भारतकोश
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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

९९- श्रीकृष्णके गोलोक-गमनका वर्णन

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

७८३

हुई हो; अतः आज मेरे वरदानसे तुम श्रीकृष्णके साथ मिलो! सुन्दरि! मेरी दुर्लभ आज्ञा मानकर तुम अपना उत्तम शृङ्गार करो।

तब पार्वतीकी आज्ञासे प्यारी सखियाँ राधाका शृङ्गार करनेमें जुट गयीं। उन्होंने ईश्वरी राधाको रमणीय रत्नसिंहासनपर बैठाया। फिर तो सखी रत्नमालाने सामनेसे आकर राधाके गलेमें रत्नोंकी माला पहना दी और उनके दाहिने हाथमें मनोहर क्रीड़ा-कमल रख दिया। पद्ममुखीने उनके दोनों चरणकमलोंको महावरसे सुशोभित किया। सुन्दरी गोपीने चन्दनयुक्त सिन्दूरकी परम रुचिर बेंदीसे सीमन्तके अधोभाग—ललाटको सुशोभित किया। सती मालतीने मालतीकी मालाओंसे विभूषित करके ऐसी मनभावनी रमणीय कबरी गूँथकर तैयार की जो मुनियोंके भी मनको मोहे लेती थी। फिर कपोलोंपर कस्तूरी और कुंकुममिश्रित चन्दनसे सुन्दर पत्रभङ्गीकी रचना की। मालावतीने राधाको सुन्दर चम्पाके पुष्पोंकी मनोहर गन्धवाली माला और खिली हुई नवमल्लिका प्रदान की। रति-कार्योंमें रसका ज्ञान रखनेवाली गोपीने परम श्रेष्ठ नायिका राधाको रत्नाभरणोंसे विभूषित करके रति-रसके लिये उत्सुक बनाया। सती ललिताने उनके शरत्कालीन कमल-दलके समान विशाल नेत्रोंको काजलसे आँजकर सुहावनी साड़ी पहननेको दी और महेन्द्रद्वारा दिये गये पारिजातके सुगन्धित पुष्पको उनके हाथमें दिया। सती गोपिका सुशीलाने पतिके पास जाकर किस प्रकार सुशील एवं मधुर यथोचित वचन कहना चाहिये—ऐसी नीतियुक्त शिक्षा दी। राधाकी माता कलावतीने विपत्तिकालमें विस्मृत हुई स्त्रियोंकी षोडश कलाओंका स्मरण कराया। बहिन सुधामूखीने शृङ्गार-विषयसम्बन्धी अमृतोपम वचनकी ओर ध्यान आकर्षित किया। कमलाने शीघ्र ही कमल और चम्पाके चन्दनचर्चित पत्तेपर कोमल रति-शय्या सजायी। स्वयं सती चम्पावतीने चम्पाके सुन्दर पुष्पको चन्दनसे अनुलिप्त करके श्रीकृष्णके लिये दोनेमें सजाकर रखा। फिर उसने श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये केलि-कदम्बोंका पुष्प, मनोहर स्तवक (गुलदस्ता) और कदम्ब-पुष्पोंकी माला तैयार की। कृष्णप्रियाने श्रीकृष्णके लिये कपूर आदिसे सुवासित श्रेष्ठ एवं रुचिर पान तथा सुगन्धित जल उपस्थित किया। इसी समय देवताओं तथा मुनियोंने देखा कि जल-स्थलसहित सारा आश्रम गोरोचनके समान उद्भासित हो रहा है। उस समय तीनों लोकोंमें वास करनेवाले सभी लोगोंने राधिकाके दर्शन किये।

जिनके शरीरकी कान्ति श्वेत चम्पकके समान परम मनोहर एवं अनुपम है; जो ऊर्ध्वरेता मुनियोंके भी मनोंको मोहमें डाल देती हैं; जो सुन्दर केशोंवाली, सुन्दरी, षोडशवर्षीया और वटवृक्षके नीचे मण्डलमें वास करनेवाली हैं; जिनका मुख करोड़ों चन्द्रमाओंकी छबिको छीने लेता है; जो सदा मुस्कराती रहती हैं, जिनके दाँत बड़े सुन्दर हैं; जिनके शरत्कालीन कमलके समान विशाल नेत्र कज्जलसे सुशोभित रहते हैं; जो महालक्ष्मी, बीजरूपा, परमाद्या, सनातनी और परमात्मस्वरूप श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठातृदेवता हैं; परमात्माकी प्राप्तिके लिये जिनकी स्तुति-पूजा की जाती है; जो परा, ब्रह्मस्वरूपा निर्लिप्ता, नित्यरूपा, निर्गुणा, विश्वके अनुरोधसे प्रकृति, भक्तानुग्रहमूर्ति, सत्यस्वरूपा, शुद्ध, पवित्र, पतित-पावनी, उत्तम तीर्थोंको पावन करनेवाली, सत्कीर्तिसम्पन्ना, ब्रह्माकी भी विधाती, महाप्रिया, महती, महाविष्णुकी माता, रासेश्वरकी स्वामिनी, सुन्दरी नायिका, रसिकेश्वरी, अग्निशुद्ध वस्त्र धारण करनेवाली, स्वेच्छारूपा और मङ्गलकी आलय हैं; सात गोपियाँ श्वेत चँवर डुलाकर जिनकी निरन्तर सेवा करती रहती हैं, चार प्यारी सखियाँ जिनके चरणकमलकी सेवामें तत्पर रहती हैं, अमूल्य रत्नोंके बने हुए आभूषण जिनकी

७८४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

शोभा बढ़ा रहे हैं, दोनों मनोहर कुण्डलोंसे जिनके कर्ण और कपोल उद्भासित हो रहे हैं और जिनकी सुन्दर नासिकामें गजमुक्ता लटक रही है, जो गरुड़की चोंचका उपहास करनेवाली है; जिनका शरीर कुंकुम-कस्तूरीमिश्रित सुस्निग्ध चन्दनसे चर्चित है, जिनके कपोल सुन्दर और अङ्ग कोमल हैं; जो कामुकी, गजराजकी-सी चालवाली, कमनीया एवं सुन्दरी नायिका, कामदेवके अस्त्रकी विजयस्वरूपा, कामकी कामनाका लय करनेवाली तथा श्रेष्ठ हैं; जिनके हाथमें प्रफुल्ल क्रीड़ा-कमल, पारिजातका पुष्प और अमूल्य रत्नजटित स्वच्छ दर्पण शोभा पाते हैं; जो नाना प्रकारके रत्नोंकी विचित्रतासे युक्त रत्नसिंहासनपर विराजमान होती हैं, जो परमात्मा श्रीकृष्णके पद्माद्वारा समर्चित मङ्गलस्वरूप चरणकमलका अपने हृदयकमलमें ध्यान करती रहती हैं तथा मन-वचन-कर्मसे स्वप्न अथवा जाग्रत् कालमें श्रीकृष्णकी प्रीति और प्रेम-सौभाग्यका नित्य नूतन रूपमें स्मरण करती रहती हैं; जो प्रगाढ़भावानुरक्त, शुद्धभक्त, पतिव्रता, धन्या, मान्या, गौरवार्णा, निरन्तर श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर वास करनेवाली, प्रियाओं तथा प्रिय भक्तोंमें परम प्रिय, प्रियवादिनी, श्रीकृष्णके वामाङ्गसे आविर्भूत, गुण और रूपमें अभिन्न, गोलोकमें वास करनेवाली, देवाधिदेवी, सबके ऊपर विराजमान, गोपीश्वरी, गुप्तिरूपा, सिद्धिदा, सिद्धिरूपिणी, ध्यानद्वारा असाध्य, दुराराध्य, सद्‍भक्तोंद्वारा वन्दित और पुण्यक्षेत्र भारतमें वृषभानु-नन्दिनीके रूपमें प्रकट हुई हैं; उन राधाकी मैं वन्दना करता हूँ। जो ध्यानपरायण मानव समाधि-अवस्थामें ध्याननिष्ठ हो राधाका ध्यान करते हैं; वे इस लोकमें तो जीवन्मुक्त हैं ही, परलोकमें श्रीकृष्णके पार्षद होते हैं। तदनन्तर लोकोंके विधाता स्वयं ब्रह्माने ब्रह्माओंकी जननी परमेश्वरी राधाको देखकर सर्वप्रथम स्तुति करना आरम्भ किया।

ब्रह्मा बोले—परमेश्वरि! मेरा चित्त तुम्हारे पादपद्मके मधुर मधुमें लुब्ध हो गया था; अतः उस मधुव्रतके लोभसे प्रेरित होकर मैंने पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें स्थित पुष्करतीर्थमें जाकर साठ हजार दिव्य वर्षोंतक तपस्या की; तथापि तुम्हारा अभीष्ट चरणकमल मुझे प्राप्त नहीं हुआ। यहाँतक कि मुझे स्वप्नमें भी उसका दर्शन नहीं हुआ। तब उस समय यों आकाशवाणी हुई—'ब्रह्मन्! वाराहकल्पमें भारतवर्षमें वृन्दावन नामक पुण्यवनमें स्थित 'सिद्धाश्रम' में तुम्हें गणेशके चरणकमलका दर्शन होगा। तुम तो विषयी हो, अतः तुम्हें राधा-माधवकी दासता कहाँसे प्राप्त होगी? इसलिये महाभाग! तुम उससे निवृत्त हो जाओ; क्योंकि वह परम दुर्लभ है।' यों सुनकर मेरा मन टूट गया और मैं उस तपस्यासे विरत हो गया। पर उस तपस्याके फलस्वरूप मेरा वह मनोरथ आज परिपूर्ण हो गया।

श्रीमहादेवजीने कहा—देवि! ब्रह्मा आदि देवता, मुनिगण, मनु, सिद्ध, संत और योगीलोग ध्याननिष्ठ हो जिनके चरणकमलका, जो पद्माद्वारा कमल-पुष्पोंसे समर्चित एवं अत्यन्त दुर्लभ है, निरन्तर ध्यान करते रहते हैं; परंतु स्वप्नमें भी उसका दर्शन नहीं कर पाते, तुम उन्हींके वक्षः-स्थलपर वास करनेवाली हो।

अनन्त बोले—सुव्रते! वेद, वेदमाता, पुराण, मैं (शेषनाग), सरस्वती और संतगण तुम्हारी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं।

नारद! इस प्रकार वहाँ जितने देव, देवी तथा अन्यान्य मुनि,मनु आदि आये थे, उन सबने विनम्रभावसे राधाका स्तवन किया। यह देखकर रुक्मिणी आदि महिलाओंका मुख लज्जासे झुक गया। उन्होंने अपने शोकोच्छ्वाससे रत्नदर्पणको मलिन कर दिया। निराहारा कृशोदरी सत्यभामा तो मृतक-तुल्य हो गयी, उसके मनका सारा गर्व गल गया।

(अध्याय १२३)


श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७८५

वसुदेवजीका शंकरजीसे भव-तरणका उपाय पूछना, शंकरजीका उन्हें ज्ञानोपदेश देकर राजसूय-यज्ञ करनेका आदेश देना, वसुदेवजीद्वारा राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान और यज्ञान्तमें सर्वस्व दक्षिणामें देकर उनका द्वारकाको लौटना

नारदजीने पूछा—विभो! गणेशपूजन और राधास्तोत्रसे बढ़कर वहाँ कौन-सी रहस्यमयी घटना घटित हुई; उसका मुझसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।

