महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
[संक्षेपसे राजधर्मका वर्णन]
[संक्षेपसे राजधर्मका वर्णन]
श्रीमहेश्वर उवाच
सम्प्रहासश्च भृत्येषु न कर्तव्यो नराधिपैः ।
लघुत्वं चैव प्राप्नोति आज्ञा चास्य निवर्तते ॥
श्रीमहादेवजी कहते हैं— देवि! राजाओंको अपने सेवकोंके साथ हास-परिहास नहीं करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे उन्हें लघुता प्राप्त होती है और उनकी आज्ञाका पालन नहीं किया जाता है ॥
भृत्यानां सम्प्रहासेन पार्थिवः परिभूयते ।
अयाच्यानि च याचन्ति अवक्तव्यं ब्रुवन्ति च ॥
सेवकोंके साथ हँसी-परिहास करनेसे राजाका तिरस्कार होता है। वे धृष्ट सेवक न माँगने योग्य वस्तुओंको भी माँग बैठते हैं और न कहने योग्य बातें भी कह डालते हैं ॥
पूर्वमप्युचितैर्लाभैः परितोषं न यान्ति ते ।
तस्माद् भृत्येषु नृपतिः सम्प्रहासं विवर्जयेत् ॥
पहलेसे ही उचित लाभ मिलनेपर भी वे संतुष्ट नहीं होते; इसलिये राजा सेवकोंके साथ हँसी-मजाक करना छोड़ दे ॥
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते न च विश्वसेत् ।
सगोत्रेषु विशेषेण सर्वोपायैर्न विश्वसेत् ॥
राजा अविश्वस्त पुरुषपर कभी विश्वास न करे। जो विश्वस्त हो, उसपर भी पूरा विश्वास न करे; विशेषतः अपने समान गोत्रवाले भाई-बन्धुओंपर किसी भी उपायसे कदापि विश्वास न करे ॥
विश्वासाद् भयमुत्पन्नं हन्याद् वृक्षमिवाशनिः ।
प्रमादाद्धन्यते राजा लोभेन च वशीकृतः ॥
तस्मात् प्रमादं लोभं च न च कुर्यान्न विश्वसेत् ॥
जैसे वज्र वृक्षको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार विश्वाससे उत्पन्न हुआ भय राजाको नष्ट कर डालता है। प्रमादवश लोभके वशीभूत हुआ राजा मारा जाता है। अतः प्रमाद और लोभको अपने भीतर न आने दे तथा किसीपर भी विश्वास न करे ॥
भयार्तानां भयात् त्राता दीनानुग्रहकारणात् ।
कार्याकार्यविशेषज्ञो नित्यं राष्ट्रहिते रतः ॥
राजा भयातुर मनुष्योंकी भयसे रक्षा करे, दीन-दुःखियोंपर अनुग्रह करे, कर्तव्य और अकर्तव्यको विशेषरूपसे समझे और सदा राष्ट्रके हितमें संलग्न रहे ॥
सत्यः संधस्थितो राज्ये प्रजापालनतत्परः ।
अलुब्धो न्यायवादी च षड्भागमुपजीवति ॥
अपनी प्रतिज्ञाको सत्य कर दिखावे। राज्यमें स्थित रहकर प्रजाके पालनमें तत्पर रहे। लोभशून्य होकर न्याययुक्त बात कहे और प्रजाकी आयका छठा भागमात्र लेकर जीवन-निर्वाह करे ।।
कार्याकार्यविशेषज्ञः सर्वं धर्मेण पश्यति ।
स्वराष्ट्रेषु दयां कुर्यादकार्ये न प्रवर्तते ।।
कर्तव्य-अकर्तव्यको समझे। सबको धर्मकी दृष्टिसे देखे! अपने राष्ट्रके निवासियोंपर दया करे और कभी न करने योग्य कर्ममें प्रवृत्त न हो ।।
ये चैवैनं प्रशंसन्ति ये च निन्दन्ति मानवाः ।
शत्रुं च मित्रवत् पश्येदपराधविवर्जितम् ।।
जो मनुष्य राजाकी प्रशंसा करते हैं और जो उसकी निन्दा करते हैं, इनमेंसे शत्रु भी यदि निरपराध हो तो उसे मित्रके समान देखे ।।
अपराधानुरूपेण दुष्टं दण्डेन शासयेत् ।
धर्मः प्रवर्तते तत्र यत्र दण्डरुचिर्नृपः ।।
दुष्टको अपराधके अनुसार दण्ड देकर उसका शासन करे। जहाँ राजा न्यायोचित दण्डमें रुचि रखता है, वहाँ धर्मका पालन होता है ।।
नाधर्मो विद्यते तत्र यत्र राजाक्षमान्वितः ।।
अशिष्टशासनं धर्मः शिष्टानां परिपालनम् ।
जहाँ राजा क्षमाशील न हो, वहाँ अधर्म नहीं होता। अशिष्ट पुरुषोंको दण्ड देना और शिष्ट पुरुषोंका पालन करना राजाका धर्म है ।।
वध्यांश्च घातयेद् यस्तु अवध्यान् परिरक्षति ।।
अवध्या ब्राह्मणा गावो दूताश्चैव पिता तथा ।
विद्यां ग्राहयते यश्च ये च पूर्वोपकारिणः ।।
स्त्रियश्चैव न हन्तव्या यश्च सर्वातिथिर्नरः ।।
राजा वधके योग्य पुरुषोंका वध करे और जो वधके योग्य न हों, उनकी रक्षा करे। ब्राह्मण, गौ, दूत, पिता, जो विद्या पढ़ाता है वह अध्यापक तथा जिन्होंने पहले कभी उपकार किये हैं वे मनुष्य—ये सब-के-सब अवध्य माने गये हैं। स्त्रियोंका तथा जो सबका अतिथि-सत्कार करनेवाला हो, उस मनुष्यका भी वध नहीं करना चाहिये ।।
धरणीं गां हिरण्यं च सिद्धान्नं च तिलान् घृतम् ।
ददन्नित्यं द्विजातिभ्यो मुच्यते राजकिल्बिषात् ।।
पृथ्वी, गौ, सुवर्ण, सिद्धान्न, तिल और घी—इन वस्तुओंका ब्राह्मणके लिये प्रतिदिन दान करनेवाला राजा पापसे मुक्त हो जाता है ।।
एवं चरति यो नित्यं राजा राष्ट्रहिते रतः ।
तस्य राष्ट्रं धनं धर्मो यशः कीर्तिश्च वर्धते ।।
