केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१
पद-भाष्य “यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म” (बृ० | “जो साक्षात् अपरोक्षरूपसे ब्रह्म ही उ० ३।४।१) “य आत्मा | है” “जो आत्मा सर्वान्तर है” इत्यादि सर्वान्तरः” (बृ० उ० ३।४।१) | अन्य श्रुतियोंसे भी प्रमाणित इत्यादिश्रुत्यन्तरेभ्यश्चेति । | होती है । वाक्य-भाष्य अह्निमित्तम्, रात्रयहनी इवादित्य- | तथा सूर्यके कारण दिन और रात निमित्ते। लोके नित्याचौष्ण्य- | हुआ करते हैं, वैसे ही उनका कारण | भी अन्य (आरोपित धर्म) ही प्रकाशावग्न्यादित्ययोरन्यत्रभावा- | है। उष्णता और प्रकाश-ये अग्नि | और सूर्यके तो नित्य-धर्म हैं, किन्तु भावयोर्निमित्तत्वाद नित्याविव | लोकमें अन्यत्र अपने भाव और | अभावके कारण वे अनित्यवत् उपचरित उपचर्येते । धक्ष्यत्यग्निः प्रकाश- | होते हैं; जैसे- 'अग्नि जला देगा', यिष्यति सवितेति तद्वत् । एवं | 'सूर्य प्रकाशित करेगा' इत्यादि | वाक्योंमें; वैसे ही [आत्माके विषयमें च सुखदुःखबन्धमोक्षाद्यध्यारोपो | समझना चाहिये]। इस प्रकार लोकका | जो सुख-दुःख एवं बन्ध-मोक्षरूप लोकस्य तदपेक्ष्य तत्त्वमस्यात्मा- | अध्यारोप है उसकी अपेक्षासे ही | 'तत्त्वमसि' 'आत्मानमेवावेत्' इत्यादि नमेवावेदित्यात्मावबोधोपदेशेन | श्रुतियाँ आत्मज्ञानके उपदेशसे केवल श्रुतयः केवलमध्यारोपापोहार्थाः। | अध्यारोपकी निवृत्तिके लिये ही हैं। यथा सवितासौ प्रकाशयति | जिस प्रकार 'यह सूर्य अपने-आपको | प्रकाशित करता है' [ इस वाक्यसे आत्मानम् इति | प्रकाशस्वरूप सूर्यमें प्रकाशकर्तृत्वका ब्रह्मणो विदिता- | तद्वत्, बोधाबोध- | उल्लेख किया जाता है] उसी प्रकार विदिताभ्या- | कर्तृत्वं च नित्य- | नित्यबोधस्वरूप आत्मामें भी ज्ञान मन्यत्वम् | बोधात्मनि।तस्मात्- | और अज्ञानका कर्तृत्व माना गया है। | इसलिये वह अविदित (अज्ञात) से अन्यदविदितात् । अधिशब्दश्च | भी अन्य है। यहाँ 'अधि' शब्द 'अन्य' अन्यार्थे । यद्वा यदि यस्याधि | अर्थमें है। अथवा जो जिससे अधि
४२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
४२ केनोपनिषद् [ खण्ड १ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ पद-भाष्य एवं सर्वात्मनः सर्वविशेष- | इस प्रकार सर्वात्मा सर्वविशेष- रहितस्य चिन्मात्रज्योतिषो | रहित चिन्मात्रज्योतिःस्वरूप वस्तुका ब्रह्मत्वप्रतिपादकस्य वाक्यार्थस्य | ब्रह्मत्व प्रतिपादन करनेवाले वाक्यार्थ-- वाक्य-भाष्य तत्ततोऽन्यत्सामर्थ्यात् । यथाधि | (ऊपर) होता है वह उससे अन्य ही हुआ करता है, क्योंकि उस शब्दकी भृत्यादीनां राजा । अव्यक्तमेव | शक्तिसे यही बोध होता है; जिस प्रकार सेवक आदिसे ऊपर राजा । १ अव्यक्त अविदितं ततोऽन्यदित्यर्थः । | ही अविदित है, उससे यह आत्मा पृथक् है—यही इसका तात्पर्य है । विदितमविदितं च व्यक्ताव्यक्ते | विदित और अविदित यानी व्यक्त और अव्यक्त ही क्रमशः कार्य कार्यकारणत्वेन विकल्पिते | तथा कारणभावसे माने गये हैं उनसे भिन्न वह ब्रह्म है जो सम्पूर्ण विशेषणोंसे ताभ्यामन्यद्ब्रह्म विज्ञानस्वरूपं | रहित विज्ञानस्वरूप है—यह इस समस्त सर्वविशेषप्रत्यस्तमितम् इत्ययं | वाक्यसमुदायका तात्पर्य है । अतः आत्मस्वरूप होनेके कारण यह त्याज्य समुदायार्थः । अत एवात्मत्वान्न | या ग्राह्य भी नहीं है । अन्य वस्तु ही किसी अन्यकी त्याज्य या ग्राह्य हुआ हेय उपादेयो वा । अन्यद्ध्यन्येन | करती है; स्वयं आप ही अपनी कोई हेयमुपादेयं वा । न तेनैव | भी वस्तु हेय या उपादेय नहीं होती । आत्मा ही ब्रह्म है और सबका तद्यस्य कस्यचिद्धेयमुपादेयं वा | अन्तर्यामी होनेसे वह किसी इन्द्रियका विषय भी नहीं है । इसलिये यह किसी भवति । आत्मा च ब्रह्म सर्वान्त- | अन्यका भी हेय या उपादेय नहीं है । रात्मत्वादविषयमतोऽन्यस्यापिन | इसके सिवा आत्मासे भिन्न कोई और वस्तु न होनेके कारण भी [वह हेयमुपादेयं वा । अन्याभावाच्च । | हेयोपादेयरहित है]। १. जिस प्रकार सेवकोंके ऊपर होनेके कारण राजा उनसे भिन्न है उसी प्रकार अविदितसे ऊपर होनेके कारण आत्मा उससे भिन्न है ।