BharatKosha
Back to the archive

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished152 pages

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७

Page 105Permalink

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९७

पद-भाष्य

[वक्ष्यमाणा-ख्यायिकायाः प्रयोजनम्]'अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्' इत्यादि-श्रवणाद् यदस्ति तद्विज्ञातं प्रमाणैः यन्नास्ति तदविज्ञातं शशविषाणकल्पमत्यन्तमेवासद्दृष्टम् ; तथेढं ब्रह्माविज्ञातत्वादसदेवेति मन्दबुद्धीनां व्यामोहो मा भूदिति तदर्थेयमाख्यायिका आरभ्यते ।'ब्रह्म जाननेवालोंके लिये अविज्ञात है और न जाननेवालोंके लिये ज्ञात है' इस श्रुतिसे मन्दबुद्धि पुरुषोंको ऐसा भ्रम न हो जाय कि 'जो वस्तु है वह तो प्रमाणोंसे जान ही ली जाती है और जो नहीं है वह अविज्ञात वस्तु तो खरगोशके सींगके समान अत्यन्त अभावरूप ही देखी गयी है, अतः यह ब्रह्म भी अविज्ञात होनेके कारण असत् ही है' इसीलिये यह आख्यायिका आरम्भ की जाती है ।

वाक्य-भाष्य

यदुक्तं संसारिण ईश्वरादनन्या इति; तन्न । पूर्व०—तुमने जो कहा कि संसारी जीवोंका ईश्वरसे अभेद है सो ठीक नहीं।

किं तर्हि ? सिद्धान्ती—तो फिर क्या बात है ?

भेद एव संसार्यात्मनाम् । पूर्व०—संसारी जीव और परमात्माका तो परस्पर भेद ही है।

कस्मात् ? सिद्धान्ती—क्यों ?

लक्षणभेदादश्वमहिषवत् । कथं लक्षणभेद इत्युच्यते—ईश्वरस्य तावन्नित्यं सर्वविषयं ज्ञानं सवितृप्रकाशवत् । तद्विपरीतं संसारिणां खद्योतस्येव । तथैव शक्तिभेदोऽपि । नित्या पूर्व०—घोड़े और भैंसके समान उनके लक्षणोंमें भेद होनेके कारण; और यदि कहो कि उनके लक्षणोंमें किस प्रकार भेद है तो बतलाते हैं [सुनो, ] सूर्यके प्रकाशके समान ईश्वरको सब विषयोंका सर्वदा ज्ञान रहता है, उसके विपरीत संसारी जीवोंको खद्योत (जुगनू) के समान अल्पज्ञान है। इसी प्रकार दोनोंकी शक्तियोंमें भी भेद है । ईश्वरकी शक्ति नित्य

९८ केनोपनिषद् [ खण्ड ३

Page 106Permalink

९८ केनोपनिषद् [ खण्ड ३

पद-भाष्य तदेव हि ब्रह्म सर्वप्रकारेण | वह ब्रह्म ही सब प्रकारसे शासन प्रशास्तृ देवानामति परोदेवः, | करनेवाला, देवताओंका भी परम देव, ईश्वराणामपि परमेश्वरः, दुर्विज्ञेयः, | ईश्वरोंका भी परम ईश्वर, दुर्विज्ञेय देवानां जयहेतुः, असुराणां | तथा देवताओंकी जयका कारण और असुरोंकी पराजयका हेतु है। वाक्य-भाष्य सर्वविषया चेश्वरशक्तिर्विपरीते- | और सर्वतोमुखी है तथा जीवकी तरस्य। कर्म च चित्स्वरूपात्म- | इसके विपरीत है। ईश्वरका कर्म भी सत्तामात्रनिमित्तमीश्वरस्य। औ- | उसके चित्स्वरूपकी सत्तामात्रसे ही होनेवाला है जैसे कि उष्णतारूप ष्ण्यस्वरूपद्रव्यसत्तामात्रनिमित्त- | [सूर्यकान्तमणि आदि] द्रव्योंकी सत्तामात्रसे दहनकार्य निष्पन्न हो जाता दहनकर्मवत् । राजाद्यस्कान्त- | है, अथवा जैसे राजा, चुम्बक और प्रकाशसे होनेवाले कार्य [उनकी प्रकाशकर्मवच्च स्वात्माविक्रिया- | सन्निधिमात्रसे] होते हैं उसी प्रकार ईश्वरके कर्म उसके स्वरूपमें विकार रूपम्। विपरीतमितरस्य। उपासी- | उत्पन्न करनेवाले नहीं हैं, किन्तु जीवके कर्म इससे विपरीत हैं। तेतिवचनादुपास्य ईश्वरो गुरु- | "उपासीत" इस श्रुतिके अनुसार राजवत् । उपासकश्चेतरः | ईश्वर गुरु एवं राजाके समान उपासनीय शिष्यभृत्यवत्। अपहतपाप्मादि- | है तथा जीव शिष्य और सेवकके समान उपासक है। "अपहतपाप्मा" आदि श्रवणान्नित्यशुद्ध ईश्वरः। | श्रुतियोंके अनुसार ईश्वर नित्यशुद्ध है पुण्यो वै पुण्येनेतिवचनाद्विपरीत | तथा "पुण्यो वै पुण्येन" आदि इतरः। | श्रुतिवाक्योंसे जीव इसके विपरीत-स्वभाववाला है। अत एव नित्यमुक्त एवेश्वरो | अतः ईश्वर तो नित्यमुक्त ही है नित्याशुद्धियोगात्संसारीतरः । | किन्तु जीव नित्य अशुद्धिके योगके कारण संसारी है। तथा जहाँ ज्ञानादि अपि च यत्र ज्ञानादिलक्षणभेदः | लक्षणोंमें भेद रहता है वहाँ सर्वदा भेद

