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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2302)

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एकादशोऽध्यायः

धृतराष्ट्रका विदुरके द्वारा युधिष्ठिरसे श्राद्धके लिये धन माँगना, अर्जुनकी सहमति और भीमसेनका विरोध

वैशम्पायन उवाच

ततो रजन्यां व्युष्टायां धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
विदुरं प्रेषयामास युधिष्ठिरनिवेशनम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर जब रात बीती और सबेरा हुआ, तब अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने विदुरजीको युधिष्ठिरके महलमें भेजा ॥ १ ॥

स गत्वा राजवचनादुवाचाच्युतमीश्वरम् ।
युधिष्ठिरं महातेजाः सर्वबुद्धिमतां वरः ॥ २ ॥

राजाकी आज्ञासे अपने धर्मसे कभी विचलित न होनेवाले राजा युधिष्ठिरके पास जाकर समस्त बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी विदुरने इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥

धृतराष्ट्रो महाराजो वनवासाय दीक्षितः ।
गमिष्यति वनं राजन्नागतां कार्तिकीमिमाम् ॥ ३ ॥

‘राजन्! महाराज धृतराष्ट्र वनवासकी दीक्षा ले चुके हैं। इसी कार्तिकी पूर्णिमाको जो कि अब निकट आ पहुँची है, वे वनकी यात्रा करेंगे ॥ ३ ॥

स त्वां कुरुकुलश्रेष्ठ किंचिदर्थमभीप्सति ।
श्राद्धमिच्छति दातुं स गाङ्गेयस्य महात्मनः ॥ ४ ॥
द्रोणस्य सोमदत्तस्य बाह्लीकस्य च धीमतः ।
पुत्राणां चैव सर्वेषां ये चान्ये सुहृदो हताः ॥ ५ ॥

‘कुरुकुलश्रेष्ठ! इस समय वे तुमसे कुछ धन लेना चाहते हैं। उनकी इच्छा है कि महात्मा भीष्म, द्रोणाचार्य, सोमदत्त, बुद्धिमान् बाह्लीक और युद्धमें मारे गये अपने समस्त पुत्रों तथा अन्य सुहृदोंका श्राद्ध करें ।।

यदि चाप्यनुजानीषे सैन्धवापसदस्य च ।
‘यदि तुम्हारी सम्मति हो तो वे उस नराधम सिन्धुराज जयद्रथका भी श्राद्ध करना चाहते हैं’ ॥ ५ १/२ ॥

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं विदुरस्य युधिष्ठिरः ॥ ६ ॥ हृष्टः सम्पूजयामास गुडाकेशश्च पाण्डवः । विदुरकी यह बात सुनकर युधिष्ठिर तथा पाण्डुपुत्र अर्जुन बड़े प्रसन्न हुए और उनकी सराहना करने लगे ॥

न च भीमो दृढक्रोधस्तद् वचो जगृहे तदा ॥ ७ ॥ विदुरस्य महातेजा दुर्योधनकृतं स्मरन् । परंतु महातेजस्वी भीमसेनके हृदयमें उनके प्रति अमिट क्रोध जमा हुआ था। उन्हें दुर्योधनके अत्याचारोंका स्मरण हो आया, अतः उन्होंने विदुरजीकी बात नहीं स्वीकार की ॥ ७ १/२ ॥

अभिप्रायं विदित्वा तु भीमसेनस्य फाल्गुनः ॥ ८ ॥ किरीटी किंचिदानम्य तमुवाच नरर्षभम् । भीमसेनके उस अभिप्रायको जानकर किरीटधारी अर्जुन कुछ विनीत हो उन नरश्रेष्ठसे इस प्रकार बोले— ॥ ८ १/२ ॥

भीम राजा पिता वृद्धो वनवासाय दीक्षितः ॥ ९ ॥ दातुमिच्छति सर्वेषां सुहृदामौर्ध्वदेहिकम् ।

‘भैया भीम! राजा धृतराष्ट्र हमारे ताऊ और वृद्ध पुरुष हैं। इस समय वे वनवासकी दीक्षा ले चुके हैं और जानेके पहले वे भीष्म आदि समस्त सुहृदोंका और्ध्वदेहिक श्राद्ध कर लेना चाहते हैं॥ ९ १/२॥ भवता निर्जितं वित्तं दातुमिच्छति कौरवः ॥ १० ॥ भीष्मादीनां महाबाहो तदनुज्ञातुमर्हसि । ‘महाबाहो! कुरुपति धृतराष्ट्र आपके द्वारा जीते गये धनको आपसे माँगकर उसे भीष्म आदिके लिये देना चाहते हैं; अतः आपको इसके लिये स्वीकृति दे देनी चाहिये॥ १० १/२॥ दिष्ट्या त्वद्य महाबाहो धृतराष्ट्रः प्रयाचते ॥ ११ ॥ याचितो यः पुरास्माभिः पश्य कालस्य पर्ययम् । ‘महाबाहो! सौभाग्यकी बात है कि आज राजा धृतराष्ट्र हमलोगोंसे धनकी याचना करते हैं। समयका उलट-फेर तो देखिये। पहले हमलोग जिनसे याचना करते थे, आज वे ही हमसे याचना करते हैं॥ ११ १/२॥ योऽसौ पृथिव्याः कृत्स्नाया भर्ता भूत्वा नराधिपः ॥ १२ ॥ परैर्विनिहतामात्यो वनं गन्तुमभीप्सति । ‘एक दिन जो सम्पूर्ण भूमण्डलका भरण-पोषण करनेवाले नरेश थे, उनके सारे मन्त्री और सहायक शत्रुओंद्वारा मार डाले गये और आज वे वनमें जाना चाहते हैं॥ १२ १/२॥ मा तेऽन्यत् पुरुषव्याघ्र दानाद् भवतु दर्शनम् ॥ १३ ॥ अयशस्यमतोऽन्यत् स्यादधर्मश्च महाभुज । ‘पुरुषसिंह! अतः आप उन्हें धन देनेके सिवा दूसरा कोई दृष्टिकोण न अपनावें। महाबाहो! उनकी याचना ठुकरा देनेसे बढ़कर हमारे लिये और कोई कलंककी बात न होगी। उन्हें धन न देनेसे हमें अधर्मका भी भागी होना पड़ेगा॥ १३ १/२॥ राजानमुपशिक्षस्व ज्येष्ठं भ्रातरमीश्वरम् ॥ १४ ॥ अर्हस्त्वमपि दातुं वै नादातुं भरतर्षभ । ‘आप अपने बड़े भाई ऐश्वर्यशाली महाराज युधिष्ठिरके बर्तावसे शिक्षा ग्रहण करें। भरतश्रेष्ठ! आप भी दूसरोंको देनेके ही योग्य हैं; दूसरोंसे लेनेके योग्य नहीं’॥ १४ १/२॥ एवं ब्रुवाणं बीभत्सुं धर्मराजोऽप्यपूजयत् ॥ १५ ॥ भीमसेनस्तु संक्रोधः प्रोवाचेदं वचस्तदा । ऐसी बात कहते हुए अर्जुनकी धर्मराज युधिष्ठिरने भूरि-भूरि प्रशंसा की। तब भीमसेनने कुपित होकर उनसे यह बात कही—॥ १५ १/२॥ वयं भीष्मस्य दास्यामः प्रेतकार्यं तु फाल्गुन ॥ १६ ॥ सोमदत्तस्य नृपतेर्भूरिश्रवस एव च । बाह्लीकस्य च राजर्षेर्द्रोणस्य च महात्मनः ॥ १७ ॥

