केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५
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खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५ उमाका प्रादुर्भाव स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमाना- मुमाँहैमवतीं ताँहोवाच किमेतद्यक्षमिति ॥१२॥ वह इन्द्र उसी आकाशमें [ जिसमें कि यक्ष अन्तर्धान हुआ था ] एक अत्यन्त शोभामयी स्त्रीके पास आया और उस सुवर्णभूषणभूषिता [ अथवा हिमालयकी पुत्री ] उमा ( पार्वतीरूपिणी ब्रह्मविद्या ) से बोला— 'यह यक्ष कौन है ?' ॥ १२ ॥ पद-भाष्य तद्यक्षं यस्मिन्नाकाशे आकाश- | वह यक्ष जिस आकाशमें— प्रदेशे आत्मानं दर्शयित्वा तिरो- | आकाशके जिस भागमें अपना दर्शन भूतमिन्द्रश्च ब्रह्मणस्तिरोधान- | देकर तिरोहित हुआ था और उसके काले यस्मिन्नाकाशे आसीत्, | तिरोहित होनेके समय इन्द्र जिस स इन्द्रः तस्मिन्नेव आकाशे | आकाशमें था, वह इन्द्र यह सोचता तस्थौ किं तद्यक्षमिति ध्यायन्; | हुआ कि 'यह यक्ष कौन है ?' उसी न निवृत्तेऽग्न्यादिवत् । | आकाशमें खड़ा रहा । अग्नि आदि- | के समान पीछे नहीं लौटा । वाक्य-भाष्य वाक्सम्भाषणमात्रमप्यनेन न | मात्र भी प्राप्त हो गया था उसके | लिये भी मैं इसे प्राप्त न हो सका— प्राप्तोऽस्मीत्यभिमानं कथं न नाम | ऐसा सोचकर यह किसी तरह अपना जह्यादिति तदनुग्रहायैवान्तर्हितं | अभिमान छोड़ दे । अतः उसपर | कृपा करनेके लिये ही ब्रह्म अन्तर्धान तद्ब्रह्म बभूव ॥ ११ ॥ | हो गया ॥ ११ ॥ स शान्ताभिमान इन्द्रोऽत्यर्थं | इस प्रकार अभिमान शान्त हो ब्रह्म विजिज्ञासुर्यस्मिन्नाकाशे | जानेपर इन्द्र ब्रह्मका अत्यन्त जिज्ञासु ब्रह्मणः प्रादुर्भाव आसीत्तिरोधानं | होकर उसी आकाशमें, जिसमें कि च तस्मिन्नेव स्त्रियमतिरूपिणीं | ब्रह्मका आविर्भाव एवं तिरोभाव हुआ | था, एक अत्यन्त रूपवती स्त्री—
११६ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
पद-भाष्य तस्येन्द्रस्य यक्षे भक्तिं बुद्ध्वा | उस इन्द्रकी यक्षमें भक्ति विद्या उमारूपिणी प्रादुरभूत्स्त्री- | जानकर स्त्रीवेषधारिणी उमारूपा रूपा । स इन्द्रः ताम् उमां | विद्यादेवी प्रकट हुई । वह इन्द्र उस बहुशोभमानाम्—सर्वेषां हि | अत्यन्त शोभामयी हैमवती उमाके शोभमानानां शोभनतमा विद्या, | पास गया । समस्त शोभायमानोंमें तदा बहुशोभमानेति विशेषण- | विद्या ही सबसे अधिक शोभामयी मुपपन्नं भवति; हैमवतीं हेम- | है; इसलिये उसके लिये 'बहु कृताभरणवतीमिव बहुशोभ- | शोभमाना' यह विशेषण उचित ही मानामित्यर्थः; अथवा उमैव | है। हैमवती अर्थात् हेम ( सुवर्ण ) हिमवतो दुहिता हैमवती नित्य- | निर्मित आभूषणोंवालीके समान मेव सर्वज्ञेनेश्वरेण सह वर्तत | अत्यन्त शोभामयी । अथवा हिमवान्- इति ज्ञातुं समर्थेति कृत्वा ताम्— | की कन्या होनेसे उमा ( पार्वती ) उपजगाम इन्द्रस्तां ह उमां किल | ही हैमवती है। वह सर्वदा उस सर्वज्ञ उवाच पप्रच्छ—ब्रूहि किमेतद्दर्श- | ईश्वरके साथ वर्तमान रहती है; अतः यित्वा तिरोभूतं यक्षमिति ॥१२॥ | उसे जाननेमें समर्थ होगी—यह | सोचकर इन्द्र उसके पास गया, | और उससे पूछा—'बतलाइये, इस | प्रकार दर्शन देकर छिप जानेवाला | यह यक्ष कौन है?' ॥ १२ ॥ इति तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥
वाक्य-भाष्य विद्यामाजगाम । अभिप्रायोद्बोध- | विद्यादेवीके पास आया । ब्रह्मके गुप्त हेतुत्वादुद्रपत्न्युमा हैमवतीव सा | हो जानेके अभिप्रायको प्रकट करनेके शोभमाना विद्यैव । विरूपोऽपि | कारण रुद्रपत्नी हिमालयपुत्री पार्वती- विद्यावान्बहु शोभते ॥ १२ ॥ | के समान शोभामयी यह ब्रह्मविद्या ही | थी, क्योंकि विद्यावान् पुरुष रूपहीन | होनेपर भी बहुत शोभा पाता है॥१२॥ इति तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११७ चतुर्थ खण्ड उमाका उपदेश सा ब्रह्मेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीय- ध्वमिति ततो हैव विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ १ ॥ उस विद्यादेवीने स्पष्टतया कहा—'यह ब्रह्म है, तुम ब्रह्मके ही विजयमें इस प्रकार महिमान्वित हुए हो'। कहते हैं, तभीसे इन्द्रने यह जाना कि यह ब्रह्म है ॥ १ ॥ पद-भाष्य सा ब्रह्मेति होवाच ह किल | उसने 'यह ब्रह्म है' ऐसा कहा। ब्रह्मणो वै ईश्वरस्यैव विजये— | 'निस्सन्देह ब्रह्म—ईश्वरके विजयमें ईश्वरेणैव जिता असुराः; यूयं | ही [ तुम महिमाको प्राप्त हुए हो ]। असुरोंको ईश्वरने ही जीता था; तत्र निमित्तमात्रम्; तस्यैव | तुम तो उसमें निमित्तमात्र थे । अतः उसके ही विजयमें तुम्हें विजये—यूयं महीयध्वं महिमानं | यह महिमा मिली है।' मूलमें प्राप्नुथ । एतदिति क्रियाविशेष- | 'एतत्' यह क्रियाविशेषणके लिये वाक्य-भाष्य तां च पृष्ट्वा तस्या एव वचनाद् | इन्द्रने उस उमासे पूछकर उसीके विदाञ्चकार विदितवान् । अत | वचनसे [ ब्रह्मको ] जाना था; अतः इन्द्रस्य बोधहेतुत्वाद्विद्यैवोमा । | इन्द्रके बोधकी हेतुभूता होनेसे उमा विद्यासहायवानीश्वर इति | विद्या ही है। 'ईश्वर विद्यासहायवान् है' ऐसी स्मृति भी है। क्योंकि इन्द्रके स्मृतिः। यस्मादिन्द्रविज्ञानपूर्वकम् | विज्ञानपूर्वक अग्नि वायु और इन्द्र अग्निवाय्विन्द्रास्ते ह्येनन्नेदिष्ठमति- | इन देवताओंने ही ब्रह्मको, उसके
११८ केनोपनिषद् [ खण्ड ४
११८ केनोपनिषद् [ खण्ड ४
पद-भाष्य णार्थम् । मिथ्याभिमानस्तु | है। 'यह हमारी ही विजय है, यह युष्माकम्—अस्माकमेवायं वि- | हमारी ही महिमा है' यह तो जयोऽस्माकमेवायं महिमिति। ततः | तुम्हारा मिथ्या अभिमान ही है। तस्मादुमावाक्याद् ह एव विदां- | तत्र उमादेवीके उस वाक्यसे ही चकार ब्रह्मेति इन्द्रः; अवधार- | इन्द्रने जाना कि 'यह ब्रह्म है'। णात् ततो हैव इति, न | 'ततः' पदके साथ 'ह' और 'एव' स्वातन्त्र्येण ॥ १ ॥ | ये अव्यय निश्चय करानेके लिये ही | प्रयुक्त हुए हैं। [अर्थात् उमा | देवीके वाक्यसे ही इन्द्रने ब्रह्मको | जाना] स्वतन्त्रतासे नहीं ॥ १ ॥
यस्मादग्निर्वायुश्चेन्द्रा एते देवा | क्योंकि अग्नि, वायु और इन्द्र— ब्रह्मणः संवाददर्शनादिना सामी- | ये देवता ही ब्रह्मके साथ संवाद प्यमुपगताः— | और दर्शनादि करनेके कारण | उसकी समीपताको प्राप्त हुए थे— तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान्द्देवान्यदग्निर्वायु- रिन्द्रस्ते ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुस्ते ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ २ ॥ क्योंकि अग्नि वायु और इन्द्र—इन देवताओंने ही इस समीपस्थ ब्रह्मको स्पर्श किया था और उन्होंने ही उसे पहले-पहल 'यह ब्रह्म है' ऐसा जाना था, अतः वे अन्य देवताओंसे बढ़कर हुए ॥ २ ॥ वाक्य-भाष्य समीपं ब्रह्मविद्यया ब्रह्म प्राप्ताः | नेदिष्ठ अर्थात् अत्यन्त समीप पहुँचकर सन्तः पस्पृशुः स्पृष्टवन्तः—ते हि | ब्रह्मविद्याद्वारा स्पर्श किया था—उन्होंने प्रथमः प्रथमं विदाञ्चकार विदा- | प्रथम यानी पहले-पहल उसे जाना था ञ्चकुरित्येतत्—तस्मादतितराम् | इसलिये वे अन्य देवताओंसे बढ़े हुए अतीत्यान्यानतिशयेन दीप्यन्ते | हैं—उनसे अधिक देदीप्यमान होते हैं;
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११९
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११९ पद-भाष्य तस्मात् स्वैर्गुणैः अतितरामिव | इसलिये निश्चय ही ये देवगण शक्तिगुणादिमहाभाग्यैः अन्यान् | अपने शक्ति एवं गुण आदि महान् देवान् अतितराम् अतिशेरत | सौभाग्योंके कारण अन्य देवताओंसे इव एते देवाः । इव | बढ़कर हुए । 'इव' शब्द निरर्थक शब्दोऽनर्थकोऽवधारणार्थो वा । | अथवा निश्चयार्थबोधक है। क्योंकि यद् अग्निः वायुः इन्द्रः ते हि | अग्नि, वायु और इन्द्र—इन देवा यस्मात् एनत् ब्रह्म नेदिष्ठम् | देवताओंने इस ब्रह्मको पूर्वोक्त अन्तिकतमं प्रियतमं पस्पर्शः | संवाद आदि प्रकारोंसे नेदिष्ठ स्पृष्टवन्तो यथोक्तैर्ब्रह्मणः सं- | अर्थात् अत्यन्त निकटवर्ती एवं वादादिप्रकारैः, ते हि यस्माच्च | प्रियतम भावसे स्पर्श किया था हेतोः एनद् ब्रह्म प्रथमः प्रथमाः | और उन्होंने ही इस ब्रह्मको प्रथम प्रधानाः सन्त इत्येतत्, विदांचकार | अर्थात् प्रधानरूपसे 'यह ब्रह्म है' विदांचकुरित्येतद्ब्रह्मेति ॥२॥ | ऐसा जाना था ॥ २ ॥ यस्मादग्निवायू अपि इन्द्र- | क्योंकि अग्नि और वायुने भी वाक्यादेव विदांचक्रतुः, इन्द्रेण हि | इन्द्रके वाक्यसे ही उसे जाना था, कारण कि उमाके वाक्यसे तो इन्द्रने उमावाक्यात्प्रथमं श्रुतं ब्रह्मेति— | ही पहले सुना था कि 'यह ब्रह्म है'— तस्माद्वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान्देवान्स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श स ह्येनत्प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ ३ ॥ इसलिये इन्द्र अन्य सब देवताओंसे बढ़कर हुआ क्योंकि उसने ही इस समीपस्थ ब्रह्मको स्पर्श किया था—उसने ही पहले-पहल 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार इसे जाना था ॥ ३ ॥ वाक्य-भाष्य अन्यान्देवांस्ततोऽपीन्द्रोऽतितरां | उनमें भी इन्द्र सबसे अधिक | दीप्तिमान् है, क्योंकि सबसे पहले उसे दीप्यते। आदौ ब्रह्मविज्ञानात् ॥१-३॥ | ही ब्रह्मका ज्ञान हुआ था ॥ १-३ ॥
