोंके लिये पतिसे बढ़कर दूसरा कोई प्रिय नहीं है। पतिके शुक्रसे पुत्रकी उत्पत्ति होती है, इससे वह प्रिय माना जाता है। कुलाङ्गनाओंकी दृष्टिमें पति सदा सौ पुत्रोंसे भी बढ़कर प्रिय है। जो असत् कुलमें उत्पन्न है, वह स्त्री पतिके इस महत्त्वको समझनेमें असमर्थ है। सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान, अखिल यज्ञोंमें दक्षिणादान, पृथ्वीकी प्रदक्षिणा, अनेक प्रकारके तप, सभी व्रत, अमूल्य वस्तुदान, पवित्र उपासनाएँ तथा गुरु, देवता एवं ब्राह्मणोंकी सेवा—इन श्रेष्ठ कार्योंकी बड़ी प्रशंसा सुनी है; किंतु ये सब-के-सब स्वामीके चरण-सेवनकी सोलहवीं कलाकी भी तुलना नहीं कर सकते। गुरु, ब्राह्मण और देवता—इन सबकी अपेक्षा स्त्रीके लिये पति ही श्रेष्ठ गुरु है। जिस प्रकार पुरुषोंके लिये विद्या प्रदान करनेवाले गुरु आदरणीय माने जाते हैं, वैसे ही कुलीन स्त्रियोंके लिये पति ही गुरुतुल्य माननीय है।

‘हाय! मैं जिनके कृपा-प्रसादसे असंख्य गोपों, गोपियों, ब्रह्माण्डों तथा वहाँके निवासी प्राणियोंकी एवं रमा आदि देवियोंसे लेकर अखिल ब्रह्माण्ड गोलोकतककी अधीश्वरी हुई हूँ, उन्हीं प्राणवल्लभके तत्त्वको नहीं जान सकी; वास्तवमें स्त्रीस्वभावको लाँघ पाना बड़ा कठिन है।’

इस प्रकार कहकर श्रीराधा भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करने लगीं। फिर तो उन्होंने प्राणनाथको अपने समीप ही पाया और उनके साथ सानन्द विहार किया।

मुने! गोलोकसे भ्रष्ट हुई वह सुशीला नामवाली गोपी ही आगे चलकर दक्षिणा नामसे प्रसिद्ध हुई। उसने दीर्घकालतक तपस्या करके भगवती लक्ष्मीके शरीरमें प्रवेश किया। तदनन्तर अत्यन्त कठिन यज्ञ

प्रकृतिखण्ड

२५१

करनेपर भी देवता आदिको जब उसका कोई फल नहीं प्राप्त हुआ, तब वे सभी उदास होकर ब्रह्माजीके पास गये। ब्रह्माजीने उनकी प्रार्थना सुनकर जगत्प्रभु भगवान् श्रीहरिका ध्यान किया। बहुत समयतक भक्तिपूर्वक ध्यान करनेके पश्चात् उन्हें भगवान्‌का आदेश प्राप्त हुआ। स्वयं भगवान् नारायणने महालक्ष्मीके दिव्य विग्रहसे मर्त्यलक्ष्मीको प्रकट किया और 'दक्षिणा' नाम रखकर उसे ब्रह्माजीको सौंप दिया। ब्रह्माजीने यज्ञसम्बन्धी समस्त कार्योंकी सम्पन्नताके लिये देवी दक्षिणाको यज्ञपुरुषके हाथमें दे दिया। उस समय यज्ञपुरुषका मन आनन्दसे भर गया। उन्होंने भगवती दक्षिणाकी विधिवत् पूजा और स्तुति की। उन देवीका वर्ण तपाये हुए सुवर्णके समान था। प्रभा ऐसी थी, मानो करोड़ों चन्द्रमा हों। वे अत्यन्त कमनीया, सुन्दरी तथा परम मनोहारिणी थीं। कमलके समान मुखवाली वे कोमलाङ्गी देवी कमल-जैसे विशाल नेत्रोंसे शोभा पा रही थीं। भगवती लक्ष्मीसे प्रकट उन आदरणीया देवीके लिये कमल ही आसन भी था। अग्निशुद्ध वस्त्र उनके शरीरकी शोभा बढ़ा रहे थे। उन साध्वीका ओठ सुपक्व बिम्बाफलके सदृश था। उनकी दन्तावली बड़ी सुन्दर थी। उन्होंने अपने केशकलापमें मालतीके पुष्पोंकी माला धारण कर रखी थी। उनके प्रसन्नमुखपर मुस्कान छायी थी। वे रत्ननिर्मित भूषणोंसे विभूषित थीं। उनका सुन्दर वेष था। उन्हें देखकर मुनियोंका मन भी मुग्ध हो जाता था। कस्तूरीमिश्रित चन्दनसे बिन्दीके रूपमें अर्द्धचन्द्राकार तिलक उनके ललाटपर शोभा पा रहा था। केशोंके नीचेका भाग (सीमन्त) सिन्दूरकी बेंदीसे अत्यन्त उद्दीप्त जान पड़ता था। सुन्दर नितम्ब, बृहत् श्रोणी और विशाल वक्षःस्थलसे वे शोभा पा रही थीं। फिर ब्रह्माजीके कथनानुसार यज्ञपुरुषने उन देवीको अपनी सहधर्मिणी बना लिया। कुछ समय बाद देवी दक्षिणा गर्भवती हो गयीं। बारह दिव्य वर्षोंके बाद उन्होंने सर्वकर्मफल नामक श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न किया। वही कर्मफलोंका दाता है। कर्मपरायण सत्पुरुषोंको दक्षिणा फल देती है तथा कर्म पूर्ण होनेपर उनका पुत्र ही फलदायक होता है। अतएव वेदज्ञ पुरुष इस प्रकार कहते हैं कि भगवान् यज्ञ देवी दक्षिणा तथा अपने पुत्र 'फल' के साथ होनेपर ही कर्मोंका फल प्रदान करते हैं।

