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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished152 pages

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५

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खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३५ पद-भाष्य क्षयात्पापस्य कर्मणः” (महा० | क्षीण होनेपर पुरुषोंको ज्ञान उत्पन्न शा० २०४।८) इति स्मृतेश्च । | होता है” इस स्मृतिसे भी यही प्रमाणित होता है। इतिशब्दः उपलक्षणत्वप्रदर्श- | [मूल मन्त्रमें] 'इति' शब्द [अन्य साधनोंका] उपलक्षणत्व नार्थः । इति एवमाद्यन्यदपि | प्रदर्शित करनेके लिये है। अर्थात् इसी प्रकार ज्ञानकी उत्पत्ति करने- ज्ञानोत्पत्तेरुपकारकम् “अमानि- | वाले “अमानित्व अदम्भित्व” आदि त्वमदम्भित्वम्” (गीता १३।७) | अन्य साधन भी प्रदर्शित हो जाते हैं। 'प्रतिष्ठा' चरणोंको कहते हैं इत्याद्युपदर्शितं भवति । प्रतिष्ठा | अर्थात् ये चरणोंके समान इसके आधारभूत हैं। जिस प्रकार पुरुष पादौ पादाविवास्याः, तेषु हि | अपने चरणोंपर स्थित होकर व्यापार सत्सु प्रतितिष्ठति ब्रह्मविद्या | करता है उसी प्रकार इन साधनोंके रहते हुए ही ब्रह्मविद्या स्थित और प्रवर्तते, पद्भ्यामिव पुरुषः। | प्रवृत्त होती है। ऋक् आदि चार वेदाश्चत्वारः सर्वाणि चाङ्गानि | वेद और शिक्षा आदि छः अङ्ग [भी प्रतिष्ठा] हैं। कर्म और शिक्षादीनि षट् कर्मज्ञानप्रकाश- | ज्ञानके प्रकाशक होनेके कारण वेदोंको और उनकी रक्षाके कत्वाद्भेदानां तद्रक्षणार्थत्वाद् | कारणभूत होनेसे वेदाङ्गोंको ब्रह्म-विद्याकी प्रतिष्ठा कहा गया है। अङ्गानां प्रतिष्ठात्वम् । अथवा, प्रतिष्ठाशब्दस्य पाद- | अथवा 'प्रतिष्ठा' शब्दकी चरण-रूपसे कल्पना की गयी है; इसलिये रूपकल्पनार्थत्वाद्भेदास्त्वितराणि | वेद उस ब्रह्मविद्याके शिर आदि सर्वाङ्गानि शिरआदीनि । | अन्य सम्पूर्ण अङ्ग हैं। इस पक्षमें अस्मिन् पक्षे शिक्षादीनां वेद- | शिक्षा आदिको वेदका ग्रहण करनेसे ग्रहणेनैव ग्रहणं कृतं प्रत्येत्तव्यम्। | ही ग्रहण किया समझ लेना चाहिये।

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१३६ केनोपनिषद् [ खण्ड ४ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ पद-भाष्य अङ्गिनि हि गृहीतेऽङ्गानि गृहीतानि क्योंकि अङ्गीके अधीन ही अङ्ग होते एव भवन्ति, तदायत्तत्वादङ्गा- हैं इसलिये अङ्गीके गृहीत होनेपर नाम् । उसके अङ्ग भी गृहीत हो ही जाते हैं । सत्यम् आयतनं यत्र तिष्ठत्यु- सत्य आयतन है । जहाँ वह पनिषत् तदायतनम् । सत्यमिति उपनिषद् स्थित होती है वही अमायिता अकौटिल्यं वाङ्मनः- उसका आयतन है । वाणी, मन कायानाम् । तेषु ह्याश्रयति और शरीरकी अमायिकता यानी विद्या ये अमायाविनः साधवः, अकुटिलताका नाम 'सत्य' है । नासुरप्रकृतिषु मायाविषु; "न जो लोग अमायावी और साधु येषु जिह्ममनृतं न माया च" ( शुद्धस्वभाव ) होते हैं उन्हींमें ( प्र० उ० १ । १६ ) इति ब्रह्मविद्या आश्रय लेती है, आसुरी श्रुतेः । तस्मात्सत्यमायतनमिति प्रकृतिवाले मायावियोंमें नहीं, जैसा कल्प्यते । तपआदिषु एव कि "जिनमें कुटिलता, मिथ्या और प्रतिष्ठात्वेन प्राप्तस्य सत्यस्य माया नहीं है" इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध पुनरायतनत्वेन ग्रहणं साधना- होता है । अतः सत्य उसका तिशयत्वज्ञापनार्थम् । "अश्वमेध- आयतन है—ऐसी कल्पना की सहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् । जाती है । तप आदिमें ही प्रतिष्ठा- अश्वमेधसहस्राच्च सत्यमेकं विशि- रूपसे प्राप्त हुए सत्यको फिर ष्यते" ( विष्णुस्मृ० ८ ) इति आयतनरूपसे ग्रहण करना उसका स्मृतेः ॥ ८ ॥ अतिशय साधनत्व प्रदर्शित करनेके लिये है । "सहस्र अश्वमेध और सत्य तराजूमें रखे जानेपर सहस्र अश्वमेधोंकी अपेक्षा अकेला सत्य ही विशेष ठहरता है" इस स्मृतिसे भी यही प्रमाणित होता है ॥ ८ ॥ -------------------❖-------------------

खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३७

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खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३७

ग्रन्थावगाहनका फल यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति ॥ ९ ॥ जो निश्चयपूर्वक इस उपनिषद्‌को इस प्रकार जानता है वह पापको क्षीण करके अनन्त और महान् स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है, प्रतिष्ठित होता है ॥ ९ ॥ पद-भाष्य यो वै एतां ब्रह्मविद्याम् | 'केनेषितम्' इत्यादि वाक्यद्वारा 'केनेषितम्' इत्यादिना यथो- | कही हुई तथा 'ब्रह्म ह देवेभ्यः' क्ताम् एवं महाभागाम् 'ब्रह्म ह | आदि आख्यायिकाद्वारा स्तुत इस देवेभ्यः' इत्यादिना स्तुतां सर्व- | महाभागा और सम्पूर्ण विद्याओंकी विद्याप्रतिष्ठां वेद 'अमृतत्वं | आश्रयभूता ब्रह्मविद्याको जो पुरुष हि विन्दते' इत्युक्तमपि ब्रह्म- | जानता है वह पापको छोड़कर विद्याफलमन्ते निगमयति— | अर्थात् अविद्या, कामना और | कर्मरूप संसारके बीजको त्यागकर | अनन्त—जिसका कोई पार नहीं | है उस स्वर्गलोकमें अर्थात् सुखरूप वाक्य-भाष्य तामेतां तपआद्यङ्गां तत्प्रतिष्ठां | तप आदि अंगोंवाली और उन्हींपर ब्राह्मीमुपनिषदं सायतनामात्म- | प्रतिष्ठित इस ब्राह्मी उपनिषद्को, जो ज्ञानहेतुभूतामेवं यथावद्यो वेद. | कि आत्मज्ञानकी हेतुभूत है, जो उसके अनुवर्ततेऽनुतिष्ठति; तस्यैतत्फलम् | आयतनके सहित इस प्रकार यथायत् आह—अपहत्य पाप्मानम् अप- | जानता है—जो उसका अनुवर्तन क्षीय धर्माधर्मावित्यर्थः अन- | यानी अनुष्ठान करता है उसके लिये न्तेऽपारेऽविद्यमानान्ते स्वर्गे | यह फल बतलाया गया है। वह पापको लोके सुखप्राये निर्दुःखात्मनि | क्षीण करके अर्थात् धर्म और अधर्मका | क्षय करके जिसका अन्त न हो उस | स्वर्गलोकमें अर्थात् दुःखरहित आनन्द- | प्राय और अनन्त—अपार अर्थात्

१३८ केनोपनिषद् [ खण्ड ४

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१३८ केनोपनिषद् [ खण्ड ४ पद-भाष्य अपहत्य पाप्मानम् अविद्याकाम- | ब्रह्ममें, जो ज्येये—बड़ा अर्थात् कर्मलक्षणं संसारबीजं विधूय | सबसे महान् है उस अपने मुख्य अनन्ते अपर्यन्ते स्वर्गे लोके | आत्मामें स्थित हो जाता है। सुखात्मके ब्रह्मणीत्येतत् । अनन्ते | तात्पर्य यह है कि वह फिर संसार- इति विशेषणान्न त्रिविष्टपे अनन्त- | को प्राप्त नहीं होता । 'अमृतत्वं हि शब्द औपचारिकोडपि स्याद् | विन्दते' इस वाक्यद्वारा पहले इत्यत आह--ज्येये इति । ज्येये | ब्रह्मविद्याका फल कह भी दिया है, ज्यायसि सर्वमहत्तरे स्वात्मनि | तो भी इस वाक्यद्वारा उसका अन्तमें मुख्ये एव प्रतितिष्ठति । न पुनः | फिर उपसंहार करते हैं। 'अनन्त' ऐसा संसारमापद्यत इत्यभिप्रायः ॥९॥ | विशेषण होनेके कारण 'स्वर्गे लोके' से देवलोक नहीं समझना चाहिये; क्योंकि उसमें भी उपचारसे 'अनन्त' शब्दकी प्रवृत्ति हो सकती है इसलिये 'ज्येये' यह विशेषण दिया गया है ॥ ९ ॥ इति चतुर्थः खण्डः ॥ ४ ॥ केनोपनिषत्पदभाष्यम् सम्पूर्णम् वाक्य-भाष्य परे ब्रह्मणि ज्येये महति सर्व- | ज्येष्ठ—महान् यानी सबसे बड़े परब्रह्म- महत्तरे प्रतितिष्ठति सर्ववेदान्तवेद्यं | में प्रतिष्ठित हो जाता है। अर्थात् ब्रह्मात्मत्वेनावगम्य तदेव ब्रह्म | सम्पूर्ण वेदान्तवाक्योंसे वेद्य ब्रह्मको प्रतिपद्यत इत्यर्थः ॥ ९ ॥ | आत्मभावसे जानकर उसी ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥ इति चतुर्थः खण्डः ॥ ४ ॥ केनोपनिषद्वाक्यभाष्यम् सम्पूर्णम्