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९

Page 107Permalink

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९

पद-भाष्य पराजयहेतुः; तत्कथं नास्तीत्येत- | तब वह है किस प्रकार नहीं ? स्वार्थस्यानुकूलानि ह्युत्तराणि | [ अर्थात् अवश्य ही है ] । इस अर्थके अनुकूल ही इस खण्डके आगेके वचांसि दृश्यन्ते । | वाक्य देखे जाते हैं । वाक्य-भाष्य अस्ति तत्र भेदो दृष्टः; यथाश्व- | ही देखा गया है; जैसे घोड़े और महिषयोः । तथा ज्ञानादिलक्षण- | भैंसमें । अतः इसी प्रकार ज्ञानादि भेदादीश्वरादात्मनां भेदोऽस्तीति | लक्षणोंमें भेद रहनेके कारण ईश्वर और चेत् । | जीवोंमें भेद ही है । न । | सिद्धान्ती—यह बात नहीं है । कस्मात् ? | पूर्व०—कैसे ? "अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति | सिद्धान्ती—क्योंकि "यह (ब्रह्म) न स वेद" (बृ० उ० १।४।१०) | अन्य है और मैं अन्य हूँ—ऐसा जो "ते क्षय्यलोका भवन्ति" (छा० | जानता है वह [ब्रह्मके यथार्थ स्वरूप- उ० ७।२५।२) "मृत्योः स | को] नहीं जानता" "वे नाशवान् मृत्युमाप्नोति" (क० उ० २।१।१०) | लोकोंको प्राप्त होते हैं" "वह मृत्युसे इति भेददृष्टिर्ह्यपोद्यते । एकत्व- | मृत्युको प्राप्त होता है" इत्यादि प्रतिपादिन्यश्च श्रुतयः सहस्रशा | वाक्योंसे भेददृष्टिका निषेध किया जाता विद्यन्ते । | है और एकत्वका प्रतिपादन करने- | वाली तो सहस्रों श्रुतियाँ विद्यमान हैं। यदुक्तं ज्ञानादिलक्षणभेदादि- | तथा तुमने जो कहा कि ज्ञानादि त्यत्रोच्यते—न | लक्षणोंमें भेद होनेके कारण जीव और ज्ञानादिभेदस्य औपाधिकत्वम् | ईश्वरका भेद ही है, सो इस विषयमें अनभ्युपगमात् । | मेरा यह कथन है कि उनमें कुछ भी बुद्ध्यादिभ्यो व्यति- | भेद नहीं है, क्योंकि हमें उनके ज्ञानादि- रिक्ता विलक्षणाश्चेश्वराद्भिन्न- | का भेद मान्य नहीं है। बुद्धि आदि लक्षणा आत्मानो न सन्ति। एक | उपाधियोंसे व्यतिरिक्त और विलक्षण एवेश्वरश्चात्मा सर्वभूतानां | ऐसे कोई जीव नहीं हैं जो ईश्वरसे | भिन्न लक्षणवाले हों। एक ही नित्यमुक्त | ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मा माना

१०० केनोपनिषद् [ खण्ड ३

Page 108Permalink

१०० केनोपनिषद् [ खण्ड ३ पद-भाष्य अथवा ब्रह्मविद्यायाः स्तुतये । | अथवा इस ( आख्यायिका ) कथम् ? ब्रह्मविज्ञानाद्धि अग्न्या- | का आरम्भ ब्रह्मविद्याकी स्तुतिके दयो देवा देवानां श्रेष्ठत्वं जग्मुः । | लिये है । किस प्रकार ? क्योंकि ततोऽप्यतितरामिन्द्र इति । | ब्रह्मज्ञानसे ही अग्नि आदि देवगण | देवताओंमें श्रेष्ठत्वको प्राप्त हुए थे और | उनमें भी इन्द्र सबसे बढ़कर हुआ । वाक्य-भाष्य नित्यमुक्तोऽभ्युपगम्यते । बाह्य- | जाता है; क्योंकि चक्षु और बुद्धि श्चक्षुर्बुद्ध्यादिसमाहारसन्तानाहं- | आदि संघातकी परम्परासे प्राप्त हुए कारममत्वादि विपरीतप्रत्ययप्र- | अहंकार और ममतारूप विपरीत बन्धाविच्छेदलक्षणो नित्यशुद्ध- | ज्ञानका विच्छेद न होना ही जिसका बुद्धमुक्तविज्ञानात्मेश्वरगर्भो नित्य- | लक्षण है, नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त विज्ञानाभासश्चित्तचैत्यबीजबीजि- | विज्ञानस्वरूप ईश्वर ही जिसका स्वभावः कल्पितोऽनित्यविज्ञान | अन्तर्यामी है, जो स्वयं नित्यविज्ञानका ईश्वरलक्षणविपरीतोऽभ्युपगम्यते; | अवभास ( प्रतिबिम्ब ) चित्त, चैत्य यस्याविच्छेदे संसारव्यवहारः | ( सुखादि विषय ), बीज (अविद्यादि) विच्छेदे च मोक्षव्यवहारः । | और बीजी ( शरीरादि ) से तादात्म्यको | प्राप्त होकर तद्रूप हो गया है तथा जो | कल्पित, अनित्य विज्ञानवान् और | ईश्वरके लक्षणसे विपरीत है वही बाह्य | जीव माना गया है; जिसके इस | औपाधिक स्वरूपका विच्छेद न होनेसे | संसारका व्यवहार होता है तथा विच्छेद | हो जानेपर मोक्षव्यवहार होता है । अन्यश्च मृत्प्रलेपवत्प्रत्यक्षप्र- | इसमें जो देव, पितृ और मनुष्यरूप ध्वंसो देवपितृमनुष्यादिलक्षणो | भूतोंका संघातविशेष है वह मृत्तिकाके भूतविशेषसमाहारो न पुनश्चतु- | लेपके समान प्रत्यक्ष नष्ट हो जानेवाला र्थोऽन्यो भिन्नलक्षण ईश्वरादभ्यु- | और [ चेतन आत्मासे ] सर्वथा भिन्न पगम्यते । | है; किन्तु जो [ स्थूल, सूक्ष्म और | कारण तीनों प्रकारके शरीरोंसे ] | विलक्षण चौथा आत्मा है वह ईश्वरसे | भिन्न लक्षणोंवाला नहीं माना जा सकता ।

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१

Page 109Permalink

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०१ ══════════════════════════════════════════════════════════════ पद-भाष्य

मूल संस्कृतहिन्दी अनुवाद
अथवा दुर्विज्ञेयं ब्रह्मेत्येतत्अथवा इससे यह दिखलाया
प्रदर्श्यते—येनाग्न्यादयोऽति-गया है कि ब्रह्म दुर्विज्ञेय है, क्योंकि
तेजसोऽपि क्लेशेनैव ब्रह्म विदित-अग्नि आदि परम तेजस्वी होनेपर
वन्तस्तथेन्द्रो देवानामीश्वरोऽपिभी कठिनतासे ही ब्रह्मको जान
सके थे तथा देवताओंका स्वामी
सन्निति ।होनेपर भी इन्द्रने उसे बड़ी
कठिनतासे पहचाना था ।

