भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

ततः कृष्णस्य तद् वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम् ।

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

भीष्मका अपनी असमर्थता प्रकट करना, भगवान्‌का उन्हें वर देना तथा ऋषियों एवं पाण्डवोंका दूसरे दिन आनेका संकेत करके वहाँसे विदा होकर अपने-अपने स्थानोंको जाना

वैशम्पायन उवाच

ततः कृष्णस्य तद् वाक्यं धर्मार्थसहितं हितम् ।
श्रुत्वा शान्तनवो भीष्मः प्रत्युवाच कृताञ्जलिः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! श्रीकृष्णका यह धर्म और अर्थसे युक्त हितकर वचन सुनकर शान्तनुनन्दन भीष्मने दोनों हाथ जोड़कर कहा— ॥ १ ॥

लोकनाथ महाबाहो शिव नारायणाच्युत ।
तव वाक्यमुपश्रुत्य हर्षेणास्मि परिप्लुतः ॥ २ ॥
‘लोकनाथ! महाबाहो! शिव! नारायण! अच्युत! आपका यह वचन सुनकर मैं आनन्दके समुद्रमें निमग्न हो गया हूँ ॥ २ ॥

किं चाहमभिधास्यामि वाक्यं ते तव संनिधौ ।
यदा वाचोगतं सर्वं तव वाचि समाहितम् ॥ ३ ॥
‘भला’ मैं आपके समीप क्या कह सकूँगा? जब कि वाणीका सारा विषय आपकी वेदमयी वाणीमें प्रतिष्ठित है ॥ ३ ॥

यच्च किंचित् क्वचिल्लोके कर्तव्यं क्रियते च यत् ।
त्वत्तस्तन्निःसृतं देव लोके बुद्धिमतो हि ते ॥ ४ ॥
‘देव! लोकमें कहीं भी जो कुछ कर्तव्य किया जाता है, वह सब आप बुद्धिमान् परमेश्वरसे ही प्रकट हुआ है ॥

कथयेद् देवलोकं यो देवराजसमीपतः ।
धर्मकामार्थमोक्षाणां सोऽर्थं ब्रूयात् तवाग्रतः ॥ ५ ॥
‘जो मनुष्य देवराज इन्द्रके निकट देवलोकका वृत्तान्त बतानेका साहस कर सके, वही आपके सामने धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी बात कह सकता है ॥ ५ ॥

शराभितापाद् व्यथितं मनो मे मधुसूदन ।
गात्राणि चावसीदन्ति न च बुद्धिः प्रसीदति ॥ ६ ॥
‘मधुसूदन! इन बाणोंके गड़नेसे जो जलन हो रही है, उसके कारण मेरे मनमें बड़ी व्यथा है। सारा शरीर पीड़ाके मारे शिथिल हो गया है और बुद्धि कुछ काम नहीं दे रही

है॥ ६॥ न च मे प्रतिभा काचिदस्ति किंचित् प्रभाषितुम्। पीड्यमानस्य गोविन्द विषानलसमैः शरैः॥ ७॥ ‘गोविन्द! ये बाण विष और अग्निके समान मुझे निरन्तर पीड़ा दे रहे हैं; अतः मुझमें कुछ भी कहनेकी शक्ति नहीं रह गयी है॥ ७॥

बलं मे प्रजहातीव प्राणाः संत्वरयन्ति च। मर्माणि परितप्यन्ति भ्रान्तचित्तस्तथा ह्यहम्॥ ८॥ ‘मेरा बल शरीरको छोड़ता-सा जान पड़ता है। ये प्राण निकलनेको उतावले हो रहे हैं। मेरे मर्मस्थानोंमें बड़ी पीड़ा हो रही है; अतः मेरा चित्त भ्रान्त हो गया है॥

दौर्बल्यात् सज्जते वाङ् मे स कथं वक्तुमुत्सहे। साधु मे त्वं प्रसीदस्व दाशार्हकुलवर्धन॥ ९॥ ‘दुर्बलताके कारण मेरी जीभ तालूमें सट जाती है, ऐसी दशामें मैं कैसे बोल सकता हूँ? दशार्हकुलकी वृद्धि करनेवाले प्रभो! आप मुझपर पूर्णरूपसे प्रसन्न हो जाइये॥ ९॥

तत् क्षमस्व महाबाहो न ब्रूयां किंचिदच्युत। त्वत्संनिधौ च सीदेद्धि वाचस्पतिरपि ब्रुवन्॥ १०॥ ‘महाबाहो! क्षमा कीजिये। मैं बोल नहीं सकता। आपके निकट प्रवचन करनेमें बृहस्पतिजी भी शिथिल हो सकते हैं; फिर मेरी क्या बिसात है?॥ १०॥

न दिशः सम्प्रजानामि नाकाशं न च मेदिनीम्। केवलं तव वीर्येण तिष्ठामि मधुसूदन॥ ११॥ ‘मधुसूदन! मुझे न तो दिशाओंका ज्ञान है और न आकाश एवं पृथ्वीका ही भान हो रहा है। केवल आपके प्रभावसे ही जी रहा हूँ॥ ११॥

स्वयमेव भवांस्तस्माद् धर्मराजस्य यद्धितम्। तद् ब्रवीत्वाशु सर्वेषामागमानां त्वमागमः॥ १२॥ ‘इसलिये आप स्वयं ही जिसमें धर्मराजका हित हो, वह बात शीघ्र बताइये; क्योंकि आप शास्त्रोंके भी शास्त्र हैं॥ १२॥

कथं त्वयि स्थिते कृष्णे शाश्वते लोककर्तरि। प्रब्रूयान्मद्विधः कश्चिद् गुरौ शिष्य इव स्थिते॥ १३॥ ‘श्रीकृष्ण! आप जगत्के कर्ता और सनातन पुरुष हैं। आपके रहते हुए मेरे-जैसा कोई भी मनुष्य कैसे उपदेश कर सकता है? क्या गुरुके रहते हुए शिष्य उपदेश देनेका अधिकारी है?’॥ १३॥

वासुदेव उवाच

उपपन्नमिदं वाक्यं कौरवाणां धुरन्धरे।

महावीर्ये महासत्त्वे स्थिरे सर्वार्थदर्शिनि ॥ १४ ॥
**भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**भीष्मजी! आप कुरुकुलका भार वहन करनेवाले, महापराक्रमी, परम धैर्यवान्, स्थिर तथा सर्वार्थदर्शी हैं; आपका यह कथन सर्वथा युक्तिसंगत है ॥ १४ ॥

यच्च मामात्थ गाङ्गेय बाणघातरुजं प्रति ।
गृहाणात्र वरं भीष्म मत्प्रसादकृतं प्रभो ॥ १५ ॥
गङ्गानन्दन भीष्म! प्रभो! बाणोंके आघातसे होनेवाली पीड़ाके विषयमें जो आपने कहा है, उसके लिये आप मेरी प्रसन्नतासे दिये हुए इस 'वर' को ग्रहण करें ॥ १५ ॥