अन्येषां चैव सर्वेषां कुन्ती कर्णाय दास्यति ।
‘अर्जुन! हमलोग स्वयं ही भीष्म, राजा सोमदत्त, भूरिश्रवा, राजर्षि बाह्लीक, महात्मा द्रोणाचार्य तथा अन्य सब सम्बन्धियोंका श्राद्ध करेंगे। हमारी माता कुन्ती कर्णके लिये पिण्डदान करेगी ।। १६-१७ १/२ ।।
श्राद्धानि पुरुषव्याघ्र मा प्रादात् कौरवो नृपः ।। १८ ।।
इति मे वर्तते बुद्धिर्मा नो निन्दन्तु शत्रवः ।
‘पुरुषसिंह! मेरा यही विचार है कि कुरुवंशी राजा धृतराष्ट्र उक्त महानुभावोंका श्राद्ध न करें। इसके लिये हमारे शत्रु हमारी निन्दा न करें ।। १८ १/२ ।।
कष्टात् कष्टतरं यान्तु सर्वे दुर्योधनादयः ।। १९ ।।
यैरियं पृथिवी कृत्स्ना घातिता कुलपांसनैः ।
‘जिन कुलांगारोंने इस सारी पृथिवीका विनाश करा डाला, वे दुर्योधन आदि सब लोग भारी-से-भारी कष्टमें पड़ जायँ’ ।। १९ १/२ ।।
कुतस्त्वमसि विस्मृत्य वैरं द्वादशवार्षिकम् ।। २० ।।
अज्ञातवासं गहनं द्रौपदीशोकवर्धनम् ।
‘तुम वह पुराना वैर, वह बारह वर्षोंका वनवास और द्रौपदीके शोकको बढ़ानेवाला एक वर्षका गहन अज्ञातवास सहसा भूल कैसे गये? ।। २० १/२ ।।
क्व तदा धृतराष्ट्रस्य स्नेहोऽस्मद्गोचरो गतः ।। २१ ।।
कृष्णाजिनोपसंवीतो हृताभरणभूषणः ।
सार्धं पाञ्चालपुत्र्या त्वं राजानमुपजग्मिवान् ।। २२ ।।
क्व तदा द्रोणभीष्मौ तौ सोमदत्तोऽपि वाभवत् ।
‘उन दिनों धृतराष्ट्रका हमारे प्रति स्नेह कहाँ चला गया था? जब तुम्हारे आभरण एवं आभूषण उतार लिये गये और तुम काले मृगचर्मसे अपने शरीरको ढँककर द्रौपदीके साथ राजाके समीप गये, उस समय द्रोणाचार्य और भीष्म कहाँ थे? सोमदत्तजी भी कहाँ चले गये थे ।। २१-२२ १/२ ।।
यत्र त्रयोदशसमा वने वन्येन जीवथ ।। २३ ।।
न तदा त्वां पिता ज्येष्ठः पितृत्वेनाभिवीक्षते ।
‘जब तुम सब लोग तेरह वर्षोंतक वनमें जंगली फल-मूल खाकर किसी तरह जी रहे थे, उन दिनों तुम्हारे ये ताऊजी पिताके भावसे तुम्हारी ओर नहीं देखते थे ।।
किं ते तद् विस्मृतं पार्थ यदेष कुलपांसनः ।। २४ ।।
दुर्बुद्धिर्विदुरं प्राह द्यूते किं जितमित्युत ।

‘पार्थ! क्या तुम उस बातको भूल गये, जब कि यह कुलांगार दुर्बुद्धि धृतराष्ट्र जुआ आरम्भ कराकर विदुरजीसे बार-बार पूछता था कि ‘इस दाँवमें हमलोगोंने क्या जीता है?’ ॥ २४ १/२ ॥

तमेवंवादिनं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
उवाच वचनं धीमान् जोषमास्वेति भर्त्सयन् ॥ २५ ॥

भीमसेनको ऐसी बातें करते देख बुद्धिमान् कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने उन्हें डाँटकर कहा—‘चुप रहो’ ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2307)

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द्वादशोऽध्यायः

अर्जुनका भीमको समझाना और युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको यथेष्ट धन देनेकी स्वीकृति प्रदान करना

