ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४५- सुयज्ञद्वारा श्रीराधाका उत्कृष्ट मन्त्रजप करते हुए दुष्कर तपस्या तथा आकाशमें रथपर बैठी हुई परमेश्वरी श्रीराधाका उन्हें दर्शन
प्रकृतिखण्ड २७९
घरको लौटा ले चलो। वहाँ यत्नपूर्वक ब्राह्मण-देवताका पूजन करके इनका आशीर्वाद लो। महाराज! इसके बाद शीघ्र ही वनको जाओ और तपस्या करो। ब्राह्मणके शापसे छुटकारा मिलने-पर फिर यहाँ आओगे।
पार्वति! ऐसा कहकर सब मुनि, देवता, राजा तथा बन्धुवर्गके लोग तुरंत अपने-अपने स्थानको चले गये। (अध्याय ५२)
सुतपाके द्वारा सुयज्ञको शिवप्रदत्त परम दुर्लभ महाज्ञानका उपदेश
श्रीपार्वतीजीने पूछा— प्रभो! मुनिसमूहोंके चले जानेपर मनुष्योंके कर्मफलका वर्णन सुननेके अनन्तर ब्रह्मशापसे विह्वल हुए नृपश्रेष्ठ सुयज्ञने क्या किया? अतिथि ब्राह्मणने भी क्या किया? वे लौटकर राजाके घरमें गये या नहीं, यह बतानेकी कृपा करें।
महेश्वरने कहा— प्रिये! मुनिसमूहोंके चले जानेपर वे शापग्रस्त नरेश धर्मात्मा पुरोहित वसिष्ठजीकी आज्ञासे भूतलपर ब्राह्मणके दोनों चरणोंमें दण्डकी भाँति गिर पड़े। तब उन श्रेष्ठ द्विजने क्रोध छोड़कर उन्हें शुभ आशीर्वाद दिया। उन कृपामूर्ति ब्राह्मणको क्रोध छोड़कर मुस्कराते देख नृपश्रेष्ठ सुयज्ञने नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए दोनों हाथ जोड़ लिये और अत्यन्त विनम्रभावसे आत्मसमर्पण करते हुए उनसे परिचय पूछा।
राजाकी बात सुनकर वे मुनिश्रेष्ठ हँसने लगे। उन्होंने मेरे दिये हुए सर्वदुर्लभ परम तत्त्वका उन्हें उपदेश दिया।
अतिथि बोले— ब्रह्माजीके पुत्र मरीचि हैं। उनके पुत्र स्वयं कश्यपजी हैं। कश्यपके प्रायः सभी पुत्र मनोवाञ्छित देवभावको प्राप्त हुए हैं। उनमें त्वष्टा बड़े ज्ञानी हुए। उन्होंने सहस्र दिव्य वर्षोंतक पुष्करमें परम दुष्कर तपस्या की। ब्राह्मण-पुत्रकी प्राप्तिके लिये देवाधिदेव परमात्मा श्रीहरिकी समाराधना की। तब भगवान् नारायणसे उन्हें एक तेजस्वी ब्राह्मण-पुत्र वरके रूपमें प्राप्त हुआ। वह पुत्र तपस्याके धनी तेजस्वी विश्वरूपके नामसे प्रसिद्ध हुआ। एक समय बृहस्पतिजी देवराजके प्रति कुपित हो जब कहीं अन्यत्र चले गये, तब इन्द्रने विश्वरूपको ही अपना पुरोहित बनाया था। विश्वरूपके मातामह दैत्य थे। अतः वे देवताओंके यज्ञमें दैत्योंके लिये भी घीकी आहुति देने लगे। जब इन्द्रको इस बातका पता लगा तो उन्होंने अपनी माताकी आज्ञा लेकर ब्राह्मण विश्वरूपके मस्तक काट दिये। नरेश्वर! विश्वरूपके पुत्र विरूप हुए, जो मेरे पिता हैं। मैं उनका पुत्र सुतपा हूँ। मेरा काश्यप गोत्र है और मैं वैरागी ब्राह्मण हूँ। महादेवजी मेरे गुरु हैं। उन्होंने ही मुझे विद्या, ज्ञान और मन्त्र दिये हैं। प्रकृतिसे परवर्ती सर्वात्मा भगवान् श्रीकृष्ण मेरे इष्टदेव हैं। मैं उन्हींके चरण-कमलोंका चिन्तन करता हूँ। मेरे मनमें सम्पत्तिके लिये कोई
४६- दिव्य सुन्दर गोलोकमें राजा सुयज्ञको रत्नसिंहासनपर विराजमान श्रीकृष्णका दर्शन
| २८० | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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इच्छा नहीं है। राधावल्लभ श्रीकृष्ण मुझे सालोक्य, सार्टि, सारूप्य और सामीप्य नामक मोक्ष देते हैं; परंतु मैं उनकी कल्याणमयी सेवाके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं लेता हूँ। ब्रह्मत्व और अमरत्वको भी मैं जलमें दिखायी देनेवाले प्रतिबिम्बकी भाँति मिथ्या मानता हूँ। नरेश्वर ! भक्तिके अतिरिक्त सब कुछ मिथ्या भ्रममात्र है, नश्वर है। इन्द्र, मनु अथवा सूर्यका पद भी जलमें खींची गयी रेखाके समान मिथ्या है। मैं उसे सत्य नहीं मानता। फिर राजाके पदको कौन गिनता है। सुयज्ञ ! तुम्हारे यज्ञमें मुनियोंका आगमन सुनकर मेरे मनमें भी यहाँ आनेकी लालसा हुई। मैं तुम्हें विष्णुभक्तिकी प्राप्ति करानेके लिये यहाँ आया हूँ। इस समय मैंने तुमपर केवल अनुग्रह किया। तुम्हें शाप नहीं दिया। तुम एक भयानक गहरे भवसागरमें गिर गये थे। मैंने तुम्हारा उद्धार किया है। केवल जलमय तीर्थ ही तीर्थ नहीं है। भगवान्के भक्त भी तीर्थ हैं, मिट्टी और पत्थरकी प्रतिमारूप देवता ही देवता नहीं हैं, भगवद्भक्त भी देवता हैं। जलमय तीर्थ और मिट्टी-पत्थरके देवता मनुष्यको दीर्घकालमें पवित्र करते हैं; परंतु श्रीकृष्णभक्त दर्शन देनेके साथ ही पवित्र कर देते हैं।*
राजन् ! निकलो इस घरसे। दे दो राज्य अपने पुत्रको। वत्स ! अपनी साध्वी पत्नीकी रक्षाका भार बेटेको सौंपकर शीघ्र ही वनको चलो। भूमिपाल ! ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सब कुछ मिथ्या ही है। जो सबके ईश्वर हैं, उन परमात्मा राधावल्लभ श्रीकृष्णका भजन करो। वे ध्यानसे सुलभ हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिके लिये भी उनकी समाराधना कठिन है। वे उत्पत्ति-विनाशशील प्राकृत पदार्थों और प्रकृतिसे भी परे हैं। जिनकी ही मायासे ब्रह्मा सृष्टि, विष्णु पालन तथा रुद्रदेव संहार करते हैं। दिशाओंके स्वामी दिक्पाल जिनकी मायासे ही भ्रमण करते हैं, जिनकी आज्ञासे वायु चलती है, दिनेश सूर्य तपते हैं तथा निशापति चन्द्रमा सदा खेतीको सुस्निग्धता प्रदान करते हैं। सम्पूर्ण विश्वोंमें सबकी मृत्यु कालके द्वारा ही होती है। काल आनेपर ही इन्द्र वर्षा करते और अग्निदेव जलाते हैं। सम्पूर्ण विश्वके शासक तथा प्रजाको संयममें रखनेवाले यम कालसे ही भयभीत-से होकर अपने कार्यमें लगे रहते हैं। काल ही समय आनेपर संहार करता है और वही यथासमय सृष्टि तथा पालन करता है। कालसे प्रेरित होकर ही समुद्र अपने देश (स्थान)-की सीमामें रहता है, पृथ्वी अपने स्थानपर स्थिर रहती है, पर्वत अपने स्थानपर रहते हैं और पाताल अपने स्थानपर। राजेन्द्र ! सात स्वर्गलोक, सात द्वीपोंसहित पृथ्वी, पर्वत और समुद्रोंसहित सात पाताल—इन समस्त लोकोंसहित जो ब्रह्माण्ड है, वह अण्डेके आकारमें जलपर तैर रहा है। प्रत्येक ब्रह्माण्डमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि रहते हैं। देवता, मनुष्य, नाग, गन्धर्व तथा राक्षस आदि निवास करते हैं। राजन् ! पातालसे लेकर ब्रह्मलोकतक जो अण्ड है, यही ब्रह्माजीका कृत्रिम ब्रह्माण्ड है। यह जलमें शयन करनेवाले क्षुद्र विराट् विष्णुके नाभिकमलपर उसी तरह है जैसे कमलकी कर्णिकामें बीज रहा करता है।
इस प्रकार सुविस्तृत जलशय्यापर शयन करनेवाले वे प्राकृत महायोगी क्षुद्र विराट् विष्णु भी प्रकृतिसे परवर्ती ईश्वर, सर्वात्मा, कालेश्वर श्रीकृष्णका ध्यान करते हैं; उनका आधार है महाविष्णुका विस्तृत रोमकूप। महाविष्णुके अनन्त रोमकूपोंमेंसे प्रत्येकमें ऐसे-ऐसे ब्रह्माण्ड स्थित हैं। महाविष्णुके शरीरमें असंख्य रोम हैं और उन रोमकूपोंमें असंख्य ब्रह्माण्ड हैं। अण्डाकार ब्रह्माण्डोंकी
* न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः ॥ ते पुनन्त्युरुकालेन कृष्णभक्ताश्च दर्शनात्।
(प्रकृतिखण्ड ५३। २५-२६)
प्रकृतिखण्ड २८१
उत्पत्तिके स्थानभूत वे महाविष्णु भी सदा श्रीकृष्णकी इच्छासे प्रकृतिके गर्भसे अण्डरूपमें प्रकट होते हैं। सबके आधारभूत वे महाविष्णु भी कालके स्वामी सर्वेश्वर परमात्मा श्रीकृष्णका सदा चिन्तन किया करते हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंमें स्थित ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि तथा महान् विराट् और क्षुद्र विराट् इन सबकी बीजरूपा जो मूलप्रकृति ईश्वरी है, वह प्रलयकालमें कालेश्वर श्रीकृष्णमें लीन होती है तथा सदा उन्हींका ध्यान किया करती है। यह सब परम दुर्लभ महाज्ञान तुम्हें बताया गया है। गुरुदेव शिवने यह ज्ञान मुझे दिया था। इसे तो तुमने सुन लिया। अब और क्या सुनना चाहते हो?
