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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages
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गुण ही फल है। सात अतिथि ही फलोंके भोक्ता हैं ॥ १३ ॥
आतिथ्यं प्रतिगृह्णन्ति तत्र तत्र महर्षयः ।
अचितेषु प्रलीनेषु तेष्वन्यद् रोचते वनम् ॥ १४ ॥
वे महर्षिगण इस यज्ञमें आतिथ्य ग्रहण करते हैं और पूजा स्वीकार करते ही उनका लय हो जाता है। तत्पश्चात् वह ब्रह्मरूप वन विलक्षणरूपसे प्रकाशित होता है ॥ १४ ॥
प्रज्ञावृक्षं मोक्षफलं शान्तिच्छायासमन्वितम् ।
ज्ञानाश्रयं तृप्तितोयमन्तःक्षेत्रज्ञभास्करम् ॥ १५ ॥
उसमें प्रज्ञारूपी वृक्ष शोभा पाते हैं, मोक्षरूपी फल लगते हैं और शान्तिमयी छाया फैली रहती है। ज्ञान वहाँका आश्रयस्थान और तृप्ति जल है। उस वनके भीतर आत्मारूपी सूर्यका प्रकाश छाया रहता है ॥ १५ ॥
येऽधिगच्छन्ति तं सन्तस्तेषां नास्ति भयं पुनः ।
ऊर्ध्वं चाधश्च तिर्यक् च तस्य नान्तोऽधिगम्यते ॥ १६ ॥
जो श्रेष्ठ पुरुष उस वनका आश्रय लेते हैं, उन्हें फिर कभी भय नहीं होता। वह वन ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर सब ओर व्याप्त है। उसका कहीं भी अन्त नहीं है ॥ १६ ॥
सप्त स्त्रियस्तत्र वसन्ति सद्य-
स्त्ववाङ्मुखा भानुमत्यो जनित्र्यः ।
ऊर्ध्वं रसानाददते प्रजाभ्यः
सर्वान् यथा सत्यमनित्यता च ॥ १७ ॥
वहाँ सात स्त्रियाँ निवास करती हैं, जो लज्जाके मारे अपना मुँह नीचेकी ओर किये रहती हैं। वे चिन्मय ज्योतिसे प्रकाशित होती हैं। वे सबकी जननी हैं और वे उस वनमें रहनेवाली प्रजासे सब प्रकारके उत्तम रस उसी प्रकार ग्रहण करती हैं, जैसे अनित्यता सत्यको ग्रहण करती है ॥ १७ ॥
तत्रैव प्रतितिष्ठन्ति पुनस्तत्रोपयन्ति च ।
सप्त सप्तर्षयः सिद्धा वसिष्ठप्रमुखैः सह ॥ १८ ॥
सात सिद्ध सप्तर्षि वसिष्ठ आदिके साथ उसी वनमें लीन होते और उसीसे उत्पन्न होते हैं ॥ १८ ॥
यशो वर्चो भगश्चैव विजयः सिद्धस्तेजसः ।
एवमेवानुवर्तन्ते सप्त ज्योतींषि भास्करम् ॥ १९ ॥
यश, प्रभा, भग (ऐश्वर्य), विजय, सिद्धि (ओज) और तेज—ये सात ज्योतियाँ उपर्युक्त आत्मारूपी सूर्यका ही अनुसरण करती हैं ॥ १९ ॥
गिरयः पर्वताश्चैव सन्ति तत्र समासतः ।
नद्यश्च सरितो वारि वहन्त्यो ब्रह्मसम्भवम् ॥ २० ॥

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उस ब्रह्मतत्त्वमें ही गिरि, पर्वत, झरने, नदी और सरिताएँ स्थित हैं, जो ब्रह्मजनित जल बहाया करती हैं ।। २० ।। नदीनां सङ्गमश्चैव वैताने समुपह्वरे ।
स्वात्मतृप्ता यतो यान्ति साक्षादेव पितामहम् ।। २१ ।।
नदियोंका संगम भी उसीके अत्यन्त गूढ़ हृदयाकाशमें संक्षेपसे होता है। जहाँ योगरूपी यज्ञका विस्तार होता रहता है। वही साक्षात् पितामहका स्वरूप है। आत्मज्ञानसे तृप्त पुरुष उसीको प्राप्त होते हैं ।। २१ ।।
कृशाशाः सुव्रताशाश्च तपसा दग्धकिल्बिषाः ।
आत्मन्यात्मानमाविश्य ब्रह्माणं समुपासते ।। २२ ।।
जिनकी आशा क्षीण हो गयी है, जो उत्तम व्रतके पालनकी इच्छा रखते हैं। तपस्यासे जिनके सारे पाप दग्ध हो गये हैं। वे ही पुरुष अपनी बुद्धिको आत्मनिष्ठ करके परब्रह्मकी उपासना करते हैं ।। २२ ।।
शममप्यत्र शंसन्ति विद्यारण्यविदो जनाः ।
तदारण्यमभिप्रेत्य यथाधीरभिजायत ।। २३ ।।
विद्या (ज्ञान)-के ही प्रभावसे ब्रह्मरूपी वनका स्वरूप समझमें आता है। इस बातको जाननेवाले मनुष्य इस वनमें प्रवेश करनेके उद्देश्यसे शम (मनोनिग्रह)-की ही प्रशंसा करते हैं, जिससे बुद्धि स्थिर होती है ।। २३ ।।
एतदेवैदृशं पुण्यमरण्यं ब्राह्मणा विदुः ।
विदित्वा चानुतिष्ठन्ति क्षेत्रज्ञेनानुदर्शिता ।। २४ ।।
ब्राह्मण ऐसे गुणवाले इस पवित्र वनको जानते हैं और तत्त्वदर्शीके उपदेशसे प्रबुद्ध हुए आत्मज्ञानी पुरुष उस ब्रह्मवनको शास्त्रतः जानकर शम आदि साधनोंके अनुष्ठानमें लग जाते हैं ।। २४ ।।

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु सप्तविंशोऽध्यायः ।। २७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीतासम्बन्धी सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २७ ।।

ज्ञानी पुरुषकी स्थिति तथा अध्वर्यु और यतिका संवाद\

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⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टाविंशोऽध्यायः

ज्ञानी पुरुषकी स्थिति तथा अध्वर्यु और यतिका संवाद*

ब्राह्मण उवाच

गन्धान् न जिघ्रामि रसान् न वेद्मि रूपं न पश्यामि न च स्पृशामि । न चापि शब्दान् विविधान् शृणोमि न चापि संकल्पमुपैमि कंचित् ॥ १ ॥
**ब्राह्मण कहते हैं—**मैं न तो गन्धोंको सूँघता हूँ, न रसोंका आस्वादन करता हूँ, न रूपको देखता हूँ, न किसी वस्तुका स्पर्श करता हूँ, न नाना प्रकारके शब्दोंको सुनता हूँ और न कोई संकल्प ही करता हूँ ॥ १ ॥