श्रीभगवान् बोले—नारद! गणेशपूजन-तीर्थमें जितने देवता, मुनि और योगीन्द्र पधारे हुए थे; वे सभी वटवृक्षके नीचे समासीन थे। उनमेंसे शम्भु, ब्रह्मा, शेषनाग और श्रेष्ठ मुनियोंसे वसुदेव और देवकीने परमादरपूर्वक यों प्रश्न किया—'हे महाभाग! आपलोग दीनोंके बन्धु हैं; अतः शीघ्र ही बताइये कि हम दीनोंके लिये इस भवसागरसे पार करनेवाला कौन-सा उत्तम साधन है? आपलोग भवसागरसे पार करनेवाली नौकाके नाविक हैं; क्योंकि न तो तीर्थ ही केवल जलमय हैं और न देवगण ही केवल मिट्टी और पत्थरकी मूर्तिमात्र होते हैं। जितने यज्ञ, पुण्य, व्रत-उपवास, तप, अनेकविध दान, विप्रों और देवताओंकी अर्चनाएँ हैं; ये सभी चिरकालमें कर्ताको पावन बनाती हैं; परंतु वैष्णवजन दर्शनसे ही पवित्र कर देते हैं। विष्णुभक्त संतोंके पावन चरणकमलोंकी रजके स्पर्शमात्रसे वसुन्धरा तत्काल ही पावन हो जाती है और तीर्थ, समुद्र तथा पर्वत भी पवित्र हो जाते हैं। देवगण भी उन वैष्णवोंके पातकरूपी ईंधनका विनाश कर देनेवाले दर्शनकी अभिलाषा करते हैं। जैसे दूध, दही और रस परम स्वादिष्ट होते हैं; उसी प्रकार ज्ञान परमानन्ददायक होता है। उस ज्ञानको जो ज्ञानीके साहचर्यसे नहीं समझ पाता, वह अज्ञानी है। ज्ञानियोंके गुरुके भी गुरु भगवन्! जैसे मैं श्रीकृष्णका पिता और चिरकालका सङ्गी हूँ; उसी तरह देवकी भी उनकी माता है। वसुदेवजीकी बात सुनकर स्वयं भगवान् शंकर, जो चारों वेदोंके भी जनक एवं गुरु हैं, हँस पड़े और इस प्रकार बोले।'

श्रीमहादेवजीने कहा—अहो! ज्ञानियोंके संनिकट रहना भी उनके अनादरका ही कारण होता है; जैसे गङ्गाके जलसे पवित्र हुए लोग भी (गङ्गाका अनादर करके) सिद्धिके लिये अन्य तीर्थोंमें जाते हैं। वासुदेवके पिता ये वसुदेव स्वयं पण्डित हैं और अपने पिता वसुस्वरूप ज्ञानी कश्यपके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। इनकी श्रीकृष्णमें पुत्र-बुद्धि है; इसीलिये ये श्रीकृष्णके अङ्गभूत हमलोगोंसे ज्ञान पूछ रहे हैं।

तदनन्तर श्रीमहादेवजीने सर्वकारणकारण भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन करके कहा—'यदुवंशी वसुदेव! सर्वेश्वर श्रीकृष्ण ही सबके मूलरूप हैं; अतः राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान करके उसमें अपने पुत्र श्रीकृष्णकी, जो यज्ञके कारण एवं यज्ञेश हैं, समर्चन करो; फिर विधिपूर्वक दक्षिणा देकर भवसागरसे पार हो जाओ।'

मुने! शिवजीका कथन सुनकर जितेन्द्रिय वसुदेवजीने सामग्री जुटाकर शुभ मुहूर्तमें राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान किया। उस यज्ञमें साक्षात् यज्ञेश और दक्षिणासहित ये यज्ञ वर्तमान थे; अतः देवताओंने साक्षात् प्रकट होकर वसुदेवजीके हव्यको ग्रहण किया। तदनन्तर जब वसुदेवजी पूर्णाहूति दे चुके; तब श्रीकृष्णकी आज्ञासे भगवान् सनत्कुमारने उनसे सर्वस्व दक्षिणामें देनेके लिये कहा। तब जिनके नेत्र और मुख प्रफुल्लित थे; उन वसुदेवजीने श्रीसनत्कुमारजीके आदेशानुसार ब्राह्मणोंको सर्वस्व दक्षिणारूपमें प्रदान कर दिया और ब्राह्मणोंके शुभ मुखोंद्वारा देवताओंको तृप्त

७८६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

किया। तत्पश्चात् देवगण और मुनिसमुदाय उस रातमें अपनी पत्नियोंके साथ वहाँ सुखपूर्वक रहे और प्रातःकाल होनेपर वे सभी श्रीकृष्णकी अनुमतिसे अपने-अपने स्थानको चले गये। तब सभी यदुवंशी भी रुक्मिणीकी दृष्टि पड़नेसे अमूल्य रत्नोंसे परिपूर्ण एवं श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित द्वारकाको प्रस्थान कर गये।

(अध्याय १२४)


राधा और श्रीकृष्णका पुनः मिलाप, राधाके पूछनेपर श्रीकृष्णद्वारा अपना तथा राधाका रहस्योद्घाटन

**श्रीनारायण कहते हैं—**नारद! इस प्रकार माधवने यादवों, देवों, मुनियों तथा अन्यान्य व्यक्तियों और देवियोंके साथ गणेश-पूजनका कार्य सम्पन्न किया। तत्पश्चात् वे अपने एक अंशसे रुक्मिणी आदि देवियोंके साथ रमणीय द्वारकापुरीको चले गये; किंतु स्वयं साक्षात्रूपसे सिद्धाश्रममें ही ठहर गये। वहाँ वे गोलोकवासी गोप-सखाओं, नन्द तथा माता यशोदा-गोपीके साथ प्रेमपूर्वक वार्तालाप करके पुनः माता, पिता, गोकुलवासी गोपों तथा बन्धुवर्गोंसे नीतियुक्त यथोचित वचन बोले।

**श्रीभगवान्ने कहा—**पिताजी! अब अपने व्रजको लौट जाओ। परम श्रेष्ठ यशस्विनी माता यशोदे! तुम भी उत्तम गोकुलको जाओ और वहाँ आयुके शेष कालपर्यन्त भोगोंका उपभोग करो। इतना कहकर भगवान् श्रीकृष्ण माता-पिताकी आज्ञा ले राधिकाके स्थानको चले गये तथा नन्दजी गोकुलको प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचकर श्रीकृष्णने मुस्कराती हुई सुन्दरी राधाको देखा। उनकी तरुणता नित्य स्थिर रहनेवाली थी, जिससे उनकी अवस्था द्वादश वर्षकी थी। मोतियोंका हार उनकी शोभा बढ़ा रहा था; वे रत्ननिर्मित ऊँचे आसनपर विराजमान थीं। उस समय मुस्कराती हुई असंख्य गोपियाँ हाथोंमें बेंत लिये उन्हें घेरे हुए थीं।

उधर प्राणवल्लभा राधाने भी दूरसे ही श्रीकृष्णको आते देखा। उनका परम सौन्दर्यशाली सुन्दर बालक-वेष था। वे मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे। उनके शरीरकी कान्ति नवीन मेघके समान श्याम थी; वे रेशमी पीताम्बर धारण किये हुए थे; उनका सर्वाङ्ग चन्दनसे अनुलिप्त था; रत्नोंके आभूषण उन्हें सुशोभित कर रहे थे; उनकी शिखामें मयूर-पिच्छ शोभा दे रहा था; वे मालतीकी मालासे विभूषित थे; उनका प्रसन्नमुख मन्द हास्यकी छटा बिखेर रहा था; वे साक्षात् भक्तानुग्रहमूर्ति थे तथा मनोहर प्रफुल्ल क्रीड़ाकमल लिये हुए थे; उनके एक हाथमें मुरली और दूसरे हाथमें सुप्रशस्त दर्पण शोभा पा रहा था। उन्हें देखकर राधा तुरंत ही गोपियोंके साथ उठ खड़ी हुईं और परम भक्तिपूर्वक उन परमेश्वरको सादर प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगीं।

**राधिका बोलीं—**नाथ! तुम्हारे मुखचन्द्रको देखकर आज मेरा जन्म लेना सार्थक और जीवन धन्य हो गया तथा मेरे नेत्र और मन परम प्रसन्न हो गये। पाँचों प्राण स्नेहार्द्र और आत्मा हर्षविभोर हो गया; दुर्लभ बन्धुदर्शन दोनों (द्रष्टा और दृश्य)-के हर्षका कारण होता है। विरहाग्निसे जली हुई मैं शोकसागरमें डूब रही थी। तुमने अपनी पीयूषवर्षिणी दृष्टिसे मेरी ओर निहारकर मुझे भलीभाँति अभिषिक्त कर दिया; जिससे मेरा ताप जाता रहा। तुम्हारे साथ रहनेपर मैं शिवा, शिवप्रदा, शिवबीजा और

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

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शिवस्वरूपा हूँ; किंतु तुमसे वियुक्त हो जानेपर मैं अदृष्ट हो जाती हूँ और मेरी सारी चेष्टाएँ नष्ट हो जाती हैं। तुम्हारे समीप स्थित रहनेपर देह शोभासम्पन्न, पवित्र और सर्वशक्तिस्वरूप दीखता है; परंतु तुम्हारे चले जानेपर वह शवरूप हो जाता है। नाथ! स्त्री-पुरुषका सामान्य वियोग भी अत्यन्त दारुण होता है। यहाँ तो परमात्माके वियोगसे पाँचों प्राण शक्तियोंके सहित ही निकल जाते हैं।

यों कहकर देवी राधिकाने परमात्मा श्रीकृष्णको अपने आसनपर बैठाया और हर्षपूर्वक उनके चरणोंकी पूजा की। तत्पश्चात् शोभाशाली श्रीकृष्ण राधाके साथ रत्नसिंहासनपर विराजमान हुए। उस समय गोपियाँ निरन्तर श्वेत चँवर डुलाकर उनकी सेवा कर रही थीं। चन्दनाने श्रीहरिके शरीरमें सुगन्धित चन्दनका अनुलेप किया। मुस्कराती हुई रत्नमालाने श्रीहरिके गलेमें रत्नमाला पहनायी। सती पद्मावतीने पद्माद्वारा कमल-पुष्पोंसे समर्चित चरणकमलमें जल, दूब, पुष्प और चन्दनयुक्त अर्घ्य प्रदान किया। मालतीने श्रीहरिकी चूड़ाको मालतीकी मालासे सुशोभित किया। सती पार्वतीने चम्पाके पुष्पका पुटक समर्पित किया। पारिजाताने हर्षमग्न हो श्रीहरिको पारिजात-पुष्प, कपूरयुक्त ताम्बूल और सुवासित शीतल जल निवेदित किया। कदम्बमालाने कदम्ब-पुष्पोंकी शुभ माला, प्रफुल्लित क्रीड़ा-कमल और अमूल्य रत्नदर्पण समर्पित किया। सुकोमला कमलाने पूर्वकालमें वरुणद्वारा दिये हुए दोनों सुन्दर वस्त्रोंको श्रीहरिके हाथमें ही रख दिया। सुन्दरी वधूने साक्षात् श्रीहरिको गोरोचनकी-सी आभावाले एवं मधुर मधुसे परिपूर्ण मधुपत्र दिया। सुधामुखीने भक्तिपूर्वक अमृतसे लबालब भरा हुआ अमृतपात्र प्रदान किया। किसी दूसरी गोपीने प्रफुल्लित मालती-पुष्पोंके मालाजालसे विभूषित एवं चन्दनचर्चित पुष्पशय्या तैयार की। वह शय्या एक ऐसे परम मनोहर भवनमें सजायी गयी थी, जिसका निर्माण बहुमूल्य रत्नोंके सारभागसे हुआ था; श्रेष्ठ मणि, मोती, माणिक्य और हीरोंके हार जिसकी विशेष शोभा बढ़ा रहे थे; कस्तूरी और कुंकुमयुक्त वायु जिसे सुगन्धित बना रही थी; जलते हुए सैकड़ों रत्नदीपोंसे जो उद्दीप्त हो रहा था और नाना प्रकारकी वस्तुओंसे समन्वित धूपोंद्वारा जो निरन्तर धूपित रहता था। वहाँ रतिकरी शय्याका निर्माण करके गोपियाँ हँसती हुई चली गयीं। तब एकान्तमें मनको आकर्षित करनेवाली उस परम रमणीय शय्याको देखकर राधा-माधव उसपर विराजमान हुए। उस समय सती राधाने माधवके गलेमें माला पहनायी, मुखमें सुवासित ताम्बूलका बीड़ा दिया; फिर श्यामसुन्दरके वक्षःस्थलपर कस्तूरी-कुंकुमयुक्त चन्दनका अनुलेप किया, उनकी शिखामें चम्पाका सुन्दर पुष्प लगाया, हाथमें सहस्रदलयुक्त क्रीड़ा-कमल दिया और उनके हाथसे मुरली छीनकर उसमें रत्नदर्पण पकड़ा दिया तथा उनके आगे पारिजातका खिला हुआ रुचिर पुष्प रख दिया। तत्पश्चात् जो शान्तिमूर्ति, कमनीय और नायिकाके मनको हर लेनेवाले हैं तथा मन्द-मन्द मुस्करा रहे थे; उन प्रियतम श्रीकृष्णसे राधा एकान्तमें मुस्कराती हुई मधुर वचन बोलीं।