(अध्याय ५३)
गोलोक एवं श्रीकृष्णकी उत्कृष्टता, कालमान एवं विभिन्न प्रलयोंका निरूपण, चौदह मनुओंका परिचय, ब्रह्मासे लेकर प्रकृतितकके श्रीकृष्णमें लय होनेका वर्णन, शिवका मृत्युञ्जयत्व, मूलप्रकृतिसे महाविष्णुका प्रादुर्भाव, सुयज्ञको विप्रचरणोदकका महत्त्व तथा राधाका मन्त्र बताकर सुतपाका जाना, पुष्करमें राजाकी दुष्कर तपस्या तथा राधामन्त्रके जपसे सुयज्ञका श्रीराधाकी कृपासे गोलोकमें जाना और श्रीकृष्णका दर्शन एवं कृपाप्रसाद प्राप्त करना
**राजाने पूछा—**मुनीश्वर! सभी कालसे भयभीत रहते हैं तो उनका आधार कहाँ है? कालकी माया कितनी है? क्षुद्र विराट्की आयु कितने कालकी है? ब्रह्मा, प्रकृति, मनु, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य तथा अन्य प्राकृत जनोंकी परमायु क्या है? वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! उनकी वेदोक्त आयुका भलीभाँति विचार करके मेरे समक्ष वर्णन कीजिये। महाभाग! समस्त विश्वोंके ऊर्ध्वभागमें कौन-सा लोक है? यह बताइये और मेरे संदेहका निवारण कीजिये।
**मुनि बोले—**राजन्! सम्पूर्ण विश्वोंके ऊर्ध्वभागमें गोलोक विद्यमान है, जो आकाशके समान विस्तृत है। वह श्रीकृष्णकी इच्छासे प्रकट हो सदा नित्य-अण्डके रूपमें प्रकाशित होता है। भूपाल! आदिसर्गमें सृष्टिके लिये उन्मुख हो अपनी कलास्वरूपा प्रकृतिके साथ संयुक्त श्रीकृष्ण जब क्रीडापरायण होकर लीलासे ही थकानका अनुभव करते हैं, उस समय उनके मुखमण्डलसे निर्गत पसीनेकी बूँदोंसे जो जलराशि प्रकट होती है, उसीके द्वारा गोलोकधाम जलसे परिपूर्ण रहता है। प्रकृतिके गर्भसे संयुक्त एवं अण्डाकारमें उत्पन्न जो विश्वके आधारभूत महाविष्णु (या महाविराट्) हैं, उनका आधार वहाँ उपर्युक्त विस्तृत गोलोकधाम ही है। अत्यन्त विस्तृत जलाधार (अथवा जलशय्या)-पर शयन करनेवाले जो महाविराट् हैं, वे श्रीराधावल्लभ श्रीकृष्णका सोलहवाँ अंश कहे गये हैं। उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति दूर्वादलके समान श्याम है। उनके मुखपर मन्द मुसकान खेलती रहती है। उनके चार भुजाएँ हैं। वे वनमाला धारण करते हैं। श्रीमान् महाविष्णु पीताम्बरसे सुशोभित हैं। सर्वोपरि आकाशमें श्रीविष्णुका नित्य वैकुण्ठधाम है, जो आत्माकाशके समान नित्य तथा चन्द्रमण्डलके तुल्य विस्तृत है। ईश्वरकी इच्छासे उसका आविर्भाव हुआ है।
४७- रासेश्वर श्रीकृष्णसहित श्रीराधाका ध्यान-चित्रण
२८२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
वह अलक्ष्य तथा आश्रयरहित है। आकाशके समान अत्यन्त विस्तृत तथा अमूल्य दिव्य रत्नोंद्वारा निर्मित है। वहाँ वनमालाधारी श्रीमान् चतुर्भुज नारायणदेव, जो लक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा तथा तुलसीके पति हैं; सुनन्द, नन्द तथा कुमुद आदि पार्षदोंसे घिरे हुए निवास करते हैं।
सर्वेश्वर, सर्वसिद्धेश्वर एवं भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही दिव्य विग्रह (अथवा कृपामय शरीर) धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण दो रूपोंमें प्रकट हैं—द्विभुज एवं चतुर्भुज। चतुर्भुजरूपसे वे वैकुण्ठमें वास करते हैं और द्विभुजरूपसे गोलोकधाममें। वैकुण्ठसे पचास करोड़ योजन ऊपर गोलाकार 'गोलोक' धाम विद्यमान है, जो समस्त लोकोंसे श्रेष्ठतम है। बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित विशाल भवन उस धामकी शोभा बढ़ाते हैं। रत्नेन्द्रसारके बने हुए विचित्र खम्भों और सीढ़ियोंसे वे भवन अलंकृत हैं। श्रेष्ठ मणिमय दर्पणोंसे जटित किवाड़ों तथा कलशोंसे उज्ज्वल एवं नाना प्रकारके चित्रोंसे विचित्र शोभा पानेवाले शिविर उस धामकी श्रीवृद्धि करते हैं। उसका विस्तार एक करोड़ योजन है तथा लंबाई उससे सौगुनी है।
विरजा नदीसे घिरा हुआ शतशृङ्ग पर्वत उस धामका परकोटा है। विरजा नदीकी आधी लंबाई-चौड़ाई तथा शतशृङ्ग पर्वतकी आधी ऊँचाईवाले वृन्दावनसे वह धाम सुशोभित है। वृन्दावनकी अपेक्षा आधी लंबाई-चौड़ाईमें निर्मित रासमण्डल गोलोकधामका अलंकार है। उपर्युक्त नदी, पर्वत और वन आदिके मध्यभागमें मुख्य गोलोकधाम है। जैसे कमलमें कर्णिका होती है, उसी प्रकार उक्त नदी, शैल आदिके बीचमें वह मनोहर धाम प्रतिष्ठित है। वहाँ रासमण्डलमें गौओं, गोपों और गोपियोंसे घिरे हुए गोपीवल्लभ श्रीकृष्ण रासेश्वरी श्रीराधाके साथ निरन्तर निवास करते हैं। उनके दो भुजाएँ हैं, वे हाथोंमें मुरली लिये बाल-गोपालका रूप धारण किये रहते हैं। अग्निशुद्ध चिन्मय वस्त्र उनका परिधान है। वे रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। उनके सारे अङ्ग चन्दनसे चर्चित हैं। गलेमें रत्नोंका हार शोभा देता है। वे रत्नमय सिंहासनपर विराजमान हैं। उनके ऊपर रत्नमय छत्र तना हुआ है तथा उनके प्रिय सखा ग्वालबाल श्वेत चवँर लिये सदा उनकी सेवामें तत्पर रहते हैं। वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सुन्दर वेषवाली गोपियाँ माला और चन्दनके द्वारा उनका शृङ्गार करती हैं। वे मन्द-मन्द मुस्कराते रहते हैं और वे गोपियाँ कटाक्षपूर्ण चितवनसे उनकी ओर निहारती रहती हैं।
इस प्रकार जैसा मैंने भगवान् शंकरके मुखसे सुना था और आगमोंमें जैसा वर्णन मिलता है, तदनुसार लोकविस्तारकी यथाशक्ति चर्चा की है। अब कालका मान सुनो। छः पल सोनेका बना हुआ एक पात्र हो, जिसकी गहराई चार अंगुलकी हो। उसमें एक-एक माशे सोनेके बने हुए चार-
प्रकृतिखण्ड २८३
चार अंगुल लंबे चार कीलोंसे छेद कर दिये जायँ। फिर उस पात्रको जलके ऊपर रख दिया जाय। उन छिद्रोंसे पानी आकर जितनी देरमें वह पात्र भर दे, उतने समयको एक दण्ड कहते हैं। दो दण्डका एक मुहूर्त और चार मुहूर्तोंका एक प्रहर होता है। आठ प्रहरोंसे एक दिन-रातकी पूर्ति होती है। पंद्रह दिन-रातको एक पक्ष कहते हैं। दो पक्षोंका एक मास और बारह मासका एक वर्ष होता है। मनुष्योंके एक मासमें जितना समय व्यतीत होता है, वह पितरोंका एक दिन-रात है। कृष्णपक्षमें उनका दिन कहा गया है और शुक्लपक्षमें रात्रि। मनुष्योंके एक वर्षमें देवताओंके एक दिन-रातकी पूर्ति होती है। उत्तरायणमें उनका दिन होता है और दक्षिणायनमें रात्रि। नरेश्वर! मनुष्य आदिकी अवस्था युग एवं कर्मके अनुरूप होती है। अब प्रकृति, प्राकृत पदार्थ एवं ब्रह्मा आदिकी आयुका परिमाण सुनो। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—इन चारोंको एक चतुर्युग कहते हैं। इनकी काल-संख्या बारह हजार दिव्य वर्ष है। सावधान होकर सुनो, सत्ययुग आदिका कालमान क्रमशः चार, तीन, दो और एक दिव्य वर्ष है। उनकी संध्या और संध्यांशकाल दो हजार दिव्य वर्षोंके बताये गये हैं*। मनुष्योंके मानसे चारों युगोंका परिमाण तैंतालीस लाख बीस हजार वर्ष है। इनमें गणनाके विद्वानोंने सत्ययुगका मान मनुष्योंके वर्षसे सत्रह लाख अट्ठाईस हजार बताया है। इसी तरह त्रेताका कालमान बारह लाख छियानबे हजार मानव-वर्ष है। द्वापरका आठ लाख चौंसठ हजार तथा कलियुगका चार लाख बत्तीस हजार मानव-वर्ष है।
जैसे सात वार, सोलह तिथियाँ, दिन-रात, दो पक्ष, बारह मास और वर्ष चक्रवत् घूमते रहते हैं, उसी प्रकार चारों युगोंका चक्र भी सदा ही चलता रहता है। राजेन्द्र! जैसे युग परिवर्तित होते हैं, उसी प्रकार मन्वन्तर भी। इकहत्तर दिव्य युगोंका एक मन्वन्तर होता है। इसी क्रमसे चौदह मनु भ्रमण करते रहते हैं।
नरेश्वर! मैंने भगवान् शंकरके मुखसे धर्मात्मा मनुओंका जो आख्यान सुना है, वह बता रहा हूँ। तुम मुझसे सुनो। आदिमनु ब्रह्माजीके पुत्र हैं। इसलिये उन्हें स्वायम्भुव मनु कहा गया है। उनकी पत्नी पतिव्रता शतरूपा हैं। स्वायम्भुव मनु धर्मात्माओंमें वरिष्ठ और मनुओंमें गरिष्ठ हैं। वे तुम्हारे प्रपितामह लगते हैं। उन्होंने भगवान् शंकरका शिष्यत्व ग्रहण किया है। वे विष्णुव्रतका पालन करनेवाले जीवन्मुक्त एवं महाज्ञानी थे। उन्होंने भगवान् शंकरकी आज्ञासे भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये प्रतिदिन एक लाख बहुमूल्य रत्न, दस करोड़ स्वर्णमुद्रा, सोनेके सींगसे सुशोभित एवं सुपूजित एक लाख दिव्य धेनु, अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र, एक लाख श्रेष्ठ मणि, सब प्रकारकी
* इस विषयका स्पष्टीकरण यों समझना चाहिये। सत्ययुग चार हजार दिव्य वर्षोंका होता है। युगके आरम्भमें चार सौ दिव्य वर्षोंकी संध्या होती है और युगके अन्तमें चार सौ दिव्य वर्षोंका संध्यांशकाल होता है। इस प्रकार सत्ययुगका कालमान चार हजार आठ सौ दिव्य वर्ष है। त्रेताका संध्यामान तीन सौ दिव्य वर्ष, युगमान तीन सहस्र दिव्य वर्ष और संध्यांशमान तीन सौ दिव्य वर्ष। इस तरह त्रेताका सम्पूर्ण कालमान तीन हजार छः सौ दिव्य वर्ष है। द्वापरका संध्यामान दो सौ दिव्य वर्ष, युगमान दो हजार दिव्य वर्ष और संध्यांशमान दो सौ दिव्य वर्ष है। ये सब मिलाकर दो हजार चार सौ दिव्य वर्ष होते हैं। इसी तरह कलियुगका संध्यामान एक सौ दिव्य वर्ष, युगमान एक सहस्र दिव्य वर्ष और संध्यांशमान एक सौ दिव्य वर्ष है। इस प्रकार कलियुगका पूरा मान बारह सौ दिव्य वर्ष है। इन चार युगोंका सम्मिलित कालमान बारह हजार दिव्य वर्ष है।