अर्थानिष्टान् कामयते स्वभावः सर्वान् द्वेष्यान् प्रद्विषते स्वभावः । कामद्वेषावुद्भवतः स्वभावात् प्राणापानौ जन्तुदेहान्निविश्य ॥ २ ॥
स्वभाव ही अभीष्ट पदार्थोंकी कामना रखता है, स्वभाव ही सम्पूर्ण द्वेष्य वस्तुओंके प्रति द्वेष करता है। जैसे प्राण और अपान स्वभावसे ही प्राणियोंके शरीरोंमें प्रविष्ट होकर अन्न-पाचन आदिका कार्य करते रहते हैं, उसी प्रकार स्वभावसे ही राग और द्वेषकी उत्पत्ति होती है। तात्पर्य यह कि बुद्धि आदि इन्द्रियाँ स्वभावसे ही पदार्थोंमें बर्त रही हैं ॥ २ ॥

तेभ्यश्चान्यांस्तेषु नित्यांश्च भावान् भूतात्मानं लक्षयेरन् शरीरे । तस्मिंस्तिष्ठन्नास्मि सक्तः कथंचित् कामक्रोधाभ्यां जरया मृत्युना च ॥ ३ ॥
इन बाह्य इन्द्रियों और विषयोंसे भिन्न जो स्वप्न और सुषुप्तिके वासनामय विषय एवं इन्द्रियाँ हैं तथा उनमें भी जो नित्यभाव हैं, उनसे भी विलक्षण जो भूतात्मा है, उसको शरीरके भीतर योगीजन देख पाते हैं। उसी भूतात्मामें स्थित हुआ मैं कहीं किसी तरह भी काम, क्रोध, जरा और मृत्युसे ग्रस्त नहीं होता ॥ ३ ॥

अकामयानस्य च सर्वकामा- नविद्विषाणस्य च सर्वदोषान् । न मे स्वभावेषु भवन्ति लेपा- स्तोयस्य बिन्दोरिव पुष्करेषु ॥ ४ ॥

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मैं सम्पूर्ण कामनाओंमेंसे किसीकी कामना नहीं करता। समस्त दोषोंसे भी कभी द्वेष नहीं करता। जैसे कमलके पत्तोंपर जल-बिन्दुका लेप नहीं होता, उसी प्रकार मेरे स्वभावमें राग और द्वेषका स्पर्श नहीं है ॥ ४ ॥

नित्यस्य चैतस्य भवन्त्यनित्या निरीक्ष्यमाणस्य बहुस्वभावान् । न सज्जते कर्मसु भोगजालं दिवीव सूर्यस्य मयूखजालम् ॥ ५ ॥

जिनका स्वभाव बहुत प्रकारका है, उन इन्द्रिय आदिको देखनेवाले इस नित्यस्वरूप आत्माके लिये सब भोग अनित्य हो जाते हैं। अतः वे भोगसमुदाय उस विद्वान्‌को उसी प्रकार कर्मोंमें लिप्त नहीं कर सकते, जैसे आकाशमें सूर्यकी किरणोंका समुदाय सूर्यको लिप्त नहीं कर सकता ॥ ५ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । अध्वर्युयतिसंवादं तं निबोध यशस्विनि ॥ ६ ॥

यशस्विनि! इस विषयमें अध्वर्यु और यतिके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, तुम उसे सुनो ॥ ६ ॥

प्रोक्ष्यमाणं पशुं दृष्ट्वा यज्ञकर्मण्यथाब्रवीत् । यतिरध्वर्युमासीनो हिंसेयमिति कुत्सयन् ॥ ७ ॥

किसी यज्ञ-कर्ममें पशुका प्रोक्षण होता देख वहीं बैठे हुए एक यतिने अध्वर्युसे उसकी निन्दा करते हुए कहा—'यह हिंसा है (अतः इससे पाप होगा)' ॥ ७ ॥

तमध्वर्युः प्रत्युवाच नायं छागो विनश्यति । श्रेयसा योक्ष्यते जन्तुर्यदि श्रुतिरियं तथा ॥ ८ ॥

अध्वर्युने यतिको इस प्रकार उत्तर दिया—'यह बकरा नष्ट नहीं होगा। यदि 'पशुर्वै नीयमानः' इत्यादि श्रुति सत्य है तो यह जीव कल्याणका ही भागी होगा ॥ ८ ॥

यो ह्यस्य पार्थिवो भागः पृथिवीं स गमिष्यति । यदस्य वारिजं किंचिदपस्तत् सम्प्रवेक्ष्यति ॥ ९ ॥

'इसके शरीरका जो पार्थिव भाग है, वह पृथ्वीमें विलीन हो जायगा। इसका जो कुछ भी जलीय भाग है, वह जलमें प्रविष्ट हो जायगा ॥ ९ ॥

सूर्यं चक्षुर्दिशः श्रोत्रं प्राणोऽस्य दिवमेव च । आगमे वर्तमानस्य न मे दोषोऽस्ति कश्चन ॥ १० ॥

'नेत्र सूर्यमें, कान दिशाओंमें और प्राण आकाशमें ही लयको प्राप्त होगा। शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार बर्ताव करनेवाले मुझको कोई दोष नहीं लगेगा' ॥ १० ॥

यतिरुवाच

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प्राणैर्वियोगे छागस्य यदि श्रेयः प्रपश्यसि । छागार्थे वर्तते यज्ञो भवतः किं प्रयोजनम् ॥ ११ ॥ **यतिने कहा—**यदि तुम बकरेके प्राणोंका वियोग हो जानेपर भी उसका कल्याण ही देखते हो, तब तो यह यज्ञ उस बकरेके लिये ही हो रहा है। तुम्हारा इस यज्ञसे क्या प्रयोजन है? ॥ ११ ॥

अत्र त्वां मन्यतां भ्राता पिता माता सखेति च । मन्त्रयस्वैनमुन्नीय परवन्तं विशेषतः ॥ १२ ॥ श्रुति कहती है 'पशो! इस विषयमें तुझे तेरे भाई, पिता, माता और सखाकी अनुमति प्राप्त होनी चाहिये।' इस श्रुतिके अनुसार विशेषतः पराधीन हुए इस पशुको ले जाकर इसके पिता माता आदिसे अनुमति लो (अन्यथा तुझे हिंसाका दोष अवश्य प्राप्त होगा) ॥ १२ ॥