न ते ग्लानिर्न ते मूर्छा न दाहो न च ते रुजा ।
प्रभविष्यन्ति गाङ्गेय क्षुत्पिपासे न चाप्युत ॥ १६ ॥
गङ्गाकुमार! अब आपको न ग्लानि होगी न मूर्छा; न दाह होगा न रोग, भूख और प्यासका कष्ट भी नहीं रहेगा ॥ १६ ॥

ज्ञानानि च समग्राणि प्रतिभास्यन्ति तेऽनघ ।
न च ते क्वचिदासक्तिर्बुद्धेः प्रादुर्भविष्यति ॥ १७ ॥
अनघ! आपके अन्तःकरणमें सम्पूर्ण ज्ञान प्रकाशित हो उठेंगे। आपकी बुद्धि किसी भी विषयमें कुण्ठित नहीं होगी ॥ १७ ॥

सत्त्वस्थं च मनो नित्यं तव भीष्म भविष्यति ।
रजस्तमोभ्यां रहितं घनैर्मुक्त इवोडुराट् ॥ १८ ॥
भीष्म! आपका मन मेघके आवरणसे मुक्त हुए चन्द्रमाकी भाँति रजोगुण और तमोगुणसे रहित होकर सदा सत्त्वगुणमें स्थित रहेगा ॥ १८ ॥

यद् यच्च धर्मसंयुक्तमर्थयुक्तमथापि च ।
चिन्तयिष्यसि तत्राग्र्या बुद्धिस्तव भविष्यति ॥ १९ ॥
आप जिस-जिस धर्मयुक्त या अर्थयुक्त विषयका चिन्तन करेंगे, उसमें आपकी बुद्धि सफलतापूर्वक आगे बढ़ती जायगी ॥ १९ ॥

इमं च राजशार्दूल भूतग्रामं चतुर्विधम् ।
चक्षुर्दिव्यं समाश्रित्य द्रक्ष्यस्यमितविक्रम ॥ २० ॥
अमितपराक्रमी नृपश्रेष्ठ! आप दिव्य दृष्टि पाकर स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज और जरायुज—इन चारों प्रकारके प्राणियोंको देख सकेंगे ॥ २० ॥

संसरन्तं प्रजाजालं संयुक्तो ज्ञानचक्षुषा ।
भीष्म द्रक्ष्यसि तत्त्वेन जले मीन इवामले ॥ २१ ॥
भीष्म! ज्ञानदृष्टिसे सम्पन्न होकर आप संसारबन्धनमें पड़नेवाले सम्पूर्ण जीवसमुदायको उसी तरह यथार्थ रूपसे देख सकेंगे, जैसे मत्स्य निर्मल जलमें सब कुछ देखता रहता है ॥ २१ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततस्ते व्याससहिताः सर्व एव महर्षयः।
ऋग्यजुःसामसहितैर्वचोभिः कृष्णमार्चयन् ॥ २२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर व्याससहित सम्पूर्ण महर्षियोंने ऋक्, यजु तथा सामवेदके मन्त्रोंसे भगवान् श्रीकृष्णका पूजन किया ॥ २२ ॥

ततः सर्वार्तवं दिव्यं पुष्पवर्षं नभस्तलात् ।
पपात यत्र वार्ष्णेयः सगाङ्गेयः सपाण्डवः ॥ २३ ॥
तत्पश्चात् जहाँ गङ्गापुत्र भीष्म और पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके साथ वृष्णिवंशी भगवान् श्रीकृष्ण विराजमान थे, वहाँ आकाशसे सभी ऋतुओंमें खिलनेवाले दिव्य पुष्पोंकी वर्षा होने लगी ॥ २३ ॥

वादित्राणि च सर्वाणि जगुश्चाप्सरसां गणाः ।
न चाहितमनिष्ठं च किञ्चित्तत्र प्रददृश्यते ॥ २४ ॥
सब प्रकारके बाजे बजने लगे, अप्सराओंके समुदाय गीत गाने लगे। वहाँ कुछ भी ऐसा नहीं देखा जाता था जो अहितकर और अनिष्टकारक हो ॥ २४ ॥

ववौ शिवः सुखो वायुः सर्वगन्धवहः शुचिः ।
शान्तायां दिशि शान्ताश्च प्रावदन् मृगपक्षिणः ॥ २५ ॥
शीतल, सुखद, मन्द, पवित्र एवं सर्वथा सुगन्धयुक्त वायु चल रही थी, सम्पूर्ण दिशाएँ शान्त थीं और उनमें रहनेवाले पशु एवं पक्षी शान्तभावसे मनोहर वचन बोल रहे थे ॥ २५ ॥

ततो मुहूर्ताद् भगवान् सहस्रांशुर्दिवाकरः ।
दहन् वनमिवैकान्ते प्रतीच्यां प्रत्यदृश्यत ॥ २६ ॥
इसी समय दो ही घड़ीमें भगवान् सहस्रकिरणमाली दिवाकर पश्चिम दिशाके एकान्त प्रदेशमें वहाँके वनप्रान्तको दग्ध करते हुए-से दिखायी दिये ॥ २६ ॥

ततो महर्षयः सर्वे समुत्थाय जनार्दनम् ।
भीष्ममामन्त्रयाञ्चक्रू राजानं च युधिष्ठिरम् ॥ २७ ॥
तब सभी महर्षियोंने उठकर भगवान् श्रीकृष्ण, भीष्म तथा राजा युधिष्ठिरसे विदा माँगी ॥ २७ ॥

ततः प्रणाममकरोत् केशवः सहपाण्डवः ।
सात्यकिः संजयश्चैव स च शारद्वतः कृपः ॥ २८ ॥
इसके बाद पाण्डवोंसहित श्रीकृष्ण, सात्यकि, संजय तथा शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्यने उन सबको प्रणाम किया ॥ २८ ॥

ततस्ते धर्मनिरताः सम्यक् तैरभिपूजिताः ।
श्वः समेष्याम इत्युक्त्वा यथेष्टं त्वरिता ययुः ॥ २९ ॥