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३ ❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧ पद-भाष्य आचार्योपदेशपरम्परया प्राप्त- | का ‘इति शुश्रुम पूर्वेषाम्’ इत्यादि त्वमाह—इति शुश्रुमेत्यादि । | वाक्यद्वारा आचार्योंके उपदेशकी ब्रह्म च एवमाचार्योपदेशपरम्परया | परम्परासे प्राप्त होना दिखलाया गया एवाधिगन्तव्यं न तर्कतः प्रवचन- | है। इस प्रकार वह ब्रह्म आचार्योंकी मेधाबहुश्रुततपोयज्ञादिभ्यश्च, इति | उपदेश-परम्परासे ही ज्ञातव्य है, एवं शुश्रुम श्रुतवन्तो वयं पूर्वे- | तर्कसे अथवा प्रवचन, मेधा, बहुश्रुत, षाम् आचार्याणां वचनम्; ये | तप एवं यज्ञादिसे नहीं—ऐसा हमने आचार्याः नः अस्मभ्यं तद् ब्रह्म | पूर्ववर्ती आचार्योंका वचन सुना है। व्याचचक्षिरे व्याख्यातवन्तः | जिन आचार्योंने हमारे प्रति उस | ब्रह्मका व्याख्यान—स्पष्ट कथन वाक्य-भाष्य इति शुश्रुम पूर्वेषामित्यागमो- | ‘इति शुश्रुम पूर्वेषाम्’ (यह हमने [हाशिये में: यथोक्तस्य आत्म-] पदेशः । व्याचच- | पूर्व आचार्योंके मुँहसे सुना है) ऐसा [हाशिये में: प्रामाणिकत्वम्] क्षिरे इत्यस्वातन्त्र्यं | कहकर यह दिखलाते हैं कि यह तर्कप्रतिषेधार्थम् । ये | [परम्परागत] शास्त्रका उपदेश है। | हमसे [शास्त्रीय मतका] व्याख्यान नस्तद्ब्रह्मोक्तवन्तस्ते नित्यमेवागमं | किया था [यह उनकी स्वतन्त्र कल्पना | नहीं है] ऐसा कहकर जो उन ब्रह्मप्रतिपादकं व्याख्यातवन्तो | आचार्योंकी परतन्त्रता दिखलायी | है यह तर्कका प्रतिषेध करनेके लिये है; न पुनः स्वबुद्धिप्रभवेण तर्केण | जिन्होंने हमसे उस ब्रह्मका वर्णन किया | था। अर्थात् उन्होंने ब्रह्म का प्रति- उक्तवन्त इत्यागमपारम्पर्या- | पादन करनेवाले नित्य आगमका ही | व्याख्यान करके बतलाया था अपनी विच्छेदं दर्शयति विद्यास्तुतये । | बुद्धिसे ही प्रकट हुए तर्कद्वारा नहीं | कहा। इस प्रकार ज्ञानकी स्तुतिके तर्कस्त्वनवस्थितो भ्रान्तोऽपि | लिये शास्त्रपरम्पराका अविच्छेद | दिखलाया है, क्योंकि तर्क तो भवतीति ॥ ३ ॥ | अनवस्थित और भ्रमपूर्ण भी | होता है ॥ ३ ॥ ───⊱✿⊰───
४४ केनोपनिषद् [ खण्ड १
४४ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
विस्पष्टं कथितवन्तः, तेषाम् | किया था, उन्हींके [वचनसे हमें उसे जानना चाहिये] यह इसका तात्पर्य इत्यर्थः ॥३॥ | है ॥ ३ ॥
'अन्यदेव तद्विदितादथो | 'वह विदितसे अन्य है और अविदितसे भी ऊपर है' इस वाक्य- अविदितादधि' इत्यनेन वाक्येन | द्वारा आत्मा ही ब्रह्म है—ऐसा आत्मा ब्रह्मेति प्रतिपादिते | प्रतिपादन किये जानेपर श्रोताको श्रोतुराशङ्का जाता-कथंन्वात्मा | यह शंका हुई—आत्मा किस ब्रह्म । आत्मा हि नामाधिकृतः | प्रकार ब्रह्म है ? आत्मा तो कर्म कर्मण्युपासने च संसारी कर्मो- | और उपासनामें अधिकृत संसारी पासनं वा साधनमनुष्ठाय ब्रह्मादि- | जीवको कहते हैं, जो कर्म या देवान्स्वर्गं वा प्राप्तुमिच्छति । | उपासनारूप साधनका अनुष्ठान कर तत्तस्मादन्य उपास्यो विष्णु- | ब्रह्मा आदि देवताओं अथवा स्वर्गको रीश्वर इन्द्रः प्राणो वा ब्रह्म | प्राप्त करना चाहता है । अतः भवितुमर्हति, न त्वात्मा; लोक- | उससे भिन्न उसका उपास्य विष्णु, प्रत्ययविरोधात् । यथान्ये | ईश्वर, इन्द्र अथवा प्राण ही ब्रह्म तार्किका ईश्वरादन्य आत्मा | होना चाहिये—आत्मा नहीं, इत्याचक्षते, तथा कर्मिणोऽमुं | क्योंकि यह बात लोक-विश्वासके यजामुं यजेत्यन्या एव देवता | विरुद्ध है । जिस प्रकार अन्य उपासते । तस्माद्युक्तं यद्विदित- | तार्किक लोग आत्माको ईश्वरसे मुपास्यं तद्ब्रह्म भवेत्, ततोऽन्य | भिन्न बतलाते हैं उसी प्रकार कर्म- उपासक इति । तामेतामाशङ्कां | काण्डी भी 'इसका यजन करो— शिष्यलिङ्गेनोपलक्ष्य तद्वाक्याद्वा | इसका यजन करो' इस प्रकार अन्य आह-मैवं शङ्किष्ठाः, | देवताकी ही उपासना करते हैं । अतः उचित यही है कि जो उपास्य विदित है वह ब्रह्म हो और उससे भिन्न उसका उपासक.हो । शिष्यके व्याज अथवा उसके वाक्यसे उसकी इस आशंकाको उपलक्षित कर कहते हैं—ऐसी शंका मत करो,
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
ब्रह्म वागादिसे अतीत और अनुपास्य है यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ४ ॥ जो वाणीसे प्रकाशित नहीं है, किन्तु जिससे वाणी प्रकाशित होती है उसीको तू ब्रह्म जान, जिस इस [ देशकालावनिच्छन्न वस्तु ] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ४ ॥ पद-भाष्य यत् चैतन्यमात्रसत्ताकम्, | जो चैतन्यसत्तास्वरूप ब्रह्म वाणी- वाचा वागिति जिह्वामूलादिष्वष्टसु | से [अप्रकाशित है]—जिह्वामूल आदि स्थानेषु विवक्तमाग्रेयं वर्णानाम् | आठ स्थानोंमें* आश्रित तथा अग्नि- अभिव्यञ्जकं करणम्, वर्णाश्चार्थ- | देवतासे अधिष्ठित वर्णोंको अभिव्यक्त सङ्केतपरिच्छिन्ना एतावन्त एवं | करनेवाली इन्द्रिय एवं अर्थ-संकेतसे क्रमप्रयुक्ता इति; एवं तद्- | परिच्छिन्न और इतने तथा इस | क्रमसे† प्रयुक्त होनेवाले हैं, ऐसे वाक्य-भाष्य यद्वाचा इति मन्त्रानुवादो | 'यद्वाचा' इत्यादि मन्त्रोंका उल्लेख दृढप्रतीतेः । अन्यदेव तद्वि- | आत्मतत्त्वकी दृढप्रतीतिका लिये किया दितादिति योऽयमागमार्थो | गया है । 'यह विदितसे भिन्न है' ऐसा ब्राह्मणोक्तोऽस्यैव द्रढिम्ने मन्त्रा | जो शास्त्रका तात्पर्य इस ब्राह्मण-ग्रन्थने यद्वाचेत्यादयः पठ्यन्ते । | ऊपर कहा है उसकी पुष्टिके लिये ही | ये 'यद्वाचा' इत्यादि मन्त्र पढ़े जाते हैं।