२८४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण खेतीसे हरी-भरी भूमि, लाखों उत्तमोत्तम गजराज, सोनेके आभूषणोंसे विभूषित तीन लाख रत्न, सहस्रों स्वर्णजटित रथरत्न, एक लाख शिबिका, अन्नसे भरे हुए तीन करोड़ सुवर्णपात्र, जलसे भरे हुए तीन कोटि सुवर्ण-कलश, कर्पूर आदिसे सुवासित ताम्बूल और विश्वकर्माद्वारा रचित तथा श्रेष्ठ रत्नोंके सारभागसे खचित एवं वह्निशुद्ध विचित्र वस्त्रसहित माल्यसमूहोंसे सुशोभित तीन करोड़ विचित्र स्वर्ण-पर्यङ्कका ब्राह्मणोंके लिये दान किया था। भगवान् शंकरसे परम दुर्लभ ज्ञान, श्रीकृष्णका मन्त्र तथा श्रीहरिका दास्यभाव प्राप्त करके वे गोलोकको चले गये। अपने पुत्रको मुक्त हुआ देख प्रजापति ब्रह्मा बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने संतुष्ट होकर भगवान् शंकरकी स्तुति की और आदिमनुके स्थानपर दूसरे मनुकी सृष्टि की। वे भी स्वयम्भूके पुत्र होनेके कारण स्वायम्भुव मनु कहलाये। दूसरे मनुका नाम स्वारोचिष है। ये अग्निदेवके पुत्र हैं। राजा स्वारोचिष भी स्वायम्भुव मनुके समान ही महान् धर्मिष्ठ एवं दानी रहे हैं। दो अन्य मनु राजा प्रियव्रतके पुत्र तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ हैं। उनके नाम हैं-तापस और उत्तम। दोनों ही वैष्णव हैं तथा क्रमशः तीसरे और चौथे मनुके पदपर प्रतिष्ठित हैं। वे दोनों भी भगवान् शंकरके शिष्य हैं तथा श्रीकृष्णकी भक्तिमें तत्पर रहते हैं। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ रैवत पाँचवें मनु हैं। चाक्षुषको छठा मनु जानना चाहिये। वे भी विष्णुभक्तिमें तत्पर रहनेवाले हैं। सूर्यपुत्र श्राद्धदेव जो विष्णुके भक्त हैं, सातवें मनु कहे गये हैं (इन्हींको वैवस्वत मनु कहते हैं)। सूर्यके दूसरे वैष्णव पुत्र सावर्णिक आठवें मनु हैं। विष्णुव्रतपरायण दक्षसावर्णि नवें मनु हैं। ब्रह्मज्ञानविशारद ब्रह्मसावर्णि दसवें मनु हैं। ग्यारहवें मनुका नाम धर्मसावर्णि है। वे धर्मिष्ठ, वरिष्ठ तथा सदा ही वैष्णवोंके व्रतका पालन करनेवाले हैं। ज्ञानी रुद्रसावर्णि बारहवें मनु हैं तथा धर्मात्मा देवसावर्णिको तेरहवाँ मनु कहा गया है। महाज्ञानी चन्द्रसावर्णि चौदहवें मनु हैं। मनुओंकी जितनी आयु होती है, उतनी ही इन्द्रोंकी भी होती है। ब्रह्माका एक दिन चौदह इन्द्रोंसे अविच्छिन्न कहा जाता है। जितना बड़ा उनका दिन होता है, उतनी ही बड़ी उनकी रात भी होती है। नरेश्वर ! उसे ब्राह्मी निशाके नामसे जानना चाहिये। उसीको वेदोंमें 'कालरात्रि' कहा गया है। राजन् ! ब्रह्माका एक दिन एक छोटा कल्प माना गया है। महातपस्वी मार्कण्डेय ऐसे ही कल्पोंसे सात कल्पतक जीवित रहते हैं। ब्रह्माका दिन बीतनेपर ब्रह्मलोकसे नीचेके सारे लोक प्रलयाग्निसे जलकर भस्म हो जाते हैं। वह अग्नि सहसा संकर्षण (शेषनाग) -के मुखसे प्रकट होती है। उस समय चन्द्रमा, सूर्य और ब्रह्माजीके पुत्रगण निश्चय ही ब्रह्मलोकमें चले जाते हैं। जब ब्रह्माकी रात बीत जाती है, तब वे पुनः सृष्टिका कार्य प्रारम्भ करते हैं। ब्रह्माकी रात्रिमें जो लोकोंका संहार होता है, उसे 'क्षुद्र प्रलय' कहते हैं। उसमें देवता, मनु और मनुष्य आदि दग्ध हो जाते हैं। इस प्रकार जब ब्रह्माके तीस दिन-रात व्यतीत हो जाते हैं, तब उनका एक मास पूरा होता है। वैसे ही बारह महीनोंका उनका एक वर्ष होता है। इस प्रकार ब्रह्माके पंद्रह वर्ष व्यतीत होनेपर एक प्रलय होता है, जिसे वेदोंमें 'दैनन्दिन प्रलय' कहा गया है। प्राचीन वेदज्ञोंने उसीको 'मोहरात्रि' की संज्ञा दी है। उसमें चन्द्रमा, सूर्य आदि; दिक्पाल, आदित्य, वसु, रुद्र, मनु, इन्द्र, मानव, ऋषि, मुनि, गन्धर्व तथा राक्षस आदि; मार्कण्डेय, लोमश और पेचक आदि चिरजीवी; राजा इन्द्रद्युम्न, अकूपार नामक कच्छप तथा नाडीजंघ नामक बक-ये सब-के-सब नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्मलोकके नीचेके सब लोक तथा नागोंके स्थान भी विनाशको प्राप्त हो जाते हैं। ऐसे समयमें
प्रकृतिखण्ड २८५ ब्रह्मपुत्र आदि सब लोग ब्रह्मलोकमें चले जाते हैं। दैनन्दिन प्रलय व्यतीत होनेपर ब्रह्माजी पुनः लोकोंकी सृष्टि आरम्भ करते हैं। इस प्रकार सौ वर्षोंतक ब्रह्माकी आयु पूरी होती है। तदनन्तर ब्रह्माजीकी आयु पूर्ण होनेपर एक कल्प पूरा हो जाता है। उस समय जो 'महाप्रलय' आता है, उसीको पुरातन महर्षियोंने 'महारात्रि' कहा है। ब्रह्माजीकी आयु पूर्ण होनेपर ब्रह्माण्डसमूह जलमें डूब जाता है। वेदमाता सावित्री, वेद और धर्म आदि सब-के-सब तिरोहित हो जाते हैं। मृत्युका भी विनाश हो जाता है। परंतु देवी प्रकृति और भगवान् शिवका नाश नहीं होता। विश्वके वैष्णवगण भगवान् नारायणमें लीन हो जाते हैं। संहारकारी कालाग्निरुद्र समस्त रुद्रगणोंके साथ मृत्युञ्जय महादेवमें लीन हो जाते हैं। उनके साथ ही तमोगुणका भी लय हो जाता है। तदनन्तर प्रकृतिकी एक पलक गिरती है। साथ ही नारायण, शिव तथा महाविष्णुकी भी पलक गिरती है। नरेश्वर ! निमेषके अन्तमें अर्थात् पलक उठनेपर श्रीकृष्णकी इच्छासे पुनः सृष्टिका आरम्भ होता है। श्रीकृष्ण निमेषसे रहित हैं। उनकी पलक नहीं गिरती है; क्योंकि वे प्रकृतिसे परे तथा प्राकृत गुणोंसे रहित हैं। जो सगुण हैं, उन्हींके निमेष होता है। वह निमेष काल- संख्यात्मक अवस्थासे सीमित होता है। जो नित्य, निर्गुण, अनादि और अनन्त हैं, उनके निमेष कहाँ? जब प्रकृतिकी एक सहस्र बार पलकें गिर जाती हैं, तब उसका एक दण्ड पूरा होता है। ऐसे साठ दण्डोंका उसका एक दिन कहा गया है। तीस दिनोंका एक मास और बारह महीनोंका वर्ष होता है। ऐसे एक सौ वर्ष बीत जानेपर प्रकृतिका श्रीकृष्णमें लय होता है। श्रीकृष्णमें उसके लय होनेपर जो प्रलय होता है, उसे 'प्राकृत प्रलय' कहा गया है। महाविष्णुकी जननी वह एकमात्र मूलप्रकृति ईश्वरी सबका संहार करके स्वयं श्रीकृष्णके वक्षःस्थलमें विलीन हो जाती है। संतपुरुष उसीको सनातनी विष्णुमाया, सर्वशक्तिस्वरूपा दुर्गा, सती नारायणी, श्रीकृष्णकी बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी तथा निर्गुणात्मिका कहते हैं। जिसकी मायासे बड़े-बड़े देवता मोहित होते हैं, उस देवीको वैष्णवजन महालक्ष्मी तथा 'परा राधा' कहते हैं। श्रीकृष्णके आधे अङ्गसे प्रकट हुई महालक्ष्मी नारायणकी प्रिया है। वही राधारूपसे श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी और उनकी प्राणाधिका है। शश्वत् प्रेममयी शक्ति है। निर्गुण परमात्माकी निर्गुणा प्रियतमा है। नारायण और शिव दोनों शुद्ध-सत्त्वस्वरूपी हैं। वे अपने बहुत-से पार्षदगणोंका अपने-आपमें संहार करके निर्गुण श्रीकृष्णमें लीन हो जाते हैं। नरेश्वर ! गोप, गोपियाँ और सवत्सा गौएँ सब- की-सब प्रकृतिस्वरूपा श्रीराधामें लीन हो जाती हैं और वे प्रकृतिदेवी परमेश्वर श्रीकृष्णमें। जो क्षुद्र विष्णु हैं, वे सब महाविष्णुमें लीन होते हैं। महाविष्णु प्रकृतिमें और वह श्रीकृष्णकी मूल- प्रकृति परमात्मा श्रीकृष्णमें लीन होती है। माया तथा ईश्वरकी इच्छासे प्रकृतिने योगनिद्रा बनकर श्रीकृष्णके नेत्रकमलोंमें निवास किया। जितने समयमें प्रकृतिका एक दिन होता है, उतने समयतक वृन्दावनमें परमात्मा श्रीकृष्णको नींद लगी रहती है। वहाँ बहुमूल्य रत्नोंका पर्यङ्क बिछा होता है, जो अग्निशुद्ध चिन्मय वस्त्रोंसे आच्छादित होता है। गन्ध, चन्दन और फूलोंकी वायुसे वह पर्यङ्क सुवासित रहता है। उसीपर श्यामसुन्दर शयन करते हैं। उनके पुनः जागनेपर सारी सृष्टिका कार्य आरम्भ होता है। उन निर्गुण परमात्मा श्रीकृष्णका वन्दन, स्मरण, ध्यान, पूजन और गुण-कीर्तन महापातकोंका नाश करनेवाला है। महाराज ! मैंने मृत्युञ्जय महादेवके मुखसे जैसा सुना था और आगमोंमें जो कुछ कहा गया है, उसके अनुसार यह सब कुछ बता दिया। अब
२८६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
तुम और क्या सुनना चाहते हो?
सुयज्ञने पूछा—ब्रह्माजीकी आयु पूर्ण होनेपर समस्त लोकोंके संहारकारी कालाग्निरुद्र, तमोगुण तथा सत्त्वगुण यदि मृत्युञ्जय शिवमें विलीन होते हैं तथा यदि उस प्राकृत लयकी बेलामें शिव निर्गुण परमात्मा श्रीकृष्णमें लीन होते हैं तो आपके गुरु भगवान् शिवका नाम श्रुतिमें मृत्युञ्जय क्यों रखा गया? तथा जिनके रोमकूपोंमें असंख्य ब्रह्माण्ड निवास करते हैं, उन महाविष्णुकी जननी यह मूलप्रकृति कैसे हुई?
सुतपा बोले—नरेश्वर! ब्रह्माजीकी आयु पूर्ण होनेपर ब्रह्मा आदि समस्त लोकोंका संहार करनेवाली मृत्युकन्या जलबिम्बकी भाँति नष्ट हो जाती है। ऐसी कितनी ही मृत्युकन्याओं और करोड़ों ब्रह्माओंका लय हो जानेपर यथासमय भगवान् शिव सत्त्वरूपधारी निर्गुण श्रीकृष्णमें लीन होते हैं। मेरे गुरु भगवान् शिवने मृत्युकन्यापर सदा ही विजय पायी है। परंतु मृत्युने कभी शिवको पराजित नहीं किया है। यह बात प्रत्येक कल्पमें श्रुतियोंद्वारा सुनी गयी है। अतः भगवान् शिवका मृत्युञ्जय नाम उचित ही है। नरेश्वर! शम्भु, नारायण और प्रकृति—इन तीनों नित्य तत्त्वोंका नित्य परमात्मा श्रीकृष्णमें लय होना लीलामात्र है, वास्तविक नहीं है। स्वयं निर्गुण परमपुरुष परमात्मा ही कालके अनुसार सगुण होते हैं। वे स्वयं ही मायासे नारायण, शिव एवं प्रकृतिके रूपमें प्रकट होते हैं; अतः सदा उनके समान ही हैं। जैसे अग्नि और उसकी चिनगारियोंमें भेद नहीं है, वैसे ही नारायण आदि तथा श्रीकृष्णमें कोई अन्तर नहीं है। ब्रह्माजीके द्वारा प्रत्येक कल्पमें जिन-जिन रुद्र, आदित्य आदिकी सृष्टि हुई है, वे सब मृत्युकन्यासे पराजित होनेके कारण नश्वर हैं। परंतु शिवकी सृष्टि ब्रह्माजीने नहीं की है। शिव सत्य, नित्य एवं सनातन हैं। भूमिपाल! उनके निमेषमात्रमें कितने ही ब्रह्माओंका पतन हो जाता है। आदिसर्गमें जगद्गुरु श्रीकृष्णने प्रकृतिके भीतर वीर्यका आधान किया था। पवित्र वृन्दावनके भीतर रासमें उनके वामांशसे प्रकट हुई रासेश्वरी राधा ही परा प्रकृति हैं। उन्होंने ही गर्भ धारण किया। तदनन्तर समय आनेपर राधाने गोलोकके रासमण्डलमें एक अण्डको जन्म दिया। अपनी संततिको अण्डाकार देख उनके हृदयमें बड़ी व्यथा हुई। वे कुपित हो उठीं तथा उन्होंने उस अण्डेको वहाँसे नीचे विश्वगोलकमें फेंक दिया। उसी अण्डसे सबके आधारभूत महाविराट् (महाविष्णु)-की उत्पत्ति हुई।
सुयज्ञने कहा—प्रभो! आज मेरा जन्म सफल हो गया। जीवन सार्थक हो गया। मेरे लिये आपका शाप भक्तिका कारण होनेसे वरदान बन गया। समस्त मङ्गलोंका भी मङ्गल करनेवाली हरि-भक्ति परम दुर्लभ है। विप्रवर! वेदोंमें जो पाँच प्रकारकी भक्ति बतायी गयी है, वह भी इसके समान नहीं है। महामुने! परमात्मा श्रीकृष्णमें जिस प्रकार भी मेरी भक्ति सम्भव हो सके, वह उपाय कीजिये; क्योंकि वह सभीके लिये परम दुर्लभ है। केवल जलमय तीर्थ ही तीर्थ नहीं है, मिट्टी और पत्थरकी प्रतिमारूप देवता ही देवता नहीं हैं, श्रीकृष्णभक्त ही मुख्य तीर्थ और देवता हैं। वे जलमय तीर्थ और मिट्टी-पत्थरके देवता दीर्घकालमें उपासकको पवित्र करते हैं, परंतु श्रीकृष्णभक्त दर्शनमात्रसे ही पवित्र कर देते हैं। समस्त वर्णोंमें ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं, उनमें भी जो भारतवर्षमें रहकर स्वधर्म-पालनमें लगे रहते हैं, वे श्रेष्ठ हैं। उनमें भी जो श्रीकृष्णमन्त्रका उपासक श्रीकृष्णभक्तिपरायण तथा प्रतिदिन श्रीकृष्णके नैवेद्यको भोजन करनेवाला है, वह सर्वश्रेष्ठ और महान् पवित्र है। आप वैष्णव हैं, अतः ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ हैं। साथ ही महान् ज्ञानके श्रेष्ठ सागर हैं। मुने! आप-जैसे शिव-शिष्य महात्मा पुरुषको पाकर मैं दूसरे किसकी शरण जाऊँ? महामुने!