**श्रीराधिकाने कहा—**नाथ! जो स्वयं मङ्गलोंका भण्डार, सम्पूर्ण मङ्गलोंका कारण, मङ्गलरूप तथा मङ्गलोंका प्रदाता है, उसके विषयमें कुशल-मङ्गलका प्रश्न करना तो निष्फल ही है; तथापि इस समय कुशल पूछना समयानुसार उचित है; क्योंकि लौकिक व्यवहार वेदोंसे भी बली माना जाता है। इसलिये रुक्मिणीकान्त! सत्यभामाके प्राणपति! इस समय

१००- नारायणके आदेशसे नारदका विवाहके लिये उद्यत हो ब्रह्मलोकमें जाना, ब्रह्माका दल-बलके साथ राजा सृंजयके पास आना, सृंजय-कन्या और नारदका विवाह, सनत्कुमारद्वारा नारदको श्रीकृष्ण-मन्त्रोपदेश, महादेवजीका उन्हें श्रीकृष्णका ध्यान और जप-विधि बतलाना, तपके अन्तमें नारदका शरीर त्यागकर श्रीहरिके पादपद्ममें लीन होना

७८८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कुशल तो है न ? तदनन्तर श्रीराधाने भगवान् श्रीकृष्णसे उनके स्वरूप तथा अवतार-लीलाके सम्बन्धमें प्रश्न किया।

तब श्रीकृष्ण बोले—राधे! जिसे सुनकर मूर्ख हलवाहा भी तत्काल ही पण्डित हो जाता है, उस सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक ज्ञानका मैं वर्णन करता हूँ, सुनो। राधे! मैं स्वभावसे ही सब लोकोंका स्वामी हूँ, फिर रुक्मिणी आदि महिलाओंकी तो बात ही क्या है। मैं कार्य-कारणरूपसे पृथक्-पृथक् व्यक्त होता हूँ। मैं स्वयं ज्योतिर्मय हूँ, समस्त विश्वोंका एकमात्र आत्मा हूँ और तृणसे लेकर ब्रह्मापर्यन्त सम्पूर्ण प्राणियोंमें व्यास हूँ। गोलोकमें मैं स्वयं परिपूर्णतम श्रीकृष्णरूपसे वर्तमान रहता हूँ और रमणीय क्षेत्र गोकुलके 'वृन्दावन' नामक वनमें मैं ही राधापति हूँ। उस समय मैं द्विभुज होकर गोपवेषमें शिशुरूपसे क्रीड़ा करता हूँ; ग्वाले, गोपियाँ और गौएँ ही मेरी सहायक होती हैं। वैकुण्ठमें मैं चतुर्भुजरूपसे रहता हूँ; वहाँ मैं ही लक्ष्मी और सरस्वतीका प्रियतम हूँ और सदा शान्तरूपसे वास करता हूँ। इस प्रकार मैं सनातन परमेश्वर ही दो रूपोंमें विभक्त हूँ। भूतलपर, श्वेतद्वीप और क्षीरसागरमें मानसी, सिन्धुकन्या और मर्त्यलक्ष्मीके जो पति हैं, वह भी मैं ही हूँ और वहाँ भी मैं चतुर्भुजरूपसे ही रहता हूँ। मैं स्वयं नारायण ऋषि हूँ और धर्मवक्ता, धर्मिष्ठ तथा धर्म-मार्गके प्रवर्तक सनातन धर्म नर हैं। धर्मिष्ठा तथा पतिव्रता शान्ति लक्ष्मीस्वरूपा है और इस पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें मैं उसका पति हूँ। मैं ही सिद्धेश्वर, सिद्धियोंके दाता और साक्षात् कपिल हूँ। सुन्दरि! इस प्रकार व्यक्तिभेदसे मैं नाना रूप धारण करता हूँ। चतुर्भुजरूपधारी मैं ही सदा द्वारकामें रुक्मिणीका स्वामी होता हूँ, क्षीरसागरमें शयन करनेवाला मैं ही सत्यभामाके शुभ भवनमें वास करता हूँ तथा अन्यान्य रानियोंके महलोंमें मैं ही पृथक्-पृथक् शरीर धारण करके क्रीड़ा करता हूँ। मैं नारायण ऋषि ही इस अर्जुनका सारथि हूँ। अर्जुन नर-ऋषि है, धर्मका पुत्र है, बलवान् है और मेरे अंशसे भूतलपर उत्पन्न हुआ है। उसने पुष्करक्षेत्रमें सारथि-कार्यके लिये तपस्याद्वारा मेरी आराधना की है।

राधे! जैसे तुम गोलोकमें राधिकादेवी हो, उसी तरह गोकुलमें भी हो। तुम्हीं वैकुण्ठमें महालक्ष्मी और सरस्वती हो। क्षीरोदशायीकी प्रियतमा मर्त्यलक्ष्मी तुम्हीं हो। धर्मकी पुत्रवधू लक्ष्मीस्वरूपिणी शान्तिके रूपमें तुम्हीं वर्तमान हो। भारतवर्षमें कपिलकी प्यारी पत्नी सती भारती तुम्हारा ही नाम है। तुम्हीं मिथिलामें सीता नामसे विख्यात हो। सती द्रौपदी तुम्हारी ही छाया है। द्वारकामें महालक्ष्मीके अंशसे प्रकट हुई सती रुक्मिणीके रूपमें तुम्हीं वास करती हो। पाँचों पाण्डवोंकी पत्नी द्रौपदी तुम्हारी कला है। तुम्हीं रामकी पत्नी सीता हो; रावणने तुम्हारा ही अपहरण किया था। सति! जैसे तुम अपनी छाया और कलासे नाना रूपोंमें प्रकट हो, वैसे ही मैं भी अपने अंश और कलासे अनेक रूपोंमें व्यक्त हूँ। मैं ही परिपूर्णतम परात्पर परमात्मा हूँ। सती राधे! इस प्रकार मैंने तुम्हें यह सारा आध्यात्मिक ज्ञान बता दिया। परमेश्वरि! अब तुम मेरे सारे अपराधोंको क्षमा कर दो। श्रीकृष्णका कथन सुनकर राधिका तथा सभी गोपिकाओंको महान् हर्ष हुआ। वे सभी परमेश्वर श्रीकृष्णको प्रणाम करने लगीं। (अध्याय १२५)

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७८९

श्रीकृष्णका राधाके साथ विभिन्न स्थलोंमें विहार करके पुनः गोकुलमें जाना, वहाँ उनका स्वागत-सत्कार, यशोदाका राधसहित श्रीकृष्णको महलमें ले जाना और मङ्गल-महोत्सव करना

तदनन्तर राधिकाने कहा—महाभाग! अब पुण्यमय वृन्दावनमें स्थित रासमण्डलको चलिये; वहाँ मैं आपके साथ जलमें तथा स्थलपर क्रीड़ा करूँगी। पुनः मलयपर्वत और सुन्दर मणिमन्दिरको चलूँगी। इनके अतिरिक्त जो दूसरे रहस्यमय स्थान हैं, जिन्हें मैंने जन्मसे लेकर आजतक सुना ही नहीं है; उन-उन स्थानोंमें भी आपके साथ चलूँगी—ऐसी मेरी उत्कृष्ट लालसा है।

यों परस्पर वार्तालाप करते ही वह मङ्गलमयी रात्रि व्यतीत हो गयी। अरुणोदय बेला आ पहुँची तथापि सती राधाने माधवको छोड़ना नहीं चाहा। तब श्रीकृष्णने युक्तिपूर्वक प्रेमभरे वचनोंसे राधाको समझाया। तदनन्तर शरत्कालीन कमलके-से विशाल नेत्रोंवाले श्रीहरि प्रातःकृत्य समाप्त करके राधा तथा गोपियोंके साथ एक ऐसे रथपर सवार हुए, जो गोलोकसे आया था। वह मनोहर तथा मनके समान वेगशाली रथ एक योजन लंबा-चौड़ा था, उसमें सहस्रों पहिये लगे थे, बहुमूल्य मणियोंके बने हुए तीन सौ करोड़ चमकीले गृहोंसे वह सुशोभित था, तीन करोड़ मणिस्तम्भों और रत्नोंकी झालरोंसे उसकी विशेष शोभा हो रही थी; मुक्ता, माणिक्य और उत्तम हीरेके हारोंसे वह परम सुहावना लग रहा था; वह नाना प्रकारकी विचित्र चित्रकारियों, श्वेत चँवर और दर्पणों, अग्निशुद्ध चमकीले वस्त्रों और मालासमूहोंसे विभूषित था; उसमें रत्नोंकी बनी हुई पुष्पचन्दनचर्चित अनेकों शय्याएँ शोभा दे रही थीं, समान रूप और वेशवाली लाखों गोपियोंसे वह समावृत था और उसे एक हजार घोड़े खींच रहे थे। उस रथसे भगवान् पुनः वृन्दावनमें गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने रात्रिके समय जलस्थलपर विहार किया और राधिकाको वहाँके सभी पदार्थोंका इस रूपमें दिखलाया, मानो सभी नवीन प्रकट हुए हों।

पुनः सुन्दर शृङ्गार करके वनों और उपवनोंमें, विस्यन्दक, सुरसन, माहेन्द्र और नन्दनवनमें, सुमेरुकी चोटी तथा रमणीय गन्धमादन पर्वतपर, सुन्दर-सुन्दर पर्वत, कन्दरा और वनमें, अत्यन्त गुप्त पुष्पोद्यानोंमें, प्रत्येक नदियों और नदोंके जलमें, समुद्रके तटपर, पारिजात-वृक्षोंके मनोहर वनमें सुभद्र, पुष्पभद्र और नारायण सरोवरपर, पवनके आवासस्थान तथा देवताओंकी निवासभूमि मलय पर्वतपर, त्रिकूट, भद्रकूट, पञ्चकूट और सुकूटपर, देवोंकी स्वर्णमयी कमनीय भूमिपर, प्रत्येक समुद्रपर तथा मनोहर द्वीपमें, श्रेष्ठ स्वर्गलोकमें, पुण्यमय रुचिर चन्द्रसरोवरपर और मुनियोंके आश्रमोंके आस-पास उन्होंने राधाके साथ विहार किया। पुनः शीघ्र ही पुण्यप्रद जम्बूद्वीपमें आकर द्वारका तथा रैवतक पर्वतको दिखलाया। फिर गोप और गो-समूहसे व्याप्त गोकुलमें आये। वहाँ भाण्डीरवटको देखकर वे पुण्यमय वृन्दावनमें गये।

श्रीकृष्णका आगमन सुनकर नन्द, यशोदा और बूढ़े गोप तथा गोपियोंकी आकुलता जाती रही और उनके नेत्रोंमें हर्षके आँसू छलक आये। फिर तो उन्होंने गजराज, नटी, नट, नर्तक, पति-पुत्रवती साध्वी ब्राह्मणी और ब्राह्मणोंको आगे करके उनका उसी प्रकार स्वागत किया, जैसे देवगण अग्निका करते हैं। तब माधव नन्द तथा माता यशोदाको देखकर राधाके साथ बालकृष्ण-रूपमें उनके निकट आये। फिर मधुसूदन हँसकर माताकी गोदमें जा बैठे। तब यशोदासहित नन्द उनका मुख-कमल चूमने लगे और स्नेहवश छातीसे लगाकर नेत्रोंके अश्रुजलसे उन्हें सींचने