जो राजा इस प्रकार राष्ट्रके हितमें तत्पर हो प्रतिदिन ऐसा बर्ताव करता है, उसके राष्ट्र, धन, धर्म, यश और कीर्तिका विस्तार होता है ॥ न च पापैर्न चानर्थैर्युज्यते स नराधिपः ॥ षड्भागमुपयुञ्जन् यः प्रजा राजा न रक्षति ॥ स्वचक्रपरचक्राभ्यां धर्मैर्वा विक्रमेण वा । निरुद्योगो नृपो यश्च परराष्ट्रविघातने ॥ स्वराष्ट्रं निष्प्रतापस्य परचक्रेण हन्यते ॥ ऐसा राजा पाप और अनर्थका भागी नहीं होता। जो नरेश प्रजाकी आयके छठे भागका उपयोग तो करता है; परंतु धर्म या पराक्रमद्वारा स्वचक्र (अपनी मण्डलीके लोगों) तथा परचक्र (शत्रुमण्डलीके लोगों)-से प्रजाकी रक्षा नहीं करता एवं जो राजा दूसरेके राष्ट्रपर आक्रमण करनेके विषयमें सदा उद्योगहीन बना रहता है, उस प्रतापहीन राजाका राज्य शत्रुओंद्वारा नष्ट कर दिया जाता है ॥ यत् पापं परचक्रस्य परराष्ट्राभिघातने । तत् पापं सकलं राजा हतराष्ट्रः प्रपद्यते ॥ दूसरे चक्रके राजाके लिये दूसरेके राष्ट्रका विनाश करनेपर जो पाप लागू होता है, वह समूचा पाप उस राजाको भी प्राप्त होता है, जिसका राज्य उसीकी दुर्बलताके कारण शत्रुओंद्वारा नष्ट कर दिया जाता है ॥ मातुलं भागिनेयं वा मातरं श्वशुरं गुरुम् । पितरं वर्जयित्वैकं हन्याद् घातकमागतम् ॥ मामा, भानजा, माता, श्वशुर, गुरु तथा पिता—इनमेंसे प्रत्येकको छोड़कर यदि दूसरा कोई मनुष्य मारनेकी नीयतसे आ जाय तो उसे (आततायी समझकर) मार डालना चाहिये ॥ स्वस्य राष्ट्रस्य रक्षार्थं युध्यमानस्तु यो हतः । संग्रामे परचक्रेण श्रूयतां तस्य या गतिः ॥ जो राजा अपने राष्ट्रकी रक्षाके लिये युद्धमें जूझता हुआ शत्रुमण्डलके द्वारा मारा जाता है, उसे जो गति मिलती है, उसको श्रवण करो ॥ विमाने तु वरारोहे अप्सरोगणसेविते । शक्रलोकमितो याति संग्रामे निहतो नृपः ॥ वरारोहे! संग्राममें मारा गया नरेश अप्सराओंसे सेवित विमानपर आरूढ़ हो इस लोकसे इन्द्रलोकमें जाता है ॥ यावन्तो रोमकूपाः स्युस्तस्य गात्रेषु सुन्दरि । तावद्वर्षसहस्राणि शक्रलोके महीयते ॥
सुन्दरि! उसके अंगोंमें जितने रोमकूप होते हैं, उतने ही हजार वर्षोंतक वह इन्द्रलोकमें सम्मानित होता है ।।
यदि वै मानुषे लोके कदाचिदुपपद्यते ।
राजा वा राजमात्रो वा भूयो भवति वीर्यवान् ।।
यदि कदाचित् वह फिर मनुष्यलोकमें आता है तो पुनः राजा या राजाके तुल्य ही शक्तिशाली पुरुष होता है ।।
तस्माद् यत्नेन कर्तव्यं स्वराष्ट्रपरिपालनम् ।
व्यवहाराश्च चारश्च सततं सत्यसंधता ।।
अप्रमादः प्रमोदश्च व्यवसायेऽप्यचण्डता ।
भरणं चैव भृत्यानां वाहनानां च पोषणम् ।।
योधानां चैव सत्कारः कृते कर्मण्यमोघता ।
श्रेय एव नरेन्द्राणामिह चैव परत्र च ।।
इसलिये राजाको यत्नपूर्वक अपने राष्ट्रकी रक्षा करनी चाहिये। राजोचित व्यवहारोंका पालन, गुप्तचरोंकी नियुक्ति, सदा सत्यप्रतिज्ञ होना, प्रमाद न करना, प्रसन्न रहना, व्यवसायमें अत्यन्त कुपित न होना, भृत्यवर्गका भरण और वाहनोंका पोषण करना, योद्धाओंका सत्कार करना और किये हुए कार्यमें सफलता लाना—यह सब राजाओंका कर्तव्य है। ऐसा करनेसे उन्हें इहलोक और परलोकमें भी श्रेयकी प्राप्ति होती है ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
यानि धर्मरहस्यानि श्रोतुमिच्छामि तान्यहम् ॥
[अहिंसाकी और इन्द्रिय-संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता]
उमोवाच
देवदेव महादेव सर्वदेवनमस्कृत ।
यानि धर्मरहस्यानि श्रोतुमिच्छामि तान्यहम् ॥
उमाने कहा— सर्वदेववन्दित देवाधिदेव महादेव! अब मैं धर्मके रहस्योंको सुनना चाहती हूँ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
अहिंसा परमो धर्मो ह्यहिंसा परमं सुखम् ।
अहिंसा धर्मशास्त्रेषु सर्वेषु परमं पदम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— अहिंसा परम धर्म है। अहिंसा परम सुख है। सम्पूर्ण धर्मशास्त्रोंमें अहिंसाको परमपद बताया गया है ॥
देवतातिथिशुश्रूषा सततं धर्मशीलता ।
वेदाध्ययनयज्ञांश्च तपो दानं दमस्तथा ॥
आचार्यगुरुशुश्रूषा तीर्थाभिगमनं तथा ।
अहिंसाया वरारोहे कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥
एतत् ते परमं गुह्यमाख्यातं परमार्चितम् ॥
वरारोहे! देवताओं और अतिथियोंकी सेवा, निरन्तर धर्मशीलता, वेदाध्ययन, यज्ञ, तप, दान, दम, गुरु और आचार्यकी सेवा तथा तीर्थोंकी यात्रा—ये सब अहिंसा-धर्मकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं। यह मैंने तुम्हें धर्मका परम गुह्य रहस्य बताया है, जिसकी शास्त्रोंमें भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी है ॥
निरुणद्धीन्द्रियाण्येव स सुखी स विचक्षणः ॥
इन्द्रियाणां निरोधेन दानेन च दमेन च ।
नरः सर्वमवाप्नोति मनसा यद् यदिच्छति ॥
जो अपनी इन्द्रियोंका निरोध करता है, वही सुखी है और वही विद्वान् है। इन्द्रियोंके निरोधसे, दानसे और इन्द्रिय-संयमसे मनुष्य मनमें जिस-जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब पा लेता है ॥
यतो यतो महाभागे हिंसा स्यान्महती ततः ।
निवृत्तो मधुमांसाभ्यां हिंसा त्वल्पतरा भवेत् ॥
महाभागे! जिस-जिस ओरसे भारी हिंसाकी सम्भावना हो, उससे तथा मद्य और मांससे मनुष्यको निवृत्त हो जाना चाहिये। इससे हिंसाकी सम्भावना बहुत कम हो जाती है ॥
निवृत्तिः परमो धर्मो निवृत्तिः परमं सुखम् ।
