चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २१ ] सूत्रस्थानम २५६
अ० २१ ] सूत्रस्थानम २५६ त्वगस्थिशेषोऽतिकृशः स्थूलपर्वा नरो मतः ॥१५॥ सततव्याधितावेतावतिस्थूलकृशौ नरौ । सततं चोपचर्यौ हि कर्षणैर्बृंहणैरपि ॥१६॥ स्थौल्यकार्श्ये वरं कार्श्यं समोपकरणौ हि तौ । यद्युभौ व्याधिरागच्छेत्स्थूलमेवातिपीडयेत् ॥१७॥ रूक्ष खान पान के सेवन से, उपवास से थोड़ा खाने से, स्नेहन, स्वेदन वमन, विरेचन आदि क्रियाओं के अतियोग से, शोक से, मल-मूत्र के उपस्थित वेगों को अथवा नींद के उपस्थित वेग को रोकने से, स्नेह मर्दन किये बिना उबटन लगाकर स्नान ( नित्य प्रति ) करने से, स्वभाव से, बुढ़ापे से, रोगों के कारण ( रोग की कमजोरी में ) उत्पन्न कमजोरी में, मिथ्याहार-विहार से, क्रोध से पुरुष बहुत कृश हो जाता है। परिश्रम, अतिशय पेट भर के खाना, भूख, प्यास और बलवान् औषध, बहुत सर्दी, बहुत गरमी और मैथुन इनको कृश पुरुष सहन नहीं कर सकता। प्लीहा कास, क्षय, श्वास, गुल्म, अर्श, उदर-रोग, और ग्रहणी रोग ( आमाशय आंत्र रोग ) प्रायः करके कृश ( निर्बल ) पुरुष को शीघ्र चिपटते हैं। नितम्ब, उदर और ग्रीवा शुष्क हो जाते हैं, शरीर पर धमनियों के जाल दीखने लगते हैं, त्वचा और अस्थियों का ही ढांचा बन जाता है, ग्रन्थियां मोटी-मोटी हो जाती हैं, ऐसे पुरुष को 'अतिकृश' कहते हैं। ये अतिस्थूल और अतिकृश पुरुष सदा रोगी रहते हैं। इसलिए कर्षण से ( स्थूल की ) और बृंहण से ( कृश पुरुष की) सदा परिचर्या करनी चाहिये। स्थूलता और कृशता में कृशता श्रेष्ठ है, क्योंकि यदि दोनों को एक ही समान चिकित्सा से साध्य व्याधि हो जाय तो स्थूल पुरुष ही अधिक पीड़ित होगा ( क्योंकि स्थूल पुरुष का यदि संतर्पण किया जाय तो स्थूलता बढ़ती है, अपतर्पण करे तो वह सहन नहीं कर सकता, क्योंकि जाठराग्नि बढ़ी होती है ) ॥११-१७॥ सम-मांस-प्रमाणस्तु समसंहननो नरः । दृढेन्द्रियत्वादू व्याधीनां न बलेनाभिभूयते ॥ १८ ॥ क्षुत्पिपासातपसहः शीत-व्यायाम-संस्सहः । समपक्ता समजरः सम-मांस-चयो मतः ॥ १६ ॥ जिस पुरुष की मांस पेशियां प्रमाण में उन्नत हैं और शरीर का संघटन ठीक प्रकार से है, इन्द्रियां बलवती हैं, वह पुरुष रोगों के बल से भी हार नहीं मानता। जो पुरुष भूख, प्यास, धूप का सहन कर सके, शीत, व्यायाम को
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भली प्रकार सहन करले, न कम और न अधिक, भोजन को जीर्ण करने वाला हो, जिसको बुढापा ठीक समीप पर आये, वह पुरुष समान उपचय अर्थात् उचित शरीर की बनावट का होता है ॥ १८-१९ ॥ गुरु चातर्पणं चेष्टं स्थूलानां कर्षणं प्रति । कृशानां बृंहणार्थं च लघु संतर्पणं च यत् ॥ २० ॥ वातघ्नान्यन्नपानानि श्लेष्म-मेदो-हराणि च । रूक्षोष्णा बस्तयस्तीक्ष्णा रूक्षाण्युद्वर्तनानि च ॥ २१ ॥ गुडूची-भद्र-मुस्तानां प्रयोगस्त्रैफलस्तथा । तक्रारिष्टप्रयोगस्तु प्रयोगो माक्षिकस्य च ॥ २२ ॥ विडङ्गानागरं क्षारः काल-लोह-रजो मधु । यवामलकचूर्णं च प्रयोगः श्रेष्ठ उच्यते ॥ २३ ॥ बिल्वादिपञ्चमूलस्य प्रयोगः क्षौद्रसंयुतः । शिलाजतुप्रयोगस्तु साग्निमन्थरसः परः ॥ २४ ॥ प्रशातिका प्रियङ्गुश्च श्यामाका यवका यवाः । जूर्णाह्वाः कोद्रवा मुद्गाः कुलत्थाश्चक्रमूद्रकाः ॥ २५ ॥ आढकीनां च बीजानि पटोलामलकैः सह । भोजनार्थं प्रयोज्यानि पानं चानु मधूदकम् ॥ २६ ॥ अरिष्टांश्चानुपानार्थे मेदो-मांस-कफापहान् । अतिस्थौल्यविनाशाय संविभज्य प्रयोजयेत् ॥ २७ ॥ प्रजागरं व्यवायं च व्यायामं चिन्तनानि च । स्थौल्यमिच्छन् परित्यक्तुं क्रमेणाभिप्रवर्धयेत् ॥ २८ ॥ स्थूल पुरुषों को कृश बनाने के लिये गुरु (भारी) और अपतर्पण क्रिया (यथा शहद भारी होने से अग्नि को कम करता है और अपतर्पण होने से मेद को कम करता है) उचित है। कृश पुरुषों को मोटा करने के लिये लघु एवं सन्तर्पण क्रिया करनी चाहिये । अतिस्थूल की चिकित्सा — वातनाशक खान पान, कफ और मेदनाशक आहार, रूखी एवं गरम बस्तियां, तीक्ष्ण, रूक्ष उबटन का मलना, गिलोय, नागर मोथा, इनका, या त्रिफला का क्वाथ देना, तक्रारिष्ट का प्रयोग अथवा मधु का उपयोग, बायबिडंग, सोंठ, क्षार, कान्त लोह-भस्म को शहद के साथ, जौ और आंवले का चूर्ण, इनका प्रयोग उत्तम है। बिल्व, अरणी, सोना पाठ, काश्मरी, पाटना इनके क्वाथ में मधु प्रक्षेप करके पीना, अग्निमन्थ (अरणी) के रस के साथ शिलाजीत
अ० २१] सूत्रस्थानम् २५१
अ० २१] सूत्रस्थानम् २५१ का उपयोग, प्रशान्तिक (नीवार धान्य), प्रियंगु, श्यामाक (सांवाक), क्षुद्रजव, जौ, कँगनी, कोदों धान्य, मूंग, कुलथी, जंगली मूंग, अरहर की दाल, परवल, आंवला इनके साथ खाने के लिये देवे; और पीने के लिये पानी में शहद मिला के देना चाहिये। अनुपान के लिये मेद, मांस और कफ को नष्ट करने वाले अरिष्टों को अतिस्थूलता नाश करने के लिये प्रयोग करना चाहिये। स्थूलता का नाश करने की इच्छा वाले पुरुष को, रात में जागना, मैथुन, परिश्रम करना, चिन्ता करना इनको क्रम से शनैः शनैः बढ़ाना चाहिये ॥ २०-२८ ॥ स्वप्नो हर्षः सुखा शय्या मनसो निर्वृतिः शमः । चिन्ता-व्यवाय-व्यायाम-विरामः प्रियदर्शनम् ॥ २९ ॥ नवान्नानि नवं मद्यं ग्राम्यानूपौदका रसाः । संस्कृतानि च मांसानि दधि सर्पिः पयांसि च ॥ ३० ॥ इक्षवः शालयो मांसा गोधूमा गुडवैकृतम् । बस्तयः स्निग्धमधुरास्तैलाभ्यङ्गश्च सर्वदा ॥ ३१ ॥ स्निग्धमुद्वर्तनं स्नानं गन्धमाल्यनिषेवणम् । शुक्लवासो यथाकालं दोषाणामवसेचनम् ॥ ३२ ॥ रसायनानां वृष्याणां योगानामुपसेवनम् । हत्वाऽतिकार्श्यमादत्ते नृणामुपचयं परम् ॥ ३३ ॥ अचिन्तनाच्च कार्याणां ध्रुवं संतर्पणेन च । स्वप्नप्रसङ्गाच्च नरो वराह इव पुष्यति ॥ ३४ ॥ कृश रोग की चिकित्सा—रात में और दिन में सोना, सदा प्रसन्न रहना, आराम, गद्देदार पलंग पर सोना, बैठना, मनकी बेफिकरी, शान्ति, चिन्ता न करना, सम्भोग का न करना, श्रम न करना और इच्छित वस्तुओं का दर्शन, नये अन्न, नया मद्य, ग्राम्य और जलचर प्राणियों के मांस का रस, संस्कृत (अच्छी प्रकार बनाये) मांस, दही, घी और दूध, गन्ने, चावल (लाल चावल) मांस, गेहूँ, गुड़ से बनी वस्तुएं, स्निग्ध और मधुर बस्तियां, सर्वदा तैल मर्दन स्निग्ध उबटन, स्नान, सुगन्ध और माला का धारण करना, सफेद वस्त्र, समय समय पर वातादि दोषों का बाहर निकालना, रसायन एवं वाजीकरण-योगों का सेवन करने से कृशता दूर होकर पुष्टि, बल (मोटापा) आता है। कार्यों की चिन्ता न करने (बेफिक्री) से, नित्य प्रति सन्तर्पण क्रिया द्वारा और रात दिन सोने से मनुष्य सूअर की तरह पुष्ट हो जाता है ॥ २९-३४ ॥ यदा तु मनसि क्लान्ते कर्मात्मानः क्लमान्विताः ।
२५२ चरकसंहिता [ अ० २१ विषयेभ्यो निवर्तन्ते तदा स्वपिति मानवः ॥ ३५ ॥ निद्रायत्तं सुखं दुःखं पुष्टिः कार्श्यं बलाबलम् । वृषता क्लीबता ज्ञानमज्ञानं जीवितं न च ॥ ३६ ॥ अकालेऽतिप्रसङ्गाच्च न च निद्रा निषेविता । सुखायुषी पराकुर्यात्कालरात्रिरिवापरा ॥ ३७ ॥ सैव युक्ता पुनर्युङ्क्ते निद्रा देहं सुखायुषा । पुरुषं योगिनं सिद्ध्या सत्या बुद्धिरिवाऽऽगता ॥ ३८ ॥ गीताध्ययन-मद्य-स्त्री-कर्म-भाराध्व-कर्षिताः । अजीर्णिनः क्षताः क्षीणा वृद्धा बालास्तथाऽबलाः ॥ ३९ ॥ तृष्णातीसारशूलार्ताः श्वासिनो हिक्किनः कृशाः । पतिताभिहतोन्मत्ताः क्लान्ता यानप्रजागरैः ॥ ४० ॥ क्रोध-शोक-भय-क्लान्ता दिवास्वप्नोचिताश्च ये । सर्व एते दिवास्वप्नं सेवेरन् सार्वकालिकम् ॥ ४१ ॥ धातुसाम्यं तथा ह्येषां बलं चाप्युपजायते । श्लेष्मा पुष्णाति चाङ्गानि स्थैर्यं भवति चाऽऽयुषः ॥ ४२ ॥ जब मन से संयुक्त आत्मा निष्क्रिय हो जाती है, इन्द्रियां क्रियारहित हो जाती हैं ( रूप, रसादि विषयों से हट जाती है ), तब पुरुष सो जाता है । यदि विधिपूर्वक नींद का सेवन किया जाय तो, सुख, शरीर की पुष्टि, बल, पुरुषत्व ज्ञान और जीवन नींद के अधीन हैं और यदि निद्रा का विधि से सेवन न किया जाय तो दुःख, कृशता, बलनाश, क्लीबता, अज्ञान, और मरण ये नींद के अधीन हैं । इसलिये सुख चाहने वाले पुरुष को चाहिये कि दूसरी प्रलय रात्रि के समान अकाल ( दिन में या सन्ध्याकाल में ) सोना, या बहुत सोना छोड़ दे । ये नींद के मिथ्यायोग हैं । यदि निद्रा उचित रूप में सेवन की जाय तो शरीर को सुख और आयु से ऐसे ही युक्त करती है जिस प्रकार योगी पुरुष को सिद्धि से तत्त्वज्ञान प्राप्त होता है । गीत गाने से कृशपुरुष, पढ़ने से कृश, मद्यपान करने वाले स्त्री-सेवा करने वाले, वमन विरेचनादि कर्म में, मार्ग चलने से कृश हुए, अतिसार आदि से कृश, अजीर्ण रोगी, उरक्षत रोगी, क्षीण (जिनके रस रक्तादि धातु क्षीण) हों, वृद्ध, बालक, स्त्रियां ( कमज़ोर ) तृणारोगी, शूल से पीड़ित, श्वास से कृश, ऊपर से गिरे, चोट लगे हुए, उन्मत्त ( धतूरा आदि खाने से ), थके हुए, सवारी करने से, रात में जागने से, क्रोध, शोक, भय से निष्क्रिय पुरुषों को दिन में सोना उचित है । ये ऊपर लिखे पुरुष सब कालों में दिन में सो सकते हैं ।
दिन में सोने से इनके विषम धातु सम होते हैं, बल बढ़ता है, कफ अंगों को पुष्ट करता है और आयु स्थिर होती है * ॥ ३५-४२ ॥ ग्रीष्मे चाऽऽदानरूक्षाणां वर्धमाने च मारुते । रात्रीणां चातिसङ्क्षेपाद्दिवास्वप्नः प्रशस्यते ॥ ४३ ॥ ग्रीष्मवर्ज्येषु कालेषु दिवास्वप्नात्प्रकुप्यतः । श्लेष्मपित्ते, दिवास्वप्नस्तस्मात्तेषु न शस्यते ॥ ४४ ॥ मेदस्विनः स्नेहहित्याः श्लेष्मलाः श्लेष्मरोगिणः । दूषीविषार्ताश्च दिवा न शयीरन् कदाचन ॥ ४५ ॥ हलीमकः शिरः शूलं स्तैमित्यं गुरुगात्रता । अङ्गमर्दोऽग्निनाशश्च प्रलेपो हृदयस्य च ॥ ४६ ॥ शोथारोचक-हल्लास-पीनसार्द्धावभेदकाः । कोठोऽरुः पिडकाः कण्डूस्तन्द्रा कासो गलामयाः ॥ ४७ ॥ स्मृति-बुद्धि-प्रमोहश्च संरोधः स्रोतसां ज्वरः । इन्द्रियाणामसामर्थ्यं विष-वेग-प्रवर्तनम् ॥ ४८ ॥ भवेन्नॄणां दिवास्वप्नस्याहितस्य निषेवणात् । तस्माद्धिताहितं स्वप्नं बुद्ध्वा स्वप्यात्सुखं बुधः ॥ ४९ ॥ रात्रौ जागरणं रूक्षं स्निग्धं प्रस्वपनं दिवा । अरूक्षमनाभिष्यन्दि त्वासीनप्रचलायितम् ॥ ५० ॥ देहवृत्तौ यथाऽऽहारस्तथा स्वप्नः सुखो मतः । स्वप्नाहारसमुत्थे च स्थौल्यकार्यं विशेषतः ॥ ५१ ॥ ग्रीष्म ऋतु आदान काल एवं रूक्ष है, इस समय वायु बढ़ती है, और रातें बहुत छोटी होती हैं, इसलिये दिन में सोना उत्तम है। ग्रीष्म ऋतु को छोड़कर और ऋतुओं में सोने से कफ और पित्त विकृत होते हैं, इसलिये इन समयों में दिन के समय सोना ठीक नहीं है। मेदस्वी, नित्य स्नेह का सेवन करने वाले, कफप्रकृति, कफरोगी, और दूषी विष से पीड़ित पुरुष दिन में खास कर कभी भी न सोयें । दिन में सोने से हलीमक, शिरोवेदना, अंगों में भारीपन, अंगों
- नींद का स्थान कहां है ? यह तो कहना कठिन है, परन्तु जब मन या मन से युक्त आत्मा मस्तिष्क की पंचम जवनिका ( Fifth Ventrical ) में पहुंच जाती है तब पुरुष को नींद आती है। इस जवनिका के साथ किसी भी ज्ञानतन्तु का सम्बन्ध नहीं है। इसी से कहा है—"स्वप्नश्च निरिन्द्रियप्रदेशे मनोऽवस्थानम्” ॥