नारद! इस प्रकार यज्ञपुरुष दक्षिणा तथा फलदाता पुत्रको प्राप्त करके सबको कर्मोंका फल प्रदान करने लगे। तब देवताओंके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे सभी सफलमनोरथ होकर अपने-अपने स्थानपर चले गये। मैंने धर्मदेवके मुखसे ऐसा सुना है। अतएव मुने! कर्ताको चाहिये कि कर्म करनेके पश्चात् तुरंत दक्षिणा दे दें। तभी सद्यः फल प्राप्त होता है—यह वेदोंकी स्पष्ट वाणी है। यदि दैववश अथवा अज्ञानसे यज्ञकर्ता कर्मसम्पन्न हो जानेपर तुरंत ही ब्राह्मणोंको दक्षिणा नहीं दे देता तो उस दक्षिणाकी संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती चली जाती है और साथ ही यजमानका सम्पूर्ण कर्म भी निष्फल हो जाता है। ब्राह्मणका स्वत्व अपहरण करनेसे वह अपवित्र मानव किसी कर्मका अधिकारी नहीं रह जाता। उसी पापके फलस्वरूप उस पातकी मानवको दरिद्र और रोगी होना पड़ता है। लक्ष्मी अत्यन्त भयंकर शाप देकर उसके घरसे चली जाती हैं। उसके दिये हुए श्राद्ध और तर्पणको पितर ग्रहण नहीं करते हैं। ऐसे ही, देवता उसकी की हुई पूजा तथा अग्निमें दी हुई आहुति भी स्वीकार नहीं करते। यज्ञ करते समय कतनि दक्षिणा संकल्प कर दी; किंतु दी नहीं और प्रतिग्रह लेनेवालेने उसे माँगा भी नहीं तो ये दोनों व्यक्ति नरकमें इस प्रकार गिरते हैं, जैसे रस्सी टूट जानेपर घड़ा। विप्र! इस प्रकारकी यह रहस्यभरी बातें बतला दीं। तुम्हें पुनः क्या सुननेकी इच्छा है?

२५२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण नारदजीने पूछा-मुने ! दक्षिणाहीन कर्मके फलको कौन भोगता है ? साथ ही यज्ञपुरुषने भगवती दक्षिणाकी किस प्रकार पूजा की थी; यह भी बतलाइये। भगवान् नारायण कहते हैं- मुने ! दक्षिणाहीन कर्ममें फल ही कैसे लग सकता है; क्योंकि फल प्रसव करनेकी योग्यता तो दक्षिणावाले कर्ममें ही है। मुने ! बिना दक्षिणाका कर्म तो बलिके पेटमें चला जाता है। पूर्वसमयमें भगवान् वामन बलिके लिये आहाररूपमें इसे अर्पण कर चुके हैं। नारद ! अश्रोत्रिय और श्रद्धाहीन व्यक्तिके द्वारा श्राद्धमें दी हुई वस्तुको बलि भोजनरूपसे प्राप्त करते हैं। शूद्रोंसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मणोंके पूजासम्बन्धी द्रव्य, निषिद्ध एवं आचरणहीन ब्राह्मणोंद्वारा किया हुआ पूजन तथा गुरुमें भक्ति न रखनेवाले पुरुषका कर्म-ये सब बलिके आहार हो जाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। मुने ! भगवती दक्षिणाके ध्यान, स्तोत्र और पूजाकी विधिके क्रम कण्वशाखामें वर्णित हैं। वह सब मैं कहता हूँ, सुनो। यज्ञपुरुषने कहा-महाभागे ! तुम पूर्वसमयमें गोलोककी एक गोपी थी। गोपियोंमें तुम्हारा प्रमुख स्थान था। राधाके समान ही तुम उनकी सखी थीं। भगवान् श्रीकृष्ण तुमसे प्रेम करते थे। कार्तिकी पूर्णिमाके अवसरपर राधा-महोत्सव मनाया जा रहा था। कुछ कार्यानन्तर उपस्थित हो जानेके कारण तुम भगवान् श्रीकृष्णके दक्षिण कंधेसे प्रकट हुई थीं। अतएव तुम्हारा नाम 'दक्षिणा' पड़ गया। शोभने ! तुम इससे पहले परम शीलवती होनेके कारण 'सुशीला' कहलाती थीं। तुम ऐसी सुयोग्या देवी श्रीराधाके शापसे गोलोकसे च्युत होकर दक्षिणा नामसे सम्पन्न हो मुझे सौभाग्यवश प्राप्त हुई हो। सुभगे ! तुम मुझे अपना स्वामी बनानेकी कृपा करो ! तुम्हीं यज्ञशाली पुरुषोंके कर्मका फल प्रदान करनेवाली आदरणीया देवी हो। तुम्हारे बिना सम्पूर्ण प्राणियोंके सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं। तुम्हारी अनुपस्थितिमें कर्मियोंका कर्म भी शोभा नहीं पाता। ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा दिक्पाल प्रभृति सभी देवता तुम्हारे न रहनेसे कर्मोंका फल देनेमें असमर्थ रहते हैं। ब्रह्मा स्वयं कर्मरूप हैं। शंकरको फलरूप बतलाया गया है। मैं विष्णु स्वयं यज्ञरूपसे प्रकट हूँ। इन सबमें साररूपा तुम्हीं हो। साक्षात् परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण, जो प्राकृत गुणोंसे रहित तथा प्रकृतिसे परे हैं, समस्त फलोंके दाता हैं, परंतु वे श्रीकृष्ण भी तुम्हारे बिना कुछ करनेमें समर्थ नहीं हैं। कान्ते ! सदा जन्म-जन्ममें तुम्हीं मेरी शक्ति हो। वरानने ! तुम्हारे साथ रहकर ही मैं समस्त कर्मोंमें समर्थ हूँ। ऐसा कहकर यज्ञके अधिष्ठाता देवता दक्षिणाके सामने खड़े हो गये। तब कमलाकी कलास्वरूपा उस देवीने संतुष्ट होकर यज्ञपुरुषका वरण किया। यह भगवती दक्षिणाका स्तोत्र है। जो पुरुष यज्ञके अवसरपर इसका पाठ करता है, उसे सम्पूर्ण यज्ञोंके फल सुलभ हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं। सभी प्रकारके यज्ञोंके आरम्भमें जो पुरुष इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसके वे सभी यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न हो जाते हैं, यह ध्रुव सत्य है।

प्रकृतिखण्ड २५३


यह स्तोत्र तो कह दिया, अब ध्यान और पूजा-विधि सुनो। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि शालग्रामकी मूर्तिमें अथवा कलशपर आवाहन करके भगवती दक्षिणाकी पूजा करे। ध्यान यों करना चाहिये—'भगवती लक्ष्मीके दाहिने कंधेसे प्रकट होनेके कारण दक्षिणा नामसे विख्यात ये देवी साक्षात् कमलाकी कला हैं। सम्पूर्ण यज्ञ-यागादि कर्मोंमें अखिल कर्मोंका फल प्रदान करना इनका सहज गुण है। ये भगवान् विष्णुकी शक्तिस्वरूपा हैं। मैं इनकी आराधना करता हूँ। ऐसी शुभा, शुद्धिदा, शुद्धिरूपा एवं सुशीला नामसे प्रसिद्ध भगवती दक्षिणाकी मैं उपासना करता हूँ।' नारद! इसी मन्त्रसे ध्यान करके विद्वान् पुरुष मूलमन्त्रसे इन वरदायिनी देवीकी पूजा करे। पाद्य, अर्घ्य आदि सभी इसी वेदोक्त मन्त्रके द्वारा अर्पण करने चाहिये। मन्त्र यह है—'ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं दक्षिणायै स्वाहा।' सुधीजनोंको चाहिये कि सर्वपूजिता इन भगवती दक्षिणाकी अर्चना भक्तिपूर्वक उत्तम विधिके साथ करें।

