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कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)

Kanhadade Prabandha of Kavi Padmanabha with Commentary

by कवि पद्मनाभ (सम्पादक: प्रो. कान्तिलाल बलदेवराम व्यास)

DevanagariHindipublished354 pages

प्रारंभिक पृष्ठ एवं ऐतिहासिक विस्तृत भूमिका

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राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला राजस्थान राज्यद्वारा प्रकाशित सामान्यतः अखिलभारतीय तथा विशेषतः राजस्थानप्रदेशीय पुरातनकालीन संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, राजस्थानी, हिन्दी आदि भाषानिबद्ध विविधवाङ्मयप्रकाशिनी विशिष्ट ग्रन्थावलि * प्रधान संपादक पुरातत्त्वाचार्य जिनविजय मुनि [ ऑनररि मेंबर ऑफ जर्मन ओरिएन्टल सोसाइटी, जर्मनी ] सम्मान्य सदस्य भाण्डारकर प्राच्यविद्या संशोधन मन्दिर, पूना; गुजरात साहित्य सभा, अहमदाबाद; सम्मान्य नियामक ( ऑनररि डायरेक्टर ) - भारतीय विद्याभवन, बंबई; प्रधान संपादक - गुजरात पुरातत्त्व मन्दिर ग्रन्थावली; भारतीय विद्या ग्रन्थावली; सिंघी जैन ग्रन्थमाला; जैनसाहित्यसंशोधक ग्रन्थावली; इत्यादि, इत्यादि ग्रन्थांक ११ कान्हडदे प्रबन्ध ( प्रथम भाग - मूल ग्रन्थ ) प्रकाशक राजस्थान राज्याज्ञानुसार संचालक, राजस्थान पुरातत्त्व मन्दिर जयपुर ( राजस्थान ) * विक्रमाब्द २०१० } राज्यनियमानुसार - सर्वाधिकार सुरक्षित { ख्रिष्टाब्द १९५३ मुद्रक - लक्ष्मीबाई नारायण चौधरी, निर्णयसागर प्रेस, २६-२८ कोलभाट स्ट्रीट, बंबई २.

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कवि पद्मनाभ विरचित कान्हडदे प्रबन्ध विविध पाठभेद, विस्तृत प्रस्तावना, परिशिष्टादि समन्वित संपादक प्रो० कान्तिलाल बलदेवराम व्यास, एम्. ए., पंडित भगवानलाल इन्द्रजी सुवर्णपदक, विश्वनाथ नारायण मण्डलिक सुवर्णपदक, भारतीय विद्याभवन प्रदत्त सुवर्णपदकादि पारितोषिक प्राप्त; फेलो ऑफ धी रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ ग्रेटब्रिटन एन्ड आयरलैन्ड, प्रधानाध्यापक - गुजराती भाषा एवं साहित्य, एल्फिन्स्टन कॉलिज, बंबई प्रकाशक राजस्थान राज्याज्ञानुसार संचालक, राजस्थान पुरातत्त्व मन्दिर जयपुर (राजस्थान) ✱ [ प्रथमावृत्ति - प्रति संख्या १००० ] आषाढ } मूल्य रु. ९-८-० { जुलाई विक्रमाब्द २०१० } १२)२५ { ख्रिस्ताब्द १९५३

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राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला 'संस्कृत-प्राकृत' साहित्य श्रेणिके अन्तर्गत जो ग्रन्थ प्रेसोमें छप रहे हैं उनकी नामावलि १ त्रिपुराभारती लघुस्तव-कर्ता सिद्धसारस्वत लघुपण्डित । २ बालशिक्षा व्याकरण-कर्ता ठाकुर संग्रामसिंह । ३ करुणामृतप्रपा-कर्ता महाकवि ठाकुर सोमेश्वर देव । ४ पदार्थरत्नमञ्जूषा-कर्ता पं. कृष्णमिश्र । ५ शकुनप्रदीप-कर्ता पं. लावण्यशर्मा । ६ उक्तिरत्नाकर-कर्ता पं. साधुसुन्दर गणी । ७ प्राकृतानन्द (प्राकृत व्याकरण)-कर्ता पं. रघुनाथ कवि । ८ ईश्वरविलासकाव्य-कर्ता पं. कृष्णभट्ट । ९ महर्षिकुलवैभव-कर्ता पं. मधुसूदन ओझा विद्यावाचस्पति । १० चक्रपाणिविजय काव्य-कर्ता पं. लक्ष्मीधर भट्ट । ११ काव्यप्रकाशसंकेत- कर्ता भट्ट सोमेश्वर । १२ प्रमाणमञ्जरी (वृत्तिद्वयोपेता)-मूलकर्ता सर्वदेवाचार्य । १३ वृत्तिदीपिका-कर्ता मौनि कृष्णभट्ट । १४ तर्कसंग्रह फक्किका-कर्ता पं. क्षमाकल्याण गणी । १५ राजविनोद काव्य-कर्ता कवि उदयराज । १६ यंत्र- राजरचना-कर्ता महाराजा सवाई जयसिंह । १७ कारकसंबन्धोद्योत-कर्ता पं. रभसनन्दी । १८ शृंगारहारावलि-कर्ता श्रीहर्षकवि १९ कृष्णगीतिकाव्यानि- कर्ता कवि सोमनाथ । २० नृत्तसंग्रह-अज्ञातकविकर्तृक । २१ नृत्यरत्नकोश- कर्ता राजाधिराज कुंभकर्णदेव । २२ नन्दोपाख्यान-अज्ञातविद्वत्कर्तृक । २३ चान्द्रव्याकरण-कर्ता महावैयाकरण चन्द्रगोमी । २४ शब्दरत्नप्रदीप- अज्ञातकर्तृक । २५ रत्नकोश-अज्ञातकर्तृक । २६ कविकौस्तुभ-कर्ता पं. रघुनाथ मनोहर । २७ मणिपरीक्षादि प्रकरण-अज्ञातकर्तृक । २८ सामुद्रकम्-अज्ञात- नामकर्तृक । २९ शतत्रयम्-कर्ता भर्तृहरि (धनसारकृत व्याख्यायुक्त) । 'राजस्थानी-हिन्दी' साहित्यश्रेणिमें प्रकाशित होनेवाले ग्रन्थोंकी नामावलि १ कान्हडदे प्रबन्ध-कर्ता जालोरनिवासी कवि पद्मनाभ । २ गोरा बादल पदमिणी चउपई-कर्ता कवि हेमरतन । ३ वसन्तविलास फागु । ४ कूर्मवंश यशप्रकाश अपर नाम लावारासा-कर्ता कविया गोपालदान । ५ क्याम खां रासा-कर्ता मुस्लिम कवि जान । ६ बांकीदासरी ख्यात । ७ मुंहता नैणसीरी ख्यात । ८ राठोड वंशरी उत्पत्ति । ९ खींची गंगेव नींबावतरो दोपहरौ, राजान राउतरो वातवणाय आदि राजस्थानी वर्णनात्मक रचना । १० दाढाला एकल गिडरी बात । इत्यादि । प्राप्तिस्थान-संचालक राजस्थान पुरातत्त्व मन्दिर, जयपुर (राजस्थान)