१२० केनोपनिषद् [ खण्ड ४
१२० केनोपनिषद् [ खण्ड ४
पद-भाष्य तस्माद्वै इन्द्रः अतितरामिव अतिशेरत इव अन्यान् देवान् । स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श यस्मात् स ह्येनत्प्रथमो विदांचकार ब्रह्मेत्युक्तार्थं वाक्यम् ॥ ३ ॥ अतः इन्द्र इन अन्य देवताओंकी अपेक्षा भी बढ़कर हुआ, क्योंकि उसीने इसे सबसे समीपसे स्पर्श किया था—उसीने इसे सबसे पहले जाना था कि ‘यह ब्रह्म है’ इस प्रकार इस वाक्यका अर्थ पहले ही कहा जा चुका है ॥ ३ ॥
ब्रह्मविषयक अधिदेव आदेश तस्यैष आदेशो यदेतद्विद्युतो व्यद्युतदा ३ इती- न्यमीमिषदा३ इत्यधिदैवतम् ॥ ४ ॥ उस ब्रह्मका यह [उपासना-सम्बन्धी] आदेश है। जो बिजलीके चमकनेके समान तथा पलक मारनेके समान प्रादुर्भूत हुआ वह उस ब्रह्मका अधिदैवत रूप है ॥ ४ ॥ पद-भाष्य तस्य प्रकृतस्य ब्रह्मण एष आदेश उपमोपदेशः। निरुपमस्य ब्रह्मणो येनोपमानेनोपदेशः उस प्रस्तावित ब्रह्मके विषयमें यह आदेश यानी उपमोपदेश है। जिस उपमासे उस निरुपम ब्रह्मका उपदेश किया जाता है वह वाक्य-भाष्य तस्यैष आदेशः । तस्य ब्रह्मण एष वक्ष्यमाण आदेश उपासनोपदेश इत्यर्थः । यस्माद्देवेभ्यो उसका यह आदेश है। अर्थात् उस ब्रह्मका यह आगे कहा जानेवाला आदेश—उपासनासम्बन्धी उपदेश है। क्योंकि ब्रह्म देवताओंके सामने विद्युत्-
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२१ पद-भाष्य सोऽयमादेश इत्युच्यते । किं | 'आदेश' कहा जाता है । वह तत् ? यदेतत् प्रसिद्धं लोके विद्युतो | आदेश क्या है ? यह जो लोकमें | प्रसिद्ध बिजलीका चमकना है । व्यद्युतद् विद्योतनं कृतवदित्ये- | यहाँ 'व्यद्युतत्' शब्दका 'प्रकाश | किया' ऐसा अर्थ अनुपपन्न होनेके तदनुपपन्नमिति विद्युतो विद्योत- | कारण 'विद्युतो विद्योतनम्—विद्युत्- | का चमकना' ऐसा अर्थ माना नमिति कल्प्यते । आ३ इत्युप- | जाता है । 'आ' यह अव्यय मार्थः । विद्युतो विद्योतनमिवे- | उपमाके लिये है । अर्थात् बिजली | चमकनेके समान [ऐसा तात्पर्य है] । त्यर्थः, “यथा सकृद्विद्युतम्” इति | जैसा कि “यथा सकृद्विद्युतम्” इस | अन्य श्रुतिसे भी देखा जाता है, श्रुत्यन्तरे च दर्शनात् । विद्यु- | क्योंकि ब्रह्म विद्युत्के समान ही दिव हि सकृदात्मानं दर्शयित्वा | अपनेको एक बार प्रकाशित करके | देवताओंके सामनेसे तिरोभूत हो तिरोभूतं ब्रह्म देवेभ्यः । | गया था । अथवा विद्युतः 'तेजः' इत्य- | अथवा 'विद्युतः' इस पदके | आगे 'तेजः' पदका अध्याहार ध्याहार्यम् । व्यद्युतद् विद्योतित- | करना चाहिये । 'व्यद्युतत्' का अर्थ वाक्य-भाष्य.. विद्युदिव सहसैव प्रादुर्भूतं ब्रह्म | के समान सहसा ( अकस्मात् ) ही | प्रकट हो गया था, इसलिये जो यह द्युतिमत्तत्त्वाद्विद्युतो विद्योतनं यथा | ब्रह्म प्रकाशमय है यह विद्युत्के प्रकाश- | के समान प्रकाशित हुआ । 'आ' का यदेतद्ब्रह्म व्यद्युतद्विद्योतितवत् । | अर्थ 'इव' है; यह 'आ' शब्द उपमाके आ इवेत्युपमार्थ आशब्दः । यथा | लिये है । जिस प्रकार बिजली सघन्
१२२ केनोपनिषद् [ खण्ड ४
पद-भाष्य
वत् आ३ इव । विद्युतस्तेजः | है 'प्रकाशित हुआ' तथा 'आ' का अर्थ सकृद्विद्योतितवदित्येत्यभिप्रायः । | 'समान' है । अतः इसका अभिप्राय इतिशब्द आदेशप्रतिनिर्देशार्थः- | यह हुआ कि 'जो बिजलीकी तेजके इत्ययमादेश इति । इच्छब्दः | समान एक बार प्रकाशित हुआ ।' समुच्चयार्थः । | 'इति' शब्द आदेशका सङ्केत अयं चापरस्तस्यादेशः । | करनेके लिये है अर्थात् 'यह आदेश कोऽसौ ? न्यमीमिषद् यथा चक्षुः | है' ऐसा बतलानेके लिये है, और न्यमीमिषद् निमेषं कृतवत् । | 'इत्' शब्द समुच्चयार्थक है ।
| इसके सिवा एक दूसरा आदेश यह | भी है । वह क्या है ? [ सुनो—] | जिस प्रकार नेत्र निमेष करता है, | उसी प्रकार उसने भी निमेष किया ।
वाक्य-भाष्य
