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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,566 pages

देशान्तरगते विप्रे संयुक्ते कालधर्मणा ।

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⬅ विषय-सूची (TOC)

[भगवान्‌के उपदेशका उपसंहार और द्वारकागमन]

युधिष्ठिर उवाच

देशान्तरगते विप्रे संयुक्ते कालधर्मणा । शरीरनाशे सम्प्राप्ते कथं प्रेतत्वकल्पना ॥

युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्‌! यदि कोई ब्राह्मण परदेश गया हो और वहीं कालकी प्रेरणासे उसका शरीर नष्ट हो जाय तो उसकी प्रेतक्रिया (अन्त्येष्टि-संस्कार) किस प्रकार सम्भव है? ॥

श्रीभगवानुवाच

श्रूयतामाहिताग्नेस्तु तथाभूतस्य संस्क्रिया । पालाशवृन्दैः प्रतिमा कर्तव्या कल्पचोदिता ॥

श्रीभगवान्‌ने कहा—राजन्‌! यदि किसी अग्निहोत्री ब्राह्मणकी इस प्रकार मृत्यु हो जाय तो उसका संस्कार करनेके लिये प्रेतकल्पमें बताये अनुसार उसकी काष्ठमयी प्रतिमा बनवानी चाहिये। वह काष्ठ पलाशका ही होना उचित है ॥

त्रीणि षष्टिशतान्याहुरस्थीन्यस्य युधिष्ठिर । तेषां विकल्पना कार्या यथाशास्त्रं विनिश्चितम् ॥

युधिष्ठिर! मनुष्यके शरीरमें तीन सौ साठ हड्डियाँ बतायी गयी हैं। उन सबकी शास्त्रोक्त रीतिसे कल्पना करके उस प्रतिमाका दाह करना चाहिये ॥

युधिष्ठिर उवाच

विशेषतीर्थं सर्वेषामशक्तानामनुग्रहात् । भक्तानां तारणार्थं तु वक्तुमर्हसि धर्मतः ॥

युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्‌! जो भक्त तीर्थयात्रा करनेमें असमर्थ हों, उन सबको तारनेके लिये कृपया किसी विशेष तीर्थका धर्मानुसार वर्णन कीजिये ॥

श्रीभगवानुवाच

पावनं सर्वतीर्थानां सत्यं गायन्ति सामगाः । सत्यस्य वचनं तीर्थमहिंसा तीर्थमुच्यते ॥

श्रीभगवान्‌ने कहा—राजन्‌! सामवेदका गायन करनेवाले विद्वान्‌ कहते हैं कि सत्य सब तीर्थोंको पवित्र करनेवाला है। सत्य बोलना और किसी जीवकी हिंसा न करना—ये तीर्थ कहलाते हैं ॥

तपस्तीर्थं दया तीर्थं शीलं तीर्थं युधिष्ठिर । अल्पसंतोषकं तीर्थं नारी तीर्थं पतिव्रता ॥

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युधिष्ठिर! तप, दया, शील, थोड़ेमें संतोष करना—ये सद्गुण भी तीर्थरूपमें ही हैं तथा पतिव्रता नारी भी तीर्थ है ।।

संतुष्टो ब्राह्मणस्तीर्थं ज्ञानं वा तीर्थमुच्यते ।
मद्भक्ताः सततं तीर्थं शङ्करस्य विशेषतः ।।
संतोषी ब्राह्मण और ज्ञानको भी तीर्थ कहते हैं। मेरे भक्त सदैव तीर्थरूप हैं और शंकरके भक्त विशेषतया तीर्थ हैं ।।

यतयस्तीर्थमित्येवं विद्वांसस्तीर्थमुच्यते ।
शरण्यपुरुषस्तीर्थमभयं तीर्थमुच्यते ।।
संन्यासी और विद्वान् भी तीर्थ कहे जाते हैं। दूसरोंको शरण देनेवाले पुरुष भी तीर्थ हैं। जीवोंको अभय दान देना भी तीर्थ ही कहलाता है ।।

त्रैलोक्येऽस्मिन् निरुद्विग्नो न बिभेमि कुतश्चन ।
न दिवा यदि वा रात्रावुद्वेगः शूद्रलङ्घनात् ।।
मैं तीनों लोकोंमें उद्वेगशून्य हूँ। दिन हो या रात, मुझे कभी किसीसे भी भय नहीं होता; किंतु शूद्रका मर्यादा-भंग करना मुझे बुरा लगता है ।।

न भयं देवदैत्येभ्यो रक्षोभ्यश्चैव मे नृप ।
शूद्रवक्त्राच्च्युतं ब्रह्म भयं तु मम सर्वदा ।।
राजन्! देवता, दैत्य और राक्षसोंसे भी मैं नहीं डरता। परंतु शूद्रके मुखसे जो वेदका उच्चारण होता है, उससे मुझे सदा ही भय बना रहता है ।।

तस्मात् सप्रणवं शूद्रो मन्नामापि न कीर्तयेत् ।
प्रणवं हि परं लोके ब्रह्म ब्रह्मविदो विदुः ।।
इसलिये शूद्रको मेरे नामका भी प्रणवके साथ उच्चारण नहीं करना चाहिये, क्योंकि वेदवेत्ता विद्वान् इस संसारमें प्रणवको सर्वोत्कृष्ट वेद मानते हैं ।।

द्विजशुश्रूषणं धर्मः शूद्राणां भक्तितो मयि ।
शूद्र मुझमें भक्ति रखते हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी सेवा करे—यही उनका परम धर्म है ।।

द्विजशुश्रूषया शूद्रः परं श्रेयोऽधिगच्छति ।
द्विजशुश्रूषणादन्यन्नास्ति शूद्रस्य निष्कृतिः ।।
द्विजोंकी सेवासे ही शूद्र परम कल्याणके भागी होते हैं। इसके सिवा उनके उद्धारका दूसरा कोई उपाय नहीं है ।।

सृष्ट्वा पितामहः शूद्रमभिभूतं तु तामसैः ।
द्विजशुश्रूषणं धर्मं शूद्राणां तु प्रयुक्तवान् ।
नश्यन्ति तामसा भावाः शूद्रस्य द्विजभक्तितः ।।

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ब्रह्माजीने शूद्रोंको तामस गुणोंसे युक्त उत्पन्न करके उनके लिये द्विजोंकी सेवारूप धर्मका उपदेश किया। द्विजोंकी भक्तिसे शूद्रके तामस भाव नष्ट हो जाते हैं।।

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतं मूर्ध्ना गृह्णामि शूद्रतः ।।
शूद्र भी यदि भक्तिपूर्वक मुझे पत्र, पुष्प, फल अथवा जल अर्पण करता है तो मैं उसके भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहारको सादर शीश चढ़ाता हूँ ।।