वाक्य-भाष्य

मूल संस्कृतहिन्दी अनुवाद
बुद्ध्यादिकल्पितात्मव्यतिरे-यदि कहो कि बुद्धि आदि कल्पित
आत्मासे [ निरुपाधिक चेतनस्वरूप ]
काभिप्रायेण तु लक्षणभेदात्आत्मा भिन्न है इस अभिप्रायसे हमने
'लक्षणभेद होनेके कारण' ऐसा हेतु
इत्याश्रयासिद्धो हेतुः ईश्वरात्दिया है, तो तुम्हारा यह हेतु
आश्रयासिद्ध * है, क्योंकि ईश्वरसे भिन्न
अन्यस्यात्मनोऽसत्त्वात् ।और किसी आत्माकी सत्ता नहीं है ।
ईश्वरस्यैव विरुद्धलक्षणत्वम-पूर्व०—[ यदि ईश्वरसे भिन्न और
कोई आत्मा नहीं है तो ] ईश्वरमें ही
विरुद्धलक्षणत्व तथा सुख-दुःख
युक्तमिति चेत्सुखदुःखादियोगश्च ।आदिका योग होना तो ठीक नहीं है ।
न । निमित्तत्वे सति लोक-सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है क्योंकि
आत्मा सूर्यके समान केवल निमित्तमात्र
विपर्ययाध्यारोपणात्सविट्वत् ।है; लोगोंकी उसमें जो विपरीत बुद्धि है
वह केवल आरोपके कारण है । जिस
यथा हि सविता नित्यप्रकाशरूप-प्रकार सूर्य नित्यप्रकाशस्वरूप होनेके

पादटिप्पणी: * जहाँ पक्षमें पक्षतावच्छेदकका अभाव होता है वहाँ आश्रयासिद्ध हेत्वाभास माना जाता है; जैसे—'आकाशकुसुम सुगन्धिमान् है, कुसुम होनेके कारण, अन्यकुसुमवत्, इस अनुमानमें 'आकाशकुसुम' जो पक्ष है उसमें पक्षतावच्छेदकाल यानी कुसुमत्वका अभाव है, क्योंकि आकाशकुसुम कभी किसीने नहीं देखा । इसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये ।

Page 110Permalink

१०२ केनोपनिषद् [ खण्ड ३ ꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤꕤ पद-भाष्य वक्ष्यमाणोपनिषद्विधिपरं वा | अथवा आगे कही जानेवाली सर्वं ब्रह्मविद्याव्यतिरेकेण प्राणिनां | समस्त उपनिषद् विधिपरक है। कर्तृत्वभोक्तृत्वाद्यभिमानो मिथ्या | और ब्रह्मविद्यासे अतिरिक्त प्राणियों- | का जो कर्तृत्व-भोक्तृत्वादिका अभि- वाक्य-भाष्य त्वाल्लोकाभिव्यक्त्यनभिव्यक्ति- | कारण लौकिक पदार्थोंकी अभिव्यक्ति निमित्तत्वे सति लोकदृष्टिविपर्य- | और अनभिव्यक्तिका निमित्तमात्र होता येणोदयास्तमयाहोरात्रादिकर्तृ- | है तथापि लोकोंकी दृष्टिमें विपरीत त्वाध्यारोपभाग्भवत्येवमीश्वरे | भाव आ जानेके कारण इस अध्यारोप- नित्यविज्ञानशक्तिरूपे लोकज्ञाना- | का पात्र बनता है कि वह उदय-अस्त पोहसुखदुःखस्मृत्यादिनिमित्तत्वे | और दिन-रात्रि आदिका कर्ता है, उसी सति लोकविपरीतबुद्ध्याध्यारो- | प्रकार नित्यविज्ञानशक्तिस्वरूप ईश्वरमें पितं विपरीतलक्षणत्वं सुख- | भी लोकोंके ज्ञानका विनाश तथा सुख, दुःखाश्रयश्च न स्वतः। | दुःख और स्मृति आदिकी निमित्तता आत्मदृष्ट्यनुरूपाध्यारोपाच्च। | उपस्थित होनेपर लोकोंकी विपरीत यथा घनादिविप्रकीर्णेऽम्बरे येनैव | बुद्धिसे विपरीतलक्षणत्व तथा सुख- सवितृप्रकाशो न दृश्यते स | दुःखाश्रयत्वका आरोप कर लिया आत्मदृष्ट्यनुरूपमेवाध्यस्यति | जाता है, उसमें स्वतः ऐसा कोई भाव सवितेदानीमिह न प्रकाशयतीति | नहीं है। सत्येव प्रकाशेऽन्यत्र भ्रान्त्या। | इसके सिवा सभी जीव अपनी- | अपनी दृष्टिके अनुरूप ही उसमें | आरोप करते हैं [ इसलिये भी वह उन | सब आरोपोंसे अछूता है]। जिस प्रकार | आकाशके मेघ आदिसे आच्छादित हो | जानेपर जिस-जिसको सूर्यका प्रकाश | दिखलायी नहीं देता वही-वही अन्यत्र | प्रकाश रहनेपर भी भ्रान्तिवश अपनी | दृष्टिके अनुसार ऐसा आरोप करता है | कि 'इस समय यहाँ सूर्य प्रकाशमान | नहीं है।' इसी प्रकार इस आत्मतत्त्वमें

Page 111Permalink

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३ पद-भाष्य इत्येतद्दर्शनार्थं वा आख्यायिका, मान है वह देवताओंके जय आदिके अभिमानके समान मिथ्या यथा देवानां जयाद्यभिमानः है—यह बात दिखानेके लिये ही तद्वदिति । प्रस्तुत आख्यायिका है। वाक्य-भाष्य एवमिह बौद्धादिवृत्त्युद्भववि- भी बुद्धि आदिकी वृत्तियोंके उदय भवाकुलभ्रान्त्याध्यारोपितः सुख- और अस्तसे वैचित्र्यको प्राप्त हुई भ्रान्तिसे आरोपित सुख-दुःखादिका दुःखादियोग उपपद्यते । योग हो सकता है। तत्स्मरणाच्च । तस्यैवेश्वरस्यैव इस विषयमें उसीकी स्मृति भी है हि स्मरणम्—"मत्तः स्मृतिर्ज्ञान- अर्थात् उस ईश्वरके ही स्मृतिवाक्य भी हैं; जैसे—"मुझहीसे प्राणियोंको मपोहनं च" (गीता १५ । १५) स्मृति, ज्ञान और अज्ञान प्राप्त "नादत्ते कस्यचित्पापम्" (गीता होते हैं" "ईश्वर किसीके पापको ५ । १५) इत्यादि । अतो नित्य- स्वीकार नहीं करता" इत्यादि । अतः मुक्त एकस्मिन्सवितरीव लोका- सूर्यके समान एक ही नित्यमुक्त ईश्वरमें विद्याध्यारोपितमीश्वरे संसारि- लोकने अविद्यावश संसारित्वका आरोप कर रखा है, तथा शास्त्रादि प्रमाणों- त्वम् । शास्त्रादिप्रामाण्यादभ्युप- से उसका असंसारित्व जाना गया है; गतमसंसारित्वमित्यविरोध इति। इसलिये इसमें कोई विरोध नहीं है। एतेन प्रत्येकं ज्ञानादिभेदः इससे प्रत्येक जीवके ज्ञानादि भेदका प्रत्युक्तः सौक्ष्म्यचैतन्यसर्वगतत्वा- प्रत्याख्यान हो गया, क्योंकि उन सभीमें सूक्ष्मता, चैतन्य और सर्वगतत्वादि धर्म द्यविशेषे च भेदहेत्वभावात् । समानरूपसे रहनेके कारण भेदके हेतुका अभाव है। यदि उन्हें विकारी माना जाय विक्रियावत्त्वे चानित्यत्वात् । तो वे अनित्य हो जायेंगे । इसके सिवा मुक्तावस्थामें किसीने भी आत्माका मोक्षे च विशेषानभ्युपगमादभ्युप- कोई विशेष भाव नहीं माना, यदि कोई मानेगा तो अनित्यत्वका प्रसंग गमे चानित्यत्वप्रसङ्गात्। अविद्या- उपस्थित हो जायगा। तथा भेद तो वदुपलभ्यत्वाच्च भेदस्य । केवल अविद्यावान्‌को ही उपलब्ध होता