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RĀJASTHĀN PURĀTAN GRANTHAMĀLĀ General Editor—Āchārya Jinavijaya Muni, Purātattvāchārya Honorary Director, Rājasthān Purātattva Mandira, Jaipur No. 11 KĀNHAḌADE PRABANDHA OF PADMANĀBHA (VOLUME I—TEXT) Published by The Rājasthān Purātattva Mandira Established by the Government of Rājasthān Jaipur (Rājasthān)

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RĀJASTHĀN PURĀTAN GRANTHAMĀLĀ Published by the Government of Rājasthān A Series devoted to the Publication of Sanskrit, Prākrit, Apabhraṁśa, Old Rājasthānī and Old Hindī works pertaining to India in general and Rājasthān in particular General Editor Āchārya Jina Vijaya Muni, Purātattvāchārya Honorary Member of the German Oriental Society, Bhāṇḍārkar Oriental Research Institute, Poona, and Gujarat Sāhitya Sabhā, Ahmedabad; Honorary Director, Bhāratīya Vidyā Bhavan, Bombay; General Editor, Gujarat Purātattva Mandira Granthāvalī; Bhāratīya Vidyā Series; Singhi Jain Series; etc, etc. No. 11 KĀNHAḌADE PRABANDHA (VOLUME I - TEXT) Published Under the Orders of the Government of Rājasthān by The Director, Rājasthān Purātattva Mandira, Jaipur (Rājasthān) V. S. 2010 All Rights Reserved 1953 A. D.

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KĀNHAḌADE PRABANDHA A Mediaeval Epic Poem in Old Western Rājasthānī OF PADMANĀBHA Critically edited with all Variant Readings, Introduction, Appendices, etc. BY Prof. K. B. Vyas, M. A., Pandit Bhagvānlāl Indrajī Gold Medallist, Vishvanāth Nārāyan Mandalik Gold Medallist, Bhāratīya Vidyā Bhavan Gold Medallist, Fellow of the Royal Asiatic Society of Great Britain and Ireland; Head of the Department of Gujarati Language and Literature, Elphinstone College, Bombay Published Under the Orders of the Government of Rājasthān by The Director, Rājasthān Purātattva Mandira, Jaipur (Rājasthān) V. S. 2010 Rs. 9-8-0 1953 A. D.

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by Prof. K. B. Vyas VASANTA VILĀSA An Old Gujarati Phāgu VASANTA VILĀSA PHĀGU A Further Study VASANTA VILĀSA The Revised, Collated Text DAŚĀVATĀRA CITRA Gujarati Painting in the Seventeenth Century THE EIGHTY-FOUR SUBCASTES OF GUJARATI BRAHMINS THE PṚTHVĪCANDRACARITRA OF MĀṆIKYASUNDARA SŪRI and Its Sources THE VIKRAMĀDITYA PROBLEM : A Fresh Approach THE KṚTA ERA HINDU-MUSLIM AMITY IN EARLY MEDIAEVAL INDIA गुजराती भाषाशास्त्रना विकासनी रूपरेखा भाषा, वृत्त अने काव्यालंकार ❊

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CONTENTS प्रधानसंपादकीय प्रास्ताविक वक्तव्य ३-८ Introduction 1–33 कान्हडदे प्रबन्ध (Text) १-२३४ Appendix I २३६-२४३ Summary of Omissions and Readings common to the different manuscripts Appendix II २४४-२५८ Critical Notes on the Readings adopted in the present edition Appendix III Verse-Index २५९-२७२ Corrigenda २७३-२७४