अग्रजो वापि यः कश्चित् सर्वपापसमन्वितः ।
यदि मां सततं ध्यायेत् सर्वपापैः प्रमुच्यते ।।
सम्पूर्ण पापोंसे युक्त होनेपर भी यदि कोई ब्राह्मण सदा मेरा ध्यान करता रहता है तो वह अपने सम्पूर्ण पापोंसे छुटकारा पा जाता है ।।

विद्याविनयसम्पन्ना ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
मयि भक्तिं न कुर्वन्ति चाण्डालसदृशा हि ते ।।
विद्या और विनयसे सम्पन्न तथा वेदोंके पारंगत विद्वान् होनेपर भी जो ब्राह्मण मुझमें भक्ति नहीं करते, वे चाण्डालके समान हैं ।।

वृथा दानं वृथा तप्तं वृथा चेष्टं वृथा हुतम् ।
वृथाऽऽतिथ्यं च तत् तस्य यो न भक्तो मम द्विजः ।।
जो द्विज मेरा भक्त नहीं है, उसके दान, तप, यज्ञ, होम और अतिथि-सत्कार—ये सब व्यर्थ हैं ।।

स्थावरे जङ्गमे वापि सर्वभूतेषु पाण्डव ।
समत्वेन यदा कुर्यान्मद्भक्तो मित्रशत्रुषु ।।
पाण्डुनन्दन! जब मनुष्य समस्त स्थावर-जंगम प्राणियोंमें एवं मित्र और शत्रुमें समान दृष्टि कर लेता है, उस समय वह मेरा सच्चा भक्त होता है ।।

आनृशंस्यमहिंसा च यथा सत्यं तथाऽऽर्जवम् ।
अद्रोहश्चैव भूतानां मद्गतानां व्रतं नृप ।।
राजन्! क्रूरताका अभाव, अहिंसा, सत्य, सरलता तथा किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना—यह मेरे भक्तोंका व्रत है ।।

नम इत्येव यो ब्रूयान्मद्भक्तं श्रद्धयान्वितः ।
तस्याक्षयाऽभवँल्लोकाः श्वपाकस्यापि पार्थिव ।।
पृथ्वीनाथ! जो मनुष्य मेरे भक्तको श्रद्धापूर्वक नमस्कार करता है, वह चाण्डाल ही क्यों न हो, उसे अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होती है ।।

किं पुनर्ये यजन्ते मां सदारं विधिपूर्वकम् ।
मद्भक्ता मद्गतप्राणाः कथयन्तश्च मां सदा ।।

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फिर जो साक्षात् मेरे भक्त हैं, जिनके प्राण मुझमें ही लगे रहते हैं तथा जो सदा मेरे ही नाम और गुणोंका कीर्तन करते रहते हैं, वे यदि लक्ष्मीसहित मेरी विधिवत् पूजा करते हैं तो उनकी सद्गतिके विषयमें क्या कहना है? ।।

बहुवर्षसहस्राणि तपस्तपति यो नरः ।
नासौ पदमवाप्नोति मद्भक्तैर्यदवाप्यते ।।
अनेकों हजार वर्षोंतक तपस्या करनेवाला मनुष्य भी उस पदको प्राप्त नहीं होता, जो मेरे भक्तोंको अनायास ही मिल जाता है ।।

मामेव तस्माद् राजेन्द्र ध्यायन् नित्यमतन्द्रितः ।
अवाप्स्यसि ततः सिद्धिं द्रक्ष्यत्येव परं पदम् ।।
इसलिये राजेन्द्र! तुम सदा सजग रहकर निरन्तर मेरा ही ध्यान करते रहो, इससे तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी और तुम निश्चय ही परम पदका साक्षात्कार कर सकोगे ।।

ऋग्वेदेनैव होता च यजुषाध्वर्युरेव च ।
सामवेदेन चोद्गाता पुण्येनाभिष्टुवन्ति माम् ।।
अथर्वशिरसा चैव नित्यमाथर्वणा द्विजाः ।
स्तुवन्ति सततं ये मां ते वै भागवताः स्मृताः ।।
जो होता बनकर ऋग्वेदके द्वारा, अध्वर्यु होकर यजुर्वेदके द्वारा, उद्गाता बनकर परम पवित्र सामवेदके द्वारा मेरा स्तवन करते हैं तथा अथर्ववेदीय द्विजोंके रूपमें जो अथर्ववेदके द्वारा हमेशा मेरी स्तुति किया करते हैं, वे भगवद्भक्त माने गये हैं ।।

वेदाधीनाः सदा यज्ञा यज्ञाधीनास्तु देवताः ।
देवताः ब्राह्मणाधीनास्तस्माद् विप्रास्तु देवताः ।।
यज्ञ सदा वेदोंके अधीन हैं और देवता यज्ञों तथा ब्राह्मणोंके अधीन होते हैं, इसलिये ब्राह्मण देवता हैं ।।

अनाश्रित्योच्छ्रयं नास्ति मुख्यमाश्रयमाश्रयेत् ।
रुद्रं समाश्रिता देवा रुद्रो ब्रह्माणमाश्रितः ।।
किसीका सहारा लिये बिना कोई ऊँचे नहीं चढ़ सकता, अतः सबको किसी प्रधान आश्रयका सहारा लेना चाहिये। देवतालोग भगवान् रुद्रके आश्रयमें रहते हैं, रुद्र ब्रह्माजीके आश्रित हैं ।।

ब्रह्मा मामाश्रितो राजन् नाहं कंचिदुपाश्रितः ।
ममाश्रयो न कश्चित् तु सर्वेषामाश्रयो ह्यहम् ।।
ब्रह्माजी मेरे आश्रयमें रहते हैं, किंतु मैं किसीके आश्रित नहीं हूँ। राजन्! मेरा आश्रय कोई नहीं है। मैं ही सबका आश्रय हूँ ।।