प्रकृतिखण्ड २८७
आपके शापसे इस समय मैं गलित कुष्ठका रोगी हूँ। अपवित्र हूँ और तपके अधिकारसे वञ्चित हूँ। ऐसी दशामें कैसे तपस्या करूँ?
सुतपा बोले—राजन्! सनातनी विष्णुमाया हरि-भक्ति प्रदान करनेवाली है। वह जिन लोगोंपर कृपा करती है, उन्हें भगवान्की भक्ति देती है। माया जिन्हें मोहित करती है, उन्हें हरि-भक्ति नहीं देती है, अपितु उनको नश्वर धन देकर ठग लेती है। अतः तुम प्राकृत गुणोंसे रहित कृष्णप्रेममयी शक्ति तथा श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी श्रीराधाकी आराधना करो, जो सम्पूर्ण सम्पदाओंको देनेवाली हैं। उनके अनुग्रह एवं सेवासे शीघ्र ही गोलोकमें चले जाओगे। वे सर्वाराध्य श्रीकृष्णसे भी सेवित एवं पूजित हैं। निर्गुण परमात्मा श्रीकृष्ण ध्यानसे भी वशमें न होनेवाले और दुराराध्य हैं। उनकी सेवा करके भक्त-जन सुदीर्घकाल किंवा अनेक जन्मोंके पश्चात् गोलोकमें जाते हैं। परंतु सर्वसम्पत्स्वरूपिणी श्रीराधा महाविष्णुकी भी जननी हैं, कृपामयी हैं। अतः उनका सेवन करके भक्तजन शीघ्र ही गोलोकमें चले जाते हैं। तुम एक सहस्र वर्षोंतक ब्राह्मणका चरणोदक पीते रहो। इससे कामदेवके समान रूपवान् तथा रोगहीन हो जाओगे। जबतक पृथ्वी ब्राह्मणके चरणोदकसे भीगी रहती है, तबतक उस ब्राह्मणभक्त पुरुषके पितर कमलके पत्तोंमें जल पीते हैं। पृथ्वीपर जो-जो तीर्थ हैं, वे सब समुद्रमें भी हैं और समुद्रमें जो तीर्थ हैं, वे सब ब्राह्मणके चरणोंमें हैं। ब्राह्मणका चरणोदक पापों तथा रोगोंका विनाश करनेवाला है। वह सम्पूर्ण तीर्थोंके जलके समान भोग तथा मोक्ष देनेवाला और शुभ है। ब्राह्मण मनुष्यके रूपमें साक्षात् देवाधिदेव जनार्दन हैं। ब्राह्मणके दिये हुए पदार्थको सब देवता भोग लगाते हैं।
ऐसा कहकर ब्राह्मण सुतपा सुयज्ञके सत्कारको ग्रहण करके अपने घरको चले गये। जाते-जाते यह कह गये कि मैं एक वर्षके बाद फिर आऊँगा। शिवे! राजा प्रतिदिन भक्तिभावसे ब्राह्मणके चरणोदकका पान करने लगे। उन्होंने एक वर्षतक ब्राह्मणोंकी पूजा की और उन्हें भोजन कराया। वर्ष बीतते-बीतते राजा रोग-व्याधिसे मुक्त हो गये। फिर कश्यपकुलके अग्रणी मुनिश्रेष्ठ सुतपा वहाँ आये। उन्होंने श्रीराधाकी पूजाके विधान, स्तोत्र, कवच, मन्त्र और सामवेदोक्त ध्यानका राजा सुयज्ञको उपदेश दिया और कहा—'राजन्! शीघ्र घर छोड़कर निकल जाओ।' ऐसा कहकर मुनि तो तपस्याके लिये चले गये और राजा तुरंत ही घर छोड़कर दुर्गम वनको चल दिये। राजाकी चारों रानियोंने प्राण त्याग दिये तथा उनका पुत्र राजा हुआ। सुयज्ञने पुष्करमें जाकर सुदुष्कर तपस्या की। उन्होंने सौ दिव्य वर्षोंतक श्रीराधाके उत्कृष्ट मन्त्रका जप किया। तब उन्होंने आकाशमें रथपर बैठी हुई परमेश्वरी श्रीराधाके दर्शन किये। उनके दर्शनमात्रसे राजाके सारे पाप-ताप दूर हो गये। उन्होंने मनुष्यदेहको त्याग दिया और दिव्य रूप धारण कर लिया। देवी श्रीराधा उस रत्नेन्द्रनिर्मित
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विमानद्वारा राजाको साथ ले गोलोकमें चली गयीं। राजाने विरजा नदी तथा मनोहर शतशृङ्ग पर्वतसे घिरे हुए, श्रीवृन्दावनसे युक्त तथा रासमण्डलसे मण्डित गोलोकका दर्शन किया। वह धाम गौओं, गोपियों और गोपसमूहोंसे सेवित तथा रत्नेन्द्रसारसे निर्मित अत्यन्त मनोहर भवनोंद्वारा सुशोभित हो रहा था। भाँति-भाँतिके चित्र-विचित्र दृश्य उसकी शोभा बढ़ाते थे तथा वह कल्पवृक्षयुक्त सैंतीस उपवनोंसे शोभायमान था। उन उपवनोंमें पारिजातके वृक्ष भी भरे हुए थे। सारा गोलोक कामधेनुओंसे आवेष्टित था। आकाशकी भाँति विपुल विस्तारसे युक्त तथा चन्द्रमण्डलके समान गोलाकार था। वैकुण्ठसे पचास करोड़ योजन ऊपर वह शून्यमें बिना किसी आधारके स्थित है और भगवान्की इच्छासे ही सुस्थिर है। आत्माकाशके समान नित्य है और हमलोगोंके लिये भी परम दुर्लभ है। मैं, नारायण, अनन्त, ब्रह्मा, विष्णु, महाविराट् धर्म, क्षुद्र विराट्, गङ्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, तुम (पार्वती), विष्णुमाया, सावित्री, तुलसी, गणेश, सनत्कुमार, स्कन्द, नर-नारायण ऋषि, कपिल, दक्षिणा, यज्ञ, ब्रह्मपुत्र, योगी, वायु, वरुण, चन्द्रमा, सूर्य, रुद्र, अग्नि तथा कृष्णमन्त्रके उपासक भारतीय वैष्णव—इन सबने ही गोलोकको देखा है। दूसरोंने इसे कभी नहीं देखा है।
उस गोलोकधाममें श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण निरामय रत्नसिंहासनपर विराजमान हैं। रत्नोंके हार, किरीट तथा रत्नमय भूषणोंसे वे विभूषित हैं। अग्निशुद्ध, अत्यन्त निर्मल चिन्मय पीताम्बर उनके श्रीअङ्गोंकी शोभा बढ़ाता है। उनके सारे अङ्ग चन्दनसे चर्चित हैं। वे किशोर गोपबालकके रूपमें दिखायी देते हैं। नूतन जलधरके समान श्याम कान्ति, श्वेत कमलके समान नेत्र, शरत्की पूर्णिमाके चन्द्रमण्डलको तिरस्कृत करनेवाला मन्द हास्यसे सुशोभित मुख, मनोहर आकृति, दो भुजाएँ और हाथोंमें मुरली—यही उनके रूपकी झाँकी है। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही वे दिव्य विग्रह धारण करते हैं। श्रीकृष्ण स्वेच्छामय (परम स्वतन्त्र), प्रकृतिसे परे, परब्रह्मस्वरूप निर्गुण परमात्मा हैं। ध्यानसे भी वे वशमें आनेवाले नहीं हैं। उनकी आराधना बहुत कठिन है। वे हमारे लिये भी परम दुर्लभ हैं। उनके प्रिय सखा बारह ग्वालबाल सफेद चँवर लिये उनकी सेवा करते हैं। प्रेमपीडिता, सुस्थिरयौवना, वह्निशुद्ध चिन्मय वस्त्रधारिणी, रत्नभूषणभूषिता एवं परम मनोहारिणी गोपिकाएँ मन्द-मन्द मुस्कराती हुई उनकी छवि निहारती रहती हैं। रासमण्डलके मध्यभागमें परात्पर पुरुष श्रीकृष्णके राजा सुयज्ञने इसी रूपमें दर्शन किये। श्रीराधाने ही वहाँ उन्हें अपने प्राणवल्लभके दर्शन कराये थे। चारों वेद मनोहर मूर्ति धारण करके उनके दर्शन करते थे। राग-रागिनियाँ भी मूर्तिमती होकर वाद्ययन्त्र और मुखसे उन्हें अत्यन्त मनोहर संगीत सुनाती थीं। शिवे! नित्य सनातनी प्रकृतिके साथ तुम भी सदा उनके चरणारविन्दोंकी सेवा करती हो। वे तुलसीदलसे मण्डित होते हैं तथा कस्तूरी, कुङ्कुम, गन्ध, चन्दन, दूर्वा, अक्षत,
प्रकृतिखण्ड २८९
पारिजातपुष्प तथा विरजाके निर्मल जलसे उनके लिये नित्य अर्घ्य दिया जाता है। उस समय उनकी बड़ी शोभा होती है। वे सुप्रसन्न, स्वतन्त्र, समस्त कारणोंके भी कारण, सर्वान्तरात्मा, सर्वेश्वर, सर्वजीवन, सर्वाधार, परमपूज्य, सनातन ब्रह्मज्योति, सर्वसम्पत्तिस्वरूप, सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता, सर्वमङ्गलस्वरूप, सर्वमङ्गलकारण, सर्वमङ्गलदाता तथा समस्त मङ्गलोंके भी मङ्गल हैं।
श्रीकृष्णका दर्शन करके सशङ्कित हो राजा सुयज्ञ तुरंत रथसे उतर पड़े और नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए पुलकित शरीरसे भगवान्के चरणोंमें मस्तक रखकर उन्होंने प्रणाम किया। परमात्मा श्रीकृष्णने राजाको अपना दासत्व, शुभाशीर्वाद तथा वह सत्य एवं अविचल श्रीकृष्णभक्ति प्रदान की, जो हमलोगोंके लिये भी परम दुर्लभ है। तदनन्तर श्रीराधा अपने रथसे उतरकर श्रीकृष्णके वक्षमें विराजमान हो गयीं। उनकी अत्यन्त प्यारी गोपियाँ सफेद चँवर लिये उनकी सेवामें लग गयीं। उनके आनेपर श्रीकृष्ण भक्ति और आदरसे सहसा उठकर खड़े हो गये। उन्होंने मन्द मुसकानके साथ श्रीराधाके साथ वार्तालाप और उनका सम्मान किया। प्राचीनकालके वे वेदवेत्ता विद्वान् वेदोंके कथनानुसार पहले राधा नामका उच्चारण करके पीछे कृष्ण या माधव कहते हैं। जो इसके विपरीत उच्चारण करते या उन जगदम्बा श्रीकृष्णप्राणाधिका एवं प्रेममयी शक्ति श्रीराधिकाकी निन्दा करते हैं, वे चन्द्रमा तथा सूर्यकी स्थितिपर्यन्त कालसूत्र नरकमें यातना भोगते हैं। तत्पश्चात् सौ वर्षोंतक स्त्री-पुत्रसे रहित तथा रोगी होते हैं।
दुर्गे! इस प्रकार मैंने परम उत्तम राधिकाख्यानका वर्णन किया है। वह सती भगवती वैष्णवी, सनातनी, नारायणी, विष्णुमाया, मूलप्रकृति एवं ईश्वरी नाम धारण करनेवाली तुम्हीं हो। मायाका आश्रय लेकर मुझसे पूछ रही हो। तुम स्वयं ही सर्वज्ञा, सर्वरूपिणी, स्त्रीजातिकी अधिदेवी तथा पूर्वजन्मकी बातोंको याद रखनेवाली श्रेष्ठ पराशक्ति हो। राधिकाकी कथा तो मैंने सुना दी, अब और क्या सुनना चाहती हो ? (अध्याय ५४)
श्रीराधाके ध्यान, षोडशोपचार-पूजन, परिचारिकापूजन, परिहारस्तवन, पूजन-महिमा तथा स्तुति एवं उसके माहात्म्यका वर्णन
