हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
by नारायण पण्डित
Source: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (origin)
कथा २
-३१ ] अनधिकृत चेष्टाका परिणाम ९३
कथा २ [ अनधिकृत चेष्टा करने वाले बंदरकी कहानी २ ] 'अस्ति मगधदेशे धर्मारण्यसंनिहितवसुधायां शुभदत्तनाम्ना कायस्थेन विहारः कर्तुमारब्धः । तत्र करपत्रक्षार्यमाणैकस्तम्भस्य कियद्दूरस्फटितस्य काष्ठखण्डद्वयमध्ये कीलकः सूत्रधारेण निहितः । तत्र बलवान्वानरयूथः क्रीडन्नागतः । एको वानरः कालप्रेरित इव तं कीलकं हस्ताभ्यां धृत्वोपविष्टः । तत्र तस्य मुष्कद्वयं लम्बमानं काष्ठखण्डद्वयाभ्यन्तरे प्रविष्टम् । अनन्तरं स च सहजचपलतया महता प्रयत्नेन तं कीलकमाकृष्टवान् । आकृष्टे च कीलके चूर्णिताण्डद्वयः पञ्चत्वं गतः । अतोऽहं ब्रवीमि—"अव्यापारेषु व्यापारम्" इत्यादि' ॥ दमनको ब्रूते— 'तथापि स्वामिचेष्टानिरूपणं सेवकेनावश्यं करणीयम् ।'— करटको ब्रूते—'सर्वस्मिन्नधिकारे य एव नियुक्तः प्रधानमन्त्री स करोतु । यतोऽनुजीविना पराधिकारचर्चा सर्वथा न कर्तव्या । 'मगध देशमें धर्मारण्यके पास किसी प्रदेशमें शुभदत्त नामक कायस्थने एक मन्दिर बनवाना आरंभ किया । वहां आरेसे चीरा हुआ लट्ठा जो कितनीही दूर तक फट रहा था; उस काटके दोनों भागोंके बीचमें बढ़ईने कील ठोक दी थी । वहां बलवान् बन्दरोंका झुंड खेलता हुआ आया । एक बन्दर मृत्युसे प्रेरित हुएके समान उस लकड़ीकी खूंटीको दोनों हाथोंसे पकड़ कर बैठ गया । वहां उसके लटकते हुए दोनों अंडकोश, उस काटके दोनों भागोंकी संदमें लटक पड़े और फिर उसने स्वभावकी चंचलतासे बडे बड़े उपाय करके खूंटीको खींच लिया, और खूंटीको खींचतेही उसके दोनों अंडकोश पिचले जाने पर वह मर गया ॥ इसलिये मैं कहता हूं—"विना कामके कामोंमें पड़ना" इत्यादि' ॥ दमनकने कहा—'तोभी सेवकको स्वामीके कामका विचार अवश्य करना चाहिये ॥' करटक बोला—'जो सब काम पर अधिकारी प्रधान मंत्री हो वही करे । क्योंकि सेवकको पराये कामकी चर्चा कभी नहीं करनी चाहिये ॥ पश्य,— पराधिकारचर्चां यः कुर्यात् स्वामिहितेच्छया । स विषीदति चीत्काराद्गर्दभस्ताडितो यथा ॥ ३१ ॥
दमनक पूछने लगा— ‘यह कथा कैसे है ?’ करटक कहने लगा ।—
९४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ३१- देख, — जो स्वामीके हितकी इच्छासे पराये अधिकारकी चर्चा करता है वह रेंकनेसे मारे गये गधेकी तरह मारा जाता है ॥ ३१ ॥ दमनकः पृच्छति — ‘कथमेतत् ?’ । करटको ब्रूते— दमनक पूछने लगा— ‘यह कथा कैसे है ?’ करटक कहने लगा ।— कथा ३ [ धोबी, धोबन, गधा और कुत्तेकी कहानी ३ ] ‘अस्ति वाराणस्यां कर्पूरपटको नाम रजकः । स चाभिनववय- स्कया वध्वा सह चिरं निधुवनं कृत्वा निर्भरमालिङ्गय प्रसुप्तः । तदनन्तरं तद्गृहद्रव्याणि हर्तुं चौरः प्रविष्टः । तस्य प्राङ्गणे गर्दभो बद्धस्तिष्ठति, कुक्कुरश्चोपविष्टोऽस्ति । अथ गर्दभः श्वानमाह— ‘सखे ! भवतस्तावदयं व्यापारः । तत्किमिति त्वमुच्चैः शब्दं कृत्वा स्वामिनं न जागरयसि ?’ कुक्कुरो ब्रूते—‘भद्र ! मम नियोगस्य चर्चा त्वया न कर्तव्या । त्वमेव किं न जानासि यथा तस्याहर्निशं गृहरक्षां करोमि । यतोऽयं चिरान्निर्वृतो ममोपयोगं न जानाति । तेनाधुनापि ममाहारदाने मन्दादरः । यतो विना विधुरदर्शनं स्वामिन उपजीविषु मन्दादरा भवन्ति ।’ ‘बनारसमैं एक कर्पूरपटक नामक धोबी रहता था। वह नवजवान अपनी स्त्रीके साथ बहुत काल तक विलास करके, और अत्यन्त छातीसे चिपटा कर सो गया । इसके बाद उसके घरके द्रव्यको चुरानेके लिये चोर अंदर घुसा । उसके आंग- नमें एक गधा बंधा था और एक कुत्ता भी बैठा था । इतनेमें गधेने कुत्तेसे कहा-‘मित्र ! यह तेरा काम है, इसलिये क्यों नहीं ऊंचे शब्दसे भोंक कर स्वामीको जगाता है ?’ कुत्ता बोला-‘भाई ! मेरे कामकी चर्चा तुझे नहीं करनी चाहिये, और क्या तू सचमुच नहीं जानता है कि जिसप्रकार मैं उनके घरकी रखवाली रातदिन करता हूं, पर वैसा वह बहुत कालसे निश्चित होकर मेरे उपयोगको नहीं मानता है; इसलिये आजकल वह मेरे आहार देनेमें भी आदर ( फिक्र ) कम करता है । क्योंकि बिना आपत्तिके देखें स्वामी सेवकों पर थोड़ा आदर करते हैं ।
