ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७६- श्रीकृष्णके विरहसे संतप्त कालियदहमें प्रवेश करनेके लिये उद्यत यशोदा, राधा और मूर्च्छित हुए नन्दराय आदि गोप-गोपियोंको बलरामजीद्वारा समझाया जाना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५१३
स्पर्श कर लिया। इससे सप्तर्षियोंमें अङ्गिराको बड़ा क्षोभ हुआ और उन्होंने अग्निको 'सर्वभक्ष्य' होनेका तथा इन पत्नियोंको मानुषी योनिमें जानेका शाप दे दिया। ये सब रोती हुई बोलीं—'हमलोग निर्दोष हैं, पतिव्रता हैं। हमारा त्याग न करें। आप हम डरी हुई अबलाओंको अभय प्रदान करें।'
इनके करुण-क्रन्दनसे मुनिको दया आ गयी। वे भी दुःखी हो गये। अन्तमें उन्होंने कहा कि तुम्हें मानुषी योनिमें जाना तो होगा; परंतु तुम्हें वहाँ साक्षात् भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन प्राप्त होंगे। उनके दर्शन होते ही तुम गोलोकमें चली जाओगी। फिर श्रीहरि अपनी योगमायासे तुमलोगोंकी छायामूर्तिका निर्माण करेंगे। वे तुम्हारी छायामूर्तियाँ कुछ समयतक उन ब्राह्मणोंके घरोंमें रहकर फिर हमारे यहाँ लौट आयेंगी। इस प्रकार तुम अपने छायांशसे पुनः हमारी पत्नियाँ हो जाओगी। अतएव यह मेरा शाप तुम्हारे लिये वरदानसे भी उत्कृष्ट है।
ऐसा कहकर वे मुनि चुप हो गये। उनके मनमें इसके लिये बड़ा दुःख था। वे स्त्रियाँ शापवश भूतलपर आकर उन ब्राह्मणोंकी पत्नियाँ हुईं और श्रीहरिको भक्तिभावसे अन्न समर्पित करके वे उनके धामको चली गयीं। निश्चय ही उनका शाप उनके लिये श्रेष्ठ सम्पत्तिसे भी अधिक महत्त्वशाली हुआ। नीच पुरुषसे मिली हुई सम्पत्ति भी निन्दनीय है; किंतु महात्मा पुरुषसे प्राप्त हुई विपत्ति भी श्रेष्ठ है। अहो! साधुपुरुषोंका कोप तत्काल ही उपकारमें बदल जाता है। विपत्तिके बिना भूतलपर किसीकी महिमा कैसे प्रकट हो सकती है? पतियोंके परित्यागसे भूमिपर उत्पन्न हुई ब्राह्मणपत्नियाँ श्रीहरिके दर्शनसे सदाके लिये भवबन्धनसे मुक्त हो गयीं*। इस प्रकार मैंने श्रीहरिके इस उत्तम चरित्रको पूर्णरूपेण कह सुनाया। उन पुण्यवती ब्राह्मणियोंके मोक्षकी यह मनोरम कथा अद्भुत है। विप्रवर! श्रीकृष्णकी लीला-कथा पद-पदमें नयी-नयी जान पड़ती है। इसे सुननेवालोंको कभी तृप्ति नहीं होती है। भला, श्रेय (कल्याणमयी कथाके श्रवण)-से कौन तृप्त होता है? मैंने पूज्य पिताजीके मुखसे जितना रमणीय भगवच्चरित्र सुना था, उसका वर्णन किया। अब तुम अपनी इच्छा बताओ। फिर क्या सुनना चाहते हो?
नारदजीने कहा—कृपानिधान! जगद्गुरो! आपने पूर्वकालमें पिताके मुखसे श्रीकृष्णकी जो-जो मङ्गलमयी लीलाएँ सुनी हैं, वे सब मुझे सुनाइये।
सूतजी कहते हैं—शौनक! देवर्षिका यह वचन सुनकर भगवान् नारायणने स्वयं ही श्रीकृष्णमहिमाके अन्यान्य प्रसङ्गोंका वर्णन आरम्भ किया। (अध्याय १८)
* निन्दनीयाच्च सम्पत्तेर्विपत्तिर्महतो वरा। अहो सद्यः सतां कोपश्चोपकाराय कल्पते॥
विना विपत्तेर्महिमा कुतः कस्य भवेद्भुवि। भूताः कान्तपरित्यागान्मुक्ता ब्राह्मणयोषितः॥
(१८। १२५-१२६)
७७- व्रजवासियों और व्रजाङ्गनाओंका कालियदहके जलसे ऊपर उछलते हुए श्रीकृष्णको देखना
| ५१४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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श्रीकृष्णका कालियदहमें प्रवेश, नागराजका उनपर आक्रमण, श्रीकृष्णद्वारा उसका दमन, नागपत्नी सुरसाद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति, श्रीकृष्णकी उसपर कृपा, सुरसाका गोलोक-गमन, छायामयी सुरसाकी सृष्टि, कालियको वरदान, कालियद्वारा भगवान्की स्तुति, उस स्तुतिकी महिमा, नागका रमणक द्वीपको प्रस्थान, कालियका यमुनाजलमें निवासका कारण, गरुडका भय, सौभरिके शापसे कालियदहतक जानेमें गरुड़की असमर्थता, श्रीकृष्णके कालियदहमें प्रवेश करनेसे ग्वालबालों तथा नन्द आदिकी व्याकुलता, बलरामका समझाना, श्रीकृष्णके निकल आनेसे सबको प्रसन्नता, दावानलसे व्रजवासियोंकी रक्षा तथा नन्दभवनमें उत्सव
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! एक दिन बलदेवको साथ लिये बिना ही श्रीकृष्ण अन्यान्य ग्वालबालोंके साथ यमुनाके उस तटपर चले गये, जहाँ कालियनागका निवासस्थान था। स्वेच्छामय शरीर धारण करनेवाले भगवान् नन्दनन्दन यमुना-तटवर्ती वनमें पके हुए फलोंको खाकर जब प्यास लगती, तब वहाँका निर्मल जल पी लेते थे। उन्होंने गोप-शिशुओंके साथ कुछ कालतक गौएँ चरायीं। तत्पश्चात् उन्हें तो एक जगह विश्रामके लिये खड़ी कर दिया और स्वयं साथियोंके साथ खेल-कूदमें लग गये; खेलमें इनका मन लग गया। ग्वालबाल भी बड़े हर्षके साथ उसमें भाग लेने लगे। उधर गौएँ नयी-नयी घास चरती हुई आगे बढ़ गयीं और यमुनाका विषमिश्रित जल पीने लगीं। मुने! दारुण कालकी चेष्टासे वह विषाक्त जल पीकर कालकूटकी ज्वालाओंसे संतप्त हो उन गौओंने तत्काल प्राण त्याग दिये। झुंड-की-झुंड गौओंको मरी हुई देख गोपबालक चिन्तासे व्याकुल और भयभीत हो उठे। उनके मुखपर विषाद छा गया और उन सबने आकर मधुसूदन श्रीकृष्णसे यह बात कही। सारा रहस्य जानकर जगन्नाथ श्रीहरिने उन सब गौओंको जीवित कर दिया। वे गौएँ तत्काल उठकर खड़ी हो गयीं और श्रीहरिका मुँह देखने लगीं। इधर श्रीकृष्ण यमुनातटवर्ती जलके निकट उत्पन्न हुए कदम्बपर चढ़कर उस सर्पके भवनमें बहुत-से नागोंके बीच कूद पड़े। उनके जलमें पड़ते ही उस कुण्डका पानी सौ हाथ ऊपर उठ गया। नारद! यह देख ग्वालबालोंको पहले तो हर्ष हुआ, फिर वे बड़े दुःखका अनुभव करने लगे। कालियसर्प मनुष्यकी आकृतिमें आये हुए श्रीहरिको देखकर क्रोधसे विह्वल हो उठा और तुरंत ही उन्हें निगल गया। जैसे किसी मनुष्यने जल्दबाजीमें तपे हुए लोहेको थाम लिया हो, वैसे ही ब्रह्मतेजसे उसका कण्ठ और पेट जलने लगा।
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५१५
वह नाग उद्विग्न हो गया और 'हाय! हाय! मेरे प्राण निकले जा रहे हैं'—यों कहकर उसने पुनः उन्हें उगल दिया। श्रीकृष्णके वज्रोपम अङ्गोंको चबानेसे उसके सारे दाँत टूट गये और मुँह लहूलुहान हो गया। भगवान् उस समय रक्तरंजित मुखवाले कालिय नागके मस्तकपर चढ़ गये। विश्वम्भरके भारसे आक्रान्त हो कालिय नाग प्राण त्याग देनेको उद्यत हो गया। मुने! उसने रक्त वमन किया और मूर्च्छित होकर वह गिर पड़ा। उसे मूर्च्छित देख सब नाग प्रेमसे विह्वल हो रोने लगे। कोई भाग गये और कोई डरके मारे बिलमें घुस गये। अपने प्रियतमको मरणोन्मुख हुआ देख नागपत्नी सती सुरसा दूसरी नागिनियोंके साथ श्रीहरिके सामने आयी और पति-प्रेमसे रोने लगी। उसने दोनों हाथ जोड़कर शीघ्र ही भयसे श्रीहरिको प्रणाम किया और उनके दोनों चरणारविन्द पकड़कर व्याकुल हो उनसे कहा।
सुरसा बोली—हे जगदीश्वर! आप मुझे मेरे स्वामीको लौटा दीजिये। दूसरोंको मान देनेवाले प्रभो! मुझे भी मान दीजिये। स्त्रियोंको पति प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय होता है। उनके लिये पतिसे बढ़कर दूसरा कोई बन्धु नहीं है। नाथ! आप देवेश्वरोंके भी स्वामी, अनन्त प्रेमके सागर, उत्तम बन्धु, सम्पूर्ण भुवनोंके बान्धव तथा श्रीराधिकाजीके लिये प्रेमके समुद्र हैं। अतः मेरे प्राणनाथका वध न कीजिये। आप विधाताके भी विधाता हैं। इसलिये यहाँ मुझे पतिदान दीजिये। त्रिनेत्रधारी महादेवके पाँच मुख हैं; ब्रह्माजीके चार और शेषनागके सहस्र मुख हैं; कार्तिकेयके भी छः मुख हैं; परंतु ये लोग भी अपने मुख-समूहोंद्वारा आपकी स्तुति करनेमें जडवत् हो जाते हैं। साक्षात् सरस्वती भी आपका स्तवन करनेमें समर्थ नहीं हैं। सम्पूर्ण वेद, अन्यान्य देवता तथा संत-महात्मा भी आपकी स्तुतिके विषयमें शक्तिहीनताका ही परिचय देते हैं। कहाँ तो मैं कुबुद्धि, अज्ञ एवं नारियोंमें अधम सर्पिणी और कहाँ सम्पूर्ण भुवनोंके परम आश्रय तथा किसीके भी दृष्टिपथमें न आनेवाले आप परमेश्वर! जिनकी स्तुति ब्रह्मा, विष्णु और शेषनाग करते हैं, उन मानव-वेषधारी आप निराकार परमेश्वरकी स्तुति मैं करना चाहती हूँ, यह कैसी विडम्बना है? पार्वती, लक्ष्मी तथा वेदजननी सावित्री जिनके स्तवनसे डरती हैं और स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हो पातीं; उन्हीं आप परमेश्वरका स्तवन कलिकलुषमें निमग्न तथा वेद-वेदाङ्ग एवं शास्त्रोंके श्रवणमें मूढ़ स्त्री मैं क्यों करना चाहती हूँ, यह समझमें नहीं आता। आप रत्नमय पर्यङ्कपर रत्ननिर्मित भूषणोंसे भूषित हो शयन करते हैं। रत्नालंकारोंसे अलंकृत अङ्गवाली राधिकाके वक्षःस्थलपर विराजमान होते हैं। आपके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित रहते हैं, मुखारविन्दपर मन्द मुस्कानकी प्रभा फैली होती है। आप उमड़ते हुए प्रेमरसके महासागरमें सदा सुखसे निमग्न रहते हैं। आपका मस्तक मल्लिका और मालतीकी मालाओंसे सुशोभित होता है। आपका मानस नित्य निरन्तर पारिजात पुष्पोंकी सुगन्धसे आमोदित रहा करता है। कोकिलके कलरव तथा भ्रमरोंके गुञ्जारवसे उद्दीपित प्रेमके कारण आपके अङ्ग उठी हुई पुलकावलियोंसे अलंकृत रहते हैं। जो सदा प्रियतमाके दिये हुए ताम्बूलका सानन्द