ब्रह्मन्! इस प्रकार भगवती दक्षिणाका उपाख्यान कह दिया। यह उपाख्यान सुख, प्रीति एवं सम्पूर्ण कर्मोंका फल प्रदान करनेवाला है। जो पुरुष देवी दक्षिणाके इस चरित्रका सावधान होकर श्रवण करता है, भारतकी भूमिपर किये गये उसके कोई कर्म अङ्गहीन नहीं होते। इसके श्रवणसे पुत्रहीन पुरुष अवश्य ही गुणवान् पुत्र प्राप्त कर लेता है और जो भार्याहीन हो, उसे परम सुशीला सुन्दरी पत्नी सुलभ हो जाती है। वह पत्नी विनीत, प्रियवादिनी एवं पुत्रवती होती है। पतिव्रता, उत्तम व्रतका पालन करनेवाली, शुद्ध आचार-विचार रखनेवाली तथा श्रेष्ठ कुलकी कन्या होती है। विद्याहीन विद्या, धनहीन धन, भूमिहीन भूमि तथा प्रजाहीन मनुष्य श्रवणके प्रभावसे प्रजा प्राप्त कर लेता है। संकट, बन्धुविच्छेद, विपत्ति तथा बन्धनके कष्टमें पड़ा हुआ पुरुष एक महीनेतक इसका श्रवण करके इन सबसे छूट जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है।

(अध्याय ४२)


देवी षष्ठीके ध्यान, पूजन, स्तोत्र तथा विशद महिमाका वर्णन

नारदजीने कहा—प्रभो! भगवती 'षष्ठी', मङ्गलचण्डिका तथा देवी मनसा—ये देवियाँ मूलप्रकृतिकी कला मानी गयी हैं। मैं अब इनके प्राकट्यका प्रसङ्ग यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ।

भगवान् नारायण कहते हैं—मुने! मूलप्रकृतिके छठे अंशसे प्रकट होनेके कारण ये 'षष्ठी' देवी कहलाती हैं। बालकोंकी ये अधिष्ठात्री देवी हैं। इन्हें 'विष्णुमाया' और 'बालदा' भी कहा जाता है। मातृकाओंमें 'देवसेना' नामसे ये प्रसिद्ध हैं। उत्तम व्रतका पालन करनेवाली इन साध्वी देवीको स्वामी कार्तिकेयकी पत्नी होनेका सौभाग्य प्राप्त है। वे प्राणोंसे भी बढ़कर इनसे प्रेम करते हैं। बालकोंको दीर्घायु बनाना तथा उनका भरण-पोषण एवं रक्षण करना इनका स्वाभाविक गुण है। ये सिद्धियोगिनी देवी अपने योगके प्रभावसे बच्चोंके पास सदा विराजमान रहती हैं। ब्रह्मन्! इनकी पूजा-विधिके साथ ही यह एक उत्तम इतिहास सुनो। पुत्र प्रदान करनेवाला यह परम सुखदायी उपाख्यान धर्मदेवके मुखसे मैंने सुना है।

प्रियव्रत नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो चुके हैं। उनके पिताका नाम था—स्वायम्भुव मनु। प्रियव्रत योगिराज होनेके कारण विवाह करना नहीं चाहते थे। तपस्यामें उनकी विशेष रुचि

३७- मनसा देवीका व्याकुल होकर शंकर, ब्रह्मा, श्रीहरि तथा कश्यपजीका स्मरण करना और उनके आनेपर मुनि जरत्कारुद्वारा स्तुति और प्रणाम करके आगमनका कारण पूछा जाना

२५४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

थी। परंतु ब्रह्माजीकी आज्ञा तथा सत्प्रयत्नके प्रभावसे उन्होंने विवाह कर लिया। मुने! विवाहके बाद सुदीर्घकालतक उन्हें कोई भी संतान नहीं हो सकी। तब कश्यपजीने उनसे पुत्रेष्टि-यज्ञ कराया। राजाकी प्रेयसी भार्याका नाम मालिनी था। मुनिने उन्हें चरु प्रदान किया। चरु-भक्षण करनेके पश्चात् रानी मालिनी गर्भवती हो गयीं। तत्पश्चात् सुवर्णके समान प्रतिभावाले एक कुमारकी उत्पत्ति हुई; परंतु सम्पूर्ण अङ्गोंसे सम्पन्न वह कुमार मरा हुआ था। उसकी आँखें उलट चुकी थीं। उसे देखकर समस्त नारियाँ तथा बान्धवोंकी स्त्रियाँ भी रो पड़ीं। पुत्रके असह्य शोकके कारण माताको मूर्च्छा आ गयी।

मुने! राजा प्रियव्रत उस मृत बालकको लेकर श्मशानमें गये। उस एकान्त भूमिमें पुत्रको छातीसे चिपकाकर आँखोंसे आँसुओंकी धारा बहाने लगे। इतनेमें उन्हें वहाँ एक दिव्य विमान दिखायी पड़ा। शुद्ध स्फटिकमणिके समान चमकनेवाला वह विमान अमूल्य रत्नोंसे बना था। तेजसे जगमगाते हुए उस विमानकी रेशमी वस्त्रोंसे अनुपम शोभा हो रही थी। अनेक प्रकारके अद्भुत चित्रोंसे वह विभूषित था। पुष्पोंकी मालासे वह सुसज्जित था। उसीपर बैठी हुई मनको मुग्ध करनेवाली एक परम सुन्दरी देवीको राजा प्रियव्रतने देखा। श्वेत चम्पाके फूलके समान उनका उज्ज्वल वर्ण था। सदा सुस्थिर तारुण्यसे शोभा पानेवाली वे देवी मुस्करा रही थीं। उनके मुखपर प्रसन्नता छायी थी। रत्नमय भूषण उनकी छवि बढ़ाये हुए थे। योगशास्त्रमें पारंगत वे देवी भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये आतुर थीं। ऐसा जान पड़ता था मानो वे मूर्तिमती कृपा ही हों। उन्हें सामने विराजमान देखकर राजाने बालकको भूमिपर रख दिया और बड़े आदरके साथ उनकी पूजा और स्तुति की। नारद! उस समय स्कन्दकी प्रिया देवी षष्ठी अपने तेजसे देदीप्यमान थीं। उनका शान्त विग्रह ग्रीष्मकालीन सूर्यके समान चमचमा रहा था। उन्हें प्रसन्न देखकर राजाने पूछा।

राजा प्रियव्रतने पूछा—सुशोभने! कान्ते! सुव्रते! वरारोहे! तुम कौन हो, तुम्हारे पतिदेव कौन हैं और तुम किसकी कन्या हो? तुम स्त्रियोंमें धन्यवाद एवं आदरकी पात्र हो।