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प्रधानसंपादकीय प्रास्ताविक वक्तव्य * राजस्थान के सुवर्णसम प्रोज्वल और परम विशुद्ध वीरत्वकी गौरवगाथा गानेवाले, महाकवि पद्मनाभके बनाये हुये राजस्थानी महाकाव्य - कान्हड दे प्रबन्धका, प्रस्तुत संस्करण राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला के ११ वें पुष्प या मणिके रूपमें, राजस्थानी साहित्य और संस्कृतिके सन्मित्र विद्वानोंके करकमलोंमें उपस्थित करते हुये मुझे विशिष्ट आनन्द हो रहा है। राजस्थानके चौहाणकुलशिरोमणि वीर कान्हड दे के, स्वधर्म और स्वदेशकी रक्षाके निमित्त, अनुपम बलिदान करनेकी कीर्तिकथाका, थोडा-बहुत परिचय, भारतीय इतिहासकी प्रायः सभी विशिष्ट पुस्तकोंमें दिया गया मिलता है। वीर कान्हड दे की वीरताको उद्देश्य कर कई आधुनिक लेखकोंने उपन्यास आदिके रूपमें भी कई कथा-कहानियां लिखी हैं। सिनेमा वालोंने इसके विषयमें कोई चित्र तैयार किया है या नहीं इसकी मुझे जानकारी नहीं है। मुसलमानी तवारिखोंमें कई जगह इस वीरके साथ हुई युद्धमयी घटनाओंका उल्लेख मिलता है-परन्तु हिंदुओंके साहित्यमें, केवल प्रस्तुत प्रबन्धके रूपमें ही, एक ऐसी रचना उपलब्ध है जिसके द्वारा हम अपने उस नारायणावतार वीरपुंगवकी कीर्तिकथाका पुण्यश्रवण करने-करानेका सद्भाग्य प्राप्त कर सकते हैं। वीसलनगर नागर ब्राह्मण, महाकवि पद्मनाभ, भारतके एक पुरातन यशोदुर्गका एक सच्चा संरक्षक, उदात्त राष्ट्रप्रेमी, आदर्श राष्ट्रकवि है। वह कवि सचमुच 'पुण्यविवेक' विरुदका धारक था। उसने अपनी कविप्रतिभाके प्रयोगके लिये जिस विषयको पसन्द किया वह वास्तव ही में बडा पुण्य कृत्य था। उसकी 'कविजनरंजनी बुद्धि'ने जिस सत्कविताका सर्जन किया है वह, अन्यान्य हजारों कवियोंकी, लाखों कविताओंसे भी, बढ कर, बहुत उन्नत भाव वाली और बहुत पुण्यदायिनी है। कविको स्वयं इस पुण्य कृतिका अभिमान है। वह स्पष्ट कहता है कि- माइ भारती तणइ पसाइ, अक्षरवंध घट्टिरस थाइ । (४-३४१) माता भारती ही का यह प्रसाद है कि जिसके कारण इस प्रकारके 'अक्षरवन्ध' = काव्य- सर्जन में अपनी बुद्धिका रस रहता है। कविकी यह रचना, कोई क्षुद्र विलासकी या कोई कुत्सित शृंगारकी पोषक, हीन कृति, नहीं है जिसे पढ कर मनुष्यकी मानसिक दुर्बल वृत्तियोंको उत्तेजना प्राप्त हो और जिसके मननसे दुर्विलासकी कुत्सित कामना कुपित हो। यह काव्य तो विशुद्ध धर्मप्रेम, उन्नत राष्ट्रप्रेम, उत्तम सदाचारप्रेम और सात्विक सत्यप्रेमका एक प्रशस्त पुण्य- स्तोत्र है जिसके पढने और सुननेसे, मनुष्यका कल्याण होता है-जीवन पवित्र होता है। और इस लिये इस सत्यकाम कविने, इस प्रबन्धके अन्तमें जो यह कहा है कि- कान्हडचरिय जि को नर भणइ, एक चित्ति जि को नर सुणइ । तीरथफल बोल्युं जेतलुं, पामइ पुण्य सवे तेतलूं ॥ (४-३५१) 'इस कान्हड दे के चरित्रको जो कोई मनुष्य एकचित्त हो कर पढेगा या सुनेगा उसको उन सब तीर्थोंकी यात्रा करने जितना पुण्यफल प्राप्त होगा, जिनका वर्णन ऋषियोंने धर्मग्रन्थोंमें

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प्रस्ताविक वक्तव्य ३ किया - है'। कविका यह कथन सर्वथा सत्यलक्ष्यी है । हमारे प्राचीन साहित्यमें ऐसी रचनायें बहुत विरल हैं । ये रचनायें हमारे महान् राष्ट्रकी - हमारी संसारश्रेष्ठ संस्कृतिकी, सबसे अधिक, अमूल्य निधिरूप हैं । इनके अध्ययन और मननसे हमारे देशकी जनताकी - हमारे राष्ट्रकी भावि संततिकी संस्कारसमृद्धिका विकास होगा । पंडित-कवि पद्मनाभका यह काव्य-प्रबन्ध एक प्रकारसे, प्रायः शुद्ध ऐतिहासिक काव्य है । इसमें वर्णित घटनायें, बहुत अंशमें, इतिहाससमर्थित हैं । कवि उसी स्थानका निवासी है जहां पर प्रबन्ध नायक कान्हड दे ने जन्म लिया, राज्य किया और वह अनुपम आत्मोत्सर्ग किया । अर्थात् कविका कविता-सर्जन उसी जालोर नगरमें हुआ जो कान्हड दे की राजधानी था । कविको इस काव्यकी रचनामें प्रेरणा करने वाला उसी चहुआन वीरका सीधा राजवंशज है, जो कान्हड दे से केवल ५ वीं पीढ़ीमें उसके राज्यसिंहासनका, शायद अन्तिम, उत्तराधिकारी था । इसका नाम अखयराज सोनगरा था । कविके कथनानुसार यह बड़ा धर्मात्मा, सदाचारी, दानशील, और ईश्वरभक्त था । इसके सद्गुणोंका संक्षेपमें वर्णन करता हुआ कवि कहता है कि - अखइराज उत्तम अवतार, जेहनां पुण्य न लामइ पार । जीणइ कीरति कान्हड दे तणी, अखइराजि अजुआली घणी ॥ (४-३३९) 'अखयराज उत्तम अवतारी पुरुष है जिसके पुण्य कृत्योंका कोई पार नहीं है और जिसने [अपने पूर्वज] कान्हड दे की कीर्तिको खूब उजाला है।' मालूम देता है कविके कुलका संबन्ध उस राजघरानेके साथ, वंशानुवंश क्रमसे, चला आ रहा था और इस लिये उसने अपने आश्रय- दाता राजवंशके, एक महान् वीरकी कीर्तिकथा इतने उत्साह और इतनी श्रद्धाके साथ गाई है । कवि कहता है कि इस प्रबन्धकी रचना करनेसे अखइराज सीपामण सरी, पदमनाभ कीरति बिस्तरी ॥ (४-३४१) 'एक तो अखयराजकी प्रेरणा सफल हुई और दूसरी पद्मनाभ कविकी कीर्ति फैली ।' कहनेकी आवश्यकता नहीं कि कविकी यह उक्ति कितनी यथार्थ है । हमने ऊपर, प्रारंभमें, इस प्रबन्धको जो राजस्थानी महाकाव्य कहा है उसके पीछे दो अर्थ लक्षित हैं - एक तो यह कि इस काव्यमें राजस्थानी वीरकी पुनीत गाथा गाई गई है और दूसरा यह कि यह प्राचीन राजस्थानी भाषाकी एक सर्वश्रेष्ठ कृति है । अतः विषय और भाषा दोनों दृष्टिसे यह काव्य राजस्थानी है । इस राजस्थानी विशेषणसे हमारा अभिप्राय उस भाषावैज्ञानिक शास्त्रीय संकेतसे है, जिसकी स्थापना, भारतीय भाषाओंका वैज्ञानिक पद्धतिसे विश्लेषण करने वाले विद्वानोंने की है । यद्यपि हमारे निजी अभिप्रायसे, यह नामाभिधान सर्वथा संगत अर्थ सूचक नहीं है - तथापि जब तक इसके लिये कोई ऐसा अन्य अधिक सार्थक नामनिर्देश विद्वन्मान्य नहीं बनता, तब तक इसका व्यवहार करना समुचित है । हमारे विद्वान् मित्र - गुजरातके सुप्रसिद्ध कवि, लेखक, एवं चिन्तक श्री उमाशंकर जोशीने, इस प्रबन्ध जैसी प्राचीन रचना- ओंकी भाषाको 'मारू-गूर्जर' भाषाका नूतन नामाभिधान सूचित किया है, जो एक प्रकारसे