घनान्धकारं विदार्य विद्युत्सर्वतः | अन्धकारको विदीर्ण करके सब ओर प्रकाशत एवं तद्ब्रह्म देवानां पुरतः | प्रकाशित होती है उसी प्रकार वह ब्रह्म सर्वतः प्रकाशवद्व्यक्तीभूतमतो | देवताओंके सामने सब ओर प्रकाशयुक्त व्यद्युतद्वित्येत्युपास्यम् । यथा | होकर व्यक्त हुआ; इसलिये 'वह सकृद्विद्युतमिति च वाजसनेयके । | बिजलीकी चमकके समान है' यस्माच्चेन्द्रोपसर्पणकाले न्यमी- | इस प्रकार उपासना करनेयोग्य है । मिषत् । यथा कश्चिच्चक्षुर्निमेषणं | जैसा कि वाजसनेयक श्रुतिमें भी कृतवानिति । इतीदित्यनर्थकौ | 'यथा सकृद्विद्युतम्' ऐसा कहा है ।
निपातौ । निमिषितवदिव तिरो- | क्योंकि इन्द्रके समीप जानेके समय भूतम् । इति एवमधिदैवतं देव- | ब्रह्म इसप्रकार संकुचित हो गया था, ताया अधि यद्दर्शनमधिदैवतं | मानो किसीने नेत्र मूँद लिये हों; अतः तत् ॥ ४ ॥ | वह नेत्र मूँदनेके समान तिरोहित | हुआ । इस प्रकार यह अधिदैवत | ब्रह्मदर्शन है। जो दर्शन देवतासम्बन्धी | होता है वह अधिदैवत कहलाता है। | 'इति' और 'इत्' इन दोनों निपातोंका | यहाँ कुछ अर्थ नहीं है ॥ ४ ॥
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३ पद-भाष्य स्वार्थे णिच् । उपमार्थ एव | यहाँ स्वार्थमें 'णिच्' प्रत्यय हुआ है । आकारः । चक्षुषो विषयं प्रति | 'आ' उपमाके ही लिये है। इस प्रकार प्रकाशतिरोभाव इव चेत्यर्थः । | 'नेत्रके विषयसे प्रकाशके छिप जानेके समान' ऐसा अर्थ हुआ। इस तरह यह इति अधिदैवतं देवताविषयं | ब्रह्मकी अधिदैवत—देवताविषयक ब्रह्मण उपमानदर्शनम् ॥ ४ ॥ | उपमा दिखलायी गयी ॥ ४ ॥ ब्रह्मविषयक अध्यात्म आदेश अथाध्यात्मं यदेतद्गच्छतीव च मनोऽनेन चैतदुप- स्मरत्यभीक्ष्णꣳसङ्कल्पः ॥ ५ ॥ इसके अनन्तर अध्यात्मउपासनाका उपदेश कहते हैं—यह मन जो जाता हुआ सा कहा जाता है वह ब्रह्म है—इस प्रकार उपासना करनी चाहिये, क्योंकि इससे ही यह ब्रह्मका स्मरण करता है और निरन्तर संकल्प किया करता है ॥ ५ ॥ पद-भाष्य अथ अनन्तरम् अध्यात्मं | इसके पश्चात् अब अध्यात्म प्रत्यगात्मविषय आदेश उच्यते । | अर्थात् प्रत्यगात्मा-सम्बन्धी आदेश वाक्य-भाष्य अथ अनन्तरमध्यात्ममात्म- | अब आगे अध्यात्म—आत्म- विषयक उपासना कही जाती है— विषयमध्यात्ममुच्यत इति वाक्य- | इस प्रकार इस वाक्यमें 'उच्यते' यह क्रियापद शेष है। जो यह मन उपर्युक्त शेषः । यदेतद्यथोक्तलक्षणं ब्रह्म | लक्षणोंवाले ब्रह्मके प्रति मानो जाता— . केनो० ५—
१२४ केनोपनिषद् [ खण्ड ४ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 पद-भाष्य
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| यदेतद् गच्छतीव च मनः । | कहा जाता है । यह जो मन जाता |
| एतद्ब्रह्म ढौकत इव विषयीकरो- | हुआ-सा मालूम होता है, सो वह |
| तीव । यच्च अनेन मनसा एतद् | मानो ब्रह्मको ही विषय करता है । |
| ब्रह्म उपस्मरति समीपतः स्मरति | और साधक पुरुष इस मनसे जो |
| साधकः अभीक्ष्णं भृशम् । संक- | ब्रह्मका बारम्बार उपस्मरण— |
| ल्पश्च मनसो ब्रह्मविषयः । मन- | समीपसे स्मरण करता है [ वह |
| उपाधिकत्वाद्धि मनसः संकल्प- | उसका अध्यात्म आदेश है ] । |
| स्मृत्यादिप्रत्ययैरभिव्यज्यते ब्रह्म, | मनका सङ्कल्प भी ब्रह्मको ही |
| विषयीक्रियमाणमिव । अतः | विषय करनेवाला है । ब्रह्म मनरूप |
| स एष ब्रह्मणोऽध्यात्ममादेशः । | उपाधिवाला है; इसलिये मनकी |
| सङ्कल्प एवं स्मृति आदि प्रतीतियोंसे | |
| मानो विषय किया जाता हुआ | |
| ब्रह्म ही अभिव्यक्त होता है । अतः | |
| यह उस ब्रह्मका अध्यात्म आदेश है । |
वाक्य-भाष्य
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| गच्छतीव प्राप्नोतीव विषयीकरोती- | प्राप्त होता अर्थात् विषय करता है |
| वेत्यर्थः । न पुनर्विषयीकरोति | [ यह ब्रह्म है—इस प्रकार उपासना |
| मनसोऽविषयत्वाद्ब्रह्मणोऽतो मनो | करनी चाहिये ] । मन वस्तुतः ब्रह्मको |
| न गच्छति । येनाहुर्मनो मतमिति | विषय नहीं करता, क्योंकि ब्रह्म तो |
| हि चोक्तम् । तु गच्छतीवेति | मनका अविषय है; इसलिये वह |
| मनसोऽपि मनस्त्वात् । | उसतक नहीं पहुँच सकता, जैसा कि |
| पहले कह चुके हैं कि 'जिससे मन- | |
| मनन किया कहा जाता है।' अतः | |
| मनका भी मन होनेके कारण | |
| 'गच्छतीव' ( मानो जाता है) ऐसा | |
| कहा गया है । |
