महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८- पंचचूड़ा अप्सराका नारदजीसे स्त्रियोंके दोषोंका वर्णन करना ३९- स्त्रियोंकी रक्षाके विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न ४०- भृगुवंशी विपुलके द्वारा योगबलसे गुरुपत्नीके शरीरमें प्रवेश करके उसकी रक्षा करना ४१- विपुलका देवराज इन्द्रसे गुरुपत्नीको बचाना और गुरुसे वरदान प्राप्त करना ४२- विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना ४३- देवशर्माका विपुलको निर्दोष बताकर समझाना और भीष्मका युधिष्ठिरको स्त्रियोंकी रक्षाके लिये आदेश देना ४४- कन्या-विवाहके सम्बन्धमें पात्रविषयक विभिन्न विचार ४५- कन्याके विवाहका तथा कन्या और दौहित्र आदिके उत्तराधिकारका विचार ४६- स्त्रियोंके वस्त्राभूषणोंसे सत्कार करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन ४७- ब्राह्मण आदि वर्णोंकी दायभाग-विधिका वर्णन ४८- वर्णसंकर संतानोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन ४९- नाना प्रकारके पुत्रोंका वर्णन ५०- गौओंकी महिमाके प्रसंगमें च्यवन मुनिके उपाख्यानका आरम्भ, मुनिका मत्स्योंके साथ जालमें फँसकर जलसे बाहर आना ५१- राजा नहुषका एक गौके मोलपर च्यवन मुनिको खरीदना, मुनिके द्वारा गौओंका माहात्म्य-कथन तथा मत्स्यों और मल्लाहोंकी सद्गति ५२- राजा कुशिक और उनकी रानीके द्वारा महर्षि च्यवनकी सेवा ५३- च्यवन मुनिके द्वारा राजा-रानीके धैर्यकी परीक्षा और उनकी सेवासे प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देना ५४- महर्षि च्यवनके प्रभावसे राजा कुशिक और उनकी रानीको अनेक आश्चर्यमय दृश्योंका दर्शन एवं च्यवन मुनिका प्रसन्न होकर राजाको वर माँगनेके लिये कहना ५५- च्यवनका कुशिकके पूछनेपर उनके घरमें अपने निवासका कारण बताना और उन्हें वरदान देना ५६- च्यवन ऋषिका भृगुवंशी और कुशिक-वंशियोंके सम्बन्धका कारण बताकर तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान ५७- विविध प्रकारके तप और दानोंका फल ५८- जलाशय बनानेका तथा बगीचे लगानेका फल ५९- भीष्मद्वारा उत्तम दान तथा उत्तम ब्राह्मणोंकी प्रशंसा करते हुए उनके सत्कारका उपदेश ६०- श्रेष्ठ अयाचक, धर्मात्मा, निर्धन एवं गुणवान्को दान देनेका विशेष फल