२४४ चरकसंहिता [ अ० २१ को गीले वस्त्र से ढांपने की भांति प्रतीति, अंगों का टूटना, जाठराग्नि की क्षीणता, हृदय का कफ से लिप्त होना, सूजन, अरुचि, वमनेच्छा, पीनस, आधा सीसी, कोठ (बर्रें के काटे के भांति), फुन्सियां, खाज, तन्द्रा, आलस्य, कास, गले के रोग स्मृति नाश, बुद्धिनाश, मूर्च्छा, स्रोतों का अवरोध, ज्वर, इन्द्रियों में असमर्थता, विष के वेग का जोर (फिर से चढ़ना) ये लक्षण अहितकारी निद्रा अर्थात् दिन में सोने से उत्पन्न होते हैं। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि अहि- तकारी नींद का त्याग करे, और हितकारी नींद का सेवन करे इससे सुख होगा। रात्रि में जागने से शरीर में रूक्षता और दिन में सोने से स्निग्धता बढ़ती है। और बैठे-बैठे सोना न तो रूक्षता उत्पन्न करता है, न अभिष्यन्द अर्थात् स्निग्धता उत्पन्न करता है। शरीर के धारण के लिये जिस प्रकार भोजन सुखकारक होता है, उसी प्रकार नींद भी आवश्यक है। इसलिये स्थूलता और कृशता मुख्य रूप से आहार और निद्रा पर अवलम्बित है ॥ ४३-५१ ॥ अभ्यङ्गोत्सादनं स्नानं ग्राम्यानूपौदका रसाः । शाल्यन्नं सदधि क्षीरं स्नेहो मद्यं मनःसुखम् ॥ ५२ ॥ मनसोऽनुगुणा गन्धाः शब्दाः संवाहनानि च । चक्षुषस्तर्पणं लेपः शिरसो वदनस्य च ॥ ५३ ॥ स्वास्तीर्णं शयनं वेश्म सुखं कालस्तथांचितः । आनयन्त्यचिरान्निद्रां प्रनष्टा या निमित्ततः ॥ ५४ ॥ तैलमर्दन, उबटन, स्नान, ग्राम्य या जलचर प्राणियों का मांस रस, चावल, दही, दूध, स्नेह (घी-तैल) मद्य, मन की प्रिय वस्तुएं, मनोनुकूल सुगन्धि, शब्द और संवाहन (मसाज, मुट्ठी भरना), आँखों का तर्पण, शिर और मुख, शरीर पर चन्दनादि का लेप, अच्छा बिछा पलंग, सुन्दर घर तथा उचित समय ये वस्तुएं कारण से नष्ट हुई नींद को शीघ्र ही उत्पन्न कर देती हैं * ॥५२-५४॥ कायस्य शिरसश्चैव विरेकश्छर्दनं भयम् । चिन्ता क्रोधस्तथा धूमो व्यायाम रक्तमोक्षणम् ॥ ५५ ॥ उपवासोऽसुखा शय्या सत्त्वौदार्यं तमोजयः । निद्राप्रसङ्गमहितं वारयन्ति समुत्थितम् ॥ ५६ ॥
- यदि मस्तिष्क में स्थित निद्रा को नियमित करने वाला केन्द्र नष्ट कर दिया जाय या चोट आदि से नष्ट हो जाय अथवा विक्षत हो जाय तो पुरुष को नींद का आना असम्भव हो जाता है। जब तक मस्तिष्क में यह केन्द्र ठीक है तभी तक यह चिकित्सा फलवती हो सकती है ।
अ० २१ ] सूत्रस्थानम् २५५
अ० २१ ] सूत्रस्थानम् २५५ शरीर का विरेचन, शिरो-विरेचन, बमन, भय, चिन्ता, क्रोध, कहानी सुनना, मैथुन रक्त मोक्षण (शिरावेध), उपवास, दुःखदायक बिस्तर, सत्त्व गुण की अधिकता, तमोगुण का जय (योगाभ्यास से होती है), ये कारण नींद को नहीं आने देते। इसलिए अहित, अवाञ्छनीय नींद को रोकने के लिये स्वस्थ पुरुष को इन्हें बर्तना चाहिये ॥५५-५६॥ एत एव च विज्ञेया निद्रानाशस्य हेतवः । कार्यं कालो विकारश्च प्रकृतिर्वायुरेव च ॥ ५७ ॥ निद्रानाश के दूसरे कारण—कार्य में फंसा रहना, काल (बुढ़ापा), विकार, शूल दर्द होना, स्वभाव से ही नींद कम आना, वायु, उन्माद रोग या वातरोग आदि निद्रानाश के कारण हैं ॥ ५७ ॥ तमोभवा श्लेष्मसमुद्भवा च मनः-शरीरश्रम-संभवा च । आगन्तुकी व्याध्यनुवर्तिनी च रात्रिस्वभाव-प्रभवा च निद्रा ॥५८॥ रात्रिस्वभावप्रभवा मता या तां भूतधात्रीं प्रवदन्ति निद्राम् । तमोभवामाहुरघस्य मूलं शेषं पुनर्व्याधिषु निर्दिशन्ति ॥५९॥ नींद छः प्रकार की हैं यथा—तमोजन्या, निद्रा कफ से उत्पन्न मन और शरीर के थकने से 'आगन्तुकी रोग (सन्निपात ज्वर आदि) उत्पन्न होने वाली रात्रि के स्वभाव के कारण उत्पन्न होने वाली निद्रा । इन छः प्रकार की निद्रा में जो निद्रा रात्रि-स्वभाव के कारण उत्पन्न होती है उसको भूतधात्री अर्थात् धाय के समान प्राणियों को पोषण करने वाली कहते हैं, और तमोगुण से उत्पन्न निद्रा पाप अधर्म का मूल है, शेष निद्राओं की गिनती रोगों में की जाती है । तत्र श्लोकाः—निन्दिताः पुरुषास्तेषां यौ विशेषेण निन्दितौ । निन्दिते कारणं दोषास्तयोर्निन्दितभेषजम् ॥ ६० ॥ येभ्यो यदा हिता निद्रा येभ्यश्चाप्यहिता यदा । अतिनिद्रानिद्रयोश्च भेषजं यद्गुणा च सा ॥ ६१ ॥ या या यथाप्रभावा च निद्रा तत्सर्वमत्रिजः । अष्टौनिन्दितसंख्याते व्याजहार पुनर्वसुः ॥६२॥ निन्दित पुरुष, इनमें जो दो (स्थूल और कृश) अधिक निन्दित, निन्दित होने का का कारण, दोनों के दोष, औषध, जिनके लिये निद्रा हितकारी है, जिनके लिये अहितकारी, अति नींद और नींद के न आने की औषध और जिस कारण से नींद आती है, जिसजिस प्रकार से उत्पन्न होती है, इन सब बातों को आत्रेय ऋषि ने 'अष्टौ निन्दित' नामक अध्यायमें कह दिया ॥६०-६२॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने योजनाचतुष्के अष्टौनिन्दितीयो नाम एकविंशतितमोऽध्यायः ॥२१॥