उनके द्वारा भलीभाँति पूजित हुए वे धर्मपरायण महर्षि, 'हमलोग फिर कल सबेरे यहाँ आयेंगे' ऐसा कहकर तुरंत ही अपने-अपने अभीष्ट स्थानको चले गये ।। २९ ।। तथैवामन्त्र्य गाङ्गेयं केशवः पाण्डवास्तथा । प्रदक्षिणमुपावृत्य रथानारुरुहुः शुभान् ।। ३० ।। इसी प्रकार श्रीकृष्ण और पाण्डव भी गङ्गानन्दन भीष्मजीसे जानेकी आज्ञा ले उनकी परिक्रमा करके अपने मङ्गलमय रथोंपर जा बैठे ।। ३० ।। ततो रथैः काञ्चनचित्रकूबरै- र्महीधराभैः समदैश्च दन्तिभिः । हयैः सुपर्णैरिव चाशुगामिभिः पदातिभिश्चात्तशरासनादिभिः ।। ३१ ।। ययौ रथानां पुरतो हि सा चमू- स्तथैव पश्चादतिमात्रसारिणी । पुरश्च पश्चाच्च यथा महानदी तमृक्षवन्तं गिरिमेत्य नर्मदा ।। ३२ ।। सुवर्णनिर्मित विचित्र कूबरोंवाले रथों, पर्वताकार मतवाले हाथियों, गरुड़के समान तीव्रगतिसे चलनेवाले घोड़ों तथा हाथमें धनुष-बाण आदि लिये हुए पैदल सैनिकोंसे युक्त वह विशाल सेना रथोंके आगे और पीछे भी बहुत दूरतक फैलकर वैसी ही शोभा पाने लगी, जैसे ऋक्षवान् पर्वतके पास पहुँचकर पूर्व और पश्चिम दिशामें भी प्रवाहित होनेवाली महानदी नर्मदा सुशोभित होती है ।। ३१-३२ ।। ततः पुरस्ताद् भगवान् निशाकरः समुत्थितस्तामभिहर्षयंश्चमूम् । दिवाकरापीतरसा महौषधीः पुनः स्वकेनैव गुणेन योजयन् ।। ३३ ।। इसके बाद पूर्व दिशाके आकाशमें भगवान् चन्द्रदेवका उदय हुआ, जो उस सेनाका हर्ष बढ़ा रहे थे और सूर्यने जिन बड़ी-बड़ी ओषधियोंका रस पी लिया था, उन सबको अपनी सुधावर्षी किरणों-द्वारा पुनः उनके स्वाभाविक गुणोंसे सम्पन्न कर रहे थे ।। ३३ ।। ततः पुरं सुरपुरसम्मितद्युति प्रविश्य ते यदुवृषपाण्डवास्तदा । यथोचितान् भवनवरान् समाविशन् श्रमान्विता मृगपतयो गुहा इव ।। ३४ ।। तदनन्तर वे यदुकुलके श्रेष्ठ वीर तथा पाण्डव सुरपुरके समान शोभा पानेवाले हस्तिनापुरमें प्रवेश करके यथायोग्य श्रेष्ठ महलोंके भीतर चले गये। ठीक उसी तरह, जैसे थके-मांदे सिंह विश्रामके लिये पर्वतकी कन्दराओंमें प्रवेश करते हैं ।। ३४ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि युधिष्ठिराद्यागमने द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें युधिष्ठिर आदिका आगमनविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥

अध्याय (पृष्ठ 352)

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णकी प्रातश्चर्या, सात्यकिद्वारा उनका संदेश पाकर भाइयोंसहित युधिष्ठिरका उन्हींके साथ कुरुक्षेत्रमें पधारना

वैशम्पायन उवाच

ततः शयनमाविश्य प्रसुप्तो मधुसूदनः ।
याममात्रार्धशेषायां यामिन्यां प्रत्यबुध्यत ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्ण एक सुन्दर शय्याका आश्रय लेकर सो गये। जब आधा पहर रात बीतनेको बाकी रह गयी, तब वे जागकर उठ बैठे ॥ १ ॥

स ध्यानपथमाविश्य सर्वज्ञानानि माधवः ।
अवलोक्य ततः पश्चाद् दध्यौ ब्रह्म सनातनम् ॥ २ ॥
तत्पश्चात् ध्यानमार्गमें स्थित हो माधव सम्पूर्ण ज्ञानोंको प्रत्यक्ष करके अपने सनातन ब्रह्मस्वरूपका चिन्तन करने लगे ॥ २ ॥

ततः स्तुतिपुराणज्ञा रक्तकण्ठाः सुशिक्षिताः ।
अस्तुवन् विश्वकर्माणं वासुदेवं प्रजापतिम् ॥ ३ ॥
इसी समय स्तुति और पुराणोंके ज्ञाता, मधुरकण्ठवाले, सुशिक्षित सूत-मागध और वन्दीजन विश्वनिर्माता, प्रजापालक उन भगवान् वासुदेवकी स्तुति करने लगे ॥ ३ ॥

पठन्ति पाणिस्वनिकास्तथा गायन्ति गायनाः ।
शङ्खांश्च मृदङ्गांश्च प्रवादयन्ति सहस्रशः ॥ ४ ॥
हाथसे वीणा आदि बजानेवाले पुरुष स्तुतिपाठ करने लगे, गायक गीत गाने लगे और सहस्रों मनुष्य शंख एवं मृदङ्ग बजाने लगे ॥ ४ ॥

वीणापणववेणूनां स्वनश्चातिमनोरमः ।
सहास इव विस्तीर्णः शुश्रुवे तस्य वेश्मनः ॥ ५ ॥
वीणा, पणव तथा मुरलीका अत्यन्त मनोरम स्वर इस तरह सुनायी देने लगा, मानो उस महलका अट्टहास सब ओर फैल रहा हो ॥ ५ ॥

ततो युधिष्ठिरस्यापि राज्ञो मङ्गलसंहिताः ।
उच्चेरुरर्मधुरा वाचो गतिवादित्रनिःस्वनाः ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरके भवनसे भी मधुर, मङ्गलमयी वाणी तथा गीत-वाद्यकी ध्वनि प्रकट होने लगी ॥ ६ ॥

तत उत्थाय दाशार्हः स्नातः प्राञ्जलिरच्युतः ।
जप्त्वा गुह्यं महाबाहुरग्नीनाश्रित्य तस्थिवान् ॥ ७ ॥
तत्पश्चात् अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होने वाले महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णने शय्यासे उठकर स्नान किया, फिर गूढ़ गायत्री-मन्त्रका जप करके हाथ जोड़े हुए अग्निके समीप जा बैठे ॥ ७ ॥

ततः सहस्रं विप्राणां चतुर्वेदविदां तथा ।
गवां सहस्रेणैकैकं वाचयामास माधवः ॥ ८ ॥
वहाँ अग्निहोत्र करनेके अनन्तर भगवान् माधवने चारों वेदोंके विद्वान् एक हजार ब्राह्मणोंको बुलाकर प्रत्येकको एक-एक हजार गौएँ दान कीं और उनसे वेदमन्त्रोंका पाठ एवं स्वस्तिवाचन कराया ॥ ८ ॥