**श्रीपार्वतीने पूछा—**भगवान्! आप पुरुषोंके ईश्वर श्रीकृष्णके मन्त्रके होते हुए उन वैष्णवनरेश सुयज्ञने राधाका मन्त्र क्यों ग्रहण किया ? सुतपाने राजाको श्रीराधाकी पूजाका कौन-सा विधान बताया ? तथा किस ध्यान, किस स्तोत्र, किस कवच और किस मन्त्रका उपदेश दिया ? श्रीराधाकी पूजापद्धति क्या है ? ये सब बातें बताइये।
**श्रीमहेश्वर बोले—**प्रिये! राजाने यह प्रश्न किया था कि 'हे विप्र! हे मुने! मैं किसका भजन करूँ? किसकी आराधनासे शीघ्र गोलोक प्राप्त कर लूँगा?' उनके ऐसा कहनेपर उन ब्राह्मणशिरोमणिने राजेन्द्र सुयज्ञसे कहा—'महाराज! श्रीकृष्णकी सेवासे उनके लोकको तुम बहुत जन्मोंमें प्राप्त करोगे, अतः उनके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी परात्परस्वरूपा श्रीराधाका भजन करो। वे कृपामयी हैं। उनके प्रसादसे साधक शीघ्र ही उनके धामको प्राप्त कर लेता है'—ऐसा कहकर मुनिने उन्हें राधाके इस षडक्षर-मन्त्रका उपदेश दिया। वह मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ राधायै स्वाहा।' इसके बाद प्राणायाम, भूतशुद्धि, मन्त्रन्यास, करन्यास, अङ्गन्यास, उनके सर्व-दुर्लभ ध्यान, स्तोत्र और कवचकी भक्तिभावसे राजाको शिक्षा दी। राजाने उसी क्रमसे उस मन्त्रका जप किया। साथ ही श्रीकृष्णने पूर्वकालमें जिस ध्यानके द्वारा श्रीराधाका चिन्तन एवं पूजन किया था, उसी सामवेदोक्त ध्यानके अनुसार उनके स्वरूपका चिन्तन किया। वह ध्यान मङ्गलोंके लिये भी मङ्गलकारी है।
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ध्यान—
श्रीराधाकी अङ्गकान्ति श्वेत चम्पाके समान गौर है। वे अपने अङ्गोंमें करोड़ों चन्द्रमाओंके समान मनोहर कान्ति धारण करती हैं। उनका मुख शरद-ऋतुकी पूर्णिमाके चन्द्रमाको लज्जित करता है। दोनों नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको छीने लेते हैं। उनके श्रोणिदेश एवं नितम्बभाग बहुत ही सुन्दर हैं। अधर पके हुए बिम्बफलकी लाली धारण करते हैं। वे श्रेष्ठ सुन्दरी हैं। मुक्ताकी पंक्तियोंको तिरस्कृत करनेवाली दन्तपङ्क्ति उनके मुखकी मनोहरताको बढ़ाती है। उनके वदनपर मन्द मुस्कानजनित प्रसन्नता खेलती रहती है। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्याकुल रहती हैं। अग्निशुद्ध चिन्मय वस्त्र उनके श्रीअङ्गोंको आच्छादित करते हैं। वे रत्नोंके हारसे विभूषित हैं। रत्नमय केयूर और कंगन धारण करती हैं। रत्नोंके ही बने हुए मंजीर उनके पैरोंकी शोभा बढ़ाते हैं। रत्ननिर्मित विचित्र कुण्डल उनके दोनों कानोंकी श्रीवृद्धि करते हैं। सूर्यप्रभाकी प्रतिमारूप कपोल-युगलसे वे सुशोभित होती हैं। अमूल्य रत्नोंके बने हुए कण्ठहार उनके ग्रीवा-प्रदेशको विभूषित करते हैं। उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित किरीट-मुकुट उनकी उज्ज्वलताको जाग्रत् किये रहते हैं। रत्नोंकी मुद्रिका और पाशक (चेन या पासा आदि) उनकी शोभा बढ़ाते हैं। वे मालतीके पुष्पों और हारोंसे अलंकृत केशपाश धारण करती हैं। वे रूपकी अधिष्ठात्री देवी हैं और गजराजकी भाँति मन्द गतिसे चलती हैं। जो उन्हें अत्यन्त प्यारी हैं, ऐसी गोप-किशोरियाँ श्वेत चँवर लेकर उनकी सेवा करती हैं। कस्तूरीकी बेंदी, चन्दनके बिन्दु और सिन्दूरकी टीकीसे उनके मनोहर सीमन्तका निम्नभाग अत्यन्त उद्दीप्त दिखायी देता है। रासमें रासेश्वरके सहित विराजित रासेश्वरी राधाका मैं भजन करता हूँ।*
* श्वेतचम्पकवर्णाभां कोटिचन्द्रसमप्रभाम्।
शरत्पार्वणचन्द्रास्यां शरत्पङ्कजलोचनाम्। सुश्रोणीं सुनितम्बां च पक्वबिम्बाधरां वराम्॥
मुक्तापङ्क्तिविनिन्दैकदन्तपङ्क्तिमनोहराम् ।
ईषद्व्हासप्रसन्नास्यां भक्तानुग्रहकातराम्। वह्निशुद्धांशुकाधानां रत्नमालाविभूषिताम्॥
रत्नकेयूरवलयां रत्नमञ्जीररञ्जिताम्।
रत्नकुण्डलयुग्मेन विचित्रेण विराजिताम्। सूर्यप्रभाप्रतिकृतिगण्डस्थलविराजिताम् ॥
अमूल्यरत्ननिर्माणग्रैवेयकविभूषित ।
सद्रत्नसारनिर्माणकिरीटमुकुटोज्ज्वलाम् । रत्नाङ्गुलीयसंयुक्तां रत्नपाशकशोभिताम्॥
बिभ्रतीं कबरीभारं मालतीमाल्यभूषिताम् ।
रूपाधिष्ठातृदेवीं च गजेन्द्रमन्दगामिनीम्। गोपीभिः सुप्रियाभिश्च सेवितां श्वेतचामरैः॥
कस्तूरीविन्दुभिः सार्द्धमधश्चन्दनबिन्दुना । सिन्दूरबिन्दुना चारुसीमन्ताधःस्थ्लोज्ज्वलाम् ॥
रासे रासेश्वरयुतां राधां रासेश्वरीं भजे॥
(प्रकृतिखण्ड ५५। १०—१५, १९)
| प्रकृतिखण्ड | २९१ |
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इस प्रकार ध्यान कर मस्तकपर पुष्प अर्पित करके पुनः जगदम्बा श्रीराधाका चिन्तन करे और फूल चढ़ावे। पुनः ध्यानके पश्चात् सोलह उपचार अर्पित करे। आसन, वसन, पाद्य, अर्घ्य, गन्ध, अनुलेपन, धूप, दीप, सुन्दर पुष्प, स्नानीय, रत्नभूषण, विविध नैवेद्य, सुवासित ताम्बूल, जल, मधुपर्क तथा रत्नमयी शय्या—ये सोलह उपचार हैं। राजाने इनमेंसे प्रत्येकको वेदमन्त्रके उच्चारणपूर्वक भक्तिभावसे अर्पित किया। शिवे ! इन उपचारोंके समर्पणके लिये जो सर्वसम्मत मन्त्र हैं, उन्हें सुनो।
( १ ) आसन
रत्नसारविकारं च निर्मितं विश्वकर्मणा।
वरं सिंहासनं रम्यं राधे पूजासु गृह्यताम् ॥
राधे ! पूजाके अवसरपर विश्वकर्माद्वारा रचित रमणीय श्रेष्ठ सिंहासन, जो रत्नसारका बना हुआ है, ग्रहण करो।*
( २ ) वसन
अमूल्यरत्नखचितममूल्यं सूक्ष्ममेव च।
वह्निशुद्धं निर्मलं च वसनं देवि गृह्यताम् ॥
देवि ! बहुमूल्य रत्नोंसे जटिल सूक्ष्म वस्त्र, जिसका मूल्य आँका नहीं जा सकता, आपकी सेवामें प्रस्तुत है। यह अग्निसे शुद्ध किया गया, चिन्मय एवं स्वभावतः निर्मल है। इसे स्वीकार करो।
( ३ ) पाद्य
सद्रत्नसारपात्रस्थं सर्वतीर्थोदकं शुभम्।
पादप्रक्षालनार्थं च राधे पाद्यं च गृह्यताम् ॥
राधे ! उत्तम रत्नसारद्वारा निर्मित पात्रमें सम्पूर्ण तीर्थोंका शुभ जल तुम्हारी सेवामें अर्पित किया गया है। तुम्हारे दोनों चरणोंको पखारनेके लिये यह पाद्य जल है। इसे ग्रहण करो।
( ४ ) अर्घ्य
दक्षिणावर्त्तशङ्खस्थं सद्दुर्वापुष्पचन्दनम्।
पूतं युक्तं तीर्थतोयै राधेऽर्घ्यं प्रतिगृह्यताम्॥
राधे! दक्षिणावर्त शङ्खमें रखा हुआ दूर्वा, पुष्प, चन्दन तथा तीर्थजलसे युक्त यह पवित्र अर्घ्य प्रस्तुत है। इसे स्वीकार करो।
( ५ ) गन्ध
पार्थिवद्रव्यसम्भूतमतीवसुरभीकृतम् ।
मङ्गलार्हं पवित्रं च राधे गन्धं गृहाण मे॥
राधे ! पार्थिव द्रव्योंसे सम्भूत अत्यन्त सुगन्धित मङ्गलोपयोगी तथा पवित्र गन्ध मुझसे ग्रहण करो।
( ६ ) अनुलेपन ( चन्दन )
श्रीखण्डचूर्णं सुस्निग्धं कस्तूरीकुङ्कुमान्वितम्।
सुगन्धयुक्तं देवेशि गृह्यतामनुलेपनम् ॥
देवेश्वरि ! कस्तूरी, कुङ्कुम और सुगन्धसे युक्त यह सुस्निग्ध चन्दनचूर्ण अनुलेपनके रूपमें तुम्हारे सामने प्रस्तुत है। इसे स्वीकार करो।
( ७ ) धूप
वृक्षनिर्याशसंयुक्तं पार्थिवद्रव्यसंयुतम् ।
अग्निखण्डशिखाजातं धूपं देवि गृहाण मे॥
देवि ! वृक्षकी गोंद (गुग्गुल) तथा पार्थिव द्रव्योंसे संयुक्त यह धूप प्रज्वलित अग्निशिखासे निर्गत धूमके रूपमें प्रस्तुत है। मेरी इस वस्तुको ग्रहण करो।
( ८ ) दीप
अन्धकारे भयहरममूल्यमणिशोभितम्।
रत्नप्रदीपं शोभाढ्यं गृहाण परमेश्वरि॥
परमेश्वरि ! अमूल्य रत्नोंका बना हुआ यह परम उज्ज्वल शोभाशाली रत्नप्रदीप अन्धकार-
* आसन आदिके स्थानपर साधारण लोग पुष्प आदिका आसन तथा अन्य उपचार, जो सर्वसुलभ हैं, दे सकते हैं; परंतु मानसिक भावनाद्वारा उसे रत्नसिंहासन आदि मानकर ही अर्पित करें। इस भावनाके अनुसार ये पूजासम्बन्धी मन्त्र हैं। मानसिक भावनाद्वारा उत्तम-से-उत्तम वस्तु इष्टदेवको अर्पित की जा सकती है।
२९२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
भयको दूर करनेवाला है। इसे स्वीकार करो।
(९) पुष्प
पारिजातप्रसूनं च गन्धचन्दनचर्चितम्।
अतीव शोभनं रम्यं गृह्यतां परमेश्वरि॥
परमेश्वरि! गन्ध और चन्दनसे चर्चित, अत्यन्त शोभायमान यह रमणीय पारिजात-पुष्प ग्रहण करो।
(१०) स्नानीय
सुगन्धामलकीचूर्णं सुस्निग्धं सुमनोहरम्।
विष्णुतैलसमायुक्तं स्नानीयं देवि गृह्यताम्॥
देवि! विष्णुतैलसे युक्त यह अत्यन्त मनोहर एवं सुस्निग्ध सुगन्धित आँवलेका चूर्ण सेवामें प्रस्तुत है। इस स्नानोपयोगी वस्तुको तुम स्वीकार करो।
(११) भूषण
अमूल्यरत्ननिर्माणं केयूरवलयादिकम्।
शङ्खं सुशोभनं राधे गृह्यतां भूषणं मम॥
राधे! अमूल्य रत्नोंके बने हुए केयूर, कङ्कण आदि आभूषणोंको तथा परम शोभाशाली शङ्खकी चूड़ियोंको मेरी ओरसे ग्रहण करो।