अर्जुन उवाच
भीम ज्येष्ठो गुरुर्मे त्वं नातोऽन्यद् वक्तुमुत्सहे ।
धृतराष्ट्रस्तु राजर्षिः सर्वथा मानमर्हति ॥ १ ॥
अर्जुन बोले— भैया भीमसेन! आप मेरे ज्येष्ठ भ्राता और गुरुजन हैं; अतः आपके सामने मैं इसके सिवा और कुछ नहीं कह सकता कि राजर्षि धृतराष्ट्र सर्वथा समादरके योग्य हैं ॥ १ ॥

न स्मरन्त्यपराद्धानि स्मरन्ति सुकृतान्यपि ।
असम्भिन्नार्यमर्यादाः साधवः पुरुषोत्तमाः ॥ २ ॥
जिन्होंने आर्योंकी मर्यादा भंग नहीं की है, वे साधु-स्वभाववाले श्रेष्ठ पुरुष दूसरोंके अपराधोंको नहीं, उपकारोंको ही याद रखते हैं ॥ २ ॥

इति तस्य वचः श्रुत्वा फाल्गुनस्य महात्मनः ।
विदुरं प्राह धर्मात्मा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ३ ॥
महात्मा अर्जुनकी यह बात सुनकर धर्मात्मा कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने विदुरजीसे कहा— ॥ ३ ॥

इदं मद्वचनात् क्षत्तः कौरवं ब्रूहि पार्थिवम् ।
यावदिच्छति पुत्राणां श्राद्धं तावद् ददाम्यहम् ॥ ४ ॥
‘चाचाजी! आप मेरी ओरसे कौरवनरेश धृतराष्ट्रसे जाकर कह दीजिये कि वे अपने पुत्रोंका श्राद्ध करनेके लिये जितना धन चाहते हों, वह सब मैं दे दूँगा ॥ ४ ॥

भीष्मादीनां च सर्वेषां सुहृदामुपकारिणाम् ।
मम कोशादिति विभो मा भूद् भीमः सुदुर्मनाः ॥ ५ ॥
‘प्रभो! भीष्म आदि समस्त उपकारी सुहृदोंका श्राद्ध करनेके लिये केवल मेरे भण्डारसे धन मिल जायगा। इसके लिये भीमसेन अपने मनमें दुखी न हों’ ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा धर्मराजस्तमर्जुनं प्रत्यपूजयत् ।
भीमसेनः कटाक्षेण वीक्षां चक्रे धनंजयम् ॥ ६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ऐसा कहकर धर्मराजने अर्जुनकी बड़ी प्रशंसा की। उस समय भीमसेनने अर्जुनकी ओर कटाक्षपूर्वक देखा ॥ ६ ॥

ततः स विदुरं धीमान् वाक्यमाह युधिष्ठिरः । भीमसेने न कोपं स नृपतिः कर्तुमर्हति ॥ ७ ॥ तब बुद्धिमान् युधिष्ठिरने विदुरसे कहा—'चाचाजी! राजा धृतराष्ट्रको भीमसेनपर क्रोध नहीं करना चाहिये ॥ ७ ॥ परिक्लिष्टो हि भीमोऽपि हिमवृष्ट्यातपादिभिः । दुःखैर्बहुविधैर्धीमानरण्ये विदितं तव ॥ ८ ॥ 'आपको तो मालूम ही है कि वनमें हिम, वर्षा और धूप आदि नाना प्रकारके दुःखोंसे बुद्धिमान् भीमसेनको बड़ा कष्ट उठाना पड़ा है ॥ ८ ॥ किं तु मद्वचनाद् ब्रूहि राजानं भरतर्षभ । यद् यदिच्छसि यावच्च गृह्यतां मद्गृहादिति ॥ ९ ॥ 'आप मेरी ओरसे राजा धृतराष्ट्रसे कहिये कि भरतश्रेष्ठ! आप जो-जो वस्तु जितनी मात्रामें लेना चाहते हों, उसे मेरे घरसे ग्रहण कीजिये' ॥ ९ ॥ यन्मात्सर्यमयं भीमः करोति भृशदुःखितः । न तन्मनसि कर्तव्यमिति वाच्यः स पार्थिवः ॥ १० ॥ 'भीमसेन अत्यन्त दुखी होनेके कारण जो कभी ईर्ष्या प्रकट करते हैं, उसे वे मनमें न लावें। यह बात आप महाराजसे अवश्य कह दीजियेगा' ॥ १० ॥ यन्ममास्ति धनं किंचिदर्जुनस्य च वेश्मनि । तस्य स्वामी महाराज इति वाच्यः स पार्थिवः ॥ ११ ॥ 'मेरे और अर्जुनके घरमें जो कुछ भी धन है, उस सबके स्वामी महाराज धृतराष्ट्र हैं; यह बात उन्हें बता दीजिये ॥ ११ ॥ ददातु राजा विप्रेभ्यो यथेष्टं क्रियतां व्ययः । पुत्राणां सुहृदां चैव गच्छत्वानृण्यमद्य सः ॥ १२ ॥ 'वे ब्राह्मणोंको यथेष्ट धन दें। जितना खर्च करना चाहें, करें। आज वे अपने पुत्रों और सुहृदोंके ऋणसे मुक्त हो जायँ ॥ १२ ॥ इदं चापि शरीरं मे तवायत्तं जनाधिप । धनानि चेति विद्धि त्वं न मे तत्रास्ति संशयः ॥ १३ ॥ 'उनसे कहिये, जनेश्वर! मेरा यह शरीर और सारा धन आपके ही अधीन है। इस बातको आप अच्छी तरह जान लें। इस विषयमें मेरे मनमें संशय नहीं है' ॥ १३ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि युधिष्ठिरानुमोदने द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें युधिष्ठिरका अनुमोदनविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2310)