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शान्तिपाठ

ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिरा- करणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥

समाप्त

केनो० ६—

मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका

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ओंहरिः मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका मन्त्रप्रतीकानि \t खं० \t सं० \t पृ० अथ वायुमब्रुवन्वायवेतत् \t ... \t ३ \t ७ \t ११२ अथाध्यात्मं यदेतत् \t ... \t ४ \t ५ \t १२३ अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन् \t ... \t ३ \t ११ \t ११४ इह चेदवेदीदथ \t ... \t २ \t ५ \t ८४ उपनिषदं भो ब्रूहि \t ... \t ४ \t ७ \t १२८ ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः \t ... \t १ \t १ \t १४ तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत् \t ... \t ३ \t ४ \t १०९ ” \t ... \t ३ \t ८ \t ११२ तद्व तद्वनं नाम \t ... \t ४ \t ६ \t १२६ त ऐक्षन्तास्माकमेवायम् \t ... \t ३ \t २ \t १०५ तस्माद्वा इन्द्रोऽतितराम् \t ... \t ४ \t ३ \t ११९ तस्माद्वा एते देवाः \t ... \t ४ \t २ \t ११८ तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यम् \t ... \t ३ \t ५ \t ११० ” \t ... \t ३ \t ९ \t ११२ तस्मै तृणं निदधौ \t ... \t ३ \t ६ \t १११ ” \t ... \t ३ \t १० \t ११२ तस्यै तपो दमः कर्मेति \t ... \t ४ \t ८ \t १३३ तस्यैष आदेशो यदेतत् \t ... \t ४ \t ४ \t १२० तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेदः \t ... \t ३ \t ३ \t १०९ न तत्र चक्षुर्गच्छति \t ... \t १ \t ३ \t ३१ नाहं मन्ये सुवेदेति \t ... \t २ \t २ \t ६३ प्रतिबोधविदितम् \t ... \t २ \t ४ \t ७३ ब्रह्म ह देवेभ्यः \t ... \t ३ \t १ \t १०४ यच्चक्षुषा न पश्यति \t ... \t १ \t ६ \t ५१ यच्छ्रोत्रेण न शृणोति \t ... \t १ \t ७ \t ५२ यत्प्राणेन न प्राणिति \t ... \t १ \t ८ \t ५२ यदि मन्यसे सुवेदेति \t ... \t २ \t १ \t ५६ यद्वाचानभ्युदितं येन \t ... \t १ \t ४ \t ४५ यन्मनसा न मनुते \t ... \t १ \t ५ \t ४९ यस्यामतं तस्य मतम् \t ... \t २ \t ३ \t ६८ यो वा एतामेवम् \t ... \t ४ \t ९ \t १३७ श्रोत्रस्य श्रोत्रम् \t ... \t १ \t २ \t २० स तस्मिन्नेवाकाशे \t ... \t ३ \t १२ \t ११५ सा ब्रह्मेति होवाच \t ... \t ४ \t १ \t ११७

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कल्याणके पुनर्मुद्रित विशेषाङ्क कल्याण वर्ष | सन् | नाम ८ | १९३४ | शिवाङ्क ९ | १९३५ | शक्ति-अङ्क १० | १९३६ | योगाङ्क १२ | १९३८ | संत-अङ्क १५ | १९४१ | साधनाङ्क १९ | १९४५ | सं० पद्मपुराणाङ्क २१ | १९४७ | सं० मार्कण्डेय-ब्रह्मपुराणाङ्क २२ | १९४८ | नारी-अङ्क २४ | १९५० | हिन्दू-संस्कृति-अङ्क २५ | १९५१ | सं० स्कन्दपुराणाङ्क २६ | १९५२ | भक्त-चरिताङ्क २७ | १९५३ | बालक-अङ्क २८ | १९५४ | सं० नारद-विष्णुपुराणाङ्क ३० | १९५६ | सत्कथा-अङ्क ३१ | १९५७ | तीर्थाङ्क ३४ | १९६० | सं० श्रीमद्देवीभागवताङ्क ३५ | १९६१ | सं० योगवासिष्ठाङ्क ३६ | १९६२ | सं० शिवपुराण ३७ | १९६३ | सं० ब्रह्मवैवर्तपुराणाङ्क ३९ | १९६५ | श्रीभगवन्नाम महिमा | | और प्रार्थना-अङ्क ४३ | १९६९ | परलोक और पुनर्जन्माङ्क ४४-४५ | १९७०-७१ | गर्गसंहिता ४९ | १९७५ | श्रीहनुमान-अङ्क ६७ | १९९३ | शिवोपासनाङ्क

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