मङ्गलालम्भनं कृत्वा आत्मानमवलोक्य च ।
आदर्शे विमले कृष्णस्ततः सात्यकिमब्रवीत् ॥ ९ ॥
इसके बाद माङ्गलिक वस्तुओंका स्पर्श करके भगवान्‌ने स्वच्छ दर्पणमें अपने स्वरूपका दर्शन किया और सात्यकिसे कहा— ॥ ९ ॥

गच्छ शैनेय जानीहि गत्वा राजनिवेशनम् ।
अपि सज्जो महातेजा भीष्मं द्रष्टुं युधिष्ठिरः ॥ १० ॥
‘शिनिनन्दन! जाओ, राजमहलमें जाकर पता लगाओ कि महातेजस्वी राजा युधिष्ठिर भीष्मजीके दर्शनार्थ चलनेके लिये तैयार हो गये क्या?’ ॥ १० ॥

ततः कृष्णस्य वचनात् सात्यकिस्त्वरितो ययौ ।
उपगम्य च राजानं युधिष्ठिरमभाषत ॥ ११ ॥
श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर सात्यकि तुरंत वहाँसे चल दिये और राजा युधिष्ठिरके पास जाकर बोले— ॥ ११ ॥

युक्तो रथवरो राजन् वासुदेवस्य धीमतः ।
समीपमापगेयस्य प्रयास्यति जनार्दनः ॥ १२ ॥
‘राजन्! परम बुद्धिमान् भगवान् वासुदेवका श्रेष्ठ रथ जुतकर तैयार हो गया है। श्रीजनार्दन शीघ्र ही गङ्गानन्दन भीष्मके समीप जानेवाले हैं ॥ १२ ॥

भवत्प्रतीक्षः कृष्णोऽसौ धर्मराज महाद्युते ।
यदत्रानन्तरं कृत्यं तद् भवान् कर्तुमर्हति ॥ १३ ॥
‘महातेजस्वी धर्मराज! भगवान् श्रीकृष्ण आपकी ही प्रतीक्षा कर रहे हैं। अब आप जो उचित समझें, वह कार्य कर सकते हैं’ ॥ १३ ॥

एवमुक्तः प्रत्युवाच धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
सात्यकिके इस प्रकार कहनेपर धर्मपुत्र युधिष्ठिरने अर्जुनको यह आदेश दिया ॥ १३ १/२ ॥

युधिष्ठिर उवाच

युज्यतां मे रथवरः फाल्गुनाप्रतिमद्युते ।। १४ ।।
न सैनिकैश्च यातव्यं यास्यामो वयमेव हि ।
न च पीडयितव्यो मे भीष्मो धर्मभृतां वरः ।। १५ ।।
अतः पुरःसराश्चापि निवर्तन्तु धनंजय ।
युधिष्ठिर बोले— अनुपम तेजस्वी अर्जुन! मेरा श्रेष्ठ रथ जोतकर तैयार कराओ। आज सैनिकोंको हमारे साथ नहीं जाना चाहिये। केवल हमलोगोंको ही चलना है। धनंजय! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भीष्मजीको अधिक भीड़ बढ़ाकर कष्ट देना उचित नहीं है। अतः आगे चलनेवाले सैनिकोंको भी जानेके लिये मना कर देना चाहिये ।। १४-१५½ ।।

अद्यप्रभृति गाङ्गेयः परं गुह्यं प्रवक्ष्यति ।। १६ ।।
अतो नेच्छामि कौन्तेय पृथग्जनसमागमम् ।
कुन्तीनन्दन! आजसे गङ्गाकुमार भीष्मजी धर्मके अत्यन्त गूढ़ रहस्यका उपदेश करेंगे। अतः मैं भिन्न-भिन्न रुचि रखनेवाले साधारण जनसमाजको वहाँ नहीं जुटाना चाहता ।। १६½ ।।

वैशम्पायन उवाच

स तद्वाक्यमथाज्ञाय कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।। १७ ।।
युक्तं रथवरं तस्मा आचचक्षे नरर्षभः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! युधिष्ठिरकी आज्ञा शिरोधार्य करके कुन्तीकुमार नरश्रेष्ठ अर्जुनने वैसा ही किया। फिर आकर उन्हें सूचना दी कि महाराजका श्रेष्ठ रथ तैयार है ।। १७½ ।।

ततो युधिष्ठिरो राजा यमौ भीमार्जुनावपि ।। १८ ।।
भूतानीव समस्तानि ययुः कृष्णनिवेशनम् ।
तदनन्तर राजा युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव सब एक रथपर आरूढ़ हो श्रीकृष्णके निवासस्थानपर गये, मानो समस्त महाभूत मूर्तिमान् होकर पधारे हों ।। १८½ ।।

आगच्छत्स्रथ कृष्णोऽपि पाण्डवेषु महात्मसु ।। १९ ।।
शैनेयसहितो धीमान् रथमेवान्वपद्यत ।
महात्मा पाण्डवोंके पदार्पण करनेपर सात्यकिसहित बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्ण भी एक ही रथपर आरूढ़ हो गये ।। १९½ ।।

रथस्थाः संविदं कृत्वा सुखां पृष्ट्वा च शर्वरीम् ।। २० ।।
मेघघोषै रथवरैः प्रययुस्ते नरर्षभाः ।

रथपर बैठे-बैठे ही उन सबने बातचीत की, और एक-दूसरेसे रात्रिके सुखपूर्वक व्यतीत होनेका कुशल-समाचार पूछा। फिर वे नरश्रेष्ठ मेघगर्जनाके समान गम्भीर घोष करनेवाले श्रेष्ठ रथोंद्वारा वहाँसे चल पड़े ॥ २० १/२ ॥

बलाहकं मेघपुष्पं शैब्यं सुग्रीवमेव च ॥ २१ ॥
दारुकश्चोदयामास वासुदेवस्य वाजिनः।
दारुकने वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके बलाहक, मेघपुष्प, शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़ोंको हाँका ॥ २१ १/२ ॥

ते हया वासुदेवस्य दारुकेण प्रचोदिताः ॥ २२ ॥
गां खुराग्रैस्तथा राजन् लिखन्तः प्रययुस्तदा।
राजन्! उस समय दारुकद्वारा हाँके गये श्रीकृष्णके वे घोड़े अपनी टापोंके अग्रभागसे पृथ्वीपर चिह्न बनाते हुए बड़े वेगसे दौड़े ॥ २२ १/२ ॥

ते ग्रसन्त इवाकाशं वेगवन्तो महाबलाः ॥ २३ ॥
क्षेत्रं धर्मस्य कृत्स्नस्य कुरुक्षेत्रमवातरन्।
उन अश्वोंका बल और वेग महान् था। वे आकाशको पीते हुए-से उड़ चले, और बात-की-बातमें सम्पूर्ण धर्मके क्षेत्रभूत कुरुक्षेत्रमें जा पहुँचे ॥ २३ १/२ ॥