३५६ चरकसंहिता [ अ० २२ द्वाविंशतितमोऽध्यायः अथातो लङ्घनबृंहणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥२॥ अब लंघनबृंहणीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ तपःस्वाध्यायनिरतानात्रेयः शिष्यसत्तमान् । षडग्निवेशप्रमुखानुक्तवान् परिचोदयन् ॥ ३ ॥ लङ्घनं बृंहणं काले रूक्षणं स्नेहनं तथा । स्वेदनं स्तम्भनं चैव जानीते यः स वै भिषक् ॥ ४ ॥ आत्रेय महर्षि तपश्चर्या और स्वाध्याय में मग्न हुए, अग्निवेश आदि प्रमुख एवं उत्तम छः शिष्यों के ज्ञान के लिये कहने लगे—जो लंघन, बृंहण, रूक्षण, स्नेहन, स्वेदन एवं स्तम्भन क्रियाओं के समय तथा विधि को जानता है, वही वैद्य है ॥ ३-४ ॥ तमुक्तवन्तमात्रेयमग्निवेश उवाच ह । भगवंल्लङ्घनं किंखिल्लङ्घनीयाश्च कीदृशाः ॥ ५ ॥ बृंहणं बृंहणीयाश्च रूक्षणीयाश्च रूक्षणम् । स्नेहनं स्नेहनीयाश्च स्वेदाः स्वेद्याश्च के मताः ॥ ६ ॥ स्तम्भनं स्तम्भनीयाश्च वक्तुमर्हसि तद् गुरो । लङ्घनप्रभृतीनां च षण्णामेषां समासतः ॥ ७ ॥ कृताकृतातिरिक्तानां लक्षणं वक्तुमर्हसि । इस प्रकार कहते हुए आत्रेय ऋषि से अग्निवेश ने कहा-कि भगवन् लंघन किस प्रकार का होता है और कौन पुरुष लंघन के योग्य हैं ? बृंहण क्या है और बृंहणीय चिकित्सा के योग्य कौन हैं ? रूक्षण क्या है और रूक्षणीय कौन हैं ? स्नेहन क्या है और स्नेहनीय कौन हैं ? स्वेदन क्या है और स्वेदनीय कौन हैं ? स्तम्भन क्या है और स्तम्भनीय पुरुष कौन हैं ? हे गुरो ! यह सब आप कहिये । इन छः लंघन आदि के लक्षण संक्षेप में कहिये । सम्यक् प्रकार से किये, न किये और अति किये हुए के लक्षण भी आप कहें ॥ ५-६ ॥ वचस्तदग्निवेशस्य निशम्य गुरुरब्रवीत् ॥ ८ ॥ यत्किञ्चिल्लाघवकरं देहे तल्लङ्घनं स्मृतम् । वृहत्त्वं यच्छरीरस्य जनयेत्तच्च बृंहणम् ॥ ६ ॥ रौक्ष्यं खरत्वं वैशद्यं यत्कुर्यात्तद्धि रूक्षणम् ।
अ० २२ ] १७ सूत्रस्थानम् २५७
अ० २२ ] १७ सूत्रस्थानम् २५७
स्नेहनं स्नेह-विष्यन्द-मार्दव-क्लेद-कारकम् ॥ १० ॥
स्तम्भ-गौरव-शीतघ्नं स्वेदनं स्वेदकारकम् ।
स्तम्भनं स्तम्भयति यद्गतिमन्तं चलं द्रवम् ॥ ११ ॥
अग्निवेश के वचन को सुनकर गुरु बोले; शरीर के अन्दर जो वस्तु लघुता
हलकापन, उत्पन्न करती है, उसको 'लंघन' कहते हैं। जो वस्तु शरीर में
स्थूलता उत्पन्न करती है, उसे 'बृंहण' कहते हैं। जो वस्तु शरीर में रूखता,
कर्कशता और विशदता, पृथक्त्व उत्पन्न करती है, वह रूक्षण है। शरीर में
जो वस्तु विकास, विष्यन्द, बिलयन, कोमलता और क्लिन्नता उत्पन्न करती है,
वह स्नेहन है, जो वस्तु शरीर में जड़ता उत्पन्न करे, भारीपन करे शीत का
नाश करे तथा पसीना लाये वह 'स्वेदन' है। जो वस्तु गतिशील, थोड़ी सी
गति को, द्रव को, रोक देती है, वह स्तम्भन है ॥ ८-११ ॥
लघूष्णतीक्ष्णविशदं रूक्षं सूक्ष्मं खरं सरम् ।
कठिनं चैव यद् द्रव्यं प्रायस्तल्लङ्घनं स्मृतम् ॥ १२ ॥
गुरुशीतमृदुस्निग्धं बहलं स्थूलपिच्छिलम् ।
प्रायो मन्दं स्थिरं श्लक्ष्णं द्रव्यं बृंहणमुच्यते ॥ १३ ॥
रूक्षं लघु खरं तीक्ष्णमुष्णं स्थिरमपिच्छिलम् ।
प्रायशः कठिनं चैव यद् द्रव्यं तद्धि रूक्षणम् ॥ १४ ॥
द्रवं सूक्ष्मं सरं स्निग्धं पिच्छिलं गुरु शीतलम् ।
प्रायो मन्दं मृदु च यद् द्रव्यं तत्स्नेहनं मतम् ॥ १५ ॥
उष्णं तीक्ष्णं सरं स्निग्धं रूक्षं सूक्ष्मं द्रवं स्थिरम् ।
द्रव्यं गुरु च यत् प्रायस्तद्धि स्वेदनमुच्यते ॥ १६ ॥
शीतं मन्दं मृदु श्लक्ष्णं रूक्षं सूक्ष्मं द्रवं स्थिरम् ।
यद् द्रव्यं लघु चोद्दिष्टं प्रायस्तत्स्तम्भनं स्मृतम् ॥ १७ ॥
जो वस्तु लघु, गरम, तीक्ष्ण, विशद, रूक्ष, सूक्ष्म, खर (कर्कश), सर
(बहने वाला) और कठिन हो वह वस्तु प्रायः करके 'लंघन' गुण वाली होती
है। भारी, शीतवीर्य, मृदु, स्निग्ध, घन, स्थूल पिच्छिल, चिरकारी, (देर में कार्य
करने वाला) स्थिर, चिकना जो पदार्थ होता है, वह प्रायः करके 'बृंहण' होता
है। रूक्ष, लघु, खर, तीक्ष्ण; उष्ण, स्थिर, विकास रहित और कठिन द्रव्य है
वह प्रायः करके 'रूक्षण' होता है। * जो द्रव्य पतला, सूक्ष्म, बहने वाला,
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* रूक्षण में मुख्य रूप से स्नेह का अभाव रहता है और लंघन में गौरव
का अभाव रहता है यह दोनों में मुख्य भेद है।
३५८ चरकसंहिता [ अ० २२ चिकना, स्नेह युक्त, भारी, शीतल, मन्द ( चिरकारी ) और मृदु होता है, वह प्रायः करके 'स्नेहन' होता है। उष्ण, तीक्ष्ण, बहने बाला, स्निग्ध, रूक्ष, सूक्ष्म, द्रव, स्थिर, और भारी जो पदार्थ होता है, वह प्रायः करके 'स्वेदन' होता है। शीत, मन्द, मृदु, श्लक्ष्ण, रूक्ष, सूक्ष्म, द्रव और स्थिर तथा लघु होता है। वह द्रव्य प्रायः करके 'स्तम्भन' होता है ॥ १२-१७ ॥ चतुष्प्रकारा संशुद्धिः पिपासा मारुतातपौ । पाचनान्युपवासश्च व्यायामश्चेति लङ्घनम् ॥ १८ ॥ प्रभूत-श्लेष्म-पित्तास्र-मलाः संसृष्टमारुताः । बृहच्छरीरा बलिनो लङ्घनीया विशुद्धिभिः ॥ १६ ॥ येषां मध्यबला रोगाः कफपित्तसमुत्थिताः । वम्यतीसार-हृद्रोग-विसूच्यलसक-ज्वराः ॥ २० ॥ विबन्ध-गौरवोद्गार-हृल्लासारोचकादयः । पाचनांस्तान् भिषक् प्राज्ञः प्रायेणाऽऽदावुपाचरेत् ॥२१॥ एत एव यथोद्दिष्टा येषामल्पबला गदाः । पिपासानिग्रहैस्तेषामुपवासैश्च ताञ्जयेत् ॥ २२ ॥ रोगाञ्जयेन्मध्यबलान् व्यायामातपमारुतैः । बलिनां किं पुनर्यैषां रोगाणामवरं बलम् ॥ २३ ॥ त्वग्दोषिणां प्रमूढानां स्निग्धाभिष्यन्दिबृंहिणाम् । शिशिरे लङ्घनं शस्तमपि वातविकारिणाम् ॥ २४ ॥ चार प्रकार की शुद्धि अर्थात्—वमन, विरेचन, नस्य और आस्थापन बस्ति; प्यास का रोकना, वायु और धूप का सहना, पाचन, उपवास और व्यायाम ये शरीर में लघुता उत्पन्न करते हैं। जिन पुरुषों में कफ, पित्त, रक्त और मल बहुत बढ़े हों, जिन को वात रोग हो, जिनका शरीर बहुत बड़ा हो, बलवान् हो, उनको वमन विरेचन आदि संशोधन द्वारा लंघन देना चाहिये और जिन मध्यम बल वाले पुरुषों में कफ, पित्त से उत्पन्न रोग हों, जिन को वमन, अती- सार, हृदय रोग, विसूचिका, अलसक, ज्वर, विबन्ध, गौरव, उद्गार, बेचैनी, अरुचि आदि (अजीर्ण) हों, उनको वैद्य प्रथम पाचन औषधियों से लंघन देकर चिकित्सा करे। यही रोग यदि अल्पबलवाले पुरुष को हो तो पिपासा के रोकने से और उपवास द्वारा लंघन कराके शान्त कराना चाहिये। मध्यम बलवाले रोगों को व्यायाम, धूप और वायु के सेवन से लंघन कराना चाहिये। इसी प्रकार बलवान् पुरुषों में जब रोग का बल न्यून हो, तब भी व्यायाम द्वारा लंघन कराना चाहिये। त्वचा के दोष वाले, प्रमेह रोगियों को, स्निग्ध वा अभि-