| ५१६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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चर्वण करते हैं; वेद भी जिनकी स्तुति करनेमें असमर्थ हैं तथा बड़े-बड़े विद्वान् भी जिनके स्तवनमें जडवत् हो जाते हैं; उन्हीं अनिर्वचनीय परमेश्वरका स्तवन मुझ-जैसी नागिन क्या कर सकती है? मैं तो आपके उन चरणकमलोंकी वन्दना करती हूँ, जिनका सेवन ब्रह्मा, शिव और शेष करते हैं तथा जिनकी सेवा सदा लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती, गङ्गा, वेदमाता सावित्री, सिद्धोंके समुदाय, मुनीन्द्र और मनु करते हैं। आप स्वयं कारणरहित हैं, किंतु सबके कारण आप ही हैं। सर्वेश्वर होते हुए भी परात्पर हैं स्वयंप्रकाश, कार्य-कारणस्वरूप तथा उन कार्य-कारणोंके भी अधिपति हैं। आपको मेरा नमस्कार है। हे श्रीकृष्ण ! हे सच्चिदानन्दघन ! हे सुरासुरेश्वर ! आप ब्रह्मा, शिव, शेषनाग, प्रजापति, मुनि, मनु, चराचर प्राणी, अणिमा आदि सिद्धि, सिद्ध तथा गुणोंके भी स्वामी हैं। मेरे पतिकी रक्षा कीजिये, आप धर्म और धर्मीके तथा शुभ और अशुभके भी स्वामी हैं। सम्पूर्ण वेदोंके स्वामी होते हुए भी उन वेदोंमें आपका अच्छी तरह निरूपण नहीं हो सका है। सर्वेश्वर ! आप सर्वस्वरूप तथा सबके बन्धु हैं। जीवधारियों तथा जीवोंके भी स्वामी हैं। अतः मेरे पतिकी रक्षा कीजिये।
इस प्रकार स्तुति करके नागराजवल्लभा सुरसा भक्तिभावसे मस्तक झुका श्रीकृष्णके चरणकमलोंको पकड़कर बैठ गयी। नागपत्नीद्वारा किये गये इस स्तोत्रका जो त्रिकाल संध्याके समय पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो अन्ततोगत्वा श्रीहरिके धाममें चला जाता है। उसे इहलोकमें श्रीहरिकी भक्ति प्राप्त होती है और अन्तमें वह निश्चय ही श्रीकृष्णका दास्य-सुख पा जाता है। वह श्रीहरिका पार्षद हो सालोक्य आदि चतुर्विध मुक्तियोंको करतलगत कर लेता है।
**नारदजीने पूछा—**नागपत्नीकी बात सुनकर हर्षसे उत्फुल्ल नेत्रोंवाले सर्वनन्दन भगवान् गोविन्दने स्वयं उससे क्या कहा? महाभाग ! यह अत्यन्त अद्भुत रहस्य मुझसे बताइये।
**भगवान् नारायणने कहा—**मुने! नागपत्नी भयसे व्याकुल हो हाथ जोड़कर भगवान्के चरणोंमें पड़ी थी। उसकी उपर्युक्त बातें सुनकर श्रीकृष्णने उससे इस प्रकार कहा—
**श्रीकृष्ण बोले—**नागेश्वरि ! उठो, उठो। भय छोड़ो और वर माँगो। मात:! मेरे वरके प्रभावसे अजर-अमर हुए अपने पतिको ग्रहण करो और यमुनाका हृद छोड़कर अपने घरको चली जाओ। वत्से ! अपने पति और परिवारके साथ अभीष्ट स्थानको पधारो। नागेशि ! आजसे तुम मेरी कन्या हुई और तुम्हारे प्राणोंसे भी अधिक प्रियतम यह नागराज मेरे जामाता हुए; इसमें संशय नहीं है। शुभे ! मेरे चरणकमलोंके चिह्नसे युक्त होनेके कारण तुम्हारे पतिको अब गरुड कष्ट नहीं देंगे, अपितु भक्तिभावसे स्तुति करके मेरे चरणचिह्नको प्रणाम करेंगे। अब तुम गरुडका भय छोड़ो और शीघ्र रमणक द्वीपको चली जाओ। बेटी ! इस हृदसे निकलो और इच्छानुसार वर माँगो।
श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर सुरसाके नेत्र और मुख हर्षसे खिल उठे। उसकी आँखोंमें आँसू भर आये तथा उसने भक्ति-भावसे मस्तक झुकाकर कहा।
**सुरसा बोली—**वरदाता परमेश्वर ! पिताजी ! यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो अपने चरणकमलोंकी सुदृढ़ एवं अविचल भक्ति प्रदान कीजिये। मेरा मन भ्रमरकी भाँति सदा आपके चरणारविन्दपर ही मँडराता रहे। मुझे आपके स्मरणकी कभी विस्मृति न हो, मेरा कान्तविषयक सौभाग्य सदा बना रहे और ये मेरे प्राणवल्लभ ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हो जायँ। प्रभो ! यही मेरी प्रार्थना है; इसे पूर्ण कीजिये।
७८- भाण्डीरवटके नीचे रत्नमय सिंहासनपर विराजमान श्रीकृष्णको अत्यन्त विस्मित होकर तथा हाथ जोड़कर ब्रह्माजीका प्रणाम करना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५१७
ऐसा कहकर नागपत्नी श्रीहरिके सामने नत हुई खड़ी हो गयी। उसने शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाको लज्जित करनेवाले श्रीहरिके मुखचन्द्रका दर्शन किये। उस सतीने अपने दोनों नेत्रोंसे निमेषरहित होकर गोविन्दके मुखकी सौन्दर्यमाधुरीका पान किया। उसके सारे अङ्ग पुलकित हो उठे। वह आनन्दके आँसुओंमें डूब गयी। श्रीहरिको सुन्दर बालकके रूपमें देखकर वह उनके प्रति पुत्रोचित स्नेह करने लगी और भक्तिके उद्रेकसे आप्लावित हो पुनः इस प्रकार बोली—'गोविन्द! मैं रमणक-द्वीपमें नहीं जाऊँगी। वहाँ मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। यह सर्प वहाँ जाकर संसार चलावे, मुझे तो आप अपनी किङ्करी बना लीजिये! हे श्रीकृष्ण! मेरे मनमें सालोक्य आदि चार प्रकारकी मुक्तिके लिये भी इच्छा नहीं है; क्योंकि वह मुक्ति आपके चरणारविन्दोंकी सेवाकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है। जो भारतवर्षमें दुर्लभ जन्म पाकर आपसे आपकी चरणसेवाके अतिरिक्त दूसरे वरकी इच्छा करता है, वह स्वयं ठगा गया*।'
नागपत्नीकी यह बात सुनकर श्रीकृष्णके मुखारविन्दपर मुस्कराहट फैल गयी। उनका मन प्रसन्न हो गया और उन श्रीमान् माधवने 'एवमस्तु' कहकर उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। इसी बीचमें उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित दिव्य विमान वहाँ तत्काल उतर आया। मुने! वह अपने तेजसे उद्दीप्त हो रहा था। उसपर अनेक श्रेष्ठ पार्षद बैठे थे तथा उसे दिव्य वस्त्रों एवं मालाओंसे सजाया गया था। उसमें सौ पहिये लगे थे। वह वायुके समान वेगशाली तथा मनकी गतिसे चलनेवाला था। देखनेमें बड़ा ही मनोहर था। श्यामसुन्दरके श्याम कान्तिवाले सेवक तुरंत ही उस रथसे उतरे और श्रीकृष्णको प्रणाम करके सुरसाको साथ ले उत्तम गोलोकधामको चले गये।
तत्पश्चात् श्रीहरिने अपने तेजसे छायारूपिणी सुरसाकी सृष्टि करके उसे सर्पको दे दिया। कालियनाग यह सब कुछ न जान सका; क्योंकि वह वैष्णवी मायासे विमोहित था। सर्पके मस्तकसे उतरकर करुणानिधान श्रीकृष्णने कृपापूर्वक शीघ्र ही कालियके सिरपर अपना हाथ रखा। हाथ रखते ही उसके शरीरमें चेतना लौट आयी और उसने श्रीहरिको अपने सामने देखा तथा इस बातकी ओर भी लक्ष्य किया कि सती सुरसा दोनों हाथ जोड़े खड़ी है और उसके नेत्रोंसे आँसू बह रहे हैं। यह देख उसने भी गोविन्दको प्रणाम किया और तत्काल प्रेमसे विह्वल होकर वह रोने लगा। कृपानिधान भगवान्ने देखा नागराज रो रहा है और सुरसा भक्तिके उद्रेकसे पुलकित हो नेत्रोंसे आँसू बहा रही है; किंतु कुछ बोल नहीं रही है। तब वे दयानिधि स्वयं बोले; क्योंकि योग्य और अयोग्य प्राणीपर भी ईश्वरकी कृपा सदा समान रूपसे ही रहती है।
श्रीकृष्णने कहा—कालिय! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो। वत्स! तुम मुझे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हो। भय छोड़ो और सुखसे रहो। जो मेरा अत्यन्त भक्त हो और मेरे अंशसे उत्पन्न हुआ हो, उसपर मैं विशेष अनुग्रह करता हूँ। उसके अभिमानको मिटानेके लिये उसका किञ्चित् दमन करके मैं पुनः उसपर कृपा करता हूँ। जो लोग तुम्हारे वंशमें उत्पन्न हुए सर्पोंका विनाश करेंगे, उनको महान् पाप लगेगा और वे दुःखोंके भागी होंगे। परंतु जो लोग तुम्हारे कुलमें उत्पन्न हुए सर्पोंको देखकर उनके मस्तकपर उभरे हुए मेरे सुन्दर चरणचिह्नोंको भक्तिभावसे प्रणाम करेंगे, वे समस्त पातकोंसे मुक्त हो जायँगे। तुम शीघ्र रमणक द्वीपको जाओ
* विना त्वत्पादसेवां च यो वाञ्छति वरान्तरम् । भारते दुर्लभं जन्म लब्ध्वासौ वञ्चितः स्वयम् ॥
(१९। ५२)
| ५१८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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और गरुड़का भय छोड़ दो। तुम्हारे मस्तकपर मेरे चरणचिह्नको देखकर गरुड़ भक्तिभावसे तुम्हें नमस्कार करेंगे। तुमको और तुम्हारे वंशजोंको गरुड़से कभी भय नहीं होगा। आजसे मेरा वर पाकर अपनी जातिके सर्पोंमें तुम सर्वश्रेष्ठ हो जाओ। वत्स! तुमको और कौन-सा उत्तम वर अभीष्ट है? उसे इस समय माँगो। मैं तुम्हारा दुःख दूर करनेवाला हूँ; अतः भय छोड़कर मुझसे मनकी बात कहो।
श्रीकृष्णकी बात सुनकर कालियनाग, जो भयसे काँप रहा था, दोनों हाथ जोड़कर उनसे बोला।