ततो ययुर्यत्र भीष्मः शरतल्पगतः प्रभुः ॥ २४ ॥
आस्ते महर्षिभिः सार्धं ब्रह्मा देवगणैर्यथा।
तदनन्तर वे सब लोग उस स्थानपर गये जहाँपर प्रभावशाली भीष्मजी बाणशय्यापर सो रहे थे। जैसे देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्माजी शोभा पाते हैं, उसी प्रकार महर्षियोंके साथ भीष्मजी सुशोभित हो रहे थे ॥ २४ १/२ ॥

ततोऽवतीर्य गोविन्दो रथात् स च युधिष्ठिरः ॥ २५ ॥
भीमो गाण्डीवधन्वा च यमौ सात्यकिरेव च।
ऋषीनभ्यर्चयामासुः करानुद्यम्य दक्षिणान् ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् रथसे उतरकर भगवान् श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर, भीमसेन, गाण्डीवधारी अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा सात्यकिने अपने-अपने दाहिने हाथोंको उठाकर ऋषियोंके प्रति सम्मानका भाव प्रदर्शित किया ॥ २५-२६ ॥

स तैः परिवृतो राजा नक्षत्रैरिव चन्द्रमाः।
अभ्याजगाम गाङ्गेयं ब्रह्माणमिव वासवः ॥ २७ ॥
नक्षत्रोंसे घिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति भाइयोंसे घिरे हुए राजा युधिष्ठिर गङ्गानन्दन भीष्मके समीप गये, मानो देवराज इन्द्र ब्रह्माजीके निकट पधारे हों ॥ २७ ॥

शरतल्पे शयानं तमादित्यं पतितं यथा।
स ददर्श महाबाहुं भयाच्चागतसाध्वसः ॥ २८ ॥

शर-शय्यापर सोये हुए महाबाहु भीष्मजी वैसे ही दिखायी दे रहे थे, मानो सूर्यदेव आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़े हों। युधिष्ठिरने उसी अवस्थामें उनका दर्शन किया। उस समय वे भयसे काँप उठे थे ।। २८ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि भीष्माभिगमने त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ।। ५३ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें युधिष्ठिर आदिका भीष्मके समीप गमनविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५३ ।।

धर्मात्मनि महावीर्ये सत्यसंधे जितात्मनि ।

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्ण और भीष्मजीकी बातचीत

जनमेजय उवाच

धर्मात्मनि महावीर्ये सत्यसंधे जितात्मनि ।
देवव्रते महाभागे शरतल्पगतेऽच्युते ॥ १ ॥
शयाने वीरशयने भीष्मे शान्तनुनन्दने ।
गाङ्गेये पुरुषव्याघ्रे पाण्डवैः पर्युपासिते ॥ २ ॥
काः कथाः समवर्तन्त तस्मिन् वीरसमागमे ।
हतेषु सर्वसैन्येषु तन्मे शंस महामुने ॥ ३ ॥

जनमेजयने पूछा— महामुने! धर्मात्मा, महापराक्रमी, सत्यप्रतिज्ञ, जितात्मा, धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले महाभाग शान्तनुनन्दन गङ्गाकुमार पुरुषसिंह देवव्रत भीष्म जब वीरशय्यापर सो रहे थे और पाण्डव उनकी सेवामें आकर उपस्थित हो गये थे, उस समय वीर पुरुषोंके उस समागमके अवसरपर, जब कि उभयपक्षकी सम्पूर्ण सेनाएँ मारी जा चुकी थीं, कौन-कौनसी बातें हुई? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १—३ ॥

वैशम्पायन उवाच

शरतल्पगते भीष्मे कौरवाणां धुरन्धरे ।
आजग्मुर्ऋषयः सिद्धा नारदप्रमुखा नृप ॥ ४ ॥

वैशम्पायनजीने कहा— नरेश्वर! कौरवकुलका भार वहन करनेवाले भीष्मजी जब बाणशय्यापर सो रहे थे, उस समय वहाँ नारद आदि सिद्ध महर्षि भी पधारे थे ॥ ४ ॥

हतशिष्टाश्च राजानो युधिष्ठिरपुरोगमाः ।
धृतराष्ट्रश्च कृष्णश्च भीमार्जुनयमास्तथा ॥ ५ ॥
तेऽभिगम्य महात्मानो भरतानां पितामहम् ।
अन्वशोचन्त गाङ्गेयमादित्यं पतितं यथा ॥ ६ ॥

महाभारत-युद्धमें जो लोग मरनेसे बच गये थे, वे युधिष्ठिर आदि राजा तथा धृतराष्ट्र, श्रीकृष्ण, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव—ये सभी महामनस्वी पुरुष पृथ्वीपर गिरे हुए सूर्यके समान प्रतीत होनेवाले, भरतवंशियोंके पितामह, गङ्गानन्दन भीष्मजीके पास जाकर बारंबार शोक प्रकट करने लगे ॥ ५-६ ॥

मुहूर्तमिव च ध्यात्वा नारदो देवदर्शनः ।
उवाच पाण्डवान् सर्वान् हतशिष्टांश्च पार्थिवान् ॥ ७ ॥

‘भरतनन्दन युधिष्ठिर तथा अन्य भूपालगण! मैं आप लोगोंको समयोचित कर्तव्य बता रहा हूँ। आपलोग गङ्गानन्दन भीष्मजीसे धर्म और ब्रह्मके विषयमें प्रश्न कीजिये, क

⬅ विषय-सूची (TOC)

तब दिव्य दृष्टि रखनेवाले देवर्षि नारदने दो घड़ीतक कुछ सोच-विचारकर समस्त पाण्डवों तथा मरनेसे बचे हुए अन्य नरेशोंको सम्बोधित करके कहा— ॥ ७ ॥ प्राप्तकालं समाचक्षे भीष्मोऽयमनुयुज्यताम् । अस्तमेति हि गाङ्गेयो भानुमानिव भारत ॥ ८ ॥

महाभारत

भगवान् श्रीकृष्णका देवर्षि नारद एवं पाण्डवोंको लेकर शरशय्यास्थित भीष्मके निकट गमन

‘भरतनन्दन युधिष्ठिर तथा अन्य भूपालगण! मैं आप लोगोंको समयोचित कर्तव्य बता रहा हूँ। आपलोग गङ्गानन्दन भीष्मजीसे धर्म और ब्रह्मके विषयमें प्रश्न कीजिये, क्योंकि अब ये भगवान् सूर्यके समान अस्त होनेवाले हैं ॥ ८ ॥ अयं प्राणानुत्सिसृक्षुस्तं सर्वेऽभ्यनुपृच्छत । कृत्स्नान् हि विविधान् धर्मांश्चातुर्वर्ण्यस्य वेत्त्ययम् ॥ ९ ॥