नारद! जगत्को मङ्गल प्रदान करनेमें प्रवीण तथा देवताओंके रणमें सहायता पहुँचानेवाली वे भगवती ‘देवसेना’ थीं। पूर्वसमयमें देवता दैत्योंसे ग्रस्त हो चुके थे। इन देवीने स्वयं सेना बनकर देवताओंका पक्ष ले युद्ध किया था। इनकी कृपासे देवता विजयी हो गये थे। अतएव इनका नाम ‘देवसेना’ पड़ गया। महाराज प्रियव्रतकी बात सुनकर ये उनसे कहने लगीं।

भगवती देवसेनाने कहा—राजन्! मैं ब्रह्माकी मानसी कन्या हूँ। जगत्पर शासन करनेवाली मुझ देवीका नाम ‘देवसेना’ है। विधाताने मुझे उत्पन्न करके स्वामी कार्तिकेयको सौंप दिया है। मैं सम्पूर्ण मातृकाओंमें प्रसिद्ध हूँ। स्कन्दकी पतिव्रता भार्या होनेका गौरव मुझे प्राप्त है। भगवती मूलप्रकृतिके छठे अंशसे प्रकट होनेके कारण विश्वमें देवी ‘षष्ठी’ नामसे मेरी प्रसिद्धि है। मेरे प्रसादसे पुत्रहीन व्यक्ति सुयोग्य पुत्र, प्रियाहीन जन प्रिया, दरिद्री धन तथा कर्मशील पुरुष कर्मोंके उत्तम फल प्राप्त कर लेते हैं। राजन्! सुख, दुःख, भय, शोक, हर्ष, मङ्गल, सम्पत्ति और विपत्ति—ये सब कर्मके अनुसार होते हैं। अपने ही कर्मके प्रभावसे पुरुष अनेक पुत्रोंका पिता होता है और कुछ लोग पुत्रहीन भी होते हैं। किसीको मरा हुआ पुत्र होता है और किसीको दीर्घजीवी—यह कर्मका ही फल है। गुणी, अङ्गहीन, अनेक पत्नियोंका स्वामी, भार्यारहित, रूपवान्, रोगी और धर्मी होनेमें मुख्य कारण अपना कर्म ही है। कर्मके अनुसार ही व्याधि होती है और पुरुष आरोग्यवान् भी हो जाता

प्रकृतिखण्ड २५५

है। अतएव राजन्! कर्म सबसे बलवान् है—यह बात श्रुतिमें कही गयी है।

मुने! इस प्रकार कहकर देवी षष्ठीने उस बालकको उठा लिया और अपने महान् ज्ञानके प्रभावसे खेल-खेलमें ही उसे पुनः जीवित कर दिया। अब राजाने देखा तो सुवर्णके समान प्रतिभावाला वह बालक हँस रहा था। अभी महाराज प्रियव्रत उस बालककी ओर देख ही रहे थे कि देवी देवसेना उस बालकको लेकर आकाशमें जानेको तैयार हो गयीं। ब्रह्मन्! यह देख राजाके कण्ठ, ओष्ठ और तालू सूख गये, उन्होंने पुनः देवीकी स्तुति की। तब संतुष्ट हुई देवीने राजासे कर्मनिर्मित वेदोक्त वचन कहा।

देवीने कहा—तुम स्वायम्भुव मनुके पुत्र हो। त्रिलोकीमें तुम्हारा शासन चलता है। तुम सर्वत्र मेरी पूजा कराओ और स्वयं भी करो। तब मैं तुम्हें कमलके समान मुखवाला यह मनोहर पुत्र प्रदान करूँगी। इसका नाम सुव्रत होगा। इसमें सभी गुण और विवेकशक्ति विद्यमान रहेगी। यह भगवान् नारायणका कलावतार तथा प्रधान योगी होगा। इसे पूर्वजन्मकी बातें याद रहेंगी। क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ यह बालक सौ अश्वमेध-यज्ञ करेगा। सभी इसका सम्मान करेंगे। उत्तम बलसे सम्पन्न होनेके कारण यह ऐसी शोभा पायेगा, जैसे लाखों हाथियोंमें सिंह। यह धनी, गुणी, शुद्ध, विद्वानोंका प्रेमभाजन तथा योगियों, ज्ञानियों एवं तपस्वियोंका सिद्धरूप होगा। त्रिलोकीमें इसकी कीर्ति फैल जायगी। यह सबको सब सम्पत्ति प्रदान कर सकेगा।

इस प्रकार कहनेके पश्चात् भगवती देवसेनाने उन्हें वह पुत्र दे दिया। राजा प्रियव्रतने पूजाकी सभी बातें स्वीकार कर लीं। यों भगवती देवसेनाने उन्हें उत्तम वर दे स्वर्गके लिये प्रस्थान किया। राजा भी प्रसन्नमन होकर मन्त्रियोंके साथ अपने घर लौट आये। आकर पुत्रविषयक वृत्तान्त सबसे कह सुनाया। नारद! यह प्रिय वचन सुनकर स्त्री और पुरुष सब-के-सब परम संतुष्ट हो गये। राजाने सर्वत्र पुत्र-प्राप्तिके उपलक्षमें माङ्गलिक कार्य आरम्भ करा दिया। भगवतीकी पूजा की। ब्राह्मणोंको बहुत-सा धन दान किया। तबसे प्रत्येक मासमें शुक्लपक्षकी षष्ठी तिथिके अवसरपर भगवती षष्ठीका महोत्सव यत्नपूर्वक मनाया जाने लगा। बालकोंके प्रसवगृहमें छठे दिन, इक्कीसवें दिन तथा अन्नप्राशनके शुभ समयपर यत्नपूर्वक देवीकी पूजा होने लगी। सर्वत्र इसका पूरा प्रचार हो गया। स्वयं राजा प्रियव्रत भी पूजा करते थे।

सुव्रत! अब भगवती देवसेनाका ध्यान, पूजन, स्तोत्र कहता हूँ, सुनो। यह प्रसङ्ग कौथुमशाखामें वर्णित है। धर्मदेवके मुखसे सुननेका मुझे अवसर मिला था। मुने! शालग्रामकी प्रतिमा, कलश अथवा वटके मूलभागमें या दीवालपर पुत्तलिका बनाकर प्रकृतिके छठे अंशसे प्रकट होनेवाली शुद्धस्वरूपिणी इन भगवतीकी इस प्रकार पूजा करनी चाहिये। विद्वान् पुरुष इनका इस प्रकार ध्यान करे—'सुन्दर पुत्र, कल्याण तथा दया प्रदान करनेवाली ये देवी जगत्की माता हैं। श्वेत चम्पकके समान इनका