Page 112Permalink

१०४ केनोपनिषद् [ खण्ड ३

देवताओंका गर्व ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त ॥ १ ॥ यह प्रसिद्ध है कि ब्रह्मने देवताओंके लिये विजय प्राप्त की। कहते हैं, उस ब्रह्मकी विजयमें देवताओंने गौरव प्राप्त किया ॥ १ ॥ पद-भाष्य ब्रह्म यथोक्तलक्षणं परं ह किल देवेभ्योऽर्थाय विजिग्ये जयं लब्धवत् देवानामसुरार्णा च | यह प्रसिद्ध है कि उपर्युक्त लक्षणोंवाले परब्रह्मने देवताओंके लिये जय प्राप्त की। अर्थात् देवता और असुरोंके संग्राममें संसारके वाक्य-भाष्य तत्क्षयेऽनुपपत्तिरिति सिद्धम् एकत्वम् । | है, अविद्याका क्षय होनेपर उसकी सिद्धि नहीं होती। अतः [जीव और ईश्वरका] एकत्व ही सिद्ध होता है। तस्माच्छरीरेन्द्रियमनोबुद्धि- | अतः अहंकारके सम्बन्धसे अज्ञानके बीजभूत शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, [बन्धमोक्ष-व्यवस्था] विषयवेदनासन्तानस्य अहङ्कारसम्बन्धादज्ञान-बीजस्य नित्यविज्ञाना-न्यनिमित्तस्यात्मतत्त्वयाथात्म्यवि-ज्ञानाद्विनिवृत्तावज्ञानबीजस्य वि-च्छेद आत्मनो मोक्षसंज्ञा; विपर्यये च बन्धसंज्ञा, स्वरूपापेक्षत्वा-दुभयोः । | विषय और इन्द्रियज्ञानके प्रवाहका, जो नित्यविज्ञानस्वरूप आत्मासे भिन्न किसी अन्य निमित्तसे स्थित है, आत्म-तत्त्वके यथार्थ ज्ञानसे उस निमित्तके निवृत्त हो जानेपर जो अज्ञानके बीजका उच्छेद हो जाना है वही आत्माका मोक्ष कहलाता है और उससे विपरीत-का नाम बन्ध है, क्योंकि वे [बन्ध और मोक्ष] दोनों ही [बुद्ध्यादि उपाधिविशिष्ट] स्वरूपकी अपेक्षासे हैं। ब्रह्म ह इत्यैतिहासार्थः । पुरा किल देवासुरसंग्रामे जगत्स्थिति-परिपिपालयिष्यात्मानुशासनानु-वर्तिभ्यो देवेभ्योऽर्थिभ्योऽर्थाय | 'ब्रह्म ह' इसमें 'ह' ऐतिह्य (इतिहास) का द्योतक है। कहते हैं, पूर्वकालमें देवासुरसंग्राममें ब्रह्मने जगत्-स्थिति (लोक-मर्यादा) की रक्षाके लिये अपनी आज्ञामें चलनेवाले विजयार्थी देवताओंके लिये असुरोंको

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५

Page 113Permalink

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०५ ❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧ पद-भाष्य संग्रामेऽसुराञ्जित्वा जगदराती- | शत्रु तथा ईश्वरकी मर्यादा भङ्ग नीश्वरसेतुभेत्तॄन् देवेभ्यो जयं | करनेवाले असुरोंको जीतकर जगत्- तत्फलं च प्रायच्छज्जगतः स्थेम्ने । | की स्थितिके लिये वह जय और तस्य ह किल ब्रह्मणो विजये | उसका फल देवताओंको दे दिया । देवाः अग्न्यादयः अमहीयन्त | कहते हैं, ब्रह्मकी उस विजयमें अग्नि महिमानं प्राप्तवन्तः ॥ १ ॥ | आदि देवगण महिमाको प्राप्त हुए ॥१॥ ❦❧❧❧❧❧❧❧❧❦ यक्षका प्रादुर्भाव त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति । तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत किमिदं यक्षमिति ॥ २ ॥ उन्होंने सोचा हमारी ही यह विजय है, और हमारी ही यह महिमा है । कहते हैं, वह ब्रह्म देवताओंके अभिप्रायको जान गया और उनके सामने प्रादुर्भूत हुआ । तब देवतालोग [ यक्षरूपमें प्रकट हुए ] उस ब्रह्मको 'यह यक्ष कौन है ?' ऐसा न जान सके ॥ २ ॥ वाक्य-भाष्य विजिग्येऽजैषीदसुरान् । ब्रह्मण | जीत लिया । अर्थात् ब्रह्मकी इच्छारूप इच्छानिमित्तो विजयो देवानां | निमित्तसे देवताओंकी विजय हो बभूवेत्यर्थः । तस्य ह ब्रह्मणो | गयी । ब्रह्मकी उस विजयमें देवताओं- विजये देवा अमहीयन्त । यज्ञा- | को महत्ता प्राप्त हुई । लोककी स्थितिके दिलोकस्थित्यपहारिष्वसुरेषु परा- | हेतुभूत यज्ञादिको नष्ट करनेवाले जितेषु देवा वृद्धिं पूजां वा | असुरोंके पराजित हो जानेपर देवताओं- प्राप्तवन्तः ॥ १ ॥ | ने वृद्धि अथवा खूब सत्कार प्राप्त | किया ॥ १ ॥ ───⊱⊰○⊱⊰─── त ऐक्षन्त इति मिथ्याप्रत्यय- | 'त ऐक्षन्त' इत्यादि शास्त्रवाक्य, | मिथ्याप्रत्ययरूप होनेके कारण त्वाद्धेयत्वख्यापनार्थमाम्नायः । | [ अभिमानका ] हेयत्व प्रतिपादन | करनेके लिये है ।