एवमेतन्मया प्रोक्तं रहस्यमिदमुत्तमम् ।
धर्मप्रियस्य ते नित्यं राजन्नेवं समाचर ।।

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राजन्! इस प्रकार ये उत्तम रहस्यकी बातें मैंने तुम्हें बतायी हैं, क्योंकि तुम धर्मके प्रेमी हो। अब तुम इस उपदेशके ही अनुसार सदा आचरण करो॥ इदं पवित्रमाख्यानं पुण्यं वेदेन सम्मितम्। यः पठेन्मामकं धर्ममहन्यहनि पाण्डव॥ धर्मोऽपि वर्धते तस्य बुद्धिश्चापि प्रसीदति। पापक्षयमुपेत्यैव कल्याणं च विवर्धते॥ यह पवित्र आख्यान पुण्यदायक एवं वेदके समान मान्य है। पाण्डुनन्दन! जो मेरे बताये हुए इस वैष्णव-धर्मका प्रतिदिन पाठ करेगा, उसके धर्मकी वृद्धि होगी और बुद्धि निर्मल। साथ ही उसके समस्त पापोंका नाश होकर परम कल्याणका विस्तार होगा॥ एतत् पुण्यं पवित्रं च पापनाशनमुत्तमम्। श्रोतव्यं श्रद्धया युक्तैः श्रोत्रियैश्च विशेषतः॥ यह प्रसंग परम पवित्र, पुण्यदायक, पापनाशक और अत्यन्त उत्कृष्ट है। सभी मनुष्योंको, विशेषतः श्रोत्रिय विद्वानोंको श्रद्धाके साथ इसका श्रवण करना चाहिये॥ श्रावयेद् यस्त्विदं भक्त्या प्रयतोऽथ शृणोति वा। स गच्छेन्मम सायुज्यं नात्र कार्या विचारणा॥ जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसे सुनाता और पवित्रचित्त होकर सुनता है, वह मेरे सायुज्यको प्राप्त होता है, इसमें कोई शंका नहीं है॥ यश्चेमं श्रावयेच्छाद्धे मद्भक्तो मत्परायणः। पितरस्तस्य तृप्यन्ति यावदाभूतसम्प्लवम्॥ मेरी भक्तिमें तत्पर रहनेवाला जो भक्त पुरुष श्राद्धमें इस धर्मको सुनाता है, उसके पितर इस ब्रह्माण्डके प्रलय होनेतक सदा तृप्त बने रहते हैं॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा भागवतान् धर्मान् साक्षाद् विष्णोर्जगद्गुरोः। प्रहृष्टमनसो भूत्वा चिन्तयन्तोऽद्भुताः कथाः॥ ऋषयः पाण्डवाश्चैव प्रणेमुस्तं जनार्दनम्। पूजयामास गोविन्दं धर्मपुत्रः पुनः पुनः॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! साक्षात् विष्णुस्वरूप जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे भागवत-धर्मोंका श्रवण करके इस अद्भुत प्रसंगपर विचार करते हुए ऋषि और पाण्डवलोग बहुत प्रसन्न हुए और सबने भगवान्‌को प्रणाम किया। धर्मनन्दन युधिष्ठिरने तो बारंबार गोविन्दका पूजन किया॥ देवा ब्रह्मर्षयः सिद्धा गन्धर्वाप्सरसस्तथा। ऋषयश्च महात्मानो गुह्यका भुजगास्तथा॥

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बालखिल्या महात्मानो योगिनस्तत्त्वदर्शिनः । तथा भगवताश्चापि पञ्चकालमुपासकाः ।। कौतूहलसमायुक्ता भगवद्भक्तिमागताः । श्रुत्वा तु परमं पुण्यं वैष्णवं धर्मशासनम् ।। विमुक्तपापाः पूतास्ते संवृत्तास्तत्क्षणेन तु । देवता, ब्रह्मर्षि, सिद्ध, गन्धर्व, अप्सराएँ, ऋषि, महात्मा, गुह्यक, सर्प, महात्मा बालखिल्य, तत्त्वदर्शी योगी तथा पञ्चयाम उपासना करनेवाले भगवद्भक्त पुरुष, जो अत्यन्त उत्कण्ठित होकर उपदेश सुननेके लिये पधारे थे, इस परम पवित्र वैष्णव-धर्मका उपदेश सुनकर तत्क्षण निष्पाप एवं पवित्र हो गये। सबमें भगवद्भक्ति उमड़ आयी ।। प्रणम्य शिरसा विष्णुं प्रतिनन्द्य च ताः कथाः ।। फिर उन सबने भगवान्‌के चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और उनके उपदेशकी प्रशंसा की ।। द्रष्टारो द्वारकायां वै वयं सर्वे जगद्गुरुम् । इति प्रहृष्टमनसो ययुर्देवगणैः सह । सर्वे ऋषिगणा राजन् ययुः स्वं स्वं निवेशनम् ।। फिर ‘भगवन्! अब हम द्वारकामें पुनः आप जगद्गुरुका दर्शन करेंगे।’ यों कहकर सब ऋषि प्रसन्नचित्त हो देवताओंके साथ अपने-अपने स्थानको चले गये ।। गतेषु तेषु सर्वेषु केशवः केशिहा हरिः । सस्मार दारुकं राजन् स च सात्यकिना सह । समीपस्थोऽभवत् सूतो याहि देवेति चाब्रवीत् ।। राजन्! उन सबके चले जानेपर केशिनिषूदन भगवान् श्रीकृष्णने सात्यकिसहित दारुकको याद किया। सारथि दारुक पास ही बैठा था, उसने निवेदन किया—‘भगवन्! रथ तैयार है, पधारिये ।।' ततो विषण्णवदनाः पाण्डवाः पुरुषोत्तमम् । अञ्जलिं मूर्ध्नि संधाय नेत्रैरश्रुपरिप्लुतैः । पिबन्तः सततं कृष्णां नोचुरार्ततरास्तदा ।। यह सुनकर पाण्डवोंका मुँह उदास हो गया। उन्होंने हाथ जोड़कर सिरसे लगाया और वे आँसूभरे नेत्रोंसे पुरुषोत्तम श्रीकृष्णकी ओर एकटक देखने लगे, किंतु अत्यन्त दुखी होनेके कारण उस समय कुछ बोल न सके ।। कृष्णोऽपि भगवान् देवः पृथामामन्त्र्य चार्तवत् । धृतराष्ट्रं च गान्धारीं विदुरं द्रौपदीं तथा ।। कृष्णद्वैपायनं व्यासमृषीनन्यांश्च मन्त्रिणः । सुभद्रामात्मजयुतामुत्तरां स्पृश्य पाणिना ।

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निर्गत्य वेश्मनस्तस्मादारुरोह तदा रथम् ॥ देवेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण भी उनकी दशा देखकर दुखी-से हो गये और उन्होंने कुन्ती, धृतराष्ट्र, गान्धारी, विदुर, द्रौपदी, महर्षि व्यास और अन्यान्य ऋषियों एवं मन्त्रियोंसे बिदा लेकर सुभद्रा तथा पुत्रसहित उत्तराकी पीठपर हाथ फेरा और आशीर्वाद देकर वे उस राजभवनसे बाहर निकल आये और रथपर सवार हो गये ॥

वाजिभिः शैब्यसुग्रीवमेघपुष्पबलाहकैः । युक्तं तु ध्वजभूतेन पतगेन्द्रेण धीमता ॥ उस रथमें शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामवाले चार घोड़े जुते हुए थे तथा बुद्धिमान् गरुड़का ध्वज फहरा रहा था ॥