२५६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

वर्ण है। रत्नमय भूषणोंसे ये अलंकृत हैं। इन परम पवित्रस्वरूपिणी भगवती देवसेनाकी मैं उपासना करता हूँ।' विद्वान् पुरुष यों ध्यान करनेके पश्चात् भगवतीको पुष्पाञ्जलि समर्पण करे। पुनः ध्यान करके मूलमन्त्रसे इन साध्वी देवीकी पूजा करनेका विधान है। पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, गन्ध, धूप, दीप, विविध प्रकारके नैवेद्य तथा सुन्दर फलद्वारा भगवतीकी पूजा करनी चाहिये। उपचार अर्पण करनेके पूर्व 'ॐ ह्रीं षष्ठीदेव्यै स्वाहा' इस मन्त्रका उच्चारण करना विहित है। पूजक पुरुषको चाहिये कि यथाशक्ति इस अष्टाक्षर महामन्त्रका जप भी करे।

तदनन्तर मनको शान्त करके भक्तिपूर्वक स्तुति करनेके पश्चात् देवीको प्रणाम करे। फल प्रदान करनेवाला यह उत्तम स्तोत्र सामवेदमें वर्णित है। जो पुरुष देवीके उपर्युक्त अष्टाक्षर महामन्त्रका एक लाख जप करता है, उसे अवश्य ही उत्तम पुत्रकी प्राप्ति होती है, ऐसा ब्रह्माजीने कहा है। मुनिवर ! अब सम्पूर्ण शुभ कामनाओंको प्रदान करनेवाला स्तोत्र सुनो। नारद ! सबका मनोरथ पूर्ण करनेवाला यह स्तोत्र वेदोंमें गोप्य है।

'देवीको नमस्कार है। महादेवीको नमस्कार है। भगवती सिद्धि एवं शान्तिको नमस्कार है। शुभा, देवसेना एवं भगवती षष्ठीको बार-बार नमस्कार है। वरदा, पुत्रदा, धनदा, सुखदा एवं मोक्षप्रदा भगवती षष्ठीको बार-बार नमस्कार है। मूलप्रकृतिके छठे अंशसे प्रकट होनेवाली भगवती सिद्धाको नमस्कार है। माया, सिद्धयोगिनी, सारा, शारदा और परादेवी नामसे शोभा पानेवाली भगवती षष्ठीको बार-बार नमस्कार है। बालकोंकी अधिष्ठात्री, कल्याण प्रदान करनेवाली, कल्याण-स्वरूपिणी एवं कर्मोंके फल प्रदान करनेवाली देवी षष्ठीको बार-बार नमस्कार है। अपने भक्तोंको प्रत्यक्ष दर्शन देनेवाली तथा सबके लिये सम्पूर्ण कार्योंमें पूजा प्राप्त करनेकी अधिकारिणी स्वामी कार्तिकेयकी प्राणप्रिया देवी षष्ठीको बार-बार नमस्कार है। मनुष्य जिनकी सदा वन्दना करते हैं तथा देवताओंकी रक्षामें जो तत्पर रहती हैं, उन शुद्धसत्त्वस्वरूपा देवी षष्ठीको बार-बार नमस्कार है। हिंसा और क्रोधसे रहित भगवती षष्ठीको बार-बार नमस्कार है। सुरेश्वरि ! तुम मुझे धन दो, प्रिया पत्नी दो और पुत्र देनेकी कृपा करो। महेश्वरि ! तुम मुझे सम्मान दो, विजय दो और मेरे शत्रुओंका संहार कर डालो। धन और यश प्रदान करनेवाली भगवती षष्ठीको बार-बार नमस्कार है। सुपूजिते ! तुम भूमि दो, प्रजा दो, विद्या दो तथा कल्याण एवं जय प्रदान करो। तुम षष्ठीदेवीको बार-बार नमस्कार है।'

इस प्रकार स्तुति करनेके पश्चात् महाराज प्रियव्रतने षष्ठीदेवीके प्रभावसे यशस्वी पुत्र प्राप्त कर लिया। ब्रह्मन् ! जो पुरुष भगवती षष्ठीके इस स्तोत्रको एक वर्षतक श्रवण करता है, वह यदि अपुत्री हो तो दीर्घजीवी सुन्दर पुत्र प्राप्त कर लेता है। जो एक वर्षतक भक्तिपूर्वक देवीकी पूजा करके इनका यह स्तोत्र सुनता है, उसके सम्पूर्ण पाप विलीन हो जाते हैं। महान् वन्ध्या भी इसके प्रसादसे संतान प्रसव करनेकी योग्यता प्राप्त कर लेती है। वह भगवती देवसेनाकी कृपासे गुणी, विद्वान्, यशस्वी, दीर्घायु एवं श्रेष्ठ पुत्रकी जननी होती है। काकवन्ध्या अथवा मृतवत्सा नारी एक वर्षतक इसका श्रवण करनेके फलस्वरूप भगवती षष्ठीके प्रभावसे पुत्रवती हो जाती है। यदि बालकको रोग हो जाय तो उसके माता-पिता एक मासतक इस स्तोत्रका श्रवण करें तो षष्ठीदेवीकी कृपासे उस बालककी व्याधि शान्त हो जाती है।

(अध्याय ४३)

प्रकृतिखण्ड २५७

भगवती मङ्गलचण्डी और मनसादेवीका उपाख्यान

भगवान् नारायण कहते हैं— ब्रह्मपुत्र नारद! आगम शास्त्रके अनुसार षष्ठीदेवीका चरित्र कह दिया। अब भगवती मङ्गलचण्डीका उपाख्यान सुनो, साथ ही उनकी पूजाका विधान भी। इसे मैंने धर्मदेवके मुखसे सुना था, वही बता रहा हूँ। यह श्रुतिसम्मत उपाख्यान सम्पूर्ण विद्वानोंको भी अभीष्ट है। 'चण्डी' शब्दका प्रयोग 'दक्षा' (चतुरा)-के अर्थमें होता है और 'मङ्गल' शब्द कल्याणका वाचक है। जो मङ्गल—कल्याण करनेमें दक्ष हो, वह 'मङ्गलचण्डिका' कही जाती है। 'दुर्गा' के अर्थमें चण्डी शब्दका प्रयोग होता है और मङ्गल शब्द भूमिपुत्र मङ्गलके अर्थमें भी आता है। अतः जो मङ्गलकी अभीष्ट देवी हैं, उन देवीको 'मङ्गलचण्डिका' कहा गया है। मनुवंशमें मङ्गल नामक एक राजा थे। सप्तद्वीपवती पृथ्वी उनके शासनमें थी। उन्होंने इन देवीको अभीष्ट देवता मानकर पूजा की थी। इसलिये भी ये 'मङ्गलचण्डी' नामसे विख्यात हुईं। जो मूलप्रकृति भगवती जगदीश्वरी 'दुर्गा' कहलाती हैं, उन्हींका यह रूपान्तर है। ये देवी कृपाकी मूर्ति धारण करके सबके सामने प्रत्यक्ष हुई हैं। स्त्रियोंकी ये इष्टदेवी हैं।