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अधिक अर्थसंगत हो सकता है; परंतु इसके विषयमें जब तक अन्यान्य विद्वान् साधक-बाधक भाव वाले विशेष विचार उपस्थित नहीं करते और उन पर उचित ऊहापोह नहीं किया जाता, तब तक इस बारेमें कोई सिद्धान्त स्थिर नहीं किया जा सकता। हमें यहां पर यह विचार इस लिये प्रदर्शित करना आवश्यक हुआ कि - प्रस्तुत कान्हड दे प्रबन्ध, आज तक गुजराती भाषाकी एक सर्वमान्य एवं सर्वज्ञात, प्राचीन कृति मानी जा रही है और गुजराती भाषाके इतिहासमें इसको एक विशिष्ट स्थान दिया जाता है - तब हम यहां पर इसे एक 'राजस्थानी महाकाव्य' किस अभिप्रायसे कह रहे हैं। वास्तविकता तो यह है कि प्रस्तुत काव्यके जैसी भाषारचनायें, जिस समयके अंतर्गत निर्मित हुईं, उस समयमें रा ज स्था नी या गु ज रा ती ऐसा भाषा-भेदसूचक कोई नामनिर्धारण नहीं हुआ था। राजस्थानी और गुजराती ये नाम मुगलोंके शासन कालके परिणामसे उत्पन्न हुये हैं। परंतु अब इस नूतन युगकी साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं राजनैतिक आदि सर्व प्रकारकी नूतन परिस्थितियोंके परिणामस्वरूप, राजस्थानी एवं गुजराती इस प्रकारकी भाषा- भेदसूचक और कुछ अंशोंमें संस्कृति-भेद सूचक भी शाब्दिक प्रसिद्धि रूढ हो गई है और उसके फलस्वरूप, आधुनिक गुजरात एवं राजस्थानके नामसे प्रसिद्ध और प्रस्थापित होने वाले प्रदेशोंके निवासियोंके मनमें, संस्कृति, साहित्य और भाषाके इतिहासका अवलोकन और अन्वेषण करनेका दृष्टिकोण भी कितनेक अंशोंमें, भिन्नभावके रूपमें विकसित हो रहा है। पर यह तो परिवर्तित समयकी परिस्थितिका अनिवार्य परिणाम है। इससे हमें व्यग्र या व्यथित होनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। हमें इसमें समंजसताका सूत्र शोधना चाहिये और उसे पकडना चाहिये। भ्रान्तिजनक एवं भेदवर्धक भावोंका निराकरण करना चाहिये। मैं यहां पर प्रस्तुत प्रबन्धको राजस्थानीका काव्य कहना पसन्द करता हूं तो उसका कारण भाषावैज्ञानिकोंने इसमें प्रयुक्त भाषाका वैसा जो शास्त्रीय नाम निश्चित किया है, वह है। हमारे गुजराती साहित्यके इतिहासमें, इसको गुजराती काव्य कहा गया है तो उसका कारण यह है कि जिस समय यह काव्य रचा गया, उस समय, आधुनिक राजस्थान और गुजरातके प्रदेशोंमें भाषा- विषयक कोई खास भिन्नता थी ही नहीं। थोडी-बहुत भिन्नता जो थी, वह केवल राजकीय सीमाओंके संबंधकी दृष्टिसे थी। बाकी सांस्कृतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक दृष्टिसे इन दोनों प्रदेशोंके बीचमें कोई सीमाभेद नहीं था। ये परस्पर एकरूप थे। चालुक्योंकी राजधानी अणहिल- पुरमें बसने वाले लोक जैसी भाषा बोलते थे, प्रायः वैसी ही भाषा, चाहमानोंकी राजधानी अजमेरमें रहने वाले लोक बोलते थे। चाहे उनके स्थानिक उच्चार और वाग्व्यवहारमें कुछ थोडी-बहुत भिन्नता भले ही रहती हो परंतु उनकी साहित्यिक भाषा एवं लिखित भाषा एकसी ही थी। अतः इस ऐतिहासिक तथ्यको लक्ष्य कर, हम इसे गुजराती महाकाव्य भी उतने ही अंशमें कह सकते हैं जितने अंशमें इसे राजस्थानी कहना चाहते हैं। बाकी कवि तो स्वयं इसको केवल 'प्रा कृत ब न्ध' कहता है, जो उस युगमें प्रान्तीय देशभाषाओंके कवियोंमें एक सामान्य रूढि चली आ रही थी। संस्कृतभिन्न