अन्वारुरोह चाप्येनं प्रेम्णा राजा युधिष्ठिरः । अपास्य चाशु यन्तारं दारुकं सूतसत्तमम् । अभीषून् प्रतिजग्राह स्वयं कुरुपतिस्तदा ॥ उस समय कुरुदेशके राजा युधिष्ठिर भी प्रेमवश भगवान्‌के पीछे-पीछे स्वयं भी रथपर जा बैठे और तुरंत ही श्रेष्ठ दारुकको सारथिके स्थानसे हटाकर उन्होंने घोड़ोंकी बागडोर अपने हाथमें ले ली ॥

उपारुह्यार्जुनश्चापि चामरव्यजनं शुभम् । रुक्मदण्डं बृहन्मूर्ध्नि दुधावाभिप्रदक्षिणम् ॥ फिर अर्जुन भी रथपर आरूढ़ हो स्वर्णदण्डयुक्त विशाल चँवर हाथमें लेकर दाहिनी ओरसे भगवान्‌के मस्तकपर हवा करने लगे ॥

तथैव भीमसेनोऽपि रथमारुह्य वीर्यवान् । छत्रं शतशलाकं च दिव्यमाल्योपशोभितम् ॥ इसी प्रकार महाबली भीमसेन भी रथपर जा चढ़े और भगवान्‌के ऊपर छत्र लगाये खड़े हो गये। वह छत्र सौ कमानियोंसे युक्त तथा दिव्य मालाओंसे सुशोभित था ॥

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वैदूर्यमणिदण्डं च चामीकरविभूषितम् । दधार तरसा भीमश्छत्रं तच्छाङ्गधन्वनः ॥ उसका डंडा वैदूर्यमणिका बना हुआ था तथा सोनेकी झालरें उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। भीमसेनने शार्ङ्गधनुषधारी श्रीकृष्णके उस छत्रको शीघ्र ही धारण कर लिया ।।

उपारुह्य रथं शीघ्रं चामरव्यजने सिते । नकुलः सहदेवश्च धूयमानौ जनार्दनम् ॥ नकुल और सहदेव भी अपने हाथोंमें सफेद चँवर लिये शीघ्र रथपर सवार हो गये और भगवान् जनार्दनके ऊपर डुलाने लगे ।।

भीमसेनोऽर्जुनश्चैव यमावप्यरिसूदनौ । पृष्ठतोऽनुययुः कृष्णं मा शब्द इति हर्षिताः ॥ इस प्रकार युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेवने हर्षपूर्वक श्रीकृष्णका अनुसरण किया और कहने लगे—'आप मत जाइये' ।।

त्रियोजने व्यतीते तु परिष्वज्य च पाण्डवान् । विसृज्य कृष्णस्तान् सर्वान् प्रणतान् द्वारकां ययौ ॥ तीन योजन (चौबीस मील) तक चले आनेके बाद भगवान् श्रीकृष्णने अपने चरणोंमें पड़े हुए पाण्डवोंको गलेसे लगाकर विदा किया और स्वयं द्वारकाको चले गये ।।

॥ आश्वमेधिकपर्व सम्पूर्णम् ॥

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तथा प्रणम्य गोविन्दं तदाप्रभृति पाण्डवाः । कपिलाद्यानि दानानि ददुर्धर्मपरायणाः ॥ इस प्रकार भगवान् गोविन्दको प्रणाम करके जब पाण्डव घर लौटे, उस दिनसे सदा धर्ममें तत्पर रहकर कपिला आदि गौओंका दान करने लगे ॥ मधुसूदनवाक्यानि स्मृत्वा स्मृत्वा पुनः पुनः । मनसा पूजयामासुर्हृदयस्थानि पाण्डवाः ॥ वे सब पाण्डव भगवान् श्रीकृष्णके वचनोंको बारंबार याद करके और उनको हृदयमें धारण करके मन-ही-मन उनकी सराहना करते थे ॥ युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा हृदि कृत्वा जनार्दनम् । तद्भक्तस्तन्मना युक्तस्तद्याजी तत्परोऽभवत् ॥ धर्मात्मा युधिष्ठिर ध्यानद्वारा भगवान्‌को अपने हृदयमें विराजमान करके उन्हींके भजनमें लग गये, उन्हींका स्मरण करने लगे और योगयुक्त होकर भगवान्‌का यजन करते हुए उन्हींके परायण हो गये ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि नकुलोपाख्याने द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९२ ॥ इस प्रकार श्रीमद्भारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें नकुलोपाख्यानविषयक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९२ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १२२० श्लोक मिलाकर कुल १२७३ श्लोक हैं)


॥ आश्वमेधिकपर्व सम्पूर्णम् ॥


अनुष्टुप्(अन्य बड़े छन्द)बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप् मानकर गिननेपरकुल योग
उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये२७४७।।(१२२।।)१६८।≡२९१५।।।≡
दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये१२६५(२१)२८।।।≡१२९३।।।≡

आश्वमेधिकपर्वकी कुल श्लोकसंख्या—४२०९।।।≡

आश्रमवासिकपर्व

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⬅ विषय-सूची (TOC)

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

श्रीमहाभारतम्

आश्रमवासिकपर्व

आश्रमवासपर्व

प्रथमोऽध्यायः

भाइयोंसहित युधिष्ठर तथा कुन्ती आदि देवियोंके द्वार धृतराष्ट्र और गान्धारीकी सेवा

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उनकी लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत) का पाठ करना चाहिये ॥

जनमेजय उवाच

प्राप्य राज्यं महात्मानः पाण्डवा मे पितामहाः ।
कथमासन् महाराज्ञि धृतराष्ट्रे महात्मनि ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! मेरे प्रपितामह महात्मा पाण्डव अपने राज्यपर अधिकार प्राप्त कर लेनेके बाद महाराज धृतराष्ट्रके प्रति कैसा बर्ताव करते थे? ॥ १ ॥
स तु राजा हतामात्यो हतपुत्रो निराश्रयः ।
कथमासीद्धतैश्वर्यो गान्धारी च यशस्विनी ॥ २ ॥
राजा धृतराष्ट्र अपने मन्त्री और पुत्रोंके मारे जानेसे निराश्रय हो गये थे। उनका ऐश्वर्य नष्ट हो गया था। ऐसी अवस्थामें वे और यशस्विनी गान्धारी देवी किस प्रकार जीवन व्यतीत करते थे ॥ २ ॥
कियन्तं चैव कालं ते मम पूर्वपितामहाः ।

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स्थिता राज्ये महात्मानस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ३ ॥ मेरे पूर्वपितामह महात्मा पाण्डव कितने समयतक अपने राज्यपर प्रतिष्ठित रहे? ये सब बातें मुझे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच

प्राप्य राज्यं महात्मानः पाण्डवा हतशत्रवः । धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य पृथिवीं पर्यपालयन् ॥ ४ ॥ **वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! जिनके शत्रु मारे गये थे, वे महात्मा पाण्डव राज्य पानेके अनन्तर राजा धृतराष्ट्रको ही आगे रखकर पृथ्वीका पालन करने लगे ॥ ४ ॥