१०६ केनोपनिषद् [ खण्ड ३

Page 114Permalink

१०६ केनोपनिषद् [ खण्ड ३ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦

पद-भाष्य तदा आत्मसंस्थस्य प्रत्यगात्मन | तत्र, अन्तःकरणमें स्थित, ईश्वरस्य सर्वज्ञस्य सर्वक्रियाफल- | प्रत्यगात्मा, सर्वज्ञ, प्राणियोंके | सम्पूर्ण कर्मफलोंका संयोग कराने- संयोजयितुः प्राणिनां सर्वशक्तेः | वाले, सर्वशक्तिमान् एवं जगत्‌की जगतः स्थितिं चिकीर्षोः अयं | रक्षा करनेके इच्छुक ईश्वरकी ही | यह सम्पूर्ण जय और महिमा है यह जयो महिमा चेत्यजानन्तः ते देवाः | न जानते हुए आत्माको अग्नि ऐक्षन्त ईक्षितवन्तः अग्न्यादि | आदि रूपोंसे परिच्छिन्न माननेवाले स्वरूपपरिच्छिन्नात्मकृतोऽस्माक- | देवता सोचने लगे कि--हमलोगों- | की ही यह विजय हुई है, और इस मेवाय विजयः अस्माकमेवायं | विजयकी फलभूत अग्नित्व, वायुत्व महिमा अग्निर्वाय्विन्द्रत्वादि- | एवं इन्द्रत्वरूप यह महिमा भी | हमारी ही है; अतः हमारे द्वारा ही लक्षणो जयफलभूतोऽस्माभिरनु- | इसका अनुभव किया जाता है; यह भूयते; नास्मत्प्रत्यगात्मभूतेश्वर- | विजय अथवा महिमा हमारे अन्तरात्म- | भूत ईश्वरकी की हुई नहीं है। कृत इति । एवं मिथ्याभिमानेक्षणवतां | इस प्रकार मिथ्या अभिमानसे | विचार करनेवाले उन देवताओंके तत् ह किल एषां मिथ्येक्षणं | इस मिथ्या विचारको ब्रह्मने जान विजज्ञौ विज्ञातवद्ब्रह्म । सर्वेशितृ | लिया, क्योंकि समस्त जीवोंके

वाक्य-भाष्य ईश्वरनिमित्ते विजये स्वसाम- | जो विजय ईश्वरके निमित्तसे प्राप्त | हुई थी उसमें 'यह हमारी सामर्थ्यसे र्थ्यनिमित्तोऽस्माकमेवायं विजयोऽ- | प्राप्त हुई हमारी ही विजय है, हमारी

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७

Page 115Permalink

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०७

पद-भाष्य हि तत् सर्वभूतकरणप्रयोक्तृ- | अन्तःकरणोंका प्रेरक होनेके कारण त्वात् देवानां च मिथ्याज्ञान- | वह सबका साक्षी है । देवताओंके | इस मिथ्या ज्ञानको जानकर 'इस मुपलभ्य मैवासुरवद्देवा मिथ्या- | मिथ्या ज्ञानसे असुरोंकी ही भाँति | देवताओंका भी पराभव न हो जाय' भिमानात्पराभवेयुरिति तदनु- | इस प्रकार उनपर अनुकम्पा करते कम्पया देवान्मिथ्याभिमाना- | हुए यह सोचकर कि 'देवताओंके | मिथ्याज्ञानको निवृत्त करके मैं उन्हें पनोदनेनानुगृह्णीयामिति तेभ्यः | अनुगृहीत करूँ' वह उन देवताओं- देवेभ्यः ह किलार्थाय प्रादुर्बभूव | के लिये प्रादुर्भूत हुआ अर्थात् वाक्य-भाष्य स्माकमेवायं महिमेत्यात्मनो | ही महिमा है' इस प्रकार [ अभिमान जयादि श्रेयोनिमित्तं सर्वात्मा- | करके ] अपनी विजय आदि कल्याणके | हेतुभूत सर्वात्मा सर्वकल्याणास्पद नमात्मस्थं सर्वकल्याणास्पदमी- | आत्मस्थ ईश्वरको ही आत्मभावसे न श्वरमेवात्मत्वेनावुद्ध्य पिण्ड- | जानकर पिण्डमात्रके अभिमानी होकर | उन्होंने जो मिथ्या प्रत्यय कर लिया था मात्राभिमानाः सन्तो यं मिथ्या- | वह केवल पिण्डमात्रसे सम्बन्ध रखने- प्रत्ययं चक्रुस्तस्य पिण्डमात्रविषय- | वाला होनेसे मिथ्या ज्ञानस्वरूप था । | अतः सर्वात्मा ईश्वरके यथार्थ स्वरूपके त्वेन मिथ्याप्रत्ययत्वात्सर्वात्मे- | बोधसे उसका हेयत्व प्रकट करनेके श्वरयाथात्म्यावबोधेन हातव्यता- | लिये ही यह 'तद्वैषाम्' ( वह ब्रह्म उन

Page 116Permalink

१०८ केनोपनिषद् [ खण्ड ३ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 पद-भाष्य स्वयोगमाहात्म्यनिर्मितेनात्यद्भु- | अपनी योगमायाके प्रभावसे सबको तेन विस्मापनीयेन रूपेण देवाना- | विस्मित करनेवाले अति अद्भुतरूपसे मिन्द्रियगोचरे प्रादुर्बभूव प्रादु- | देवताओंकी इन्द्रियोंका विषय होकर र्भूतवत् । तत् प्रादुर्भूतं ब्रह्म | प्रादुर्भूत अर्थात् प्रकट हुआ । उस न व्यजानत नैव विज्ञातवन्तः | प्रकट हुए ब्रह्मको देवतालोग यह देवाः किमिदं यक्षं पूज्यं | न जान सके कि यह यक्ष अर्थात् महद्भूतमिति ॥२॥ | पूजनीय महान् प्राणी कौन है ?॥२॥ ❖❖❖ वाक्य-भाष्य ख्यापनार्थस्तद्धैषामित्याद्याख्या- | देवताओंके अभिप्रायको जान गया) यिकाम्नायः। | आदि आख्यायिकारूप आम्नाय | (शास्त्र) है। तद्ब्रह्म ह किलैषां देवानामभि- | कहते हैं, वह ब्रह्म इन देवताओंके प्रायं मिथ्याहङ्काररूपं विज्ञज्ञौ | मिथ्या अहंकाररूप अभिप्रायको समझ विज्ञातवत् । ज्ञात्वा च मिथ्याभि- | गया—उसे इसका ज्ञान हो गया । मानशातनेन तदनुजिघृक्षया | उसे जानकर उस मिथ्याभिमानके देवेभ्योऽर्थाय तेषामेवेन्द्रियगोचरे | छेदनद्वारा देवताओंपर अनुग्रह करने- नातिदूरे प्रादुर्बभूव । महेश्वर- | की इच्छासे वह देवताओंके ही लिये शक्तिमायोपात्तेनात्यन्ताद्भुतेन | उनकी इन्द्रियोंका विषय होकर उनसे प्रादुर्भूतं किलकेनचिद्रूपविशेषेण। | थोड़ी ही दूरपर प्रकट हुआ। यह तत्किलोपलभमाना अपि देवा | महेश्वरकी मायाशक्तिसे ग्रहण किये हुए न व्यजानत न विज्ञातवन्तः | किसी बड़े ही विचित्र रूपविशेषसे किमिदं यदेतद्यक्षं पूज्यमिति ॥ २॥ | प्रकट हुआ, जिसे देखकर भी देवता | लोग यह न जान सके—न पहचान | सके कि यह यक्ष अर्थात् पूज्य | कौन है ? ॥ २ ॥ ━━━━━━━━━━━━━━━ ❖ ━━━━━━━━━━━━━━━