१०१- पुराणोंके लक्षण और उनकी श्लोक-संख्याका निरूपण, ब्रह्मवैवर्तपुराणके पठन-श्रवणके माहात्म्यका वर्णन करके सूतजीका सिद्धाश्रमको प्रयाण

७९० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण लगे। उधर स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण यशोदाका स्तनपान करनेमें जुट गये। उस समय सभी लोगोंने श्रीकृष्णको उसी रूपमें देखा, जिस रूपमें वे मथुरा गये थे। उनके हाथमें मुरली शोभा पा रही थी, वे रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित थे, उनकी ग्यारह वर्षकी किशोर अवस्था थी, पीताम्बर उनकी शोभा बढ़ा रहा था, शिखामें मयूरपिच्छकी निराली छटा थी और वे मालतीकी मालाओंसे सुसज्जित थे। तत्पश्चात् यशोदा राधासहित माधवको महलके भीतर लिवा ले गयीं। वहाँ उन्होंने माङ्गलिक कार्य सम्पन्न करके ब्राह्मणोंको भोजन कराया और गोपियोंका उसी प्रकार पूजन किया जैसे लोग मुनियोंका करते हैं। फिर आनन्दमग्न हो ब्राह्मणोंको मणि, रत्न, मूँगा, उत्तम सुवर्ण, मोती, माणिक्य, हीरा, गजरत्न, गोरत्न, मनोहर अश्वरत्न, धान्य, फसल लगी हुई खेती और वस्त्र दान किये। राधाके साथ माधवको अपूर्व वस्तुका दर्शन कराया। नारद ! फिर गोपियोंको भी आदरपूर्वक मिष्टान्नका भोजन कराया, दुन्दुभियाँ बजवायीं, मङ्गल कराया और देवगणोंको आनन्दपूर्वक मनोहर पदार्थोंका भोग समर्पित किया। (अध्याय १२६) श्रीकृष्णद्वारा नन्दको ज्ञानोपदेश और राधा-कलावती आदि गोपियोंका गोलोक-गमन श्रीनारायण कहते हैं— नारद! जहाँ पहले ब्राह्मणपत्नियोंने श्रीकृष्णको अन्न दिया था; उस भाण्डीर-वटकी छायामें श्रीकृष्ण स्वयं विराजमान हुए और वहीं समस्त गोपोंको बुलवा भेजा। श्रीहरिके वामभागमें राधिकादेवी, दक्षिणभागमें यशोदासहित नन्द, नन्दके दाहिने वृषभानु और वृषभानुके बायें कलावती तथा अन्यान्य गोप, गोपी, भाई-बन्धु तथा मित्रोंने आसन ग्रहण किया। तब गोविन्दने उन सबसे समयोचित यथार्थ वचन कहा। श्रीभगवान् बोले- नन्द ! इस समय जो समयोचित, सत्य, परमार्थ और परलोकमें सुखदायक है; उसका वर्णन करता हूँ, सुनो। ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सभी पदार्थ बिजलीकी चमक, जलके ऊपर की हुई रेखा और पानीके बुलबुलेके समान भ्रमरूप ही हैं- ऐसा जानो। मैंने मथुरामें तुम्हें सब कुछ बतला दिया था, कुछ भी उठा नहीं रखा था। उसी प्रकार कदलीवनमें राधिकाने यशोदाको समझाया था। वही परम सत्य भ्रमरूपी अन्धकारका विनाश करनेके लिये दीपक है; इसलिये तुम मिथ्या मायाको छोड़कर उसी परम पदका स्मरण करो। वह पद जन्म-मृत्यु-जरा- व्याधिका विनाशक, महान् हर्षदायक, शोक- संतापका निवारक और कर्ममूलका उच्छेदक है। मुझ परम ब्रह्म सनातन भगवान्‌का बारंबार ध्यान करके तुम उस परम पदको प्राप्त करो। अब कर्मकी जड़ काट देनेवाले कलियुगका आगमन संनिकट है; अतः तुम शीघ्र ही गोकुलवासियोंके साथ गोलोकको चले जाओ। तदनन्तर भगवान्ने कलियुगके धर्म तथा लक्षणोंका वर्णन किया। विप्रवर ! इसी बीच वहाँ व्रजमें लोगोंने सहसा गोलोकसे आये हुए एक मनोहर रथको देखा। वह रथ चार योजन विस्तृत और पाँच योजन ऊँचा था; बहुमूल्य रत्नोंके सारभागसे उसका निर्माण हुआ था। वह शुद्ध स्फटिकके समान उद्भासित हो रहा था; विकसित पारिजात- पुष्पोंकी मालाओंसे उसकी विशेष शोभा हो रही थी; वह कौस्तुभमणयोंके आभूषणोंसे विभूषित था; उसके ऊपर अमूल्य रत्नकलश चमक रहा था; उसमें हीरेके हार लटक रहे थे; वह सहस्रों

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७९१ करोड़ मनोहर मन्दिरोंसे व्याप्त था; उसमें दो हजार पहिये लगे थे और दो हजार घोड़े उसका भार वहन कर रहे थे तथा उसपर सूक्ष्म वस्त्रका आवरण पड़ा हुआ था एवं वह करोड़ों गोपियोंसे समावृत था। नारद ! राधा और धन्यवादकी पात्र कलावती देवीका जन्म किसीके गर्भसे नहीं हुआ था। यहाँतक कि गोलोकसे जितनी गोपियाँ आयी थीं; वे सभी अयोनिजा थीं। उसके रूपमें श्रुतिपत्नियां ही अपने शरीरसे प्रकट हुई थीं। वे सभी श्रीकृष्णकी आज्ञासे अपने नश्वर शरीरका त्याग करके उस रथपर सवार हो उत्तम गोलोकको चली गयीं। साथ ही राधा भी गोकुलवासियोंके साथ गोलोकको प्रस्थित हुईं। ब्रह्मन् ! मार्गमें उन्हें विरजा नदीका मनोहर तट दीख पड़ा, जो नाना प्रकारके रत्नोंसे विभूषित था। उसे पार करके वे शतशृङ्ग पर्वतपर गयीं। वहाँ उन्होंने अनेक प्रकारके मणिसमूहोंसे व्याप्त सुसज्जित रासमण्डलको देखा। उससे कुछ दूर आगे जानेपर पुण्यमय वृन्दावन मिला। आगे बढ़नेपर अक्षयवट दिखायी दिया, उसकी करोड़ों शाखाएँ चारों ओर फैली हुई थीं। वह सौ योजन विस्तारवाला और तीन सौ योजन ऊँचा था और लाल रंगके बड़े-बड़े फलसमूह उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके नीचे मनोहर वृन्दा हजारों-करोड़ों गोपियोंके साथ विराजमान थीं। उसे देखकर राधा तुरंत ही रथसे उतरकर आदरसहित मुस्कराती हुई उसके निकट गयीं। वृन्दाने राधाको नमस्कार किया। तत्पश्चात् रासेश्वरी राधासे वार्तालाप करके वह उन्हें अपने महलके भीतर लिवा ले गयी। वहाँ वृन्दाने राधाको हीरेके हारोंसे समन्वित एक रमणीय रत्नसिंहासनपर बैठाया और स्वयं उनकी चरणसेवामें जुट गयी। सात सखियाँ श्वेत चँवर डुलाकर उनकी सेवा करने लगीं। इतनेमें परमेश्वरी राधाको देखनेके लिये सभी गोपियाँ वहाँ आ पहुँचीं। तब राधाने नन्द आदिके लिये पृथक्-पृथक् आवासस्थानकी व्यवस्था की। तदनन्तर परमानन्दरूपा गोपिका राधा परमानन्दपूर्वक सबके साथ अपने परम रुचिर भवनको प्रस्थित हुईं। (अध्याय १२७) श्रीकृष्णके गोलोक-गमनका वर्णन श्रीनारायण कहते हैं - नारद ! परिपूर्णतम प्रभु भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ तत्काल ही गोकुलवासियोंके सालोक्य मोक्षको देखकर भाण्डीरवनमें वटवृक्षके नीचे पाँच गोपोंके साथ ठहर गये। वहाँ उन्होंने देखा कि सारा गोकुल तथा गो-समुदाय व्याकुल है। रक्षकोंके न रहनेसे वृन्दावन शून्य तथा अस्त- व्यस्त हो गया है। तब उन कृपासागरको दया आ गयी। फिर तो, उन्होंने योगधारणाद्वारा अमृतकी वर्षा करके वृन्दावनको मनोहर, सुरम्य और गोपों तथा गोपियोंसे परिपूर्ण कर दिया। साथ ही गोकुलवासी गोपोंको ढाढस भी बँधाया। तत्पश्चात् वे हितकर नीतियुक्त दुर्लभ मधुर वचन बोले। श्रीभगवान्ने कहा- हे गोपगण ! हे बन्धो ! तुमलोग सुखका उपभोग करते हुए शान्तिपूर्वक यहाँ वास करो; क्योंकि प्रियाके साथ विहार, सुरम्य रासमण्डल और वृन्दावन नामक पुण्यवनमें श्रीकृष्णका निरन्तर निवास तबतक रहेगा, जबतक सूर्य और चन्द्रमाकी स्थिति रहेगी। तत्पश्चात् लोकोंके विधाता ब्रह्मा भी भाण्डीरवनमें आये। उनके पीछे स्वयं शेष, धर्म, भवानीके साथ स्वयं शंकर, सूर्य, महेन्द्र, चन्द्र, अग्नि, कुबेर, वरुण, पवन, यम, ईशान आदि देव, आठों वसु, सभी ग्रह, रुद्र, मुनि तथा मनु- ये सभी शीघ्रतापूर्वक वहाँ आ पहुँचे, जहाँ सामर्थ्यशाली भगवान् श्रीकृष्ण विराजमान थे। तब स्वयं ब्रह्माने दण्डकी भाँति भूमिपर लेटकर उन्हें प्रणाम किया और यों कहा। ब्रह्मा बोले- भगवन्! आप परिपूर्णतम ब्रह्मस्वरूप, नित्य विग्रहधारी, ज्योतिःस्वरूप,

७९२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

परमब्रह्म और प्रकृतिसे परे हैं, आपको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। परमात्मन् ! आप परम निर्लिप्त, निराकार, ध्यानके लिये साकार, स्वेच्छामय और परमधाम हैं; आपको प्रणाम है। सर्वेश ! आप सम्पूर्ण कार्यस्वरूपोंके स्वामी, कारणोंके कारण और ब्रह्मा, शिव, शेष आदि देवोंके अधिपति हैं, आपको बारंबार अभिवादन है। परात्पर! आप सरस्वती, पद्मा, पार्वती, सावित्री और राधाके स्वामी हैं; रासेश्वर ! आपको मेरा प्रणाम स्वीकार हो। सृष्टिरूप ! आप सबके आदिभूत, सर्वरूप, सर्वेश्वर, सबके पालक और संहारक हैं; आपको नमस्कार प्राप्त हो। हे नाथ ! आपके चरणकमलकी रजसे वसुन्धरा पावन तथा धन्य हुई हैं; आपके परमपद चले जानेपर यह शून्य हो जायगी। इसपर क्रीड़ा करते आपके एक सौ पचीस वर्ष बीत गये। अब आप इस विरहातुरा रोती हुई पृथ्वीको छोड़कर अपने धामको पधार रहे हैं।