(१२) नैवेद्य
कालदेशोद्भवं पक्वफलं च लड्डुकादिकम्।
परमान्नं च मिष्टान्नं नैवेद्यं देवि गृह्यताम्॥
देवि! देश-कालके अनुसार उपलब्ध हुए पके फल तथा लड्डू आदि उत्तम मिष्टान्न नैवेद्यके रूपमें प्रस्तुत किया गया है। इसे स्वीकार करो।
(१३) ताम्बूल और (१४) जल
ताम्बूलं च वरं रम्यं कर्पूरादिसुवासितम्।
सर्वभोगाधिकं स्वादु सलिलं देवि गृह्यताम्॥
देवि! कर्पूर आदिसे सुवासित, सब भोगोंसे उत्कृष्ट, रमणीय एवं सुन्दर ताम्बूल तथा स्वादिष्ट जल ग्रहण करो।
(१५) मधुपर्क
अशनं रत्नपात्रस्थं सुस्वादु सुमनोहरम्।
मया निवेदितं भक्त्या गृह्यतां परमेश्वरि॥
परमेश्वरि! रत्नमय पात्रमें रखा हुआ यह अशन (मधुपर्क) अत्यन्त स्वादिष्ट तथा परम मनोहर है। मैंने भक्तिभावसे इसे सेवामें समर्पित किया है। कृपया स्वीकार करो।
(१६) शय्या
रत्नेन्द्रसारनिर्माणं वह्निशुद्धांशुकान्वितम्।
पुष्पचन्दनचर्चाढ्यं पर्यङ्कं देवि गृह्यताम्॥
देवि! श्रेष्ठ रत्नोंके सारभागसे निर्मित, अग्निशुद्ध निर्मल वस्त्रसे आच्छादित तथा पुष्प और चन्दनसे चर्चित यह शय्या प्रस्तुत है। इसे ग्रहण करो।
इस प्रकार देवी श्रीराधाका सम्यक् पूजन करके उनके लिये तीन बार पुष्पाञ्जलि दे तथा देवीकी आठ नायिकाओंका, जो उनकी परम प्रिया परिचारिकाएँ हैं, यत्नपूर्वक भक्तिभावसे पञ्चोपचार पूजन करे। प्रिये! उनके पूजनका क्रम पूर्व आदिसे आरम्भ करके दक्षिणावर्त बताया गया है। पूर्वदिशामें मालावती, अग्निकोणमें माधवी, दक्षिणमें रत्नमाला, नैर्ऋत्यकोणमें सुशीला, पश्चिममें शशिकला, वायव्यकोणमें पारिजाता, उत्तरमें पद्मावती तथा ईशानकोणमें सुन्दरीकी पूजा करे।
व्रती पुरुष व्रतकालमें यूथिका (जूही), मालती और कमलोंकी माला चढ़ावे। तत्पश्चात् सामवेदोक्त रीतिसे परिहार नामक स्तुति करे—
परिहारके मन्त्र इस प्रकार हैं—
त्वं देवी जगतां माता विष्णुमाया सनातनी।
कृष्णप्राणाधिदेवी च कृष्णप्राणाधिका शुभा॥
कृष्णप्रेममयी शक्तिः कृष्णसौभाग्यरूपिणी।
कृष्णभक्तिप्रदे राधे नमस्ते मङ्गलप्रदे॥
अद्य मे सफलं जन्म जीवनं सार्थकं मम।
पूजितासि मया सा च या श्रीकृष्णेन पूजिता॥
प्रकृतिखण्ड २९३ कृष्णवक्षसि या राधा सर्वसौभाग्यसंयुता। रासे रासेश्वरीरूपा वृन्दा वृन्दावने वने॥ कृष्णप्रिया च गोलोके तुलसी कानने तु या। चम्पावती कृष्णसङ्गे क्रीडा चम्पककानने॥ चन्द्रावली चन्द्रवने शतशृङ्गे सतीति च। विरजादर्पहन्त्री च विरजातटकानने॥ पद्मावती पद्मवने कृष्णा कृष्णसरोवरे। भद्रा कुञ्जकुटीरे च काम्या वै काम्यके वने॥ वैकुण्ठे च महालक्ष्मीर्वाणी नारायणोरसि। क्षीरोदे सिन्धुकन्या च मर्त्ये लक्ष्मीर्हरिप्रिया॥ सर्वस्वर्गे स्वर्गलक्ष्मीर्देवदुःखविनाशिनी। सनातनी विष्णुमाया दुर्गा शङ्करवक्षसि॥ सावित्री वेदमाता च कलया ब्रह्मवक्षसि। कलया धर्मपत्नी त्वं नरनारायणप्रसूः॥ कलया तुलसी त्वं च गङ्गा भुवनपावनी। लोमकूपोद्भवा गोप्यः कलांशा रोहिणी रतिः॥ कलाकलांशरूपा च शतरूपा शची दितिः। अदितिर्देवमाता च त्वत्कलांशा हरिप्रिया॥ देव्यश्च मुनिपत्न्यश्च त्वत्कलाकलया शुभे। कृष्णभक्तिं कृष्णदास्यं देहि मे कृष्णपूजिते॥ एवं कृत्वा परीहारं स्तुत्वा च कवचं पठेत्। पुराकृतं स्तोत्रमेतद्भक्तिदास्यप्रदं शुभम्॥ ( प्रकृतिखण्ड ५५। ४४-५७ ) तुलसी, कृष्णसंगमें चम्पावती, चम्पक-काननमें क्रीडा, चन्द्रवनमें चन्द्रावली, शतशृङ्ग पर्वतपर सती, विरजातटवर्ती काननमें विरजादर्पहन्त्री, पद्मवनमें पद्मावती, कृष्णसरोवरमें कृष्णा, कुञ्जकुटीरमें भद्रा, काम्यकवनमें काम्या, वैकुण्ठमें महालक्ष्मी, नारायणके हृदयमें वाणी, क्षीरसागरमें सिन्धुकन्या, मर्त्यलोकमें हरिप्रिया लक्ष्मी, सम्पूर्ण स्वर्गमें देवदुःखविनाशिनी स्वर्गलक्ष्मी तथा शंकरके वक्षःस्थलपर सनातनी विष्णुमाया दुर्गा हैं। वही अपनी कलाद्वारा वेदमाता सावित्री होकर ब्रह्मवक्षमें विलास करती हैं। देवि राधे ! तुम्हीं अपनी कलासे धर्मकी पत्नी एवं मुनि नर-नारायणकी जननी हो। तुम्हीं अपनी कलाद्वारा तुलसी तथा भुवनपावनी गङ्गा हो। गोपियाँ तुम्हारे रोमकूपोंसे प्रकट हुई हैं। रोहिणी तथा रति तुम्हारी कलाकी अंशस्वरूपा हैं। शतरूपा, शची और दिति तुम्हारी कलाकी कलांशरूपिणी हैं। देवमाता हरिप्रिया अदिति तुम्हारी कलांशरूपा हैं। शुभे ! देवाङ्गनाएँ और मुनिपत्नियां तुम्हारी कलाकी कलासे प्रकट हुई हैं। कृष्णपूजिते ! तुम मुझे श्रीकृष्णकी भक्ति और श्रीकृष्णका दास्य प्रदान करो। इस प्रकार परिहार एवं स्तुति करके कवचका पाठ करे। यह प्राचीन शुभ स्तोत्र श्रीहरिकी भक्ति एवं दास्य प्रदान करनेवाला है। श्रीराधे ! तुम देवी हो। जगज्जननी सनातनी विष्णुमाया हो। श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी तथा उन्हें प्राणोंसे भी अधिक प्यारी हो। शुभस्वरूपा हो। कृष्णप्रेममयी शक्ति तथा श्रीकृष्णसौभाग्यरूपिणी हो। श्रीकृष्णकी भक्ति प्रदान करनेवाली मङ्गलदायिनी राधे ! तुम्हें नमस्कार है। आज मेरा जन्म सफल है। आज मेरा जीवन सार्थक हुआ; क्योंकि श्रीकृष्णने जिसकी पूजा की है, वही देवी आज मेरे द्वारा पूजित हुई। श्रीकृष्णके वक्षःस्थलमें जो सर्वसौभाग्यशालिनी राधा हैं, वे ही रासमण्डलमें रासेश्वरी, वृन्दावनमें वृन्दा, गोलोकमें कृष्णप्रिया, तुलसी-काननमें इस प्रकार जो प्रतिदिन श्रीराधाकी पूजा करता है, वह भारतवर्षमें साक्षात् विष्णुके समान है। जीवन्मुक्त एवं पवित्र है। उसे निश्चय ही गोलोकधामकी प्राप्ति होती है। शिवे ! जो प्रतिवर्ष कार्तिककी पूर्णिमाको इसी क्रमसे राधाकी पूजा करता है, वह राजसूय-यज्ञके फलका भागी होता है। इहलोकमें उत्तम ऐश्वर्यसे सम्पन्न एवं पुण्यवान् होता है और अन्तमें सब पापोंसे मुक्त हो श्रीकृष्णधाममें जाता है। पार्वति ! आदिकालमें पहले श्रीकृष्णने इसी क्रमसे वृन्दावनके रासमण्डलमें श्रीराधाकी स्तुति एवं पूजा की थी। दूसरी बार
२९४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण तुम्हारे वरसे वेदमाता सावित्रीको पाकर सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीने इसी क्रमसे राधाका पूजन किया था। नारायणने भी श्रीराधाकी आराधना करके महालक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा तथा भुवनपावनी पराशक्ति तुलसीको प्राप्त किया था। क्षीरसागरशायी श्रीविष्णुने राधाकी आराधना करके ही सिन्धुसुताको प्राप्त किया था। पहले दक्षकन्याकी मृत्यु हो जानेपर मैंने भी श्रीकृष्णकी आज्ञासे पुष्करमें श्रीराधाकी पूजा की और उसके प्रभावसे तुम्हें प्राप्त किया। पतिव्रता श्रीराधाकी पूजा करके उनके दिये हुए वरसे कामदेवने रतिको, धर्मदेवने सती साध्वी मूर्तिको तथा देवताओं और मुनियोंने धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षको प्राप्त किया था। इस प्रकार मैंने श्रीराधाकी पूजाका विधान बताया है। अब स्तोत्र सुनो। एक बार श्रीराधाजी मान करके श्रीकृष्णके समीपसे अन्तर्धान हो गयीं। तब ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सब देवता ऐश्वर्यभ्रष्ट, श्रीहीन, भार्यारहित तथा उपद्रवग्रस्त हो गये। इस परिस्थितिपर विचार करके उन सबने भगवान् श्रीकृष्णकी शरण ली। उनके स्तोत्रसे संतुष्ट हुए सबके परमात्मा श्रीकृष्णने स्नान करके शुद्ध हो सती राधिकाकी पूजा करके उनका इस प्रकार स्तवन किया। श्रीकृष्ण बोले- सुमुखि श्रीराधे! क्या मैं इसी प्रकार तुम्हारा प्रिय हूँ और मुझमें तुम्हारी प्रीति है? तुम्हारी वाणीमें जो छलना थी, वह आज अच्छी तरह प्रकट हो गयी। 'हे कृष्ण ! तुम मेरे प्राण हो, जीवात्मा हो' इस तरहकी बातें जो तुम नित्य-निरन्तर प्रेमपूर्वक कहा करती थीं, वे अब तत्काल कहाँ चली गयीं? मैं पहले तुम्हारे सामने जो कुछ कहता था, मेरा वचन आज भी ध्रुव सत्य है। 'तुम मेरे पाँचों प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी हो', 'राधा मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय है' - मेरी ये बातें जैसे पहले सत्य थीं, उसी तरह आज भी हैं। मैं तुम्हें अपने पास रखनेमें समर्थ न हो सका, अतः तुम्हारे बिना मेरे प्राण चले जा रहे हैं। अधिष्ठात्री देवीके बिना कौन कहाँ जीवित रह सकता है ? तुम महाविष्णुकी माता, मूलप्रकृति ईश्वरी हो। अपनी कलासे तुम सगुणरूपमें प्रकट होती हो। स्वयं तो निर्गुणा (प्राकृत गुणोंसे रहित) ही हो। ज्योतिःपुञ्ज ही तुम्हारा स्वरूप है। तुम वास्तवमें निराकार हो। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही तुम रूप धारण करती हो। भक्तोंकी विभिन्न रुचिके कारण नाना प्रकारकी मूर्तियाँ ग्रहण करती हो। वैकुण्ठमें महालक्ष्मी और सरस्वतीके रूपमें तुम्हारा ही निवास है। पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें सत्पुरुषोंकी जननी भी तुम्हीं हो। सती और पार्वतीके रूपमें तुम्हारा ही प्राकट्य हुआ है। तुम्हीं पुण्यरूप तुलसी और भुवनपावनी गङ्गा हो। ब्रह्मलोकमें सावित्रीके रूपमें तुम्हीं रहती हो। तुम्हीं अपनी कलासे वसुन्धरा हुई हो, गोलोकमें तुम्हीं समस्त गोपालोंकी अधीश्वरी राधा हो। तुम्हारे बिना मैं निर्जीव हूँ। किसी भी कर्मको करनेमें असमर्थ हूँ। तुम्हें शक्तिके रूपमें पाकर ही शिव शक्तिमान् हैं। तुम्हारे बिना वे शिव नहीं, शव हैं। तुम्हें ही वेदमाता सावित्रीके रूपमें अपने साथ पाकर साक्षात् ब्रह्माजी वेदोंके प्राकट्यकर्ता माने गये हैं। तुम लक्ष्मीका सहयोग मिलनेसे ही जगत्पालक नारायण जगत्का पालन करते हैं। तुम्हीं दक्षिणारूपसे साथ रहती हो, इसलिये यज्ञ फल देता है। पृथ्वीके रूपमें तुम्हें मस्तकपर धारण करके ही शेषनाग सृष्टिका संरक्षण करते हैं। गङ्गाधर शिव तुम्हें ही गङ्गारूपमें अपने मस्तकपर धारण करते हैं। तुमसे ही सारा जगत् शक्तिमान् है। तुम्हारे बिना सब कुछ शव (मृतक)-के तुल्य है। तुम वाणी हो। तुम्हें पाकर ही सब लोग वक्ता बनते हैं। तुम्हारे बिना पौराणिक सूत भी मूक हो जाता है। जैसे कुम्हार सदा मिट्टीके सहयोगसे ही घड़ा बनानेमें समर्थ होता है, उसी प्रकार
प्रकृतिखण्ड २९५ तुम प्रकृतिदेवीके साथ ही मैं सृष्टि-रचनामें सफल होता हूँ। तुम्हारे बिना मैं सर्वत्र जड हूँ। कहीं भी शक्तिमान् नहीं हूँ। तुम्हीं सर्वशक्तिस्वरूपा हो। अतः मेरे निकट आओ। अग्निमें तुम्हीं दाहिकाशक्ति हो। तुम्हारे बिना अग्नि दाहकर्ममें समर्थ नहीं हैं। चन्द्रमामें तुम्हीं शोभा बनकर रहती हो। तुम्हारे बिना चन्द्रमा सुन्दर नहीं लगेगा। सूर्यमें तुम्हीं प्रभा हो। तुम्हारे बिना सूर्यदेव प्रभापूर्ण नहीं रह सकते। प्रिये! तुम्हीं रति हो। तुम्हारे बिना कामदेव कामिनियोंके प्राणवल्लभ नहीं हो सकते। इस प्रकार श्रीराधाकी स्तुति करके जगत्प्रभु श्रीकृष्णने उन्हें प्राप्त किया। फिर तो सब देवता सश्रीक, सस्त्रीक और शक्तिसम्पन्न हो गये। गिरिराजनन्दिनि ! तदनन्तर सारा जगत् सस्त्रीक हो गया। श्रीराधाकी कृपासे गोलोक गोपाङ्गनाओंसे परिपूर्ण हो गया। इसी प्रकार हरिप्रिया श्रीराधाकी स्तुति करके राजा सुयज्ञ गोलोकधाममें चले गये। जो मनुष्य श्रीकृष्णद्वारा किये गये इस राधास्तोत्रका पाठ करता है, वह श्रीकृष्णकी भक्ति और दास्यभाव प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है। स्त्रीसे वियोग होनेपर जो पवित्रभावसे एक मासतक इस स्तोत्रका श्रवण करता है, वह शीघ्र ही सती, सुन्दरी और सुशीला स्त्रीको प्राप्त कर लेता है। जो भार्या और सौभाग्यसे हीन है, वह यदि एक वर्षतक इस स्तोत्रका श्रवण करे तो उसे भी शीघ्र ही सुन्दरी, सुशीला एवं सती भार्याकी प्राप्ति हो जाती है। पार्वति ! पूर्वकालमें जब दक्ष-कन्या सतीकी मृत्यु हो गयी थी, तब परमात्मा श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर मैंने इसी स्तोत्रसे श्रीराधाकी स्तुति की और तुम्हें पा लिया। पूर्वकालमें ब्रह्माजीको भी इसी स्तोत्रके प्रभावसे सावित्रीकी प्राप्ति हुई थी। पूर्वकालमें दुर्वासाके शापसे जब देवतालोग श्रीहीन हो गये, तब इसी स्तोत्रसे श्रीराधाकी स्तुति करके उन्होंने परम दुर्लभ लक्ष्मी प्राप्त की थी। पुत्रकी इच्छावाला पुरुष यदि एक वर्षतक इस स्तोत्रका श्रवण करे तो उसे पुत्र प्राप्त हो जाता है। इस स्तोत्रके प्रसादसे मनुष्य बहुत बड़ी व्याधि एवं रोगोंसे मुक्त हो जाता है। जो कार्तिककी पूर्णिमाको श्रीराधाका पूजन करके इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह अविचल लक्ष्मीको पाता है तथा राजसूय- यज्ञके फलका भागी होता है। यदि नारी इस स्तोत्रका श्रवण करे तो वह पतिके सौभाग्यसे सम्पन्न होती है। जो भक्तिपूर्वक इस स्तोत्रको सुनता है, वह निश्चय ही बन्धनसे मुक्त हो जाता है। जो प्रतिदिन भक्तिभावसे श्रीराधाकी पूजा करके प्रेमपूर्वक इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह भवबन्धनसे मुक्त हो गोलोकधाममें जाता है। (अध्याय ५५) श्रीजगन्मङ्गल-राधाकवच तथा उसकी महिमा श्रीपार्वती बोलीं- श्रीराधाकी पूजाका विधान और स्तोत्र अत्यन्त अद्भुत है, उसे मैंने सुन लिया। अब राधाकवचका वर्णन कीजिये। आपकी कृपासे उसे भी सुनूँगी। श्रीमहेश्वरने कहा- दुर्गे ! सुनो। मैं परम अद्भुत राधाकवचका वर्णन आरम्भ करता हूँ। पूर्वकालमें साक्षात् परमात्मा श्रीकृष्णने गोलोकमें इस अति गोपनीय परम तत्त्वरूप तथा सर्वमन्त्रसमूहमय कवचका मुझसे वर्णन किया था। यह वही कवच है, जिसे धारण करके पाठ करनेसे ब्रह्माने वेदमाता सावित्रीको पत्नीरूपमें प्राप्त किया। सुरेश्वरि ! तुम सर्वलोकजननी हो। मुझे तुम्हारा स्वामी होनेका जो सौभाग्य प्राप्त हुआ है, वह इस कवचको धारण करनेका ही प्रभाव
२९६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण है। इसीको धारण करके भगवान् नारायणने महालक्ष्मीको प्राप्त किया। इसीको धारण करनेसे प्रकृतिसे परवर्ती निर्गुण परमात्मा श्रीकृष्ण पूर्वकालमें सृष्टिरचना करनेकी शक्तिसे सम्पन्न हुए। जगत्पालक विष्णुने इसीको धारण करके सिन्धुकन्याको प्राप्त किया। इसी कवचके प्रभावसे शेषनाग समस्त ब्रह्माण्डको अपने मस्तकपर सरसोंके दानेकी भाँति धारण करते हैं। इसीका आश्रय ले महाविराट् प्रत्येक रोमकूपमें असंख्य ब्रह्माण्डोंको धारण करते हैं और सबके आधार बने हैं। इस कवचका धारण और पाठ करनेसे धर्म सबके साक्षी और कुबेर धनाध्यक्ष हुए हैं। इसके पाठ और धारणका ही यह प्रभाव है कि इन्द्र देवताओंके स्वामी तथा मनु नरेशोंके भी सम्राट् हुए हैं। इसके पाठ और धारणसे ही श्रीमान् चन्द्रदेव राजसूय-यज्ञ करनेमें सफल हुए और सूर्यदेव तीनों लोकोंके ईश्वर-पदपर प्रतिष्ठित हो सके। इसका मनके द्वारा धारण और वाणीद्वारा पाठ करनेसे अग्निदेव जगत्को पवित्र करते हैं तथा पवनदेव मन्दगतिसे प्रवाहित हो तीनों भुवनोंको पावन बनाते हैं। इस कवचको ही धारण करनेका यह प्रभाव है कि मृत्युदेव समस्त प्राणियोंमें स्वच्छन्दगतिसे विचरते हैं। इसके पाठ और धारणसे ही सशक्त हो जमदग्निनन्दन परशुरामने पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रियोंसे सूनी कर दिया और कुम्भज ऋषिने समुद्रको पी लिया। इसे धारण करके ही भगवान् सनत्कुमार ज्ञानियोंके गुरु हुए हैं और नर-नारायण ऋषि जीवन्मुक्त एवं सिद्ध हो गये हैं। इसीके धारण और पठनसे ब्रह्मपुत्र वसिष्ठ सिद्ध हो गये हैं। कपिल सिद्धोंके स्वामी हुए हैं। इसीके प्रभावसे प्रजापति दक्ष और भृगु मुझसे निर्भय होकर द्वेष करते हैं, कूर्म शेषको भी धारण करते हैं, वायुदेव सबके आधार हुए हैं और वरुण सबको पवित्र करनेवाले हो सके हैं। शिवे ! इसीके प्रभावसे ईशान दिक्पाल और यम शासक हुए हैं। इसीका आश्रय लेनेसे काल एवं कालाग्निरुद्र तीनों लोकोंका संहार करनेमें समर्थ हो सके हैं। इसीको धारण करके गौतम सिद्ध हुए, कश्यप प्रजापतिके पदपर प्रतिष्ठित हो सके और मुनिवर दुर्वासाने अपनी पत्नीका वियोग होनेपर पूर्वकालमें देवीकी कलास्वरूपा वसुदेवकुमारी एकानंशाको प्राप्त किया। पूर्वकालमें श्रीरामचन्द्रजीने रावणद्वारा हरी हुई सीताको इसी कवचके प्रतापसे प्राप्त किया। राजा नलने इसीके पाठसे सती दमयन्तीको पाया। महावीर शङ्खचूड़ इसीके प्रभावसे दैत्योंका स्वामी हुआ। दुर्गे ! इसीका आश्रय लेनेसे वृषभ नन्दिकेश्वर मुझको वहन करते हैं और गरुड़ श्रीहरिके वाहन हो सके हैं। पूर्वकालके सिद्धों और मुनियोंने इसीके प्रभावसे सिद्धि प्राप्त की। इसीको धारण करके महालक्ष्मी सम्पूर्ण सम्पदाओंको देनेमें समर्थ हुईं। सरस्वतीको सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ स्थान प्राप्त हुआ तथा कामपत्नी रति क्रीड़ामें कुशल हो सकी। वेदमाता सावित्रीने इस कवचके प्रभावसे ही सिद्धि प्राप्त की। सिन्धुकन्या इसीके बलसे मर्त्यलक्ष्मी और विष्णुकी पत्नी हुईं। इसीको धारण करके तुलसी पवित्र और गङ्गा भुवनपावनी हुईं। इसका आश्रय लेकर ही वसुन्धरा सबकी आधारभूमि तथा सम्पूर्ण शस्योंसे सम्पन्न हुईं। इसको धारण करनेसे मनसादेवी विश्वपूजित सिद्धा हुईं और देवमाता अदितिने भगवान् विष्णुको पुत्ररूपमें प्राप्त किया। लोपामुद्रा और अरुन्धतीने इस कवचको धारण करके ही पतिव्रताओंमें ऊँचा स्थान प्राप्त किया तथा सती देवहूतिने इसीके प्रभावसे कपिल-जैसा पुत्र पाया। शतरूपाने जो प्रियव्रत और उत्तानपाद- जैसे पुत्र प्राप्त किये तथा तुम्हारी माता मेनाने भी जो तुम-जैसी देवी गिरिजाको पुत्रीके रूपमें पाया, वह इस कवचका ही माहात्म्य है। इस प्रकार समस्त सिद्धगणोंने राधाकवचके प्रभावसे सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्राप्त किये हैं।