**कालियने कहा—**वरदायक प्रभो! दूसरे किसी वरके लिये मेरी इच्छा नहीं है। प्रत्येक जन्ममें मेरी आपके चरणकमलोंमें भक्ति बनी रहे और मैं सदा आपके उन चरणारविन्दोंका चिन्तन करता रहूँ; यही वर मुझे दीजिये। जन्म ब्राह्मणके कुलमें हो या पशु-पक्षियोंकी योनियोंमें, सब समान है। वही जन्म सफल है, जिसमें आपके चरणकमलोंकी स्मृति बनी रहे। यदि आपके चरणोंका स्मरण न हो तो देवता होकर स्वर्गमें रहना भी निष्फल है। जो आपके चरणोंके चिन्तनमें तत्पर है, उसे जो भी स्थान प्राप्त हो, वही सबसे उत्तम है। उस पुरुषकी आयु एक क्षणकी हो या करोड़ों कल्पोंकी अथवा उसकी आयु तत्काल ही क्षीण होनेवाली क्यों न हो; यदि वह आपकी आराधनामें बीत रही है तो सफल है, अन्यथा उसका कोई फल नहीं है—वह व्यर्थ है। जो आपके चरणारविन्दोंके सेवक हैं, उनकी आयु व्यर्थ नहीं जाती, सार्थक होती है। उन्हें जन्म-मरण, रोग-शोक और पीड़ाका कुछ भी भय नहीं रहता—वे इनकी कुछ भी परवाह नहीं करते। भक्तोंके मनमें आपके चरणोंकी सेवाको छोड़कर इन्द्रपद, अमरत्व अथवा परम दुर्लभ ब्रह्मपदको भी पानेकी इच्छा नहीं होती। आपके भक्तजन सालोक्य आदि चार प्रकारकी मुक्तियोंको अत्यन्त फटे पुराने वस्त्रके चिथड़ेके समान तुच्छ देखते हैं*। ब्रह्मन्! मैंने भगवान् अनन्तके मुखसे ज्यों ही आपके मन्त्रका उपदेश प्राप्त किया, त्यों ही आपकी भावना करते-करते आपके अनुग्रहसे मैं आपके समान वर्णवाला हो गया। मैं अपक्व भक्त था अर्थात् मेरी भक्ति परिपक्व नहीं हुई थी। यह जानकर ही स्वयं सुदृढ़ भक्ति धारण करनेवाले गरुड़ने मुझे देशसे दूर कर दिया और धिक्कारा था। परंतु वरदेश्वर! अब आपने मुझे अविचल भक्ति दे दी है। गरुड़ भी भक्त हैं, मैं भी भक्त हो गया हूँ; अतः अब वे मेरा त्याग नहीं कर सकते हैं। आपके चरणारविन्दोंके चिह्नसे अलंकृत मेरे श्रीयुत मस्तकको देखकर गरुड़ मुझे सदोष होनेपर भी गुणवान् मानेंगे; अतः इस समय मेरा त्याग नहीं कर सकेंगे। अब तो वे यह मानकर कि नागेन्द्रगण हमारे आराध्य हैं, मुझे कष्ट नहीं देंगे। परमेश्वर! अब मैं उनका वध्य नहीं रहा। उन गुरुदेव अनन्तके सिवा मुझे कहीं किसीसे भी भय नहीं है। देवेन्द्रगण, देवता, मुनि, मनु और मानव—जिन्हें स्वप्नमें तथा ध्यानमें भी नहीं देख पाते हैं—वे ही परमात्मा इस समय मेरे
* तन्निष्फलः स्वर्गवासो नास्ति यस्य स्मृतिस्तव। त्वत्पदध्यानयुक्तस्य यत्तत् स्थानं च तत्परम्॥
क्षणं वा कोटिकल्पं वा पुरुषायुश्च यस्तथा। यदि त्वत्सेवया याति सफलो निष्फलोऽन्यथा॥
तेषां चायुः क्षयो नास्ति ये त्वत्पादाब्जसेवकाः। न सन्ति जन्ममरणरोगशोकार्तिभीतयः॥
इन्द्रत्वे चामरत्वे वा ब्रह्मत्वे चातिदुर्लभे। वाञ्छा नास्त्येव भक्तानां त्वत्पादसेवनं विना॥
सुजीर्णपटखण्डस्य समं तन्नूनमेव वा। पश्यन्ति भक्ताः किं चान्यत् सालोक्यादिचतुष्टयम्॥
(१९।७६–८०)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५१९ नेत्रोंके विषय हो रहे हैं। प्रभो! आप तो भक्तोंके अनुरोधसे साकार रूपमें प्रकट हुए हैं; अन्यथा आपको शरीरकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? सगुण-साकार तथा निर्गुण-निराकार भी आप ही हैं। आप स्वेच्छामय, सबके आवासस्थान तथा समस्त चराचर जगत्के सनातन बीज हैं। सबके ईश्वर, साक्षी, आत्मा और सर्वरूपधारी हैं। ब्रह्मा, शिव, शेष, धर्म और इन्द्र आदि देवता तथा वेदों और वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् भी जिन परमेश्वरकी स्तुति करनेमें जडवत् हो जाते हैं, उन्हीं सर्वव्यापी प्रभुका स्तवन क्या एक सर्प कर सकेगा? हे नाथ! हे करुणासिन्धो! हे दीनबन्धो! आप मुझ अधमको क्षमा कीजिये। श्रीकृष्ण! मैंने अपने खल स्वभाव और अज्ञानके कारण आपको चबा डालनेका प्रयत्न किया; परंतु आप तो आकाशकी भाँति सर्वत्र व्यापक तथा अमूर्त हैं; अतः किसी भी अस्त्रके लक्ष्य नहीं हैं। न तो आपका अन्त देखा जा सकता है और न लाँघा ही जा सकता है। न तो कोई आपका स्पर्श कर सकता है और न आपपर आवरण ही डाल सकता है। आप स्वयं प्रकाशरूप हैं। ऐसा कहकर नागराज कालिय भगवान्के चरणकमलोंमें गिर पड़ा। भगवान् उसपर संतुष्ट हो गये। उन्होंने 'एवमस्तु' कहकर उसे सम्पूर्ण अभीष्ट वर दे दिया। जो नागराजद्वारा किये गये स्तोत्रका प्रातःकाल उठकर पाठ करता है, उसे तथा उसके वंशजोंको कभी नागोंसे भय नहीं होता। वह भूतलपर नागोंकी शय्या बनाकर सदा उसपर शयन कर सकता है। उसके भोजनमें विष और अमृतका भेद नहीं रह जाता। जिसको नागने ग्रस लिया हो, काट खाया हो अथवा विषैला भोजन करनेसे जिसके प्राणान्तकी सम्भावना हो गयी हो, वह मनुष्य भी इस स्तोत्रको सुननेमात्रसे स्वस्थ हो जाता है। जो इस स्तोत्रको भोजपत्रपर लिखकर भक्तिभावसे युक्त हो कण्ठमें या दाहिने हाथमें धारण करता है, उसे भी नागोंसे भय नहीं होता। जिस घरमें यह स्तोत्र पढ़ा जाता है, वहाँ कोई नाग नहीं ठहरता। निश्चय ही उस घरमें विष, अग्नि तथा वज्रका भय नहीं प्राप्त होता। इहलोकमें श्रीहरिकी भक्ति और स्मृति उसे सदा सुलभ होती है तथा अन्तमें अपने कुलको पवित्र करके निश्चय ही वह श्रीकृष्णका दास्यभाव प्राप्त कर लेता है। भगवान् नारायण कहते हैं-नारद! नागराजको अभीष्ट वर देकर जगदीश्वर श्रीहरिने पुनः उससे मधुर वचन कहे, जो परिणाममें सुख देनेवाले थे। श्रीकृष्ण बोले-नागराज! तुम यमुना- जलके मार्गसे ही परिवारसहित रमणकद्वीपमें चले जाओ। वह स्थान इन्द्रनगरके समान श्रेष्ठ एवं सुन्दर है। श्रीहरिकी यह आज्ञा सुनकर नाग प्रेमविह्वल होकर रोने लगा और बोला- 'नाथ ! मैं आपके चरणकमलोंका कब दर्शन करूँगा?' वह महेश्वर श्रीकृष्णको सैकड़ों बार प्रणाम करके स्त्री और परिवारके साथ जलके ही मार्गसे चला गया। जाते समय नागराज भगवद्-विरहसे व्याकुल हो रहा था। उसके चले जानेके बाद यमुनाके उस कुण्डका जल अमृतके समान हो गया। इससे समस्त जन्तुओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। नारद! रमणकमें पहुँचकर कालियने इन्द्रनगरके समान सुन्दर भवन देखा। कृपासिन्धु श्रीकृष्णकी आज्ञासे साक्षात् विश्वकर्माने उसका निर्माण किया था। वहाँ नागराज कालिय अपनी पत्नी और पुत्रोंके साथ श्रीहरिके चिन्तनमें तत्पर हो भय छोड़कर बड़े हर्षके साथ रहने लगा। इस प्रकार श्रीहरिका सारा अद्भुत, सुखदायक, मोक्षप्रद तथा सारभूत चरित्र मैंने कह सुनाया। अब और क्या सुनना चाहते हो? सूतजी कहते हैं-महर्षि नारायणका उपर्युक्त
७९- नन्दद्वारा इन्द्रयज्ञकी तैयारी देखकर श्रीकृष्णका विस्मित होकर उनसे पूजनके स्वरूप आदिके विषयमें प्रश्न करना
| ५२० | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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वचन सुनकर नारदजी हर्षविभोर हो गये। उन्होंने समस्त संदेहोंका निवारण करनेवाले उन महर्षिसे अपना संदेह इस प्रकार पूछा।
नारदजी बोले— जगद्गुरो! अपने पहलेके उत्तम भवनको छोड़कर कालिय यमुनातटको क्यों चला गया था? इसका रहस्य मुझे बताइये।
भगवान् श्रीनारायणने कहा— नारद! सुनो। मैं उस प्राचीन इतिहासका वर्णन कर रहा हूँ, जिसे मैंने सूर्यग्रहणके समय मलयाचलपर सुप्रभा नदीके पश्चिम किनारे श्रीकृष्ण-कथाके प्रसङ्गमें पिता धर्मके मुखसे सुना था। पुलहने धर्मसे अपना संदेह पूछा था, तब कृपानिधान धर्मने मुनियोंकी सभामें इस आश्चर्यमय आख्यानको सुनाया था। नारद! वहीं मैंने इसे सुना था, अतः कहता हूँ, सुनो।
भगवान् शेषकी आज्ञासे नागगण प्रतिवर्ष कार्तिककी पूर्णिमाको भयके कारण गरुड़देवकी पूजा करते हैं। पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और विविध उपहार-सामग्री अर्पित करके प्रसन्नतापूर्वक उनकी आराधना करते हैं। महातीर्थ पुष्करमें भक्तिपूर्वक भलीभाँति स्नान करके कालियने अहंकारवश उक्त तिथिको गरुड़की पूजा नहीं की। नागोंद्वारा जो पूजाकी सामग्री एकत्र की गयी थी, उसे कालियनाग बलपूर्वक खानेको उद्यत हो गया। तब सभी नाग उस मदमत्त कालियको रोकने तथा उसे नीतिकी बात बताने लगे। जब किसी तरह भी वे कालियको रोकनेमें समर्थ न हो सके, तब सहसा वहाँ पक्षिराज गरुड़ प्रकट हो गये। मुने! गरुड़को आया देख नागगण कालियके प्राणोंकी रक्षा करनेके लिये जबतक सूर्योदय नहीं हुआ, तबतक पूरी शक्ति लगाकर उनके साथ युद्ध करते रहे। अन्तमें पक्षिराजके तेजसे उद्विग्न हो वे सब-के-सब भाग खड़े हुए और सबके अभयदाता भगवान् अनन्तकी शरणमें गये। नागोंको भागते देख करुणानिधान कालिय वहाँ निःशङ्कभावसे खड़ा रहा। उसने गरुड़की ओर देखा और श्रीहरिके चरणारविन्दोंका चिन्तन करके गरुड़के साथ युद्ध आरम्भ कर दिया। एक मुहूर्ततक उन दोनोंमें अत्यन्त भयानक युद्ध हुआ। अन्तमें गरुड़के तेजसे नागराज कालियको पराजित होना पड़ा। फिर तो वह भागा और यमुनाजीके उसी कुण्डमें चला गया, जहाँ सौभरिके शापसे पक्षिराज गरुड़ नहीं जा सकते थे। गरुड़के भयसे नाग वहीं रहने लगा। पीछेसे उसके परिवारके लोग भी वहीं चले गये।
नारदजीने पूछा— भगवन्! गरुड़को सौभरिका शाप कैसे प्राप्त हुआ? परमेश्वरके वाहन होकर भी गरुड़ उस ह्रदमें क्यों नहीं जा सकते थे?