अ० २२ ] सूत्रस्थानम् २५६
अ० २२ ] सूत्रस्थानम् २५६ मन्द अथवा पुष्ट शरीर वाले पुरुष को, एवं वात रोगियों को शिशिर काल में लंघन देना उत्तम है । (शिशिर के समान गुण होने से हेमन्त भी उत्तम है) । अदिग्धविद्धमक्लिष्टं वयःस्थं सात्म्यचारिणाम् । मृगमत्स्यविहङ्गानां मांसं बृंहणमुच्यते ॥ २५ ॥ क्षीणाः क्षताः कृशा वृद्धा दुर्बला नित्यमध्वगाः । स्त्रीमद्यनित्या ग्रीष्मे च बृंहणीया नराः स्मृताः ॥ २६ ॥ शोषार्शो-ग्रहणीदोषैर्व्याधिभिः कर्शिताश्च ये । तेषां क्रव्यादमांसानां बृंहणा लघवो रसाः ॥ २७ ॥ स्नानमुत्सादनं स्वप्नो मधुराः स्नेहबस्तयः । शर्करा क्षीरसर्पींषि सर्वेषां विद्धि बृंहणम् ॥ २८ ॥ विषयुक्त शस्त्र से न मारे हुए, नीरोगी, जवान, सात्म्यवस्तु को खाने वाले एवं सात्म्य स्थान में चरने वाले, मृग, मछली या पक्षियों का मांस बृंहण के लिये उपयुक्त है । ॐ क्षीण रोगी, उरःक्षत का रोगी, कृश, वृद्ध, दुर्बल, रोज़ सफ़र ( परिश्रम ) करने वाले, स्त्रीसेवी, मद्यसेवी पुरुषों का ग्रीष्म काल में बृंहण करना चाहिये । शोष, अर्श, ग्रहणीरोग के कारण जो पुरुष निर्बल हो गये हैं, उनको मांस खाने वाले पशु-पक्षियों के मांस से बृंहण करना चाहिये । मांस को संस्कार द्वारा लघु बना लेना चाहिये, अथवा लघु गुण वाले पक्षी बाज़ आदि का मांस प्रयोग करना चाहिये । स्नान, उबटन, निद्रा मधुर एवं स्नेह युक्त बस्ति या, शक्कर, घी, दूध ये वस्तुऐं सब पुरुषों का बृंहण करती हैं ॥२८॥ कटु-तिक्त-कषायाणां सेवनं स्त्रीष्वसंयमः । खलि-पिण्याक-तक्राणां मध्वादीनां च रूक्षणम् ॥ २६ ॥ अभिष्यन्दा महादोषा मर्मस्था व्याधयश्च ये । ऊरुस्तम्भप्रभृतयो रूक्षणीया निदर्शिताः ॥ ३० ॥ कडुए, तीखे, कषाय रस का सेवन, अति स्त्रीसंग, सरसों की खल, तिल की खल, तक्र और मधु ( शहद ) आदि विरूक्षण करने वाले हैं । कफरोगी, वातरोगी और जिन को मर्म स्थान के रोग ( ऊरुस्तम्भ 'आढ्यवात, प्रमेह आदि ) हों उनका विरूक्षण उपचार करना चाहिये ॥ २६-३० ॥ ॐ घर में पाले या रक्खे पक्षी या मछलियों का मांस लाभकर नहीं है। जो पशु-पक्षी अपने स्वाभाविक रूप में रहते हैं और अपना स्वाभाविक आहार लेते हैं; उन का मांस ही लाभदायक है ।
२६० चरकसंहिता [ अ० २२ स्नेहाः स्नेहयितव्याश्च स्वेदाः स्वेद्याश्च ये नराः । स्नेहाध्याये मयोक्तास्ते स्वेदाख्ये च सविस्तरम् ॥ ३१ ॥ स्नेह कितने हैं और कौन स्नेह के योग्य हैं ? स्वेद कितने हैं और कौन स्वेद के योग्य हैं ? ये स्नेह और स्वेद अध्याय में विस्तार से कह दिये हैं ॥३१॥ द्रवं तनु स्थिरं यावच्छीतीकरणमौषधम् । स्वादु तिक्तं कषायं च स्तम्भनं सर्वमेव तत् ॥ ३२ ॥ पित्तक्षाराग्निदग्धा ये वम्यतीसारपीडिताः । विषस्वेदातियोगातर्ाः स्तम्भनीयास्तथाविधाः ॥ ३३ ॥ जो द्रव्य पतला, द्रव, बहने वाला और शीतलता उत्पन्न करने वाला है, तथा मधुर, तिक्त या कषाय रस है, वह सब 'स्तम्भन' है। पित्त रोगी, क्षार या अग्नि से जले रोगी, वमन या अतिसार से पीड़ित, विषवेग से या अतिस्वेदन क्रिया से पीड़ित पुरुष स्तम्भन क्रिया के योग्य हैं ॥ ३२-३३ ॥ वात-मूत्र-पुरीषाणां विसर्गे गात्रलाघवे । हृदयोद्गारकण्ठास्यशुद्धौ तन्द्राक्लमे गते ॥ ३४ ॥ स्वेदे जाते रुचौ चैव क्षुत्पिपासासहोदये । कृतं लङ्घनमादेश्यं निर्व्यथे चान्तरात्मनि ॥ ३५ ॥ पर्वभेदोऽङ्गमर्दश्च कासः शोषो मुखस्य च । क्षुत्प्रणाशोऽरुचिस्तृष्णा दौर्बल्यं श्रोत्रनेत्रयोः ॥ ३६ ॥ मनसः संभ्रमोऽभीक्ष्णमूर्ध्ववातस्तमो हृदि । देहाग्निबलनाशश्च लङ्घनेऽतिकृते भवेत् ॥ ३७ ॥ अपान वायु, मल-मूत्र का बाहर आना, शरीर में हल्कापन, आमाशय, डकार, गला और मुख के शुद्ध होने पर, आलस्य और निष्क्रियता के नष्ट होने पर, पसीना और भोजन में रुचि उत्पन्न होने पर, भूख और प्यास का एक साथ सहन न होने पर, अर्थात् भूख और प्यास एक साथ लगने पर; मन के प्रसन्न होने पर, सम्यक् प्रकार से लंघन हुआ ऐसा जानना चाहिये । लंघन के अधिक करने से जोड़ो का टूटना, अंगो में पीड़ा, कास, मुख का सूखना, भूख का नष्ट होना, अरुचि, प्यास, कान और आंख में निर्बलता, मन की बेचैनी, चक्कर आना, शरीर के ऊपर के भाग में बारम्बार वायु का चढ़ना, क्षोर होना, हृदय में अन्धकार ( तमोगुण की अधिकता ), जठराग्नि और शरीर के बल का नाश होना ये लंघन के अतियोग से होते हैं ॥ ३४-३७ ॥
अ० २२ ] सूत्रस्थानम् २६१