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९

Page 117Permalink

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९ अग्निकी परीक्षा तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद एतद्विजानीहि किमिदं यक्षमिति तथेति ॥ ३ ॥ उन्होंने अग्निसे कहा—‘हे अग्ने ! इस बातको मालूम करो कि यह यक्ष कौन है ?’ उसने कहा—‘बहुत अच्छा’ ॥ ३ ॥ पद-भाष्य ते तदजानन्तो देवाः सान्त- | उसे न जाननेवाले देवताओंने र्भयास्तद्विजिज्ञासवः अग्निम् | भीतरसे डरते-डरते उसे जाननेकी अग्रगामिनं जातवेदसं सर्वज्ञ- | इच्छासे सत्रसे आगे चलनेवाले कल्पम् अब्रुवन् उक्तवन्तः । हे | सर्वज्ञकल्प जातवेदा अग्निसे कहा— जातवेदः एतद् अस्मद्गोचरस्थं | ‘हे जातवेदः ! हमारे नेत्रोंके सम्मुख यक्षं विजानीहि विशेषतो बुध्य- | स्थित इस यक्षको जानो—विशेष- स्व त्वं नस्तेजस्वी किमेतद्य- | रूपसे मालूम करो कि यह यक्ष क्षमिति ॥ ३ ॥ | कौन है; क्योंकि तुम हम सत्रमें तेजस्वी हो’ ॥ ३ ॥ तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्य- ब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥ ४ ॥ अग्नि उस यक्षके पास गया । उसने अग्निसे पूछा, ‘तू कौन है ?’ उसने कहा, ‘मैं अग्नि हूँ, मैं निश्चय जातवेदा ही हूँ’ ॥ ४ ॥ पद-भाष्य तथा अस्तु इति तद् यक्षम् | तब ‘बहुत अच्छा’ ऐसा कहकर अभि अद्रवत् तत्प्रति गतवा- | अग्नि उस यक्षकी ओर अभिद्रुत नग्निः । तं च गतवन्तं | हुआ अर्थात् उसके पास गया । पिपृच्छिषुं तत्समीपेऽप्रगल्भत्वा- | इस प्रकार गये हुए और धृष्ट न तूष्णींभूतं तद्यक्षम् अभ्यवदद् | होनेके कारण अपने समीप चुपचाप खड़े हुए प्रश्न करनेकी इच्छावाले उस अग्निसे यक्षने कहा—‘तू

११० केनोपनिषद् [ खण्ड ३

Page 118Permalink

११० केनोपनिषद् [ खण्ड ३ पद-भाष्य अग्निं प्रति अभाषत कोऽसीति । | कौन है ?' ब्रह्मके इस प्रकार एवं ब्रह्मणा पृष्टोऽग्निः अब्रवीत्— | पूछनेपर—'मैं अग्नि हूँ—मैं अग्नि अग्निर्वे अग्निनामाहं प्रसिद्धो जात- | नामसे प्रसिद्ध जातवेदा हूँ'— इस वेदा इति च नामद्वयेन प्रसिद्ध- | प्रकार अग्निने दो नामसे प्रसिद्ध तयात्मानं श्लाघयन्निति ॥ ४ ॥ | होनेके कारण अपनी प्रशंसा करते | हुए कहा ॥ ४ ॥ तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदँ सर्वं दहेयं यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ५ ॥ [ फिर यक्षने पूछा— ] 'उस [ जातवेदारूप ] तुझमें सामर्थ्य क्या हैं ?' [ अग्निने कहा— ] 'पृथिवीमें यह जो कुछ है उस सभीको जला सकता हूँ' ॥ ५ ॥ पद-भाष्य एवमुक्तवन्तं ब्रह्मावोचत् | इस प्रकार बोलते हुए उस तस्मिन् एवं प्रसिद्धगुणनामवति | अग्निसे ब्रह्मने कहा—'ऐसे प्रसिद्ध त्वयि किं वीर्यं सामर्थ्यम् इति । | गुण और नामवाले तुझमें क्या सोऽब्रवीद् इदं जगत् सर्वं दहेयं | वीर्य—सामर्थ्य है ?' वह बोला— भस्मीकुर्यां यद् इदं स्थावरादि | 'पृथिवीपर जो यह चराचररूप पृथिव्याम् इति । पृथिव्यामि- | जगत् है इस सबको जला सकता त्युपलक्षणार्थम्, यतोऽन्तरिक्षस्थ- | हूँ—भस्म कर सकता हूँ।' 'पृथिवीमें' मपि दह्यत एवाग्निना ॥ ५ ॥ | यह केवल उपलक्षणके लिये है, | क्योंकि जो वस्तु आकाशमें रहती | है वह भी अग्निसे जल ही | जाती है ॥ ५ ॥