- जिह्वामूल, हृदय, कण्ठ, मूर्धा, दन्त, नासिका, ओष्ठ और तालु । † यह मीमांसकोंका मत है, जैसे 'गौः' यह पद गकार, औकार तथा विसर्ग— इस क्रमविशेषसे अवच्छिन्न वर्णरूप ही है ।
. ४६ केनोपनिषद् [ खण्ड १
. ४६ केनोपनिषद् [ खण्ड १ पद-भाष्य भिद्यङ्गचः शब्दः पदं वागिति | नियमवाले वर्ण 'वाक्' कहे जाते उच्यते; "अकारो वै सर्वा वाक्सैषा | हैं। तथा उनसे अभिव्यक्त होनेवाला स्पर्शान्तस्थोष्मभिर्व्यज्यमाना | शब्द भी 'पद' या 'वाक्' कहा जाता है । श्रुति कहती है— बह्वी नानारूपा भवति" | "अकार* ही सम्पूर्ण वाक् है, और (ऐ० आ० २।३।७।१३) इति | यह वाक् ही अपने स्पर्श¹ अन्तस्थ² और उष्म³ आदि भेदोंसे अभिव्यक्त होकर श्रुतेः । मितममितं स्वरः | अनेक रूपवाली हो जाती है।" इस प्रकार मितं⁴ अमितं⁵ स्वरं⁶ एवं सत्यानृते एष विकारो यस्यास्तया | सत्य और मिथ्या—ये जिसके विकार वाक्य-भाष्य यद्ब्रह्म वाचा शब्देनानभ्युदितम् | जो ब्रह्म वाणीसे अर्थात् शब्दसे अनभ्युदित—अनुक्त अर्थात् अप्रकाशित अनभ्युक्तमप्रकाशितमित्येतत्, | है। और जिससे वाणी अभ्युदित होती है—ऐसा कहकर उसे वाणीके प्रकाश- येन वागभ्युद्यत इति वाक्प्रकाश- | का हेतु बतलाया है। 'जिससे वाणी प्रकाशित होती है' ऐसा कहकर हेतुत्वोक्तिः। येन प्रकाश्यत इति | वाणीके अभिधान (उच्चारण) के अभिधेय (वाच्य) को प्रकाशित वाचोऽभिधानस्याभिधेयप्रकाश- | करनेमें ब्रह्मको हेतु बतलाया है [अर्थात् यह दिखलाया है कि वाणीमें जो कत्वस्य हेतुत्वमुच्यते ब्रह्मणः । | अर्थको अभिव्यञ्जित करनेका सामर्थ्य है वह ब्रह्मका ही है ] ।
- अकार प्रधान ॐकारसे उपलक्षित स्फोट नामक चिच्छक्ति। १. क से म तक सभी वर्ग। २. य र ल व । ३. श ष स ह । ४. जिनके पादका अन्त नियत अक्षरोंवाला है उन वाक्योंको मित (ऋग्वेद) कहते हैं। ५. जिनके पादका अन्त नियत अक्षरोंवाला नहीं है उन वाक्योंको अमित (यजुर्वेद) कहते हैं। ६. गायन- प्रधान सामवेद 'स्वर' कहलाता है।
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४७ पद-भाष्य वाचा पदत्वेन परिच्छिन्नया | हैं उस पदरूपसे परिच्छिन्न एवं करणगुणवत्या—अनभ्युदितम् | वागिन्द्रियरूप गुणवाली वाणीसे अप्रकाशितमनभ्युक्तम् । | जो अनभ्युदित—अप्रकाशित | अर्थात् नहीं कहा गया है— येन ब्रह्मणा विवक्षितेऽर्थे | बल्कि जिस ब्रह्मके द्वारा सकरणा वाक् अभ्युद्यते चैतन्य- | वागिन्द्रियसहित वाणी विवक्षित ज्योतिषा प्रकाश्यते प्रयुज्यत | अर्थमें बोली जाती अर्थात् अपने इत्येतद्यद्वाचो ह वागित्युक्तम्, | चैतन्य-ज्योतिःस्वरूपसे प्रकाशित “वदन्वाक्” (बृ० उ० १ । | यानी प्रयुक्त की जाती है, जो ४।७) “यो वाचमन्तरो यम- | 'वाणीकी वाणी है' इस प्रकार यति” (बृ० उ० ३ । ७ । १७) | बतलाया गया है [जिसके विषयमें] इत्यादि च वाजसनेयके । “या | बृहदारण्यकोपनिषद्में “बोलनेके वाक् पुरुषेषु सा घोषेषु प्रतिष्ठिता | कारण वाणी है” “जो भीतरसे वाणी- | का नियमन करताहै” इत्यादि कहा | है, तथा “चेतन प्राणियोंमें जो वाणी | (वाक्शक्ति) है वह घोषों (वर्णों) में वाक्य-भाष्य उक्तं च केनेषितां वाचमिमां | ऊपर 'लोग किसकी प्रेरणासे इस वदन्ति यद्वाचो ह वाचमिति । | वाणीको बोलते हैं' इस प्रश्नके उत्तरमें तदेव ब्रह्म त्वं विद्धीत्यविषयत्वेन | 'जो वाणीका वाणी है' इत्यादि कहा ग्रहणं आत्मन्यवस्थापनार्थं | भी जा चुका है। 'तू उसीको ब्रह्म आम्नायः । यद्वाचानभ्युदितं | जान' यह आगम ब्रह्मको अविषय- वाक्प्रकाशनिमित्तं चेति ब्रह्म- | रूपसे बुद्धिमें बिठानेके लिये है । णोऽविषयत्वेन वस्त्वन्तरजिघृक्षां | 'जो वाणीसे प्रकट नहीं होता बल्कि | वाणीके प्रकाशित होनेका हेतु है' | इस कथनसे ब्रह्मका अविषयत्व | सिद्ध करता हुआ शास्त्र पुरुषको | अन्य वस्तुके ग्रहण करनेकी इच्छासे
कश्चित्तां वेद ब्राह्मणः" इति | स्थित है, उसे कोई ब्रह्मवेत्ता ही
४८ केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य