भगवान् श्रीनारायण बोले— उस कुण्डमें सौभरि मुनि एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक तपस्या करके महासिद्ध हो श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान करते थे। उन ध्यानपरायण मुनिके समीप पक्षिराज गरुड़ यमुनाजीके जलमें तथा किनारे भी अपने गणोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक निःशङ्क विचरा करते थे। वे अपनी उत्कृष्ट इच्छासे प्रेरित हो बहुधा पूँछ (अथवा पंख) ऊपरको उठाकर मुनिके अगल-बगलमें उनकी सानन्द परिक्रमा करते हुए जाते-आते थे। एक दिन उन्होंने परिवारसहित विशालकाय मीनको देखा। देखते-ही-देखते गरुड़ने मुनीन्द्रके निकटसे ही उस मीनको चोंचसे पकड़ लिया। मछलीको मुँहमें दबाये जाते हुए गरुड़को मुनिने रोषभरी दृष्टिसे देखा। मुनिकी उस दृष्टिसे गरुड़ काँप उठे और वह महामत्स्य उनकी चोंचसे छूटकर पानीमें गिर पड़ा। गरुड़के डरसे वह मीन मुनिके पास ठहर गया—उनके शरणागत हो गया। जब गरुड़ पुनः उसे लेनेको उद्यत हुए, तब मुनीन्द्रने उनसे कहा।
सौभरि बोले— पक्षिराज! मेरे पाससे दूर हटो, दूर हटो। मेरे सामनेसे इस विशाल जीवको पकड़ लेनेकी तुममें क्या योग्यता है? तुम
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५२१
अपनेको श्रीकृष्णका वाहन समझकर बहुत बड़ा मानते हो। श्रीकृष्ण तुम्हारे-जैसे करोड़ों वाहन रच लेनेकी शक्ति रखते हैं। मैं अपनी भौंहें टेढ़ी करनेमात्रसे तुम्हें शीघ्र और अनायास ही भस्म कर सकता हूँ। तुम परमेश्वरके वाहन हो तो क्या हुआ? हमलोग तुम्हारे दास नहीं हैं। पक्षिराज! यदि आजसे कभी भी मेरे इस कुण्डमें आओगे तो मेरे शापसे तत्काल भस्म हो जाओगे। यह ध्रुव सत्य है।
मुनीन्द्रकी बात सुनकर पक्षिराज विचलित हो गये। वे श्रीकृष्णके चरणोंका स्मरण करते-करते उन्हें प्रणाम करके चल दिये। विप्रवर नारद! तबसे अबतक सदा ही उस कुण्डका नाम सुननेमात्रसे पक्षिराजको कँपकँपी आ जाती है। यह इतिहास, जो धर्मके मुखसे सुना गया था, तुमसे कहा गया। अब जिसका प्रकरण चल रहा है, श्रीहरिके उस श्रवणसुखद, रहस्ययुक्त तथा मङ्गलमय लीलाचरित्रको सुनो।
श्रीकृष्ण बहुत देरतक यमुना-जलसे ऊपर नहीं उठे। यह जानकर ग्वालबाल दुःखी हो गये। वे मोहवश यमुनाके तटपर रोने लगे। कुछ बालक शोकसे व्याकुल हो अपनी छाती पीटने लगे। कोई श्रीहरिके बिना पृथ्वीपर पछाड़ खाकर गिरे और मूर्च्छित हो गये। कितने ही बालक श्रीकृष्णविरहसे व्यथित हो कालियदहमें प्रवेश करनेको उद्यत हो गये और कुछ ग्वालबाल उनको उसमें जानेसे रोकने लगे। कोई-कोई विलाप करके प्राण त्याग देनेको उद्यत हो गये और उनमें जो समझदार थे, ऐसे कुछ बालक उन मरणोन्मुख बालकोंकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करने लगे। कोई 'हाय-हाय' कहकर रोने-बिलखने लगे। कोई 'कृष्ण-कृष्ण' की रट लगाने लगे और कोई इस समाचारको बतानेके लिये नन्दरायजीके समीप दौड़े गये। कुछ बालक वहाँ शोक, भय और मोहसे आतुर हो परस्पर मिलकर यों कहने लगे—'हम क्या करें? हमारे श्रीहरि कहाँ चले गये? हे नन्दनन्दन! हे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रियतम श्रीकृष्ण! हे बन्धो! हमें दर्शन दो। हमारे प्राण निकले जा रहे हैं।'
इसी बीचमें कुछ बालक नन्दरायजीके निकट जा पहुँचे। वे अत्यन्त चञ्चल थे और शोकसे व्याकुल होकर रो रहे थे। उन्होंने शीघ्र ही यशोदाको, उनके पास बैठे हुए बलरामको तथा अन्यान्य गोपों और लाल कमलके समान नेत्रोंवाली गोपाङ्गनाओंको यह समाचार बताया। यह समाचार सुनकर वे सब-के-सब शोकसे व्याकुल हो दौड़ते हुए यमुनातटपर जा पहुँचे और बालकोंके साथ रोने लगे। सारे व्रजवासी एकत्र हो रोते-रोते शोकसे मूर्च्छित हो गये। माता यशोदा कालियदहमें प्रवेश करने लगीं। यह देख कुछ लोगोंने उन्हें रोका। गोप और गोपियाँ शोकसे अपने ही अङ्गोंको पीटने लगीं। कुछ लोग विलाप करने लगे और कितने ही व्रजवासी अपनी सुध-बुध खो बैठे। राधा भी यमुनाजीके उस कुण्डमें घुसने लगीं। यह देख कुछ स्त्रियोंने दौड़कर उन्हें रोका। वे शोकसे मूर्च्छित हो गयीं और उस नदीके तटपर मरी हुईके समान पड़
५२२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण गयीं। नन्दरायजी अत्यन्त विलाप करके बार- बार मूर्च्छित होने लगे। वे चेत होनेपर पुनः रोते तथा रो-रोकर फिर मूर्च्छित हो जाते थे। उस समय ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ बलरामजीने अत्यन्त विलाप करते हुए नन्दको, शोकसे कातर हुई यशोदाको, गोपों और गोपाङ्गनाओंको, अत्यन्त मूर्च्छित राधिकाको, रोते हुए समस्त बालकोंको तथा शोकग्रस्त हुई सम्पूर्ण गोप-बालिकाओंको धीरज बँधाते हुए समझना आरम्भ किया। श्रीबलदेव बोले-हे गोपो ! गोपियो ! और बालको ! सब लोग मेरी बात सुनो। हे नन्दबाबा ! ज्ञानिशिरोमणि गर्गजीकी बातोंको याद करो। जो जगत्का भार उठानेवाले शेषके भी आधारभूत हैं, संहारकारी शंकरके भी संहारक हैं तथा विधाताके भी विधाता हैं; उनकी इस भूतलपर किससे पराजय हो सकती है? श्रीकृष्ण अणुसे भी अणु तथा परम महान् हैं। वे स्थूलसे भी स्थूल तथा परात्पर हैं। उनकी सत्ता सदा और सर्वत्र विद्यमान है; तथापि वे किसीके दृष्टिपथमें नहीं आते। वे ही योगियोंके भी सम्यक् योग हैं। श्रुतियोंने स्पष्ट कहा है कि सम्पूर्ण दिशाएँ कभी एकत्र नहीं हो सकतीं, आकाशको कोई छू नहीं सकता तथा सर्वेश्वरको कोई बाधा नहीं पहुँच सकता। श्रीकृष्ण सबके आत्मा हैं। आत्मा किसीकी दृष्टिमें नहीं आता। उसे अस्त्रोंका निशाना नहीं बनाया जा सकता। वह न तो वधके योग्य है और न दृश्य ही है। उसे आग नहीं जला सकती और न उसकी हिंसा ही की जा सकती है। अध्यात्मतत्त्वके विज्ञाता विद्वानोंने आत्माको ऐसा ही जाना और माना है। इन श्रीकृष्णका विग्रह भक्तोंके ध्यानके लिये ही है। ये ज्योतिःस्वरूप और सर्वव्यापी हैं। इन परमात्माका आदि, मध्य और अन्त नहीं है। जब सारा ब्रह्माण्ड एकार्णवके जलमें मग्न हो जाता है तब ये श्रीकृष्ण जलमें शयन करते हैं। उस समय इनकी नाभिसे जो कमल पैदा होता है, उसीसे ब्रह्माजीका प्राकट्य होता है। जिन्हें एकार्णवके जलमें भी भय नहीं है, उन्हीं परमेश्वरके लिये इस कालियदहमें विपत्तिकी सम्भावना कितना महान् अज्ञान है ? पिताजी ! यदि एक मच्छर सारे ब्रह्माण्डको निगल जानेमें समर्थ हो जाय तो भी उन ब्रह्माण्डनायकको वह सर्प अपना ग्रास नहीं बना सकता। यह मैंने परम उत्तम सम्पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञानकी बात कही है। यह गूढ़ ज्ञान योगियोंके लिये सार वस्तु है। इससे समस्त संशयोंका उच्छेद हो जाता है। बलदेवजीकी बात सुनकर और गर्गजीके वचनोंको याद करके नन्दजीने शोक त्याग दिया। व्रजवासियों और व्रजाङ्गनाओंका भी शोक जाता रहा। सबने बलदेवजीके इस प्रबोधनको मान लिया; परंतु यशोदा और राधिकाको इससे संतोष न हुआ। प्रियजनके विरहके विषयमें मन किसी प्रकारके प्रबोधको नहीं ग्रहण करता- जबतक प्रियजनका मिलन न हो जाय, तबतक केवल समझाने-बुझानेसे मनको शान्ति नहीं मिल सकती। मुने ! इसी समय व्रजवासियों और व्रजाङ्गनाओंने
८०- गोवर्धन-पूजाके समय श्रीकृष्णका लोगोंसे वर माँगनेके लिये कहना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५२३
श्रीकृष्णको जलसे ऊपरको उछलते देखा। इससे उनके हर्षकी सीमा न रही। उनका शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति परम मनोहर मुख और उनकी मन्द-मन्द मुस्कराहट मनको बरबस अपनी ओर खींचे लेती थी। पानीसे निकलनेपर भी वस्त्र भीगे नहीं थे। शरीर भी आर्द्र नहीं था। भाल-देशमें चन्दन और नेत्रोंमें अञ्जनका शृङ्गार भी लुप्त नहीं हुआ था। समस्त आभूषणोंसे अलंकृत, सिरपर मोरपंखका मुकुट धारण किये और अधरोंसे मुरली लगाये अच्युत श्रीकृष्ण ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रहे थे। यशोदा अपने लालाको देखते ही छातीसे लगाकर मुस्करा उठीं और उनके मुखारविन्दको चूमने लगीं। उस समय उनके नेत्र और मुख प्रसन्नतासे खिल उठे थे। नन्द, बलराम तथा रोहिणीजीने बारी-बारीसे श्यामसुन्दरको हर्षपूर्वक हृदयसे लगाया। सब लोग एकटक हो गोविन्दके श्रीमुखका दर्शन करने लगे। प्रेमसे अंधे हुए सम्पूर्ण ग्वालबालोंने श्रीहरिका आलिङ्गन किया। गोपाङ्गनाएँ नेत्र-चकोरोंद्वारा उनके मुखचन्द्रकी मधुर सुधाका पान करने लगीं।