धृतराष्ट्रमुपातिष्ठद् विदुरः संजयस्तथा । वैश्यापुत्रश्च मेधावी युयुत्सुः कुरुसत्तम ॥ ५ ॥ कुरुश्रेष्ठ! विदुर, संजय तथा वैश्यापुत्र मेधावी युयुत्सु—ये लोग सदा धृतराष्ट्रकी सेवामें उपस्थित रहते थे ॥ ५ ॥

पाण्डवाः सर्वकार्याणि सम्पृच्छन्ति स्म तं नृपम् । चक्रुस्तेनाभ्यनुज्ञाता वर्षाणि दश पञ्च च ॥ ६ ॥ पाण्डवलोग सभी कार्योंमें राजा धृतराष्ट्रकी सलाह पूछा करते थे और उनकी आज्ञा लेकर प्रत्येक कार्य करते थे। इस तरह उन्होंने पंद्रह वर्षोंतक राज्यका शासन किया ॥ ६ ॥

सदा हि गत्वा ते वीराः पर्युपासन्त तं नृपम् । पादाभिवादनं कृत्वा धर्मराजमते स्थिताः ॥ ७ ॥ वीर पाण्डव प्रतिदिन राजा धृतराष्ट्रके पास जा उनके चरणोंमें प्रणाम करके कुछ कालतक उनकी सेवामें बैठे रहते थे और सदा धर्मराज युधिष्ठिरकी आज्ञाके अधीन रहते थे ॥ ७ ॥

ते मूर्ध्नि समुपाघ्राताः सर्वकार्याणि चक्रिरे । कुन्तिभोजसुता चैव गान्धारीमन्ववर्तत ॥ ८ ॥ धृतराष्ट्र भी स्नेहवश पाण्डवोंका मस्तक सूँघकर जब उन्हें जानेकी आज्ञा देते, तब वे आकर सब कार्य किया करते थे। कुन्तीदेवी भी सदा गान्धारीकी सेवामें लगी रहती थीं ॥ ८ ॥

द्रौपदी च सुभद्रा च याश्चान्याः पाण्डवस्त्रियः । समां वृत्तिमवर्तन्त तयोः श्वश्र्वोर्यथाविधि ॥ ९ ॥ द्रौपदी, सुभद्रा तथा पाण्डवोंकी अन्य स्त्रियाँ भी कुन्ती और गान्धारी दोनों सासुओंकी समान भावसे विधिवत् सेवा किया करती थीं ॥ ९ ॥

शयनानि महार्हाणि वासांस्याभरणानि च । राजार्हाणि च सर्वाणि भक्ष्यभोज्यान्यनेकशः ॥ १० ॥

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युधिष्ठिरो महाराज धृतराष्ट्रैऽभ्युपाहरत् ।
तथैव कुन्ती गान्धार्यां गुरुवृत्तिमवर्तत ॥ ११ ॥
महाराज! राजा युधिष्ठिर बहुमूल्य शय्या, वस्त्र, आभूषण तथा राजाके उपभोगमें आने योग्य सब प्रकारके उत्तम पदार्थ एवं अनेकानेक भक्ष्य, भोज्य पदार्थ धृतराष्ट्रको अर्पण किया करते थे। इसी प्रकार कुन्तीदेवी भी अपनी सासकी भाँति गान्धारीकी परिचर्या किया करती थीं ॥ १०-११ ॥
विदुरः संजयश्चैव युयुत्सुश्चैव कौरव ।
उपासते स्म तं वृद्धं हतपुत्रं जनाधिपम् ॥ १२ ॥
कुरुनन्दन! जिनके पुत्र मारे गये थे, उन बूढ़े राजा धृतराष्ट्रकी विदुर, संजय और युयुत्सु —ये तीनों सदा सेवा करते रहते थे ॥ १२ ॥
श्यालो द्रोणस्य यश्चासीद् दयितो ब्राह्मणो महान् ।
स च तस्मिन् महेष्वासः कृपः समभवत् तदा ॥ १३ ॥
द्रोणाचार्यके प्रिय साले महान् ब्राह्मण महा-धनुर्धर कृपाचार्य तो उन दिनों सदा धृतराष्ट्रके ही पास रहते थे ॥ १३ ॥
व्यासश्च भगवान् नित्यमासांचक्रे नृपेण ह ।
कथाः कुर्वन् पुराणर्षिर्देवर्षिपितृरक्षसाम् ॥ १४ ॥
पुरातन ऋषि भगवान् व्यास भी प्रतिदिन उनके पास आकर बैठते और उन्हें देवर्षि, पितर तथा राक्षसोंकी कथाएँ सुनाया करते थे ॥ १४ ॥
धर्मयुक्तानि कार्याणि व्यवहारान्वितानि च ।
धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातो विदुरस्तान्यकारयत् ॥ १५ ॥
धृतराष्ट्रकी आज्ञासे विदुरजी उनके समस्त धार्मिक और व्यावहारिक कार्य करते-कराते थे ॥ १५ ॥
सामन्तेभ्यः प्रियाण्यस्य कार्याणि सुबहून्यपि ।
प्राप्यन्तेऽर्थैः सुलघुभिः सुनयाद् विदुरस्य वै ॥ १६ ॥
विदुरजीकी अच्छी नीतिके कारण उनके बहुतेरे प्रिय कार्य थोड़े खर्चमें ही सामन्तों (सीमावर्ती राजाओं)-से सिद्ध हो जाया करते थे ॥ १६ ॥
अकरोद् बन्धमोक्षं च वध्यानां मोक्षणं तथा ।
न च धर्मसुतो राजा कदाचित् किंचिदब्रवीत् ॥ १७ ॥
वे कैदियोंको कैदसे छुटकारा दे देते और वधके योग्य मनुष्योंको भी प्राणदान देकर छोड़ देते थे; किंतु धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर इसके लिये उनसे कभी कुछ कहते नहीं थे ॥ १७ ॥
विहारयात्रासु पुनः कुरुराजो युधिष्ठिरः ।
सर्वान् कामान् महातेजाः प्रददावम्बिकासुते ॥ १८ ॥