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १११

Page 119Permalink

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १११ तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥ ६ ॥ तब यक्षने उस अग्निके लिये एक तिनका रख दिया और कहा— 'इसे जला' । अग्नि उस तृणके समीप गया, परन्तु अपने सारे वेगसे भी उसे जलानेमें समर्थ नहीं हुआ । वह उसके पाससे ही लौट आया और बोला, 'यह यक्ष कौन है—इस बातको मैं नहीं जान सका' ॥ ६ ॥ पद-भाष्य तस्मै एवमभिमानवते ब्रह्म | इस प्रकार अभिमान करनेवाले तृणं निदधौ पुरोग्रेः स्थापितवत् । | उस अग्निके लिये ब्रह्मने एक तृण ब्रह्मणा 'एतत् तृणमात्रं ममाग्रतः | रखा अर्थात् उसके आगे तृण डाल दह; न चेदसि दग्धुं समर्थः, | दिया । ब्रह्मके ऐसा कहनेपर कि मुञ्च दग्धृत्वाभिमानं सर्वत्र' | 'तू मेरे सामने इस तिनकेको जला; इत्युक्तः तत् तृणम् उपप्रेयाय | यदि तू इसे जलानेमें समर्थ नहीं है तृणसमीपं गतवान् सर्वजवेन | तो सर्वत्र जलानेवाला होनेका सर्वोत्साहकृतेन वेगेन । गत्वा | अभिमान छोड़ दे' वह अपने सारे तत् न शशाक नाशकद्दग्धुम् । | बल अर्थात् उत्साहकृत सम्पूर्ण सः जातवेदाः तृणं दग्धुम- | वेगसे उस तृणके पास गया । शक्तो व्रीडितो हतप्रतिज्ञः तत | किन्तु वहाँ जाकर भी वह उसे एव यक्षादेव तूष्णीं देवान्प्रति | जलानेमें समर्थ न हुआ । निववृते निवृत्तः प्रतिगतवान् न | इस प्रकार उस तिनकेको एतत् यक्षम् अशकं शक्तवानहं | जलानेमें असमर्थ वह अग्नि हतप्रतिज्ञ विज्ञातुं विशेषतः यदेतद्यक्ष- | होनेके कारण लज्जित होकर उस मिति ॥ ६ ॥ | यक्षके पाससे चुपचाप देवताओंके प्रति निवृत्त हुआ—अर्थात् उनके पास लौट आया [और बोला—] 'इस यक्षको मैं विशेषरूपसे ऐसा नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है ?' ॥ ६ ॥

११२ केनोपनिषद् [ खण्ड ३

Page 120Permalink

११२ केनोपनिषद् [ खण्ड ३ वायुकी परीक्षा अथ वायुमब्रुवन्वायवेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति ॥ ७ ॥ तदनन्तर, उन देवताओंने वायुसे कहा—'हे वायो ! इस बातको मालूम करो कि यह यक्ष कौन है?' उसने कहा—'बहुत अच्छा' ॥ ७ ॥ तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीति वायुर्वा अहमस्मीत्य- ब्रवोन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥ ८ ॥ वायु उस यक्षके पास गया, उसने वायुसे पूछा—'तू कौन है?' उसने कहा—'मैं वायु हूँ—मैं निश्चय मातरिश्वा ही हूँ' ॥ ८ ॥ तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदँ सर्वमाददीय यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ९ ॥ [ तत्र यक्षने पूछा—] 'उस [ मातरिश्वारूप ] तुझमें क्या सामर्थ्य है ?' [ वायुने कहा—] 'पृथिवीमें यह जो कुछ है उस सभीको ग्रहण कर सकता हूँ ॥ ९ ॥ तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकादातुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥ १० ॥ तत्र यक्षने उस वायुके लिये एक तिनका रखा और कहा—'इसे ग्रहण कर'। वायु उस तृणके समीप गया । परन्तु अपने सारे वेगसे भी

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३

Page 121Permalink

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३ वह उसे ग्रहण करनेमें समर्थ न हुआ। तब वह उसके पाससे लौट आया और बोला—'यह यक्ष कौन है—इस बातको मैं नहीं जान सका' ॥१०॥ पद-भाष्य अथ अनन्तरं वायुमब्रुवन् | तदनन्तर उन्होंने वायुसे कहा— हे वायो एतद्विजानीहीत्यादि | 'हे वायो ! इसे जानो' इत्यादि सब अर्थ पहलेहीके समान है। समानार्थं पूर्वेण। वानाद्गमना- | [ वायुको ] वान अर्थात् गमन या गन्धग्रहण करनेके कारण 'वायु' द्वन्धनाद्वा वायुः। मातर्यन्त- | कहा जाता है। 'मातरि' अर्थात् रिक्षे श्वयतीति मातरिश्वा। इदं | अन्तरिक्षमें श्वयन (विचरण) करनेके कारण वह 'मातरिश्वा' सर्वमपि आददीय गृह्णीयाम् | है। पृथिवीमें जो कुछ है मैं इस सभीको ग्रहण कर सकता हूँ— यदिदं पृथिव्यामित्यादिसमान- | इत्यादि शेष अर्थ पहलेहीके समान है ॥१०॥ मेव ॥१०॥ वाक्य-भाष्य तद्विज्ञानायाग्निमब्रुवन्। तृण- | देवताओंने उसे जाननेके लिये अग्निसे कहा। अग्नि और वायुके निधानेऽयमभिप्रायोऽत्यन्तसम्भा- | सामने तृण रखनेमें ब्रह्मका यह वितयोरग्निमारुतयोस्तृणदहनादा- | अभिप्राय था कि एक तिनकेको जलाने और ग्रहण करनेमें असमर्थ होनेसे इन नाशकत्यात्मसम्भावना शातिता | अत्यन्त प्रतिष्ठित अग्नि और वायुका आत्माभिमान क्षीण हो जाय ॥३-१०॥ भवेदिति ॥ ३-१० ॥

११४ केनोपनिषद् [ खण्ड ३

Page 122Permalink

११४ केनोपनिषद् [ खण्ड ३

इन्द्रकी नियुक्ति अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति तदभ्यद्रवत्तस्मात्तिरोधधे ॥ ११ ॥ तदनन्तर देवताओंने इन्द्रसे कहा—'मघवन् ! यह यक्ष कौन है—इस बातको मालूम करो।' तब इन्द्र 'बहुत अच्छा' कह उस यक्षके पास गया, किन्तु वह इन्द्रके सामनेसे अन्तर्धान हो गया ॥ ११ ॥ पद-भाष्य अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्विजा- | फिर देवताओंने इन्द्रसे 'हे नीहीत्यादि पूर्ववत् । इन्द्रः | मघवन् ! इसे जानो' इत्यादि पूर्ववत् परमेश्वरो मघवा बलवत्त्वात् | कहा । इन्द्र अर्थात् परमेश्वर, जो तथेति तदभ्यद्रवत् । तस्मात् | बलवान् होनेके कारण 'मघवा' इन्द्रादात्मसमीपं गतात् तद्ब्रह्म | कहा गया है, बहुत अच्छा—ऐसा तिरोधधे तिरोभूतम् । इन्द्रस्ये- | कहकर उसकी ओर चला । अपने न्द्रत्वाभिमानोऽतितरां निरा- | समीप आये हुए उस इन्द्रके सामने- कर्तव्य इत्यतः संवादमात्रमपि | से वह ब्रह्म अन्तर्धान हो गया । नादाद्ब्रह्मेन्द्राय ॥ ११ ॥ | इन्द्रका सबसे बढ़ा हुआ इन्द्रत्वका अभिमान तोड़ना चाहिये— | इसलिये इन्द्रको ब्रह्मने संवादमात्रका भी अवसर नहीं दिया ॥ ११ ॥