प्रकृतिखण्ड
२९७
विनियोग
ॐ अस्य श्रीजगन्मङ्गलकवचस्य प्रजापति-ऋषिर्गायत्री छन्दः स्वयं रासेश्वरी देवता श्रीकृष्ण-भक्तिसम्प्राप्तौ विनियोगः।
इस जगन्मङ्गल राधाकवचके प्रजापति ऋषि हैं, गायत्री छन्द है, स्वयं रासेश्वरी देवता हैं और श्रीकृष्णभक्ति-प्राप्तिके लिये इसका विनियोग बताया गया है।
जो अपना शिष्य और श्रीकृष्णभक्त ब्राह्मण हो, उसीके समक्ष इस कवचको प्रकाशित करे। जो शठ तथा दूसरेका शिष्य हो, उसको इसका उपदेश देनेसे मृत्युकी प्राप्ति होती है। प्रिये! राज्य दे दे, अपना मस्तक कटा दे; परंतु अनधिकारीको यह कवच न दे। मैंने गोलोकमें देखा था कि साक्षात् परमात्मा श्रीकृष्णने भक्तिभावसे अपने कण्ठमें इसको धारण किया था। पूर्वकालमें ब्रह्मा और विष्णुने भी इसे अपने गलेमें स्थान दिया था।
‘ॐ राधायै स्वाहा।’ यह मन्त्र कल्पवृक्षके समान मनोवाञ्छित फल देनेवाला है और श्रीकृष्णने इसकी उपासना की है। यह मेरे मस्तककी रक्षा करे। ‘ॐ ह्रीं श्रीं राधिकायै स्वाहा।’ यह मन्त्र मेरे कपालकी तथा दोनों नेत्रों और कानोंकी सदा रक्षा करे। ‘ॐ रां ह्रीं श्रीं राधिकायै स्वाहा।’ यह मन्त्रराज सदा मेरे मस्तक और केशसमूहोंकी रक्षा करे। ‘ॐ रां राधायै स्वाहा।’ यह सर्वसिद्धिदायक मन्त्र मेरे कपोल, नासिका और मुखकी रक्षा करे। ‘ॐ क्लीं श्रीं कृष्णप्रियायै नमः।’ यह मन्त्र मेरे कण्ठकी रक्षा करे। ‘ॐ रां रासेश्वर्यै नमः।’ यह मन्त्र मेरे कंधेकी रक्षा करे। ‘ॐ रां रासविलासिन्यै स्वाहा।’ यह मन्त्र मेरे पृष्ठभागकी सदा रक्षा करे। ‘ॐ वृन्दावनविलासिन्यै स्वाहा।’ यह मन्त्र वक्षःस्थलकी सदा रक्षा करे। ‘ॐ तुलसीवनवासिन्यै स्वाहा।’ यह मन्त्र नितम्बकी रक्षा करे। ‘ॐ कृष्ण-प्राणाधिकायै स्वाहा।’ यह मन्त्र दोनों चरणों तथा सम्पूर्ण अङ्गोंकी सदा सब ओरसे रक्षा करे। राधा पूर्व-दिशामें मेरी रक्षा करें। कृष्णप्रिया अग्निकोणमें मेरा पालन करें। रासेश्वरी दक्षिणदिशामें मेरी रक्षाका भार सँभालें। गोपीश्वरी नैर्ऋत्यकोणमें मेरा संरक्षण करें। निर्गुणा पश्चिम तथा कृष्णपूजिता वायव्यकोणमें मेरा पालन करें। मूलप्रकृति ईश्वरी उत्तरदिशामें निरन्तर मेरे संरक्षणमें लगी रहें। सर्वपूजिता सर्वेश्वरी सदा ईशानकोणमें मेरी रक्षा करें। महाविष्णु-जननी जल, स्थल, आकाश, स्वप्न और जागरणमें सदा सब ओरसे मेरा संरक्षण करें।
दुर्गे! यह परम उत्तम श्रीजगन्मङ्गलकवच मैंने तुमसे कहा है। यह गूढ़से भी परम गूढ़तर तत्त्व है। इसका उपदेश हर एकको नहीं देना चाहिये। मैंने तुम्हारे स्नेहवश इसका वर्णन किया है। किसी अनधिकारीके सामने इसका प्रवचन नहीं करना चाहिये। जो वस्त्र, आभूषण और चन्दनसे गुरुकी विधिवत् पूजा करके इस कवचको कण्ठ या दाहिनी बाँहमें धारण करता है, वह भगवान् विष्णुके समान तेजस्वी हो जाता है। सौ लाख जप करनेपर यह कवच सिद्ध हो जाता है। यदि किसीको यह कवच सिद्ध हो जाय तो वह आगसे जलता नहीं है। दुर्गे! पूर्वकालमें इस कवचको धारण करनेसे ही राजा दुर्योधनने जल और अग्निका स्तम्भन करनेमें निश्चितरूपसे दक्षता प्राप्त की थी। मैंने पहले पुष्करतीर्थमें सूर्यग्रहणके अवसरपर सनत्कुमारको इस कवचका उपदेश दिया था। सनत्कुमारने मेरुपर्वतपर सान्दीपनिको यह कवच प्रदान किया। सान्दीपनिने बलरामजीको और बलरामजीने दुर्योधनको इसका उपदेश दिया। इस कवचके प्रसादसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो सकता है।*
* ॐ राधेति चतुर्थ्यन्तं वह्निजायान्तमेव च। कृष्णोनोपासितो मन्त्रः कल्पवृक्षः शिरोऽवतु ॥
ॐ ह्रीं श्रीं राधिका ङेउन्तं वह्निजायान्तमेव च। कपालं नेत्रयुग्मं च श्रोत्रयुग्मं सदावतु ॥
ॐ रां ह्रीं श्रीं राधिकेति ङेऽन्तं वह्निजायान्तमेव च। मस्तकं केशसंघांश्च मन्त्रराजः सदावतु ॥
२९८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण जो राधामन्त्रका उपासक होकर प्रतिदिन इस कवचका भक्तिभावसे पाठ करता है, वह विष्णुतुल्य तेजस्वी होता तथा राजसूय-यज्ञका फल पाता है। सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान, सब प्रकारका दान, सम्पूर्ण व्रतोंमें उपवास, पृथ्वीकी परिक्रमा, समस्त यज्ञोंकी दीक्षाका ग्रहण, सदैव सत्यकी रक्षा, नित्यप्रति श्रीकृष्णकी सेवा, श्रीकृष्ण-नैवेद्यका भक्षण तथा चारों वेदोंका पाठ करनेपर मनुष्य जिस फलको पाता है, उसे निश्चय ही वह इस कवचके पाठसे पा लेता है। राजद्वारपर, श्मशानभूमिमें, सिंहों और व्याघ्रोंसे भरे हुए वनमें, दावानलमें, विशेष संकटके अवसरपर, डाकुओं और चोरोंसे भय प्राप्त होनेपर, जेल जानेपर, विपत्तिमें पड़ जानेपर, भयंकर एवं अटूट बन्धनमें बँधनेपर तथा रोगोंसे आक्रान्त होनेपर यदि मनुष्य इस कवचको धारण कर ले तो निश्चय ही वह समस्त दुःखोंसे छूट जाता है। दुर्गे! महेश्वरि ! यह तुम्हारा ही कवच तुमसे कहा है। तुम्हीं सर्वरूपा माया हो और छलसे इस विषयमें मुझसे पूछ रही हो। श्रीनारायण कहते हैं— नारद ! इस प्रकार राधिकाकी कथा कहकर बारंबार माधवका स्मरण करके भगवान् शंकरके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहने लगी। श्रीकृष्णके समान कोई देवता नहीं है, गङ्गा-जैसी दूसरी नदी नहीं है, पुष्करके समान कोई तीर्थ नहीं है तथा ब्राह्मणसे बढ़कर कोई वर्ण नहीं है। नारद ! जैसे परमाणुसे बढ़कर सूक्ष्म, महाविष्णु (महाविराट्)-से बढ़कर महान् तथा आकाशसे अधिक विस्तृत दूसरी कोई वस्तु नहीं है, उसी प्रकार वैष्णवसे बढ़कर ज्ञानी तथा भगवान् शंकरसे बढ़कर कोई योगीन्द्र नहीं है। देवर्षे ! उन्होंने ही काम, क्रोध, लोभ और मोहपर विजय पायी है। भगवान् शिव सोते, जागते हर समय श्रीकृष्णके ध्यानमें तत्पर रहते हैं। जैसे कृष्ण हैं, वैसे शिव हैं। श्रीकृष्ण और शिवमें कोई भेद नहीं है।* वत्स ! जैसे वैष्णवोंमें शम्भु तथा देवताओंमें माधव श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार कवचोंमें यह जगन्मङ्गल राधाकवच सर्वोत्तम है। 'शि' यह मङ्गलवाचक है ॐ रां राधेति चतुर्थ्यन्तं वह्निजायान्तमेव च। सर्वसिद्धिप्रदः पातु कपोलं नासिकां मुखम् ॥ क्लीं श्रीं कृष्णप्रिया ङेऽन्तं कण्ठं पातु नमोऽन्तकम्। ॐ रां रासेश्वरी ङेऽन्तं स्कन्धं पातु नमोऽन्तकम् ॥ ॐ रां रासविलासिन्यै स्वाहा पृष्ठं सदावतु । वृन्दावनविलासिन्यै स्वाहा वक्षः सदावतु ॥ तुलसीवनवासिन्यै स्वाहा पातु नितम्बकम् । कृष्णप्राणाधिका ङेऽन्तं स्वाहान्तं प्रणवादिकम् ॥ पादयुग्मं च सर्वाङ्गं संततं पातु सर्वतः । राधा रक्षतु प्राच्यां च वह्नौ कृष्णप्रियावतु ॥ दक्षे रासेश्वरी पातु गोपीशा नैर्ऋतेऽवतु । पश्चिमे निर्गुणा पातु वायव्ये कृष्णपूजिता ॥ उत्तरे संततं पातु मूलप्रकृतिरीश्वरी । सर्वेश्वरी सदैशान्यं पातु मां सर्वपूजिता ॥ जले स्थले चान्तरिक्षे स्वप्ने जागरणे तथा। महाविष्णोश्च जननी सर्वतः पातु संततम् ॥ कवचं कथितं दुर्गे श्रीजगन्मङ्गलं परम्। यस्मै कस्मै न दातव्यं गूढाद् गूढ़तरं परम् ॥ तव स्नेहान्मयाऽऽख्यातं प्रवक्तव्यं न कस्यचित् । गुरुमभ्यर्च्य विधिवद्वस्त्रालंकारचन्दनैः ॥ कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ धृत्वा विष्णुसमो भवेत् । शतलक्षजपेनैव सिद्धं च कवचं भवेत् ॥ यदि स्यात् सिद्धकवचो न दग्धो वह्निना भवेत् । एतस्मात् कवचाद् दुर्गे राजा दुर्योधनः पुरा ॥ विशारदो जलस्तम्भे वह्निस्तम्भे च निश्चितम्। मया सनत्कुमाराय पुरा दत्तं च पुष्करे ॥ सूर्यपर्वणि मेरौ च स सान्दीपनये ददौ । बलाय तेन दत्तं च ददौ दुर्योधनाय सः ॥ कवचस्य प्रसादेन जीवन्मुक्तो भवेन्नरः ॥ (प्रकृतिखण्ड ५६। ३२-४९)
- यथा कृष्णस्तथा शम्भुर्न भेदो माधवेशयोः ॥ (प्रकृतिखण्ड ५६। ६१)