-३४ ] अनधिकृत चेष्टाका उपाख्यान ९५ गर्दभो ब्रूते—‘शृणु रे बर्बर ! याचते कार्यकाले यः स किंभृत्यः स किंसुहृत् ।’ गधा बोला—‘सुन रे मूर्ख ! जो कामके समय पर माँगे वह निन्दित सेवक और निन्दित मित्र है.’ कुकुरो ब्रूते— ‘भृत्यान्संभाषयेद्यस्तु कार्यकाले स किंप्रभुः ॥ ३२ ॥ कुत्ता बोला-‘जो काम अटकने पर सेवकोंसे ( केवल अपने स्वार्थके खातर ) मीठी मीठी बातें करे वह तो निन्दित स्वामी है ॥ ३२ ॥ यतः,— आश्रितानां भृतौ स्वामिसेवायां धर्मसेवने । पुत्रस्योत्पादने चैव न सन्ति प्रतिहस्तकाः’ ॥ ३३ ॥ क्योंकि आश्रितोंके पालन-पोषणमें, स्वामीकी सेवामें, धर्मकी सेवा (आचरण) करनेमें, और पुत्रके उत्पन्न करनेमें, प्रतिनिधि (एवजी) नहीं होते हैं अर्थात् ये काम अपने आपही करनेके हैं, दूसरेसे करानेके योग्य नहीं हैं’ ॥ ३३ ॥ ततो गर्दभः सकोपमाह—‘अरे दुष्टमते ! पापीयांस्त्वं यद्विपत्तौ स्वामिकार्यं उपेक्षां करोषि । भवतु तावत्, यथा स्वामी जाग- रिष्यति तन्मया कर्तव्यम् । फिर गधा झुंझला कर बोला-‘अरे दुष्टबुद्धि ! तू बड़ा पापी है, कि विपत्तिमें स्वामीके कामकी अवहेलना करता है । ठीक, जिस किसी भी प्रकार से स्वामी जग जावे ऐसा मैं तो अवश्य करूँगा ॥ यतः,— पृष्ठतः सेवयेदर्कं जठरेण हुताशनम् । स्वामिनं सर्वभावेन परलोकममायया’ ॥ ३४ ॥ क्योंकि—पीठके बल धूप खाय, पेटके बल अग्निसे तापे, स्वामीकी सब प्रकारसे (वफादारीसे) और परलोककी बिना कपटसे सेवा करनी चाहिये ॥३४॥ इत्युक्त्वातीव चीत्कारशब्दं कृतवान् । ततः स रजकस्तेन ची- त्कारेण प्रबुद्धो निद्राभङ्गकोपादुत्थाय गर्दभं लगुडेन ताडया- मास । तेनासौ पञ्चत्वमगमत् । अतोऽहं ब्रवीमि—"पराधि-
९६ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ३५-
कारचर्चाम्" इत्यादि ॥ पश्य । पशूनामन्वेषणमेवास्मन्नियोगः । स्वनियोगचर्चा क्रियताम् । ( विमृश्य) किंत्वद्य तया चर्चया न प्रयोजनम् । यत आवयोर्भक्षितशेषाहारः प्रचुरोऽस्ति ।' दमनकः सकोपमाह—'कथमाहारार्थी भवान्केवलं राजानं सेवते ? एतदयुक्तमुक्तं त्वया । यह कह कर उसने अत्यंत रेंकनेका शब्द किया । तब वह धोबी उसके चिल्लानेसे जाग उठा और नींद टूटनेके क्रोधके मारे उठ कर लकड़ीसे गधेको मारा कि जिससे वह मर गया । इसलिये मैं कहता हूं-"पराये अधिकारकी चर्चाको" इत्यादि ॥ देख-पशुओंका ढूंढना हमारा काम है ॥ अपने कामकी चर्चा करो । ( सोच कर ) परन्तु आज उस चर्चासे कुछ प्रयोजन नहीं ॥ क्योंकि अपने दोनोंके भोजनसे बचा हुआ आहार बहुत धरा है ।' दमनक क्रोधसे बोला-‘क्या तुम केवल भोजनकेही अर्थी हो कर राजाकी सेवा करते हो ? यह तुमने अयोग्य कहा । यतः,— सुहृदामुपकारकारणा- द्विषतामप्यपकारकारणात् । नृपसंश्रय इष्यते बुधै- र्जठरं को न बिभर्ति केवलम् ॥ ३५ ॥ क्योंकि-मित्रोंके उपकारके लिये, और शत्रुओंके अपकारके लिये चतुर मनुष्य राजाका आश्रय करते हैं (याने अपने मित्र या आप्तके हितके लिये और शत्रुके नाशके लियेही राजाश्रय किया जाता है ) और केवल पेट कौन नहीं भर लेता हैं ? अर्थात् सभी भरते हैं ॥ ३५ ॥ जीविते यस्य जीवन्ति विप्रा मित्राणि बान्धवाः । सफलं जीवितं तस्य आत्मार्थे को न जीवति ? ॥ ३६ ॥ जिसके जीनेसे ब्राह्मण, मित्र और भाई जीते हैं उसीका जीवन सफल है और केवल अपने (स्वार्थके) लिये कौन नहीं जीता है ? ॥ ३६ ॥ अपि च,— यस्मिञ्जीवति जीवन्ति बहवः स तु जीवतु । काकोऽपि किं न कुरुते चञ्च्वा स्वोदरपूरणम् ? ॥ ३७ ॥
-४१ ] सेवाधर्मकी निन्दा और पराक्रमकी प्रशंसा ९७ औरभी-जिसके जीनेसे बहुतसे लोग जिये वह तो सचमुच जिया, और यों तो काकभी क्या चोंचसे अपना पेट नहीं भर लेता है ? ॥ ३७ ॥ पश्य,— पञ्चभिर्याति दासत्वं पुराणैः कोऽपि मानवः । कोऽपि लक्षैः कृती कोऽपि लक्षैरपि न लभ्यते ॥ ३८ ॥ देख-कोई मनुष्य पांच पुराण में दासपनेको करने लगता है, कोई लाख में करता है और कोई एक लाखमेंभी नहीं मिलता है ॥ ३८ ॥ अन्यच्च,— मनुष्यजातौ तुल्यायां भृत्यत्वमतिगर्हितम् । प्रथमो यो न तत्रापि स किं जीवत्सु गण्यते ? ॥ ३९ ॥ और दूसरे-मनुष्योंको समान जातिमें सेवकाई काम करना अति निन्दित है और सेवकोंमेंभी जो प्रथम अर्थात् सबका मुखिया नहीं है क्या वह जीते हुओंमें गिना जा सकता है ? अर्थात् उसका जीना और मरना समान है ॥ ३९ ॥ तथा चोक्तम्,— वाजिवारणलोहानां काष्ठपाषाणवाससाम् । नारीपुरुषतोयानामन्तरं महदन्तरम् ॥ ४० ॥ जैसा कहा है-घोड़ा, हाथी, लोहा, काष्ठ, पत्थर, वस्त्र, स्त्री, पुरुष और जल इस प्रत्येकमें बड़ा अन्तर है ॥ ४० ॥ तथा हि, स्वल्पमप्यतिरिच्यते । और उसी प्रकार-थोड़ा बहुतभी गिना जाता है. स्वल्पस्नायुवसावशेषमलिनं निर्मांसमप्यस्थिकं श्वा लब्ध्वा परितोषमेति न भवेत्तस्य क्षुधः शान्तये । सिंहो जम्बुकमङ्कगं तमपि त्यक्त्वा निहन्ति द्विपं, सर्वः कृच्छ्रगतोऽपि वाञ्छति जनः सत्त्वानुरूपं फलम्॥४१॥ कुत्ता थोड़ी नस तथा चरबीसे मलिन विना मांसकी हड्डीको पा कर उसीमें संतोष कर लेता है, कुछ उससे उसकी भूख दूर नहीं होती है; और सिंह गोदमें आये हुए सियारको भी छोड़ कर हाथीको मारता है इसलिये सब प्राणी क्लेशको सह कर भी अपने पराक्रमके अनुसार फलकी इच्छा करते हैं ॥ ४१ ॥ १ पुराण=८० कौडी याने एक पैसा; ६४ कौडीका एक पैसा माना जाता है. हि० ७
९८ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ४२- अपरं च, सेव्यसेवकयोरन्तरं पश्य,— लाङ्गूलचालनमधश्चरणावपातं भूमौ निपत्य वदनोदरदर्शनं च । श्वा पिण्डदस्य कुरुते गजपुंगवस्तु धीरं विलोकयति चाटुशतैश्च भुङ्क्ते ॥ ४२ ॥ और दूसरे—स्वामी और सेवकका भेद देखो-कुत्ता, टुकड़ा देने वालोंके सामने पूंछको हिलाता है, उसके चरणोंमें गिरता है, धरती पर लेट कर अपना मुख और पेट दिखाया करता है, परन्तु श्रेष्ठ हाथी तो स्वामीको धीरजसे देखता है, और सौ सौ उपाय करनेसे खाता है ॥ ४२ ॥ किंच,— यज्जीव्यते क्षणमपि प्रथितं मनुष्यै- र्विज्ञानविक्रमयशोभिरभज्यमानम् । तन्नाम जीवितमिह प्रवदन्ति तज्ज्ञाः काकोऽपि जीवति चिराय बलिं च भुङ्क्ते ॥ ४३ ॥ और शास्त्रज्ञान, पराक्रम, तथा यशसे विख्यात होकर जो मनुष्य क्षणभर भी जीते हैं, उसी जीनेको इस दुनियामें पण्डित लोग सफल कहते हैं, और यों तो काकभी बहुत दिन तक जीता है और खुराक खाता है ॥ ४३ ॥ अपरं च,— यो नात्मजे न च गुरौ न च भृत्यवर्गे दीने दयां न कुरुते न च बन्धुवर्गे । किं तस्य जीवितफलेन मनुष्यलोके काकोऽपि जीवति चिराय बलिं च भुङ्क्ते ॥ ४४ ॥ और दूसरा—जो न पुत्र पर, न गुरु पर, न सेवकों पर, और न दीन बांधवों पर दया करता है उसके जीनेके फलसे मनुष्यलोकमें क्या है, और यों तो काकभी बहुत काल तक जीता है और बलि खाता है अर्थात् केवल पेट भरनाही जीवनका फल नहीं है ॥ ४४ ॥
-४७] मनुष्यकी उन्नति और अवनति ९९ अपरमपि, — अहितहितविचारशून्यबुद्धेः श्रुतिसमयैर्बहुभिस्तिरस्कृतस्य । उदरभरणमात्रकेवलेच्छोः पुरुषपशोश्च पशोश्च को विशेषः ?' ॥ ४५ ॥ औरभी-हित और अहितके विचार करनेमें जडमति वाला, और शास्त्रके ज्ञानसे रहित होकर जिसकी इच्छा केवल पेट भरनेकी ही रहती है, ऐसा पुरुषरूपी पशु और सचमुच पशुमें कौनसा अन्तर समझा जा सकता है ? अर्थात् ज्ञानहीन एवं केवल भोजनकी इच्छा रखने वालेसे घास खाकर जीने वाला पशु अच्छा है ॥ ४५ ॥ करटको ब्रूते—'आवां तावदप्रधानौ। तदप्यावयोः किमनया विचारणया ?'। दमनको ब्रूते—'कियता कालेनामात्याः प्रधा- नतामप्रधानतां वा लभन्ते । करटक बोला-'हम दोनों मंत्री नहीं हैं फिर हमें इस विचारसे क्या ?' दमनक बोला-'कुछ कालमें मंत्री प्रधानता वा अप्रधानताको पाते हैं । यतः,— न कस्यचित्कश्चिदिह स्वभावा- द्भवत्युदारोऽभिमतः खलो वा । लोके गुरुत्वं विपरीततां वा स्वचेष्टितान्येव नरं नयन्ति ॥ ४६ ॥ क्योंकि—इस दुनियामें कोई किसीका स्वभावसे अर्थात् जन्मसे सुशील अथ- वा दुष्ट नहीं होता है; परन्तु मनुष्यको अपने कर्मही बड़पनको अथवा नीचपन- को पहुंचाते हैं ॥ ४६ ॥ किंच,— आरोप्यते शिला शैले यत्नेन महता यथा । निपात्यते क्षणेनाधस्तथात्मा गुणदोषयोः ॥ ४७ ॥ और जैसे पर्वत पर बड़े यत्नसे पाषाणकी सिला चढ़ाई जाती है और छिनभ- रमें ढुलका दी जाती है वैसेही मनुष्यके चित्तकी वृत्तिभी गुण और दोषमें लगाई और हटा ली जाती है अर्थात् मनुष्यकी उन्नति कठिनतासे और अवनति सहज- में हो सकती है ॥ ४७ ॥
१०० हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ४८- यात्यधोऽधो व्रजत्युच्चैर्नरः स्वैरेव कर्मभिः । कूपस्य खनिता यद्वत्प्राकारस्येव कारकः ॥ ४८ ॥ मनुष्य अपनेही कर्मोंसे कुएके खोदने वालेके समान नीचे और राजभवनके बनाने वालेके समान ऊपर जाता है; अर्थात् मनुष्य अपना उच्च (अच्छे) कर्मोंसे उन्नतिको और हीन (खराब) कर्मोंसे अवनतिको पाता है ॥ ४८ ॥ तद्भद्रम् । स्वयत्नायत्तो ह्यात्मा सर्वस्य ।' करटको ब्रूते—'अथ भवान्किं ब्रवीति ?' । स आह—'अयं तावत्स्वामी पिङ्गलकः कुतोऽपि कारणात्सचकितः परिवृत्योपविष्टः ।' करटको ब्रूते— 'किं तत्त्वं जानासि ?' । दमनको ब्रूते—'किमत्राविदितमस्ति ? इसलिये यह ठीक है कि सबकी आत्मा अपनेही यत्नके आधीन रहती है।' करटक बोला-'तुम अब क्या कहते हो?' वह बोला-'यह स्वामी पिंगलक किसी न किसी कारणसे घबराया-सा लौट करके आ बैठा है।' करटकने कहा-'क्या तुम इसका भेद जानते हो?' दमनक बोला-'इसमें नहीं जाननेकी क्या बात है ? उक्तं च,— उदीरितोऽर्थः पशुनापि गृह्यते हयाश्च नागाश्च वहन्ति देशिताः । अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः ॥ ४९ ॥ और कहा है—जताए हुए अभिप्रायको पशुभी समझ लेता है और हांके हुए घोड़े और हाथीभी बोझा ढोते हैं। पण्डित कहे बिनाही मनकी बात तर्कसे जान लेता है; क्योंकि पराये चित्तका भेद जान लेनाही बुद्धियोंका फल है ॥ ४९ ॥ आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषणेन च । नेत्रवक्त्रविकारेण लक्ष्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥ ५० ॥ आकारसे, हृदयके भावसे, चालसे, कामसे, बोलनेसे और नेत्र और मुंहके विकारसे, औरोंके मनकी बात जान ली जाती है ॥ ५० ॥ अत्र भयप्रस्तावे प्रज्ञाबलेनाहमेनं स्वामिनमात्मीयं करिष्यामि । इस भयके सुझावमें बुद्धिके बलसे मैं इस स्वामीको अपना कर लूंगा ॥
-५५ ] सेवकका उचित कर्तव्य १०१ यतः,— प्रस्तावसदृशं वाक्यं सद्भावसदृशं प्रियम् । आत्मशक्तिसमं कोपं यो जानाति स पण्डितः' ॥ ५१ ॥ क्योंकि—जो प्रसंगके समान वचनको, स्नेहके सदृश मित्रको और अपनी सामर्थ्यके सदृश क्रोधको समझता है वह बुद्धिमान् है' ॥ ५१ ॥ करटको ब्रूते—'सखे ! त्वं सेवानभिज्ञः । करटक बोला—'मित्र ! तुम सेवा करना नहीं जानते हो । पश्य,— अनाहूतो विशेद्यस्तु अपृष्टो बहु भाषते । आत्मानं मन्यते प्रीतं भूपालस्य स दुर्मतिः' ॥ ५२ ॥ देखो—जो मनुष्य विना बुलाये घुसे, और विना पूछे बहुत बोलता है, और अपनेको राजाका प्रिय मित्र समझता है वह मूर्ख है' ॥ ५२ ॥ दमनको ब्रूते—'भद्र ! कथमहं सेवानभिज्ञः ? दमनक बोला—'भाई ! मैं सेवा करना क्यों नहीं जानता हूं ? पश्य,— किमप्यस्ति स्वभावेन सुन्दरं वाप्यसुन्दरम्। यदेव रोचते यस्मै भवेत्तत्तस्य सुन्दरम् ॥ ५३ ॥ देखो—कोई वस्तु स्वभावसे अच्छी और बुरी होती है, जो जिसको रुचती है वही उसको सुन्दर लगती है ॥ ५३ ॥ यतः,— यस्य यस्य हि यो भावस्तेन तेन हि तं नरम् । अनुप्रविश्य मेधावी क्षिप्रमात्मवशं नयेत् ॥ ५४ ॥ क्योंकि-बुद्धिमान्को चाहिये कि जिस मनुष्यका जैसा मनोरथ होय उसी अभिप्रायको ध्यानमें रख कर एवं उस पुरुषके पेटमें घुस कर उसे अपने वशमें कर ले ॥ ५४ ॥ अन्यच्च,— कोऽत्रेत्यहमिति ब्रूयात्सम्यगादेशयेति च । आज्ञामवितथां कुर्याद्यथाशक्ति महीपतेः ॥ ५५ ॥
१०२ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ५६- और दूसरे-यहां कौन है ? मैं हूं; कृपा कर आज्ञा कीजिये, ऐसा कहना चाहिये और जहां तक हो सके राजाकी आज्ञाको सफल करनी चाहिये ॥ ५५ ॥ अपरं च,- अल्पेच्छुधृतिमान् प्राज्ञश्छायेवानुगतः सदा । आदिष्टो न विकल्पेत स राजवसतो वसेत्' ॥ ५६ ॥ और थोड़ा चाहने वाला, धैर्यवान्, पण्डित तथा सदा छायाके समान पीछे चलने वाला और जो आज्ञा पाने पर सोच विचार न करे, अर्थात् यथार्थरूपसे आज्ञाका पालन करे ऐसा मनुष्य राजाके घरमें रहना चाहिये' ॥ ५६ ॥ करटको ब्रूते—'कदाचित्त्वामनवसरप्रवेशादवमन्यते स्वामी' ! स आह—'अस्त्वेवम् । तथाप्यनुजीविना स्वामिसान्निध्यमवश्यं करणीयम् । करटक बोला-‘जो कभी कुसमय पर घुस जानेसे स्वामी तुम्हारा अनादर करे' ॥ वह बोला-‘ऐसा हो तो भी सेवकको स्वामीके पास अवश्य जाना चाहिये । यतः,— दोषभीतेरनारम्भस्तत्कापुरुषलक्षणम् । कैरजीर्णभयाद्भ्रातर्भोजनं परिहीयते ? ॥ ५७ ॥ क्योंकि—दोषके डरसे किसी कामका आरंभ न करना यह कायर पुरुषका चिन्ह है; हे भाई ! अजीर्णके डरसे कौन भोजनको छोड़ते हैं ? ॥ ५७ ॥ पश्य,— आसन्नमेव नृपतिर्भजते मनुष्यं विद्याविहीनमकुलीनमसंगतं वा । प्रायेण भूमिपतयः प्रमदा लताश्च यः पार्श्वतो वसति तं परिवेष्टयन्ति' ॥ ५८ ॥ देखो-पास रहने वाला कैसाही विद्याहीन, कुलहीन तथा विसंगत मनुष्य क्यों न हो राजा उसीसे हित करने लगता है, क्योंकि राजा, स्त्री और बेल ये बहुधा जो अपने पास रहता है, उसीका आश्रय कर लेते हैं' ॥ ५८ ॥