सर्वप्रथम भगवान् शंकरने इन सर्वश्रेष्ठरूपा देवीकी आराधना की। ब्रह्मन्! त्रिपुर नामक दैत्यके भयंकर वधके समयका यह प्रसङ्ग है। भगवान् शंकर बड़े संकटमें पड़ गये थे। दैत्यने रोषमें आकर उनके वाहन विमानको आकाशसे नीचे गिरा दिया था। तब ब्रह्मा और विष्णुने उन्हें प्रेरणा की। उन महानुभावोंका उपदेश मानकर शंकर भगवती दुर्गाकी स्तुति करने लगे। वे भी देवी मङ्गलचण्डी ही थीं। केवल रूप बदल लिया था। स्तुति करनेपर वे ही देवी भगवान् शंकरके सामने प्रकट हुईं और उनसे बोलीं—

'प्रभो! तुम्हें भय नहीं करना चाहिये। स्वयं सर्वेश भगवान् श्रीहरि ही वृषभका रूप धारण करके तुम्हारे सामने उपस्थित होंगे। वृषध्वज! मैं युद्ध-शक्तिस्वरूपा बनकर तुम्हारा साथ दूँगी। फिर स्वयं मेरी तथा श्रीहरिकी सहायतासे तुम देवताओंको पदच्युत करनेवाले उस दानवको, जिसने घोर शत्रुता ठान रखी है, मार डालोगे।'

मुनिवर! इस प्रकार कहकर भगवती अन्तर्धान हो गयीं। उसी क्षण उन शक्तिरूपी देवीसे शंकर सम्पन्न हो गये। भगवान् श्रीहरिने एक अस्त्र दे दिया था। अब उसी अस्त्रसे त्रिपुर-वधमें उन्हें सफलता प्राप्त हो गयी। दैत्यके मारे जानेपर सम्पूर्ण देवताओं तथा महर्षियोंने भगवान् शंकरका स्तवन किया। उस समय सभी भक्तिमें सराबोर होकर अत्यन्त नम्र हो गये थे। उसी क्षण भगवान् शंकरके मस्तकपर पुष्पोंकी वर्षा होने लगी। ब्रह्मा और विष्णुने परम संतुष्ट होकर उन्हें शुभ आशीर्वाद और सदुपदेश भी दिया। तब भगवान् शंकर सम्यक् प्रकारसे स्नान करके भक्तिके साथ भगवती मङ्गलचण्डीकी आराधना करने लगे। पाद्य, अर्घ्य, आचमन, विविध वस्त्र, पुष्प, चन्दन, भाँति-भाँतिके नैवेद्य, बलि, वस्त्र, अलंकार, माला, तीर, पिष्टक, मधु, सुधा तथा नाना प्रकारके फलोंद्वारा भक्तिपूर्वक उन्होंने देवीकी पूजा की। नाच, गान, वाद्य और नाम-कीर्तन भी कराया। तत्पश्चात् माध्यन्दिन शाखामें कहे हुए ध्यान-मन्त्रके द्वारा भगवती मङ्गलचण्डीका भक्तिपूर्वक ध्यान किया। नारद! उन्होंने मूलमन्त्रका उच्चारण करके ही भगवतीको सभी द्रव्य समर्पण किये थे। वह मन्त्र इस प्रकार है—

'ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्वपूज्ये देवि मङ्गलचण्डिके ऐं क्रूं फट् स्वाहा।'*


* देवीभागवत नवम स्कन्धके ४७वें अध्यायमें भी यह मन्त्र आया है, वहाँ 'ऐं क्रूं' के स्थानमें 'हूं हूं' ऐसा पाठ है।

३४- आदिगौ सुरभीदेवीका उपाख्यान

२५८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

—इक्कीस अक्षरका यह मन्त्र सुपूजित होनेपर भक्तोंको सम्पूर्ण कामना प्रदान करनेके लिये कल्पवृक्षस्वरूप है। दस लाख जप करनेपर इस मन्त्रकी सिद्धि होती है।

ब्रह्मन्! अब ध्यान सुनो। सर्वसम्मत ध्यान वेदप्रणीत है। 'सुस्थिरयौवना भगवती मङ्गलचण्डिका सदा सोलह वर्षकी ही जान पड़ती हैं। ये सम्पूर्ण रूप-गुणसे सम्पन्न, कोमलाङ्गी एवं मनोहारिणी हैं। श्वेत चम्पाके समान इनका गौरवर्ण तथा करोड़ों चन्द्रमाओंके तुल्य इनकी मनोहर कान्ति है। ये अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र धारण किये रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। मल्लिका-पुष्पोंसे समलंकृत केशपाश धारण करती हैं। बिम्बसदृश लाल ओठ, सुन्दर दन्त-पंक्ति तथा शरत्कालके प्रफुल्ल कमलकी भाँति शोभायमान मुखवाली मङ्गलचण्डिकाके प्रसन्न वदनारविन्दपर मन्द मुसकानकी छटा छा रही है। इनके दोनों नेत्र सुन्दर खिले हुए नीलकमलके समान मनोहर जान पड़ते हैं। सबको सम्पूर्ण सम्पदा प्रदान करनेवाली ये जगदम्बा घोर संसार-सागरसे उबारनेमें जहाजका काम करती हैं। मैं सदा इनका भजन करता हूँ।' मुने! यह तो भगवती मङ्गलचण्डिकाका ध्यान हुआ। ऐसे ही स्तवन भी है, सुनो।

महादेवजीने कहा—जगन्माता भगवती मङ्गलचण्डिके! तुम सम्पूर्ण विपत्तियोंका विध्वंस करनेवाली हो एवं हर्ष तथा मङ्गल प्रदान करनेको सदा प्रस्तुत रहती हो। मेरी रक्षा करो, रक्षा करो। खुले हाथ हर्ष और मङ्गल देनेवाली हर्षमङ्गलचण्डिके! तुम शुभा, मङ्गलदक्षा, शुभमङ्गलचण्डिका, मङ्गला, मङ्गलार्हा तथा सर्वमङ्गलमङ्गला कहलाती हो। देवि! साधुपुरुषोंको मङ्गल प्रदान करना तुम्हारा स्वाभाविक गुण है। तुम सबके लिये मङ्गलका आश्रय हो। देवि! तुम मङ्गलग्रहकी इष्टदेवी हो। मङ्गलके दिन तुम्हारी पूजा होनी चाहिये। मनुवंशमें उत्पन्न राजा मङ्गलकी पूजनीया देवी हो। मङ्गलाधिष्ठात्री देवि! तुम मङ्गलोंके लिये भी मङ्गल हो। जगत्के समस्त मङ्गल तुमपर आश्रित हैं। तुम सबको मोक्षमय मङ्गल प्रदान करती हो। मङ्गलको सुपूजित होनेपर मङ्गलमय सुख प्रदान करनेवाली देवि! तुम संसारकी सारभूता मङ्गलाधारा तथा समस्त कर्मोंसे परे हो।'