**श्रीमहादेवजीने कहा—**विभो ! आप ब्रह्माकी प्रार्थनासे भूतलपर अवतीर्ण हो पृथ्वीका भार हरण करके अपने पदको जा रहे हैं। आपके चरणोंसे अङ्कित हुई भूमि तुरंत ही पावन और तीनों लोकोंमें धन्य हो गयी। आपके चरणकमलका साक्षात् दर्शन करके हमलोग और मुनिगण धन्य हो गये। जो ऊर्ध्वरेता मुनियोंके लिये ध्यानद्वारा असाध्य, दुराराध्य और निष्पाप हैं; वे ही परमेश्वर इस समय भूतलपर हमलोगोंके दृष्टिगोचर हुए हैं। जिनके रोमकूपोंमें विश्वोंका निवास है, उन सर्वनिवास प्रभुको वासु कहते हैं, उन वासु-स्वरूप महाविष्णुके जो देव हैं, वे भूतलपर 'वासुदेव' नामसे विख्यात हैं। जिनके अनुपम एवं परम दुर्लभ पादपद्म सिद्धेन्द्रोंके चिरकालतक तपस्या करनेपर उपलब्ध होते हैं; वे ही आज सब लोगोंके नेत्रोंके विषय हुए हैं।

**अनन्त बोले—**नाथ ! ऐश्वर्यशाली अनन्त तो आप ही हैं, मैं नहीं हूँ। मैं तो आपका कलांश हूँ। विश्वके एकमात्र आधार उस क्षुद्र कूर्मकी पीठपर मैं उसी तरह दिखायी देता हूँ, जैसे हाथीके ऊपर मच्छर। ब्रह्मा, विष्णु और शिवात्मक असंख्यौं शेष और कूर्म हैं तथा विश्व भी असंख्य हैं। उन सबके स्वामी स्वयं आप हैं। नाथ! हमलोगोंका ऐसा सुदिन कहाँ होगा कि स्वप्नमें भी जिनका दर्शन दुर्लभ है, वे ही ईश्वर समस्त जीवोंके दृष्टिगोचर हो रहे हैं। नाथ! आपने ही वसुन्धराको पावन बनाया है। अब शोकसागरमें डूबती एवं रोती हुई उस पृथ्वीको अनाथ करके आप गोलोक पधार रहे हैं।

**देवताओंने कहा—**भगवन् ! देवगण तथा ब्रह्मा और ईशान आदि देवता जिनकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं; उनका स्तवन भला, हमलोग क्या कर सकते हैं; अतः आपको नमस्कार है।

मुने ! इतना कहकर वे सभी देवता हर्षमग्न हो द्वारकावासी भगवान्‌का दर्शन करनेके लिये शीघ्र ही द्वारकापुरीको प्रयाण कर गये। उनमें जितने ग्वाले थे, वे सभी उत्तम गोलोकको चले गये। पृथ्वी भयभीत हो काँपने लगी। सातों समुद्र मर्यादारहित हो गये। ब्रह्मशापसे द्वारकाकी शोभा नष्ट हो गयी। तब राधिकापति श्रीकृष्ण उसे त्यागकर कदम्बमूलस्थित मूर्तिमें समा गये। उन सभी यदुवंशियोंका एरकायुद्धमें विनाश हो गया तथा उनकी पत्नियाँ चितामें जलकर अपने-अपने पतियोंकी अनुगामिनी बन गयीं। अर्जुनने हस्तिनापुर जाकर यह समाचार युधिष्ठिरसे कह सुनाया। तब राजा युधिष्ठिर भी पत्नी तथा भाइयोंके साथ स्वर्गको चले गये।

तदनन्तर जो परम आत्मबलसे सम्पन्न, देवाधिदेव, नारायण, प्रभु, श्यामसुन्दर, किशोर अवस्थावाले और रत्ननिर्मित आभूषणोंसे सुशोभित थे; अग्निशुद्ध वस्त्र जिनका परिधान था; वनमाला जिनकी शोभा बढ़ा रही थी; जो अत्यन्त सुन्दर, शान्त और मनोहर थे; जिनके पद्मा आदिद्वारा

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

७९३

वन्दित चरणकमलमें व्याधद्वारा छोड़ा हुआ अस्त्र चुभा हुआ था; उन लक्ष्मीकान्त परमेश्वरको कदम्बके नीचे स्थित देखकर ब्रह्मा आदि सभी देवताओंने भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम किया और फिर उनकी स्तुति की। तब श्रीकृष्णने उन ब्रह्मा आदि देवोंकी ओर मुस्कराते हुए देखकर उन्हें अभयदान दिया। पृथ्वी प्रेमविह्वल हो रो रही थी; उसे पूर्णरूपसे आश्वासन दिया और व्याधको अपने उत्तम परम पदको भेज दिया। तत्पश्चात् बलदेवजीका परम अद्भुत तेज शेषनागमें, प्रद्युम्नका कामदेवमें और अनिरुद्धका ब्रह्मामें प्रविष्ट हो गया। नारद! देवी रुक्मिणी, जो अयोनिजा तथा साक्षात् महालक्ष्मी थीं; अपने उसी शरीरसे वैकुण्ठको चली गयीं। कमलालया सत्यभामा पृथ्वीमें तथा स्वयं जाम्बवतीदेवी जगज्जननी पार्वतीमें प्रवेश कर गयीं। इस प्रकार भूतलपर जो-जो देवियाँ जिन-जिनके अंशसे प्रकट हुई थीं; वे सभी पृथक्-पृथक् अपने अंशीमें विलीन हो गयीं। साम्बका अत्यन्त निराला तेज स्कन्दमें, वसुदेव कश्यपमें और देवकी अदितिमें समा गयीं। विकसित मुख और नेत्रोंवाले समुद्रने रुक्मिणीके महलको छोड़कर शेष सारी द्वारकापुरीको अपने अंदर समेट लिया। इसके बाद क्षीरसागरने आकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका स्तवन किया। उस समय उनके वियोगके कारण उसके नेत्र अश्रुपूर्ण हो गये और वह व्याकुल होकर रोने लगा। मुने! तत्पश्चात् गङ्गा, सरस्वती, पद्मावती, यमुना, गोदावरी, स्वर्णरेखा, कावेरी, नर्मदा, शरावती, बाहुदा और पुण्यदायिनी कृतमाला—ये सभी सरिताएँ भी वहाँ आ पहुँचीं और सभीने परमेश्वर श्रीकृष्णको नमस्कार किया। उनमें जह्नुतनया गङ्गादेवी विरह-वेदनासे कातर तथा अत्यन्त दीन हो रही थीं। उनके नेत्रोंमें आँसू उमड़ आये थे। वे रोती हुई परमेश्वर श्रीकृष्णसे बोलीं।

**भागीरथीने कहा—**नाथ! रमणश्रेष्ठ! आप तो उत्तम गोलोकको पधार रहे हैं; किंतु इस कलियुगमें हमलोगोंकी क्या गति होगी?

**तब श्रीभगवान् बोले—**जाह्नवि! पापीलोग तुम्हारे जलमें स्नान करनेसे तुम्हें जिन पापोंको देंगे; वे सभी मेरे मन्त्रकी उपासना करनेवाले वैष्णवके स्पर्श, दर्शन और स्नानसे तत्काल ही भस्म हो जायँगे। जहाँ हरि-नाम-संकीर्तन और पुराणोंकी कथा होगी; वहाँ तुम इन सरिताओंके साथ जाकर सावधानतया श्रवण करोगी। उस पुराण-श्रवण तथा हरि-नाम-संकीर्तनसे ब्रह्महत्या आदि महापातक जलकर राख हो जाते हैं। वे ही पाप वैष्णवके आलिङ्गनसे भी दग्ध हो जाते हैं। जैसे अग्नि सूखी लकड़ी और घास-फूसको जला डालती है; उसी प्रकार जगत्में वैष्णवलोग पापियोंके पापोंको भी नष्ट कर देते हैं। गङ्गे! भूतलपर जितने पुण्यमय तीर्थ हैं; वे सभी मेरे भक्तोंके पावन शरीरोंमें सदा निवास करते हैं। मेरे भक्तोंकी चरण-रजसे वसुन्धरा तत्काल पावन हो जाती है, तीर्थ पवित्र हो जाते हैं तथा जगत् शुद्ध हो जाता है। जो ब्राह्मण मेरे मन्त्रके उपासक हैं, मुझे अर्पित करनेके बाद मेरा प्रसाद भोजन करते हैं और नित्य मेरे ही ध्यानमें तल्लीन रहते हैं; वे मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। उनके स्पर्शमात्रसे वायु और अग्नि पवित्र हो जाते हैं। मेरे भक्तोंके चले जानेपर सभी वर्ण एक हो जायँगे और मेरे भक्तोंसे शून्य हुई पृथ्वीपर कलियुगका पूरा साम्राज्य हो जायगा।

इसी अवसरपर वहाँ श्रीकृष्णके शरीरसे एक चार-भुजाधारी पुरुष प्रकट हुआ। उसकी प्रभा सैकड़ों चन्द्रमाओंको लज्जित कर रही थी। वह श्रीवत्स-चिह्नसे विभूषित था और उसके हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म शोभा पा रहे थे। वह एक सुन्दर रथपर सवार होकर क्षीरसागरको चला गया। तब स्वयं मूर्तिमती सिन्धुकन्या भी उनके पीछे चली गयीं। जगत्के पालनकर्ता

७९४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण विष्णुके श्वेतद्वीप चले जानेपर श्रीकृष्णके मनसे उत्पन्न हुई मनोहरा मर्त्यलक्ष्मीने भी उनका अनुगमन किया। इस प्रकार उस शुद्ध सत्त्वस्वरूपके दो रूप हो गये। उनमें दक्षिणाङ्ग हो भुजाधारी गोप-बालकके रूपमें प्रकट हुआ। वह नूतन जलधरके समान श्याम और पीताम्बरसे शोभित था; उसके मुखसे सुन्दर वंशी लगी हुई थी; नेत्र कमलके समान विशाल थे; वह शोभासम्पन्न तथा मन्द मुस्कानसे युक्त था। वह सौ करोड़ चन्द्रमाओंके समान सौन्दर्यशाली, सौ करोड़ कामदेवोंकी-सी प्रभावाला, परमानन्दस्वरूप, परिपूर्णतम, प्रभु, परमधाम, परब्रह्मस्वरूप, निर्गुण, सबका परमात्मा, भक्तानुग्रहमूर्ति, अविनाशी शरीरवाला, प्रकृतिसे पर और ऐश्वर्यशाली ईश्वर था। योगीलोग जिसे सनातन ज्योतिरूप जानते हैं और उस ज्योतिके भीतर जिसके नित्य रूपको भक्तिके सहारे समझ पाते हैं। विचक्षण वेद जिसे सत्य, नित्य और आद्य बतलाते हैं, सभी देवता जिसे स्वेच्छामय परम प्रभु कहते हैं, सारे सिद्धशिरोमणि तथा मुनिवर जिसे सर्वरूप कहकर पुकारते हैं, योगिराज शंकर जिसका नाम अनिर्वचनीय रखते हैं, स्वयं ब्रह्मा जिसे कारणके कारणरूपसे प्रख्यात करते हैं और शेषनाग जिस नौ प्रकारके रूप धारण करनेवाले ईश्वरको अनन्त कहते हैं; छः प्रकारके धर्म ही उनके छः रूप हैं, फिर एक रूप वैष्णवोंका, एक रूप वेदोंका और एक रूप पुराणोंका है; इसीलिये वे नौ प्रकारके कहे जाते हैं। जो मत शंकरका है, उसी मतका आश्रय ले न्यायशास्त्र जिसे अनिर्वचनीय रूपसे निरूपण करता है, दीर्घदर्शी वैशेषिक जिसे नित्य बतलाते हैं; सांख्य उन देवको सनातन ज्योतिरूप, मेरा अंशभूत वेदान्त सर्वरूप और सर्वकारण, पतञ्जलिमनानुयायी अनन्त, वेदगण सत्यस्वरूप, पुराण स्वेच्छामय और भक्तगण नित्यविग्रह कहते हैं; वे ही ये गोलोकनाथ श्रीकृष्ण गोकुलमें वृन्दावन नामक पुण्यवनमें गोपवेश धारण करके नन्दके पुत्ररूपसे अवतीर्ण हुए हैं। ये राधाके प्राणपति हैं। ये ही वैकुण्ठमें चार-भुजाधारी महालक्ष्मीपति स्वयं भगवान् नारायण हैं; जिनका नाम मुक्ति-प्राप्तिका कारण है। नारद ! जो मनुष्य एक बार भी 'नारायण' नामका उच्चारण कर लेता है; वह तीन सौ कल्पोंतक गङ्गा आदि सभी तीर्थोंमें स्नान करनेका फल पा लेता है। तदनन्तर जो शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण करते हैं; जिनके वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न शोभा देता है; मणिश्रेष्ठ कौस्तुभ और वनमालासे जो सुशोभित होते हैं; वेद जिनकी स्तुति करते हैं; वे भगवान् नारायण सुनन्द, नन्द और कुमुद आदि पार्षदोंके साथ विमानद्वारा अपने स्थान वैकुण्ठको चले गये। उन वैकुण्ठनाथके चले जानेपर राधाके स्वामी स्वयं श्रीकृष्णने अपनी वंशी बजायी, जिसका सुरीला शब्द त्रिलोकीको मोहमें डालनेवाला था। नारद! उस शब्दको सुनते ही पार्वतीके अतिरिक्त सभी देवतागण और मुनिगण मूर्च्छित हो गये और उनकी चेतना लुप्त हो गयी। तब जो भगवती विष्णुमाया, सर्वरूपा, सनातनी, परब्रह्मस्वरूपा, परमात्मस्वरूपिणी सगुणा, निर्गुणा, परा और स्वेच्छामयी हैं; वे सती-साध्वी देवी पार्वती सनातन भगवन् श्रीकृष्णसे बोलीं। पार्वतीने कहा - प्रभो ! गोलोकस्थित रासमण्डलमें मैं ही अपने एक राधिकारूपसे रहती हूँ। इस समय गोलोक रासशून्य हो गया है; अतः आप मुक्ता और माणिक्यसे विभूषित रथपर आरूढ़ हो वहाँ जाइये और उसे परिपूर्ण कीजिये। आपके वक्षःस्थलपर वास करनेवाली परिपूर्णतमा देवी मैं ही हूँ। आपकी आज्ञासे वैकुण्ठमें वास करनेवाली महालक्ष्मी मैं ही हूँ। वहीं श्रीहरिके वामभागमें स्थित रहनेवाली सरस्वती भी मैं ही हूँ। मैं आपकी आज्ञासे आपके मनसे उत्पन्न हुई सिन्धुकन्या हूँ। ब्रह्माके संनिकट रहनेवाली अपनी