इतनेमें ही वहाँ सहसा वनके भीतरी भागको दावानलने आवेष्टित कर लिया। उन सबके साथ गौओंका समुदाय भी उस दावाग्निसे घिर गया। वनके भीतर चारों ओर पर्वतोंके समान आगकी ऊँची-ऊँची लपटें उठने लगीं। यह देख सबने अपना नाश निकट ही समझा। उस संकटसे सब भयभीत हो उठे। उस समय सारे व्रजवासी, गोपीजन और ग्वालबाल संत्रस्त हो भक्तिसे सिर झुका दोनों हाथ जोड़कर श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे।
ग्वालबाल बोले—ब्रह्मन्! मधुसूदन! आपने सब आपत्तियोंमें जैसे हमारे कुलकी रक्षा की है, उसी प्रकार फिर इस दावानलसे हमें बचाइये। जगत्पते! आप ही हमारे इष्टदेवता हैं और आप ही कुलदेवता। संसारकी सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले भी आप ही हैं। अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, सूर्य, यम, कुबेर, वायु, ईशानादि देवता, ब्रह्मा, शिव, शेष, धर्म, इन्द्र, मुनीन्द्र, मनु, मानव, दैत्य, यक्ष, राक्षस, किन्नर तथा अन्य जो-जो चराचर प्राणी हैं, वे सब-के-सब आपकी ही विभूतियाँ हैं। उन सबके आविर्भाव और लय आपकी इच्छासे ही होते हैं। गोविन्द! हमें अभय दीजिये और इस अग्निका संहार कीजिये। हम आपकी शरणमें आये हैं। आप हम शरणागतोंको बचाइये।
यों कहकर वे सब लोग श्रीकृष्णके चरणकमलोंका चिन्तन करते हुए खड़े हो गये। श्रीकृष्णकी अमृतमयी दृष्टि पड़ते ही दावानल दूर हो गया। फिर तो वे ग्वालबाल मोदमग्न होकर नाचने लगे। क्यों न हो, श्रीहरिके स्मरणमात्रसे सब विपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। जो प्रातःकाल उठकर इस परम पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करता है, उसे जन्म-जन्ममें कभी अग्निसे भय नहीं होता। शत्रुओंसे घिर जानेपर, दावानलमें आ जानेपर, भारी विपत्तिमें पड़नेपर तथा प्राणसंकटके समय इस स्तोत्रका पाठ करके मनुष्य सब दुःखोंसे छुटकारा पा जाता है। इसमें संशय नहीं है। शत्रुओंकी सेना क्षीण हो जाती है और वह मनुष्य युद्धमें सर्वत्र विजयी होता है। वह इहलोकमें श्रीहरिकी भक्ति और अन्तमें उनके दास्य-सुखको अवश्य पा लेता है*।
* यथा संरक्षितं ब्रह्मन् सर्वापत्स्वेव नः कुलम्। तथा रक्षां कुरु पुनर्दावाग्नेर्मधुसूदन ॥
त्वमिष्टदेवतास्माकं त्वमेव कुलदेवता। वह्निर्वा वरुणो वापि चन्द्रो वा सूर्य एव वा ॥
यमः कुबेरः पवन ईशानाद्याश्च देवताः। ब्रह्मोशशेषधर्मेन्द्रा मुनीन्द्रा मनवः स्मृताः ॥
मानवाश्च तथा दैत्या यक्षराक्षसकिन्नराः। ये ये चराचराश्चैव सर्वे तव विभूतयः ॥
स्रष्टा पाता च संहर्ता जगतां च जगत्पते। आविर्भावस्तिरोभावः सर्वेषां च तवेच्छया ॥
| ५२४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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भगवान् श्रीनारायण कहते हैं—नारद ! सुनो। दावानलसे उनका उद्धार करके श्रीहरि उन सबके साथ अपने कुबेरभवनोपम गृहमें गये। वहाँ नन्दने आनन्दपूर्वक ब्राह्मणोंको प्रचुर धनका दान किया और ज्ञातिवर्गके लोगों तथा भाई-बन्धुओंको भोजन कराया। नाना प्रकारका मङ्गलकृत्य तथा श्रीहरिनाम-कीर्तन कराया। ब्राह्मणोंद्वारा प्रसन्नतापूर्वक वेदपाठ करवाया। इस प्रकार वृन्दावनके घर-घरमें वे सब गोप श्रीकृष्णचरणारविन्दोंके चिन्तनमें चित्तको एकाग्र करके आनन्दपूर्वक रहने लगे। श्रीहरिका यह सारा मङ्गलमय चरित्र कहा गया, जो कलिकल्मषरूपी काष्ठको दग्ध करनेके लिये अग्निके समान है। (अध्याय १९)
मोहवश श्रीहरिके प्रभावको जाननेके लिये ब्रह्माजीके द्वारा गौओं, बछड़ों और बालकोंका अपहरण, श्रीकृष्णद्वारा उन सबकी नूतन सृष्टि, ब्रह्माजीका श्रीहरिके पास आना, सबको श्रीकृष्णमय देख उनकी स्तुति करके पहलेके गौओं आदिको वापस देकर अपने लोकको जाना तथा श्रीकृष्णका घरको पधारना
भगवान् श्रीनारायण कहते हैं—नारद ! एक दिन बलरामसहित माधव खा-पीकर चन्दन आदिसे चर्चित हो ग्वालबालोंके साथ वृन्दावनमें गये। वहाँ भगवान् कौतूहलवश उन ग्वाल-बालोंके साथ क्रीडा करने लगे। इधर ग्वाल-बालोंका मन खेलमें लगा हुआ था, उधर उन सबकी गौएँ बहुत दूर निकल गयीं। उस समय लोकनाथ ब्रह्मा श्रीकृष्णका प्रभाव जाननेके लिये समस्त गौओं, बछड़ों और ग्वालबालोंको भी चुरा ले गये। उनका अभिप्राय जान सर्वज्ञ एवं सर्वस्रष्टा योगीन्द्र श्रीहरिने योगमायासे पुनः उन सबकी सृष्टि कर ली। दिनभर गौएँ चराकर क्रीडाकौतुकमें मन लगानेवाले श्रीहरि संध्याको बलराम और ग्वालबालोंके साथ घर गये। इस प्रकार एक वर्षतक भगवान्ने ऐसा ही किया। वे प्रतिदिन गौओं, ग्वालबालों तथा बलरामजीके साथ यमुना तटपर आते और संध्याके समय घरको लौट जाते थे। भगवान्के इस प्रभावको जानकर ब्रह्माजीका मस्तक लज्जासे झुक गया। वे भाण्डीर वटके नीचे जहाँ श्रीहरि बैठे हुए थे, आये। उन्होंने ग्वालबालोंसे घिरे हुए श्रीकृष्णको वहीं देखा, मानो नक्षत्रोंके साथ पूर्णिमाके चन्द्रदेव प्रकाशित हो रहे हों। गोविन्द रत्नमय सिंहासनपर बैठे थे और सानन्द मन्द-मन्द हँस रहे थे। उनके श्रीअङ्गोंमें पीताम्बरका परिधान शोभा पा रहा था। वे ब्रह्मतेजसे प्रकाशमान थे। उनकी बाँहोंमें रत्नोंके बने हुए बाजूबंद, कलाईमें रत्नोंके कंगन तथा पैरोंमें रत्नमय मञ्जीर शोभा दे रहे थे। दो रत्ननिर्मित कुण्डलोंकी प्रभासे उनके गण्डस्थल अत्यन्त उद्दीप्त हो रहे थे। श्यामसुन्दरका श्रीविग्रह करोड़ों कन्दर्पोंकी लावण्यलीलाका धाम था। वे मनको मोहे लेते थे। उनके श्रीअङ्ग चन्दन, अगुरु,
अभयं देहि गोविन्द वह्निसंहरणं कुरु। वयं त्वां शरणं यामो रक्ष नः शरणागतान्॥
इत्येवमुक्त्वा ते सर्वे तस्थुर्ध्यात्वा पदाम्बुजम्। दूरीभूतश्च दावाग्निः श्रीकृष्णामृतदृष्टितः॥
दूरीभूते च दावाग्नौ ननृतुस्ते मुदान्विताः। सर्वापदः प्रणश्यन्ति हरिस्मरण मात्रतः॥
इदं स्तोत्रं महापुण्यं प्रातरुत्थाय यः पठेत्। वह्नितो न भवेत्तस्य भयं जन्मनि जन्मनि॥
शत्रुग्रस्ते च दावाग्नौ विपत्तौ प्राणसंकटे। स्तोत्रमेतत् पठित्वा च मुच्यते नात्र संशयः॥
शत्रुसैन्यं क्षयं याति सर्वत्र विजयी भवेत्। इहलोके हरेर्भक्तिमन्ते दास्यं लभेद् ध्रुवम्॥
(१९। १७१—१८१)
८१- श्रीहरि (कृष्ण)-का गोवर्धन पर्वतको बायें हाथमें छातेके डंडेकी भाँति धारण कर लेना
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५२५
कस्तूरी और कुङ्कुमसे चर्चित थे। वे पारिजातपुष्पोंकी मालाओंसे विभूषित थे। उनकी अङ्गकान्ति नूतन जलधरकी श्याम शोभाको लज्जित कर रही थी। शरीरमें नूतन यौवनका अङ्कुर प्रस्फुटित हो रहा था। मस्तकपर मोरपंखका मुकुट और उसमें मालतीकी मालाओंका संयोग बड़ा मनोहर जान पड़ता था। अपने अङ्गोंकी सौन्दर्यमयी दीप्तिसे वे आभूषणोंको भी भूषित कर रहे थे। शरत्कालकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी प्रभाको लूट लेनेवाले मुखकी कान्तिसे वे परम सुन्दर प्रतीत होते थे। ओठ पके बिम्बाफलकी लालीको लजा रहे थे। नुकीली नासिका पक्षिराज गरुड़की चोंचको तिरस्कृत करती थी। नेत्र शरत्कालके मध्याह्नमें खिले हुए कमलोंकी शोभाको छीने लेते थे। मुक्तापङ्क्तियोंकी शोभाको निन्दित करनेवाली दन्तपङ्क्तिसे उनके मुखकी मनोहरता बढ़ गयी थी। मणिराज कौस्तुभकी दिव्य दीप्तिसे वक्षःस्थल उद्भासित हो रहा था। उन परिपूर्णतम शान्तस्वरूप परमेश्वर राधाकान्तको देखकर ब्रह्माजीने अत्यन्त विस्मित होकर प्रणाम किया। वे बार-बार उन्हें देखने और प्रणाम करने लगे। उन्होंने अपने हृदयकमलमें जिस रूपको देखा था, वही उन्हें बाहर भी दिखायी दिया। जो मूर्ति सामने थी, वही पीछे और अगल-बगलमें भी दृष्टिगोचर हुई। मुने! वहाँ वृन्दावनमें सब कुछ श्रीकृष्णके ही तुल्य देख जगद्गुरु ब्रह्मा उसी रूपका ध्यान करते हुए वहाँ बैठ गये। गौएँ, बछड़े, बालक, लता, गुल्म और वीरुध आदि सारा वृन्दावन ब्रह्माजीको श्यामसुन्दरके ही रूपमें दिखायी दिया। यह परम आश्चर्य देखकर ब्रह्माजीने फिर ध्यान लगाया। अब उन्हें सारी त्रिलोकी श्रीकृष्णके सिवा और कुछ भी नहीं दिखायी दी। कहाँ गये वृक्ष ? कहाँ हैं पर्वत ? कहाँ गयी पृथ्वी ? कहाँ हैं समुद्र ? कहाँ देवता ? कहाँ गन्धर्व ? कहाँ मुनीन्द्र और मानव ? कहाँ आत्मा ? कहाँ जगत्का बीज तथा कहाँ स्वर्ग और गौएँ हैं ? श्रीहरिकी मायासे ब्रह्माजीने सब कुछ अपनी आँखोंसे देखा और सबको कृष्णमय पाया। कहाँ जगदीश्वर श्रीकृष्ण और कहाँ मायाकी विभूतियाँ ? सबको श्रीकृष्णमय देखकर ब्रह्माजी कुछ भी बोलनेमें असमर्थ हो गये—किस तरह स्तुति करूँ? क्या करूँ? इस प्रकार मन-ही-मन विचार करके जगद्धाता ब्रह्मा वहीं बैठकर जप करनेको उद्यत हुए। उन्होंने सुखपूर्वक योगासन लगाकर दोनों हाथ जोड़ लिये। उनके सारे अङ्ग पुलकित हो गये। नेत्रोंसे अश्रुधारा बहने लगी और वे अत्यन्त दीनके समान हो गये।