मनसा विनिवृत्तानां धर्मस्य निचयो महान् ॥ निवृत्ति परम धर्म है, निवृत्ति परम सुख है, जो मनसे विषयोंकी ओरसे निवृत्त हो गये हैं, उन्हें विशाल धर्मराशिकी प्राप्ति होती है ।। मनःपूर्वागमा धर्मा अधर्माश्च न संशयः । मनसा बध्यते चापि मुच्यते चापि मानवः ॥ निगृहीते भवेत् स्वर्गो विसृष्टे नरको ध्रुवः । इसमें संदेह नहीं कि धर्म और अधर्म पहले मनमें ही आते हैं। मनसे ही मनुष्य बँधता है और मनसे ही मुक्त होता है। यदि मनको वशमें कर लिया जाय, तब तो स्वर्ग मिलता है और यदि उसे खुला छोड़ दिया जाय तो नरककी प्राप्ति अवश्यम्भावी है ।। जीवाः पुराकृतेनैव तिर्यग्योनिसरीसृपाः । नानायोनिषु जायन्ते स्वकर्मपरिवेष्टिताः ॥ जीव अपने पूर्वकृत कर्मके ही फलसे पशु-पक्षी एवं कीट आदि होते हैं। अपने-अपने कर्मोंसे बँधे हुए प्राणी ही भिन्न-भिन्न योनियोंमें जन्म लेते हैं ।। जायमानस्य जीवस्य मृत्युः पूर्वं प्रजायते । सुखं वा यदि वा दुःखं यथापूर्वं कृतं तु वा ॥ जो जीव जन्म लेता है, उसकी मृत्यु पहले ही पैदा हो जाती है। मनुष्यने पूर्व जन्ममें जैसा कर्म किया है, तदनुसार ही उसे सुख या दुःख प्राप्त होता है ।। अप्रमत्तः प्रमत्तेषु विधिर्जागर्ति जन्तुषु । न हि तस्य प्रियः कश्चिन्न द्वेष्यो न च मध्यमः ॥ प्राणी प्रमादमें पड़कर भले ही सो जायँ, परंतु उनका प्रारब्ध या दैव प्रमादशून्य—सावधान होकर सदा जागता रहता है। उसका न कोई प्रिय है, न द्वेषपात्र है और न कोई मध्यस्थ ही है ।। समः सर्वेषु भूतेषु कालः कालं निरीक्षते । गतायुषो ह्याक्षिपते जीवः सर्वस्य देहिनः ॥ काल समस्त प्राणियोंके प्रति समान है। वह अवसरकी प्रतीक्षा करता रहता है। जिनकी आयु समाप्त हो गयी है, उन्हीं प्राणियोंका वह संहार करता है। वही समस्त देहधारियोंका जीवन है ।। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[त्रिवर्गका निरूपण तथा कल्याणकारी आचार-व्यवहारका वर्णन]
[त्रिवर्गका निरूपण तथा कल्याणकारी आचार-व्यवहारका वर्णन]
श्रीमहेश्वर उवाच
विद्या वार्ता च सेवा च कारुत्वं नाट्यता तथा ।
इत्येते जीवनार्थाय मर्त्यानां विहिताः प्रिये ॥
**श्रीमहेश्वरने कहा—**प्रिये! विद्या, वार्ता, सेवा, शिल्पकला और अभिनय-कला—ये मनुष्योंके जीवन-निर्वाहके लिये पाँच वृत्तियाँ बनायी गयी हैं॥
विद्यायोगस्तु सर्वेषां पूर्वमेव विधीयते ।
कार्याकार्यं विजानन्ति विद्यया देवि नान्यथा ॥
देवि! सभी मनुष्योंके लिये विद्याका योग पहले ही निश्चित कर दिया जाता है। विद्यासे लोग कर्तव्य और अकर्तव्यको जानते हैं, अन्यथा नहीं॥
विद्यया स्फीयते ज्ञानं ज्ञानात् तत्त्वविदर्शनम् ।
दृष्टतत्त्वो विनीतात्मा सर्वार्थस्य च भाजनम् ॥
विद्यासे ज्ञान बढ़ता है, ज्ञानसे तत्त्वका दर्शन होता है और तत्त्वका दर्शन कर लेनेके पश्चात् मनुष्य विनीतचित्त होकर समस्त पुरुषार्थोंका भाजन हो जाता है॥
शक्यं विद्याविनीतेन लोके संजीवनं शुभम् ॥
आत्मानं विद्यया तस्मात् पूर्वं कृत्वा तु भाजनम् ।
वश्येन्द्रियो जितक्रोधो भूतात्मानं तु भावयेत् ॥
विद्यासे विनीत हुआ पुरुष संसारमें शुभ जीवन बिता सकता है; अतः अपने आपको पहले विद्याद्वारा पुरुषार्थका भाजन बनाकर क्रोधविजयी एवं जितेन्द्रिय पुरुष सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा-परमात्माका चिन्तन करे॥
भावयित्वा तदाऽऽत्मानं पूजनीयः सतामपि ॥
कुलानुवृत्तं वृत्तं वा पूर्वमात्मा समाश्रयेत् ।
परमात्माका चिन्तन करके मनुष्य सत्पुरुषोंके लिये भी पूजनीय बन जाता है। जीवात्मा पहले कुल-परम्परासे चले आते हुए सदाचारका ही आश्रय ले॥
यदि चेद् विद्यया चैव वृत्तिं काङ्क्षेतधात्मनः ॥
राजविद्यां तु वा देवि लोकविद्यामथापि वा ।
तीर्थतश्चापि गृह्णीयाच्छुश्रूषादिगुणैर्युतः ॥
ग्रन्थतश्चार्थतश्चैव दृढं कुर्यात् प्रयत्नतः ॥
देवि! यदि विद्यासे अपनी जीविका चलानेकी इच्छा हो तो शुश्रूषा आदि गुणोंसे सम्पन्न हो किसी गुरुसे राजविद्या अथवा लोकविद्याकी शिक्षा ग्रहण करे और उसे ग्रन्थ एवं अर्थके अभ्यासद्वारा प्रयत्नपूर्वक दृढ़ करे॥
एवं विद्याफलं देवि प्राप्नुयान्नान्यथा नरः ।
न्यायाद् विद्याफलानीच्छेदधर्मं तत्र वर्जयेत् ।। देवि! ऐसा करनेसे मनुष्य विद्याका फल पा सकता है, अन्यथा नहीं। न्यायसे ही विद्याजनित फलोंको पानेकी इच्छा करे। वहाँ अधर्मको सर्वथा त्याग दे ।।
यदिच्छेद् वार्तया वृत्तिं काङ्क्षेत विधिपूर्वकम् । क्षेत्रे जलोपपन्ने च तद्योग्यं कृषिमाचरेत् ।। यदि वार्त्तावृत्तिके द्वारा जीविका चलानेकी इच्छा हो तो जहाँ सींचनेके लिये जलकी व्यवस्था हो, ऐसे खेतमें तदनुरूप कार्य विधिपूर्वक करे ।।
वाणिज्यं वा यथाकालं कुर्यात् तद्देशयोगतः । मूल्यमर्थं प्रयासं च विचार्यैव व्ययोदयौ । अथवा यथासमय उस देशकी आवश्यकताके अनुसार वस्तु, उसके मूल्य, व्यय, लाभ और परिश्रम आदिका भलीभाँति विचार करके व्यापार करे ।।
पशुसंजीवनं चैव देशगः पोषयेद् ध्रुवम् ।। बहुप्रकारा बहवः पशवस्तस्य साधकाः ।। देशवासी पुरुषको पशुओंका पालन-पोषण भी अवश्य करना चाहिये। अनेक प्रकारके बहुसंख्यक पशु भी उसके लिये अर्थप्राप्तिके साधक हो सकते हैं ।।
यः कश्चित् सेवया वृत्तिं कांक्षेत मतिमान् नरः । यतात्मा श्रवणीयानां भवेद् वै सम्प्रयोजकः ।। जो कोई बुद्धिमान् मनुष्य सेवाद्वारा जीवननिर्वाह करना चाहे तो वह मनको संयममें रखकर श्रवण करनेयोग्य मीठे वचनोंका प्रयोग करे ।।