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७९५

कलासे प्रकट हुई वेदमाता सावित्री मेरा ही नाम है। पहले सत्ययुगमें आपकी आज्ञासे मैंने समस्त देवताओंके तेजोंमें अपना वासस्थान बनाया और उससे प्रकट होकर देवीका शरीर धारण किया। उसी शरीरसे मेरे द्वारा लीलापूर्वक शुम्भ आदि दैत्य मारे गये। मैं ही दुर्गासुरका वध करके 'दुर्गा', त्रिपुरका संहार करनेपर 'त्रिपुरा' और रक्तबीजको मारकर 'रक्तबीजविनाशिनी' कहलाती हूँ। आपकी आज्ञासे मैं सत्यस्वरूपिणी दक्षकन्या 'सती' हुई। वहाँ योगधारणद्वारा शरीरका त्याग करके आपके ही आदेशसे पुनः गिरिराजनन्दिनी 'पार्वती' हुई; जिसे आपने गोलोकस्थित रासमण्डलमें शंकरको दे दिया था। मैं सदा विष्णुभक्तिमें रत रहती हूँ; इसी कारण मुझे वैष्णवी और विष्णुमाया कहा जाता है। नारायणकी माया होनेके कारण मुझे लोग नारायणी कहते हैं। मैं श्रीकृष्णकी प्राणप्रिया, उनके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी और वासुस्वरूप महाविष्णुकी जननी स्वयं राधिका हूँ। आपके आदेशसे मैंने अपनेको पाँच रूपोंमें विभक्त कर दिया; जिससे पाँचों प्रकृति मेरा ही रूप हैं। मैं ही घर-घरमें कला और कलांशसे प्रकट हुई वेदपत्नियोंके रूपमें वर्तमान हूँ। महाभाग! वहाँ गोलोकमें मैं विरहसे आतुर हो गोपियोंके साथ सदा अपने आवासस्थानमें चारों ओर चक्कर काटती रहती हूँ; अतः आप शीघ्र ही वहाँ पधारिये।

नारद! पार्वतीके वचन सुनकर रसिकेश्वर श्रीकृष्ण हँसे और रत्ननिर्मित विमानपर सवार हो उत्तम गोलोकको चले गये। तब सनातनी विष्णुमाया स्वयं पार्वतीने मायारूपिणी वंशीके नादसे आच्छन्न हुए देवगणको जगाया। वे सभी हरिनामोच्चारण करके विस्मयाविष्ट हो अपने-अपने स्थानको चले गये। श्रीदुर्गा भी हर्षमग्न हो शिवके साथ अपने नगरको चली गयीं।

तदनन्तर सर्वज्ञा राधा हर्षविभोर हो आते हुए प्राणवल्लभ श्रीकृष्णके स्वागतार्थ गोपियोंके साथ आगे आयीं। श्रीकृष्णको समीप आते देखकर सती राधिका रथसे उतर पड़ीं और सखियोंके साथ आगे बढ़कर उन्होंने उन जगदीश्वरके चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम किया। ग्वालों और गोपियोंके मनमें सदा श्रीकृष्णके आगमनकी लालसा बनी रहती थी; अतः उन्हें आया देखकर वे आनन्दमग्न हो गये। उनके नेत्र और मुख हर्षसे खिल उठे। फिर तो वे दुन्दुभियाँ बजाने लगे।

उधर विरजा नदीको पार करके जगत्पति श्रीकृष्णकी दृष्टि ज्यों ही राधापर पड़ी, त्यों ही वे रथसे उतर पड़े और राधिकाके हाथको अपने हाथमें लेकर शतशृङ्ग पर्वतपर घूमने चले गये। वहाँ सुरम्य रासमण्डल, अक्षयवट और पुण्यमय वृन्दावनको देखते हुए तुलसी-काननमें जा पहुँचे। वहाँसे मालतीवनको चले गये। फिर श्रीकृष्णने कुन्दवन तथा माधवी-काननको बायें करके मनोरम चम्पकारण्यको दाहिने छोड़ा। पुनः सुरुचिर चन्दनकाननको पीछे करके आगे बढ़े तो सामने राधिकाका परम रमणीय भवन दीख पड़ा। वहाँ जाकर वे राधाके साथ श्रेष्ठ रत्नसिंहासनपर विराजमान हुए। फिर उन्होंने सुवासित जल पिया तथा कपूरयुक्त पानका बीड़ा ग्रहण किया। तत्पश्चात् वे सुगन्धित चन्दनसे चर्चित पुष्पशय्यापर सोये और रस-सागरमें निमग्न हो सुन्दरी राधाके साथ बिहार करने लगे।

नारद! इस प्रकार मैंने रमणीय गोलोकारोहणके विषयमें अपने पिता धर्मके मुखसे जो कुछ सुना था, वह सब तुम्हें बता दिया। अब पुनः और क्या सुनना चाहते हो?

(अध्याय १२८)

७९६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

नारायणके आदेशसे नारदका विवाहके लिये उद्यत हो ब्रह्मलोकमें जाना, ब्रह्माका दल-बलके साथ राजा सृंजयके पास आना, सृंजय-कन्या और नारदका विवाह, सनत्कुमारद्वारा नारदको श्रीकृष्ण-मन्त्रोपदेश, महादेवजीका उन्हें श्रीकृष्णका ध्यान और जप-विधि बतलाना, तपके अन्तमें नारदका शरीर त्यागकर श्रीहरिके पादपद्ममें लीन होना

**नारदने कहा—**महाभाग ! मेरी जो कुछ सुननेकी लालसा थी; वह सब कुछ सुन लिया। अब कुछ भी अवशिष्ट नहीं है। कामनाकी पूर्ति करनेवाला यह ब्रह्मवैवर्तपुराण कैसा अद्भुत है ! जगद्गुरो ! मैं तप करनेके लिये हिमालयपर जाना चाहता हूँ, इसके लिये मुझे आज्ञा दीजिये अथवा अब मैं क्या करूँ, वह मुझे बतलानेकी कृपा करें।

**श्रीनारायण बोले—**नारद ! इस समय तो तुम ब्रह्माके पुत्र हो; परंतु पूर्वजन्ममें तुम उपबर्हण नामक गन्धर्व थे। तुम्हारे पचास पत्नियाँ थीं। उनमेंसे एक सती-साध्वी सुन्दरी कामिनीने तपस्याद्वारा भगवान् शंकरकी आराधना की और वररूपमें नारदको अपना मनोनीत पति प्राप्त किया। वही राजा सृंजयकी कन्या होकर पैदा हुई है। उसका नाम स्वर्णवी (स्वर्णष्ठीवी) है। वह इच्छाकी सहोदरा बहिन है। वह सुन्दरियोंमें परम सुन्दरी, कोमलाङ्गी, लक्ष्मीकी कला, पतिव्रता, महाभागा, मनोहरा, अत्यन्त प्रिय बोलनेवाली, कामुकी, कमनीया और सदा सुस्थिर यौवनवाली है। तुम उसके साथ विवाह कर लो; क्योंकि शंकरकी आज्ञा व्यर्थ कैसे हो सकती है ? ब्रह्माने जो प्राक्तन कर्म लिख दिया है; उसे कौन मिटा सकता है ? अपना किया हुआ शुभ अथवा अशुभ कर्म अवश्य ही भोगना पड़ता है; चाहे सौ करोड़ कल्प बीत जायँ तो भी बिना भोग किये कर्मका नाश नहीं होता।

**सूतजी कहते हैं—**शौनक ! नारायणका कथन सुनकर नारदका मन खिन्न हो गया। वे नारायणको प्रणाम करके शीघ्र ही राजा सृंजयकी राजधानीकी ओर चल दिये।

**शौनकने कहा—**महाभाग सूतजी ! अहो, यह कैसा परम अद्भुत, पुरातन, सरस, अपूर्व रहस्य है। इसे तो मैंने सुन लिया। अब मैं नारदका विवाह-वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ; क्योंकि नारदमुनि तो अतीन्द्रिय और ब्रह्माके पुत्र थे।

**सूतजी कहते हैं—**शौनक ! नारदपर मोहने अपना अधिकार जमा लिया था; अतः वे विष्णु-व्रतपरायणा महाभागा तपस्विनी सृंजय-कन्याको देखकर ब्रह्माजीकी रमणीय सभामें गये। वह सभा सभी देवताओंसे खचाखच भरी थी। वहाँ उन्होंने पिता ब्रह्माको प्रणाम करके उनसे सारा रहस्य कह सुनाया। उस शुभ समाचारको सुनकर ब्रह्माका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। फिर तो जगत्पति ब्रह्मा अपने तपस्वी पुत्र नारदसे बातचीत करके शुभ मुहूर्तमें देवताओंके साथ पुत्रको आगे करके रत्ननिर्मित विमानद्वारा सृंजयके महलको चल पड़े। उस समाचारको सुनकर राजा सृंजयने अपनी रत्ननिर्मित आभूषणोंसे विभूषित सुन्दरी कन्याको लेकर हर्षपूर्वक नारदको सौंप दिया। साथ ही अपना सारा मणिमुक्ता आदि दहेजमें दिया। फिर हाथ जोड़कर उन्होंने वह सारा कार्य सम्पन्न किया। तत्पश्चात् योगिश्रेष्ठ राजा सृंजय अपनी कन्या ब्रह्माको समर्पित करके ‘वत्से ! वत्से !’ यों कहकर फूट-फूटकर रोते हुए कहने लगे—‘कमललोचने ! तुम मेरे घरको सूना करके कहाँ जा रही हो। बेटी ! तुम्हें त्यागकर तो मैं जीते-जी मृतक-तुल्य हो गया हूँ; अतः मैं घोर वनमें चला जाऊँगा।’ तब वह कन्या रोते हुए पिता और रोती हुई माताको प्रणाम करके स्वयं भी रोती हुई ब्रह्माके रथपर सवार हुई। ब्रह्मा हर्षमग्न हो भार्यासहित पुत्रको लेकर देवेन्द्रों और मुनियोंके साथ ब्रह्मलोकको

श्रीकृष्णजन्मखण्ड

७९७


प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने दुन्दुभिका घोष कराया और ब्राह्मणों, देवताओं तथा सिद्धोंको भोजनसे तृप्त किया। मुनिश्रेष्ठ नारद तो अपने पूर्वकर्मसे बाधित थे; क्योंकि विप्रवर ! जिसका जो प्राक्तन कर्म होता है; उसका उल्लङ्घन करना दुष्कर है। उसे भला कौन हटा सकता है?