एवमेवानुमन्येरंस्तान् भवान् द्रष्टुमर्हति । तेषामनुमतं श्रुत्वा शक्या कर्तुं विचारणा ॥ १३ ॥ पहले तुम्हें इस पशुके उन सम्बन्धियोंसे मिलना चाहिये। यदि वे भी ऐसा ही करनेकी अनुमति दे दें, तब उनका अनुमोदन सुनकर तदनुसार विचार कर सकते हो ॥ १३ ॥

प्राणा अप्यस्य छागस्य प्रापितास्ते स्वयोनिषु । शरीरं केवलं शिष्टं निश्चेष्टमिति मे मतिः ॥ १४ ॥ तुमने इस छागकी इन्द्रियोंको उनके कारणोंमें विलीन कर दिया है। मेरे विचारसे अब तो केवल इसका निश्चेष्ट शरीर ही अवशिष्ट रह गया है ॥ १४ ॥

इन्धनस्य तु तुल्येन शरीरेण विचेतसा । हिंसानिर्वेष्टुकामानामिन्धनं पशुसंज्ञितम् ॥ १५ ॥ यह चेतनाशून्य जड शरीर ईंधनके ही समान है, उससे हिंसाके प्रायश्चित्तकी इच्छासे यज्ञ करनेवालोंके लिये ईंधन ही पशु है (अतः जो काम ईंधनसे होता है, उसके लिये पशु-हिंसा क्यों की जाय?) ॥ १५ ॥

अहिंसा सर्वधर्माणामिति वृद्धानुशासनम् । यदिहिंसं भवेत् कर्म तत् कार्यमिति विद्महे ॥ १६ ॥ वृद्ध पुरुषोंका यह उपदेश है कि अहिंसा सब धर्मोंमें श्रेष्ठ है, जो कार्य हिंसासे रहित हो वही करने योग्य है, यही हमारा मत है ॥ १६ ॥

अहिंसेति प्रतिज्ञेयं यदि वक्ष्याम्यतः परम् । शक्यं बहुविधं कर्तुं भवता कार्यदूषणम् ॥ १७ ॥ इसके बाद भी यदि मैं कुछ कहूँ तो यही कह सकता हूँ कि सबको यह प्रतिज्ञा कर लेनी चाहिये कि 'मैं अहिंसा-धर्मका पालन करूँगा।' अन्यथा आपके द्वारा नाना प्रकारके कार्य-दोष सम्पादित हो सकते हैं ॥ १७ ॥

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अहिंसा सर्वभूतानां नित्यमस्मासु रोचते । प्रत्यक्षतः साधयामो न परोक्षमुपास्महे ॥ १८ ॥ किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना ही हमें सदा अच्छा लगता है। हम प्रत्यक्ष फलके साधक हैं, परोक्षकी उपासना नहीं करते हैं ॥ १८ ॥

अध्वर्युरुवाच

भूमेर्गन्धगुणान् भुङ्क्षे पिबस्यापोमयान् रसान् । ज्योतिषां पश्यसे रूपं स्पृशस्यनिलजान् गुणान् ॥ १९ ॥ शृणोष्याकाशजान् शब्दान् मनसा मन्यसे मतिम् । सर्वाण्येतानि भूतानि प्राणा इति च मन्यसे ॥ २० ॥ अध्वर्युने कहा—यते! यह तो तुम मानते ही हो कि सभी भूतोंमें प्राण है, तो भी तुम पृथ्वीके गन्ध गुणोंका उपभोग करते हो, जलमय रसोंको पीते हो, तेजके गुण? रूपका दर्शन करते हो और वायुके गुण स्पर्शको छूते हो, आकाशजनित शब्दोंको सुनते हो और मनसे मतिका मनन करते हो ॥ १९-२० ॥

प्राणादाने निवृत्तोऽसि हिंसायां वर्तते भवान् । नास्ति चेष्टा विना हिंसां किं वा त्वं मन्यसे द्विज ॥ २१ ॥ एक ओर तो तुम किसी प्राणीके प्राण लेनेके कार्यसे निवृत्त हो और दूसरी ओर हिंसामें लगे हुए हो। द्विजवर! कोई भी चेष्टा हिंसाके बिना नहीं होती। फिर तुम कैसे समझते हो कि तुम्हारे द्वारा अहिंसाका ही पालन हो रहा है? ॥ २१ ॥

यतिरुवाच

अक्षरं च क्षरं चैव द्वैधीभावोऽयमात्मनः । अक्षरं तत्र सद्भावः स्वभावः क्षर उच्यते ॥ २२ ॥ यतिने कहा—आत्माके दो रूप हैं—एक अक्षर और दूसरा क्षर। जिसकी सत्ता तीनों कालोंमें कभी नहीं मिटती वह सत्स्वरूप अक्षर (अविनाशी) कहा गया है तथा जिसका सर्वथा और सभी कालोंमें अभाव है, वह क्षर कहलाता है ॥ २२ ॥

प्राणो जिह्वा मनः सत्त्वं सद्भावो रजसा सह । भावैरेतैर्विमुक्तस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः ॥ २३ ॥ समस्य सर्वभूतेषु निर्ममस्य जितात्मनः । समन्तात् परिमुक्तस्य न भयं विद्यते क्वचित् ॥ २४ ॥ प्राण, जिह्वा, मन और रजोगुणसहित सत्त्वगुण—ये रज अर्थात् मायासहित सद्भाव हैं। इन भावोंसे मुक्त निर्द्वन्द्व, निष्काम, समस्त प्राणियोंके प्रति समभाव रखनेवाले, ममतारहित, जितात्मा तथा सब ओरसे बन्धनशून्य पुरुषको कभी और कहीं भी भय नहीं होता ॥ २३-२४ ॥

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अध्वर्युरुवाच

सद्भिरेवेह संवासः कार्यो मतिमतां वर ।
भवतो हि मतं श्रुत्वा प्रतिभाति मतिर्मम ॥ २५ ॥
भगवन् भगवद्बुद्धया प्रतिपन्नो ब्रवीम्यहम् ।
व्रतं मन्त्रकृतं कर्तुर्नापराधोऽस्ति मे द्विज ॥ २६ ॥
**अध्वर्युने कहा—**बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ यते! इस जगत्में आप-जैसे साधुपुरुषोंके साथ ही निवास करना उचित है। आपका यह मत सुनकर मेरी बुद्धिमें भी ऐसी ही प्रतीति हो रही है। भगवन्! विप्रवर! मैं आपकी बुद्धिसे ज्ञानसम्पन्न होकर यह बात कह रहा हूँ कि वेदमन्त्रोंद्वारा निश्चित किये हुए व्रतका ही मैं पालन कर रहा हूँ। अतः इसमें मेरा कोई अपराध नहीं है॥ २५-२६॥