-६२ ] प्रसन्न या अप्रसन्न स्वामिका चिन्ह १०३ करटको ब्रूते—'अथ तत्र गत्वा किं वक्ष्यति भवान् ?'। स आह—'शृणु । किमनुरक्तो विरक्तो वा मयि स्वामीति ज्ञास्यामि' । करटको ब्रूते—'किं तज्ज्ञानलक्षणम् ?' । करटक बोला-'वहां जा कर क्या कहोगे ?' वह बोला-'सुनो । पहिले यह जानूंगा कि स्वामी मेरे ऊपर प्रसन्न है अथवा उदास है'. करटक बोला-'इस बातको जाननेका क्या चिन्ह है ?' दमनको ब्रूते—'शृणु,— दूरादवेक्षणं हासः संप्रश्नेष्वादरो भृशम् । परोक्षेऽपि गुणश्लाघा स्मरणं प्रियवस्तुषु ॥ ५९ ॥ दमनक बोला-'सुनो,-दूरसे बड़ी अभिलाषासे देख लेना, मुसकाना, समा- चार आदि पूछनेमें अधिक आदर करना, पीठ पीछेभी गुणोंकी बड़ाई करना, प्रिय वस्तुओंमें स्मरण रखना ॥ ५९ ॥ असेवके चानुरक्तिर्दानं सप्रियभाषणम् । अनुरक्तस्य चिह्नानि दोषेऽपि गुणसंग्रहः ॥ ६० ॥ जो सेवक न हो उसमेंभी स्नेह दिखाना, सुन्दर सुन्दर बचनोंके साथ धन आदिका देना और दोषमेंभी गुणोंका ग्रहण करना ये स्नेहयुक्त स्वामिके लक्षण हैं ॥ ६० ॥ अन्यच्च— कालयापनमाशानां वर्धनं फलखण्डनम् । विरक्तेश्वरचिह्नानि जानीयान्मतिमान्नरः ॥ ६१ ॥ और दूसरे-आज कल कह करके, कृपा आदिके करनेमें समय टालना तथा आशाओंका बढ़ाना और जब फलका समय आवे तब उसका खंडन करना ये उदास स्वामीके लक्षण मनुष्यको जानना चाहिये ॥ ६१ ॥ एतज्ज्ञात्वा यथा चायं ममायत्तो भविष्यति तथा करिष्यामि । यह जान कर जैसे यह मेरे बशमें हो जायगा वैसे करूंगा; यतः,— अपायसंदर्शनजां विपत्ति- मुपायसंदर्शनजां च सिद्धिम् । मेधाविनो नीतिविधिप्रयुक्तां पुरः स्फुरन्तीमिव दर्शयन्ति' ॥ ६२ ॥
१०४ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ६३- क्योंकि—पण्डित लोग नीतिशास्त्रमें कही हुई बुराईके होनेसे उत्पन्न हुई विपत्तिको, और उपायसे उत्पन्न हुई सिद्धिको नेत्रोंके सामने साक्षात् झलकती हुईसी देखते हैं ॥ ६२ ॥ करटको ब्रूते—'तथाप्यप्राप्ते प्रस्तावे न वक्तुमर्हसि । करटक बोला—'तो भी बिना अवसरके नहीं कह सकते हो; यतः,— अप्राप्तकालवचनं बृहस्पतिरपि ब्रुवन् । प्राप्नुयाद्बुद्ध्यवज्ञानमपमानं च शाश्वतम्' ॥ ६३ ॥ क्योंकि—बिना अवसरकी बातको कहते हुए बृहस्पतिजीभी बुद्धिकी निन्दा और अनादरको सर्वदा पा सकते हैं ॥ ६३ ॥ दमनको ब्रूते—'मित्र ! मा भैषीः । नाहमप्राप्तावसरं वचनं वदिष्यामि । दमनक बोला—'मित्र ! डरो मत; मैं बिना अवसरकी बात नहीं कहूंगा; यतः,— आपद्युन्मार्गगमने कार्यकालात्ययेषु च । अपृष्टेनापि वक्तव्यं भृत्येन हितमिच्छता ॥ ६४ ॥ क्योंकि—आपत्तिमें, कुमार्ग पर चलनेमें और कार्यका समय टले जानेमें, हित चाहने वाले सेवकको बिना पूछेभी कहना चाहिये ॥ ६४ ॥ यदि च प्राप्तावसरेणापि मया मन्त्रो न वक्तव्यस्तदा मन्त्रित्वमेव ममानुपपन्नम् । और जो अवसर पा कर भी मैं परामर्श (राय) नहीं कहूंगा तो मुझे मंत्रीप- नामी अयोग्य है । यतः,— कल्पयति येन वृत्तिं येन च लोके प्रशस्यते सद्भिः । स गुणस्तेन च गुणिना रक्ष्यः संवर्धनीयश्च ॥ ६५ ॥ क्योंकि—मनुष्य जिस गुणसे आजीविका पाता है और जिस गुणके कारण इस दुनियामें सज्जन उसकी बड़ाई करते हैं, गुणीको ऐसे गुणकी रक्षा करना और बड़े यत्नसे बढ़ाना चाहिये ॥ ६५ ॥
-६६ ] बडे पुरुषको भी छोटीसी चीजकी जरूरी होना १०५ तद्भद्र ! अनुजानीहि माम् । गच्छामि' । करटको ब्रूते- 'शुभ- मस्तु । शिवास्ते पन्थानः । यथाभिलषितमनुष्ठीयताम्' इति । ततो दमनको विस्मित इव पिङ्गलकसमीपं गतः । इसलिये हे शुभचिन्तक ! मुझे आज्ञा दीजिये । मैं जाता हूं ।' करटकने कहा-'कल्याण हो । और तुम्हारे मार्ग विघ्नरहित अर्थात् शुभ हो । अपना मनोरथ पूरा करो !' तब दमनक घबराया-सा पिंगलकके पास गया ॥ अथ दूरादेव सादरं राज्ञा प्रवेशितः साष्टाङ्गप्रणिपातं प्रणि- पत्योपविष्टः । राजाह-'चिराद्दृष्टोऽसि' । दमनको ब्रूते-'यद्यपि मया सेवकेन श्रीमद्देवपादानां १ न किंचित्प्रयोजनमस्ति, तथापि प्राप्तकालमनुजीविना सांनिध्यमवश्यं कर्तव्यमित्यागतोऽस्मि । तब दूरसेही बड़े आदरसे राजाने भीतर आने दिया और वह साष्टांग दंडवत करके बैठ गया । राजा बोला-'बहुत दिनसे दीखे ।' दमनक बोला-'यद्यपि मुझ सेवकसे श्रीमहाराजको कुछ प्रयोजन नहीं है तोभी समय आने पर सेवकको अवश्य पास आना चाहिये, इसलिये आया हूं; किं च,— दन्तस्य निर्घर्षणकेन राजन् ! कर्णस्य कण्डूयनकेन वापि । तृणेन कार्यं भवतीश्वराणां किमङ्गवाक्पाणिमता नरेण ॥ ६६ ॥ और-हे राजा ! दांतके कुरेदनेके लिये तथा कान खुजानेके लिये राजाओंको तुनकेसेभी काम पड़ता है फिर देह, वाणी तथा हाथ वाले मनुष्यसे क्यों नहीं ? अर्थात् अवश्य पड़ताही है ॥ ६६ ॥ यद्यपि चिरेणावधीरितस्य देवपादैर्मे बुद्धिनाशः शङ्क्यते, तदपि न शङ्कनीयम् । यद्यपि बहुत कालसे मुझ अनादर किये गयेकी बुद्धिके नाशकी श्रीमहाराज शंका करते हो सोभी शंका न करनी चाहिये, १ यहां पाद अर्थात् चरणोंका शब्द केवल प्रतिष्ठाके लिये है ।