वाक्य-भाष्य इन्द्र आदित्यो वज्रभृद्वा ; | इन्द्र आदित्य अथवा वज्रधारी अविरोधात् । इन्द्रोपसर्पणे ब्रह्म | देवराजका नाम है, क्योंकि दोनों ही तिरोधध इत्यत्रायमभिप्रायः— | अर्थोंमें कोई विरोध नहीं है । ब्रह्म जो इन्द्रोऽहमित्यधिकतमोऽभिमानो- | इन्द्रके समीप आते ही अन्तर्धान हो ऽस्य सोऽहमग्न्यादिभिः प्राप्तं | गया इसमें यह अभिप्राय था कि [ब्रह्मने देखा—] इसे 'मैं इन्द्र (देवराज) हूँ' ऐसा सोचकर सबसे अधिक अभिमान है, अतः मेरे साथ अग्नि आदिको जो वाणीका सम्भाषण-

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५

Page 123Permalink

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति दिया गया है:

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५ उमाका प्रादुर्भाव स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमाना- मुमाँहैमवतीं ताँहोवाच किमेतद्यक्षमिति ॥१२॥ वह इन्द्र उसी आकाशमें [ जिसमें कि यक्ष अन्तर्धान हुआ था ] एक अत्यन्त शोभामयी स्त्रीके पास आया और उस सुवर्णभूषणभूषिता [ अथवा हिमालयकी पुत्री ] उमा ( पार्वतीरूपिणी ब्रह्मविद्या ) से बोला— 'यह यक्ष कौन है ?' ॥ १२ ॥ पद-भाष्य तद्यक्षं यस्मिन्नाकाशे आकाश- | वह यक्ष जिस आकाशमें— प्रदेशे आत्मानं दर्शयित्वा तिरो- | आकाशके जिस भागमें अपना दर्शन भूतमिन्द्रश्च ब्रह्मणस्तिरोधान- | देकर तिरोहित हुआ था और उसके काले यस्मिन्नाकाशे आसीत्, | तिरोहित होनेके समय इन्द्र जिस स इन्द्रः तस्मिन्नेव आकाशे | आकाशमें था, वह इन्द्र यह सोचता तस्थौ किं तद्यक्षमिति ध्यायन्; | हुआ कि 'यह यक्ष कौन है ?' उसी न निवृत्तेऽग्न्यादिवत् । | आकाशमें खड़ा रहा । अग्नि आदि- | के समान पीछे नहीं लौटा । वाक्य-भाष्य वाक्सम्भाषणमात्रमप्यनेन न | मात्र भी प्राप्त हो गया था उसके | लिये भी मैं इसे प्राप्त न हो सका— प्राप्तोऽस्मीत्यभिमानं कथं न नाम | ऐसा सोचकर यह किसी तरह अपना जह्यादिति तदनुग्रहायैवान्तर्हितं | अभिमान छोड़ दे । अतः उसपर | कृपा करनेके लिये ही ब्रह्म अन्तर्धान तद्ब्रह्म बभूव ॥ ११ ॥ | हो गया ॥ ११ ॥ स शान्ताभिमान इन्द्रोऽत्यर्थं | इस प्रकार अभिमान शान्त हो ब्रह्म विजिज्ञासुर्यस्मिन्नाकाशे | जानेपर इन्द्र ब्रह्मका अत्यन्त जिज्ञासु ब्रह्मणः प्रादुर्भाव आसीत्तिरोधानं | होकर उसी आकाशमें, जिसमें कि च तस्मिन्नेव स्त्रियमतिरूपिणीं | ब्रह्मका आविर्भाव एवं तिरोभाव हुआ | था, एक अत्यन्त रूपवती स्त्री—

Page 124Permalink

११६           केनोपनिषद्           [ खण्ड ३

पद-भाष्य तस्येन्द्रस्य यक्षे भक्तिं बुद्ध्वा | उस इन्द्रकी यक्षमें भक्ति विद्या उमारूपिणी प्रादुरभूत्स्त्री- | जानकर स्त्रीवेषधारिणी उमारूपा रूपा । स इन्द्रः ताम् उमां | विद्यादेवी प्रकट हुई । वह इन्द्र उस बहुशोभमानाम्—सर्वेषां हि | अत्यन्त शोभामयी हैमवती उमाके शोभमानानां शोभनतमा विद्या, | पास गया । समस्त शोभायमानोंमें तदा बहुशोभमानेति विशेषण- | विद्या ही सबसे अधिक शोभामयी मुपपन्नं भवति; हैमवतीं हेम- | है; इसलिये उसके लिये 'बहु कृताभरणवतीमिव बहुशोभ- | शोभमाना' यह विशेषण उचित ही मानामित्यर्थः; अथवा उमैव | है। हैमवती अर्थात् हेम ( सुवर्ण ) हिमवतो दुहिता हैमवती नित्य- | निर्मित आभूषणोंवालीके समान मेव सर्वज्ञेनेश्वरेण सह वर्तत | अत्यन्त शोभामयी । अथवा हिमवान्- इति ज्ञातुं समर्थेति कृत्वा ताम्— | की कन्या होनेसे उमा ( पार्वती ) उपजगाम इन्द्रस्तां ह उमां किल | ही हैमवती है। वह सर्वदा उस सर्वज्ञ उवाच पप्रच्छ—ब्रूहि किमेतद्दर्श- | ईश्वरके साथ वर्तमान रहती है; अतः यित्वा तिरोभूतं यक्षमिति ॥१२॥ | उसे जाननेमें समर्थ होगी—यह               | सोचकर इन्द्र उसके पास गया,               | और उससे पूछा—'बतलाइये, इस               | प्रकार दर्शन देकर छिप जानेवाला               | यह यक्ष कौन है?' ॥ १२ ॥ इति तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥

वाक्य-भाष्य विद्यामाजगाम । अभिप्रायोद्बोध- | विद्यादेवीके पास आया । ब्रह्मके गुप्त हेतुत्वादुद्रपत्न्युमा हैमवतीव सा | हो जानेके अभिप्रायको प्रकट करनेके शोभमाना विद्यैव । विरूपोऽपि | कारण रुद्रपत्नी हिमालयपुत्री पार्वती- विद्यावान्बहु शोभते ॥ १२ ॥ | के समान शोभामयी यह ब्रह्मविद्या ही               | थी, क्योंकि विद्यावान् पुरुष रूपहीन               | होनेपर भी बहुत शोभा पाता है॥१२॥ इति तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