ब्राह्मण उवाच

उपपत्त्या यतिस्तूष्णीं वर्तमानस्ततः परम् ।
अध्वर्युर्पि निर्मोहः प्रचार महामखे ॥ २७ ॥
**ब्राह्मण कहते हैं—**प्रिये! अध्वर्युकी दी हुई युक्तिसे वह यति चुप हो गया और फिर कुछ नहीं बोला। फिर अध्वर्यु भी मोहरहित होकर उस महायज्ञमें अग्रसर हुआ॥ २७॥

एवमेतादृशं मोक्षं सुसूक्ष्मं ब्राह्मणा विदुः ।
विदित्वा चानुतिष्ठन्ति क्षेत्रज्ञेनार्थदर्शिना ॥ २८ ॥
इस प्रकार ब्राह्मण मोक्षका ऐसा ही अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूप बताते हैं और तत्त्वदर्शी पुरुषके उपदेशके अनुसार उस मोक्ष-धर्मको जानकर उसका अनुष्ठान करते हैं॥ २८॥


इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु
अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८॥


* यह अध्याय क्षेपक हो तो कोई आश्चर्य नहीं; क्योंकि इसमें यह बात कही गयी है कि बुद्धि और इन्द्रियोंमें राग-द्वेषके रहते हुए भी विद्वान् कर्मोंमें लिप्त नहीं होता और यज्ञमें पशु-हिंसाका दोष नहीं लगता। किंतु यह कथन युक्तिविरुद्ध है।

कार्तवीर्यस्य संवादं समुद्रस्य च भाविनि ॥ १ ॥

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⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनत्रिंशोऽध्यायः

परशुरामजीके द्वारा क्षत्रिय-कुलका संहार

ब्राह्मण उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
कार्तवीर्यस्य संवादं समुद्रस्य च भाविनि ॥ १ ॥
ब्राह्मणने कहा— भामिनि! इस विषयमें भी कार्तवीर्य और समुद्रके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ १ ॥

कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रवान् ।
येन सागरपर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही ॥ २ ॥
पूर्वकालमें कार्तवीर्य अर्जुनके नामसे प्रसिद्ध एक राजा था, जिसकी एक हजार भुजाएँ थीं। उसने केवल धनुष-बाणकी सहायतासे समुद्रपर्यन्त पृथ्वीको अपने अधिकारमें कर लिया था ॥ २ ॥

स कदाचित् समुद्रान्ते विचरन् बलदर्पितः ।
अवाकिरन् शरशतैः समुद्रमिति नः श्रुतम् ॥ ३ ॥
सुना जाता है, एक दिन राजा कार्तवीर्य समुद्रके किनारे विचर रहा था। वहाँ उसने अपने बलके घमण्डमें आकर सैकड़ों बाणोंकी वर्षासे समुद्रको आच्छादित कर दिया ॥ ३ ॥

तं समुद्रो नमस्कृत्य कृताञ्जलिरुवाच ह ।
मा मुञ्च वीर नाराचान् ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ ४ ॥
मदाश्रयाणि भूतानि त्वद्विसृष्टैर्महेषुभिः ।
वध्यन्ते राजशार्दूल तेभ्यो देह्यभयं विभो ॥ ५ ॥
तब समुद्रने प्रकट होकर उसके आगे मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा—‘वीरवर! राजसिंह! मुझपर बाणोंकी वर्षा न करो। बोलो, तुम्हारी किस आज्ञाका पालन करूँ? शक्तिशाली नरेश्वर! तुम्हारे छोड़े हुए इन महान् बाणोंसे मेरे अन्दर रहनेवाले प्राणियोंकी हत्या हो रही है। उन्हें अभय दान करो’ ॥ ४-५ ॥

अर्जुन उवाच

मत्समो यदि संग्रामे शरासनधरः क्वचित् ।
विद्यते तं समाचक्ष्व यः समासीत मां मृधे ॥ ६ ॥

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**कार्तवीर्य अर्जुन बोला—**समुद्र! यदि कहीं मेरे समान धनुर्धर वीर मौजूद हो, जो युद्धमें मेरा मुकाबला कर सके तो उसका पता बता दो। फिर मैं तुम्हें छोड़कर चला जाऊँगा ।। ६ ।।

समुद्र उवाच

महर्षिर्जमदग्निस्ते यदि राजन् परिश्रुतः ।
तस्य पुत्रस्तवातिथ्यं यथावत् कर्तुमर्हति ।। ७ ।।
**समुद्रने कहा—**राजन्! यदि तुमने महर्षि जमदग्निका नाम सुना हो तो उन्हींके आश्रमपर चले जाओ। उनके पुत्र परशुरामजी तुम्हारा अच्छी तरह सत्कार कर सकते हैं ।। ७ ।।
ततः स राजा प्रययौ क्रोधेन महता वृतः ।
स तमाश्रममागम्य राममेवान्वपद्यत ।। ८ ।।
स रामप्रतिकूलानि चकार सह बन्धुभिः ।
आयासं जनयामास रामस्य च महात्मनः ।। ९ ।।
ततस्तेजः प्रजज्वाल रामस्यामिततेजसः ।
प्रदहन् रिपुसैन्यानि तदा कमललोचने ।। १० ।।

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ततः परशुमादाय स तं बाहुसहस्रिणम् । चिच्छेद सहसा रामो बहुशाखमिव द्रुमम् ॥ ११ ॥ (ब्राह्मणने कहा—) कमलके समान नेत्रोंवाली देवि! तदनन्तर राजा कार्तवीर्य बड़े क्रोधमें भरकर महर्षि जमदग्निके आश्रमपर परशुरामजीके पास जा पहुँचा और अपने भाई-बन्धुओंके साथ उनके प्रतिकूल बर्ताव करने लगा। उसने अपने अपराधोंसे महात्मा परशुरामजीको उद्विग्न कर दिया। फिर तो शत्रु-सेनाको भस्म करनेवाला अमित तेजस्वी परशुरामजीका तेज प्रज्वलित हो उठा। उन्होंने अपना फरसा उठाया और हजार भुजाओंवाले उस राजाको अनेक शाखाओंसे युक्त वृक्षकी भाँति सहसा काट डाला ॥ ८—११ ॥

तं हतं पतितं दृष्ट्वा समेताः सर्वबान्धवाः । असीनादाय शक्तीश्च भार्गवं पर्यधावयन् ॥ १२ ॥ उसे मरकर जमीनपर पड़ा देख उसके सभी बन्धु-बान्धव एकत्र हो गये तथा हाथोंमें तलवार और शक्तियाँ लेकर परशुरामजीपर चारों ओरसे टूट पड़े ॥ १२ ॥

रामोऽपि धनुरादाय रथमारुह्य सत्वरः । विसृजन् शरवर्षाणि व्यधमत् पार्थिवं बलम् ॥ १३ ॥ इधर परशुरामजी भी धनुष लेकर तुरंत रथपर सवार हो गये और बाणोंकी वर्षा करते हुए राजाकी सेनाका संहार करने लगे ॥ १३ ॥