‘भीष्मजी अपने प्राणोंका परित्याग करना चाहते हैं, अतः आप सब लोग इनसे अपने मनकी बातें पूछ लें; क्योंकि ये चारों वर्णोंके सम्पूर्ण एवं विभिन्न धर्मोंको जानते हैं ॥ ९ ॥ एष वृद्धः पराँल्लोकान् सम्प्राप्नोति तनुं त्यजन् । तं शीघ्रमनुयुञ्जीध्वं संशयान् मनसि स्थितान् ॥ १० ॥ ‘भीष्मजी अत्यन्त वृद्ध हो गये हैं और अपने शरीरका त्याग करके उत्तम लोकोंमें पदार्पण करनेवाले हैं; अतः आप लोग शीघ्र ही इनसे अपने मनके संदेह पूछ लें’ ॥ १० ॥ वैशम्पायन उवाच एवमुक्ते नारदेन भीष्ममीयुर्नराधिपाः । प्रष्टुं चाशक्नुवन्तस्ते वीक्षांचक्रुः परस्परम् ॥ ११ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! नारदजीके ऐसा कहनेपर सब नरेश भीष्मजीके निकट आ गये; परंतु उन्हें उनसे कुछ पूछनेका साहस नहीं हुआ। वे सभी एक दूसरेका मुँह ताकने लगे ॥ ११ ॥ अथोवाच हृषीकेशं पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः । नान्यस्तु देवकीपुत्राच्छक्तः प्रष्टुं पितामहम् ॥ १२ ॥ तब पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने हृषीकेशकी ओर लक्ष्य करके कहा—‘दिव्यज्ञानसम्पन्न देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको छोड़कर दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो पितामहसे प्रश्न कर सके’ ॥ १२ ॥ प्रव्याहर यदुश्रेष्ठ त्वमग्रे मधुसूदन । त्वं हि नस्तात सर्वेषां सर्वधर्मविदुत्तमः ॥ १३ ॥ (फिर श्रीकृष्णसे कहने लगे—) ‘मधुसूदन! यदुश्रेष्ठ! आप ही पहले वार्तालाप आरम्भ कीजिये। तात! आप ही हम सब लोगोंमें सम्पूर्ण धर्मोंके श्रेष्ठ ज्ञाता हैं’ ॥ १३ ॥ एवमुक्तः पाण्डवेन भगवान् केशवस्तदा । अभिगम्य दुराधर्षं प्रव्याजहारयदच्युतः ॥ १४ ॥ पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने दुर्जय भीष्मजीके निकट जाकर इस प्रकार बातचीत की ॥ १४ ॥ वासुदेव उवाच कच्चित् सुखेन रजनी व्युष्टा ते राजसत्तम । विस्पष्टलक्षणा बुद्धिः कच्चिच्चोपस्थिता तव ॥ १५ ॥ **भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**नृपश्रेष्ठ भीष्मजी! आपकी रात सुखसे बीती है न? क्या आपको सभी ज्ञातव्य विषयोंका सुस्पष्टरूपसे दर्शन करानेवाली निर्मल बुद्धि प्राप्त हो गयी? ॥ १५ ॥ कच्चिज्ज्ञानानि सर्वाणि प्रतिभान्ति च तेऽनघ ।

न ग्लायते च हृदयं न च ते व्याकुलं मनः ॥ १६ ॥
निष्पाप भीष्म! क्या आपके अन्तःकरणमें सब प्रकारके ज्ञान प्रकाशित हो रहे हैं? आपके हृदयमें ग्लानि तो नहीं है? आपका मन व्याकुल तो नहीं हो रहा है? ॥ १६ ॥

भीष्म उवाच

दाहो मोहः श्रमश्चैव क्लमो ग्लानिस्तथा रुजा ।
तव प्रसादाद् वार्ष्णेय सद्यः प्रतिगतानि मे ॥ १७ ॥
भीष्मजी बोले— वृष्णिनन्दन! आपकी कृपासे मेरे शरीरकी जलन, मनका मोह, थकावट, विकलता, ग्लानि तथा रोग—ये सब तत्काल दूर हो गये थे ॥ १७ ॥

यच्च भूतं भविष्यच्च भवच्च परमद्युते ।
तत् सर्वमनुपश्यामि पाणौ फलमिवार्पितम् ॥ १८ ॥
परम तेजस्वी पुरुषोत्तम! अब मैं हाथपर रखे हुए फलकी भाँति भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंकी सभी बातें सुस्पष्टरूपसे देख रहा हूँ ॥ १८ ॥

वेदोक्ताश्चैव ये धर्मा वेदान्ताधिगताश्च ये ।
तान् सर्वान् सम्प्रपश्यामि वरदानात् तवाच्युत ॥ १९ ॥
अच्युत! वेदोंमें जो धर्म बताये गये हैं तथा वेदान्तों (उपनिषदों)-द्वारा जिनको जाना गया है, उन सब धर्मोंको मैं आपके वरदानके प्रभावसे प्रत्यक्ष देख रहा हूँ ॥ १९ ॥

शिष्टैश्च धर्मो यः प्रोक्तः स च मे हृदि वर्तते ।
देशजातिकुलानां च धर्मज्ञोऽस्मि जनार्दन ॥ २० ॥
जनार्दन! शिष्ट पुरुषोंने जिस धर्मका उपदेश किया है, वह भी मेरे हृदयमें स्फुरित हो रहा है। देश, जाति और कुलके धर्मोंका भी इस समय मुझे पूर्ण ज्ञान है ॥

चतुर्ष्वश्रमधर्मेषु योऽर्थः स च हृदि स्थितः ।
राजधर्मांश्च सकलानवगच्छामि केशव ॥ २१ ॥
चारों आश्रमोंके धर्मोंमें जो सारभूत तत्त्व है, वह भी मेरे हृदयमें प्रकाशित हो रहा है। केशव! इस समय मैं सम्पूर्ण राजधर्मोंको भी भलीभाँति जानता हूँ ॥ २१ ॥

यच्च यत्र च वक्तव्यं तद् वक्ष्यामि जनार्दन ।
तव प्रसादाद्धि शुभा मनो मे बुद्धिरविशत् ॥ २२ ॥
जनार्दन! जिस विषयमें जो कुछ भी कहने योग्य बात है, वह सब मैं कहूँगा। आपकी कृपासे मेरे हृदयमें निर्मल मन और कल्याणमयी बुद्धिका आवेश हुआ है ॥ २२ ॥

युवेवास्मि समावृत्तस्त्वदनुध्यानबृंहितः ।
वक्तुं श्रेयः समर्थोऽस्मि त्वत्प्रसादाज्जनार्दन ॥ २३ ॥
जनार्दन! आपके निरन्तर चिन्तनसे मेरी शक्ति इतनी बढ़ गयी है कि मैं जवान-सा हो गया हूँ। आपके प्रसादसे अब मैं कल्याणकारी उपदेश देनेमें समर्थ हूँ ॥