कश्चित्तां वेद ब्राह्मणः" इति | स्थित है, उसे कोई ब्रह्मवेत्ता ही प्रश्नमुत्पाद्य प्रतिवचनमुक्तम् | जानता है" इस प्रकार प्रश्न उठा- "सा वाग्यया स्वप्ने भाषते" इति। | कर यह उत्तर दिया है कि "जिसके सा हि वक्तुर्वक्तिर्नित्या वाक् | द्वारा जीव स्वप्नमें बोलता है वह चैतन्यज्योतिःस्वरूपा, "न हि | वाक् है" वक्ताकी वह नित्य वाचन- वक्तुर्वक्तेर्विपरिलोपो विद्यते" | शक्तिही चैतन्य-ज्योतिःस्वरूप वाक् (बृ० उ० ४ । ३ । २६) इति | है जैसा कि "वक्ताकी वाचन- श्रुतेः। | शक्तिका लोप कभी नहीं होता" | इस श्रुतिसे सिद्ध होता है। तदेव आत्मस्वरूपं ब्रह्म | उस आत्मस्वरूपको ही तू बृहत् निरतिशयं भूमाख्यं बृहत्त्वाद् | होनेके कारण 'ब्रह्म' यानी भूमा- ब्रह्मेति विद्धि विजानीहि त्वम् । | संज्ञक सर्वोत्कृष्ट ब्रह्म जान। जिन वाक् यैर्वागाद्युपाधिभिर्वाचो ह वाक् | आदि उपाधियोंके कारण, वाणीका चक्षुषश्चक्षुः श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो | वाणी, चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र, मनः कर्ता भोक्ता विज्ञाता | मनका मन, कर्ता, भोक्ता, विज्ञाता, नियन्ता प्रशासिता विज्ञान- | नियन्ता, शासनकर्ता, तथा ब्रह्म मानन्दं ब्रह्म इत्येवमादयः | विज्ञान और आनन्दस्वरूप है— संव्यवहारा असंव्यवहारे नि- | इत्यादि प्रकारके व्यवहार उस र्विशेषे परे साम्ये ब्रह्मणि प्रवर्तन्ते, | अव्यवहार्य निर्विशेष सर्वोत्कृष्ट | समस्वरूप ब्रह्ममें प्रवृत्त होते हैं,
वाक्य-भाष्य
निवर्त्य स्वात्मन्येवावस्थापयति | निवृत्त करके अपने आत्मस्वरूपमें ही | जोड़ता है और 'उसीको तू ब्रह्म जान' आज्ञायस्तदेव ब्रह्म त्वं विद्धीति | इस वाक्यद्वारा वह उसे अन्य प्रयत्नसे | उपरत करता है तथा 'नेदं यदिद- यत्नत उपरमयति । नेदमित्युपा- | मुपासते' इस कथनसे भी ब्रह्मका | उपास्यत्व निषेध करनेके कारण स्यप्रतिषेधाच्च ॥ ४॥ | [वह अन्य सब ओरसे उसे निवृत्त | करता है] ॥ ४॥
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९ पद-भाष्य तान्युदस्य आत्मानमेव नि- | उन सब उपाधियोंका बाधकर अपने र्विशेषं ब्रह्म विद्धीति एवशब्दार्थः। | निर्विशेष आत्माको ही ब्रह्म जान— नेदं ब्रह्म यदिदम् इत्युपाधिभेद- | यही 'एव' शब्दका अर्थ है । जिस विशिष्टमनात्मेश्वरादि उपासते | इस उपाधिविशिष्ट अनात्मा ईश्वरादि- ध्यायन्ति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि | की उपासना—ध्यान करते हैं यह इत्युक्तेऽपि नेदं ब्रह्म इत्यनात्म- | ब्रह्म नहीं है । 'उसीको तू ब्रह्म | जान' इतना कह देनेपर भी | [ अनात्मवस्तुमें ब्रह्मभावनाका | निषेध हो ही जाता ] पुन: 'यह नोऽब्रह्मत्वं पुनरुच्यते नियमार्थम् | ब्रह्म नहीं है' इस वाक्यके द्वारा | जो अनात्माका अब्रह्मत्व प्रतिपादन अन्यब्रह्मबुद्धिपरिसंख्यानार्थं | किया है वह आत्मामें ही ब्रह्म- | बुद्धिका नियमन करनेके लिये अथवा | अन्य उपास्य देवताओंमें ब्रह्म-बुद्धि- वा ॥४॥ | की निवृत्ति करनेके लिये है ॥४॥ यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ५ ॥ जो मनसे मनन नहीं किया जाता, बल्कि जिससे मन मनन किया हुआ कहा जाता है उसीको तू ब्रह्म जान। जिस इस [देश-कालावच्छिन्न वस्तु] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ५ ॥
५० केनोपनिषद् [ खण्ड १
पद-भाष्य यन्मनसा न मनुते; मन | जिसका मनके द्वारा मनन नहीं इत्यन्तःकरणं बुद्धिमन्सोरेकत्वेन | किया जाता; मन और बुद्धिके गृह्यते । मनुतेऽनेनेति मनः सर्व- | एकत्वरूपसे यहाँ मन शब्दसे अन्तः- करणसाधारणम्, सर्वविषय- | करणका ग्रहण किया जाता है। व्यापकत्वात् । “कामः सङ्कल्पो | जिसके द्वारा मनन करते हैं उसे विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा धृतिर- | मन कहते हैं; वह समस्त इन्द्रियोंके धृतिर्ह्रीर्धीरित्येतत्सर्वं मन एव” | विषयोंमें व्यापक होनेके कारण (बृ० उ० १।५।३) इति | सम्पूर्ण इन्द्रियोंके लिये समान है। श्रुतेः कामादिवृत्तिमन्मनः । तेन | “काम, संकल्प, संशय, श्रद्धा, मनसा यत् चैतन्यज्योतिर्मनसः | अश्रद्धा, धैर्य, अधैर्य, लज्जा, बुद्धि अवभासकं न मनुते न सङ्कल्प- | और भय—ये सब मन ही हैं” इस यति नापि निश्चिनोति लोकः, | श्रुतिके अनुसार मन कामादि मनसोऽवभासकत्वेन नियन्तृ- | वृत्तियोंवाला है । उस मनके द्वारा त्वात् । सर्वविषयं प्रति प्रत्य- | यह लोक जिस मनके प्रकाशक गेवेति स्वात्मनि न प्रवर्ततेऽन्तः- | चैतन्यज्योतिका मनन—संकल्प करणम् । अन्तःस्थेन हि चैतन्य- | अथवा निश्चय नहीं कर सकता, ज्योतिषावभासितस्य मनसो | क्योंकि मनका प्रकाशक होनेके मननसामर्थ्यम्; तेन सवृत्तिकं | कारण वह तो उसका नियामक | है । आत्मा सब विषयोंके प्रति | प्रत्यक्रूप (आन्तरिक) ही है; अतः | उसमें मन प्रवृत्त नहीं हो सकता । | अपने भीतर स्थित चैतन्यज्योतिसे | प्रकाशित हुए मनमें ही मनन करनेका | सामर्थ्य है। उसके द्वारा वृत्तियुक्त हुए वाक्य-भाष्य यन्मनसा इत्यादि समानम् । | ‘यन्मनसा’ इत्यादि श्रुतियोंका मनो मतमितिःयेन ब्रह्मणा मनोऽपि | तात्पर्य समान ही है । ‘मन मनन विषयीकृतं नित्यविज्ञानस्वरूपेण | किया जाता है’ अर्थात् जिस नित्य | विज्ञानस्वरूप ब्रह्मद्वारा मन भी विषय