ततस्तु क्षत्रियाः केचिज्जामदग्न्यभयार्दिताः । विविशुर्गिरिदुर्गाणि मृगाः सिंहार्दिता इव ॥ १४ ॥ उस समय बहुत-से क्षत्रिय परशुरामजीके भयसे पीड़ित हो सिंहके सताये हुए मृगोंकी भाँति पर्वतोंकी गुफाओंमें घुस गये ॥ १४ ॥

तेषां स्वविहितं कर्म तद्भयान्नानुतिष्ठताम् । प्रजा वृषलतां प्राप्ता ब्राह्मणानामदर्शनात् ॥ १५ ॥ उन्होंने उनके डरसे अपने क्षत्रियोचित कर्मोंका भी त्याग कर दिया। बहुत दिनोंतक ब्राह्मणोंका दर्शन न कर सकनेके कारण वे धीरे-धीरे अपने कर्म भूलकर शूद्र हो गये ॥ १५ ॥

एवं ते द्रविडाऽऽभीराः पुण्ड्राश्च शबरैः सह । वृषलत्वं परिगता व्युत्थानात् क्षत्रधर्मिणः ॥ १६ ॥ इस प्रकार द्रविड, आभीर, पुण्ड्र और शबरोंके सहवासमें रहकर वे क्षत्रिय होते हुए भी धर्म-त्यागके कारण शूद्रकी अवस्थामें पहुँच गये ॥ १६ ॥

ततश्च हतवीरासु क्षत्रियासु पुनः पुनः । द्विजैरुत्पादितं क्षत्रं जामदग्न्यो न्यकृन्तत ॥ १७ ॥

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तत्पश्चात् क्षत्रियवीरोंके मारे जानेपर ब्राह्मणोंने उनकी स्त्रियोंसे नियोगकी विधिके अनुसार पुत्र उत्पन्न किये, किंतु उन्हें भी बड़े होनेपर परशुरामजीने फरसेसे काट डाला ॥ १७ ॥

एकविंशतिमेधान्ते रामं वागशरीरिणी ।
दिव्या प्रोवाच मधुरा सर्वलोकपरिश्रुता ॥ १८ ॥
इस प्रकार एक-एक करके जब इक्कीस बार क्षत्रियोंका संहार हो गया, तब परशुरामजीको दिव्य आकाशवाणीने मधुर स्वरमें सब लोगोंके सुनते हुए यह कहा — ॥ १८ ॥

राम राम निवर्तस्व कं गुणं तात पश्यसि ।
क्षत्रबन्धूनिमान् प्राणैर्विप्रयोज्य पुनः पुनः ॥ १९ ॥
‘बेटा! परशुराम! इस हत्याके कामसे निवृत्त हो जाओ। परशुराम! भला बारंबार इन बेचारे क्षत्रियोंके प्राण लेनेमें तुम्हें कौन-सा लाभ दिखायी देता है?’ ॥ १९ ॥

तथैव तं महात्मानमृचीकप्रमुखास्तदा ।
पितामहा महाभाग निवर्तस्वेत्यथाब्रुवन् ॥ २० ॥
उस समय महात्मा परशुरामजीको उनके पितामह ऋचीक आदिने भी इसी प्रकार समझाते हुए कहा—‘महाभाग! यह काम छोड़ दो, क्षत्रियोंको न मारो’ ॥ २० ॥

पितुर्वधममृष्यंस्तु रामः प्रोवाच तानृषीन् ।
नार्हन्तीह भवन्तो मां निवारयितुमित्युत ॥ २१ ॥
पिताके वधको सहन न करते हुए परशुरामजीने उन ऋषियोंसे इस प्रकार कहा —‘आपलोगोंको मुझे इस कामसे निवारण नहीं करना चाहिये’ ॥ २१ ॥

पितर ऊचुः

नार्हसे क्षत्रबन्धूंस्त्वं निहन्तुं जयतां वर ।
नेह युक्तं त्वया हन्तुं ब्राह्मणेन सता नृपान् ॥ २२ ॥
**पितर बोले—**विजय पानेवालोंमें श्रेष्ठ परशुराम! बेचारे क्षत्रियोंको मारना तुम्हारे योग्य नहीं है; क्योंकि तुम ब्राह्मण हो, अतः तुम्हारे हाथसे राजाओंका वध होना उचित नहीं है ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1723)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रिंशोऽध्यायः

अलर्कके ध्यानयोगका उदाहरण देकर पितामहोंका परशुरामजीको समझाना और परशुरामजीका तपस्याके द्वारा सिद्धि प्राप्त करना

पितर ऊचुः

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
श्रुत्वा च तत् तथा कार्यं भवता द्विजसत्तम ॥ १ ॥
पितरोंने कहा— ब्राह्मणश्रेष्ठ! इसी विषयमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, उसे सुनकर तुम्हें वैसा ही आचरण करना चाहिये ॥ १ ॥

अलर्को नाम राजर्षिरभवत् सुमहातपाः ।
धर्मज्ञः सत्यवादी च महात्मा सुदृढव्रतः ॥ २ ॥
पहलेकी बात है, अलर्क नामसे प्रसिद्ध एक राजर्षि थे, जो बड़े ही तपस्वी, धर्मज्ञ, सत्यवादी, महात्मा और दृढ़प्रतिज्ञ थे ॥ २ ॥

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ससागरान्तां धनुषा विनिर्जित्य महीमिमाम् । कृत्वा सुदुष्करं कर्म मनः सूक्ष्मे समादधे ॥ ३ ॥ उन्होंने अपने धनुषकी सहायतासे समुद्रपर्यन्त इस पृथ्वीको जीतकर अत्यन्त दुष्कर पराक्रम कर दिखाया था। इसके पश्चात् उनका मन सूक्ष्मतत्त्वकी खोजमें लगा ॥ ३ ॥

स्थितस्य वृक्षमूलेषु तस्य चिन्ता बभूव ह । उत्सृज्य सुमहत्कर्म सूक्ष्मं प्रति महामते ॥ ४ ॥ महामते! वे बड़े-बड़े कर्मोंका आरम्भ त्यागकर एक वृक्षके नीचे जा बैठे और सूक्ष्मतत्त्वकी खोजके लिये इस प्रकार चिन्ता करने लगे ॥ ४ ॥

अलर्क उवाच

मनसो मे बलं जातं मनो जित्वा ध्रुवो जयः । अन्यत्र बाणान् धास्यामि शत्रुभिः परिवारितः ॥ ५ ॥ अलर्क कहने लगे—मुझे मनसे ही बल प्राप्त हुआ है, अतः वही सबसे प्रबल है। मनको जीत लेनेपर ही मुझे स्थायी विजय प्राप्त हो सकती है। मैं इन्द्रियरूपी शत्रुओंसे घिरा हुआ हूँ, इसलिये बाहरके शत्रुओंपर हमला न करके इन भीतरी शत्रुओंको ही अपने बाणोंका निशाना बनाऊँगा ॥ ५ ॥