इस प्रकार विवाह करके उससे विरत हो मुनिश्रेष्ठ नारद ब्रह्मलोकमें मनोहर वटवृक्षके नीचे बैठे हुए थे। उसी समय वहाँ साक्षात् भगवान् सनत्कुमार आ पहुँचे। बालककी तरह उनका नग्न-वेष था। वे ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। सृष्टिके पूर्वमें उनकी जो आयु थी, वही पाँच वर्षकी अवस्था अब भी थी। उनका चूडाकर्म और उपनयन-संस्कार नहीं हुआ था तथा वे वेदाध्ययन और संध्यासे रहित थे। उनके नारायण गुरु हैं। वे अनन्त कल्पोंसे तीनों भाइयोंके साथ कृष्ण-मन्त्रका जप कर रहे थे। वे वैष्णवोंके अग्रणी, ईश्वर और ज्ञानियोंके गुरु थे। सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ अपने भाई सनत्कुमारको सहसा निकट आया देखकर नारद दण्डकी भाँति भूमिपर लेट गये और चरणोंमें सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया। तब बालकरूप सनत्कुमारजी हँसकर नारदसे पारमार्थिक वचन बोले।

**सनत्कुमारजीने कहा—**अरे भाई! क्या कर रहे हो ? युवतीपते ! कुशल तो है न? स्त्री-पुरुषका प्रेम सदा बढ़ता रहता है और वह नित्य नूतन ही होता है। वह ज्ञानमार्गकी साँकल, भक्तिद्वारका किवाड़, मोक्षमार्गका व्यवधान और चिरकालिक बन्धनका कारण है; फिर भी पापी नराधम अमृत-बुद्धिसे उस विषको पीते हैं। जिसका मन परम पुरुष नारायणको छोड़कर विषयमें रचा-पचा रहता है, उसे मानो मायाने ठग लिया है; जिससे वह अमृतका त्याग करके विषका सेवन करता है। अतः भाई! इस मायामयी प्रियतमा पत्नीको छोड़ो और तपके लिये निकल जाओ। परम पुण्यमय भारतवर्षमें जाकर तपस्याद्वारा माधवका भजन करो। अपना पद प्रदान करनेवाले अपने स्वामी परम पुरुष नारायणके स्थित रहते जो विषयी पुरुष विषयोंमें मत्त रहता है; उसे निश्चय ही मायाने ठग लिया है। अब तुम मेरे ‘कृष्ण’ इस दो अक्षरवाले मन्त्रको ग्रहण करो। यह मन्त्र सभी मन्त्रोंका सार तथा परात्पर है। सभी पुराणों, चारों वेदों, धर्मशास्त्रों और तन्त्रोंमें इससे उत्तम दूसरा मन्त्र नहीं है। इसे नारायणने मुझे सूर्यग्रहणके अवसरपर पुष्करक्षेत्रमें प्रदान किया था। असंख्यों कल्पोंसे इसका जप करके मैं सर्वपूजित हो भ्रमण करता रहता हूँ। यों कहकर उन्होंने नारदको स्नान कराया और फिर उन्हें उस परमोत्कृष्ट मन्त्रका उपदेश दिया, जिसे वे मणियोंकी पावन मालापर रात-दिन जपते रहते हैं।

इस प्रकार वैष्णवोंके अग्रणी सनत्कुमारजी नारदको वह मन्त्र और शुभाशीर्वाद देकर सनातन भगवान् श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये गोलोकको चले गये। इधर जब नारदको वह सर्वसिद्धिप्रद श्रीकृष्णमें निश्चल भक्ति प्रदान करनेवाला तथा कर्मोंका उच्छेदक श्रेष्ठ मन्त्र प्राप्त हो गया; तब वे अपनी मायामयी भार्याका त्याग करके तपस्या करनेके लिये भारतवर्षमें आये। यहाँ उन्हें कृतमाला नदीके तटपर भगवान् शंकरके दर्शन हुए। सहसा उन्हें देखकर नारदमुनिने शिवजीके चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम किया। तब भक्तवत्सल जगदीश्वर शिव अपने भक्त नारदसे बोले।

**श्रीमहादेवजीने कहा—**अहो नारद ! अपने तेजसे उद्भासित होते हुए तुम्हें देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है; क्योंकि जिस दिन भक्तोंका दर्शन प्राप्त हो जाय, वह शरीरधारियोंके लिये उत्तम दिन माना जाता है। भक्तोंके साथ समागम होना प्राणियोंके लिये परम लाभ है। जिसे वैष्णवका दर्शन प्राप्त हो गया, उसने मानो समस्त तीर्थोंमें स्नान कर लिया। जो समस्त तन्त्रोंमें परम दुर्लभ है, वह ‘कृष्ण’ रूप महामन्त्र क्या तुम्हें प्राप्त हो गया? इस मन्त्रको मैंने अपने पुत्र गणेश और स्कन्दको दिया था। श्रीकृष्णने इसे गोलोकस्थित रासमण्डलमें मुझे, ब्रह्मा और धर्मको बतलाया था। धर्मने नारायणको तथा ब्रह्माने सनत्कुमारको इसका उपदेश दिया था। वही मन्त्र सनत्कुमारने

७९८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

तुम्हें प्रदान किया है। इस मन्त्रके ग्रहणमात्रसे ही मनुष्य नारायणस्वरूप हो जाता है। इसके जपके लिये शुभ-अशुभ समय-असमयका कोई विचार नहीं है। पाँच लाख जपसे ही इसका पुरश्चरण पूर्ण हो जाता है। इसका ध्यान पापनाशक तथा कर्ममूलका उच्छेदक है। शास्त्रमें उसका वर्णन किया गया है, उसी ढंगसे वैष्णवको श्रीकृष्णका ध्यान करना चाहिये। (वह ध्यान यों है—)

'नूतन जलधरके समान जिनका श्यामवर्ण है, जिनकी किशोर-अवस्था है, जो पीताम्बरसे सुशोभित हैं, सौ करोड़ चन्द्रमाओंके समान परम अनुपम सौन्दर्य धारण किये हुए हैं, अमूल्य रत्नोंके बने हुए भूषणसमूह जिनकी शोभा बढ़ा रहे हैं, जिनके सर्वाङ्गमें चन्दनका अनुलेप हुआ है, कौस्तुभमणिद्वारा जिनकी विशेष शोभा हो रही है, जिनकी मालतीकी मालाओंसे मण्डित शिखामें लगे हुए मयूरपिच्छकी निराली छवि हो रही है, जिनके प्रसन्नमुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छायी हुई है, शिव आदि देवगण जिनकी नित्य उपासना करते रहते हैं तथा जो ध्यानद्वारा असाध्य, दुराराध्य, निर्गुण, प्रकृतिसे पर, सबके परमात्मा, भक्तानुग्रहमूर्ति, वेदोंद्वारा अनिर्वचनीय और सर्वेश्वर हैं; उन श्रेष्ठ श्रीकृष्णका मैं भजन करता हूँ।'

नारद! जो परमानन्द, सत्य, नित्य और परात्पर हैं, उन सनातन भगवान् श्रीकृष्णका इस ध्यान-विधिसे ध्यान करके भजन करो। इतना कहकर परमेश्वर शम्भु अपने स्थानको चले गये। तब नारदने उन जगन्नाथको प्रणाम करके तपस्यामें मन लगाया। तत्पश्चात् नारद श्रीहरिका स्मरण करके योगधारणाद्वारा शरीरको त्यागकर पद्माद्वारा समर्चित श्रीहरिके चरणकमलमें विलीन हो गये। (अध्याय १२९)

पुराणोंके लक्षण और उनकी श्लोक-संख्याका निरूपण, ब्रह्मवैवर्तपुराणके पठन-श्रवणके माहात्म्यका वर्णन करके सूतजीका सिद्धाश्रमको प्रयाण

तदनन्तर अग्नि तथा स्वर्णकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग सुनाकर शौनकजीके पूछनेपर सूतजीने ब्रह्मवैवर्तपुराणके समस्त विषयोंकी अनुक्रमणिका सुनायी।

फिर शौनकजीने कहा—वत्स! ब्रह्मवैवर्त-पुराणमें जिस फलका निरूपण हुआ है, वह निर्विघ्नतापूर्वक मोक्षका कारण है। उसे सुनकर आज मेरा जन्म लेना सफल हो गया और जीवन सुजीवन बन गया। तात! अभी मुझे कुछ और निवेदन करना है; यदि मुझे अभयदान दो तो मैं उसे प्रकट करूँ।

तब सूतजी बोले—महाभाग शौनकजी! भय छोड़ दीजिये और आपकी जो इच्छा हो, उसे पूछिये। मैं जो-जो भी मनोहर गोपनीय विषय होगा, सब आपसे वर्णन करूँगा।

शौनकने कहा—पुत्रक! अब मेरी पुराणोंके लक्षण, उनकी श्लोक-संख्या और उनके श्रवणका फल सुननेकी अभिलाषा है।

सूतजी कहते हैं—शौनकजी! मैं अपनी बुद्धिके अनुसार विस्तृत पुराणों, इतिहासों, संहिताओं और पाञ्चरात्रोंका वर्णन करता हूँ, सुनिये। विप्रवर! सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—इन पाँचों लक्षणोंसे जो युक्त हो, उसे पुराण कहते हैं। विद्वान्लोग उपपुराणोंका भी यही लक्षण बतलाते हैं। अब प्रधान पुराणोंका लक्षण आपको बतलाता हूँ—सृष्टि, विसृष्टि, स्थिति, उनका पालन, कर्मोंकी वासना-वार्ता, मनुओंका क्रम, प्रलयोंका वर्णन, मोक्षका निरूपण, श्रीहरिका गुण-गान तथा देवताओंका पृथक्-पृथक् वर्णन—प्रधान पुराणोंके ये दस लक्षण और बतलाये जाते हैं। अब इन पुराणोंकी श्लोक-संख्याका वर्णन करता हूँ, सुनिये।

शौनकजी! परमोत्कृष्ट ब्रह्मपुराणकी श्लोक-संख्या दस हजार और पद्मपुराणकी पचपन हजार कही गयी है। विद्वान्लोग विष्णुपुराणको तेईस हजार श्लोकोंवाला बतलाते हैं। शिवपुराणमें चौबीस हजार श्लोक बतलाये जाते हैं। श्रीमद्भागवतपुराण अठारह हजार श्लोकोंमें ग्रथित है। नारदपुराणकी श्लोक-संख्या पचीस हजार बतलायी गयी है। पण्डितलोग