तदनन्तर उन्होंने इडा, सुषुम्णा, मध्या, पिङ्गला, नलिनी और धुरा—इन छः नाड़ियोंको प्रयत्नपूर्वक योगद्वारा निबद्ध किया। तत्पश्चात् मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा—इन छः चक्रोंको निबद्ध किया। फिर कुण्डलिनीद्वारा एक-एक चक्रका लङ्घन कराते हुए क्रमशः छहों चक्रोंका भेदन करके विधाता उसे ब्रह्मरन्ध्रमें ले आये। तदनन्तर उन्होंने ब्रह्मरन्ध्रको वायुसे पूर्ण किया। प्राणवायुको वहाँ निबद्ध करके पुनः उसे क्रमशः हृदयकमलमें
८२- इन्द्रके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णका स्तवन
| ५२६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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मध्या नाड़ीके पास ले आये। उस वायुको घुमाकर विधाताने मध्या नाड़ीके साथ संयुक्त कर दिया। ऐसा करके वे निष्पन्द (निश्चल) हो गये और पूर्वकालमें श्रीहरिने जिसका उपदेश दिया था, उस परम उत्तम दशाक्षर-मन्त्रका जप करने लगे। मुने! श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका ध्यान करते हुए एक मुहूर्ततक जप करनेके पश्चात् ब्रह्माने अपने हृदयकमलमें उनके सर्वतेजोमय स्वरूपको देखा। उस तेजके भीतर अत्यन्त मनोरम रूप था, दो भुजाएँ, हाथमें मुरली और पीताम्बरभूषित श्रीअङ्ग। कानोंके मूलभागमें पहने गये मकराकृति कुण्डल अपनी उज्ज्वल आभा बिखेर रहे थे। प्रसन्न मुखारविन्दपर मन्द हास्यकी छटा छा रही थी। भगवान् भक्तपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते थे। ब्रह्माजीने ब्रह्मरन्ध्रमें जिस रूपको देखा और हृदयकमलमें जिसकी झाँकी की, वही रूप बाहर भी दृष्टिगोचर हुआ। वह परम आश्चर्य देखकर उन्होंने उन परमेश्वरकी स्तुति की। मुने! पूर्वकालमें एकार्णवके जलमें शयन करनेवाले श्रीहरिने ब्रह्माजीको जिस स्तोत्रका उपदेश दिया था, उसीके द्वारा विधाताने भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर उन परमेश्वरका विधिवत् स्तवन किया।
ब्रह्माजी बोले— जो सर्वस्वरूप, सर्वेश्वर, समस्त कारणोंके भी कारण तथा सबके लिये अनिर्वचनीय हैं; उन कल्याणस्वरूप श्रीकृष्णको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनका श्रीविग्रह नवीन मेघमालाके समान श्याम एवं सुन्दर है, जो सम्पूर्ण जीवोंमें स्थित रहकर भी उनसे लिप्त नहीं होते, जो साक्षीस्वरूप हैं, स्वात्माराम, पूर्णकाम, विश्वव्यापी, विश्वसे परे, सर्वस्वरूप, सबके बीजरूप और सनातन हैं; जो सर्वाधार, सबमें विचरनेवाले, सर्वशक्तिसम्पन्न, सर्वाराध्य, सर्वगुरु तथा सर्वमङ्गलकारण हैं। सम्पूर्ण मन्त्र जिनके स्वरूप हैं, जो समस्त सम्पदाओंकी प्राप्ति करानेवाले और श्रेष्ठ हैं; जिनमें शक्तिका संयोग और वियोग भी है; उन स्वेच्छामय प्रभुकी मैं स्तुति करता हूँ। जो शक्तिके स्वामी, शक्तिके बीज, शक्तिरूपधारी तथा घोर संसारसागरमें शक्तिमयी नौकासे युक्त हैं; उन भक्तवत्सल कृपालु कर्णधारको मैं नमस्कार करता हूँ। जो आत्मस्वरूप, एकान्तमय, लिप्त, निर्लिप्त, सगुण और निर्गुण ब्रह्म हैं; उन स्वेच्छामय परमात्माकी मैं स्तुति करता हूँ। जो सम्पूर्ण इन्द्रियोंके अधिदेवता, आवासस्थान और सर्वेन्द्रिय-स्वरूप हैं; उन विराट् परमेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो वेद, वेदोंके जनक तथा सर्ववेदाङ्गस्वरूप हैं; उन सर्वमन्त्रमय परमेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सारसे सारतर द्रव्य, अपूर्व, अनिर्वचनीय, स्वतन्त्र और अस्वतन्त्र हैं; उन यशोदानन्दनका मैं भजन करता हूँ। जो सम्पूर्ण शरीरोंमें शान्तरूपसे विद्यमान हैं, किसीके दृष्टिपथमें नहीं आते, तर्कके अविषय हैं, ध्यानसे वशमें होनेवाले नहीं हैं तथा नित्य विद्यमान हैं; उन योगीन्द्रोंके भी गुरु गोविन्दका मैं भजन करता हूँ। जो रासमण्डलके मध्यभागमें विराजमान होते हैं, रासोल्लासके लिये सदा उत्सुक रहते हैं तथा गोपाङ्गनाएँ सदा जिनकी सेवा करती हैं; उन राधावल्लभको मैं नमस्कार करता हूँ। जो साधु पुरुषोंकी दृष्टिमें सदैव सत् और असाधु पुरुषोंके मतमें सदा ही असत् हैं, भगवान् शिव जिनकी सेवा करते हैं; उन योगसाध्य योगीश्वर श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ। जो मन्त्रबीज, मन्त्रराज, मन्त्रदाता, फलदाता, फलरूप, मन्त्रसिद्धिस্বরূপ तथा परात्पर हैं; उन श्रीकृष्णको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सुख-दुःख, सुखद-दुःखद, पुण्य, पुण्यदायक, शुभद और शुभ बीज हैं; उन परमेश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ।
इस प्रकार स्तुति करके ब्रह्माजीने गौओं और बालकोंको लौटा दिया तथा पृथ्वीपर दण्डकी भाँति पड़कर रोते हुए प्रणाम किया। मुने! तदनन्तर जगत्स्रष्टाने आँखें खोलकर श्रीहरिके दर्शन किये। जो ब्रह्माजीके द्वारा किये गये इस
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५२७
स्तोत्रका प्रतिदिन भक्तिभावसे पाठ करता है, वह इहलोकमें सुख भोगकर अन्तमें श्रीहरिके धाममें जाता है। वहाँ उसे अनुपम दास्यसुख तथा उन परमेश्वरके निकट स्थान प्राप्त होता है। श्रीकृष्णका सांनिध्य पाकर वह पार्षदशिरोमणि बन जाता है।
भगवान् नारायण कहते हैं—तदनन्तर जगत्-विधाता ब्रह्मा जब ब्रह्मलोकमें चले गये, तब भगवान् श्रीकृष्ण ग्वालबालोंके साथ अपने घरको गये। उस दिन गौओं, बछड़ों और ग्वालबालोंने एक वर्षके बाद अपने घरपर पदार्पण किया था; किंतु श्रीकृष्णकी मायासे उन सबने उस एक वर्षके अन्तरको एक दिनका ही अन्तर समझा। गोप और गोपियाँ उस समय कुछ भी अनुमान न लगा सकीं। (पहलेके मायारचित बालकोंमें और आजके वास्तविक बालकोंमें उन्हें कोई अन्तर नहीं जान पड़ा।) योगीके लिये तो क्या नया और क्या पुराना, सारा जगत् कृत्रिम ही है। इस प्रकार श्रीकृष्णका यह सारा शुभ चरित्र कहा गया—जो सुखद, मोक्षप्रद, पुण्यमय तथा सर्वकालमें सुख देनेवाला है।
(अध्याय २०)
नन्दद्वारा इन्द्रयागकी तैयारी, श्रीकृष्णद्वारा इसके विषयमें जिज्ञासा, नन्दजीका उत्तर और श्रीकृष्णद्वारा प्रतिवाद, श्रीकृष्णकी आज्ञाके अनुसार इन्द्रका यजन न करके गोपोंद्वारा ब्राह्मणों और गिरिराजका पूजन, उत्सवकी समाप्तिपर इन्द्रका कोप, नन्दद्वारा इन्द्रकी स्तुति, श्रीकृष्णका नन्दको इन्द्रकी स्तुतिसे रोककर सब व्रजवासियोंको गौओंसहित गोवर्धनकी गुफामें स्थापित करके पर्वतको छातेके डंडेकी भाँति उठा लेना; इन्द्र, देवताओं तथा मेघोंका स्तम्भन कर देना, पराजित इन्द्रद्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति, श्रीकृष्णका उन्हें विदा करके पर्वतको स्थापित कर देना तथा नन्दद्वारा श्रीकृष्णका स्तवन
भगवान् नारायण कहते हैं—मुने! एक दिन आनन्दयुक्त नन्दने व्रजमें इन्द्रयज्ञकी तैयारी करके सब ओर ढिंढोरा पिटवाया। उस समय सबको यह संदेश दिया गया कि जो-जो इस नगरमें गोप, गोपी, बालक, बालिका, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र निवास करते हैं; वे सब लोग भक्तिपूर्वक दही, दूध, घी, तक्र, माखन, गुड़ और मधु आदि सामग्री लेकर इन्द्रकी पूजा करें। इस प्रकार घोषणा कराकर उन्होंने स्वयं ही प्रसन्नतापूर्वक सुविस्तृत रमणीय स्थानमें यष्टिका-आरोपण किया (ध्वजाके लिये बाँस गड़वाया)। उसमें रेशमी वस्त्र और मनोहर मालाएँ लगवायीं। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुङ्कुमके द्रवसे उस यष्टिको चर्चित किया गया। नन्दजीने स्नान और नित्यकर्म करके भक्तिभावसे दो धुले हुए वस्त्र धारण किये तथा पैर धोकर वे सोनेके पीढ़ेपर बैठे। उस समय नाना प्रकारके पात्रोंके साथ ब्राह्मण, पुरोहित, गोप, गोपी, बालिका तथा बालक उपस्थित हुए। इसी बीचमें वहाँ नगरनिवासी भी बहुत सामान एकत्र करके अनेक प्रकारकी भेंट-पूजा लिये आ पहुँचे। तदनन्तर ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान, वेद-वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् एवं शान्त-स्वभाव—गर्ग, जैमिनि, कृष्णद्वैपायन आदि बहुत-से मुनिगण शिष्योंसहित वहाँ पधारे। और भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, बन्दी, भिक्षुक आदि आये। गोपराज नन्दने उठकर सभीका यथायोग्य प्रणामादिद्वारा स्वागत-सत्कार किया। तत्पश्चात् यष्टिके समीप ही निपुण रसोइया ब्राह्मण