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५ पद-भाष्य विद्युन्निमेषणवदधिदैवतं द्रुत- । विद्युत् और निमेषोन्मेषके समान ब्रह्म शीघ्र प्रकाशित होनेवाला प्रकाशनधर्मि, अध्यात्मं च मनः- है-यह अधिदैवत आदेश कहा गया और वह मनकी प्रतीतिके प्रत्ययसमकालाभिव्यक्तिधर्मि- समकालमें अभिव्यक्त होनेवाला इत्येष आदेशः। एवमादिश्यमानं है-यह उसका अध्यात्म आदेश है। इस प्रकार उपदेश किया हुआ हि ब्रह्म मन्दबुद्धिगम्यं भवतीति ब्रह्म मन्दबुद्धियोंकी भी समझमें आ जाता है-इसलिये यह [सोपाधिक] ब्रह्मण आदेशोपदेशः। न हि ब्रह्मका उपदेश किया गया, क्योंकि निरुपाधिकमेव ब्रह्म मन्दबुद्धि- मन्द-बुद्धि पुरुषोंद्वारा निरुपाधिक ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा भिराकलयितुं शक्यम् ॥ ५ ॥ सकता ॥ ५ ॥ वाक्य-भाष्य आत्मभूतत्वाच्च ब्रह्मणस्तत्स- । अर्थात् ब्रह्मका स्वरूपभूत होनेके मीपे मनो वर्तत इति। उपस्मरत्य- कारण मन उसके समीप रहता है। नेन मनसैच तद्ब्रह्म विद्वान्यस्मा- क्योंकि विद्वान् इस मनसे ही उस त्तस्माद्ब्रह्म गच्छतीवेत्युच्यते। ब्रह्मका स्मरण करता है इसलिये [मन] ब्रह्मके समीप मानो जाता है' ऐसा अभीक्ष्णं पुनः पुनश्च सङ्कल्पो कहा जाता है। ब्रह्मद्वारा प्रेरित मनका ब्रह्मप्रेषितस्य मनसः । अत ही बारम्बार सङ्कल्प होता है। अतः उपस्मरणसङ्कल्पादिभिर्लिङ्गैर्ब्रह्म । तात्पर्य यह है कि स्मरण और सङ्कल्प मनोऽध्यात्मभूतमुपास्यमित्यभि- आदि लिङ्गोंसे मनकी अध्यात्म ब्रह्म- प्रायः ॥ ५ ॥ स्वरूपसे उपासना करनी चाहिये ॥ ५ ॥
१२६ केनोपनिषद् [ खण्ड ४
१२६ केनोपनिषद् [ खण्ड ४ किंच | तथा— वन-संज्ञक ब्रह्मकी उपासनाका फल तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाभि हैनं सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति ॥ ६ ॥ वह यह ब्रह्म ही वन ( सम्भजनीय ) है । उसकी 'वन'—इस नामसे उपासना करनी चाहिये । जो उसे इस प्रकार जानता है उसे सभी भूत अच्छी तरह चाहने लगते हैं ॥ ६ ॥ पद-भाष्य तद् ब्रह्म ह किल तद्वनं नाम | वह ब्रह्म निश्चय ही 'तद्वन' तस्य वनं तद्वनं तस्य प्राणिजातस्य | नामवाला है । 'तस्य वनं तद्वनम्' | [ इस प्रकार यहाँ षष्ठी तत्पुरुष प्रत्यगात्मभूतत्वाद्वनं वननीयं | समास है ] । अर्थात् यह उस | प्राणिसमूहका प्रत्यगात्मस्वरूप होनेके संभजनीयम् । अतः तद्वनं नाम; | कारण वन—वननीय अर्थात् | भजनीय है । इसलिये इसका नाम प्रख्यातं ब्रह्म तद्वनमिति यतः, | 'तद्वन' है । क्योंकि ब्रह्म 'तद्वन' तस्मात् तद्वनमिति अनेनैव गुणा- | इस नामसे प्रसिद्ध है, इसलिये | उसकी 'तद्वन' इस गुणव्यञ्जक भिधानेन उपासितव्यं चिन्त- | नामसे ही उपासना—चिन्तन नीयम् । | करना चाहिये । वाक्य-भाष्य तस्य चाध्यात्ममुपासने गुणो | उस ब्रह्मकी अध्यात्म-उपासनामें विधीयते— | गुणका विधान किया जाता है— तद् तद्वनम् तदेतद्ब्रह्म तच्च | 'यह ब्रह्म तद् वन' है, यानी यह ब्रह्म | तत् अर्थात् परोक्ष और वन—अच्छी तद्वनं च तत्परोक्षं वनं | तरह भजन करने योग्य है । [ वन | धातुका अर्थ अच्छी प्रकार भजन सम्भजनीयम् । वनतेस्तत्कर्म- | करना है ] तत् शब्द जिसका कर्मभूत
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२७
पद-भाष्य
अनेन नाम्नोपासनस्य फल- | इस नामसे की हुई उपासनाका माह स यः कश्चिद् एतद् यथोक्तं | फल बतलाते हैं—‘जो कोई इस ब्रह्म एवं यथोक्तगुणं वेद उपास्ते | पूर्वोक्त ब्रह्मको उपर्युक्त गुणोंसे अभि ह एनम् उपासकं सर्वाणि | युक्त जानता अर्थात् उपासना करता भूतानि अभि संवाञ्छन्ति ह | है उस उपासकसे समस्त प्राणी प्रार्थयन्त एव यथा ब्रह्म ॥ ६ ॥ | इसी प्रकार अपने सम्पूर्ण अभीष्ट | फलोंकी इच्छा यानी प्रार्थना करने | लगते हैं, जैसे कि ब्रह्मसे ॥ ६ ॥
एवमनुशिष्टः शिष्य आचार्य- | इस प्रकार उपदेश पाकर मुवाच— | शिष्यने आचार्यसे कहा—
वाक्य-भाष्य
णस्तस्मात्तद्वनं नाम । | है ऐसे वन् धातुसे तद्वन शब्द सिद्ध ब्रह्मणो गौणं हीदं नाम । तस्मा- | होता है; अतः उसका ‘तद्वन’ नाम दनेन गुणेन तद्वनमित्युपासित- | है। ब्रह्मका यह नाम गुणविशेषके व्यम् । स यः कश्चिदेतद्यथोक्तमेवं | कारण है। अतः इस गुणके कारण यथोक्तेन गुणेन वनमित्यनेन | वह ‘वन है’ इस प्रकार उपासना करने नाम्नाभिधेयं ब्रह्म वेदोपास्ते | योग्य है। वह, जो कोई उपर्युक्त तस्यैतत्फलमुच्यते । सर्वाणि | गुणके कारण पहले कहे हुए ‘वन’ इस भूतान्येनमुपासकमभिसंवाञ्छ- | नामसे इसके अभिधेय ब्रह्मको जानता न्तीहाभिसम्भजन्ते सेवन्ते स्मे- | अर्थात् उपासना करता है उसके लिये त्यर्थः । यथागुणोपासनं हि | यह फल बतलाया जाता है। इस फलम् ॥ ६ ॥ | उपासककी सभी भूत इच्छा करते हैं | अर्थात् सभी उसका भजन यानी सेवा | करते हैं। यह प्रसिद्ध ही है कि जैसे | गुणवालेकी उपासना की जाती है वैसा | ही फल होता है ॥ ६ ॥