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त्रयोदशोऽध्यायः

विदुरका धृतराष्ट्रको युधिष्ठिरका उदारतापूर्ण उत्तर सुनाना

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु राज्ञा स विदुरो बुद्धिसत्तमः।
धृतराष्ट्रमुपेत्यैवं वाक्यमाह महार्थवत्॥ १॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजा युधिष्ठिरके इस प्रकार कहनेपर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विदुरजी धृतराष्ट्रके पास जाकर यह महान् अर्थसे युक्त बात बोले—॥ १॥

उक्तो युधिष्ठिरो राजा भवद्वचनमादितः।
स च संश्रुत्य वाक्यं ते प्रशंसंस महाद्युतिः॥ २॥
'महाराज! मैंने महातेजस्वी राजा युधिष्ठिरके यहाँ जाकर आपका संदेश आरम्भसे ही कह सुनाया। उसे सुनकर उन्होंने आपकी बड़ी प्रशंसा की॥ २॥

बीभत्सुश्च महातेजा निवेदयति ते गृहान्।
वसु तस्य गृहे यच्च प्राणानपि च केवलान्॥ ३॥
'महातेजस्वी अर्जुन भी आपको अपना सारा घर सौंपते हैं। उनके घरमें जो कुछ धन है, उसे और अपने प्राणोंको भी वे आपकी सेवामें समर्पित करनेको तैयार हैं॥ ३॥

धर्मराजश्च पुत्रस्ते राज्यं प्राणान् धनानि च।
अनुजानाति राजर्षे यच्चान्यदपि किंचन॥ ४॥
'राजर्षे! आपके पुत्र धर्मराज युधिष्ठिर अपना राज्य, प्राण, धन तथा और जो कुछ उनके पास है, सब आपको दे रहे हैं॥ ४॥

भीमश्च सर्वदुःखानि संस्मृत्य बहुलान्युत।
कृच्छ्रादिव महाबाहुरनुजज्ञे विनिःश्वसन्॥ ५॥
'परंतु महाबाहु भीमसेनने पहलेके समस्त क्लेशोंका, जिनकी संख्या अधिक है, स्मरण करके लंबी साँस खींचते हुए बड़ी कठिनाईसे धन देनेकी अनुमति दी है॥ ५॥

स राजन् धर्मशीलेन राज्ञा बीभत्सुना तथा।
अनुनीतो महाबाहुः सौहृदे स्थापितोऽपि च॥ ६॥
'राजन्! धर्मशील राजा युधिष्ठिर तथा अर्जुनने भी महाबाहु भीमसेनको भलीभाँति समझाकर उनके हृदयमें भी आपके प्रति सौहार्द उत्पन्न कर दिया है॥ ६॥

न च मन्युस्त्वया कार्य इति त्वां प्राह धर्मराट्।
संस्मृत्य भीमस्तद्वैरं यदन्यायवदाचरत्॥ ७॥

'धर्मराजने आपसे कहलाया है कि भीमसेन पूर्व वैरका स्मरण करके जो कभी-कभी आपके साथ अन्याय-सा कर बैठते हैं, उसके लिये आप इनपर क्रोध न कीजियेगा।। ७।। एवं प्रायो हि धर्मोऽयं क्षत्रियाणां नराधिप । युद्धे क्षत्रियधर्मे च निरतोऽयं वृकोदरः ॥ ८ ॥ 'नरेश्वर! क्षत्रियोंका यह धर्म प्रायः ऐसा ही है। भीमसेन युद्ध और क्षत्रिय-धर्ममें प्रायः निरत रहते हैं।। वृकोदरकृते चाहमर्जुनश्च पुनः पुनः। प्रसीद याचे नृपते भवान् प्रभुरिहास्ति यत् ॥ ९ ॥ 'भीमसेनके कटु बर्तावके लिये मैं और अर्जुन दोनों आपसे बार-बार क्षमायाचना करते हैं। नरेश्वर! आप प्रसन्न हों। मेरे पास जो कुछ भी है, उसके स्वामी आप ही हैं।। ९ ।। तद् ददातु भवान् वित्तं यावदिच्छसि पार्थिव । त्वमीश्वरोऽस्य राज्यस्य प्राणानामपि भारत ॥ १० ॥ 'पृथ्वीनाथ! भरतनन्दन! आप जितना धन दान करना चाहें, करें। आप मेरे राज्य और प्राणोंके भी ईश्वर हैं' ।। १० ।। ब्रह्मदेयाग्रहारांश्च पुत्राणामौर्ध्वदेहिकम् । इतो रत्नानि गाश्चैव दासीदासमजाविकम् ॥ ११ ॥ आनयित्वा कुरुश्रेष्ठो ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छतु । 'ब्राह्मणोंको माफी जमीन दीजिये और पुत्रोंका श्राद्ध कीजिये।' युधिष्ठिरने यह भी कहा है कि 'महाराज धृतराष्ट्र मेरे यहाँसे नाना प्रकारके रत्न, गौएँ, दास, दासियाँ और भेड़-बकरे मँगवाकर ब्राह्मणोंको दान करें ।। ११ १/२ ।। दीनान्धकृपणेभ्यश्च तत्र तत्र नृपाज्ञया ॥ १२ ॥ बह्वन्नरसपानाढ्याः सभा विदुर कारय । गवां निपानान्यन्यच्च विविधं पुण्यकं कुरु ॥ १३ ॥ 'विदुरजी! आप राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञासे दीनों, अन्धों और कंगालोंके लिये भिन्न-भिन्न स्थानोंमें प्रचुर अन्न, रस और पीनेयोग्य पदार्थोंसे भरी हुई अनेक धर्मशालाएँ बनवाइये तथा गौओंके पानी पीनेके लिये बहुत-से पौंसलोंका निर्माण कीजिये। साथ ही दूसरे भी विविध प्रकारके पुण्य कीजिये ।। १२-१३ ।। इति मामब्रवीद् राजा पार्थश्चैव धनंजयः । यदत्रानन्तरं कार्यं तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १४ ॥ 'इस प्रकार राजा युधिष्ठिर और अर्जुनने मुझसे बार-बार कहा है। अब इसके बाद जो कार्य करना हो, उसे आप बताइये' ।। १४ ।। इत्युक्ते विदुरेणाथ धृतराष्ट्रोऽभिनन्द्य तान् । मनश्चक्रे महादाने कार्तिकां जनमेजय ॥ १५ ॥