यथा यथा स तुष्येत तथा संतोषयेत् तु तम् । अनुजीविगुणोपेतः कुर्यादात्मानमाश्रितम् ।। जैसे-जैसे सेव्य स्वामी संतुष्ट रहे, वैसे ही वैसे उसे संतोष दिलावे। सेवकके गुणोंसे सम्पन्न हो अपने आपको स्वामीके आश्रित रखे ।।
विप्रियं नाचरेत् तस्य एषा सेवा समासतः ।। विप्रयोगात् पुरा तेन गतिमन्यां न लक्षयेत् ।। स्वामीका कभी अप्रिय न करे, यही संक्षेपसे सेवाका स्वरूप है। उसके साथ वियोग होनेसे पहले अपने लिये दूसरी कोई गति न देखे ।।
कारुकर्म च नाट्यं च प्रायशो नीचयोनिषु । तयोरपि यथायोगं न्यायातः कर्मवेतनम् ।। शिल्पकर्म अथवा कारीगरी और नाट्यकर्म प्रायः निम्न जातिके लोगोंमें चलते हैं। शिल्प और नाट्यमें भी यथायोग्य न्यायानुसार कार्यका वेतन लेना चाहिये ।।
आर्जवेभ्योऽपि सर्वेभ्यः स्वार्जवाद् वेतनं हरेत् । अनार्जवादाहरतस्तत् तु पापाय कल्पते ।।
सरल व्यवहारवाले सभी मनुष्योंसे सरलतासे ही वेतन लेना चाहिये। कुटिलतासे वेतन लेनेवालेके लिये वह पापका कारण बनता है॥ सर्वेषां पूर्वमारम्भांश्चिन्तयेन्न्यायपूर्वकम्। आत्मशक्तिमुपायांश्च देशकालौ च युक्तितः॥ कारणानि प्रवासं च प्रक्षेपं च फलोदयम्। एवमादीनि संचिन्त्य दृष्ट्वा दैवानुकूलताम्। अतः परं समारम्भेद् यत्रात्महितमाहितम्॥ जीविका-साधनके जितने उपाय हैं, उन सबके आरम्भोंपर पहले न्यायपूर्वक विचार करे। अपनी शक्ति, उपाय, देश, काल, कारण, प्रवास, प्रक्षेप और फलोदय आदिके विषयमें युक्तिपूर्वक विचार एवं चिन्तन करके दैवकी अनुकूलता देखकर जिसमें अपना हित निहित दिखायी दे, उसी उपायका आलम्बन करे॥ वृत्तिमेवं समासाद्य तां सदा परिपालयेत्। दैवमानुषविघ्नेभ्यो न पुनर्भ्रश्यते यथा॥ इस प्रकार अपने लिये जीविकावृत्ति चुनकर उसका सदा ही पालन करे और ऐसा प्रयत्न करे, जिससे वह दैव और मानुष विघ्नोंसे पुनः उसे छोड़ न बैठे॥ पालयन् वर्धयन् भुञ्जांस्तां प्राप्य न विनाशयेत्। क्षीयते गिरिसंकाशमश्रतो ह्यनपेक्षया॥ रक्षा, वृद्धि और उपभोग करते हुए उस वृत्तिको पाकर नष्ट न करे। यदि रक्षा आदिकी चिन्ता छोड़कर केवल उपभोग ही किया जाय तो पर्वत-जैसी धनराशि भी नष्ट हो जाती है॥ आजीवेभ्यो धनं प्राप्य चतुर्था विभजेद् बुधः। धर्मायार्थाय कामाय आपत्प्रशमनाय च॥ आजीविकाके उपायोंसे धनका उपार्जन करके विद्वान् पुरुष धर्म, अर्थ, काम तथा संकट-निवारण—इन चारोंके उद्देश्यसे उस धनके चार भाग करे॥ चतुर्ष्वपि विभागेषु विधानं शृणु भामिनि॥ यज्ञार्थं चान्नदानार्थं दीनानुग्रहकारणात्॥ देवब्राह्मणपूजार्थं पितृपूजार्थमेव च॥ मूलार्थं संनिवासार्थं क्रियानित्यैश्च धार्मिकैः। एवमादिषु चान्येषु धर्मार्थं संत्यजेद् धनम्॥ भामिनि! इन चारों विभागोंमें भी जैसा विधान है, उसे सुनो। यज्ञ करने, दीन-दुःखियोंपर अनुग्रह करके अन्न देने, देवताओं, ब्राह्मणों तथा पितरोंकी पूजा करने, मूलधनकी रक्षा करने, सत्पुरुषोंके रहने तथा क्रियापरायण धर्मात्मा पुरुषोंके सहयोगके लिये तथा इसी प्रकार अन्यान्य सत्कर्मोंके उद्देश्यसे धर्मार्थ धनका दान करे॥
धर्मकार्ये धनं दद्यादनवेक्ष्य फलोदयम् । ऐश्वर्यस्थानलाभार्थं राजवाल्लभ्यकारणात् ।। वार्तायां च समारम्भेऽमात्यमित्रपरिग्रहे । आवाहे च विवाहे च पूर्णानां वृत्तिकारणात् ।। अर्थोदयसमावाप्तावनर्थस्य विघातने । एवमादिषु चान्येषु अर्थार्थं विसृजेद् धनम् ।। फलकी प्राप्तिका विचार न करके धर्मके कार्यमें धन देना चाहिये। ऐश्वर्यपूर्ण स्थानकी प्राप्तिके लिये, राजाका प्रिय होनेके लिये, कृषि, गोरक्षा अथवा वाणिज्यके आरम्भके लिये, मन्त्रियों और मित्रोंके संग्रहके लिये, आमन्त्रण और विवाहके लिये, पूर्ण पुरुषोंकी वृत्तिके लिये, धनकी उत्पत्ति एवं प्राप्तिके लिये तथा अनर्थके निवारण और ऐसे ही अन्य कार्योंके लिये अर्थार्थ धनका त्याग करना चाहिये ।।
अनुबन्धं हेतुयुक्तं दृष्ट्वा वित्तं परित्यजेत् । अनर्थं बाधते ह्यर्थो अर्थं चैव फलान्युत ।। हेतुयुक्त अनुबन्ध (सकारण सम्बन्ध) देखकर उसके लिये धनका त्याग करना चाहिये। अर्थ अनर्थका निवारण करता है तथा धन एवं अभीष्ट फलकी प्राप्ति कराता है ।।
नाधनाः प्राप्नुवन्त्यर्थं नरा यत्नशतैरपि । तस्माद् धनं रक्षितव्यं दातव्यं च विधानतः ।। निर्धन मनुष्य सैकड़ों यत्न करके भी धन नहीं पा सकते। अतः धनकी रक्षा करनी चाहिये तथा विधिपूर्वक उसका दान करना चाहिये ।।
शरीरपोषणार्थाय आहारस्य विशेषणे । एवमादिषु चान्येषु कामार्थं विसृजेद् धनम् ।। शरीरके पोषणके लिये विशेष प्रकारके आहारकी व्यवस्था तथा ऐसे ही अन्य कार्योंके निमित्त कामार्थ धनका व्यय करना उचित है ।।
विचार्य गुणदोषौ तु त्रयाणां तत्र संत्यजेत् । चतुर्थं संनिदध्याच्च आपदर्थं शुचिस्मिते ।। गुण-दोषका विचार करके धर्म, अर्थ और काम-सम्बन्धी धनोंका तत्तत् कार्योंमें व्यय करना चाहिये। शुचिस्मिते! धनका जो चौथा भाग है, उसे आपत्तिकालके लिये सदा सुरक्षित रखे ।।