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प्रास्ताविक वक्तव्य ५ देशभाषाओंको, विद्वान् जन या तो सामान्य रूपसे प्राकृत कह कर उल्लिखित करते थे, या फिर काव्यशास्त्रके विवेचकोंने विशेषतया जिसका नाम अपभ्रंश रखा था, लोकभाषाका उसी अपभ्रंश नामसे व्यवहार करते थे । भाषाके कवियोंने तो नहीं लेकिन व्याकरणके विद्वानोंने, इन लोक- भाषाओंको लक्ष्य कर, प्राचीन प्राकृत और तद्भव अपभ्रंश भाषाभेदोंके, जो कुछ नाम निर्दिष्ट किये हैं उनमें एक गौ र्ज र अ प भ्रं श नाम भी मिलता है । इस दृष्टिसे हम इस प्रबन्धकी भाषाको 'गौर्जर अपभ्रंश' भी कहें तो उसमें कोई असंगति नहीं प्रतीत होती । शायद इसी विचारको लक्ष्यमें रख कर, गुजराती भाषाके समर्थ विद्वान् एवं प्रौढ भाषाशास्त्रज्ञ स्व० नरसिंहराव भो० दिवेटियाने प्रस्तुत प्रबन्धकी भाषाको 'प्राचीन गुजराती' भाषा न कह कर 'गूर्जर अपभ्रंश' कहना उचित समझा होगा । इस प्रकार प्रस्तुत प्रबन्धको प्राचीन राजस्थानी, अथवा प्राचीन गुजराती, अथवा तो गूर्जर अपभ्रंश, चाहे जिस भाषाकी रचना कही जाय या मानी जाय । इसमें वाद-विवादका कोई कारण हमें नहीं लगता । वास्तवमें यह रचना समूचे पश्चिम भारतकी 'नूतन-भारत-आर्य -भाषा' कुल की एक प्रतिनिधिरूप और प्रमाणभूत उत्तम साहित्यिक कृति है । अतः इस दृष्टिसे इसका अध्ययन, अवलोकन और अनुशीलन होना आवश्यक है; और इसी विशुद्ध वैज्ञानिक विचारको लक्ष्यमें रख कर, हमने इसे राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला द्वारा प्रकट करना उचित समझा है । ❊ इस प्रबन्धमें, कुछ तो राजस्थान-गुजरातके गौरवमय सुवर्णयुगकी समाप्तिका वह करुण इतिहास अंकित है जिसे पढ कर हम खिन्न होते हैं, उद्विग्न होते हैं और रुदन करते हैं; पर साथ ही में इसमें, उस कराल कलियुगमें भी देवांशी अवतार लेनेवाले ऐसे धीरोदात्त वीर पुरुषोंका आदर्श जीवन चित्रित है जिसे पढ कर हमें रोमांच होता है, गर्व होता है और हर्षाश्रु आते हैं । जिस समयकी घटना का इस काव्यमें वर्णन है वह समय भारतके लिये बडा भयंकर प्रलय- काल-सा था । भारतकी प्राचीन संस्कृति और समृद्धिका सर्वनाश करने वाला वह असाधारण विकराल काल था । उस कालदैत्यके कोपानलसे शताब्दियोंसे संचित और सर्जित भारतकी उस संसार- मोहिनी संस्कृति, समृद्धि, सार्वभौमता और सुरक्षितताका बहुत बडा भाग, कुछ ही क्षणोंमें भस्मीभूत-सा हो गया । पूर्वदेशका पाल-साम्राज्य, मध्यदेशका गाहडवाल साम्राज्य, दिल्ली-लाहोरका तोमर-राज्य, अजमेर-सपादलक्षका चाहमान-राज्य, अणहिलपुरका चालुक्य महाराज्य, अवन्ती- मालवका प्रमार साम्राज्य, एवं दक्षिण-देवगिरिका यादव राज्य-इस प्रकार भारतके पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण जैसे चारों खण्डोंमें, कई शताब्दियोंसे अपनी बलवान् सत्ता जमाये हुये बडे बडे राज्य और उनके शासक राजवंश, इस दुष्ट दावानलकी दुर्देवी ज्वालाओंसे कुछ ही दिनोंके अन्दर, देखते देखते, दग्ध हो गये । अपार समृद्धिसे भरे हुए उनके असंख्य राज्यभण्डार घडियोमें लुट गये । हजारों वर्षोंसे खडे हुए गगनचुंबी और पातालकंपी महान् राजप्रासाद एवं देवमन्दिर थोडी ही पलोंमें शतखण्ड हो हो कर धराशायी हो गये ।