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१ पद-भाष्य मनो येन ब्रह्मणा मतं विषयीकृतं | मनको ब्रह्मवेत्तालोग जिस ब्रह्मके व्याप्तम् आहुः कथयन्ति ब्रह्म- | द्वारा मत--विषयीकृत अर्थात् व्याप्त विदः । तस्मात् तदेव मनस | बतलाते हैं; उस मनके प्रत्यक्चेतयिता आत्मानं प्रत्यक्चेतयितारं ब्रह्म | आत्माको ही तू ब्रह्म जान । 'नेदं••••' विद्धि। नेदमित्यादि पूर्ववत् ॥५॥ | इत्यादि वाक्यकी व्याख्या पूर्ववत् समझनी चाहिये ॥ ५ ॥ यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ६ ॥ जिसे कोई नेत्रसे नहीं देखता बल्कि जिसकी सहायतासे नेत्र [ अपने विषयोंको ] देखते हैं उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस [ देश- कालावच्छिन्न वस्तु ] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥६॥ पद-भाष्य यत् चक्षुषा न पश्यति न | लोक जिसे अन्तःकरणकी वृत्ति- विषयीकरोति अन्तःकरणवृत्ति- | से युक्त नेत्रद्वारा नहीं देखता अर्थात् संयुक्तेन लोकः, येन चक्षूंषि | विषय नहीं करता किन्तु जिस चैतन्यआत्मज्योतिके द्वारा चक्षुओं अन्तःकरणवृत्तिभेदभिन्नाश्चक्षु- | अर्थात् अन्तःकरणकी वृत्तियोंके भेदसे विभिन्न हुई—नेत्रेन्द्रियकी र्वृत्तीः पश्यति चैतन्यात्म- | वृत्तियोंको देखता—विषय करता यानी व्याप्त करता है उसीको तू ज्योतिषा विषयीकरोति व्या- | ब्रह्म जान इत्यादि पूर्ववत् समझना प्नोति । तदेवेत्यादि पूर्ववत् ॥६॥ | चाहिये ॥६॥ वाक्य-भाष्य इत्येतत् । सर्वकरणानामविषयम्, | किया जाता है। जो सब इन्द्रियोंका तानि च सव्यापाराणि सविषयाणि | अविषय है और नित्य विज्ञानस्वरूपसे नित्यविज्ञानस्वरूपावभासतया | अवभासित होनेके कारण जिससे वे
५२ केनोपनिषद् [ खण्ड १
५२ केनोपनिषद् [ खण्ड १ यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदंऽ श्रुतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ७॥ जिसे कोई कानसे नहीं सुनता बल्कि जिससे यह श्रोत्रेन्द्रिय सुनी जाती है उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस [ देशकालावच्छिन्न वस्तु ] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ७ ॥ पद-भाष्य यत् श्रोत्रेण न शृणोति | लोक जिसे मनोवृत्तिसे युक्त दिग्देवताधिष्ठितेन आकाश- | आकाशके कार्यभूत तथा दिशा- कार्येण मनोवृत्तिसंयुक्तेन न | रूप देवतासे अधिष्ठित श्रोत्रेन्द्रियद्वारा विषयीकरोति लोकः, येन श्रोत्रम् | नहीं सुन सकता अर्थात् जिसे इदं श्रुतं यत्प्रसिद्धं चैतन्यात्म- | श्रोत्रसे विषय नहीं कर सकता, ज्योतिषा विषयीकृतं तदेव | बल्कि जिस चैतन्यआत्मज्योतिद्वारा इत्यादि पूर्ववत् ॥७॥ | यह प्रसिद्ध श्रोत्र सुना यानी विषय | किया जाता है वही [ब्रह्म है] इत्यादि | पूर्ववत् समझना चाहिये ॥७॥ यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ८ ॥ जो नासिकारन्ध्रस्थ प्राणके द्वारा विषय नहीं किया जाता बल्कि जिससे प्राण अपने विषयोंकी ओर जाता है उसीको तू ब्रह्म जान । जिस इस [ देशकालावच्छिन्न वस्तु ] की लोक उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ॥ ८ ॥ वाक्य-भाष्य येनावभास्यन्त इति श्लोकार्थः । | सभी इन्द्रियाँ अपने व्यापार और “क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं | विषयोंके सहित अवभासित होती हैं— | यह इन मन्त्रोंका तात्पर्य है । “तथा प्रकाशयति” ( गीता १३ । ३३ ) | क्षेत्रज्ञ सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करता
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३ पद-भाष्य यत् प्राणेन घ्राणेन पार्थिवेन अन्तःकरणकी और प्राणकी नासिकापुटान्तरवस्थितेनान्तः- वृत्तियोंके सहित नासिकारन्ध्रमें स्थित एवं पृथिवीके कार्यभूत प्राण यानी करणप्राणवृत्तिभ्यां सहितेन यन्न घ्राणके द्वारा जो प्राणन अर्थात् गन्ध- प्राणिति गन्धवन्न विषयीकरोति, युक्त वस्तुओंको विषय नहीं करता, बल्कि जिस चैतन्यात्मज्योतिसे येन चैतन्यात्मज्योतिषावभास्य- प्रकाश्यरूपसे प्राण अपने विषयकी त्वेन स्वविषयं प्रति प्राणः प्रणी- ओर प्रवृत्त किया जाता है वही ब्रह्म है इत्यादि शेष सब अर्थ पहले- यते तदेवैत्यादि सर्वं समानम् ॥८॥ हीके समान है ॥ ८ ॥ इति प्रथमः खण्डः ॥१॥ वाक्य-भाष्य इति स्मृतेः । "तस्य भासा" है" इस स्मृतिसे और "उसीके तेजसे (मुं० उ० २।२।१०) इति [ यह सब प्रकाशित है]" इस आथर्वणी चाथर्वणे । येन प्राण इति क्रिया- श्रुतिसे भी यही प्रमाणित होता है । 'येन प्राणः' इस श्रुतिका यह तात्पर्य है शक्तिरप्यात्मविज्ञाननिमित्तेत्ये- कि क्रियाशक्ति भी आत्मविज्ञानके तत् ॥५॥६॥ ॥७॥ ॥८॥ कारण ही प्रवृत्त होती है ॥ ५-८ ॥ इति प्रथमः खण्डः ॥ १ ॥