राज्यभ्रंशविनाशार्थं दुर्भिक्षार्थं च शोभने । महाव्याधिविमोक्षार्थं वार्धक्यस्यैव कारणात् ।। शत्रूणां प्रतिकाराय साहसैश्चाप्यमर्षणात् ।। प्रस्थाने चान्य देशार्थमापदां विप्रमोक्षणे । एवमादि समुद्दिश्य संनिदध्यात् स्वकं धनम् ।।
शोभने! राज्य-विध्वंसका निवारण करने, दुर्भिक्षके समय काम आने, बड़े-बड़े रोगोंसे छुटकारा पाने, बुढ़ापेमें जीवन-निर्वाह करने, साहस और अमर्षपूर्वक शत्रुओंसे बदला लेने, विदेश-यात्रा करने तथा सब प्रकारकी आपत्तियोंसे छुटकारा पाने आदिके उद्देश्यसे अपने धनको अपने निकट बचाये रखना चाहिये ।। सुखमर्थवतां लोके कृच्छ्राणां विप्रमोक्षणम् । धन संकटोंसे छुड़ानेवाला है, इसलिये इस जगत्में धनवानोंको सुख होता है ।। धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं च परमं यशः । त्रिवर्गो हि वशे युक्तः सर्वेषां शं विधीयते ।। तथा संवर्तमानास्तु लोकयोर्हितमाप्नुयुः ।। वह धन यश, आयु तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है। इतना ही नहीं, वह परम यशस्वरूप है। धर्म, अर्थ और काम यह त्रिवर्ग कहलाता है। वह जिनके वशमें होता है, उन सबके लिये कल्याणकारी होता है। ऐसा बर्ताव करनेवाले लोग उभय लोकमें अपना हित साधन करते हैं ।। काल्योत्थानं च शौचं च देवब्राह्मणभक्तितः । गुरूणामेव शुश्रूषा ब्राह्मणेष्वाभिवादनम् ।। प्रत्युत्थानं च वृद्धानां देवस्थानप्रणामनम् । आभिमुख्यं पुरस्कृत्य अतिथीनां च पूजनम् ।। वृद्धोपदेशकरणं श्रवणं हितपथ्ययोः । पोषणं भृत्यवर्गस्य सान्त्वदानपरिग्रहैः ।। न्यायतः कर्मकरणमन्यायाहितवर्जितम् । सम्यग्वृत्तं स्वदारेषु दोषाणां प्रतिषेधनम् ।। पुत्राणां विनयं कुर्यात् तत्तत्कार्यनियोजनम् । वर्जनं चाशुभार्थानां शुभानां जोषणं तथा ।। कुलोचितानां धर्माणां यथावत् परिपालनम् । कुलसंधारणं चैव पौरुषेणैव सर्वशः । एवमादि शुभं सर्वं तस्य वृत्तमिति स्थितम् ।। प्रातःकाल उठना, शौच-स्नान करके शुद्ध होना, देवताओं और ब्राह्मणोंमें भक्ति रखते हुए गुरुजनोंकी सेवा तथा ब्राह्मण-वर्गको प्रणाम करना, बड़े-बूढ़ोंके आनेपर उठकर उनका स्वागत करना, देवस्थानमें मस्तक झुकाना, अतिथियोंके सम्मुख होकर उनका उचित आदर-सत्कार करना, बड़े-बूढ़ोंके उपदेशको मानना और आचरणमें लाना, उनके हितकर और लाभदायक वचनोंको सुनना, भृत्यवर्गको सान्त्वना और अभीष्ट वस्तुका दान देकर अपनाते हुए उसका पालन-पोषण करना, न्याययुक्त कर्म करना, अन्याय और अहितकर कार्यको त्याग देना, अपनी स्त्रीके साथ अच्छा बर्ताव करना, दोषोंका निवारण करना,
पुत्रोंको विनय सिखाना, उन्हें भिन्न-भिन्न आवश्यक कार्योंमें लगाना, अशुभ पदार्थोंको त्याग देना, शुभ पदार्थोंका सेवन करना, कुलोचित धर्मोंका यथावत् रूपसे पालन करना और अपने ही पुरुषार्थसे सर्वथा अपने कुलकी रक्षा करना इत्यादि सारे शुभ व्यवहार वृत्त कहे गये हैं ।।
वृद्धसेवी भवेन्नित्यं हितार्थं ज्ञानकाङ्क्षया ।
परार्थं नाहरेद् द्रव्यमनामन्त्र्य तु सर्वदा ॥
प्रतिदिन अपने हितके लिये और ज्ञान-प्राप्तिकी इच्छासे वृद्ध पुरुषोंका सेवन करे। दूसरेके द्रव्यको उससे पूछे बिना कदापि न ले ।।
न याचेत परान् धीरः स्वबाहुबलमाश्रयेत् ।।
स्वशरीरं सदा रक्षेदाहाराचारयोरपि ।
हितं पथ्यं सदाहारं जीर्णं भुञ्जीत मात्रया ॥
धीर पुरुष दूसरेसे याचना न करे। अपने बाहुबलका भरोसा रखे। आहार और आचार-व्यवहारमें भी सदा अपने शरीरकी रक्षा करे। जो भोजन हितकर एवं लाभदायक हो तथा अच्छी तरह पक गया हो, उसीको नियत मात्रामें ग्रहण करे ।।
देवतातिथिसत्कारं कृत्वा सर्वं यथाविधि ।
शेषं भुञ्जेच्छुचिर्भूत्वा न च भाषेत विप्रियम् ।।
देवताओं और अतिथियोंको पूर्णरूपसे विधिपूर्वक सत्कार करके शेष अन्नका पवित्र होकर भोजन करे और कभी किसीसे अप्रिय वचन न बोले ।।
प्रतिश्रयं च पानीयं बलिं भिक्षां च सर्वतः ।
गृहस्थवासी व्रतवान् दद्याद् गाश्चैव पोषयेत् ।।
गृहस्थ पुरुष धर्मपालनका व्रत लेकर अतिथिके लिये ठहरनेका स्थान, जल, उपहार और भिक्षा दे तथा गौओंका पालन-पोषण करे ।।
बहिर्निष्क्रमणं चैव कुर्यात् कारणतोऽपि वा ।
मध्याह्ने वार्धरात्रे वा गमनं नैव रोचयेत् ।।
वह किसी विशेष कारणसे बाहरकी यात्रा भी कर सकता है, परंतु दोपहर या आधी रातके समय उसे प्रस्थान करनेका विचार नहीं करना चाहिये ।।
विषयान् नावगाहेत स्वशक्त्या तु समाचरेत् ।
यथाऽऽयव्ययता लोके गृहस्थानां प्रपूजिता ।।
विषयोंमें डूबा न रहे। अपनी शक्तिके अनुसार धर्माचरण करे। गृहस्थ पुरुषकी जैसी आय हो, उसके अनुसार ही यदि उसका व्यय हो तो लोकमें उसकी प्रशंसा की जाती है ।।
अयशस्करमर्थघ्नं कर्म यत् परपीडनम् ।
भयाद् वा यदि वा लोभान्न कुर्वीत कदाचन ।।
भय अथवा लोभवश कभी ऐसा कर्म न करे जो यश और अर्थका नाशक तथा दूसरोंको पीड़ा देनेवाला हो ।।
बुद्धिपूर्वं समालोक्य दूरतो गुणदोषतः ।
आरभेत तदा कर्म शुभं वा यदि वेतरत् ।।
किसी कर्मके गुण और दोषको दूरसे ही बुद्धिपूर्वक देखकर तदनन्तर उस शुभ कर्मको लाभदायक समझे तो आरम्भ करे या अशुभका त्याग करे ।।