१०६ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ६७- यतः,- कदर्थितस्यापि च धैर्यवृत्ते- र्बुद्धेर्विनाशो न हि शङ्कनीयः । अधःकृतस्यापि तनूनपातो नाधः शिखा याति कदाचिदेव ॥ ६७ ॥ क्योंकि—अनादरभी किये गये धैर्यवानकी बुद्धिके नाशकी शंका नहीं करनी चाहिये; जैसे नीचेकी ओर की गईभी अग्निकी ज्वाला कभीभी नीचे नहीं जाती है, अर्थात् हमेशा ऊंचीही रहती है ॥ ६७ ॥ देव ! तत्सर्वथा विशेषज्ञेन स्वामिना भवितव्यम् । हे महाराज ! इसलिये सदा स्वामीको विवेकी होना चाहिये, यतः,- मणिर्लुठति पादेषु काचः शिरसि धार्यते । यथैवास्ते तथैवास्तां काचः काचो मणिर्मणिः ॥ ६८ ॥ क्योंकि—मणि चरणोंमें ठुकराता है और कांच शिर पर धारण किया जाता है सो जैसा है वैसा भलेही रहे. कांच कांचही है और मणि मणिही है ॥ ६८ ॥ अन्यच्च,— निर्विशेषो यदा राजा समं सर्वेषु वर्तते । तदोद्यमसमर्थानामुत्साहः परिहीयते ॥ ६९ ॥ और दूसरे—जब राजा सब (लायक और नालायक) के विषयमें समान वर्ताव करता है तब बड़े बड़े कार्यके करनेवाले (पुरुषों)का उत्साह नष्ट हो जाता है ॥ ६९ ॥ किं च,— त्रिविधाः पुरुषा राजन्नुत्तमाधममध्यमाः । नियोजयेत्तथैवैतांस्त्रिविधेष्वेव कर्मसु ॥ ७० ॥ और हे राजा ! उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकारके मनुष्य हैं; उसी प्रकार इन तीन प्रकारके पुरुषोंको तीन प्रकारके ही काममें नियुक्त कर देना चाहिये ॥ ७० ॥ यतः,— स्थान एव नियोज्यन्ते भृत्याश्चाभरणानि च । न हि चडामणिः पादे नूपुरं शिरसा कृतम् ॥ ७१ ॥
-७६ ] राजाको तारतम्यसे ही काम लेनेकी आवश्यकता १०७ क्योंकि सेवक और आभरण योग्य स्थानमें ( जहांके वहां ) लगा दिये जाते हैं, जैसे मुकुट पैरमें और पाजेब शिर पर नहीं पहिनी जाती है ॥ ७१ ॥ अपि च,— कनकभूषणसंग्रहणोचितो यदि मणित्रपुणि प्रणिधीयते । न च विरौति न चापि स शोभते भवति योजयितुर्वचनीयता ॥ ७२ ॥ और भी सुवर्णके आभूषणमें जड़नेके योग्य मणि, जो सीसा आदि धातुके आभूषणमें जड़ दिया जाय तो, वह मणि न तो झनकारता है और न शोभाही देता है किन्तु जड़ियेकी बुराई होती है ॥ ७२ ॥ अन्यच्च,— मुकुटे रोपितः काचश्चरणाभरणे मणिः । न हि दोषो मणेरस्ति किंतु साधोरविज्ञता ॥ ७३ ॥ और दूसरे—जो मुकुटमें कांच जड़ दिया जाय, और चरणके आभूषणमें मणि जड़ दिया जाय तो कुछ मणिकी निन्दा नहीं है पर जड़ियेकी मूर्खता समझी जाती है ॥ ७३ ॥ पश्य,— बुद्धिमाननुरक्तोऽयमयं शूर इतो भयम् । इति भृत्यविचारज्ञो भृत्यैरापूर्यते नृपः ॥ ७४ ॥ देखो—यह बुद्धिमान् है, यह राजभक्त है, यह शूर है, इससे भय है, इस प्रकार सेवकोंके विचारको जानने वाला राजा सेवकोंसे भरा पूरा रहता है ॥ ७४ ॥ तथा हि,— अश्वः शस्त्रं शास्त्रं वीणा वाणी नरश्च नारी च । पुरुषविशेषं प्राप्य हि भवन्ति योग्या अयोग्याश्च ॥ ७५ ॥ और भी कहा है—घोड़ा, शस्त्र, शास्त्र, वीणा, वाणी, मनुष्य और स्त्री ये गुणीके अथवा गुणहीनके पास पहुंचते ही ( उसके संसर्गसे ) योग्य और अयोग्य बन जाते हैं ॥ ७५ ॥ अन्यच्च,— किं भक्तेनासमर्थेन किं शक्तेनापकारिणा ? । भक्तं शक्तं च मां राजन्नावज्ञातुं त्वमर्हसि ॥ ७६ ॥
१०८ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ७७- और दूसरे—असमर्थ भक्तसे अथवा अपकारी समर्थसे क्या प्रयोजन निकलता है ? सो हे राजा ! मेरे समान भक्त और काम करनेमें समर्थका अपमान आपको नहीं करना चाहिये ॥ ७६ ॥ यतः,— अवज्ञानाद्राज्ञो भवति मतिहीनः परिजन- स्ततस्तत्प्रामाण्याद्भवति न समीपे बुधजनः । बुधैस्त्यक्ते राज्ये न हि भवति नीतिर्गुणवती विपन्नायां नीतौ सकलमवशं सीदति जगत् ॥ ७७ ॥ क्योंकि राजाके अपमान करनेसे आपसके ( परिवारी ) लोग बुद्धिहीन हो जाते हैं, पीछे उसके प्रमाणसे ( अर्थात् मेराभी यह अपमान करेगा यह सोच कर ) पण्डितजन उसके पास नहीं आते हैं । पण्डितोंसे छोड़े हुए राज्यमें नीति दोष- रहित नहीं होती है, और नीतिके बिगड़नेसे सब संसार बेवश होकर नष्ट हो जाता है ॥ ७७ ॥ अपरं च,— जनं जनपदा नित्यमर्चयन्ति नृपार्चितम् । नृपेणावमतो यस्तु स सर्वैरवमन्यते ॥ ७८ ॥ और दूसरे—राजासे सन्मान किये हुए मनुष्यकी प्रजा सर्वदा आदर करती है और राजासे अपमान किये गये ( पुरुष ) का सब अपमान करते हैं ॥ ७८ ॥ किं च,— बालादपि ग्रहीतव्यं युक्तमुक्तं मनीषिभिः । रवेरविषये किं न प्रदीपस्य प्रकाशनम् ?' ॥ ७९ ॥ और पण्डितोंको बालकसेभी योग्य बात ग्रहण करनी चाहिये, जैसे सूर्यके नहीं निकलने पर क्या दीपकका उजाला नहीं होता है ? ॥ ७९ ॥ पिङ्गलकोऽवदत्—'भद्र दमनक ! किमेतत् ? त्वमस्मदीयप्रधा- नामात्यपुत्र इयन्तं कालं यावत्कुतोऽपि खलवाक्यान्नागतोऽसि ? इदानीं यथाभिमतं ब्रूहि ।' दमनको ब्रूते—'देव ! पृच्छामि किंचित् । उच्यताम् । उदकार्थी स्वामी पानीयमपीत्वा किमिति विस्मित इव तिष्ठति ?' । पिङ्गलकोऽवदत्—'भद्रमुक्तं त्वया । किंन्त्वेतद्रहस्यं वक्तुं काचिद्विश्वासभूमिर्नास्ति । तथापि निभृतं
-८० ] आवाजसे डरे हुए सिंहकी बयान १०९ कृत्वा कथयामि । शृणु; संप्रति वनमिदमपूर्वसत्त्वाधिष्ठितमतो- ऽस्माकं त्याज्यम् । अनेन हेतुना विस्मितोऽस्मि । तथा च श्रुतो मयापि महानपूर्वशब्दः । शब्दानुरूपेणास्य प्राणिनो महता बलेन भवितव्यम् ।' दमनको ब्रूते- 'देव ! अस्ति तावदयं महान्भयहेतुः स शब्दोऽस्माभिरप्याकर्णितः । किंतु स किंमन्त्री यः प्रथमं भूमि- त्यागं पश्चाद्युद्धं चोपदिशति । अस्मिन्कार्यसंदेहे भृत्यानामुपयोग एक ज्ञातव्यः । पिंगलक बोला-'प्यारे दमनक ! यह क्या बात है ? तू हमारे मुख्य मंत्रीका पुत्र होकर इतने समय तक किसी दुष्टके सिखाये भलायेसे नहीं आया ? अब जो तेरा मनोरथ हो कह दे ।' दमनक बोला-'महाराज ! कुछ पूछता हूं, कहिये । स्वामी प्यासे होकर पानीके विना पिये क्यों घबराये हुएसे बैठे हैं ?' पिङ्गलक बोला-'तूने अच्छी बात पूछी परंतु यह गुप्त बात कहनेके लिये कोई भरोसेका मनुष्य नहीं है । तोभी यहां एकांत होनेसे कहता हूं, सुन; इस बनमें अब एक अपूर्व जीव आ कर बसा है और हमें त्यागना पड़ेगा इस कारण मैं घबराया हुआ-सा हूं और मैंने बड़ा भारी एक अपूर्व शब्दभी सुना है । और शब्दके अनुसार इस प्राणीका बड़ा बल होगा ।' दमनक बोला-'महाराज ! यह तो बड़े भयका कारण है । वह शब्द तो मैंनेभी सुना है परन्तु वह बुरा मंत्री है कि जो पहले धरती छोड़नेका और पीछे लड़नेका उपदेश देता है । इस कामके संदेहमेंही सेवकोंके कार्य करनेकी चतुरता जाननी चाहिये ॥ यतः,- बंधुस्त्रीभृत्यवर्गस्य बुद्धेः सत्त्वस्य चात्मनः । आपन्निकषपाषाणे नरो जानाति सारताम्' ॥ ८० ॥ क्योंकि-बांधव (भाई या संबंधी) स्त्री, सेवक, अपनी बुद्धि और अपना बल इनकी उत्कर्षताको मनुष्य आपित्तरूपी कसौटी पर परीक्षा करता है' ॥ ८० ॥ सिंहो ब्रूते— 'भद्र ! महती शङ्का मां बाधते ।' दमनकः पुनराह स्वगतम्— 'अन्यथा राज्यसुखं परित्यज्य स्थानान्तरं गन्तुं कथं मां संभाषसे ?' । प्रकाशं ब्रूते- 'देव ! यावदहं जीवामि तावद्भयं न कर्तव्यम् । किंतु करटकादयोऽप्याश्वास्यन्तां यस्मादापत्प्रतीकार- काले दुर्लभः पुरुषसमवायः ।'
११० हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ८१- सिंह बोला—'हे शुभचिंतक ! मुझे बड़ी शंका दुःख दे रही है।' फिर दमनक अपने जीमें कहने लगा—'जो यह न होता तो राज्यका सुख छोड़ कर दूसरे स्थानमें जानेके लिये मुझसे क्यों कहते हो?' प्रकट बोला-'महाराज ! जब तक मैं जीता हूं तब तक भय नहीं करना चाहिये, परन्तु करटक आदिकोभी भरोसा दे दीजिये, क्योंकि विपत्तिके प्रतिकार ( उपाय)के समय पुरुषोंका इकट्ठा होना दुर्लभ है।' ततस्तौ दमनककरटकौ राज्ञा सर्वस्वेनापि पूजितौ भयप्रती- कारं प्रतिज्ञाय चलितौ । करटको गच्छन् दमनकमाह—'सखे ! किं शक्यप्रतीकारो भयहेतुरशक्यप्रतीकारो वेति न ज्ञात्वा भयोपशमं प्रतिज्ञाय कथमयं महाप्रसादो गृहीतः ? यतोऽनुप- कुर्वाणो न कस्याप्युपायनं गृह्णीयाद्विशेषतो राज्ञः । तब राजाने तन, मन, और धनसे उन दोनोंका सत्कार किया और वे दोनों दमनक, करटक भयके उपायकी प्रतिज्ञा करके चले । चलते चलते करटकने दमनकसे कहा—'मित्र ! भयके कारणका उपाय होनेके योग्य है अथवा उपाय न होनेके योग्य है यह बिनाही जाने भयके दूर करनेकी प्रतिज्ञा करके कैसे यह महाप्रसाद ( वस्त्र, आभूषण इत्यादि ) लेलिया ? क्योंकि अनुपकारी ( बिना उपाय किये किसी)की भी भेंट नहीं लेनी चाहिये और विशेष करके राजाकी ।' पश्य,— यस्य प्रसादे पद्मास्ते विजयश्च पराक्रमे । मृत्युश्च वसति क्रोधे सर्वतेजोमयो हि सः ॥ ८१ ॥ देखो—जिसकी प्रसन्नतामें लक्ष्मी रहती है, पराक्रममें जय रहता है, और क्रोधमें मृत्यु रहती है, वह ( राजा ) सचमुच तेजस्वी होता है ॥ ८१ ॥ तथा हि,— बालोऽपि नावमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिपः । महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति' ॥ ८२ ॥ और बालक होने पर भी राजाका मनुष्य समझकर अपमान नहीं करना चाहिये, क्योंकि यह मनुष्यके रूपसे स्वयं बड़ी देवता है' ॥ ८२ ॥