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७९९ मार्कण्डेयपुराणमें नौ हजार श्लोक बतलाते हैं। परम रुचिर अग्निपुराण पंद्रह हजार चार सौ श्लोकोंवाला कहा गया है। पुराणप्रवर भविष्यमें चौदह हजार पाँच सौ श्लोक बतलाये जाते हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराणमें अठारह हजार श्लोक हैं। विद्वज्जन इसे सभी पुराणोंका सार बतलाते हैं। श्रेष्ठ लिङ्गपुराण ग्यारह हजार श्लोकोंका है। वाराहपुराणकी श्लोक-संख्या चौबीस हजार कही गयी है। सज्जनोंने उत्तम स्कन्दपुराणको ग्यारह हजार एक सौ अथवा इक्यासी हजार एक सौ श्लोकोंवाला निरूपित किया है। पण्डितोंने वामनपुराणकी दस हजार, कूर्मपुराणकी सतरह हजार और मत्स्यपुराणकी चौदह हजार श्लोक-संख्या बतलायी है। गरुड़पुराण उन्नीस हजार और उत्तम ब्रह्माण्डपुराण बारह हजार श्लोकोंवाला कहा गया है। इस प्रकार सभी पुराणोंकी श्लोक-संख्या चार लाख बतलायी जाती है। इस प्रकार पुराणवेत्ता लोग अठारह पुराण ही बतलाते हैं। इसी तरह उपपुराणोंकी भी संख्या अठारह ही कही गयी है। महाभारतको इतिहास कहते हैं। वाल्मीकीय रामायण काव्य है और श्रीकृष्णके माहात्म्यसे परिपूर्ण पञ्चरात्रोंकी संख्या पाँच है। वासिष्ठ, नारदीय, कापिल, गौतमीय और सनत्कुमारीय-ये ही पाँचों श्रेष्ठ पञ्चरात्र हैं। संहिताएँ भी पाँच बतलायी जाती हैं; जो सभी श्रीकृष्णकी भक्तिसे ओतप्रोत हैं। इनके नाम हैं- ब्रह्मसंहिता, शिवसंहिता, प्रह्लादसंहिता, गौतमसंहिता और कुमारसंहिता। शौनकजी ! इस प्रकार शास्त्रका भण्डार तो बहुत बड़ा है, तथापि मैंने अपनी जानकारीके अनुसार आपको क्रमशः पृथक्-पृथक् सब बतला दिया है। मुने ! साक्षात् भगवान् श्रीविष्णुने गोलोकस्थित रासमण्डलमें अपने भक्त ब्रह्माको यह पुराण बतलाया था। फिर ब्रह्माने धर्मात्मा धर्मको, धर्मने नारायणमुनिको, नारायणने नारदको और नारदने मुझ भक्तको इसका उपदेश किया। मुनिवर ! वही श्रेष्ठ पुराण इस समय मैं आपसे वर्णन कर रहा हूँ। यह अभीप्सित ब्रह्मवैवर्तपुराण परम दुर्लभ है। जो विश्वसमूहका वरण करता है, जीवधारियोंका परमात्मस्वरूप है; वही ब्रह्म कर्मनिष्ठोंके कर्मोंका साक्षीरूप है। उस ब्रह्मका तथा उसकी अनुपम विभूतिका जिसमें विवरण किया गया है; इसी कारण विद्वान्लोग इसे 'ब्रह्मवैवर्त' कहते हैं। यह पुराण पुण्यप्रद, मङ्गलस्वरूप और मङ्गलोंका दाता है। इसमें नये-नये अत्यन्त गोपनीय रमणीय रहस्य भरे पड़े हैं। यह हरिभक्तिप्रद, दुर्लभ हरिदास्यका दाता, सुखद, ब्रह्मकी प्राप्ति करनेवाला साररूप और शोक-संतापका नाशक है। जैसे सरिताओंमें शुभकारिणी गङ्गा तत्क्षण ही मुक्ति प्रदान करनेवाली हैं, तीर्थोंमें पुष्कर और पुरियोंमें काशी जैसे शुद्ध है, सभी वर्षोंमें जैसे भारतवर्ष शुभ और तत्काल मुक्तिप्रद है, जैसे पर्वतोंमें सुमेरु, पुष्पोंमें पारिजात-पुष्प, पत्रोंमें तुलसी-पत्र, व्रतोंमें एकादशीव्रत, वृक्षोंमें कल्पवृक्ष, देवताओंमें श्रीकृष्ण, ज्ञानिशिरोमणियोंमें महादेव, योगिन्द्रोंमें गणेश्वर, सिद्धेन्द्रोंमें एकमात्र कपिल, तेजस्वियोंमें सूर्य, वैष्णवोंमें अग्रगण्य भगवान् सनत्कुमार, राजाओंमें श्रीराम, धनुर्धारियोंमें लक्ष्मण, देवियोंमें महापुण्यवती सती दुर्गा, श्रीकृष्णकी प्रेयसियोंमें प्राणाधिका राधा, ईश्वरियोंमें लक्ष्मी तथा पण्डितोंमें सरस्वती सर्वश्रेष्ठ हैं; उसी प्रकार सभी पुराणोंमें ब्रह्मवैवर्त श्रेष्ठ है। इससे विशिष्ट, सुखद, मधुर, उत्तम पुण्यका दाता और संदेहनाशक दूसरा कोई पुराण नहीं है। यह इस लोकमें सुखद, सम्पूर्ण सम्पत्तियोंका उत्तम दाता, शुभद, पुण्यद, विघ्नविनाशक और उत्तम हरि-दास्य प्रदान करनेवाला है तथा परलोकमें प्रभूत आनन्द देनेवाला है। पुत्रक ! सम्पूर्ण यज्ञों, तीर्थों, व्रतों और तपस्याओंका तथा समूची पृथ्वीकी प्रदक्षिणाका भी फल इसके फलकी समतामें नगण्य है। चारों वेदोंके पाठसे भी इसका फल श्रेष्ठ है। जो संयत-चित्त होकर इस पुराणको श्रवण करता है; उसे गुणवान् विद्वान् वैष्णव पुत्र प्राप्त होता है। यदि कोई दुर्भगा नारी इसे सुनती है तो उसे पतिके सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। इस पुराणके श्रवणसे मृतवत्सा, काकबन्ध्या आदि पापिनी स्त्रियोंको भी चिरजीवी पुत्र सुलभ हो जाता है। अपुत्रको पुत्र, भार्यारहितको पत्नी और कीर्तिहीनको उत्तम यश मिल जाता है। मूर्ख पण्डित हो जाता है। रोगी रोगसे, बँधा हुआ बन्धनसे, भयभीत भयसे और आपत्तिग्रस्त आपत्तिसे मुक्त हो जाता है। अरण्यमें, निर्जन मार्गमें अथवा दावाग्निमें फँसकर भयभीत हुआ मनुष्य इसके

८०० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

श्रवणसे निश्चय ही उस भयसे छूट जाता है। इसके श्रवणसे पुण्यवान् पुरुषपर कुष्ठरोग, दरिद्रता, व्याधि और दारुण शोकका प्रभाव नहीं पड़ता। ये सभी पुण्यहीनोंपर ही प्रभाव डालते हैं। जो मनुष्य अत्यन्त दत्तचित्त हो इसका आधा श्लोक अथवा चौथाई श्लोक सुनता है, उसे बहुसंख्यक गोदानका पुण्य प्राप्त होता है—इसमें संशय नहीं है। जो मनुष्य शुद्ध समयमें जितेन्द्रिय होकर संकल्पपूर्वक वक्ताको दक्षिणा देकर भक्ति-भावसहित इस चार खण्डोंवाले पुराणको सुनता है, वह अपने असंख्य जन्मोंके बचपन, कौमार, युवा और वृद्धावस्थाके संचित पापसे निःसंदेह मुक्त हो जाता है तथा श्रीकृष्णका रूप धारण करके रत्ननिर्मित विमानद्वारा अविनाशी गोलोकमें जा पहुँचता है। वहाँ उसे श्रीकृष्णकी दासता प्राप्त हो जाती है, यह ध्रुव है। असंख्य ब्रह्माओंका विनाश होनेपर भी उसका पतन नहीं होता। वह श्रीकृष्णके समीप पार्षद होकर चिरकालतक उनकी सेवा करता है।

मुने! भलीभाँति स्नान करके शुद्ध हो तथा इन्द्रियोंको वशमें करके 'ब्रह्मखण्ड' की कथा सुननेसे पश्चात् श्रोताको चाहिये कि वह वाचकको खीर-पूड़ी और फलका भोजन कराये, पानका बीड़ा समर्पित करे और सुवर्णकी दक्षिणा दे। फिर चन्दन, श्वेत पुष्पोंकी माला और मनोहर महीन वस्त्र श्रीकृष्णको निवेदित करके वाचकको प्रदान करे। अमृतोपम सुन्दर कथाओंसे युक्त 'प्रकृतिखण्ड' को सुनकर वक्ताको दधियुक्त अन्न खिलाकर स्वर्णकी दक्षिणा देनी चाहिये और फिर भक्तिपूर्वक सुन्दर सवत्सा गौका दान देना चाहिये। विघ्ननाशके लिये 'गणपतिखण्ड' को सुनकर जितेन्द्रिय श्रोताको उचित है कि वह वाचकको सोनेका यज्ञोपवीत, श्वेत अश्व, छाता, पुष्पमाला, स्वस्तिकके आकारकी मिठाई, तिलके लड्डू और काल-देशानुसार उपलब्ध होनेवाले पके फल प्रदान करे। 'श्रीकृष्णजन्मखण्ड' को श्रवण करके भक्तको चाहिये कि वाचकको रत्नकी सुन्दर अँगूठी दान करे और फिर महीन वस्त्र, हार, उत्तम स्वर्णकुण्डल, माला, सुन्दर पालकी, पके हुए फल, दूध और अपना सर्वस्व दक्षिणामें देकर उनकी स्तुति करे। इसके बाद सौ ब्राह्मणोंको परम आदरके साथ भोजन कराना चाहिये। जो विष्णुभक्त, शास्त्रपटु पण्डित और शुद्धाचारी हो, ऐसे ही श्रेष्ठ ब्राह्मणको वाचक बनाना चाहिये। जो श्रीकृष्णसे विमुख, दुराचारी और उपदेश देनेमें अकुशल हो, ऐसे ब्राह्मणसे कथा नहीं सुननी चाहिये। नहीं तो, पुराण-श्रवण निष्फल हो जाता है। जो श्रीकृष्णकी भक्तिसे युक्त हो इस पुराणको सुनता है, वह श्रीहरिकी भक्ति और पुण्यका भागी होता है तथा उसके पूर्वजन्मके पाप नष्ट हो जाते हैं।

विप्रवर! इस प्रकार मैंने अपने गुरुजीके श्रीमुखसे जो कुछ सुना था, वह सब आपसे वर्णन कर दिया। अब मुझे जानेकी आज्ञा दीजिये; मैं नारायणाश्रमको जाना चाहता हूँ। यहाँ इस विप्र-समाजको देखकर नमस्कार करनेके लिये आ गया था; फिर आपलोगोंकी आज्ञा होनेसे उत्तम ब्रह्मवैवर्तपुराण भी सुना दिया। आप ब्राह्मणोंको मेरा नमस्कार प्राप्त हो। परमात्मा श्रीकृष्ण, शिव, ब्रह्मा और गणेशको नित्यशः बारंबार नमस्कार है। शौनकजी! जो सत्यस्वरूप, राधाके प्राणेश और तीनों गुणोंसे परे हैं; उन परब्रह्म श्रीकृष्णका आप मन-वचन-शरीरसे परमभक्तिपूर्वक रात-दिन भजन कीजिये। सरस्वती-देवीको नमस्कार है। पुराणगुरु व्यासजीको अभिवादन है। सम्पूर्ण विघ्नोंका विनाश करनेवाली दुर्गादेवीको अनेकशः प्रणाम है। शौनकजी! आपलोगोंके पुण्यमय चरणकमलोंका दर्शन करके आज मैं उस सिद्धाश्रमको जाना चाहता हूँ, जहाँ भगवान् गणेश विराजमान हैं।

(अध्याय १३०-१३१)


॥ श्रीकृष्णजन्मखण्ड सम्पूर्ण ॥


॥ ब्रह्मवैवर्तपुराण समाप्त ॥