यदिदं चापलात् कर्म सर्वान् मर्त्यांश्चिकीर्षति । मनः प्रति सुतीक्ष्णाग्रानहं मोक्ष्यामि सायकान् ॥ ६ ॥ यह मन चंचलताके कारण सभी मनुष्योंसे तरह-तरहके कर्म कराता है, अतः अब मैं मनपर ही तीखे बाणोंका प्रहार करूँगा ॥ ६ ॥

मन उवाच

नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथंचन । तवैव मर्म भेत्स्यन्ति भिन्नमर्मा मरिष्यसि ॥ ७ ॥ अन्यान् बाणान् समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदयिष्यसि । मन बोला—अलर्क! तुम्हारे ये बाण मुझे किसी तरह नहीं बींध सकते। यदि इन्हें चलाओगे तो ये तुम्हारे ही मर्मस्थानोंको चीर डालेंगे और मर्मस्थानोंके चीरे जानेपर तुम्हारी ही मृत्यु होगी; अतः तुम अन्य प्रकारके बाणोंका विचार करो, जिनसे तुम मुझे मार सकोगे ॥ ७ १/२ ॥

तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमब्रवीत् ॥ ८ ॥ यह सुनकर अलर्कने थोड़ी देरतक विचार किया, इसके बाद वे (नासिकाको लक्ष्य करके) बोले ॥ ८ ॥

अलर्क उवाच

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आघ्राय सुबहून् गन्धांस्तानेव प्रतिगृद्ध्यति । तस्माद् घ्राणं प्रति शरान् प्रतिमोक्ष्याम्यहं शितान् ॥ ९ ॥ **अलर्कने कहा—**मेरी यह नासिका अनेक प्रकारकी सुगन्धियोंका अनुभव करके भी फिर उन्हींकी इच्छा करती है, इसलिये इन तीखे बाणोंको मैं इस नासिकापर ही छोडूँगा ॥ ९ ॥

घ्राण उवाच

नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथंचन । तवैव मर्म भेत्स्यन्ति भिन्नमर्मा मरिष्यसि ॥ १० ॥ अन्यान् बाणान् समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदयिष्यसि । **नासिका बोली—**अलर्क! ये बाण मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। इनसे तो तुम्हारे ही मर्म विदीर्ण होंगे और मर्मस्थानोंका भेदन हो जानेपर तुम्हीं मरोगे; अतः तुम दूसरे प्रकारके बाणोंका अनुसंधान करो, जिससे तुम मुझे मार सकोगे ॥ १० १/२ ॥ तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमब्रवीत् ॥ ११ ॥ नासिकाका यह कथन सुनकर अलर्क कुछ देर विचार करनेके पश्चात् (जिह्वाको लक्ष्य करके) कहने लगे ॥ ११ ॥

अलर्क उवाच

इयं स्वादून् रसान् भुक्त्वा तानेव प्रतिगृद्ध्यति । तस्माज्जिह्वां प्रति शरान् प्रतिमोक्ष्याम्यहं शितान् ॥ १२ ॥ **अलर्कने कहा—**यह रसना स्वादिष्ट रसोंका उपभोग करके फिर उन्हें ही पाना चाहती है। इसलिये अब इसीके ऊपर अपने तीखे सायकोंका प्रहार करूँगा ॥ १२ ॥

जिह्वोवाच

नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथंचन । तवैव मर्म भेत्स्यन्ति भिन्नमर्मा मरिष्यसि ॥ १३ ॥ अन्यान् बाणान् समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदयिष्यसि । **जिह्वा बोली—**अलर्क! ये बाण मुझे किसी प्रकार नहीं छेद सकते। ये तो तुम्हारे ही मर्मस्थानोंको बींधेंगे। मर्मस्थानोंके बिंध जानेपर तुम्हीं मरोगे। अतः दूसरे प्रकारके बाणोंका प्रबन्ध सोचो, जिनकी सहायतासे तुम मुझे मार सकोगे ॥ १३ १/२ ॥ तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमब्रवीत् ॥ १४ ॥ यह सुनकर अलर्क कुछ देरतक सोचते-विचारते रहे, फिर (त्वचापर कुपित होकर) बोले ॥ १४ ॥

अलर्क उवाच

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स्पृष्ट्वा त्वग्विविधान् स्पर्शांस्तानेव प्रतिगृद्ध्यति ।
तस्मात् त्वचं पाटयिष्ये विविधैः कङ्कपत्रिभिः ॥ १५ ॥
अलर्कने कहा— यह त्वचा नाना प्रकारके स्पर्शोंका अनुभव करके फिर उन्हींकी अभिलाषा किया करती है, अतः नाना प्रकारके बाणोंसे मारकर इस त्वचाको ही विदीर्ण कर डालूँगा ॥ १५ ॥

त्वगुवाच

नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथंचन ।
तवैव मर्म भेत्स्यन्ति भिन्नमर्मा मरिष्यसि ॥ १६ ॥
अन्यान् बाणान् समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदयिष्यसि ।
त्वचा बोली— अलर्क! ये बाण किसी प्रकार मुझे अपना निशाना नहीं बना सकते। ये तो तुम्हारा ही मर्म विदीर्ण करेंगे और मर्म विदीर्ण होनेपर तुम्हीं मौतके मुखमें पड़ोगे। मुझे मारनेके लिये तो दूसरी तरहके बाणोंकी व्यवस्था सोचो, जिनसे तुम मुझे मार सकोगे ॥ १६ ½ ॥
तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमब्रवीत् ॥ १७ ॥
त्वचाकी बात सुनकर अलर्कने थोड़ी देरतक विचार किया, फिर (श्रोत्रको सुनाते हुए) कहा— ॥ १७ ॥

अलर्क उवाच

श्रुत्वा तु विविधान् शब्दांस्तानेव प्रतिगृद्ध्यति ।
तस्माच्छ्रोत्रं प्रति शरान् प्रतिमुञ्चाम्यहं शितान् ॥ १८ ॥
अलर्क बोले— यह श्रोत्र बारंबार नाना प्रकारके शब्दोंको सुनकर उन्हींकी अभिलाषा करता है, इसलिये मैं इन तीखे बाणोंको श्रोत्र-इन्द्रियके ऊपर चलाऊँगा ॥ १८ ॥