अ० २२ ] सूत्रस्थानम् २६१ बलं पुष्ट्युपलब्धश्च कार्श्यदोषविवर्जनम् । लक्षणं बृंहिते, स्थौल्यमति चाल्यर्थबृंहिते ॥ ३८ ॥ बल, पुष्टि का होना, कृशता के दोषों का दूर हो जाना, ये सम्यक् प्रकार के बृंहण होने के लक्षण हैं । बृंहण के अतियोग से स्थूलता आती है ॥ ३८ ॥ कृताकृतस्य लिङ्गं यल्लङ्गिते तद्धि रूक्षिते । लंघन के सम्यक् योग और अयोग के जो लक्षण हैं वे ही लक्षण रूक्षण के सम्यक् योग और अयोग के हैं । स्तम्भितः स्याद्बले लब्धे यथोक्तैश्चाऽऽमयैर्जितैः ॥ ३९ ॥ श्यावता स्तब्धगात्रत्वमुद्वेगो हनुसंग्रहः । हृद्धोर्विनिग्रहश्च स्यादतिस्तम्भितलक्षणम् ॥ ४० ॥ स्तम्भन क्रिया के योग्य रोगों के शान्त होने पर, बल प्राप्त होने से स्तम्भन भली प्रकार से हुआ जानना चाहिये । स्तम्भन के अतियोग से—काला रंग, शरीर का जड़ होना, वमन की इच्छा, जबड़ी का बन्द होना, हृदय का अव- रोध, मल का रुकना ये अतिस्तम्भन के लक्षण हैं ॥ ३९-४० ॥ लक्षणं चाकृतानां स्यात् षण्णामेषां समासतः । तदौषधानां व्याधीनामशमो वृद्धिरैव च ॥ ४१ ॥ इति षट् सर्वरोगाणां प्रोक्ताः सम्यगुपक्रमाः । साध्यानां साधने सिद्धा मात्राकालानुरोधिनः ॥ ४२ ॥ इति । भवति चात्र—दोषाणां बहुसंसर्गात् संकीर्यन्ते ह्यपक्रमाः । षडृत्वं तु नातिवर्तन्ते त्रित्वं वातादयो यथा ॥ ४३ ॥ तत्र श्लोकः—इत्यग्निलङ्घनाध्याये व्याख्याताः षडुपक्रमाः । यथाप्रश्नं भगवता चिकित्सा यैः प्रवर्तिता ॥ ४४ ॥ लंघन आदि छः क्रियाओं के अयोग से, इन क्रियाओं से शान्त होने वाले रोगों की शान्ति नहीं होती या बढ़ जाते हैं । इन छः क्रियाओं के सम्यक् योग से सब रोग शान्त हो सकते हैं । मात्रा और समय का विचार करके इन क्रियाओं का उपयोग करने से सब साध्य रोग ठीक होते हैं । वातादि दोषों के परस्पर मिलने से बहुत भेद हो जाते हैं, इसलिये चिकित्सा भी बहुत प्रकार की है । जिस प्रकार कि रोग वात आदि तीन को छोड़कर नहीं होते उसी प्रकार चिकित्सा भी इन छः में ही सीमित है । इस लंघनीय अध्याय में छः क्रियायें प्रश्न के अनुसार भगवान् आत्रेय ने कह दी हैं ॥ ४१-४४ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने योजनाचतुष्के लङ्घनबृंहणीयो नाम द्वाविंशतितमोऽध्यायः ॥ २२ ॥
२६२ चरकसंहिता [ अ० २३
त्रयोविंशतितमोऽध्यायः ।
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अथातः सन्तर्पणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे सन्तर्पणीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान्
आत्रेय ने कहा था ॥ २ ॥
संतर्पयति यः स्निग्धैर्मधुरैर्गुरुपिच्छिलैः ।
नवान्नैर्नवमद्यैश्च मांसैश्चानूपवारिजैः ॥ ३ ॥
गोरसैर्गौडिकैश्चान्न्रैः पैष्टिकैश्चातिमात्रशः ।
चेष्टाद्वेषी दिवास्वप्न-शय्यासन-सुखे रतः ॥ ४ ॥
रोगास्तस्योपजायन्ते संतर्पणनिमित्तजाः ।
जो पुरुष स्निग्ध, मधुर, गुरु और पिच्छिल पदार्थों से शरीर का सन्तर्पण
करते हैं, नये अन्न, नवीन मद्य, जलीय प्रदेश में या जलचर प्राणियों के मांस
का सेवन, दूध से बने या गुड़ से बने पदार्थों का या पौष्टिक भोजनों का अति
उपयोग करते हैं, हाथ पांव हिलाने की क्रिया करना पसन्द नहीं करते, दिन में
सोना, आरामतलबी से उठना-बैठना जिन्दगी बसर करना पसन्द करते हैं उनकी
सन्तर्पणजन्य रोग उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ३-४ ॥
प्रमेह-कण्डू-पिडकाः कोठ-पाण्ड्वामय-ज्वराः ॥ ५ ॥
कुष्ठान्यामप्रदोषाश्च मूत्रकृच्छ्रमरोचकः ।
तन्द्रा क्लैब्यमतिस्थौल्यमालस्यं गुरुगात्रता ॥ ६ ॥
इन्द्रियस्रोतसां लेपो बुद्धेर्मोहः प्रमीलकः ।
शोफाश्चैवंविधाश्चान्ये शीघ्रमप्रतिकुर्वतः ॥ ७ ॥
सन्तर्पणजन्य रोग-प्रमेह, कण्डू, फुन्सियां, कोठ (बर्रै के काटे के समान
चकत्ते), पाण्डु रोग, ज्वर, कुष्ठ रोग, विषूचिका आदि, मूत्रकृच्छ्र, अरुचि,
तन्द्रा, क्लीबता, अतिस्थूलता, आलस्य, शरीर का भारीपन, इन्द्रिय और स्रोतों
का अवरोध, बुद्धिभ्रंश, निरन्तर एक ही बात की चिन्ता, सूजन एवं इसी प्रकार
के अन्य रोग शीघ्र प्रतिकार न करने से उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ५-७ ॥
शस्तमुल्लेखनं तत्र विरेको रक्तमोक्षणम् ।
व्यायामश्चोपवासश्च धूमाश्च स्वेदनानि च ॥ ८ ॥
सक्षौद्रश्चाभयाप्राशः प्रायो रूक्षाश्नसेवनम् ।
चूर्णप्रदेहा ये चोक्ताः कण्डूकोठविनाशनाः ॥ ६ ॥
अ० २३ ] सूत्रस्थानम् २६३
अ० २३ ] सूत्रस्थानम् २६३ त्रिफलारग्वधं पाठां सप्तपर्णं सवत्सकम् । मुस्तं निम्बं समदनं जलेनोलकथितं पिबेत् ॥ १० ॥ तेन मेहादयो यान्ति नाशमभ्यस्यतो ध्रुवम् । मात्राकालप्रयुक्तेन संतर्पणसमुत्थिताः ॥ ११ ॥ ऐसी अवस्था में वमन, विरेचन, रक्तमोक्षण, व्यायाम, उपवास, धूमपान, स्वेद क्रिया, मधु के साथ हरीतकी खाना (या अगस्त्य हरीतकी का खाना), रूक्ष अन्नों का उपयोग, कण्डू और कोठ को नष्ट करने वाले जो चूर्ण या प्रदेह आरग्वधीय अध्याय में कहे हैं उनका सेवन, त्रिफला (हरड़, बहेड़ा, आंवला), अमलतास, पाढ़ल, सतवन, इन्द्रजौ, नागरमोथा, नीम की छाल, मैनफल इनका जल में काढ़ा बनाकर अभ्यास पूर्वक (नित्यप्रति) पीने से प्रमेह आदि रोग जो कि मात्रा और काल में सन्तर्पण क्रिया से उत्पन्न हुए हैं, नष्ट हो जाते हैं॥८-११॥ मुस्तमारग्वधः पाठा त्रिफला देवदारु च । श्वदंष्ट्रा खदिरो निम्बो हरिद्रे त्वक्व वत्सकात् ॥ १२ ॥ रसमेषां यथादोषं प्रातः प्रातः पिबेन्नरः । संतर्पणकृतैः सर्वैर्व्याधिभिः संप्रमुच्यते ॥ १३ ॥ एभिश्चोद्वर्त्तनोद्धर्षस्नानयोगोपयोजितैः । त्वग्दोषाः प्रशमं यान्ति तथा स्नेहोपसंहितैः ॥ १४ ॥ कुष्ठं गोमेदको हिङ्गु क्रौञ्चास्थि त्र्यूषणं वचा । वृषकैलै श्वदंष्ट्रा च खराह्वा चाश्मभेदकः ॥ १५ ॥ तक्रेण दधिमण्डेन बदराम्लरसेन वा । मूत्रकृच्छ्रं प्रमेहं च पीतमेतद् व्यपोहति ॥ १६ ॥ तक्राभयाप्रयोगैश्च त्रिफलायास्तथैव च । अरिष्टानां प्रयोगैश्च यान्ति मेहादयः शमम् ॥ १७ ॥ त्र्यूषणं त्रिफला क्षौद्रं क्रिमिघ्नं साजमोदकम् । मन्थोऽयं सक्तवः सर्पिर्हितो लोहोदकाप्लुतः ॥ १८ ॥ व्योषं विडङ्गं शिग्रूणि त्रिफलां कटुरोहिणीम् । बृहत्यौ द्वे हरिद्रे द्वे पाठां सातिविषां स्थिराम् ॥ १९ ॥ हिङ्गुकेबूकमूलानि यवानीधान्यचित्रकम् । सौवर्चलमजाजी च हबुषां चेति चूर्णयेत् ॥ २० ॥ चूर्ण-तैल-घृत-क्षौद्र-भागाः स्युर्मानतः समाः । सक्तूनां षोडशगुणो भागः संतर्पणं पिबेत् ॥ २१ ॥