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६ कान्हड दे प्रबन्ध उक्त प्रत्येक देशमेंसे लाखों नर-नारी धर्मभ्रष्ट, गृहविहीन और बन्दी बन गये और लाखों ही अपने प्राणों तकसे मुक्त हो गये । यद्यपि इस कराल कालके सर्जक और प्रतिनिधि स्वरूप उन यमदूतसे आक्रान्ताओंके अनेक इतिहासकारोंने इस प्रलयके विषयकी सत्य-असत्य ऐसी असंख्य घटनायें आलेखित की हैं-परन्तु जिस देश पर, जिस जनता पर, जिस जाति पर, इस प्रकार, उस दुष्ट दानवने अपना दैत्यास्त्र चलाया, उसकी अनन्त सन्तानोंमेंसे शायद ही दो-चार व्यक्तियोंने, ऐसी दो-चार छोटी-बड़ी कृतियोंमें, उक्त कालकथाका कुछ आभास आलेखित किया है । इन्हीं दो-चार व्यक्तियोंमें से, प्रस्तुत प्रबन्धकर्ता कवि पद्मनाभ भी एक है और इसका स्थान उन सबमें प्रथम नहीं तो प्रधान तो अवश्य है । इस देशप्रेमी, जनताप्रेमी, जातिप्रेमी कविने, उक्त कालकथाका जितना संगत, जितना संयत, जितना समुचित वर्णन किया है वैसा शायद अन्य किसी कविने, अन्य किसी कृतिमें नहीं किया । साक्षात् प्रलयसदृश उस क्रूर महाकालके साथ, राजस्थानके एक छोटेसे सुवर्णगिरि दुर्गपर रहनेवाले स्वल्पसंख्यक महावीरोंने और वीरांगनाओंने, कैसा भयंकर अट्टहास किया, उस दुर्धर दानवका कैसा मार्मान्तिक उपहास किया और उसके दुष्ट मनोरथोंको कैसे चूरचूर किया, इसका वास्तविक चित्र कवि पद्मनाभने इस काव्यमें बडी हृदयंगमताके साथ आलेखित किया है । काव्यगत वस्तुका विस्तृत विवेचन यहां अपेक्षित नहीं है । वह तो इसके दूसरे भागमें दिया जायगा । प्रस्तुतमें तो केवल संक्षेपमें काव्यकी उपयोगिता और विशिष्टताका सूचक कुछ परिचय देना ही उद्दिष्ट है । * इस काव्यकी एक हस्तलिखित प्राचीन पोथी, सबसे पहिले, भारतीय संस्कृति, साहित्य और इतिहासके असाधारण प्रेमी एवं अन्वेषक, स्वर्गस्थ महान् जर्मन विद्वान् डॉ. ब्यूल्हरको राजस्थान एवं गुजरातमें प्राचीन ग्रंथोंकी खोज करते समय, सीरोही राज्यके निकट- स्थ एवं उत्तर गुजरातकी सीमा पर बसे हुए, थराद (प्राचीन 'थिरापद्र') नामक गांवके एक प्राचीन जैन ग्रन्थभंडारमें मिली । डॉ० ब्यूल्हरने तुरन्त उसकी उपयोगिता पहचान ली और गुजराती भाषाकी एक विशिष्ट प्राचीन कृति एवं गुजरात-राजस्थानके इतिहासका एक विशिष्ट प्रबन्ध समझ कर, इसको प्रकाशित करनेके लिये, तत्कालीन 'गुजरात शाळा पत्र' नामक मासिक पत्रके संपादक सुप्रसिद्ध गुजराती विद्वान् नवलराम लक्ष्मीराम पंड्याको भेज दी, जिसे उनने अपने मासिकके सन् १८७७-७८ के कई अंकोंमें, क्रमशः प्रकट किया । 'गुजरात शालापत्र' में प्रकाशित यह प्रबन्ध भाषा या पाठशुद्धिकी दृष्टिसे बहुत ही सामान्य कोटिका था । पीछेसे जब कुछ अन्य विद्वानोंने इस ग्रन्थका विशेष अवलोकन किया, तो इसकी कुछ चर्चा होने लगी और इसके अध्ययनकी ओर कुछ आकर्षण बढ़ने लगा । सन् १९१३ में गुजराती साहित्य एवं भाषाके अन्यतर विद्वान्, स्व० डाह्याभाई पी० देरासरीने इस प्रबन्धकी कुछ और हस्तलिखित प्राचीन प्रतियां प्राप्त कर, उनके आधारसे एक अच्छा संस्करण तैयार