आत्मसाक्षी भवेन्नित्यमात्मनस्तु शुभाशुभे ।
मनसा कर्मणा वाचा न च कांक्षेत पातकम् ।।
अपने शुभ और अशुभ कर्ममें सदा अपने-आपको ही साक्षी माने और मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा कभी पाप करनेकी इच्छा न करे ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)
[विविध प्रकारके कर्मफलोंका वर्णन]
[विविध प्रकारके कर्मफलोंका वर्णन]
उमोवाच
सुरासुरपते देव वरद प्रीतिवर्धन ।
मानुषेष्वेव ये केचिदाढ्याः क्लेशविवर्जिताः ॥
भुञ्जाना विविधान् भोगान् दृश्यन्ते निरुपद्रवाः ॥
अपरे क्लेशसंयुक्ता दरिद्रा भोगवर्जिताः ॥
किमर्थं मानुषे लोके न समत्वेन कल्पिताः ।
एतच्छ्रोतुं महादेव कौतूहलमतीव मे ॥
उमाने पूछा— सुरासुरपते! सबकी प्रीति बढ़ानेवाले वरदायक देव! मनुष्योंमें ही कितने ही लोग क्लेशशून्य, उपद्रवरहित एवं धन-धान्यसे सम्पन्न होकर भाँति-भाँतिके भोग भोगते देखे जाते हैं और दूसरे बहुत-से मनुष्य क्लेशयुक्त, दरिद्र एवं भोगोंसे वंचित पाये जाते हैं। महादेव! मनुष्यलोकमें सब लोग समान क्यों नहीं बनाये गये (वहाँ इतनी विषमता क्यों है)? यह सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
यादृशं कुरुते कर्म तादृशं फलमश्रुते ।
स्वकृतस्य फलं भुङ्क्ते नान्यस्तद् भोक्तुमर्हति ॥
श्रीमहेश्वर कहते हैं— देवि! जीव जैसा कर्म करता है, वैसा फल पाता है। वह अपने किये हुएका फल स्वयं ही भोगता है, दूसरा कोई उसे भोगनेका अधिकारी नहीं है ॥
अपरे धर्मकामेभ्यो निवृत्ताश्च शुभेक्षणे ।
कदर्या निरनुक्रोशाः प्रायेणात्मपरायणाः ॥
तादृशा मरणं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि शोभने ।
दरिद्राः क्लेशभूयिष्ठा भवन्त्येव न संशयः ॥
शुभेक्षणे! जो लोग धर्म और कामसे निवृत्त हो लोभी, निर्दयी और प्रायः अपने ही शरीरके पोषक हो जाते हैं, शोभने! ऐसे लोग मृत्युके पश्चात् जब पुनः जन्म लेते हैं, तब दरिद्र और अधिक क्लेशके भागी होते हैं। इसमें संशय नहीं है ॥
उमोवाच
मानुषेष्वथ ये केचिद् धनधान्यसमन्विताः ।
भोगहीनाः प्रदृश्यन्ते सर्वभोगेषु सत्स्वपि ॥
न भुञ्जते किमर्थं ते तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा— भगवन्! मनुष्योंमें जो लोग धन-धान्यसे सम्पन्न हैं, उनमेंसे भी कितने ही ऐसे हैं, जो सम्पूर्ण भोगोंके होनेपर भी भोगहीन देखे जाते हैं। वे उन भोगोंको क्यों नहीं
भोगते? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
परैः संचोदिता धर्मं कुर्वते न स्वकामतः ।
धर्मश्रद्धां बहिष्कृत्य कुर्वन्ति च रुदन्ति च ॥
तादृशा मरणं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि शोभने ।
फलानि तानि सम्प्राप्य भुञ्जते न कदाचन ॥
रक्षन्तो वर्धयन्तश्च आसते निधिपालवत् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो दूसरोंसे प्रेरित होकर धर्म करते हैं, स्वेच्छासे नहीं तथा धर्मविषयक श्रद्धाको दूर करके अश्रद्धासे दान या धर्म करते हैं और उसके लिये रोते या पछताते हैं; शोभने! ऐसे लोग जब मृत्युको प्राप्त होकर फिर जन्म लेते हैं तो धर्मके उन फलोंको पाकर कभी भोगते नहीं हैं। केवल खजानेकी रक्षा करनेवाले सिपाहीकी भाँति उस धनकी रखवाली करते हुए उसे बढ़ाते रहते हैं ।।
उमोवाच
केचिद् धनवियुक्ताश्च भोगयुक्ता महेश्वर ।
मानुषाः सम्प्रदृश्यन्ते तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा— महेश्वर! कितने ही मनुष्य धनहीन होनेपर भी भोगयुक्त दिखायी देते हैं। इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
नित्यं ये दातुमनसो नरा वित्तेष्वसत्स्वपि ॥
कालधर्मवशं प्राप्ताः पुनर्जन्मनि ते नराः ।
एते धनविहीनाश्च भोगयुक्ता भवन्त्युत ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो धन न होनेपर भी सदा दान देनेकी इच्छा रखते हैं, वे मनुष्य मृत्युके पश्चात् जब फिर जन्म लेते हैं, तब निर्धन होनेके साथ ही भोगयुक्त होते हैं (धर्मके प्रभावसे उनके योगक्षेमकी व्यवस्था होती रहती है) ।।
धर्मदानोपदेशं वा कर्तव्यमिति निश्चयः ।
इति ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
अतः धर्म और दानका उपदेश करना चाहिये—यह विद्वानोंका निश्चय है। देवि! तुम्हारे इस प्रश्नका उत्तर तो दे दिया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश त्र्यक्ष वृषभध्वज ।
मानुषास्त्रिविधा देव दृश्यन्ते सततं विभो ॥
**उमाने कहा—**भगवन्! देवदेवेश्वर! त्रिलोचन! वृषभध्वज! देव! विभो! मनुष्य तीन प्रकारके दिखायी देते हैं ।।
आसीना एव भुञ्जन्ते स्थानैश्वर्यपरिग्रहैः ।
अपरे यत्नपूर्वं तु लभन्ते भोगसंग्रहम् ।।
अपरे यतमानाश्च न लभन्ते तु किंचन ।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
कुछ लोग बैठे-बैठे ही उत्तम स्थान, ऐश्वर्य और विविध भोगोंका संग्रह पाकर उनका उपभोग करते हैं। दूसरे लोग यत्नपूर्वक भोगोंका संग्रह कर पाते हैं, और तीसरे ऐसे हैं, जो यत्न करनेपर भी कुछ नहीं पाते। किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