इस स्तोत्रसे स्तुति करके भगवान् शंकरने देवी मङ्गलचण्डिकाकी उपासना की। वे प्रति मङ्गलवारको उनका पूजन करके चले जाते हैं। यों ये भगवती सर्वमङ्गला सर्वप्रथम भगवान् शंकरसे पूजित हुईं। उनके दूसरे उपासक मङ्गल ग्रह हैं। तीसरी बार राजा मङ्गलने तथा चौथी बार मङ्गलके दिन कुछ सुन्दरी स्त्रियोंने इन देवीकी पूजा की। पाँचवीं बार मङ्गलकी कामना रखनेवाले बहुसंख्यक मनुष्योंने मङ्गलचण्डिकाका पूजन किया। फिर तो विश्वेश शंकरसे सुपूजित ये देवी प्रत्येक विश्वमें सदा पूजित होने लगीं। मुने! इसके बाद देवता, मुनि, मनु और मानव—सभी सर्वत्र इन परमेश्वरीकी पूजा करने लगे।

जो पुरुष मनको एकाग्र करके भगवती मङ्गलचण्डिकाके इस मङ्गलमय स्तोत्रका श्रवण करता है, उसे सदा मङ्गल प्राप्त होता है। अमङ्गल उसके पास नहीं आ सकता। उसके पुत्र और पौत्रोंमें वृद्धि होती है तथा उसे प्रतिदिन मङ्गल ही दृष्टिगोचर होता है।

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! आगमोंके अनुसार देवी षष्ठी और मङ्गलचण्डिकाका उपाख्यान कह चुका। अब मनसादेवीका चरित्र, जो धर्मके मुखसे मैं सुन चुका हूँ, तुमसे कहता हूँ, सुनो। ये भगवती कश्यपजीकी मानसी कन्या हैं तथा मनसे उद्दीप्त होती हैं, इसलिये 'मनसा' देवीके नामसे विख्यात हैं। आत्मामें रमण करनेवाली इन सिद्धयोगिनी वैष्णवीदेवीने तीन युगोंतक परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णकी तपस्या की है।

प्रकृतिखण्ड २५९

गोपीपति परम प्रभु उन परमेश्वरने इनके वस्त्र और शरीरको जीर्ण देखकर इनका ‘जरत्कारु’ नाम रख दिया। साथ ही, उन कृपानिधिने कृपापूर्वक इनकी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण कर दीं, इनकी पूजाका प्रचार किया और स्वयं भी इनकी पूजा की। स्वर्गमें, ब्रह्मलोकमें, भूमण्डलमें और पातालमें—सर्वत्र इनकी पूजा प्रचलित हुई। सम्पूर्ण जगत्‌में ये अत्यधिक गौरवर्ण, सुन्दरी और मनोहारिणी हैं; अतएव ये साध्वी देवी ‘जगद्गौरी’—के नामसे विख्यात होकर सम्मान प्राप्त करती हैं। भगवान् शिवसे शिक्षा प्राप्त करनेके कारण ये देवी ‘शैवी’ कहलाती हैं। भगवान् विष्णुकी ये अनन्य उपासिका हैं। अतएव लोग इन्हें ‘वैष्णवी’ कहते हैं। राजा जनमेजयके यज्ञमें इन्हींके सत्प्रयत्नसे नागोंके प्राणोंकी रक्षा हुई थी, अतः इनका नाम ‘नागेश्वरी’ और ‘नागभगिनी’ पड़ गया। विषका संहार करनेमें परम समर्थ होनेसे इनका एक नाम ‘विषहरी’ है। इन्हें भगवान् शंकरसे योगसिद्धि प्राप्त हुई थी। अतः ये ‘सिद्धयोगिनी’ कहलाने लगीं। इन्होंने शंकरसे महान् गोपनीय ज्ञान एवं मृतसंजीवनी नामक उत्तम विद्या प्राप्त की है, इस कारण विद्वान् पुरुष इन्हें ‘महाज्ञानयुता’ कहते हैं। ये परम तपस्विनी देवी मुनिवर आस्तीककी माता हैं। अतः ये देवी जगत्‌में सुप्रतिष्ठित होकर ‘आस्तीकमाता’ नामसे विख्यात हुई हैं। जगत्पूज्य योगी महात्मा मुनिवर जरत्कारुकी प्यारी पत्नी होनेके कारण ये ‘जरत्कारुप्रिया’ नामसे विख्यात हुईं। जरत्कारु, जगद्गौरी, मनसा, सिद्धयोगिनी, वैष्णवी, नागभगिनी, शैवी, नागेश्वरी, जरत्कारुप्रिया, आस्तीकमाता, विषहरी और महाज्ञानयुता—इन बारह नामोंसे विश्व इनकी पूजा करता है। जो पुरुष पूजाके समय इन बारह नामोंका पाठ करता है, उसे तथा उसके वंशजको भी सर्पका भय नहीं हो सकता।* जिस शयनागारमें नागोंका भय हो, जिस भवनमें बहुतेरे नाग भरे हों, नागोंसे युक्त होनेके कारण जो महान् दारुण स्थान बन गया हो तथा जो नागोंसे वेष्टित हो, वहाँ भी पुरुष इस स्तोत्रका पाठ करके सर्पभयसे मुक्त हो जाता है—इसमें कोई संशय नहीं है। जो नित्य इसका पाठ करता है, उसे देखकर नाग भाग जाते हैं। दस लाख पाठ करनेसे यह स्तोत्र मनुष्योंके लिये सिद्ध हो जाता है। जिसे यह स्तोत्र सिद्ध हो गया, वह विष-भक्षण करने तथा नागोंको भूषण बनाकर नागपर सवारी करनेमें भी समर्थ हो सकता है। वह नागासन, नागकल्प तथा महान् सिद्ध हो जाता है।

मुनिवर! अब मैं देवी मनसाकी पूजाका विधान तथा सामवेदोक्त ध्यान बतलाता हूँ, सुनो। ‘भगवती मनसा श्वेतचम्पक-पुष्पके समान वर्णवाली हैं। इनका विग्रह रत्नमय भूषणोंसे विभूषित है। अग्निशुद्ध वस्त्र इनके शरीरकी शोभा बढ़ा रहे हैं। इन्होंने सर्पोंका यज्ञोपवीत धारण कर रखा है। महान् ज्ञानसे सम्पन्न होनेके कारण प्रसिद्ध ज्ञानियोंमें भी ये प्रमुख मानी जाती हैं। ये सिद्धपुरुषोंकी अधिष्ठात्री देवी हैं। सिद्धि प्रदान करनेवाली तथा सिद्धा हैं; मैं इन भगवती मनसाकी उपासना करता हूँ।’ इस प्रकार ध्यान करके मूलमन्त्रसे भगवतीकी पूजा करनी चाहिये। अनेक प्रकारके नैवेद्य तथा गन्ध, पुष्प और अनुलेपनसे देवीकी पूजा होती है। सभी उपचार मूलमन्त्रको पढ़कर अर्पण करने चाहिये। मुने! इनके मूलमन्त्रका नाम है—‘मूल कल्पतरु’—यह सुसिद्ध मन्त्र है। इसमें बारह