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प्रास्ताविक वक्तव्य ७ करनेका प्रयत्न किया और पाठशुद्धिकी दृष्टिके साथ, प्रस्तावना, टिप्पण आदिसे सज्जित कर इसे प्रकट किया । यद्यपि श्रीयुत देरासरी द्वारा संपादित वह संस्करण सामान्यतया अच्छा था, परंतु पाठशुद्धि आदिकी दृष्टिसे जैसा चाहिये वैसा उपयुक्त नहीं था। पिछले कई वर्षोंसे बंबई युनिव- र्सिटीके गुजराती साहित्य विषयक पाठ्यक्रममें इस प्रबन्धका समावेश होता रहा है, अतः इसका पठन-पाठन बढा और विद्यार्थियोंको एवं अध्यापकोंको इसके एक उत्तम एवं शास्त्रीय पद्धतिके मुताबिक संपादित नूतन संस्करणकी आवश्यकता विशेष प्रतीत होने लगी । राजस्थान और गुजरातके कई स्थानोंके ग्रन्थभंडारोंमें इस प्रबन्धकी कुछ और प्राचीन प्रतियोंकी उपलब्धि हुई जिसे देख कर मेरे मनमें यह विचार हुआ कि इसका नूतन संस्करण कोई विद्वान् तैयार करे तो बहुत उपयोगी होगा । कोई सन् १९३९-४० में प्रो० कान्तिलाल व्यासके सम्मुख, प्रसंगवश वार्तालाप करते समय, मैंने अपना यह विचार प्रदर्शित किया; तो इनने बडे उत्साह और आनन्दके साथ, इस कार्यको हाथमें लेनेकी अपनी उत्कंठा प्रकट की और फिर, मैंने भी इसमें मुझसे हो सके वह सहायता करने-करानेका अपना मनोरथ प्रकट किया । उस समय मेरे मनमें था कि यदि अन्य कोई संस्था इसके प्रकाशनका प्रबन्ध न कर सकेगी तो मैं अपनी सिंघी जैन ग्रन्थ माला द्वारा ही इसे प्रकट करनेका प्रयत्न करूंगा । यद्यपि प्रो० व्यासने इसके संपादनका कार्य उसी समयसे प्रारंभ कर दिया था, लेकिन अन्यान्य भण्डारोंमें से प्राचीन प्रतियां प्राप्त करनेमें और उनके पाठान्तर आदि लेनेमें अपेक्षासे बहुत ही अधिक श्रम और समयसाध्य कार्य अनुभूत हुआ । लगभग ११-१२ वर्ष जितने दीर्घ समयमें इसका पाठसंकलन कार्य संपन्न हुआ । इस संकलनमें किस किस प्रकारकी प्राचीन पोथियोंका उपयोग किया गया है, उसका विस्तृत परिचय प्रो० व्यासने अपनी विस्तृत अंग्रेजी भूमिकामें दिया है । सन् १९५० में, राजस्थान सरकारने, राजस्थानकी साहित्यिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक साधन-सामग्रीका अन्वेषण, संग्रह, संरक्षण, संशोधन और प्रकाशन आदि करनेकी दृष्टिसे, परामर्शके लिये मुझे आमंत्रित किया। मेरे सुझाव और प्रस्तावके अनुसार, सरकारने राजस्थान पुरातत्त्व मन्दिर नामक कार्यालयकी स्थापना की और उसका प्रारंभिक संचालन कार्य सम्भालनेके लिये भी मुझे ही आदेश दिया । तदनुसार राजस्थान पुरातत्त्व मन्दिरके जो कार्य चालू किये गये हैं, उनमें एक प्रधान अंगस्वरूप कार्य राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला का प्रकाशन है जिसके द्वारा, विशेष रूपसे, राजस्थानके साथ संबन्ध रखने वाले संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और राजस्थानी-गुजराती, हिन्दी आदि भाषाओंमें रचे गये ग्रन्थोंको, सुयोग्य विद्वानों द्वारा संशोधित-संपादित-अनुवादित आदि करा कर प्रकट करनेका है। प्रो० व्यास द्वारा सुसंपादित प्रस्तुत 'कान्हड दे प्रबन्ध' इस ग्रन्थमालाका एक बहुत उपयुक्त और बहुमूल्य मणि जैसा भूषण स्वरूप होगा, ऐसा सोच कर मैंने इसको, इस ग्रन्थमालामें गुम्फित करनेका अपना अभिप्राय

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८ कान्हड दे प्रबन्ध इनको सूचित किया; तो इनने इसका बडे आदरके साथ स्वीकार किया । इसके फलस्वरूप, प्रायः तीन वर्षके सतत परिश्रमके बाद, इसका मूलग्रन्थ स्वरूप यह प्रथम भाग, आज विद्वानोंके हाथोंमें उपस्थित किया जा रहा है । प्रो० कान्तिलाल व्यास मेरे बहुत ही निकटीभूत मित्रोंमेंसे हैं । इनकी साहित्योपासना बडी लगनवाली है । हाथमें लिये गये कामको ये बडी श्रद्धा और निष्ठा पूर्वक करनेका स्वभाव रखते हैं; और साथमें एक बहुत ही विनम्र शिष्यके रूपमें अपने आपको उपस्थित करते हैं । बंबई राज्यकी सर्वश्रेष्ठ सरकारी कॉलेजके, गुजराती भाषाविभागके, ये प्रधानाध्यापक हैं और प्राचीन गुजराती भाषा, प्राचीन भारतीय इतिहास एवं अन्यान्य विविध संस्कृति विषयक अनेक विषयोंमें, मौलिक अनुशीलन और संशोधन स्वरूप विशिष्ट कोटिका काम करते रहते हैं । अपने अध्ययन-मननके परिणाम स्वरूप कई अच्छे निबन्ध और पुस्तक आदिका इनने प्रणयन किया है जिनका विद्वानोंने अच्छा सत्कार किया है एवं युनिवर्सिटी आदि प्रौढ प्रतिष्ठानोंने उनकी मूल्यवत्ताको उपलक्ष्य कर, इनको सुवर्णचन्द्रकादि जैसे पारितोषिकोंसे सत्कृत किया है । इनका संपादित 'वसन्त विलास' नामक प्राचीन गुजरातीका रसात्मक फागु काव्य विद्वानोंमें बहुत आदरपात्र बना है और कई युनिवर्सिटियोंने, अपने 'नूतन भारतीय भाषा विषयक' पाठ्यक्रममें उसे समाविष्ट किया है । इसी 'वसन्त विलास' की प्रस्तावना लिखते समय हमने इनके विषयमें आशा प्रदर्शित की थी कि-'प्रो० व्यास इस तरह अपना संशोधनकार्य सतत चालू रखेंगे और उसके द्वारा प्राप्त सुंदर फल, समशील विद्वानोंके सम्मुख उपस्थित कर, उनके अभिनन्दन प्राप्त करते रहेंगे ।' हमारी वह शुभाशा, आज प्रस्तुत ग्रन्थके, इस प्रकारके, उत्तम संपादन- रूपमें, अच्छी तरह फलवती हुई देख कर, मुझे और भी विशेष आनन्दका होना स्वाभाविक है और इस लिये मैं आज पुनः, ठीक ११ वर्ष बाद, उसी जयाभ्युदयकारिणी विजयादशमीके मांगलिक दिन (उक्त 'वसन्त विलास फागु' की प्रस्तावना भी मैंने वि. सं. १९९८ के विजयादशमीके दिन लिखी थी) इनको अपना हार्दिक अभिनन्दन देता हूं । विजयादशमी, वि. सं. २०१० } १७, अक्टूबर, १९५३ } मुनि जिनविजय