न्यायतस्त्वं महाभागे श्रोतुकामासि भामिनि ।।
ये लोके मानुषा देवि दानधर्मपरायणाः ।
पात्राणि विधिवज्ज्ञात्वा दूरतोऽप्यनुमानतः ।।
अभिगम्य स्वयं तत्र ग्राहयन्ति प्रसाद्य च ।
दानादि चेङ्गितैरेव तैरविज्ञातमेव वा ।।
पुनर्जन्मनि ते देवि तादृशाः शोभना नराः ।
अयत्नतस्तु तान्येव फलानि प्राप्नुवन्त्युत ।।
आसीना एव भुञ्जन्ते भोगान् सुकृतभागिनः ।
**श्रीमहेश्वरने कहा—**महाभागे! भामिनि! तुम न्यायतः मेरा उपदेश सुनना चाहती हो, अतः सुनो। देवि! दानधर्ममें तत्पर रहनेवाले जो मनुष्य संसारमें दानके सुयोग्य पात्रोंका विधिवत् ज्ञान प्राप्त करके अथवा अनुमानसे भी उन्हें जानकर दूरसे भी स्वयं उनके पास चले जाते और उन्हें प्रसन्न करके अपनी दी हुई वस्तुएँ उन्हें स्वीकार करवाते हैं, उनके दान आदि कर्म संकेतसे ही होते हैं; अतः दान-पात्रोंको जनाये बिना ही जो उनके लिये दानकी वस्तुएँ दे देते हैं; देवि! वे ही पुनर्जन्ममें वैसे श्रेष्ठ पुरुष होते हैं तथा वे बिना यत्नके ही उन कर्मोंके फलोंको प्राप्त कर लेते हैं और पुण्यके भागी होनेके कारण बैठे-बैठाये ही सब तरहके भोग भोगते हैं ।।
अपरे ये च दानानि ददत्येव प्रयाचिताः ।।
यदा यदार्थिने दत्त्वा पुनर्दानं च याचिताः ।
तावत्कालं ततो देवि पुनर्जन्मनि ते नराः ।
यत्नतः श्रमसंयुक्ताः पुनस्तान् प्राप्नुवन्ति च ।।
दूसरे जो लोग याचकोंके माँगनेपर दान देते ही हैं और जब-जब याचकने माँगा, तब-तब उसे दान देकर उसके पुनः याचना करनेपर फिर दान दे देते हैं; देवि! वे मनुष्य पुनर्जन्म
पानेपर यत्न और परिश्रमसे बारंबार उन दान-कर्मोंके फल पाते रहते हैं ।।
याचिता अपि केचित् तु न ददत्येव किंचन ।
अभ्यसूयापरा मर्त्या लोभोपहतचेतसः ।।
कुछ लोग ऐसे हैं, जो याचना करनेपर भी याचकको कुछ नहीं देते। उनका चित्त लोभसे दूषित होता है और वे सदा दूसरोंके दोष ही देखा करते हैं ।।
ते पुनर्जन्मनि शुभे यतन्तो बहुधा नराः ।
न प्राप्नुवन्ति मनुजा मार्गन्तस्तेऽपि किंचन ।।
शुभे! ऐसे लोग फिर जन्म लेनेपर बहुत यत्न करते रहते हैं तो भी कुछ नहीं पाते। बहुत ढूँढनेपर भी उन्हें कोई भोग सुलभ नहीं होता ।।
नानुप्तं रोहते सस्यं तद्वद् दानफलं विदुः ।
यद् यद् ददाति पुरुषस्तत् तत् प्राप्नोति केवलम् ।।
इति ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ।।
जैसे बीज बोये बिना खेती नहीं उपजती, यही बात दानके फलके विषयमें समझनी चाहिये—दिये बिना किसीको कुछ नहीं मिलता। मनुष्य जो-जो देता है, केवल उसीको पाता है। देवि! यह विषय तुम्हें बताया गया। अब और क्या सुनना चाहती हो? ।।
उमोवाच
भगवन् भगनेत्रघ्न केचिद् वार्धक्य संयुताः ।
अभोगयोग्यकाले तु भोगांश्चैव धनानि च ।।
लभन्ते स्थविरा भूता भोगैश्वर्यं यतस्ततः ।।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसिगर्हसि ।।
**उमाने पूछा—**भगवन्! भगदेवताका नेत्र नष्ट करनेवाले महादेव! कुछ लोग बूढ़े हो जानेपर, जब कि उनके लिये भोग भोगने योग्य समय नहीं रह जाता, बहुत-से भोग और धन पा जाते हैं। वे वृद्ध होनेपर भी जहाँ-तहाँसे भोग और ऐश्वर्य प्राप्त कर लेते हैं; ऐसा किस कर्म-विपाकसे सम्भव होता है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता ।।
धर्मकार्यं चिरं कालं विस्मृत्य धनसंयुताः ।
प्राणान्तकाले सम्प्राप्ते व्याधिभिश्च निपीडिताः ।।
आरभन्ते पुनर्धर्मान् दातुं दानानि वा नराः ।।
ते पुनर्जन्मनि शुभे भूत्वा दुःखपरिप्लुताः ।
अतीतयौवने काले स्थविरत्वमुपागताः ।।
लभन्ते पूर्वदत्तानां फलानि शुभलक्षणे ।।
एतत् कर्मफलं देवि कालयोगाद् भवत्युत ।।
श्रीमहेश्वरने कहा—देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक तुमसे इसका उत्तर देता हूँ, तुम
एकाग्रचित्त होकर इसका तात्त्विक विषय सुनो। जो लोग धनसे सम्पन्न होनेपर भी
दीर्घकालतक धर्मकार्यको भूले रहते हैं और जब रोगोंसे पीड़ित होते हैं, तब प्राणान्त-काल
निकट आनेपर धर्म करना या दान देना आरम्भ करते हैं, शुभे! वे पुनर्जन्म लेनेपर दुःखमें
मग्न हो यौवनका समय बीत जानेपर जब बूढ़े होते हैं, तब पहलेके दिये हुए दानोंके फल
पाते हैं। शुभलक्षणे! देवि! यह कर्म-फल काल-योगसे प्राप्त होता है ।।
उमोवाच
भोगयुक्ता महादेव केचिद् व्याधिपरिप्लुताः ।
असमर्थाश्च तान् भोक्तुं भवन्ति किल कारणम् ।।
उमाने पूछा—महादेव! कुछ लोग युवावस्थामें ही भोगसे सम्पन्न होनेपर भी रोगोंसे
पीड़ित होनेके कारण उन्हें भोगनेमें असमर्थ हो जाते हैं, इसका क्या कारण है? ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
व्याधियोगपरिक्लिष्टा ये निराशाः स्वजीविते ।
आरभन्ते तदा कर्तुं दानानि शभलक्षणे ।।
ते पुनर्जन्मनि शुभे प्राप्य तानि फलान्युत ।
असमर्थाश्च तान् भोक्तुं व्याधितास्ते भवन्त्युत ।।
श्रीमहेश्वरने कहा—शुभलक्षणे! जो रोगोंसे कष्टमें पड़ जानेपर जब जीवनसे निराश
हो जाते हैं, तब दान करना आसम्भ करते हैं। शुभे! वे ही पुनर्जन्म लेनेपर उन फलोंको