जनमेजय! विदुरके ऐसा कहनेपर धृतराष्ट्रने पाण्डवोंकी बड़ी प्रशंसा की और कार्तिककी तिथियोंमें बहुत बड़ा दान करनेका निश्चय किया॥ १५॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि विदुरवाक्ये त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें विदुरका वाक्यविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३॥

अध्याय (पृष्ठ 2313)

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चतुर्दशोऽध्यायः

राजा धृतराष्ट्रके द्वारा मृत व्यक्तियोंके लिये श्राद्ध एवं विशाल दान-यज्ञका अनुष्ठान

वैशम्पायन उवाच

विदुरेणैवमुक्तस्तु धृतराष्ट्रो जनाधिपः ।
प्रीतिमानभवद् राजन् राज्ञो जिष्णोश्च कर्मणि ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज जनमेजय! विदुरके ऐसा कहनेपर राजा धृतराष्ट्र युधिष्ठिर और अर्जुनके कार्यसे बहुत प्रसन्न हुए ॥ १ ॥

ततोऽभिरूपान् भीष्माय ब्राह्मणानृषिसत्तमान् ।
पुत्रार्थे सुहृदश्चैव स समीक्ष्य सहस्रशः ॥ २ ॥
कारयित्वान्नपानानि यानान्याच्छादनानि च ।
सुवर्णमणिरत्नानि दासीदासमजाविकम् ॥ ३ ॥
कम्बलानि च रत्नानि ग्रामान् क्षेत्रं तथा धनम् ।
सालङ्कारान् गजानश्वान् कन्याश्चैव वरस्त्रियः ॥ ४ ॥

तदनन्तर उन्होंने भीष्मजी तथा अपने पुत्रोंके श्राद्धके लिये सुयोग्य एवं श्रेष्ठ ब्रह्मर्षियों तथा सहस्रों सुहृदोंको निमन्त्रित किया। निमन्त्रित करके उनके लिये अन्न, पान, सवारी, ओढ़नेके वस्त्र, सुवर्ण, मणि, रत्न, दास-दासी, भेड़-बकरे, कम्बल, उत्तम-उत्तम रत्न, ग्राम, खेत, धन, आभूषणोंसे विभूषित हाथी और घोड़े तथा सुन्दरी कन्याएँ एकत्र कीं ॥ २—४ ॥

उद्दिश्योद्दिश्य सर्वेभ्यो ददौ स नृपसत्तमः ।
द्रोणं संकीर्त्य भीष्मं च सोमदत्तं च बाह्लिकम् ॥ ५ ॥
दुर्योधनं च राजानं पुत्रांश्चैव पृथक् पृथक् ।
जयद्रथपुरोगांश्च सुहृदश्चापि सर्वशः ॥ ६ ॥

तत्पश्चात् उन नृपश्रेष्ठने सम्पूर्ण मृत व्यक्तियोंके उद्देश्यसे एक-एकका नाम लेकर उपर्युक्त वस्तुओंका दान किया। द्रोण, भीष्म, सोमदत्त, बाह्लिक, राजा दुर्योधन तथा अन्य पुत्रोंका और जयद्रथ आदि सभी सगे-सम्बन्धियोंका नामोच्चारण करके उन सबके निमित्त पृथक्-पृथक् दान किया ॥ ५-६ ॥

स श्राद्धयज्ञो ववृते बहुशो धनदक्षिणः ।
अनेकधनरत्नौघो युधिष्ठिरमते तदा ॥ ७ ॥

वह श्राद्धयज्ञ युधिष्ठिरकी सम्मतिके अनुसार बहुत-से धनकी दक्षिणासे सुशोभित हुआ। उसमें नाना प्रकारके धन और रत्नोंकी राशियाँ लुटायी गयीं ॥ ७ ॥

अनिशं यत्र पुरुषा गणका लेखकास्तदा ।
युधिष्ठिरस्य वचनादपृच्छन्त स्म तं नृपम् ॥ ८ ॥
आज्ञापय किमेतेभ्यः प्रदायं दीयतामिति ।
तदुपस्थितमेवात्र वचनान्ते ददुस्तदा ॥ ९ ॥
धर्मराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे हिसाब लगाने और लिखनेवाले बहुतेरे कार्यकर्ता वहाँ निरन्तर उपस्थित रहकर धृतराष्ट्रसे पूछते रहते थे कि बताइये, इन याचकोंको क्या दिया जाय? यहाँ सब सामग्री उपस्थित ही है। धृतराष्ट्र ज्यों ही कहते त्यों ही उतना धन उन याचकोंको वे कर्मचारी दे देते थे ॥ ८-९ ॥

शतदेये दशशतं सहस्रे चायुतं तथा ।
दीयते वचनाद् राज्ञः कुन्तीपुत्रस्य धीमतः ॥ १० ॥
बुद्धिमान् कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके आदेशसे जहाँ सौ देना था, वहाँ हजार दिया गया और हजारकी जगह दस हजार बाँटा गया है ॥ १० ॥

एवं स वसुधाराभिर्वर्षमाणो नृपाम्बुदः ।
तर्पयामास विप्रांस्तान् वर्षन् सस्यमिवाम्बुदः ॥ ११ ॥
जिस प्रकार मेघ पानीकी धारा बहाकर खेतीको हरी-भरी कर देता है, उसी प्रकार राजा धृतराष्ट्ररूपी मेघने धनरूपी वारिधाराकी वर्षा करके समस्त ब्राह्मणरूपी खेतीको तृप्त एवं हरी-भरी कर दिया ॥ ११ ॥