५४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
५४ केनोपनिषद् [ खण्ड २
द्वितीय खण्ड
ब्रह्मज्ञानकी अनिर्वचनीयता पद-भाष्य एवं हेयोपादेयविपरीतस्त्व- | इस प्रकार हेयोपादेयसे विपरीत मात्मा ब्रह्मेति प्रत्यायितः शिष्यः | तू आत्मा ही ब्रह्म है—ऐसी प्रतीति अहमेव ब्रह्मेति सुष्ठु वेदाहमिति | कराया हुआ शिष्य यह न समझ मा गृह्णीयादित्याशयादाहाचार्यः | बैठे कि 'ब्रह्म मैं ही हूँ, ऐसा मैं उसे शिष्यबुद्धिविचालनार्थम्—यदि- | अच्छी तरह जानता हूँ' इस त्यादि । | अभिप्रायसे उसकी बुद्धिको [ इस निश्चयसे ] विचलित करनेके लिये आचार्यने 'यदि मन्यसे'इत्यादि कहा। नन्विष्टैव सु वेदाहम् इति | पूर्व०—मैं उसे अच्छी तरह निश्चिता प्रतिपत्तिः । | जानता हूँ—ऐसा निश्चित ज्ञान तो इष्ट ही है । सत्यम्, इष्टा निश्चिता प्रति- | सिद्धान्ती—ठीक है, निश्चित पत्तिः; न हि सु वेदा- | ज्ञान तो अवश्य इष्ट ही है, परन्तु ब्रह्मणोऽवेद्यत्वे हेतुः | 'मैं उसे अच्छी तरह जानता हूँ' हमिति । यद्धि वेद्यं | ऐसा कथन इष्ट नहीं है । जो वेद्य वस्तु विषयीभवति, तत्सुष्ठु | वस्तु वेत्ताकी विषय होती है वही वेदितुं शक्यम्, दाह्यमिव दग्धुम् | अच्छी तरह जानी जा सकती है; अग्नेर्दग्धुः न त्वग्नेः स्वरूपमेव । | जिस प्रकार दहन करनेवाले अग्नि- के दाहका विषय दाह्य पदार्थ ही हो सकता है उसका स्वरूप नहीं सर्वस्य हि वेदितुः स्वात्मा ब्रह्मेति | हो सकता । 'ब्रह्म सभी ज्ञाताओंका सर्ववेदान्तानां सुनिश्चितोऽर्थः। | आत्मा (अपना-आप) ही है' यह समस्त वेदान्तोंका भलीभाँति निश्चय इह च तदेव प्रतिपादितं प्रश्न- | किया हुआ अर्थ है । यहाँ भी
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५ पद-भाष्य प्रतिवचनोक्त्या ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ | ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ इत्यादि प्रश्नोत्तरों- इत्यादि । ‘यद्वाचानभ्युदितम्’ | द्वारा उसीका प्रतिपादन किया गया इति च विशेषतोऽवधारितम् । | है । उसीको ‘यद्वाचानभ्युदितम्’ ब्रह्मवित्सम्प्रदायनिश्चयश्चोक्तः | इस वाक्यद्वारा विशेषरूपसे निश्चय ‘अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- | किया है । ‘वह विदितसे अन्य है दितादधि’ इति । उपन्यस्तमुप- | और अविदितसे भी ऊपर है’ इस संहरिष्यति च ‘अविज्ञातं वि- | वाक्यद्वारा ब्रह्मवेत्ताओंके सम्प्रदाय- जानतां विज्ञातमविजानताम्’ | का निश्चय भी बतलाया गया है; इति । तस्माद्युक्तमेव शिष्यस्य सु | तथा इस प्रकार उल्लेख किये हुए वेदेति बुद्धिं निराकर्तुम् । | प्रकरणका ‘अविज्ञातं विजानतां न हि वेदिता वेदितुर्वेदितुं | विज्ञातमविजानताम्’ इस वाक्यद्वारा शक्यः अग्निर्द्धग्धुरिव दग्धुमग्नेः । | उपसंहार करेंगे । अतः ‘मैं अच्छी | तरह जानता हूँ’ ऐसी शिष्यकी | बुद्धिका निराकरण करना उचित | ही है । | जिस प्रकार जलानेवाले अग्नि- | द्वारा स्वयं अग्नि नहीं जलाया जा | सकता उसी प्रकार जाननेवालेके वाक्य-भाष्य यदि मन्यसे सुवेद इति | ‘यदि मन्यसे सुवेद’ इत्यादि वाक्यसे शिष्यबुद्धिविचालना गृहीत- | जो शिष्यकी बुद्धिको विचलित करना स्थिरतायै । विदिताविदि- | है वह उसके ग्रहण किये हुए अर्थको ताभ्यां निवर्त्य बुद्धिं शिष्यस्य | स्थिर करनेके लिये ही है । शिष्यकी स्वात्मन्यवस्थाप्य तदेव ब्रह्म त्वं | बुद्धिको ज्ञात और अज्ञात वस्तुओंसे विद्धीति स्वाराज्येऽभिषिच्य | हटाकर ‘तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि’ (उसीको उपास्यप्रतिषेधेनाथास्य बुद्धिं | तू ब्रह्म जान ) इस कथनसे अपने विचालयति । | आत्मस्वरूपमें स्थिर कर तथा उपास्यके | प्रतिषेधद्वारा उसे स्वाराज्यपर अभिषिक्त- | कर अब उसकी बुद्धिको विचलित | करते हैं ।
५६ केनोपनिषद् [ खण्ड २