श्रोत्रमुवाच

नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथंचन ।
तवैव मर्म भेत्स्यन्ति ततो हास्यसि जीवितम् ॥ १९ ॥
अन्यान् बाणान् समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदयिष्यसि ।
श्रोत्रने कहा— अलर्क! ये बाण मुझे किसी प्रकार नहीं छेद सकते। ये तुम्हारे ही मर्मस्थानोंको विदीर्ण करेंगे। तब तुम जीवनसे हाथ धो बैठोगे। अतः तुम अन्य प्रकारके बाणोंकी खोज करो, जिनसे मुझे मार सकोगे ॥ १९ ½ ॥
तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमब्रवीत् ॥ २० ॥
यह सुनकर अलर्कने कुछ सोच-विचारकर (नेत्रको सुनाते हुए) कहा ॥ २० ॥

अलर्क उवाच

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दृष्ट्वा रूपाणि बहुशस्तानेव प्रतिगृद्ध्यति । तस्माच्चक्षुर्हनिष्यामि निशितैः सायकैरहम् ॥ २१ ॥ **अलर्क बोले—**यह आँख भी अनेकों बार विभिन्न रूपोंका दर्शन करके पुनः उन्हींको देखना चाहती है। अतः मैं इसे अपने तीखे तीरोंसे मार डालूँगा ॥ २१ ॥

चक्षुरुवाच

नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथंचन । तवैव मर्म भेत्स्यन्ति भिन्नमर्मा मरिष्यसि ॥ २२ ॥ अन्यान् बाणान् समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदयिष्यसि । **आँखने कहा—**अलर्क! ये बाण मुझे किसी प्रकार नहीं छेद सकते। ये तुम्हारे ही मर्मस्थानोंको बींध डालेंगे और मर्म विदीर्ण हो जानेपर तुम्हें ही जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा। अतः दूसरे प्रकारके सायकोंका प्रबन्ध सोचो, जिनकी सहायतासे तुम मुझे मार सकोगे ॥ २२ ½ ॥

तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याथ ततो वचनमब्रवीत् ॥ २३ ॥ यह सुनकर अलर्कने कुछ देर विचार करनेके बाद (बुद्धिको लक्ष्य करके) यह बात कही ॥ २३ ॥

अलर्क उवाच

इयं निष्ठा बहुविधा प्रज्ञया त्वध्यवस्यति । तस्माद् बुद्धिं प्रति शरान् प्रतिमोक्ष्याम्यहं शितान् ॥ २४ ॥ **अलर्कने कहा—**यह बुद्धि अपनी ज्ञानशक्तिसे अनेक प्रकारका निश्चय करती है, अतः इस बुद्धिपर ही अपने तीक्ष्ण सायकोंका प्रहार करूँगा ॥ २४ ॥

बुद्धिरुवाच

नेमे बाणास्तरिष्यन्ति मामलर्क कथंचन । तवैव मर्म भेत्स्यन्ति भिन्नमर्मा मरिष्यसि । अन्यान् बाणान् समीक्षस्व यैस्त्वं मां सूदयिष्यसि ॥ २५ ॥ **बुद्धि बोली—**अलर्क! ये बाण मेरा किसी प्रकार भी स्पर्श नहीं कर सकते। इनसे तुम्हारा ही मर्म विदीर्ण होगा और मर्म विदीर्ण होनेपर तुम्हीं मरोगे। जिनकी सहायतासे मुझे मार सकोगे, वे बाण तो कोई और ही हैं। उनके विषयमें विचार करो ॥ २५ ॥

ब्राह्मण उवाच

ततोऽलर्कस्तपो घोरं तत्रैवास्थाय दुष्करम् । नाध्यगच्छत् परं शक्त्या बाणमेतेषु सप्तसु ॥ २६ ॥

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**ब्राह्मणने कहा—**देवि! तदनन्तर अलर्कने उसी पेड़के नीचे बैठकर घोर तपस्या की, किंतु उससे मन-बुद्धिसहित पाँचों इन्द्रियोंको मारनेयोग्य किसी उत्तम बाणका पता न चला ॥ २६ ॥

सुसमाहितचेतास्तु स ततोऽचिन्तयत् प्रभुः ।
स विचिन्त्य चिरं कालमलर्को द्विजसत्तम ॥ २७ ॥
नाध्यगच्छत् परं श्रेयो योगान्मतिमतां वरः ।
तब वे सामर्थ्यशाली राजा एकाग्रचित्त होकर विचार करने लगे। विप्रवर! बहुत दिनोंतक निरन्तर सोचने-विचारनेके बाद बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजा अलर्कको योगसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी साधन नहीं प्रतीत हुआ ॥ २७ १/२ ॥

स एकाग्रं मनः कृत्वा निश्चलो योगमास्थितः ॥ २८ ॥
इन्द्रियाणि जघानाशु बाणेनैकेन वीर्यवान् ।
योगेनात्मानमाविश्य सिद्धिं परमिकां गतः ॥ २९ ॥
वे मनको एकाग्र करके स्थिर आसनसे बैठ गये और ध्यानयोगका साधन करने लगे। इस ध्यानयोगरूप एक ही बाणसे मारकर उन बलशाली नरेशने समस्त इन्द्रियोंको सहसा परास्त कर दिया। वे ध्यानयोगके द्वारा आत्मामें प्रवेश करके परम सिद्धि (मोक्ष)-को प्राप्त हो गये ॥ २८-२९ ॥

विस्मितश्चापि राजर्षिरिमां गाथां जगाद ह ।
अहो कष्टं यदस्माभिः सर्वं बाह्यमनुष्ठितम् ॥ ३० ॥
भोगतृष्णासमायुक्तैः पूर्वं राज्यमुपासितम् ।
इति पश्चान्मया ज्ञातं योगान्नास्ति परं सुखम् ॥ ३१ ॥
इस सफलतासे राजर्षि अलर्कको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने इस गाथाका गान किया—'अहो! बड़े कष्टकी बात है कि अबतक मैं बाहरी कामोंमें ही लगा रहा और भोगोंकी तृष्णासे आबद्ध होकर राज्यकी ही उपासना करता रहा। ध्यानयोगसे बढ़कर दूसरा कोई उत्तम सुखका साधन नहीं है, यह बात तो मुझे बहुत पीछे मालूम हुई है' ॥ ३०-३१ ॥

इति त्वमनुजानीहि राम मा क्षत्रियान् जहि ।
तपो घोरमुपातिष्ठ ततः श्रेयोऽभिपत्स्यसे ॥ ३२ ॥
(पितामहोंने कहा—) बेटा परशुराम! इन सब बातोंको अच्छी तरह समझकर तुम क्षत्रियोंका नाश न करो। घोर तपस्यामें लग जाओ, उसीसे तुम्हें कल्याण प्राप्त होगा ॥ ३२ ॥