१२८ केनोपनिषद् [ खण्ड ४
१२८ केनोपनिषद् [ खण्ड ४ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 उपसंहार उपनिषदं भो ब्रूह्रित्युक्ता त उपनिषद्ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति ॥ ७ ॥ [ शिष्यके यह कहनेपर कि ] हे गुरो ! उपनिषद् कहिये [ गुरुने कहा ] 'हमने तुझसे उपनिषद् कह दी । अब हम तेरे प्रति ब्राह्मण- जातिसम्बन्धिनी उपनिषद् कहेंगे' ॥ ७ ॥ पद-भाष्य उपनिषदं रहस्यं यच्चिन्त्यं हे भगवन् ! जो चिन्तनीय भो भगवन् ब्रूहि इति । उपनिषद् यानी रहस्य है वह मुझसे कहिये । एवमुक्तवति शिष्ये आहा- शिष्यके ऐसा कहनेपर आचार्य- चार्यः—उक्ता अभिहिता ते तव ने कहा, 'तुझसे उपनिषद् तो कह दी गयी।' वह उपनिषद् क्या है ? उपनिषत् । का पुनः सेत्याह— सो बतलाते हैं—हमने तेरे प्रति ब्राह्मी-ब्रह्म यानी परमात्मसम्बन्धिनी ब्राह्मीं ब्रह्मणः परमात्मन इयं उपनिषद् ही कही है, क्योंकि पूर्व- ब्राह्मीं ताम्, परमात्मविषयत्वा- कथित विज्ञान परमात्मसम्बन्धी ही था । 'वाव'—निश्चय ही 'ते उपनिषदमब्रूम' दतीतविज्ञानस्य, वाव एव ते इस वाक्यके द्वारा पहले कही हुई उपनिषद्को ही लक्ष्य करके 'मैंने उपनिषदमब्रूमेति उक्तामेव तुमसे परमात्मसम्बन्धिनी उपनिषद् ही कही है' इस प्रकार* अगले परमात्मविषयामुपनिषदमब्रूमेत्य- ग्रन्थका विषय स्पष्ट करनेके लिये निश्चय करते हैं । वधारयत्युत्तरार्थम् । वाक्य-भाष्य उपनिषदं भो ब्रूहि इत्युक्ता- इस प्रकार उपनिषद् कह चुकनेपर यामप्युपनिषदि शिष्येणोक्त भी जब शिष्यने कहा कि 'उपनिषद् कहिये' तब आचार्य बोले—'मैंने आचार्य आह—उक्ता कथिता तुझसे उपनिषद् और आत्माकी
- उपनिषदके जिज्ञासु शिष्यसे आचार्य पूर्वमें ही उपनिषद्का कथन कर यह स्पष्ट करते हैं कि उत्तर ग्रन्थमें उपनिषद्का वर्णन नहीं है ।
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२९
पद-भाष्य परमात्मविषयामुपनिषदं श्रुत- | यहाँ परमात्मविषयिनी उपनिषद्- वतः उपनिषदं भो ब्रूहीति | को सुन चुकनेवाले शिष्यका पृच्छतः शिष्यस्य कोऽभिप्रायः ? | ‘उपनिषद् कहिये’ इस प्रकार प्रश्न यदि तावच्छ्रुतसार्थस्य प्रश्नः | करनेमें क्या अभिप्राय है ? यदि कृतः, ततः पिष्टपेषणवत्पुनरु- | उसने सुनी हुई बातके विषयमें ही क्तोऽनर्थकः प्रश्नः स्यात् । अथ | पुनः प्रश्न किया है तो उसका पुनः सावशेषोक्तोपनिषत्स्यात्, ततस्त- | कहना पिष्टपेषण (पिसे हुएको स्याः फलवचनेनोपसंहारो न | पीसने) के समान निरर्थक ही है । युक्तः “प्रेत्यास्माल्लोकादमृता | और यदि पहले कही हुई उपनिषद् भवन्ति” (के० उ० २ । ५) | असम्पूर्ण होती तो “इस लोकसे इति। तस्मादुक्तोपनिषच्छेषविष- | प्रयाण करनेके अनन्तर वे अमर हो योऽपि प्रश्नोऽनुपपन्न एव, अनव- | जाते हैं” इस प्रकार फल बतलाते हुए शेषितत्वात् । कस्तर्ह्यभिप्रायः | उसका उपसंहार करना उचित न प्रष्टुरित्युच्यते— | होता । अतः पूर्वोक्त उपनिषद्के | अवशिष्ट (कहनेसे बचे हुए) अंशके | सम्बन्धमें प्रश्न करना भी अयुक्त ही | है, क्योंकि उसमें कोई बात कहनेसे | छोड़ी नहीं गयी। तो फिर प्रश्नकर्ता- | का क्या अभिप्राय हो सकता है ? | इसपर कहा जाता है— वाक्य-भाष्य ते तुभ्यमुपनिषदामोपासनं च । | उपासना कह दी’ । अब हम अधुना ब्राह्मीं वाव ते तुभ्यं | तुझे ब्राह्मी—ब्रह्मकी—ब्राह्मण-जातिकी ब्रह्मणो ब्राह्मणजातेरुपनिषदमब्रूम | उपनिषद् सुनाते हैं । यह उपनिषद् वक्ष्याम इत्यर्थः । वक्ष्यति हि । | आगे कही जायगी । अबतक ब्राह्मी ब्राह्मी नोक्ता उक्ता त्वात्मोपनि- | उपनिषद् नहीं कही गयी, केवल षत् । तस्माच्च भूताभिप्रायोऽब्रूमे- | आत्मोपनिषद् ही कही गयी है। अतः त्ययं शब्दः ॥ ७ ॥ | ‘अब्रूम’ इस शब्दसे भूतकालका | अभिप्राय नहीं है ॥ ७ ॥
१३० केनोपनिषद् [ खण्ड ४
१३० केनोपनिषद् [ खण्ड ४