५६ केनोपनिषद् [ खण्ड २ ❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧ पद-भाष्य न चान्यो वेदिता ब्रह्मणोऽस्ति | द्वारा स्वयं जाननेवाला नहीं जाना यस्य वेद्यमन्यत्स्याद्ब्रह्म । "नान्य- | जा सकता । ब्रह्मका जाननेवाला कोई और है भी नहीं जिसका वह दतोऽस्ति विज्ञातृ" (बृ० उ० | उससे भिन्न ब्रह्म ज्ञेय हो सके । ३।८।११) इत्यन्यो विज्ञाता | "इससे भिन्न और कोई ज्ञाता नहीं है" इस श्रुतिद्वारा भी ब्रह्मसे भिन्न प्रतिषिध्यते । तस्मात् सुष्ठु वेदाहं | ज्ञाताका प्रतिषेध किया गया है । अतः 'मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता ब्रह्मेति प्रतिपत्तिर्मिथ्यैव । तस्माद् | हूँ' यह समझना मिथ्या ही है । इसलिये गुरुने 'यदि मन्यसे' युक्तमेवाहाचार्यो यदीत्यादि । | इत्यादि ठीक ही कहा है । यदि मन्यसे सुवेदेति दहरमेवापि नूनम् । त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपं यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम् ॥ १ ॥ यदि तू ऐसा मानता है कि 'मैं अच्छी तरह जानता हूँ, तो निश्चय ही तू ब्रह्मका थोड़ा-सा ही रूप जानता है । इसका जो रूप तू जानता है और इसका जो रूप देवताओंमें विदित है [ वह भी अल्प ही है ] अतः तेरे लिये ब्रह्म विचारणीय ही है । [ तब शिष्यने एकान्त देशमें विचार करनेके अनन्तर कहा— ] 'मैं ब्रह्मको जान गया—ऐसा समझता हूँ' ॥ १ ॥ पद-भाष्य यदि कदाचित् मन्यसे सु | यदि कदाचित् तू ऐसा मानता वेदेति सुष्ठु वेदाहं ब्रह्मेति । | हो कि मैं ब्रह्मको अच्छी तरह वाक्य-भाष्य यदि मन्यसे सुवेद अहं | यदि तू यह मानता है कि मैं ब्रह्मको ब्रह्मेति त्वं ततोऽल्पमेव ब्रह्मणो | अच्छी तरह जानता हूँ तो तू निश्चय १ 'दभ्रमेव' ऐसा भी पाठ है ।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ पद-भाष्य कदाचिद्यथाश्रुतं दुर्विज्ञेयमपि | जानता हूँ । जिसके दोष क्षीण हो क्षीणदोषः सुमेधाः कश्चित्प्रति- | गये हैं ऐसा कोई बुद्धिमान् पुरुष कभी सुने हुएके अनुसार दुर्विज्ञेय पद्यते कश्चिन्नेति साशङ्कमाह | विषयको भी समझ लेता है और कोई नहीं भी समझता—इस यदीत्यादि । दृष्टं च “य एषोऽ- | आशयसे ही [गुरुने] 'यदि मन्यसे' इत्यादि शंकायुक्त वाक्य कहा है । क्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति | ऐसा देखा भी गया है कि “यह जो नेत्रोंके भीतर पुरुष दिखायी होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्म” | देता है यही आत्मा है, यही अमृत है, यही अभयपद है और यही (छा० उ० ८।७।४) इत्युक्ते | ब्रह्म है—ऐसा [ब्रह्माने] कहा” इस प्राजापत्यः पण्डितोऽप्यसुरराड्- | प्रकार ब्रह्माजीके कहनेपर प्रजापति-की सन्तान और पण्डित होनेपर विरोचनः स्वभावदोषवशादनुप- | भी असुरराज विरोचनने अपने स्वभावके दोषसे, किसी प्रकार सिद्ध पद्यमानमपि विपरीतमर्थं शरीर- | न होनेपर भी शरीर ही आत्मा है, मात्मेति प्रतिपन्नः । तथेन्द्रो | ऐसा विपरीत अर्थ समझ लिया । तथा देवराज इन्द्रने भी एक, देवराट् सकृद्द्विस्त्रिरुक्तं चाप्रति- | दो तथा तीन बार कहनेपर भी इसका भाव न समझकर अपने पद्यमानः स्वभावदोषक्षयमपेक्ष्य | स्वभावका दोष क्षीण हो जानेके वाक्य-भाष्य रूपं वेत्थ त्वमिति नूनं निश्चितं | ही ब्रह्मके रूपको बहुत कम जानता है—ऐसा आचार्य समझते हैं । परन्तु मन्यत इत्याचार्यः। सा पुनर्वि- | आचार्य जो शिष्यकी बुद्धिको विचलित करते हैं वह किसलिये है—इसपर चालना किमर्थेत्युच्यते-पूर्व- | कहते हैं कि [उनका यह कार्य] शिष्यद्वारा पहले ग्रहण किये हुए अर्थमें गृहीतवस्तुनि बुद्धेः स्थिरतायै । | बुद्धिकी स्थिरताके लिये है ।
५८ केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य चतुर्थे पर्याये प्रथमोक्तमेव ब्रह्म | अनन्तर चौथी बार कहनेपर पहली | ही बार कहे हुए ब्रह्मका ज्ञान प्राप्त प्रतिपन्नवान् । लोकेऽपि एकस्माद् | किया । लोकमें भी एक ही गुरु- | से श्रवण करनेवालोंमें कोई तो गुरोः शृण्वतां कश्चिद्यथावत्प्रति- | ठीक-ठीक समझ लेता है, कोई पद्यते कश्चिदद्यथावत् कश्चिद्विप- | ठीक नहीं समझता है, कोई उलटा | समझ बैठता है और कोई समझता रींतं कश्चिन्न प्रतिपद्यते । किमु | ही नहीं । फिर यदि अतीन्द्रिय | आत्मतत्त्वको न समझ सकें तो वक्तव्यमतीन्द्रियमात्मतत्त्वम् ? | इसमें कहना ही क्या है ? इसके | सम्बन्धमें तो समस्त सद्वादी और अत्र हि विप्रतिपन्नाः सदसद्वादि- | असद्वादी तार्किक भी उलटा ही | समझे हुए हैं । अतः 'ब्रह्मको जान मस्तार्किकाः सर्वे । तस्माद्विदितं | लिया' यह कथन सुनिश्चित होनेपर | भी विषम प्रतिपत्ति (ज्ञान) होनेके ब्रह्मेति सुनिश्चितोक्तमपि विषम- | कारण आचार्यका 'यदि मन्यसे | सुवेद' इत्यादि शंकायुक्त कथन प्रतिपत्तित्वाद् यदि मन्यसे | उचित ही है । [अतः आचार्य इत्यादि साशङ्कं वचनं युक्तमेव | कहते हैं यदि तू 'ब्रह्मको मैने जान | लिया है' ऐसा मानता है तो] आचार्यस्य । दहरम् अल्पमेवापि | निश्चय ही तू ब्रह्मके अल्प रूपको नूनं त्वं वेत्थ जानीषे ब्रह्मणो | ही जानता है । रूपम् । | वाक्य-भाष्य देवेष्वपि सुवेदाहमिति मन्यते यः | उद्देश्यको लेकर आचार्य कहते हैं—] | देवताओंमें भी जो कोई यह मानता है सोऽप्यस्य ब्रह्मणो रूपं दहरमेव | कि मैं ब्रह्मको अच्छी तरह जानता हूँ | वह भी निश्चय ही उस ब्रह्मके रूपको वेत्ति नूनम् । कस्मात् ? अविषय- | बहुत कम जानता है। क्यों ? क्योंकि ब्रह्म त्वात्कस्यचिद्ब्रह्मणः । | किसीका भी विषय नहीं है ।