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महातेजस्वी कुरुराज युधिष्ठिर विहार और यात्राके अवसरोंपर राजा धृतराष्ट्रको समस्त मनोवाञ्छित वस्तुओंकी सुविधा देते थे ॥ १८ ॥
आरालिकाः सूपकारा रागखाण्डविकास्तथा ।
उपातिष्ठन्त राजानं धृतराष्ट्रं यथा पुरा ॥ १९ ॥
राजा धृतराष्ट्रकी सेवामें पहलेकी ही भाँति उक्त अवसरोंपर भी रसोईके काममें निपुण आरालिक³, सूपकार³ और रागखाण्डविक³ मौजूद रहते थे ॥ १९ ॥
वासांसि च महार्हाणि माल्यानि विविधानि च ।
उपाजह्रुर्यथान्यायं धृतराष्ट्रस्य पाण्डवाः ॥ २० ॥
पाण्डवलोग धृतराष्ट्रको यथोचित रूपसे बहुमूल्य वस्त्र और नाना प्रकारकी मालाएँ भेंट करते थे ॥ २० ॥
मैरेयकाणि मांसानि पानकानि लघूनि च ।
चित्रान् भक्ष्यविकारांश्च चक्रुस्तस्य यथा पुरा ॥ २१ ॥
वे उनकी सेवामें पहलेकी ही भाँति सुखभोगप्रद फलके गूदे, हलके पानक (मीठे शर्बत) और अन्यान्य विचित्र प्रकारके भोजन प्रस्तुत करते थे ॥ २१ ॥
ये चापि पृथिवीपालाः समाजग्मुस्ततस्ततः ।
उपातिष्ठन्त ते सर्वे कौरवेन्द्रं यथा पुरा ॥ २२ ॥
भिन्न-भिन्न देशोंसे जो-जो भूपाल वहाँ पधारते थे, वे सब पहलेकी ही भाँति कौरवराज धृतराष्ट्रकी सेवामें उपस्थित होते थे ॥ २२ ॥
कुन्ती च द्रौपदी चैव सात्वती च यशस्विनी ।
उलूपी नागकन्या च देवी चित्राङ्गदा तथा ॥ २३ ॥
धृष्टकेतोश्च भगिनी जरासंधसुता तथा ।
एताश्चान्याश्च बह्व्यो वै योषितः पुरुषर्षभ ॥ २४ ॥
किंकराः पर्युपातिष्ठन् सर्वाः सुबलजां तथा ।
पुरुषप्रवर! कुन्ती, द्रौपदी, यशस्विनी सुभद्रा, नागकन्या उलूपी, देवी चित्रांगदा, धृष्टकेतुकी बहिन तथा जरासंधकी पुत्री—ये तथा कुरुकुलकी दूसरी बहुत-सी स्त्रियाँ दासीकी भाँति सुबलपुत्री गान्धारीकी सेवामें लगी रहती थीं ॥ २३-२४ १/२ ॥
यथा पुत्रवियुक्तोऽयं न किंचिद् दुःखमाप्नुयात् ॥ २५ ॥
इति तानन्वशाद् भ्रातृन् नित्यमेव युधिष्ठिरः ।
राजा युधिष्ठिर सदा भाइयोंको यह उपदेश देते थे कि ‘बन्धुओ! तुम ऐसा बर्ताव करो, जिससे अपने पुत्रोंसे बिछुड़े हुए इन राजा धृतराष्ट्रको किंचिन्मात्र भी दुःख न प्राप्त हो’ ॥ २५ १/२ ॥
एवं ते धर्मराजस्य श्रुत्वा वचनमर्थवत् ॥ २६ ॥

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सविशेषमवर्तन्त भीममेकं तदा विना ।
धर्मराजका यह सार्थक वचन सुनकर भीमसेनको छोड़ अन्य सभी भाई धृतराष्ट्रका विशेष आदर-सत्कार करते थे ॥
न हि तत् तस्य वीरस्य हृदयादपसर्पति ।
धृतराष्ट्रस्य दुर्बुद्ध्या यद् वृत्तं द्यूतकारितम् ।। २७ ।।
वीरवर भीमसेनके हृदयसे कभी भी यह बात दूर नहीं होती थी कि जूएके समय जो कुछ भी अनर्थ हुआ था, वह धृतराष्ट्रकी ही खोटी बुद्धिका परिणाम था ।।

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि प्रथमोऽध्यायः ।। १ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें पहला अध्याय पूरा हुआ ।। १ ।।


१. 'अरा' नामक शस्त्रसे काटकर बनाये जानेके कारण साग-भाजी आदिको 'अरालु' कहते हैं। उसको सुन्दर रीतिसे तैयार करनेवाले रसोइये 'आरालिक' कहलाते हैं। २. दाल आदि बनानेवाले सामान्यतः सभी रसोइयोंको 'सूपकार' कहते हैं। ३. पीपल, सोंठ और चीनी मिलाकर मूँगका रसा तैयार करनेवाले रसोइये 'रागखाण्डविक' कहलाते हैं।

अध्याय (पृष्ठ 2248)

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द्वितीयोऽध्यायः

पाण्डवोंका धृतराष्ट्र और गान्धारीके अनुकूल बर्ताव

वैशम्पायन उवाच

एवं सम्पूजितो राजा पाण्डवैरम्बिकासुतः । विजहार यथापूर्वमृषिभिः पर्युपासितः ॥ १ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार पाण्डवोंसे भलीभाँति सम्मानित हो अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र पूर्ववत् ऋषियोंके साथ गोष्ठी-सुखका अनुभव करते हुए वहाँ सानन्द निवास करने लगे ॥ १ ॥

ब्रह्मदेयाग्रहारांश्च प्रददौ स कुरूद्वहः । तच्च कुन्तीसुतो राजा सर्वमेवान्वपद्यत ॥ २ ॥ कुरुकुलके स्वामी महाराज धृतराष्ट्र ब्राह्मणोंको देनेयोग्य अग्रहार (माफी जमीन) देते थे और कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर सभी कार्योंमें उन्हें सहयोग देते थे ॥ २ ॥

आनृशंस्यपरो राजा प्रीयमाणो युधिष्ठिरः । उवाच स तदा भ्रातॄनमात्यांश्च महीपतिः ॥ ३ ॥ मया चैव भवद्भिश्च मान्य एष नराधिपः । निदेशे धृतराष्ट्रस्य यस्तिष्ठति स मे सुहृत् ॥ ४ ॥ विपरीतश्च मे शत्रुर्नियम्यश्च भवेन्नरः । राजा युधिष्ठिर बड़े दयालु थे। वे सदा प्रसन्न रहकर अपने भाइयों और मन्त्रियोंसे कहा करते थे कि ‘ये राजा धृतराष्ट्र मेरे और आपलोगोंके माननीय हैं। जो इनकी आज्ञाके अधीन रहता है, वही मेरा सुहृद् है। विपरीत आचरण करनेवाला मेरा शत्रु है। वह मेरे दण्डका भागी होगा ॥ ३-४ १/२ ॥

पितृवृत्तेषु चाहःसु पुत्राणां श्राद्धकर्मणि ॥ ५ ॥ सुहृदां चैव सर्वेषां यावदस्य चिकीर्षितम् । ‘पिता आदिकी क्षयाह तिथियोंपर तथा पुत्रों और समस्त सुहृदोंके श्राद्धकर्ममें राजा धृतराष्ट्र जितना धन खर्च करना चाहें, वह सब इन्हें मिलना चाहिये’ ॥ ५ १/२ ॥