पद-भाष्य किं पूर्वोक्तोपनिषच्छेषतया | पहले जो उपनिषद् कही गयी तत्सहकारिसाधनान्तरापेक्षा, अथ | है उसके अवशेषरूपसे किन्हीं अन्य निरपेक्षैव ? सापेक्षा चेदपेक्षित- | सहकारी साधनोंकी अपेक्षा है विषयामुपनिषदं ब्रूहि । अथ | अथवा वह सर्वथा निरपेक्षा ही कही निरपेक्षा चेदवधारय पिप्पलाद- | गयी है ? यदि वह सापेक्षा है तो वन्नातः परमस्तीत्येवमभिप्रायः । | अपेक्षित विषयसम्बन्धिनी उपनिषद् एतदुपपन्नमाचार्यस्यावधारण- | कहिये और यदि उसे किसीकी वचनम् ‘उक्ता त उपनिषत्’ | अपेक्षा नहीं है तो पिप्पलादके इति । | समान* इससे पर और कुछ नहीं ननु नावधारणमिदम्, यतो- | है—इस प्रकार निर्धारण कीजिये— ऽन्यद्वक्तव्यमाह ‘तस्यै तपो दमः’ | यह शिष्यके प्रश्नका अभिप्राय है । इत्यादि । | अतः आचार्यका ‘तुझसे उपनिषद् सत्यम्, वक्तव्यमुच्यते आचा- | कह दी गयी’ यह अवधारण वाक्य [हाशिया: तपःप्रभृतीनां] र्येण न तूक्तोपनिष- | ठीक ही है । [हाशिया: ब्रह्मविद्याया] च्छेषतया तत्सहकारि- | शङ्का—यह अवधारण वाक्य [हाशिया: अशेषत्वप्रति-] साधनान्तराभिप्रायेण | नहीं हो सकता, क्योंकि ‘तस्यै तपो [हाशिया: पादनम्] वा; किं तु ब्रह्मविद्या- | दमः’ इत्यादि आगामी वाक्यद्वारा प्राप्त्युपायाभिप्रायेण वेदैस्तदङ्गैश्च | कुछ और कहने योग्य बात कही | गयी है । | समाधान—ठीक है, आचार्यने | एक दूसरे कथनीय विषयको तो | कहा है; तथापि उसे पूर्वोक्त | उपनिषद्के अवशेषरूप अथवा | अन्य सहकारी साधनरूपसे नहीं | कहा । बल्कि ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिके | उपाय बतलानेके ही अभिप्रायसे | कहा है, क्योंकि मन्त्रमें वेद और
- देखिये प्रश्नोपनिषद् ६ । ७
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३१ पद-भाष्य
सहपाठेन समीकरणात्तपःप्रभृती- | उनके अङ्गोंके साथ तप आदिका नाम् । न हि वेदानां शिक्षाद्य- | पाठ करके उनसे इनकी समानता प्रकट की गयी है। ब्रह्मविद्याके ङ्गानां च साक्षाद्ब्रह्मविद्याशेषत्वं | साक्षात् शेषभूत अथवा सहकारी साधन वेद और उनके अंग शिक्षा तत्सहकारिसाधनत्वं वा सम्भ- | आदि भी नहीं हो सकते । [अतः इनके साथ पाठ होनेसे तप आदि भी वति । | विद्याके अंग या साधन सिद्ध नहीं होते] ।
सहपठितानामपि यथायोगं | शङ्का-किन्तु [वेद-वेदाङ्गोंके] साथ-साथ पढ़े हुए होनेपर भी तप विभज्य विनियोगः स्यादिति | आदिका भी सम्बन्धके अनुसार विभाग करके प्रयोग किया जा सकता चेत्; यथा सूक्तवाकानुमन्त्रण- | है। अर्थात् जिस प्रकार सूक्तवाकरूप अनुमन्त्रण मन्त्रोंका उनके देवताओं- मन्त्राणां यथादैवतं विभागः, | के अनुसार विभाग किया जाता है* उसी प्रकार तप दम कर्म और तथा तपोदमकर्मसत्यादीनामपि | सत्यादिको भी ब्रह्मविद्याका शेषभूत अथवा सहकारी साधन माना जा ब्रह्मविद्याशेषत्वं तत्सहकारिसाध- | सकता है। वेद और उनके अङ्ग अर्थके प्रकाशक होनेसे कर्म और नत्वं वेति कल्प्यते । वेदानां | तदङ्गानां चार्थप्रकाशकत्वेन |
- अग्निरिदं हविरजुषतावीवृधत महो ज्यायोऽकृत । अग्नीषोमाविदं हविरजुषेतामवीवृधेतां महो ज्यायोऽक्रांताम् ॥ इत्यादि सूक्तवाकसे ही समस्त यज्ञोंकी समाप्तिपर देवताओंका अनुमन्त्रण किया जाता है। यद्यपि इस सूक्तवाकमें बहुतसे देवताओंका निर्देश किया गया है; तो भी जिस यज्ञमें जिस देवताका आवाहन किया जाता है उसीके विसर्जनमें समर्थ होनेके कारण जिस प्रकार इस सूक्तवाकका विनियोग होता है उसी प्रकार तप आदिका भी विद्याके शेषरूपसे विनियोग हो जायगा ।
१३२ | केनोपनिषद् | [ खण्ड. ४
[Header] १३२ | केनोपनिषद् | [ खण्ड. ४
पद-भाष्य
[वाम भाग / संस्कृत मूल] कर्मात्मज्ञानोपायत्वमित्येवं ह्ययं विभागो युज्यते अर्थसम्बन्धोप- पत्तिसामर्थ्यादिति चेत् । न; अयुक्तेः । न ह्ययं वि- भागो घटनां प्राञ्चति । न हि सर्वक्रियाकारकफलभेदबुद्धितिर- स्कारिण्या ब्रह्मविद्यायाः शेषा- पेक्षा सहकारिसाधनसम्बन्धो वा युज्यते । सर्वविषयव्यावृत्तप्रत्य- गात्मविषयनिष्ठत्वाच्च ब्रह्म- विद्यायास्तत्फलस्य च निःश्रेय- सस्य । "मोक्षमिच्छन्सदा कर्म त्यजेदेव ससाधनम् । त्यजतैव हि तज्ज्ञेयं त्यक्तुः प्रत्यक्परं पदम्" तस्मात्कर्मणां सहकारित्वं कर्मशेषापेक्षा वा न ज्ञानस्योप- पद्यते। ततोऽसदेव सूक्तवाकानु- मन्त्रणवद्यथायोगं विभाग इति ।