५२८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण पाक करने लगे। रत्नदीपोंकी तथा धूपकी जगमगाहट और सुगन्धि चारों ओर फैल गयी। पुष्पमालाओंसे स्थान सुसज्जित हो गये। भाँति- भाँतिकी मिठाई, पक्वान्न, मीठे फल, हजारों- लाखों घड़े दूध, दही, घृत, मधु, मक्खन आदि इकट्ठे हो गये। सुरीले बाजे बजने लगे। नाना प्रकारके सोने-चाँदीके पात्र, श्रेष्ठ वस्त्र, आभूषण, स्वर्णपीठ आदि लाये गये। सभी चीजें अगणित थीं। नृत्यगीत होने लगे। दीप्तिसे ऐसा दमक रहा था, मानो शरद्-ऋतुका प्रफुल्ल कमल सूर्यदेवकी किरणोंसे उद्दीप्त हो रहा हो। जगदीश्वर श्रीकृष्ण उनके बीचमें रत्नमय सिंहासनपर बैठे, मानो शरत्कालके चन्द्रमा तारामण्डलके बीचमें भासमान हो रहे हों। वह महोत्सव देखकर नीतिशास्त्रविशारद श्रीहरिने पितासे तत्काल ऐसी नीतिपूर्ण बात कही, जो अन्य सब लोगोंके लिये दुर्लभ थी। श्रीकृष्ण बोले-उत्तम व्रतका पालन करनेवाले गोपसम्राट् ! आप यहाँ क्या कर रहे हैं ? आपके आराध्य देवता कौन हैं ? इस पूजाका क्या स्वरूप है और इस प्रकार पूजन करनेपर कौन-सा फल इसी बीच बलशाली बलराम तथा ग्वाल- बालोंके साथ साक्षात् श्रीहरि शीघ्रतापूर्वक वहाँ आये। उन्हें देखकर सब लोग हर्षसे खिल उठे और उठकर खड़े हो गये। श्रीकृष्ण क्रीडास्थानसे लौटकर आ रहे थे। उनका शान्त सुन्दर विग्रह बड़ा मनोहर था। विनोदकी साधनभूत मुरली, वेणु और शृङ्ग नामक वाद्योंकी ध्वनि उनके साथ सुनायी देती थी। रत्नोंके सार-तत्त्वसे निर्मित आभूषणों तथा कौस्तुभमणिसे वे विभूषित थे। उनका श्याम मनोहर शरीर अगुरु एवं चन्दनपङ्कसे चर्चित था। वे रत्नमय दर्पणमें शरद्-ऋतुके मध्याह्नकालमें प्रफुल्ल कमलके समान अपने मनोहर मुखको देख रहे थे। भालदेशमें कस्तूरीकी बेंदीके साथ पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति मनोहर चन्दन लगा था। इससे उनका ललाट चन्द्रदेवसे अलंकृत आकाशकी भाँति शोभा पा रहा था। श्याम कण्ठ और वक्षःस्थल मालतीकी मालासे उज्ज्वल कान्ति धारण कर रहा था, मानो अत्यन्त निर्मल शरत्कालिक आकाश बगुलोंकी पंक्तिसे अलंकृत हुआ हो। मनोहर पीताम्बरसे उनके श्याम विग्रहकी अनुपम शोभा हो रही थी, मानो नवीन मेघ विद्युत्की कान्तिसे निरन्तर उद्भासित हो रहा हो। मस्तकपर एक ओर झुका हुआ टेढ़ा मोरमुकुट कुन्दके फूलों और गुञ्जाओंकी मालासे आबद्ध था, मानो आकाश नक्षत्रों तथा इन्द्र-धनुषसे सुशोभित हो रहा हो। उनका मुस्कराता हुआ मुख रत्नमय कुण्डलोंकी प्राप्त होता है ? इस फलसे कौन-सा साधन सुलभ होता है और उस साधनसे भी कौन-सा मनोरथ सिद्ध होता है? यदि पूजामें भी विघ्न पड़ जाय और देवता रुष्ट हो जायें तो क्या होता है? अथवा यदि देवता संतुष्ट हों तो वे इहलोक और परलोकमें कौन-सा फल देते हैं ? विप्ररूपधारी श्रीहरि नैवेद्यको साक्षात् ग्रहण करते हैं; अतः ब्राह्मणके संतुष्ट होनेपर सब देवता संतुष्ट हो जाते हैं। जो ब्राह्मणके पूजनमें लगा
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५२९ हुआ है, उसके लिये देवपूजाकी क्या आवश्यकता है ? जिसने ब्राह्मणोंकी पूजा की है, उसने सम्पूर्ण देवताओंकी पूजा सम्पन्न कर ली। देवताको नैवेद्य देकर जो ब्राह्मणको नहीं देता है, उसका वह नैवेद्य भस्मीभूत होता है और पूजन निष्फल हो जाता है। देवताका नैवेद्य यदि ब्राह्मणको दिया जाय तो उस दानसे वह निश्चय ही अक्षय हो जाता है और उस अवस्थामें देवता संतुष्ट होकर दाताको अभीष्ट वरदान दे अपने धामको जाते हैं। जो मूढ़ देवताको नैवेद्य अर्पित करके ब्राह्मणके दिये बिना स्वयं खा लेता है, वह दत्तापहारी (देकर छीन लेनेवाला) है और देवताकी वस्तु खाकर नरकमें पड़ता है। जो भगवान् विष्णुको अर्पित न किया गया हो, वह अन्न विष्ठा और जल मूत्रके समान है। यह क्रम सभीके लिये है; परंतु ब्राह्मणोंके लिये विशेषरूपसे इसपर ध्यान देना उचित है। यदि नैवेद्य अथवा भोज्य वस्तु देवताको न देकर ब्राह्मणको दे दी गयी तो देवता ब्राह्मणके मुखमें ही उसे खाकर संतुष्ट हो स्वर्गलोकको लौट जाते हैं; अतः पिताजी ! आप सारी शक्ति लगाकर ब्राह्मणोंका पूजन कीजिये; क्योंकि वे इहलोक और परलोकमें भी उत्तम फलके दाता हैं। जो श्रीहरिकी आराधना करनेवाले ब्राह्मण हैं, वे उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं। हरिभक्त ब्राह्मणोंका प्रभाव श्रुतिमें दुर्लभ है। उनके चरणकमलोंकी धूलिसे पृथ्वी तत्काल पवित्र हो जाती है। उनका जो चरणचिह्न है, उसीको तीर्थ कहा गया है। उनके स्पर्शमात्रसे तीर्थोंका पाप नष्ट हो जाता है। उनके आलिङ्गन, श्रेष्ठ वार्तालाप, दर्शन और स्पर्शसे भी मनुष्य समस्त पापोंसे छुटकारा पा जाता है। सम्पूर्ण तीर्थोंमें भ्रमण और स्नान करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह हरिभक्त ब्राह्मणके दर्शनमात्रसे सुलभ हो जाता है। मनुष्यको चाहिये कि वह पुण्यके लिये समस्त जीवोंको अन्न दे; परंतु विशिष्ट जीवोंको अन्न-दान करनेसे विशिष्ट फलकी प्राप्ति होती है। भगवान् विष्णु ब्राह्मणोंके भक्त हैं। उन्हें उत्तम वस्तुका दान करनेसे दाताको जो फल मिलता है, वह निश्चय ही भक्त ब्राह्मणको भोजन करानेमात्रसे मिल जाता है। भक्तके संतुष्ट होनेपर श्रीहरि संतुष्ट होते हैं और श्रीहरिके संतुष्ट होनेपर सब देवता सिद्ध हो जाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे वृक्षकी जड़ सींचनेसे उसकी शाखाएँ भी पुष्ट होती हैं। यदि ये सब संचित द्रव्य आप किसी एक देवताको देते हैं तो अन्य सब देवता रुष्ट हो जायँगे। उस दशामें एक देवता क्या करेगा ? मेरी सम्मति तो यह है कि यहाँ जितनी वस्तुएँ प्रस्तुत हैं, उनका आधा भाग आप श्रीगोवर्धनदेवको दे दीजिये। वे गौओंकी सदा वृद्धि करते हैं; इसलिये उनका नाम 'गोवर्धन' हुआ है। पिताजी ! इस भूतलपर गोवर्धनके समान पुण्यवान् दूसरा कोई नहीं है; क्योंकि वे नित्यप्रति गौओंको नयी-नयी घास देते हैं। तीर्थस्थानोंमें जाकर स्नान-दानसे जो पुण्य प्राप्त होता है; ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है, सम्पूर्ण व्रत-उपवास, सब तपस्या, महादान तथा श्रीहरिकी आराधना करनेपर जो पुण्य सुलभ होता है, सम्पूर्ण पृथ्वीकी परिक्रमा, सम्पूर्ण वेदवाक्योंके स्वाध्याय तथा समस्त यज्ञोंकी दीक्षा ग्रहण करनेपर मनुष्य जिस पुण्यको पाता है; वही पुण्य बुद्धिमान् मानव गौओंको घास देकर पा लेता है*। जो घास चरती हुई गायको स्वेच्छापूर्वक
- तीर्थस्नानेषु यत्पुण्यं यत्पुण्यं विप्रभोजने । सर्वव्रतोपवासेषु सर्वेष्वेव तपःसु च॥ यत्पुण्यं च महादाने यत्पुण्यं हरिसेवने । भुवः पर्यटने यत्तु वेदवाक्येषु यद्भवेत् ॥ यत्पुण्यं सर्वयज्ञेषु दीक्षायां च लभेन्नरः । तत्पुण्यं लभते प्राज्ञो गोभ्यो दत्त्वा तृणानि च ॥ (२१।८७-८९)
| ५३० | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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चरनेसे रोकता है, उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है तथा वह प्रायश्चित्त करनेपर ही शुद्ध होता है। पिताजी! सब देवता गौओंके अङ्गोंमें, सम्पूर्ण तीर्थ गौओंके पैरोंमें तथा स्वयं लक्ष्मी उनके गुह्य स्थानों (मल-मूत्रके स्थानों)-में सदा वास करती हैं। जो मनुष्य गायके पद-चिह्नसे युक्त मिट्टीद्वारा तिलक करता है, उसे तत्काल तीर्थस्नानका फल मिलता है और पग-पगपर उसकी विजय होती है। गौएँ जहाँ भी रहती हैं, उस स्थानको तीर्थ कहा गया है। वहाँ प्राणोंका त्याग करके मनुष्य तत्काल मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। जो नराधम ब्राह्मणों तथा गौओंके शरीरपर प्रहार करता है; निःसंदेह उसे ब्रह्महत्याके समान पाप लगता है। जो नारायणके अंशभूत ब्राह्मणों तथा गौओंका वध करते हैं, वे मनुष्य जबतक चन्द्रमा और सूर्यकी सत्ता है, तबतकके लिये कालसूत्र नामक नरकमें जाते हैं*।
नारद! ऐसा कहकर श्रीकृष्ण चुप हो गये। तब आनन्दयुक्त नन्दने मुस्कराते हुए उनसे कहा।
नन्द बोले—बेटा! यह महात्मा महेन्द्रकी पूजा है, जो पूर्वपरम्परासे चली आ रही है। यह सुवृष्टिका साधन है और इससे सब प्रकारके मनोहर शस्योंकी उत्पत्ति ही साध्य है। शस्य ही प्राणियोंके प्राण हैं। शस्यसे ही जीवधारी जीवन-निर्वाह करते हैं। इसलिये व्रजवासी लोग पूर्व पीढ़ियोंके क्रमसे महेन्द्रकी पूजा करते चले आ रहे हैं। यह महान् उत्सव वर्षके अन्तमें होता है। विघ्न-बाधाओंकी निवृत्ति और कल्याणकी प्राप्ति ही इसका उद्देश्य है।
नन्दजीकी यह बात सुनकर बलरामसहित श्रीकृष्ण जोर-जोरसे हँसने लगे और पुनः प्रसन्नतापूर्वक पितासे बोले।