स्वयं किमर्थं तु भवान् श्रेयो न प्राह पाण्डवम् ।
किं ते विवक्षितं चात्र तदाशु वद माधव ॥ २४ ॥
माधव! तो भी मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप स्वयं ही पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको कल्याणकारी उपदेश क्यों नहीं देते हैं? इस विषयमें आप क्या कहना चाहते हैं? यह शीघ्र बताइये ॥ २४ ॥

वासुदेव उवाच

यशसः श्रेयसश्चैव मूलं मां विद्धि कौरव ।
मत्तः सर्वेऽभिनिर्वृत्ता भावाः सदसदात्मकाः ॥ २५ ॥
**भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**कुरुनन्दन! आप मुझे ही यश और श्रेयका मूल समझें। संसारमें जो भी सत् और असत् पदार्थ हैं, वे सब मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं ॥ २५ ॥
शीतांशुश्चन्द्र इत्युक्ते लोके को विस्मयिष्यति ।
तथैव यशसा पूर्णे मयि को विस्मयिष्यति ॥ २६ ॥
'चन्द्रमा शीतल किरणोंसे सम्पन्न हैं' यह बात कहनेपर जगत्में किसको आश्चर्य होगा? अर्थात् किसीको नहीं होगा। उसी प्रकार सम्पूर्ण यशसे सम्पन्न मुझ परमेश्वरके द्वारा कोई उत्तम उपदेश प्राप्त हो तो उसे सुनकर कौन आश्चर्य करेगा? ॥ २६ ॥
आधेयं तु मया भूयो यशस्तव महाद्युते ।
ततो मे विपुला बुद्धिस्त्वयि भीष्म समर्पिता ॥ २७ ॥
महातेजस्वी भीष्म! मुझे इस जगत्में आपके महान् यशकी प्रतिष्ठा करनी है, अतः मैंने अपनी विशाल बुद्धि आपको समर्पित की है ॥ २७ ॥
यावद्धि पृथिवीपाल पृथ्वीयं स्थास्यति ध्रुवा ।
तावत् तवाक्षया कीर्तिर्लोकाननुचरिष्यति ॥ २८ ॥
भूपाल! जबतक यह अचला पृथ्वी स्थिर रहेगी, तबतक सम्पूर्ण जगत्में आपकी अक्षय कीर्ति विख्यात होती रहेगी ॥ २८ ॥
यच्च त्वं वक्ष्यसे भीष्म पाण्डवायानुपृच्छते ।
वेदप्रवाद इव ते स्थास्यते वसुधातले ॥ २९ ॥
भीष्म! आप पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके प्रश्न करनेपर उसके उत्तरमें जो कुछ कहेंगे, वह वेदके सिद्धान्तकी भाँति इस भूतलपर मान्य होगा ॥ २९ ॥
यश्चैतेन प्रमाणेन योक्ष्यत्यात्मानमात्मना ।
स फलं सर्वपुण्यानां प्रेत्य चानुभविष्यति ॥ ३० ॥
जो मनुष्य आपके इस उपदेशको प्रमाण मानकर उसे अपने जीवनमें उतारेगा, वह मृत्युके बाद सब प्रकारके पुण्योंका फल प्राप्त करेगा ॥ ३० ॥
एतस्मात् कारणाद् भीष्म मतिर्दिव्या मया हि ते ।

दत्ता यशो विप्रथयेत् कथं भूयस्तवेति ह ॥ ३१ ॥ भीष्म! इसीलिये मैंने आपको दिव्य बुद्धि प्रदान की है कि जिस किसी प्रकारसे भी आपके महान् यशका इस भूतलपर विस्तार हो ॥ ३१ ॥ यावद्धि प्रथते लोके पुरुषस्य यशो भुवि । तावत् तस्याक्षयं स्थानं भवतीति विनिश्चिता ॥ ३२ ॥ जगतमें जबतक भूतलपर मनुष्यके यशका विस्तार होता रहता है, तबतक उसकी परलोकमें अचल स्थिति बनी रहती है, यह निश्चय है ॥ ३२ ॥ राजानो हतशिष्टास्त्वां राजन्नभित आसते । धर्माननुयुयुक्षन्तस्तेभ्यः प्रब्रूहि भारत ॥ ३३ ॥ भारत! नरेश्वर! मरनेसे बचे हुए ये भूपाल आपके पास धर्मकी जिज्ञासासे बैठे हैं। आप इन सबको धर्मका उपदेश करें ॥ ३३ ॥ भवान् हि वयसा वृद्धः श्रुताचारसमन्वितः । कुशलो राजधर्माणां सर्वेषामपराश्च ये ॥ ३४ ॥ आपकी अवस्था सबसे बड़ी है। आप शास्त्रज्ञान तथा सदाचारसे सम्पन्न हैं। साथ ही समस्त राजधर्मों तथा अन्य धर्मोंके ज्ञानमें भी आप कुशल हैं ॥ ३४ ॥ जन्मप्रभृति ते कश्चिद् वृजिनं न ददर्श ह । ज्ञातारं सर्वधर्माणां त्वां विदुः सर्वपार्थिवाः ॥ ३५ ॥ जन्मसे लेकर आजतक किसीने भी आपमें कोई भी दोष (पाप) नहीं देखा है। सब राजा इस बातको स्वीकार करते हैं कि आप सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता हैं ॥ तेभ्यः पितेव पुत्रेभ्यो राजन् ब्रूहि परं नयम् । ऋषयश्चैव देवाश्च त्वया नित्यमुपासिताः ॥ ३६ ॥ तस्माद् वक्तव्यमेवेदं त्वयावश्यमशेषतः । राजन्! आप इन राजाओंको उसी प्रकार उत्तम नीतिका उपदेश करें, जैसे पिता अपने पुत्रको सद्धर्मकी शिक्षा देता है। आपने देवताओं और ऋषियोंकी सदा उपासना की है; इसलिये आपको अवश्य ही सम्पूर्ण धर्मोंका उपदेश करना चाहिये ॥ ३६½ ॥ धर्मं शुश्रूषमाणेभ्यः पृष्टेन च सता पुनः ॥ ३७ ॥ वक्तव्यं विदुषा चेति धर्ममाहुर्मनीषिणः । मनीषी पुरुषोंने यह धर्म बताया है कि 'श्रेष्ठ विद्वान् पुरुषसे जब कुछ पूछा जाय तो उसे उचित है कि वह सुननेकी इच्छावाले लोगोंको धर्मका उपदेश दे' ॥ ३७½ ॥ अप्रतिब्रुवतः कष्टो दोषो हि भविता प्रभो ॥ ३८ ॥ तस्मात् पुत्रैश्च पौत्रैश्च धर्मान् पृष्टान् सनातनान् । विद्वाञ्जिज्ञासमानैस्त्वं प्रब्रूहि भरतर्षभ ॥ ३९ ॥