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९
खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९ पद-भाष्य किमनेकानि ब्रह्मणो रूपाणि | पूर्व०-क्या ब्रह्मके बड़े और महान्त्यर्भकाणि च, येनाह दहर- | छोटे अनेकों रूप हैं, जिससे कि मेवेत्यादि ? | गुरु 'तू ब्रह्मके अल्प रूपको ही | जानता है' ऐसा कह रहे हैं ? बाढम्; अनेकानि हि | सिद्धान्ती-हाँ, नाम-रूपात्मक ब्रह्मण नामरूपोपाधिकृतानि | उपाधिके किये हुए तो ब्रह्मके अनेक औपाधिकभेद- ब्रह्मणो रूपाणि, न | रूप हैं, किन्तु स्वतः नहीं हैं। स्वतः निरूपणम् स्वतः । स्वतस्तु | तो "जो अशब्द, अस्पर्श, रूपरहित, "अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथा- | अव्यय, रसहीन, नित्य और गन्ध- रसं नित्यमगन्धवच्च यत्" ( क० | हीन है" इस श्रुतिके अनुसार उ० १ । ३ । १५, नृसिंहोत्तर० | शब्दादिके सहित उसके सभी रूपों- ९, मुक्तिक० २ । ७२ ) इति | का प्रतिषेध किया जाता है । शब्दादिभिः सह रूपाणि प्रति- | षिध्यन्ते । | पूर्व०-जिस धर्मके द्वारा जिसका ननु येनैव धर्मेण यद्रूप्यते | निरूपण किया जाता है वही उसका तदेव तस्य स्वरूपमिति ब्रह्मणोऽपि | रूप हुआ करता है; अतः ब्रह्मका भी येन विशेषेण निरूपणं तदेव | जिस विशेषणसे निरूपण होता है वही तस्य स्वरूपं स्यात् । अत उच्यते- | उसका स्वरूप होना चाहिये । अतः चैतन्यम् पृथिव्यादीनामन्य- | कहते हैं—चैतन्य पृथिवी आदिका तमस्य सर्वेषां विपरिणतानां वा | अथवा परिणामको प्राप्त हुए अन्य वाक्य-भाष्य अथवाल्पमेवास्याध्यात्मिकं | अथवा इसका इस प्रकार सम्बन्ध मनुष्येषु देवेषु च आधिदैविक- | लगाना चाहिये कि इस ब्रह्मका जो मस्य ब्रह्मणो यद्रूपं तदिति | मनुष्योंमें आध्यात्मिक और देवताओंमें सम्बन्धः । अथ न्विति हेतु- | आधिदैविक रूप है वह बहुत तुच्छ ही मीमांसायाः । यस्माद्दहरमेव सु | है। 'अथ नु' ऐसा कहकर ब्रह्मके विदितं ब्रह्मणो रूपमन्यदेव तद्विदि- | -विचारमें हेतु प्रदर्शित करते हैं। क्योंकि | 'ब्रह्म विदितसे पृथक् ही है'—ऐसा कहे | जानेके कारण ब्रह्मका अच्छी प्रकार | जाना हुआ रूप तो अल्प ही है। केनो० ३—
६० केनोपनिषद् [ खण्ड २
६० केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य धर्मो न भवति, तथा श्रोत्रादी- | समस्त पदार्थोंमेंसे किसीका धर्म नहीं नामन्तःकरणस्य च धर्मो न | है और न वह श्रोत्रादि इन्द्रिय अथवा भवतीति ब्रह्मणो रूपमिति ब्रह्म | अन्तःकरणका ही धर्म है, अतएव रूप्यते चैतन्येन । तथा चोक्तम् । | वह ब्रह्मका रूप है, इसीलिये “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म” (बृ० उ० | ब्रह्मका चैतन्यरूपसे निरूपण किया ३।९।२८) “विज्ञानघन एव” | जाता है। ऐसा ही कहा भी है— (बृ० उ० २।४।१२) “सत्यं | “ब्रह्म विज्ञान और आनन्दस्वरूप है” ज्ञानमनन्तं ब्रह्म” (तै० उ० | “वह विज्ञानघन ही है” “ब्रह्म सत्य २।१।१) “प्रज्ञानं ब्रह्म” | ज्ञान और अनन्तस्वरूप है” “प्रज्ञान (ऐ० उ० ५ । ३) इति च | ब्रह्म है” इस प्रकार श्रुतियोंमें भी ब्रह्मणो रूपं निर्दिष्टं श्रुतिषु । | ब्रह्मके रूपका निरूपण किया गया है । सत्यमेवम्; तथापि तदन्तः- | सिद्धान्ती—यह ठीक है, तथापि करणदेहेन्द्रियोपाधिद्वारेणैव वि- | वह अन्तःकरण, शरीर और इन्द्रिय- रूप उपाधिके द्वारा ही विज्ञानादि ज्ञानादिशब्दैर्निर्दिश्यते, तदनु- | शब्दोंसे निरूपण किया जाता है, कारित्वाद् देहादिवृद्धिसङ्कोच- | क्योंकि देहादिके वृद्धि, संकोच, वाक्य-भाष्य तादित्युक्तत्वात्। सुवेदेति च मन्य- | और तू यह मानता ही है कि मैं उसे अच्छी सेऽतोऽल्पमेव वेत्थ त्वं ब्रह्मणो | तरह जानता हूँ। इसलिये तू ब्रह्मके अल्प स्वरूपको ही जानता है। क्योंकि ऐसी रूपं यत्साद्य नु तत्सान्मीमांस्यम् | बात है, इसलिये जबतक तुझे विदित और अविदितका प्रतिषेध करनेवाले एवाद्यापि ते तव ब्रह्म विचार्यमेव | शास्त्रवचनका अनुभव न हो तबतक तो अब भी मैं तेरे लिये ब्रह्मको मीमांसा यावद्विदिताविदितप्रतिषेधागमा- | यानी विचारके योग्य ही समझता हूँ; र्थानुभव इत्यर्थः । | यह इसका तात्पर्य है ।