इत्युक्तः स तपो घोरं जामदग्न्यः पितामहैः ।
आस्थितः सुमहाभागो ययौ सिद्धिं च दुर्गमाम् ॥ ३३ ॥

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अपने पितामहोंके इस प्रकार कहनेपर महान् सौभाग्यशाली जमदग्निनन्दन परशुरामजीने कठोर तपस्या की और इससे उन्हें परम दुर्लभ सिद्धि प्राप्त हुई ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥

अध्याय (पृष्ठ 1730)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

एकत्रिंशोऽध्यायः

राजा अम्बरीषकी गायी हुई आध्यात्मिक स्वराज्यविषयक गाथा

ब्राह्मण उवाच

त्रयो वै रिपवो लोके नवधा गुणतः स्मृताः ।
प्रहर्षः प्रीतिरानन्दस्त्रयस्ते सात्त्विका गुणाः ॥ १ ॥
तृष्णा क्रोधोऽभिसंरम्भो राजसास्ते गुणाः स्मृताः ।
श्रमस्तन्द्रा च मोहश्च त्रयस्ते तामसा गुणाः ॥ २ ॥
ब्राह्मणने कहा— देवि! इस संसारमें सत्त्व, रज और तम—ये तीन मेरे शत्रु हैं। ये वृत्तियोंके भेदसे नौ प्रकारके माने गये हैं। हर्ष, प्रीति और आनन्द—ये तीन सात्त्विक गुण हैं; तृष्णा, क्रोध और द्वेषभाव—से तीन राजस गुण हैं और थकावट, तन्द्रा तथा मोह—ये तीन तामस गुण हैं ॥ १-२ ॥

एतान् निकृत्य धृतिमान् बाणसंघैरतन्द्रितः ।
जेतुं परानुत्सहते प्रशान्तात्मा जितेन्द्रियः ॥ ३ ॥
शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, आलस्यहीन और धैर्यवान् पुरुष शम-दम आदि बाण-समूहोंके द्वारा इन पूर्वोक्त गुणोंका उच्छेद करके दूसरोंको जीतनेका उत्साह करते हैं ॥ ३ ॥

अत्र गाथाः कीर्तयन्ति पुराकल्पविदो जनाः ।
अम्बरीषेण या गीता राज्ञा पूर्वं प्रशाम्यता ॥ ४ ॥
इस विषयमें पूर्वकालकी बातोंके जानकार लोग एक गाथा सुनाया करते हैं। पहले कभी शान्तिपरायण महाराज अम्बरीषने इस गाथाका गान किया था ॥ ४ ॥

समुदीर्णेषु दोषेषु बाध्यमानेषु साधुषु ।
जग्राह तरसा राज्यमम्बरीषो महायशाः ॥ ५ ॥
कहते हैं—जब दोषोंका बल बढ़ा और अच्छे गुण दबने लगे, उस समय महायशस्वी महाराज अम्बरीषने बलपूर्वक राज्यकी बागडोर अपने हाथमें ली ॥ ५ ॥

स निगृह्यात्मनो दोषान् साधून् समभिपूज्य च ।
जगाम महतीं सिद्धिं गाथाश्चेमा जगाद ह ॥ ६ ॥
उन्होंने अपने दोषोंको दबाया और उत्तम गुणोंका आदर किया। इससे उन्हें बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त हुई और उन्होंने यह गाथा गायी— ॥ ६ ॥

भूयिष्ठं विजिता दोषा निहताः सर्वशत्रवः ।
एको दोषो वरिष्ठश्च वध्यः स न हतो मया ॥ ७ ॥

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‘मैंने बहुत-से दोषोंपर विजय पायी और समस्त शत्रुओंका नाश कर डाला; किंतु एक सबसे बड़ा दोष रह गया है। यद्यपि वह नष्ट कर देने योग्य है तो भी अबतक मैं नाश न कर सका ।। ७ ।।

यत्प्रयुक्तो जन्तुरयं वैतृष्ण्यं नाधिगच्छति ।
तृष्णार्त इह निम्नानि धावमानो न बुध्यते ।। ८ ।।
‘उसीकी प्रेरणासे इस प्राणीको वैराग्य नहीं होता। तृष्णाके वशमें पड़ा हुआ मनुष्य संसारमें नीच कर्मोंकी ओर दौड़ता है, सचेत नहीं होता ।। ८ ।।

अकार्यमपि येनेह प्रयुक्तः सेवते नरः ।
तं लोभमसिभिस्तीक्ष्णैर्निकृत्य सुखमेधते ।। ९ ।।
‘उससे प्रेरित होकर वह यहाँ नहीं करने-योग्य काम भी कर डालता है। उस दोषका नाम है लोभ। उसे ज्ञानरूपी तलवारसे काटकर मनुष्य सुखी होता है ।। ९ ।।

लोभाद्धि जायते तृष्णा ततश्चिन्ता प्रवर्तते ।
स लिप्समानो लभते भूयिष्ठं राजसान् गुणान् ।
तदवाप्तौ तु लभते भूयिष्ठं तमसान् गुणान् ।। १० ।।
‘लोभसे तृष्णा और तृष्णासे चिन्ता पैदा होती है। लोभी मनुष्य पहले बहुत-से राजस गुणोंको पाता है और उनकी प्राप्ति हो जानेपर उसमें तामसिक गुण भी अधिक मात्रामें आ जाते हैं ।। १० ।।

स तैर्गुणैः संहतदेहबन्धनः
पुनः पुनर्जायति कर्म चेहते ।
जन्मक्षये भिन्नविकीर्णदेहो
मृत्युं पुनर्गच्छति जन्मनैव ।। ११ ।।
‘उन गुणोंके द्वारा देह-बन्धनमें जकड़कर वह बारंबार जन्म लेता और तरह-तरहके कर्म करता रहता है। फिर जीवनका अन्त समय आनेपर उसके देहके तत्त्व विलग-विलग होकर बिखर जाते हैं और वह मृत्युको प्राप्त हो जाता है। इसके बाद फिर जन्म-मृत्युके बन्धनमें पड़ता है ।। ११ ।।

तस्मादेतं सम्यगवेक्ष्य लोभं
निगृह्य धृत्याऽऽत्मनि राज्यमिच्छेत् ।
एतद् राज्यं नान्यदस्तीह राज्य-
मात्मैव राजा विदितो यथावत् ।। १२ ।।
‘इसलिये इस लोभके स्वरूपको अच्छी तरह समझकर इसे धैर्यपूर्वक दबाने और आत्मराज्यपर अधिकार पानेकी इच्छा करनी चाहिये। यही वास्तविक स्वराज्य है। यहाँ दूसरा कोई राज्य नहीं है। आत्माका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर वही राजा है’ ।। १२ ।।

इति राज्ञाम्बरीषेण गाथा गीता यशस्विना ।