ततः स राजा कौरव्यो धृतराष्ट्रो महामनाः ॥ ६ ॥ ब्राह्मणेभ्यो यथार्हेभ्यो ददौ वित्तान्यनेकशः । धर्मराजश्च भीमश्च सव्यसाची यमावपि ॥ ७ ॥ तत् सर्वमन्ववर्तन्त तस्य प्रियचिकीर्षया । तदनन्तर महामना कुरुकुलनन्दन राजा धृतराष्ट्र उक्त अवसरोंपर सुयोग्य ब्राह्मणोंको बारम्बार प्रचुर धनका दान करते थे। धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, सव्यसाची अर्जुन और

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नकुल-सहदेव भी उनका प्रिय करनेकी इच्छासे सब कार्योंमें उनका साथ देते थे ॥ कथं नु राजा वृद्धः स पुत्रपौत्रवधार्दितः ॥ ८ ॥ शोकमस्मत्कृतं प्राप्य न म्रियेतेति चिन्त्यते । उन्हें सदा इस बातकी चिन्ता बनी रहती थी कि पुत्र-पौत्रोंके वधसे पीड़ित हुए बूढ़े राजा धृतराष्ट्र हमारी ओरसे शोक पाकर कहीं अपने प्राण न त्याग दें ॥ ८ ½ ॥ यावद्धि कुरुवीरस्य जीवत्पुत्रस्य वै सुखम् ॥ ९ ॥ बभूव तदवाप्नोति भोगांश्चेति व्यवस्थिताः । अपने पुत्रोंकी जीवितावस्थामें कुरुवीर धृतराष्ट्रको जितने सुख और भोग प्राप्त थे, वे अब भी उन्हें मिलते रहें—इसके लिये पाण्डवोंने पूरी व्यवस्था की थी ॥ ९ ½ ॥ ततस्ते सहिताः पञ्च भ्रातरः पाण्डुनन्दनाः ॥ १० ॥ तथाशीलाः समातस्थुर्धृतराष्ट्रस्य शासने । इस प्रकारके शील और बर्तावसे युक्त होकर वे पाँचों भाई पाण्डव एक साथ धृतराष्ट्रकी आज्ञाके अधीन रहते थे ॥ १० ½ ॥ धृतराष्ट्रश्च तान् सर्वान् विनीतान् नियमे स्थितान् ॥ ११ ॥ शिष्यवृत्तिं समापन्नान् गुरुवत् प्रत्यपद्यत । धृतराष्ट्र भी उन सबको परम विनीत, अपनी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले और शिष्य-भावसे सेवामें संलग्न जानकर पिताकी भाँति उनसे स्नेह रखते थे ॥ गान्धारी चैव पुत्राणां विविधैः श्राद्धकर्मभिः ॥ १२ ॥ आनृण्यमगमत् कामान् विप्रेभ्यः प्रतिपाद्य सा । गान्धारी देवीने भी अपने पुत्रोंके निमित्त नाना प्रकारके श्राद्धकर्मका अनुष्ठान करके ब्राह्मणोंको उनकी इच्छाके अनुसार धन दान किया और ऐसा करके वे पुत्रोंके ऋणसे मुक्त हो गयीं ॥ १२ ½ ॥ एवं धर्मभृतां श्रेष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १३ ॥ भ्रातृभिः सहितो धीमान् पूजयामास तं नृपम् । इस प्रकार धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ रहकर सदा राजा धृतराष्ट्रका आदर-सत्कार करते रहते थे ॥ १३ ½ ॥ स राजा सुमहातेजा वृद्धः कुरुकुलोद्वहः ॥ १४ ॥ न ददर्श तदा किंचिदप्रियं पाण्डुनन्दने । कुरुकुलशिरोमणि महातेजस्वी बूढ़े राजा धृतराष्ट्रने पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरका कोई ऐसा बर्ताव नहीं देखा, जो उनके मनको अप्रिय लगनेवाला हो ॥ १४ ½ ॥ वर्तमानेषु सद्वृत्तिं पाण्डवेषु महात्मसु ॥ १५ ॥ प्रीतिमानभवद् राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।

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महात्मा पाण्डव सदा अच्छा बर्ताव करते थे; इसलिये अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र उनके ऊपर बहुत प्रसन्न रहते थे ॥ १५ १/२ ॥ सौबलेयी च गान्धारी पुत्रशोकमपास्य तम् ॥ १६ ॥ सदैव प्रीतिमत्यासीत् तनयेषु निजेष्विव । सुबलपुत्री गान्धारी भी अपने पुत्रोंका शोक छोड़कर पाण्डवोंपर सदा अपने सगे पुत्रोंके समान प्रेम करती थीं ॥ १६ १/२ ॥ प्रियाण्येव तु कौरव्यो नाप्रियाणि कुरूद्वहः ॥ १७ ॥ वैचित्रवीर्ये नृपतौ समाचरत वीर्यवान् । पराक्रमी कुरुकुलतिलक राजा युधिष्ठिर महाराज धृतराष्ट्रका सदा प्रिय ही करते थे, अप्रिय नहीं करते थे ॥ १७ १/२ ॥ यद् यद् ब्रूते च किंचित् स धृतराष्ट्रो जनाधिपः ॥ १८ ॥ गुरु वा लघु वा कार्यं गान्धारी च तपस्विनी । तं स राजा महाराज पाण्डवानां धुरंधरः ॥ १९ ॥ पूजयित्वा वचस्तत् तदकार्षीत् परवीरहा । महाराज! राजा धृतराष्ट्र और तपस्विनी गान्धारी देवी ये दोनों जो कोई भी छोटा या बड़ा कार्य करनेके लिये कहते, पाण्डवधुरन्धर शत्रुसूदन राजा युधिष्ठिर उनके उस आदेशको सादर शिरोधार्य करके वह सारा कार्य पूर्ण करते थे ॥ १८-१९ १/२ ॥ तेन तस्याभवत् प्रीतो वृत्तेन स नराधिपः ॥ २० ॥ अन्वतप्यत संस्मृत्य पुत्रं तं मन्दचेतसम् । उनके उस बर्तावसे राजा धृतराष्ट्र सदा प्रसन्न रहते और अपने उस मन्दबुद्धि दुर्योधनको याद करके पछताया करते थे ॥ २० १/२ ॥ सदा च प्रातरुत्थाय कृतजप्यः शुचिर्नृपः ॥ २१ ॥ आशास्ते पाण्डुपुत्राणां समरेष्वपराजयम् । प्रतिदिन सबेरे उठकर स्नान-संध्या एवं गायत्रीजप कर लेनेके पश्चात् पवित्र हुए राजा धृतराष्ट्र सदा पाण्डवोंको समरविजयी होनेका आशीर्वाद देते थे ॥ ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्याथ हुत्वा चैव हुताशनम् ॥ २२ ॥ आयूंषि पाण्डुपुत्राणामाशंसत नराधिपः । ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर अग्निमें हवन करनेके पश्चात् राजा धृतराष्ट्र सदा यह शुभकामना करते थे कि पाण्डवोंकी आयु बढ़े ॥ २२ १/२ ॥ न तां प्रीतिं परामाप पुत्रेभ्यः स कुरूद्वहः ॥ २३ ॥ यां प्रीतिं पाण्डुपुत्रेभ्यः सदावाप नराधिपः ।