ततोऽनन्तरमेवात्र सर्ववर्णान् महामते ।
अन्नपानरसौघेन प्लावयामास पार्थिवः ॥ १२ ॥
महामते! तदनन्तर सभी वर्णके लोगोंको भाँति-भाँतिके भोजन और पीनेयोग्य रस प्रदान करके राजाने उन सबको संतुष्ट कर दिया ॥ १२ ॥

स वस्त्रधनरत्नौघो मृदङ्गनिनदो महान् ।
गवाश्वमकरावर्तो नानारत्नमहाकरः ॥ १३ ॥
ग्रामाग्रहारद्वीपाढ्यो मणिहेमजलार्णवः ।
जगत् सम्प्लावयामास धृतराष्ट्रोऽपोद्धतः ॥ १४ ॥
वह दानयज्ञ एक उमड़ते हुए महासागरके समान जान पड़ता था। वस्त्र, धन और रत्न—ये ही उसके प्रवाह थे। मृदंगोंकी ध्वनि उस समुद्रकी गर्जना थी। उसका स्वरूप विशाल था। गाय, बैल और घोड़े उसमें घड़ियालों और भँवरोंके समान जान पड़ते थे। नाना प्रकारके रत्नोंका वह महान् आकर बना हुआ था। दानमें दिये जानेवाले गाँव और माफी भूमि—ये ही उस समुद्रके द्वीप थे। मणि और सुवर्णमय जलसे वह लबालब भरा था और

धृतराष्ट्ररूपी पूर्ण चन्द्रमाको देखकर उसमें ज्वार-सा उठ गया था। इस प्रकार उस दान-सिन्धुने सम्पूर्ण जगत्को आप्लावित कर दिया था॥ १३-१४॥

एवं स पुत्रपौत्राणां पितृणामात्मनस्तथा।
गान्धार्याश्च महाराज प्रददावौर्ध्वदेहिकम्॥ १५॥
महाराज! इस प्रकार उन्होंने पुत्रों, पौत्रों और पितरोंका तथा अपना एवं गान्धारीका भी श्राद्ध किया॥

परिश्रान्तो यदासीत् स ददद् दानान्यनेकशः।
निवर्तयामास तदा दानयज्ञं नराधिपः॥ १६॥
जब अनेक प्रकारके दान देते-देते राजा धृतराष्ट्र बहुत थक गये, तब उन्होंने उस दान-यज्ञको बंद किया॥

एवं स राजा कौरव्य चक्रे दानमहाक्रतुम्।
नटनर्तकलास्याढ्यं बह्वन्नरसदक्षिणम्॥ १७॥
कुरुनन्दन! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्रने दान नामक महान् यज्ञका अनुष्ठान किया। उसमें प्रचुर अन्न, रस एवं असंख्य दक्षिणाका दान हुआ। उस उत्सवमें नटों और नर्तकोंके नाच-गानका भी आयोजन किया गया था॥ १७॥

दशाहमेवं दानानि दत्त्वा राजाम्बिकासुतः।
बभूव पुत्रपौत्राणामनृणो भरतर्षभ॥ १८॥
भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार लगातार दस दिनोंतक दान देकर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र पुत्रों और पौत्रोंके ऋणसे मुक्त हो गये॥ १८॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि दानयज्ञे चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें दानयज्ञविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४॥

अध्याय (पृष्ठ 2316)

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पञ्चदशोऽध्यायः

गान्धारीसहित धृतराष्ट्रका वनको प्रस्थान

वैशम्पायन उवाच

ततः प्रभाते राजा स धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
आहूय पाण्डवान् वीरान् वनवासे कृतक्षणः ॥ १ ॥
गान्धारीसहितो धीमानभ्यनन्दद् यथाविधि ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर ग्यारहवें दिन प्रातःकाल गान्धारीसहित बुद्धिमान् अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रने वनवासकी तैयारी करके वीर पाण्डवोंको बुलाया और उनका यथावत् अभिनन्दन किया ॥ १ १/२ ॥

कार्तिक्यां कारयित्वेष्टिं ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ॥ २ ॥
अग्निहोत्रं पुरस्कृत्य वल्कलाजिनसंवृतः ।
वधूजनवृतो राजा निर्ययौ भवनात् ततः ॥ ३ ॥
उस दिन कार्तिककी पूर्णिमा थी। उसमें उन्होंने वेदके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंसे यात्राकालोचित इष्टि करवाकर वल्कल और मृगचर्म धारण किये और अग्निहोत्रको आगे करके पुत्र-वधुओंसे घिरे हुए राजा धृतराष्ट्र राजभवनसे बाहर निकले ॥ २-३ ॥

ततः स्त्रियः कौरवपाण्डवानां
याश्चापराः कौरवराजवंश्याः ।
तासां नादः प्रादुरासीत् तदानीं
वैचित्रवीर्ये नृपतौ प्रयाते ॥ ४ ॥
विचित्रवीर्यनन्दन राजा धृतराष्ट्रके इस प्रकार प्रस्थान करनेपर कौरवों और पाण्डवोंकी स्त्रियाँ तथा कौरवराजवंशकी अन्यान्य महिलाएँ सहसा रो पड़ीं। उनके रोनेका महान् शब्द उस समय सब ओर गूँज उठा था ॥

ततो लाजैः सुमनोभिश्च राजा
विचित्राभिस्तद् गृहं पूजयित्वा ।
सम्पूज्यार्थैर्भृत्यवर्गं च सर्वं
ततः समुत्सृज्य ययौ नरेन्द्रः ॥ ५ ॥
घरसे निकलकर राजा धृतराष्ट्रने लावा और भाँति-भाँतिके फूलोंसे उस राजभवनकी पूजा की और समस्त सेवकवर्गका धनसे सत्कार करके उन सबको छोड़कर वे महाराज वहाँसे चल दिये ॥ ५ ॥