प्रभो! जो मनुष्य जानते हुए भी श्रद्धापूर्वक प्रश्न करनेवालेको उपदेश नहीं देता, उसे अत्यन्त दुःखदायक दोषकी प्राप्ति होती है; अतः भरतश्रेष्ठ! धर्मको जाननेकी इच्छावाले अपने पुत्रों और पौत्रोंके पूछनेपर उन्हें सनातन धर्मका उपदेश करें; क्योंकि आप धर्मशास्त्रोंके विद्वान् हैं ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कृष्णवाक्ये चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें श्रीकृष्ण-वाक्यविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥

हन्त धर्मान् प्रवक्ष्यामि दृढे वाङ्मनसी मम ॥ १ ॥

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

भीष्मका युधिष्ठिरके गुणकथनपूर्वक उनको प्रश्न करनेका आदेश देना, श्रीकृष्णका उनके लज्जित और भयभीत होनेका कारण बताना और भीष्मका आश्वासन पाकर युधिष्ठिरका उनके समीप जाना

वैशम्पायन उवाच

अथाब्रवीन्महातेजा वाक्यं कौरवनन्दनः ।
हन्त धर्मान् प्रवक्ष्यामि दृढे वाङ्मनसी मम ॥ १ ॥
तव प्रसादाद् गोविन्द भूतात्मा ह्यसि शाश्वतः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! श्रीकृष्णकी बात सुनकर कुरुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले महातेजस्वी भीष्मजीने कहा—'गोविन्द! आप सम्पूर्ण भूतोंके सनातन आत्मा हैं। आपके प्रसादसे मेरी वाक्शक्ति सुदृढ़ है और मन भी स्थिर हो गया है; अतः मैं समस्त धर्मोंका प्रवचन करूँगा ।। १ १/२ ।।

युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा मां धर्माननुपृच्छतु ।
एवं प्रीतो भविष्यामि धर्मान् वक्ष्यामि चाखिलान् ॥ २ ॥
'धर्मात्मा युधिष्ठिर मुझसे एक-एक करके धर्मोंके विषयमें प्रश्न करें, इससे मुझे प्रसन्नता होगी और मैं सम्पूर्ण धर्मोंका उपदेश कर सकूँगा ।। २ ।।

यस्मिन् राजर्षभे जाते धर्मात्मनि महात्मनि ।
अहृष्यन्नृषयः सर्वे स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥ ३ ॥
'जिन राजर्षिशिरोमणि धर्मपरायण महात्मा युधिष्ठिरका जन्म होनेपर सभी महर्षि हर्षसे खिल उठे थे, वे ही पाण्डुपुत्र मुझसे प्रश्न करें ।। ३ ।।

सर्वेषां दीप्तयशसां कुरूणां धर्मचारिणाम् ।
यस्य नास्ति समःकश्चित् स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥ ४ ॥
'जिनके यशका प्रताप सर्वत्र छा रहा है, उन समस्त धर्मचारी कौरवोंमें जिनकी समानता करनेवाला कोई नहीं है, वे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझसे प्रश्न करें ।।

धृतिर्दमो ब्रह्मचर्यं क्षमा धर्मश्च नित्यदा ।
यस्मिन्नोजश्च तेजश्च स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥ ५ ॥
'जिनमें धैर्य, इन्द्रियसंयम, ब्रह्मचर्य, क्षमा, धर्म, ओज और तेज सदा विद्यमान रहते हैं, वे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझसे प्रश्न करें ।। ५ ।।

सम्बन्धिनोऽतिथीन् भृत्यान् संश्रितांश्चैव यो भृशम् ।

सम्मानयति सत्कृत्य स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥ ६ ॥
‘जो सम्बन्धियों, अतिथियों, भृत्यों तथा शरणागतोंका सदा सत्कारपूर्वक विशेष सम्मान करते हैं, वे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझसे प्रश्न करें’ ॥ ६ ॥
सत्यं दानं तपः शौर्यं शान्तिर्दाक्ष्यमसम्भ्रमः ।
यस्मिन्नेतानि सर्वाणि स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥ ७ ॥
‘जिनमें सत्य, दान, तप, शूरता, शान्ति, दक्षता तथा असम्भ्रम (स्थिरचित्तता)—ये समस्त सद्गुण सदा मौजूद रहते हैं, वे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझसे प्रश्न करें’ ॥ ७ ॥
यो न कामान्न संरम्भान्न भयान्नार्थकारणात् ।
कुर्यादधर्मं धर्मात्मा स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥ ८ ॥
‘जो न तो कामनासे, न क्रोधसे, न भयसे और न किसी स्वार्थके ही लोभसे अधर्म करते हैं, वे धर्मात्मा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझसे प्रश्न करें’ ॥ ८ ॥
सत्यनित्यः क्षमानित्यो ज्ञाननित्योऽतिथिप्रियः ।
यो ददाति सतां नित्यं स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥ ९ ॥
‘जिनमें सदा ही सत्य, सदा ही क्षमा और सदा ही ज्ञानकी स्थिति है, जो निरन्तर अतिथिसत्कारके प्रेमी हैं और सत्पुरुषोंको सदा दान देते रहते हैं, वे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझसे प्रश्न करें’ ॥ ९ ॥
इज्याध्ययननित्यस्य धर्मे च निरतः सदा ।
क्षान्तः श्रुतरहस्यश्च स मां पृच्छतु पाण्डवः ॥ १० ॥
‘जिन्होंने शास्त्रोंके रहस्यका श्रवण किया है, जो सदा ही यज्ञ, स्वाध्याय और धर्ममें लगे रहनेवाले तथा क्षमाशील हैं, वे पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर मुझसे प्रश्न करें’ ॥

वासुदेव उवाच

लज्जया परयोपेतो धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
अभिशापभयाद् भीतो भवन्तं नोपसर्पति ॥ ११ ॥
**भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**प्रजानाथ! धर्मराज युधिष्ठिर बहुत लज्जित हैं, वे शापके भयसे डरे होनेके कारण आपके निकट नहीं आ रहे हैं ॥ ११ ॥
लोकस्य कदनं कृत्वा लोकनाथो विशाम्पते ।
अभिशापभयाद् भीतो भवन्तं नोपसर्पति ॥ १२ ॥
प्रजापालक भीष्म! ये लोकनाथ युधिष्ठिर जगत्‌का संहार करके शापके भयसे त्रस्त हो उठे हैं; इसीलिये आपके निकट नहीं आते हैं ॥ १२ ॥
पूज्यान् मान्यांश्च भक्तांश्च गुरून् सम्बन्धिबान्धवान् ।
अर्हार्हानिषुभिर्भित्त्वा भवन्तं नोपसर्पति ॥ १३ ॥