२६४ चरकसंहिता [अ० २३ प्रयोगादस्य शाम्यन्ति रोगाः संतर्पणोत्थिताः । प्रमेहा मूढवाताश्च कुष्ठान्यर्शासि कामलाः ॥ २२ ॥ प्लीहा पाण्ड्वामयः शोफो मूत्रकृच्छ्रमरोचकः । हृद्रोगो राजयक्ष्मा च कासः श्वासो गलग्रहः ॥ २३ ॥ क्रिमयो ग्रहणीदोषाः श्वैत्र्यं स्थौल्यमतीव च । नराणां दीप्यते चाग्निः स्मृतिर्बुद्धिश्च वर्धते ॥ २४ ॥ व्यायामनित्यो जीर्णाशी यव-गोधूम-भोजनः । संतर्पणकृतैर्दोषैः स्थौल्यं मुक्त्वा विमुच्यते ॥२५॥ नागरमोथा, अमलतास, पाढ़ल, त्रिफला, देवदारु, गोखरू, खैर की छाल, नीम की छाल, हल्दी, दारूहल्दी, कूड़े की छाल, इन औषधियों से क्वाथ करके दोषानुसार प्रतिदिन प्रातःकाल पीने से, सन्तर्पणजन्य सब व्याधियों से मुक्त हो जाता है। स्नेह साधन द्वारा त्वचा के रोग मिट जाते हैं। कूठ, गोमेदक मणि, (या अंकोल) हींग, कौंच पक्षी की अस्थि, सोंठ, मिरच, पिप्पली, वच, वासा, इलायची, गोखरू, अजवायन, पाषाणभेद इन सब को तक्र या दधिमण्ड के साथ अथवा खट्टे बेरों के रसों के साथ पीने से मूत्रकृच्छ्र और प्रमेह रोग मिटते हैं। छाछ और हरड़ के प्रयोग से या छाछ और त्रिफला के प्रयोग से, या तक्रा- रिष्ट के प्रयोग से (प्रमेह में कहे अरिष्टों के उपयोग से) प्रमेह आदि रोग शान्त होते हैं। सोंठ, मिरच, पिप्पली, त्रिफला मधु, बायविडंग, अजवायन, पानी में घुला (घिसा) अगर, घी और सत्तू इनका मन्थ बनाकर पीने से प्रमेह आदि रोग मिटते हैं। सोंठ, मिरच, पीपल, वायबिडंग, शोभाञ्जन, त्रिफला, कुटकी, छोटी कटेरी, बड़ी कटेरी, हल्दी, दारुहल्दी, पाढ़ल, अतीस, पृश्निपर्णी, हींग, केवूक- मूल, अजवायन, धनिया, चीतामूल, सुवर्चल, जीरा हाऊबेर, इनका चूर्ण कर लेना चाहिये। अब चूर्ण के बराबर तेल, घी और शहद प्रत्येक समान भाग मिलाना चाहिये। इसमें जौ के सत्तू का सोलहवां भाग मिला कर खाना चाहिये। इस प्रकार करने से सन्तर्पणजन्य रोग शान्त हो जाते हैं। प्रमेह, मूढ़वात, कुष्ठ, अर्श, कामला, प्लीहा, पाण्डुरोग, शोफ, मूत्रकृच्छ्र, अरुचि, हृदय रोग, राजयक्ष्मा, कास, श्वास, गले का अवरोध, कृमि, ग्रहणी रोग, श्वित्र रोग, अतिस्थूलता रोग नष्ट होते हैं, जाठराग्नि दीप्त होती है और स्मृति एवं बुद्धि बढ़ती है। नित्य व्यायाम करने वाला, पहिले भोजन के जीर्ण होने पर खाने वाला, जौ और गेहूँ का भोजन करने वाला मनुष्य सन्तर्पणजन्य रोगों से मुक्त होता है, तथा स्थूलता का नाश होता है ॥ १२-२५ ॥
अ० २३ ] सूत्रस्थानम् २६५
अ० २३ ] सूत्रस्थानम् २६५
उक्तं संतर्पणोत्थानामपतर्पणमौषधम् ।
वक्ष्यन्ते सौषधाश्चोर्ध्वमपतर्पणजा गदाः ॥ २६ ॥
देहाग्नि-बल-वर्णौजः-शुक्र-मांस-बल-क्षयः ।
ज्वरः कासानुबन्धश्च पार्श्वशूलमरोचकः ॥ २७ ॥
श्रोत्रदौर्बल्यमुन्मादः प्रलापो हृदयव्यथा ।
विण्मूत्रसंग्रहः शूलं जङ्घोरुत्रिकसंश्रयम् ॥ २८ ॥
पर्वास्थिसंधिभेदश्च ये चान्ये वातजा गदाः ।
ऊर्ध्ववातादयः सर्वे जायन्ते तेऽपतर्पणात् ॥ २९ ॥
तेषां संतर्पणं तज्ज्ञैः पुनराख्यातमौषधम् ।
यत्तदात्वे समर्थं स्यादभ्यासे वा तदिष्यते ॥ ३० ॥
सद्यः क्षीणो हि सद्यो वै तर्पणेनोपचीयते ।
नर्ते सन्तर्पणाभ्यासाच्चिरक्षीणस्तु पुष्यति ॥ ३१ ॥
देहाग्नि-दोष-भैषज्य-मात्रा-कालानुवर्तिना ।
कार्यमत्वरमाणे न भेषजं चिरदुर्बले ॥ ३२ ॥
हिता मांसरसास्तस्मै पयांसि च घृतानि च ।
स्नानानि बस्तयोऽभ्यङ्गास्तर्पणास्तर्पणाश्च ये ॥ ३३ ॥
ज्वर-कास-प्रसक्तानां कृशानां मूत्रकृच्छ्रिणाम् ।
तृष्यतामूर्ध्ववातानां हितं वक्ष्यामि तर्पणम् ॥ ३४ ॥
शर्करा-पिप्पली-मूल-घृत-क्षौद्रैः समांशकैः ।
सक्तुद्विगुणितो वृष्यस्तेषां मन्थः प्रशस्यते ॥ ३५ ॥
सक्तवो मदिरा क्षौद्रं शर्करा चेति तर्पणम् ।
पिबेन्मारुतविण्मूत्रकफपित्तानुलोमनम् ॥ ३६ ॥
फाणितं सक्तवः सर्पिर्दधि-मण्डोऽम्ल-काञ्जिकम् ।
तर्पणं मूत्रकृच्छ्रघ्नमुदावर्तहरं पिबेत् ।
मन्थः खर्जूरमृद्वीका-वृक्षाम्लाम्लीक-दाडिमैः ।
परूषकैः सामलकैर्युक्तो मद्यविकारनुत् ॥ ३८ ॥
स्वादुरम्लो जलकृतः सस्नेहो रूक्ष एव वा ।
सद्यः संतर्पणो मन्थः स्थैर्यवर्णबलप्रदः ॥ ३९ ॥
सन्तर्पण से उत्पन्न रोगों की औषध कह दी, अब अपतर्पण को कहते हैं,
तथा अपतर्पण जन्य रोग और उनकी औषध भी कहते हैं—अपतर्पण से ज्वर,
कास एवं कास सम्बन्धी विकार, बल, कान्ति, ओज, शुक्र और मांस का क्षय,
कर्णेन्द्रिय की निर्बलता, उन्माद, प्रलाप, हृदय-पीड़ा, मल-मूत्र का अवरोध,
२६६ चरकसंहिता [ अ० २३ जंघा, ऊरु और त्रिक ( कटि के नीचे ) प्रदेश में दर्द, पर्व, अस्थि और सन्धियों का टूटना, और अन्य वातजन्य रोग यथा ऊर्ध्ववात ( वायु का ऊपर चढ़ना ) आदि रोग अपतर्पण के कारण उत्पन्न होते हैं। अपतर्पण से उत्पन्न इन रोगों के लिये संतर्पण क्रिया औषध है। सन्तर्पण क्रिया दो प्रकार की है। यथा—सद्यः सन्तर्पण और अभ्यास ( क्रमशः शनैः शनैः ) सन्तर्पण। जो मनुष्य सहसा एकदम से क्षीण होता है, वह सद्यः सन्तर्पण क्रिया से पुष्ट होता है और देर से क्षीण हुआ पुरुष बिना अभ्यास जन्य सन्तर्पण के पुष्ट नहीं होता। जो पुरुष देर से निर्बल हो, उसमें शरीर जाठराग्नि, दोष, औषध बल, मात्रा और समय का विचार करके शान्ति से ( जल्दी न करके ) चिकित्सा करनी चाहिये। इस प्रकार के रोगी के लिये मांस, रस, दूध, घी, स्नान, बस्तियां, मर्दन, सन्तर्पण