पाकर रोगोंसे आक्रान्त हो उन्हें भोगनेमें असमर्थ हो जाते हैं ।।
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश मानुषेष्वेव केचन ।
रूपयुक्ताः प्रदृश्यन्ते शुभाङ्का प्रियदर्शनाः ।।
केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।।
उमाने पूछा—भगवन्! देवदेवेश्वर! मनुष्योंमें कुछ ही लोग रूपवान्, शुभ लक्षणसम्पन्न
और प्रिय-दर्शन (परम मनोहर) देखे जाते हैं, किस कर्मविपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे
बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता ।।
ये पुरा मानुषा देवि लज्जायुक्ताः प्रियंवदाः ।
शक्ताः सुमधुरा नित्यं भूत्वा चैव स्वभावतः ।।
अमांसभोजिनश्चैव सदा प्राणिदयायुताः । प्रतिकर्मप्रदा वापि वस्त्रदा धर्मकारणात् ।। भूमिशुद्धिकरा वापि कारणादग्निपूजकाः ।। एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि ते नराः । रूपेण स्पृहणीयास्तु भवन्त्येव न संशयः ।। श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मैं प्रसन्नतापूर्वक इसका रहस्य बताता हूँ। तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो। जो मनुष्य पूर्वजन्ममें लज्जायुक्त, प्रिय वचन बोलनेवाले, शक्तिशाली और सदा स्वभावतः मधुर स्वभाववाले होकर सर्वदा समस्त प्राणियोंपर दया करते हैं, कभी मांस नहीं खाते हैं, धर्मके उद्देश्यसे वस्त्र और आभूषणोंका दान करते हैं, भूमिकी शुद्धि करते हैं, कारणवश अग्निकी पूजा करते हैं; ऐसे सदाचारसम्पन्न मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर रूप-सौन्दर्यकी दृष्टिसे स्पृहणीय होते ही हैं, इसमें संशय नहीं है ।।
उमोवाच
विरूपाश्च प्रदृश्यन्ते मानुषेष्वेव केचन । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ।। उमाने पूछा— भगवन्! मनुष्योंमें ही कुछ लोग बड़े कुरूप दिखायी देते हैं, इसमें कौन-सा कर्मविपाक कारण है? यह मुझे बताइये ।।
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु कल्याणि कारणम् ।। रूपयोगात् पुरा मर्त्या दर्पाहंकारसंयुताः । विरूपहासकाश्चैव स्तुतिनिन्दादिभिर्भृशम् ।। परोपतापिनश्चैव मांसादाश्च तथैव च । अभ्यसूयापराश्चैव अशुद्धाश्च तथा नराः ।। एवंयुक्तसमाचारा यमलोके सुदण्डिताः । कथंचित् प्राप्य मानुष्यं तत्र ते रूपवर्जिताः ।। विरूपाः सम्भवन्त्येव नास्ति तत्र विचारणा । श्रीमहेश्वरने कहा— कल्याणि! सुनो, मैं तुमको इसका कारण बताता हूँ। पूर्वजन्ममें सुन्दर रूप पाकर जो मनुष्य दर्प और अहंकारसे युक्त हो स्तुति और निन्दा आदिके द्वारा कुरूप मनुष्योंकी बहुत हँसी उड़ाया करते हैं, दूसरोंको सताते, मांस खाते, पराया दोष देखते और सदा अशुद्ध रहते हैं, ऐसे अनाचारी मनुष्य यमलोकमें भलीभाँति दण्ड पाकर जब फिर किसी प्रकार मनुष्य-योनिमें जन्म लेते हैं, तब रूपहीन और कुरूप होते ही हैं। इसमें विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं ।।
उमोवाच
भगवन् देवदेवेश केचित् सौभाग्यसंयुताः । रूपभोगविहीनाश्च दृश्यन्ते प्रमदाप्रियाः ॥ केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ उमाने पूछा— भगवन्! देवदेवेश्वर! कुछ मनुष्य सौभाग्यशाली होते हैं, जो रूप और भोगसे हीन होनेपर भी नारीको प्रिय लगते हैं। किस कर्म-विपाकसे ऐसा होता है? यह मुझे बताइये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
ये पुरा मानुषा देवि सौम्यशीलाः प्रियंवदाः । स्वदारैरेव संतुष्टा दारेषु समवृत्तयः ॥ दाक्षिण्येनैव वर्तन्ते प्रमदास्वप्रियास्वपि । न तु प्रत्यादिशन्त्येव स्त्रीदोषान् गुणसंश्रितान् ॥ अन्नपानीयदाः काले नृणां स्वादुप्रदाश्च ये । स्वदारव्रतिनश्चैव धृतिमन्तो निरत्ययाः ॥ एवंयुक्तसमाचाराः पुनर्जन्मनि शोभने । मानुषास्ते भवन्त्येव सततं सुभगा भृशम् ॥ अर्थादृतेऽपि ते देवि भवन्ति प्रमदाप्रियाः ॥ श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! जो मनुष्य पहले सौम्य-स्वभावके तथा प्रिय वचन बोलनेवाले होते हैं, अपनी ही पत्नीमें संतुष्ट रहते हैं, यदि कई पत्नियाँ हों तो उन सबपर समान भाव रखते हैं, अपने स्वभावके कारण अप्रिय लगनेवाली स्त्रियोंके प्रति भी उदारतापूर्ण बर्ताव करते हैं, स्त्रियोंके दोषोंकी चर्चा नहीं करते, उनके गुणोंका ही बखान करते हैं, समयपर अन्न और जलका दान करते हैं, अतिथियोंको स्वादिष्ट अन्न भोजन कराते हैं, अपनी पत्नीके प्रति ही अनुरक्त रहनेका नियम लेते हैं, धैर्यवान् और दुःखरहित होते हैं, शोभने! ऐसे आचारवाले मनुष्य पुनर्जन्म लेनेपर सदा सौभाग्यशाली होते ही हैं। देवि! वे धनहीन होनेपर भी अपनी पत्नीके प्रीतिपात्र होते हैं ॥
उमोवाच
दुर्भागाः सम्प्रदृश्यन्ते आर्या भोगयुता अपि । केन कर्मविपाकेन तन्मे शंसितुमर्हसि ॥ उमाने पूछा— भगवन्! बहुत-से श्रेष्ठ पुरुष भोगोंसे सम्पन्न होनेपर भी दुर्भाग्यके मारे दिखायी देते हैं। किस कर्मविपाकसे ऐसा सम्भव होता है? यह मुझे बताइये ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु सर्वं समाहिता ॥