-८३ ] अनपेक्षित कार्य करनेका परिणाम १११ दमनको विहस्याह—'मित्र ! तूष्णीमास्यताम् । ज्ञातं मया भय- कारणम् । बलीवर्द्दनर्दितं तत् । वृषभाश्चास्माकमपि भक्ष्याः । किं पुनः सिंहस्य ? ।' करकटको ब्रूते—'यद्येवं तदा किं पुनः स्वामित्रा- सस्तत्रैव किमिति नापनीतः ?' । दमनको ब्रूते—'यदि स्वामित्रा- सस्तत्रैवमुच्यते तदा कथमयं महाप्रसादलाभः स्यात् ? दमनक हंस कर बोला-'मित्र ! तुम चुप बैठे रहो, मैंने भयका कारण जान लिया है । वह बैलका नाद था । और बैल तो हमाराभी भोजन है, फिर सिंहका क्या कहना है ?' करटक बोला—'जो ऐसा ही है तो फिर स्वामीका भय वहांही क्यों नहीं दूर कर दिया ?' दमनकने कहा—'जो स्वामीका भय वहां ऐसे कह देता तो यह सुंदर वस्त्र आभूषणोंका लाभ कैसे होता ? अपरं च,— निरपेक्षो न कर्तव्यो भृत्यैः स्वामी कदाचन । निरपेक्षं प्रभुं कृत्वा भृत्यः स्याद्दधिकर्णवत्' ॥ ८३ ॥ और दूसरे—सेवकोंको चाहिये कि स्वामीको कभी निचला न बैठने दें, अर्थात् कुछ न कुछ झगड़ा लगातेही रहें, क्योंकि सेवक स्वामीको अपेक्षारहित करके दधिकर्ण बिलावके समान मारा जाता है' ॥ ८३ ॥ करटकः पृच्छति—'कथमेतत् ?' । दमनकः कथयति— करकट पूछने लगा—'यह कथा कैसे है ?' दमनक कहने लगा।— कथा ४ [ सिंह, चूहा और बिलावकी कहानी ४ ] 'अस्त्युत्तरापथेऽर्बुदशिखरनाम्नि पर्वते दुर्दान्तो नाम महा- विक्रमः सिंहः । तस्य पर्वतकन्दरमधिशयानस्य केसराग्रं कश्चिन्मू- षिकः प्रत्यहं छिनत्ति । ततः केसराग्रं लूनं दृष्ट्वा कुपितो विवरा- न्तर्गतं मूषिकमलभमानोऽचिन्तयत्— 'उत्तर दिशाके मार्गमें अर्बुदशिखर नाम पर्वत पर दुर्दांत नाम एक बड़ा पराक्रमी सिंह रहता था. उस पर्वतकी कंदरामें सोते हुये सिंहकी लटाके बालोंको एक चूहा नित्य काट जाया करता था, तब लटाओंके छोरको कटा देख क्रोधसे बिलके भीतर घुसे हुये चूहेको नहीं पा कर ( सिंह ) सोचने लगा,—
११२ हितोपदेशः [ सुहृद्भेदः ८४- 'क्षुद्रशत्रुर्भवेद्यस्तु विक्रमान्नैव लभ्यते । तमाहन्तुं पुरस्कार्यः सदृशस्तस्य सैनिकः' ॥ ८४ ॥ 'जो छोटा शत्रु हो और पराक्रमसेभी न मिले तो उसको मारनेके लिये उसके (चाल और बलसे) समान घातक उसके आगे कर देना चाहिये' ॥८४॥ इत्यालोच्य तेन ग्रामं गत्वा विश्वासं कृत्वा दधिकर्णनामा बिडा- लो यत्नेनानीय मांसाहारं दत्त्वा स्वकन्दरे स्थापितः । अनन्तरं तद्भयान्मूषिकोऽपि बिलान्न निःसरति । तेनासौ सिंहोऽक्षत- केसरः सुखं स्वपिति । मूषिकशब्दं यदा यदा शृणोति तदा तदा मांसाहारदानेन तं बिडालं संवर्धयति । यह विचार कर उसने गांवमें जा और भरोसा दे कर दधिकर्ण नाम बिलावको यत्नसे ला मांसका आहार दे कर अपनी गुहामें रख लिया । पीछे उसके भयसे चूहाभी बिलसे नहीं निकलने लगा—कि जिससे यह सिंह बालोंके नहीं कटनेके कारण सुखसे सोने लगा । जब जब चूहेका शब्द सुनता था तब तब मांसके आहारसे उस बिलावको तृप्त करता था ॥ अथैकदा स मूषिकः क्षुधापीडितो बहिः संचरन्बिडालेन प्राप्तो व्यापादितश्च । अनन्तरं स सिंहोऽनेककालं यावन्मूषिकं न पश्यति तत्कृतरावमपि न शृणोति तदा तस्यानुपयोगाद्विडाल- स्याप्याहारदाने मन्दादरो बभूव । ततोऽसावाहारविहारविरहा- दुर्बलो दधिकर्णोऽवसन्नो बभूव । अतोऽहं ब्रवीमि—“निरपेक्षी न कर्तव्यः” इत्यादि' ॥ ततो दमनककरटकौ संजीवकसमीपं गतौ । तत्र करटकस्तरुतले साटोपमुपविष्टः । फिर एक दिन भूखके मारे बाहर फिरते हुए उस चूहेको बिलावने पकड़ लिया और मार डाला । पीछे उस सिंहने बहुत काल तक जब चूहेको न देखा और उसका शब्दभी न सुना तब उसके उपयोगी न होनेसे बिलावके भोजन देनेमेंभी कम आदर करने लगा । फिर, वह दधिकर्ण आहारविहारसे दुर्बल हो कर मर गया । इसलिये मैं कहता हूं-“अपेक्षा रहित नहीं करना चाहिये” इत्यादि'. इसके अनन्तर दमनक और करटक दोनों संजीवकके पास गये । वहां करटक पेड़के नीचे बड़े अहंकारसे बैठ गया ।