श्रीकृष्णने कहा—तात! आज मैंने आपके मुखसे बड़ी विचित्र और अद्भुत बात सुनी है। इसका कहीं भी निरूपण नहीं किया गया है कि इन्द्रसे वृष्टि होती है। आज आपके मुखसे अपूर्व नीतिवचन सुननेको मिला है। सूर्यसे जल उत्पन्न होता है और जलसे शस्य एवं वृक्ष उत्पन्न होते और बढ़ते हैं। उनसे अन्न और फल पैदा होते हैं तथा उन अन्नों और फलोंसे जीवधारी जीवननिर्वाह करते हैं। सूर्य अपनी किरणोंद्वारा जो धरतीका जल सोख लेते हैं, वर्षाकालमें उसी जलका उनसे प्रादुर्भाव होता है। सूर्य और मेघ आदि सबका विधाताद्वारा निरूपण होता है। पञ्चाङ्गोंके अनुसार जिस वर्षमें जो मेघ गज और समुद्र माने गये हैं, जो शस्याधिपति राजा और मन्त्री निश्चित किये गये हैं; उन सबका विधाताद्वारा ही निरूपण हुआ है। प्रत्येक वर्षमें जल, शस्य तथा तृणोंकी आढक-संख्या निश्चित की जाती है, उस निश्चयके अनुसार वर्ष-वर्षमें, युग-युगमें और कल्प-कल्पमें वे सारी बातें घटित होती हैं। ईश्वरकी इच्छासे ही जल आदिका आविर्भाव होता है। उसमें कोई बाधा नहीं पड़ती। तात! भूत, वर्तमान और भविष्य तथा महान्, क्षुद्र और मध्यम—जिस कर्मका विधाताने निरूपण किया है, उसका कौन निवारण कर सकता है? ईश्वरकी आज्ञासे ही ब्रह्माजीने सम्पूर्ण चराचर जगत्का निर्माण किया है। पहले भोजनकी
* भुक्तवन्तीं तृणं यश्च गां वारयति कामतः। ब्रह्महत्या भवेत् तस्य प्रायश्चित्ताद् विशुध्यति॥
सर्वे देवा गवामङ्गे तीर्थानि तत्पदेषु च। तद्गुह्येषु स्वयं लक्ष्मीस्तिष्ठत्येव सदा पितः॥
गोष्पदाक्तमृदा यो हि तिलकं कुरुते नरः। तीर्थस्नातो भवेत् सद्यो जयस्तस्य पदे पदे॥
गावस्तिष्ठन्ति यत्रैव तत्तीर्थं परिकीर्तितम्। प्राणांस्त्यक्त्वा नरस्तत्र सद्यो मुक्तो भवेद् ध्रुवम्॥
ब्राह्मणानां गवामङ्गं यो हन्ति मानवाधमः। ब्रह्महत्यासमं पापं भवेत् तस्य न संशयः॥
नारायणांशान् विप्रांश्च गाश्च ये घ्नन्ति मानवाः। कालसूत्रं च ते यान्ति यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥
(२१। ९०-९५)
श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५३१
व्यवस्था होती है, उसके बाद जीव प्रकट होता है। बारंबार ऐसा होनेसे ही इस नियत व्यवस्थाको स्वभाव कहते हैं। स्वभावसे कर्म होता है और कर्मके अनुसार जीवधारियोंको सुख-दुःखका भोग प्राप्त होता है। यातना, जन्म-मरण, रोग-शोक, भय, उत्पत्ति, विपत्ति, विद्या, कविता, यश, अपयश, पुण्य, स्वर्गवास, पाप, नरकनिवास, भोग, मोक्ष और श्रीहरिका दास्य—ये सब मनुष्योंको कर्मके अनुसार उपलब्ध होते हैं। ईश्वर सबके जनक हैं। शील और कर्मोंका अभ्यास विधाताके लिये भी फलदाता होता है। सब कुछ ईश्वरकी इच्छासे ही सम्भव होता है। विराट् पुरुषसे प्रकृति, पञ्चतत्त्व, जगत्, कूर्म, शेष, धरणी तथा ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सम्पूर्ण चराचर पदार्थोंका निर्माण हुआ है। जिनकी आज्ञासे वायु कूर्मको, कूर्म शेषको, शेष अपने मस्तकपर वसुधाको और वसुधा सम्पूर्ण चराचर जगत्को धारण करती है; जिनके आदेशसे जगत्के प्राणस्वरूप समीर सदा तीनों लोकोंमें बहते रहते हैं, उत्तम प्रभाके धाम सूर्य समस्त भूगोलका भ्रमण करते हुए तपा करते हैं, अग्नि जलाती है, मृत्यु समस्त जन्तुओंमें संचरित होती है और वृक्ष समयानुसार फूल एवं फल धारण करते हैं; जिनकी आज्ञासे समुद्र अपने स्थानपर विद्यमान रहते और तत्काल ही नीचे-नीचे निमग्न हो जाते हैं; उन परमेश्वरका ही आप भक्तिभावसे भजन कीजिये। इन्द्र क्या कर सकता है? जिनके भ्रूभङ्गकी लीलामात्रसे आजतक कितने ही ब्रह्माण्ड पैदा हुए और कालके गालमें चले गये तथा कितने ही विधाता उत्पन्न होकर नष्ट हो गये। वे परमेश्वर ही मृत्युकी भी मृत्यु, कालके भी काल तथा विधाताके भी विधाता हैं। तात! आप उन्हींकी शरण लीजिये। वे ही आपकी रक्षा करेंगे। अहो! जिनके एक दिन-रातमें अट्ठाईस इन्द्रोंका पतन होता है, ऐसे एक सौ आठ ब्रह्माओंका उन निर्गुण परमात्मा श्रीहरिके एक निमेषमें ही पतन हो जाता है; ऐसे परमात्माके रहते हुए इन्द्रकी पूजा विडम्बनामात्र है।
नारद! यों कहकर श्रीकृष्ण चुप हो गये। उस समय सभामें बैठे हुए महर्षियोंने भगवान्की भूरि-भूरि प्रशंसा की। नन्दके शरीरमें रोमाञ्च हो आया। वे हर्षसे उत्फुल्ल हो सभामें बैठे-बैठे नेत्रोंसे अश्रु बहाने लगे। मनुष्य यदि अपने पुत्रोंसे पराजित हों तो वे आनन्दित ही होते हैं। श्रीकृष्णकी आज्ञा मान नन्दजीने स्वस्तिवाचन किया और क्रमशः सब ब्राह्मणों एवं मुनियोंका वरण किया। उन्होंने आदरपूर्वक गिरिराज गोवर्धनकी, समागत मुनीश्वरोंकी, विद्वान् ब्राह्मणोंकी तथा गौओं और अग्निकी सानन्द पूजा की। पूजाकी समाप्ति होनेपर उस यज्ञ-महोत्सवमें नाना प्रकारके वाद्योंका तुमुल नाद होने लगा। जय-जयकारके शब्द, शङ्खध्वनि तथा हरिनामकीर्तन होने लगे। मुनिवर गर्गने वेदोंके मङ्गलकाण्डका पाठ किया। बन्दीजनोंमें श्रेष्ठ डिंडी जो कंसका प्रिय सचिव था, सामने खड़े हो उच्चस्वरसे मङ्गलाष्टकका पाठ करने लगा। श्रीकृष्ण गिरिराजके निकट जा दूसरी मूर्ति धारण करके बोले—‘मैं साक्षात् गोवर्धन
८३- श्रीकृष्णका सुदर्शनचक्रसे दैत्यराज धेनुकासुरको काट डालना
५३२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण पर्वत हूँ और तुमलोगोंकी दी हुई भोज्य वस्तुएँ खा रहा हूँ। तुम मुझसे वर माँगो। ' उस समय श्रीकृष्णने नन्दसे कहा - 'पिताजी ! सामने देखिये, गिरिराज प्रकट हुए हैं। इनसे वर माँगिये। आपका कल्याण होगा।' तब गोपराजने हरिदास्य और हरिभक्तिका वर माँगा। परोसी हुई सामग्री खाकर और वर देकर गिरिराज अदृश्य हो गये। मुनीन्द्रों और ब्राह्मणोंको भोजन कराकर गोपराजने बन्दीजनों, ब्राह्मणों और मुनियोंको धन दिया। तत्पश्चात् आनन्दयुक्त नन्द बलराम और श्रीकृष्णको आगे करके सपरिवार अपने घरको गये। उन्होंने बन्दी डिंडीको वस्त्र, चाँदी, सोना, श्रेष्ठ घोड़ा, मणि तथा नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थ दिये। मुनि और ब्राह्मण बलराम तथा श्रीकृष्णकी स्तुति एवं नमस्कार करके चले गये। समस्त अप्सराएँ, गन्धर्व और किन्नर भी अपने-अपने स्थानको पधारे। उस महोत्सवमें आये हुए राजा और सम्पूर्ण गोप भी श्रीकृष्णको सादर नमस्कार करके वहाँसे बिदा हो गये। इसी समय यज्ञभङ्ग हो जानेसे अपनी अनेक प्रकारकी निन्दा सुनकर इन्द्र कुपित हो उठे। उनके ओठ फड़कने लगे। उन्होंने मरुद्गणों और मेघोंके साथ तत्काल रथपर आरूढ़ हो मनोहर नन्दनगर वृन्दावनपर आक्रमण किया। फिर युद्ध-शास्त्रमें निपुण समस्त देवता भी हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये रोषपूर्वक रथपर आरूढ़ हो उनके पीछे-पीछे गये। वायुकी सनसनाहट, मेघोंकी गड़गड़ाहट और सेनाकी भयानक गर्जनासे सारा नगर काँप उठा। नन्दको भी बड़ा भय हुआ; परंतु वे नीतिमें निपुण थे। अतः अपनी पत्नी तथा सेवकगणोंको पुकारकर निर्जन स्थानमें ले जाकर शोकसे कातर हो बोले । नन्दजीने कहा- हे यशोदे ! हे रोहिणि ! इधर आओ और मेरी बात सुनो। तुमलोग राम और कृष्णको व्रजसे दूर ले जाओ। भयसे व्याकुल बालक-बालिकाएँ और स्त्रियाँ भी दूर चली जायँ । केवल बलवान् गोप मेरे पास ठहरें। फिर हमलोग इस प्राण-संकटसे निकलनेका प्रयास करेंगे। यों कहकर गोपप्रवर नन्दने भयभीत हुए श्रीहरिका स्मरण किया। उनके दोनों हाथ जुड़ गये। भक्तिसे मस्तक झुक गया और वे काण्वशाखामें कहे गये स्तोत्रद्वारा श्रीशचीपतिकी स्तुति करने लगे। नन्द बोले - इन्द्र, सुरपति, शक्र, अदितिज, पवनाग्रज, सहस्राक्ष, भगाङ्ग, कश्यपात्मज, विडौजा, शुनासीर, मरुत्वान्, पाकशासन, जयन्तजनक, श्रीमान्, शचीश, दैत्यसूदन, वज्रहस्त, कामसखा, गौतमीव्रतनाशन, वृत्रहा, वासव, दधीचि-देह- भिक्षुक, जिष्णु, वामनभ्राता, पुरुहूत, पुरन्दर, दिवस्पति, शतमख, सुत्रामा, गोत्रभिद्, विभु, लेखर्षभ, बलाराति, जम्भभेदी, सुराश्रय, संक्रन्दन, दुश्च्यवन, तुराषाट्, मेघवाहन, आखण्डल, हरि, हय, नमुचिप्राणनाशन, वृद्धश्रवा, वृष तथा दैत्यदर्पनिषूदन - ये छियालीस नाम निश्चय ही समस्त पापोंका नाश करनेवाले हैं। जो मनुष्य कौथुमीशाखामें कहे गये इस स्तोत्रका प्रतिदिन पाठ करता है, उसकी बड़ी-से-बड़ी विपत्तिमें इन्द्र वज्र हाथमें लिये रक्षा करते हैं। उसे अतिवृष्टि, शिलावृष्टि तथा भयंकर वज्रपातसे भी कभी भय नहीं होता; क्योंकि स्वयं इन्द्र उसकी रक्षा करते हैं। नारद ! जिस घरमें यह स्तोत्र पढ़ा जाता है और जो पुण्यवान् पुरुष इसे जानता है; उसके उस घरपर न कभी वज्रपात होता है और न ओले या पत्थर ही बरसते हैं। भगवान् श्रीनारायण कहते हैं- नन्दके मुखसे इस स्तोत्रको सुनकर मधुसूदन श्रीकृष्ण कुपित हो गये। वे ब्रह्मतेजसे प्रज्वलित हो रहे थे। उन्होंने पितासे यह नीतिकी बात कही। तात ! आप बड़े डरपोक हैं। किसकी स्तुति करते हैं? कौन हैं इन्द्र ? मेरे निकट रहकर आप इन्द्रका भय छोड़