ततो राजा प्राञ्जलिर्वेपमानो
युधिष्ठिरः सस्वरं बाष्पकण्ठः ।

विमुच्योच्चैर्महानादं हि साधो क्व यास्यसीत्यपतत् तात भूमौ ॥ ६ ॥ तात! उस समय राजा युधिष्ठिर हाथ जोड़े हुए काँपने लगे। आँसुओंसे उनका गला भर आया। वे जोर-जोरसे महान् आर्तनाद करते हुए फूट-फूटकर रोने लगे। और 'महात्मन्! आप मुझे छोड़कर कहाँ चले जा रहे हैं।' ऐसा कहते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ६ ॥

तथार्जुनस्तीव्रदुःखाभितप्तो मुहुर्मुहुर्निःश्वसन् भारताग्र्यः । युधिष्ठिरं मैवमित्येवमुक्त्वा निगृह्याथो दीनवत् सीदमानः ॥ ७ ॥ उस समय भरतवंशके अग्रगण्य वीर अर्जुन दुःसह दुःखसे संतप्त हो बारंबार लंबी साँस खींचते हुए वहाँ युधिष्ठिरसे बोले—'भैया! आप ऐसे अधीर न हो जाइये।' यों कहकर वे उन्हें दोनों हाथोंसे पकड़कर दीनकी भाँति शिथिल होकर बैठ गये ॥ ७ ॥

वृकोदरः फाल्गुनश्चैव वीरौ माद्रीपुत्रौ विदुरः संजयश्च । वैश्यापुत्रः सहितो गौतमेन धौम्यो विप्राश्चान्वयुर्बाष्पकण्ठाः ॥ ८ ॥ कुन्ती गान्धारीं बद्धनेत्रां व्रजन्तीं स्कन्धासक्तं हस्तमथोद्वहन्ती । राजा गान्धार्याः स्कन्धदेशेऽवसज्य पाणिं ययौ धृतराष्ट्रः प्रतीतः ॥ ९ ॥ तत्पश्चात् युधिष्ठिरसहित भीमसेन, अर्जुन, वीर माद्रीकुमार, विदुर, संजय, वैश्यापुत्र युयुत्सु, कृपाचार्य, धौम्य तथा और भी बहुत-से ब्राह्मण आँसू बहाते हुए गद्गदकण्ठ होकर उनके पीछे-पीछे चले। आगे-आगे कुन्ती अपने कंधेपर रखे हुए गान्धारीके हाथको पकड़े चल रही थीं। उनके पीछे आँखोंपर पट्टी बाँधे गान्धारी थी और राजा धृतराष्ट्र गान्धारीके कंधेपर हाथ रखे निश्चिन्ततापूर्वक चले जा रहे थे ॥ ८-९ ॥

तथा कृष्णा द्रौपदी सात्वती च
बालापत्या चोत्तरा कौरवी च ।
चित्राङ्गदा याश्च काश्चित्स्त्रियोऽन्याः
सार्धं राज्ञा प्रस्थितास्ता वधूभिः ॥ १० ॥

द्रुपदकुमारी कृष्णा, सुभद्रा, गोदमें नन्हा-सा बालक लिये उत्तरा, कौरव्यनागकी पुत्री उलूपी, बभ्रुवाहनकी माता चित्रांगदा तथा अन्य जो कोई भी अन्तःपुरकी स्त्रियाँ थीं; वे सब अपनी बहुओंसहित राजा धृतराष्ट्रके साथ चल पड़ीं ॥ १० ॥
तासां नादो रुदतीनां तदासीद्
राजन् दुःखात् कुररीणामिवोच्चैः ।
ततो निष्पेतुर्ब्राह्मणक्षत्रियाणां
विट्शूद्राणां चैव भार्याः समन्तात् ॥ ११ ॥

राजन्! उस समय वे सब स्त्रियाँ दुःखसे व्याकुल हो कुररियोंके समान उच्चस्वरसे विलाप कर रही थीं। उनके रोनेका कोलाहल सब ओर व्याप्त हो गया था। उसे सुनकर पुरवासी ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रोंकी स्त्रियाँ भी चारों ओरसे घर छोड़कर बाहर निकल आयीं ॥ ११ ॥
तन्निर्याणे दुःखितः पौरवर्गो

गजाह्वये चैव बभूव राजन् ।
यथा पूर्वं गच्छतां पाण्डवानां
द्यूते राजन् कौरवाणां सभायाः ॥ १२ ॥
राजन्! जैसे पूर्वकालमें द्यूतक्रीड़ाके समय कौरवसभासे निकलकर वनवासके लिये पाण्डवोंके प्रस्थान करनेपर हस्तिनापुरके नागरिकोंका समुदाय दुःखमें डूब गया था, उसी प्रकार धृतराष्ट्रके जाते समय भी समस्त पुरवासी शोकसे संतप्त हो उठे थे ॥ १२ ॥
या नापश्यंश्चन्द्रमसं न सूर्यं
रामाः कदाचिदपि तस्मिन् नरेन्द्रे ।
महावनं गच्छति कौरवेन्द्रे
शोकेनार्ता राजमार्गं प्रपेदुः ॥ १३ ॥
रनिवासकी जिन रमणियोंने कभी बाहर आकर सूर्य और चन्द्रमाको भी नहीं देखा था, वे ही कौरवराज धृतराष्ट्रके महावनके लिये प्रस्थान करते समय शोकसे व्याकुल होकर खुली सड़कपर आ गयी थीं ॥ १३ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रनिर्याणे
पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रका नगरसे निकलनाविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2320)

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षोडशोऽध्यायः

धृतराष्ट्रका पुरवासियोंको लौटाना और पाण्डवोंके अनुरोध करनेपर भी कुन्तीका वनमें जानेसे न रुकना