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INTRODUCTION I The Kānhaḍade Prabandha is perhaps the most valuable treasure in Old Gujarātī or Old Western Rājasthānī, as it is called by Dr. TESSITORI. It is an epic of a glorious age and there is nothing to compare with it either in Old or Modern Gujarātī. It can easily stand comparison with the celebrated Pṛthvīrāja Rāsā in Old Hindi. There are various reasons why the Kānhaḍade Prabandha has attained this unique position. In the first place, it is a text of supreme importance for a study of the development of the Gujarātī language. Composed as early as v. s. 1512, it represents an important landmark in the evolution of the Gujarātī language. It embodies a stage when Gujarātī and Rājasthānī were just beginning to evolve their distinctive characteristics from the common source—the post- Apabhraṁśa. While the morphology and the general character of the language are unmistakeably Gujarātī, its phonology reveals several Rājasthānī traits. It is a rich mine of typical Old Western Rājasthānī words, many of which are rarely met with in other Old Western Rājas- thānī works. Besides being a gifted poet the author was an erudite scholar. His work, therefore, faithfully reproduces the standard form of the language current at the time. This text, fortunately, has been handed down by learned scribes who have taken care to preserve its linguistic peculiarities with great fidelity. The result is that we get from this work a clear picture of the Old Gujarātī language or Old Western Rājasthānī as it prevailed in the middle of the 15th century A. D. And herein lies the value of this work because the works of eminent mediaeval poets like Narasiṁha and Mīrābāī, although belonging approximately to the same age, have considerably suffered in the process of transmission in later times. From the historical point of view, also, the Kānhaḍade Prabandha is without a parallel in the entire Old Western Rājasthānī literature. It is perhaps the only OWR Prabandha that gives an accurate account of historical events. There is hardly any doubt that the poet has drawn at first-hand on court-records and chronicles as well as the current historical traditions of Rājasthān. His references to the contemporary geography of India are always accurate. The value of this work as a source-book of the history of the period, therefore, must be rated very high indeed. Moreover, the work is a mine of information on the social customs and manners *

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2 KĀNHAḌADE PRABANDHA of the period. It is a work of the utmost importance, therefore, to the social historian as well. And lastly, the Kānhaḍade Prabandha can claim a high place of honour as a work of art. It is an epic poem, grand in its design, vigorous in the portrayal of its characters, and masterly in its treatment of the sentiments. The flow of its narrative, punctuated by descriptions—lively, sombre or gay—and its songs filled with a rare lyrical charm, make this work a classic ornament of Old Western Rājasthānī literature. II It was only natural that a work of such outstanding importance should soon attract the attention of scholars. Dr. BÜHLER, the well- known orientalist, chanced upon a manuscript of this work, preserved in a Jaina Jñāna Bhaṇḍāra (manuscript-library) at Tharād, North Gujarāt, during his tour in search of manuscripts of Sanskrit and Prakrit works. He promptly got it copied and sent it to the late Naval

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INTRODUCTION 3 (4) the ᴍꜱ (dated v. s. 1930), which Dr. BÜHLER got copied and sent to Navalrām (designated as घ); (5) a recent ᴍꜱ containing the first 150 verses of the Kānhaḍade Prabandha, copied out by some cāraṇa (bard) for his personal use (designated as च). Of these ᴍꜱꜱ क and घ are identical, क being printed verbatim from the घ ᴍꜱ. ख and घ both come from Tharād and both have a big common lacuna¹. It can, therefore, be presumed that both are identical, ख representing the original ᴍꜱ from which the copy घ was prepared at the instance of Dr. BUHLER. Of the remaining ᴍꜱꜱ ग represents another manuscript-tradition, while च is fragmentary and is very modern. From these ᴍꜱꜱ DERĀSARĪ prepared his text. But according to the practice then prevalent among Gujarati scholars, when Old Guja- rātī studies were in their infancy, the editor did not base his collation on any

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4 KĀNHADADE PRABANDHA Verses in DEERASARI'S Edition Corresponding Verses in the Present Edition मरण तणि भयि भोजन वार मरण तणइ भयि भोजन बार वांसी चाटुउ धरइ सूआर ॥ बांस चाटवड धरइ सूआर ॥ १-२५ पातसाहनी पहिरामणी पातिसाहनी पहिरामणी तव घरायउ ^1 सिम्भरनु धणी ॥ उगराहह सिंबरिनउ धणी ॥ १-३० पाला पति पटावत काहर पाला पलइ पटायत काहर भोइ नव लभि पार ॥ भोई नइ घलवाल ॥ १-४२ आगलि थिको वागडू सावज आगलि थिकी वागहू साविज बाटि नाठां जाइ । वेडई नाठो जाइ । विसमी भूमि लीह विहू दिसि विसमी भूमि लेहें देसाउत हुटी भाटां धाइ ॥ निहूं दिसि घाटो धाइ ॥ १-४९ आगइ अन्न वंग संू बीतुं आगइ अन्न वरासउ बीतउ छयल

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छह सही" Wait, "लूणकरण माल्हण छह सही" - yes!

Pair 16 Right L2: "छठी फोजइ जइमल जई रही ॥ ३-१८०"

Pair 17 Left L1: "माणिकराय घरि जूथि वार"

Pair 17 Left L2: "देवराज लीधु अवतार ।" (Single danda '।')

Pair 17 Right L1: "माणिकराय घरि चडयी वार"

Pair 17 Right L2: "महीपाल लीधउ अवतार ।" (Single danda '।')

Pair 18 Left L1: "जयतलदे घरि हुं कुंयरी"

Pair 18 Left L2: "सरूपदे नामि अवतरी ॥"

Pair 18 Right L1: "योगादे घरि हू नूंअरी"

Pair 18 Right L2: "सरूपदे नामइ अवतरी ॥ ३-१९९"

Footnotes section: A horizontal line separates the main text from the footnotes. Footnotes: [L..] ¹ पडिउ I₂ [L..] ² तणा भला I₂ [L..] ³ मोल्हणदे I₂ Wait, let's look at footnote 3: "³ मोल्हणदे I₂" or "³ मोल्हणदे I₂"? Yes: "