* जरत्कारुर्जगद्गौरी मनसा सिद्धयोगिनी। वैष्णवी नागभगिनी शैवी नागेश्वरी तथा॥
जरत्कारुप्रियाऽऽस्तीकमाता विषहरीति च। महाज्ञानयुता चैव सा देवी विश्वपूजिता॥
द्वादशैतानि नामानि पूजाकाले तु यः पठेत्। तस्य नागभयं नास्ति तस्य वंशोद्भवस्य च॥
(प्रकृतिखण्ड ४५। १५—१७)

३५- नारद-नारायण-संवादमें पार्वतीजीके पूछनेपर महादेवजीके द्वारा श्रीराधाके प्रादुर्भाव एवं महत्त्व आदिका वर्णन

२६०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अक्षर हैं। इसका वर्णन वेदमें है। यह भक्तोंके मनोरथको पूर्ण करनेवाला है। मन्त्र इस प्रकार है—‘ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं मनसादेव्यै स्वाहा।’ पाँच लाख मन्त्र जप करनेपर यह मन्त्र सिद्ध हो जाता है। जिसे इस मन्त्रकी सिद्धि प्राप्त हो गयी, वह धरातलपर सिद्ध है। उसके लिये विष भी अमृतके समान हो जाता है। उस पुरुषकी धन्वन्तरिसे तुलना की जा सकती है।

ब्रह्मन्! जो पुरुष आषाढ़की संक्रान्तिके दिन ‘गुडा’ (कपास या सेंहुड़) नामक वृक्षकी शाखापर यत्नपूर्वक इन भगवती मनसाका आवाहन करके भक्तिभावके साथ पूजा करता है तथा मनसापञ्चमीको उन देवीके लिये बलि अर्पण करता है, वह अवश्य ही धनवान्, पुत्रवान् और कीर्तिमान् होता है। महाभाग! पूजाका विधान कह चुका। अब धर्मदेवके मुखसे जैसा कुछ सुना है, वह उपाख्यान कहता हूँ, सुनो।

प्राचीन समयकी बात है। भूमण्डलके सभी मानव नागोंके भयसे आक्रान्त हो गये थे। नाग जिन्हें काट खाते, वे जीवित नहीं बचते थे। यह देख-सुनकर कश्यपजी भी भयभीत हो गये; अतः ब्रह्माजीके अनुरोधसे उन्होंने सर्पभयनिवारक मन्त्रोंकी रचना की। ब्रह्माजीके उपदेशसे वेदबीजके अनुसार मन्त्रोंकी रचना हुई। साथ ही ब्रह्माजीने अपने मनसे उत्पन्न करके इन देवीको इस मन्त्रकी अधिष्ठात्री देवी बना दिया। तपस्या तथा मनसे प्रकट होनेके कारण ये देवी ‘मनसा’ नामसे विख्यात हुईं। कुमारी अवस्थामें ही ये भगवान् शंकरके धाममें चली गयीं। कैलासमें पहुँचकर इन्होंने भक्तिपूर्वक भगवान् चन्द्रशेखरकी पूजा करके उनकी स्तुति की। मुनिकुमारी मनसाने देवताओंके वर्षसे हजार वर्षोंतक भगवान् शंकरकी उपासना की। तदनन्तर भगवान् आशुतोष इनपर प्रसन्न हो गये। मुने! भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर इन्हें महान् ज्ञान प्रदान किया। सामवेदका अध्ययन कराया और भगवान् श्रीकृष्णके कल्पवृक्षरूप अष्टाक्षर-मन्त्रका उपदेश किया।

मन्त्रका रूप ऐसा है—लक्ष्मीबीज, मायाबीज और कामबीजका पूर्वमें प्रयोग करके कृष्ण शब्दके अन्तमें ‘ङे’ विभक्ति लगाकर ‘नमः’ पद जोड़ दिया जाता है (‘श्रीं ह्रीं क्लीं कृष्णाय नमः’)। भगवान् शंकरकी कृपासे जब मुनिकुमारी मनसाको उक्त मन्त्रके साथ त्रैलोक्यमङ्गल नामक कवच, पूजनका क्रम, सर्वमान्य स्तवन, भुवनपावन ध्यान, सर्वसम्मत वेदोक्त पुरश्चरणका नियम तथा मृत्युञ्जय-ज्ञान प्राप्त हो गया, तब वह साध्वी उनसे आज्ञा ले पुष्करक्षेत्रमें तपस्या करनेके लिये चली गयी। वहाँ जाकर उसने परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णकी तीन युगोंतक उपासना की। इसके बाद उसे तपस्यामें सिद्धि प्राप्त हुई। भगवान् श्रीकृष्णने सामने प्रकट होकर उसे दर्शन दिये। उस समय कृपानिधि श्रीकृष्णने उस कृशाङ्गी बालापर अपनी कृपाकी दृष्टि डाली। उन्होंने उसका दूसरोंसे पूजन कराया और स्वयं भी उसकी पूजा की; साथ ही वर दिया कि ‘देवि! तुम जगत्में पूजा प्राप्त करो।’ इस प्रकार कल्याणी मनसाको वर प्रदान करके भगवान् अन्तर्धान हो गये।

इस तरह इस मनसादेवीकी सर्वप्रथम भगवान् श्रीकृष्णने पूजा की। तत्पश्चात् शंकर, कश्यप, देवता, मुनि, मनु, नाग एवं मानव आदिसे त्रिलोकीमें श्रेष्ठ व्रतका पालन करनेवाली यह देवी सुपूजित हुई। फिर कश्यपजीने जरत्कारु मुनिके साथ उसका विवाह कर दिया। वे मुनि महान् योगी थे। विवाह करनेके पश्चात् तपस्या करनेमें संलग्न हो गये। वे एक दिन पुष्करक्षेत्रमें उस वटवृक्षके नीचे देवी जरत्कारुकी जाँघपर लेट गये और उन्हें नींद आ गयी। इतनेमें सायंकाल होनेको आया। सूर्यनारायण अस्ताचलको जाने लगे। देवी मनसा परम साध्वी एवं पतिव्रता थी। उसने मनमें विचार किया—‘द्विजोंके लिये