वैशम्पायन उवाच

ततः प्रासादहर्म्येषु वसुधायां च पार्थिव ।
नारीणां च नराणां च निःस्वनः सुमहानभूत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—पृथ्वीनाथ! तदनन्तर महलों और अट्टालिकाओंमें तथा पृथ्वीपर भी रोते हुए नर-नारियोंका महान् कोलाहल छा गया ॥ १ ॥

स राजा राजमार्गेण नृनारीसंकुलेन च ।
कथंचिन्निर्ययौ धीमान् वेपमानः कृताञ्जलिः ॥ २ ॥
सारी सड़क पुरुषों और स्त्रियोंकी भीड़से भरी हुई थी। उसपर चलते हुए बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्र बड़ी कठिनाईसे आगे बढ़ पाते थे। उनके दोनों हाथ जुड़े हुए थे और शरीर काँप रहा था ॥ २ ॥

स वर्द्धमानद्वारेण निर्ययौ गजसाह्वयात् ।
विसर्जयामास च तं जनौघं स मुहुर्मुहुः ॥ ३ ॥
राजा धृतराष्ट्र वर्धमान नामक द्वारसे होते हुए हस्तिनापुरसे बाहर निकले। वहाँ पहुँचकर उन्होंने बारंबार आग्रह करके अपने साथ आये हुए जनसमूहको विदा किया ॥ ३ ॥

वनं गन्तुं च विदुरो राज्ञा सह कृतक्षणः ।
संजयश्च महामात्रः सूतो गावलगणिस्तथा ॥ ४ ॥
विदुर और गवलगणकुमार महामात्र सूत संजयने राजाके साथ ही वनमें जानेका निश्चय कर लिया था ॥ ४ ॥

कृपं निवर्तयामास युयुत्सुं च महारथम् ।
धृतराष्ट्रो महीपालः परिदाप्य युधिष्ठिरे ॥ ५ ॥
महाराज धृतराष्ट्रने कृपाचार्य और महारथी युयुत्सुको युधिष्ठिरके हाथों सौंपकर लौटाया ॥ ५ ॥

निवृत्ते पौरवर्गे च राजा सान्तःपुरस्तदा ।
धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातो निवर्तितुमियेष ह ॥ ६ ॥
पुरवासियोंके लौट जानेपर अन्तःपुरकी रानियोंसहित राजा युधिष्ठिरने धृतराष्ट्रकी आज्ञा लेकर लौट जानेका विचार किया ॥ ६ ॥

सोऽब्रवीन्मातरं कुन्तीं वनं तमनुजग्मुषीम् । अहं राजानमन्विष्ये भवती विनिवर्तताम् ॥ ७ ॥ वधूपरिवृता राज्ञि नगरं गन्तुमर्हसि । राजा यात्वेष धर्मात्मा तापस्ये कृतनिश्चयः ॥ ८ ॥ उस समय उन्होंने वनकी ओर जाती हुई अपनी माता कुन्तीसे कहा—'रानी मा! आप अपनी पुत्र-वधुओंके साथ लौटिये, नगरको जाइये। मैं राजाके पीछे-पीछे जाऊँगा; क्योंकि ये धर्मात्मा नरेश तपस्याके लिये निश्चय करके वनमें जा रहे हैं, अतः इन्हें जाने दीजिये' ॥ इत्युक्ता धर्मराजेन बाष्पव्याकुललोचना । जगामैव तदा कुन्ती गान्धारीं परिगृह्य ह ॥ ९ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर कुन्तीके नेत्रोंमें आँसू भर आया तो भी वे गान्धारीका हाथ पकड़े चलती ही गयीं ॥ ९ ॥

कुन्त्युवाच सहदेवे महाराज माप्रसादं कृथाः क्वचित् । एष मामनुरक्तो हि राजंस्त्ववां चैव सर्वदा ॥ १० ॥ जाते-जाते ही कुन्तीने कहा—महाराज! तुम सहदेवपर कभी अप्रसन्न न होना। राजन्! यह सदा मेरे और तुम्हारे प्रति भक्ति रखता आया है ॥ १० ॥ कर्णं स्मरेथाः सततं संग्रामेष्वपलायिनम् । अवकीर्णो हि समरे वीरो दुष्प्रज्ञया तदा ॥ ११ ॥ संग्राममें कभी पीठ न दिखानेवाले अपने भाई कर्णको भी सदा याद रखना, क्योंकि मेरी ही दुर्बुद्धिके कारण वह वीर युद्धमें मारा गया ॥ ११ ॥ आयसं हृदयं नूनं मन्दाया मम पुत्रक । यत् सूर्यजमपश्यन्त्याः शतधा न विदीर्यते ॥ १२ ॥ बेटा! मुझ अभागिनीका हृदय निश्चय ही लोहेका बना हुआ है; तभी तो आज सूर्यनन्दन कर्णको न देखकर भी इसके सैकड़ों टुकड़े नहीं हो जाते ॥ १२ ॥ एवं गते तु किं शक्यं मया कर्तुमरिंदम । मम दोषोऽयमत्यर्थं ख्यापितो यन्न सूर्यजः ॥ १३ ॥ शत्रुदमन! ऐसी दशामें मैं क्या कर सकती हूँ। यह मेरा ही महान् दोष है कि मैंने सूर्यपुत्र कर्णका तुमलोगोंको परिचय नहीं दिया ॥ १३ ॥ तन्निमित्तं महाबाहो दानं दद्यास्त्वमुत्तमम् । सदैव भ्रातृभिः सार्धं सूर्यजस्यारिमर्दन ॥ १४ ॥ महाबाहो! शत्रुमर्दन! तुम अपने भाइयोंके साथ सदा ही सूर्यपुत्र कर्णके लिये भी उत्तम दान देते रहना ॥ १४ ॥