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राजा धृतराष्ट्रको सदा पाण्डवोंके बर्तावसे जितनी प्रसन्नता होती थी, उतनी उत्कृष्ट प्रीति उन्हें अपने पुत्रोंसे भी कभी प्राप्त नहीं हुई थी ॥ २३ १/२ ॥
ब्राह्मणानां यथावृत्तः क्षत्रियाणां यथाविधिः ॥ २४ ॥
तथा विट्शूद्रसंघानामभवत् स प्रियस्तदा ।
युधिष्ठिर ब्राह्मणों और क्षत्रियोंके साथ जैसा सद्बर्ताव करते थे, वैसा ही वैश्यों और शूद्रोंके साथ भी करते थे। इसलिये वे उन दिनों सबके प्रिय हो गये थे ॥
यच्च किंचित् तदा पापं धृतराष्ट्रसुतैः कृतम् ॥ २५ ॥
अकृत्वा हृदि तत् पापं तं नृपं सोऽन्ववर्तत ।
धृतराष्ट्रके पुत्रोंने उनके साथ जो कुछ बुराई की थी, उसे अपने हृदयमें स्थान न देकर वे युधिष्ठिर राजा धृतराष्ट्रकी सेवामें संलग्न रहते थे ॥ २५ १/२ ॥
यश्च कश्चिन्नरः किंचिदप्रियं वाम्बिकासुते ॥ २६ ॥
कुरुते द्वेष्यतामेति स कौन्तेयस्य धीमतः ।
जो कोई मनुष्य राजा धृतराष्ट्रका थोड़ा-सा भी अप्रिय कर देता, वह बुद्धिमान् कुन्तीकुमार युधिष्ठिरके द्वेषका पात्र बन जाता था ॥ २६ १/२ ॥
न राज्ञो धृतराष्ट्रस्य न च दुर्योधनस्य वै ॥ २७ ॥
उवाच दुष्कृतं कश्चिद् युधिष्ठिरभयान्नरः ।
युधिष्ठिरके भयसे कोई भी मनुष्य कभी राजा धृतराष्ट्र और दुर्योधनके कुकृत्योंकी चर्चा नहीं करता था ॥
धृत्या तुष्टो नरेन्द्रः स गान्धारी विदुरस्तथा ॥ २८ ॥
शौचेन चाजातशत्रोर्न तु भीमस्य शत्रुहन् ।
शत्रुसूदन जनमेजय! राजा धृतराष्ट्र, गान्धारी और विदुरजी अजातशत्रु युधिष्ठिरके धैर्य और शुद्ध व्यवहारसे विशेष प्रसन्न थे, किंतु भीमसेनके बर्तावसे उन्हें संतोष नहीं था ॥ २८ १/२ ॥
अन्ववर्तत भीमोऽपि निश्चितो धर्मजं नृपम् ॥ २९ ॥
धृतराष्ट्रं च सम्प्रेक्ष्य सदा भवति दुर्मनाः ।
यद्यपि भीमसेन भी दृढ़ निश्चयके साथ युधिष्ठिरके ही पथका अनुसरण करते थे, तथापि धृतराष्ट्रको देखकर उनके मनमें सदा ही दुर्भावना जाग उठती थी ॥ २९ १/२ ॥
राजानमनुवर्तन्तं धर्मपुत्रममित्रहा ।
अन्ववर्तत कौरव्यो हृदयेन पराङ्मुखः ॥ ३० ॥
धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरको धृतराष्ट्रके अनुकूल बर्ताव करते देख शत्रुसूदन कुरुनन्दन भीमसेन स्वयं भी ऊपरसे उनका अनुसरण ही करते थे, तथापि उनका हृदय धृतराष्ट्रसे विमुख ही रहता था ॥ ३० ॥

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इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2253)

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तृतीयोऽध्यायः

राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दुःखी होना

वैशम्पायन उवाच

युधिष्ठिरस्य नृपतेर्दुर्योधनपितुस्तदा ।
नान्तरं ददृशु राज्ये पुरुषाः प्रणयं प्रति ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजा युधिष्ठिर और धृतराष्ट्रमें जो पारस्परिक प्रेम था, उसमें राज्यके लोगोंने कभी कोई अन्तर नहीं देखा ॥ १ ॥

यदा तु कौरवो राजा पुत्रं सस्मार दुर्मतिम् ।
तदा भीमं हृदा राजन्नपध्याति स पार्थिवः ॥ २ ॥
राजन्! परंतु वे कुरुवंशी राजा धृतराष्ट्र जब अपने दुर्बुद्धि पुत्र दुर्योधनका स्मरण करते थे, तब मन-ही-मन भीमसेनका अनिष्ट-चिन्तन किया करते थे ॥ २ ॥

तथैव भीमसेनोऽपि धृतराष्ट्रं जनाधिपम् ।
नामर्षयत राजेन्द्र सदैव दुष्टवद्धृदा ॥ ३ ॥
राजेन्द्र! उसी प्रकार भीमसेन भी सदा ही राजा धृतराष्ट्रके प्रति अपने मनमें दुर्भावना रखते थे। वे कभी उन्हें क्षमा नहीं कर पाते थे ॥ ३ ॥

अप्रकाशान्यप्रियाणि चकारास्य वृकोदरः ।
आज्ञां प्रत्यहरच्चापि कृतज्ञैः पुरुषैः सदा ॥ ४ ॥
भीमसेन गुप्त रीतिसे धृतराष्ट्रको अप्रिय लगनेवाले काम किया करते थे तथा अपने द्वारा नियुक्त किये हुए कृतज्ञ पुरुषोंसे उनकी आज्ञा भी भंग करा दिया करते थे ॥

स्मरन् दुर्मन्त्रितं तस्य वृत्तान्यप्यस्य कानिचित् ।
अथ भीमः सुहृन्मध्ये बाहुशब्दं तथाकरोत् ॥ ५ ॥
संश्रवे धृतराष्ट्रस्य गान्धार्याश्चाप्यमर्षणः ।
स्मृत्वा दुर्योधनं शत्रुं कर्णदुःशासनावपि ॥ ६ ॥
प्रोवाचेदं सुसंरब्धो भीमः स परुषं वचः ।