[दक्षिण भाग / हिन्दी व्याख्या] आत्मज्ञानके साधन हैं—इस प्रकार अर्थके सम्बन्धकी उपपत्ति के सामर्थ्यसे उनका ऐसा विभाग उचित ही है। ऐसा मानें तो ? समाधान—युक्तिसङ्गत न होनेके कारण ऐसा मानना ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा विभाग प्रस्तुत प्रसंगके अनुकूल नहीं है। सब प्रकारकी क्रिया कारक फल और भेदबुद्धिका तिरस्कार करनेवाली ब्रह्मविद्यामें किसी प्रकारके शेषकी अपेक्षा अथवा उचित सहकारी साधनका सम्बन्ध मानना ठीक नहीं है, क्योंकि ब्रह्मविद्या और उसका फल निःश्रेयस—ये सब प्रकारके विषयोंसे निवृत्त होकर प्रत्यगात्मा-रूप विषयमें स्थित होनेवाले हैं। [कहा भी है] “मोक्षकी इच्छा करनेवाला पुरुष सर्वदा साधनसहित कर्मोंको त्याग दे। त्याग करनेसे ही त्यागीको अपने प्रत्यगात्मरूप परमपदका ज्ञान हो सकता है”। अतः कर्मको ज्ञानकी सहकारिता अथवा ज्ञानको कर्मका शेष होनेकी अपेक्षा सम्भव नहीं है। अतः सूक्तवाकरूप अनुमन्त्रणके समान इन तप आदिका भी सम्बन्धके अनुसार विभाग हो सकता है—ऐसा विचार मिथ्या ही है। अतः [शिष्यके उपर्युक्त]
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३
खण्ड ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १३३
पद-भाष्य
तस्मादवधारणार्थतैव प्रश्नप्रति- | प्रश्नका जो उत्तर है वह [ उपदेश- वचनस्योपपद्यते । एतावत्येवेयम् | की समाप्तिका ] अवधारण करनेके उपनिषदुकान्यनिरपेक्षा अमृत- | लिये है—ऐसा मानना ही ठीक है। त्वाय् ॥ ७॥ | अर्थात् अमरत्व-प्राप्तिके लिये किसी | अन्य साधनकी अपेक्षासे रहित इतनी | ही उपनिषद् कही गयी है ॥ ७ ॥
❖❖❖ विद्याप्राप्तिके साधन
तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् ॥ ८ ॥
उस (ब्राह्मी उपनिषद्) की तप, दम, कर्म तथा वेद और सम्पूर्ण वेदांग—ये प्रतिष्ठा हैं एवं सत्य आयतन है ॥ ८ ॥
पद-भाष्य
यामिमां ब्राह्मीमुपनिषदं तवा- | तुम्हारे सामने जिस ब्राह्मी ग्रेस्रूमेति तस्यै तस्या उक्ताया | उपनिषद्का वर्णन किया है उस उपनिषदः प्राप्त्युपायभूतानि | पूर्वकथित उपनिषद्की प्राप्तिके तपआदीनि । तपः कायेन्द्रिय- | उपायभूत तप आदि हैं। शरीर, मनसां समाधानम् । दमः उप- | इन्द्रिय और मनके समाधानका | नाम तप है । दम उपशम | (विषयोंसे निवृत्त होने) को कहते
वाक्य-भाष्य
तस्या वक्ष्यमाणाया उपनिषदः | उस आगे कही जानेवाली उपनिषद्- तपो ब्रह्मचर्यादि दम उपशमः कर्म | की तप—ब्रह्मचर्यादि, दम—इन्द्रिय- अग्निहोत्रादीत्येतानि प्रतिष्ठाश्रयः। | निग्रह तथा अग्निहोत्रादि कर्म—ये सब एतेषु हि सत्सु ब्राह्मयुपनिषत् | प्रतिष्ठा—आश्रय हैं। इनके होनेपर प्रतिष्ठिता भवति। वेदाश्चत्वारोऽ- | ही ब्राह्मी उपनिषद् प्रतिष्ठित हुआ ङ्गानि च सर्वाणि । प्रतिष्ठेत्यनु- | करती है। चारों वेद तथा सम्पूर्ण | वेदाङ्ग भी प्रतिष्ठा ही हैं। इस प्रकार | [वेदाः सर्वाङ्गानि के आगे ] 'प्रतिष्ठा'
१३४ केनोपनिषद् [ खण्ड ४ पद-भाष्य शमः । कर्म अग्निहोत्रादि । | हैं। और कर्म अग्निहोत्रादि हैं। एतैर्हि संस्कृतस्य सत्त्वशुद्धिद्वारा | इनके द्वारा संस्कारयुक्त हुए पुरुषों- | को ही चित्तशुद्धिद्वारा तत्त्वज्ञानकी तत्त्वज्ञानोत्पत्तिर्दृष्टा । दृष्टा ह्यमृ- | उत्पत्ति होती देखी गयी है । जिनका दितकल्मषस्योक्तेऽपि ब्रह्मण्य- | मनोमल निवृत्त नहीं हुआ है .उन | पुरुषोंको तो उपदेश दिया जानेपर प्रतिपत्तिर्विपरीतप्रतिपत्तिश्च, यथे- | भी ब्रह्मके विषयमें अज्ञान अथवा न्द्रविरोचनप्रभृतीनाम् । | विपरीत ज्ञान होता देखा गया है, | जैसे इन्द्र और विरोचन आदिको । तस्मादिह वातीतेषु वा बहुषु | अतः इस जन्ममें अथवा बीते जन्मान्तरेषु तपआदिभिः कृत- | हुए अनेकों जन्मोंमें जिनका चित्त सत्त्वशुद्धेर्ज्ञानं समुत्पद्यते यथा- | तप आदिसे शुद्ध हो गया है उन्हें श्रुतम्; “यस्य देवे परा भक्तिर्यथा | ही. श्रुत्युक्त ज्ञान उत्पन्न होता है । देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता | “जिसकी भगवान्में अत्यन्त भक्ति ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः” | है और जैसी भगवान्में है वैसी ही ( श्वे० उ० ६।२३ ) इति मन्त्र- | गुरुमें भी है उस महात्माको ही ये वर्णात् । “ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां | पूर्वोक्त विषय प्रकाशित होते हैं” | इस मन्त्रवर्णसे तथा “पापकर्मोंके वाक्य-भाष्य वर्तते । ब्रह्माश्रया हि विद्या । | पदकी अनुवृत्ति की जाती है । क्योंकि सत्यं यथाभूतवचनमपीडाकरम् | विद्या ब्रह्म (वेद) के ही आश्रय रहने- | वाली है । सत्य अर्थात् दूसरेको पीडा आयतनं निवासः सत्यवत्सु हि | न पहुँचानेवाला यथार्थ वचन सर्वं यथोक्तमायतन इवावं- | आयतन—निवासस्थान है,.. क्योंकि | सत्यवान् पुरुषोंमें ही उपर्युक्त साधन स्थितम् ॥ ८ ॥ | आयतनके समान स्थित हैं ॥ ८ ॥