करने वाले मन्थ आदि प्रयोग करने चाहिये। ज्वर, कास के रोगियों के लिये, निर्बलों के लिये, मूत्रकृच्छ्र रोगियों के लिये, प्यास रोगवालों के लिये, ऊर्ध्ववात रोगियों के लिये, हितकारी तर्पण क्रिया का उपदेश करते हैं—शर्करा, पिप्पलीमूल, घी और शहद ये समान भाग लेकर इन सब से दुगुना सत्तू लेकर मन्थ बनाये। सत्तू, मदिरा, शहद और शर्करा इनसे मन्थ तैयार करके वायु, मल, मूत्र के अनुलोमन ( अधोमार्ग से बाहर करने के लिये ) और कफ, पित्त को अनुकूल करने के लिये प्रयोग करना चाहिये। फाणित ( राव ) सत्तू, घी, दधिमण्ड और धान्याम्ल कांजी, इनसे बना मन्थ मूत्रकृच्छ्र नाशक और उदावर्त्त रोग को नष्ट करने वाला तर्पण है। खजूर, मुनक्का, इमली, कोकम, अनारदाना, फालसा और आंवला उनसे बना हुआ मन्थ मदिरा के विकार को नष्ट करता है। खट्टे और मीठे (अनारदाना ) पदार्थों से पानी में बना और घी युक्त या बिना घी के बना हुआ मन्थ सद्यः सन्तर्पण है और स्थिरता, वर्ण कान्ति और बल को देता है ।। २६-३६ ॥ तत्र श्लोकः—संतर्पणोत्था ये रोगा रोगा ये चापतर्पणात् । संतर्पणीये तेऽध्यायं सौषधाः परिकीर्तिताः ॥ ४० ॥ सन्तर्पण और अपतर्पण से उत्पन्न जो जो रोग हैं उनको तथा उनकी औषध को इस सन्तर्पणीय अध्याय में कह दिया ॥ ४० ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने योजनाचतुष्के सन्तर्पणीयो नाम त्रयोविंशतितमोऽध्यायः ॥ २३ ॥
अ० २४ ] सूत्रस्थानम् २६७
अ० २४ ] सूत्रस्थानम् २६७ चतुर्विंशतितमोऽध्यायः । अथातो विधिशोणितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ अब विधिशोणितीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ विधिना शोणितं जातं शुद्धं भवति देहिनाम् । देश-कालोक-सात्म्यानां विधिर्यः संप्रकाशितः ॥ ३ ॥ तद्विशुद्धं हि रुधिरं बल-वर्ण-सुखायुषा । युनक्ति प्राणिनं प्राणः शोणितं ह्यनुवर्तते ॥ ४ ॥ देशसात्म्य, कालसात्म्य और अभ्याससात्म्य की जो विधि कही है उस विधि से मनुष्यों का जो रक्त उत्पन्न होता है, वह यदि विशुद्ध हो तो पुरुष को बल, वर्ण, सुख, आयु से युक्त करता है । क्योंकि प्राणियों के प्राण रक्त का अनुसरण करते रहते हैं ॥ ३-४ ॥ प्रदुष्टबहुतीक्ष्णोष्णमद्यैरन्यैश्च तद्विधैः । तथाऽतितिलवणक्षारैरम्लैः कटुभिरेव च ॥ ५ ॥ कुलत्थ-माष-निष्पाव-तिल-तैल-निषेवणैः । पिण्डालुमूलकादीनां हरितानां च सर्वशः ॥ ६ ॥ जलजानूपशैलानां प्रसहानां च सेवनात् । दध्यम्ल-मस्तु-शुक्तानां सुरासौवीरकस्य च ॥ ७ ॥ विरुद्धानामुपक्लिन्नपूतीनां भक्षणेन च । भुक्त्वा दिवा प्रस्वपतां द्रवस्निग्धगुरूणि च ॥ ८ ॥ अत्यादानं तथा क्रोधं भजतां चाऽऽतपानलौ । छर्दि-वेग-प्रतीघातात्काले चानवसेचनातू ॥ ६ ॥ श्रमाभिघातसंतापैरजीर्णाध्यशनैस्तथा । शरत्कालस्वभावाच्च शोणितं संप्रदुष्यति ॥ १० ॥ ततः शोणितजा रोगाः प्रजायन्ते पृथग्विधाः । रक्त दूषित होने के कारण—अपनी प्रकृति से विपरीत, बहुत तीक्ष्ण, बहुत गरम मद्य अथवा इसी प्रकार के पानकादि ( या अन्न से ), बहुत नमक, क्षार या खटाई से, कडुवे रस से, कुलथी, उड़द, राजशिम्बी, तिल, तैल के खाने से, पिण्डालू ( कंद ग्रन्थि, पांढरी रतालू, अरवी, घुईयां ), मूली, और हरे शाक
२६८ चरकसंहिता [ अ० २४ सब्जियों के खाने से, पानी में रहने वाले तथा जलीय प्रदेश में रहने वाले, तथा पर्वत पर रहने वाले और मांस खाने वाले पक्षियों ( बाज़, चील ) का मांस खाने से, खट्टी दही, मस्तु, शुक्त ( कांजीभेद ), सुरा, सौवीरक ( कांजी भेद ) के खाने से, विरुद्ध, सड़े, गले, दुर्गन्ध युक्त भोजनों के खाने से, भोजन करके दिन में सोने से, तरल, स्निग्ध और भारी पदार्थों के सेवन से, बहुत अधिक खाने से, क्रोध, धूप, और अग्नि के अधिक सेवन से, वमन के वेग को रोकने से, रक्त के दूषित होने के समय ( शरत्काल ) में रक्त का मोक्षण न करने से, परिश्रम से, चोट से, सन्ताप से, अजीर्ण ( बिना भोजन के पचे पुनः खाने ) से, अध्यशन अर्थात् भोजन के जीर्ण हुए बिना फिर भोजन करनें से तथा शरत्काल में स्वभाव से ही रक्त दूषित हो जाता है । रक्त के दूषित होने से नाना प्रकार के रक्तजन्य रोग उत्पन्न होते हैं ॥ ५-१० ॥ मुखपाकोऽक्षिरागश्च पूतिघ्राणास्यगन्धता ॥ ११ ॥ गुल्मोपकुश-वीसर्प-रक्तपित्त-प्रमीलकाः । विद्रधी रक्तमेहश्च प्रदरो वातशोणितम् ॥ १२ ॥ वैवर्ण्यमग्निनाशश्च पिपासा गुरुगात्रता । सन्तापश्चातिदौर्बल्यमरुचिः शिरसश्च रुक् ॥ १३ ॥ विदाहश्चान्नपानस्य तिक्ताम्लोद्गिरणं क्लमः । क्रोधप्रचुरता बुद्धेः संमोहो लवणास्यता ॥ १४ ॥ स्वेदः शरीरदौर्गन्ध्यं मदः कम्पः स्वरक्षयः । तन्द्रा निद्रातियोगश्च तमसश्चातिदर्शनम् ॥ १५ ॥ कण्डूरुकोष्ठपिडकाः कुष्ठचर्मदलादयः । विकाराः सर्व एवैते विज्ञेयाः शोणिताश्रयाः ॥ १६ ॥ शीतोष्णस्निग्धरूक्षाद्यैरुपक्रान्ताश्च ये गदाः । सम्यक् साध्या न सिध्यन्ति रक्तजांस्तानविभावयेत् ॥ १७ ॥ यथा मुखपाक, आंख की सूजन ( आंख की लालिमा ), नाक से बदबू, मुख का दुर्गन्ध, गुल्म, उपकुश, वीसर्प, रक्त पित्त, प्रमीलक, विद्रधि, रक्त प्रमेह, प्रदर, वातरक्त, विवर्णता, जाठराग्नि का नष्ट होना, प्यास, शरीर का भारीपन, सन्ताप, अतिनिर्बलता, अरुचि, शिर की दर्द, खान-पान का विदाह ( अपचन ), कडुवी या खट्टी डकार आना, निष्क्रियता, क्रोध की अधिकता, बुद्धिभ्रंश, मुख का नमकीनपन, पसीना आना, शरीर की दुर्गन्धता, मद, कम्पन, स्वरनाश, तन्द्रा, निद्रा का अधिक आना और आंखों के सामने