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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

ब्राह्मणोंकी महिमाका वर्णन

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एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

ब्राह्मणोंकी महिमाका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

के पूज्याः के नमस्कार्याः कथं वर्तेत केषु च ।
किमाचारः कीदृशेषु पितामह न रिष्यते ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! संसारमें कौन मनुष्य पूज्य हैं? किनको नमस्कार करना चाहिये? किनके साथ कैसा बर्ताव करना उचित है तथा कैसे लोगोंके साथ किस प्रकारका आचरण किया जाय तो वह हानिकर नहीं होता? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

ब्राह्मणानां परिभव सादयेदपि देवताः ।
ब्राह्मणांस्तु नमस्कृत्य युधिष्ठिर न रिष्यते ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! ब्राह्मणोंका अपमान देवताओंको भी दुःखमें डाल सकता है। परंतु यदि ब्राह्मणोंको नमस्कार करके उनके साथ विनयपूर्ण बर्ताव किया जाय तो कभी कोई हानि नहीं होती ॥ २ ॥

ते पूज्यास्ते नमस्कार्या वर्तेथास्तेषु पुत्रवत् ।
ते हि लोकानिमान् सर्वान् धारयन्ति मनीषिणः ॥ ३ ॥
अतः ब्राह्मणोंकी पूजा करे। ब्राह्मणोंको नमस्कार करे। उनके प्रति वैसा ही बर्ताव करे, जैसा सुयोग्य पुत्र अपने पिताके प्रति करता है; क्योंकि मनीषी ब्राह्मण इन सब लोकोंको धारण करते हैं ॥ ३ ॥

ब्राह्मणाः सर्वलोकानां महान्तो धर्मसेतवः ।
धनत्यागाभिरामाश्च वाक्संयमरताश्च ये ॥ ४ ॥
ब्राह्मण समस्त जगत्की धर्ममर्यादाका संरक्षण करनेवाले सेतुके समान हैं। वे धनका त्याग करके प्रसन्न होते हैं और वाणीका संयम रखते हैं ॥ ४ ॥

रमणीयाश्च भूतानां निधानं च धृतव्रताः ।
प्रणेतारश्च लोकानां शास्त्राणां च यशस्विनः ॥ ५ ॥
वे समस्त भूतोंके लिये रमणीय, उत्तम निधि, दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले, लोकनायक, शास्त्रोंके निर्माता और परम यशस्वी हैं ॥ ५ ॥

तपो येषां धनं नित्यं वाक् चैव विपुलं बलम् ।
प्रभवश्चैव धर्माणां धर्मज्ञाः सूक्ष्मदर्शिनः ॥ ६ ॥

सदा तपस्या उनका धन और वाणी उनका महान् बल है। वे धर्मोंकी उत्पत्तिके कारण, धर्मके ज्ञाता और सूक्ष्मदर्शी हैं॥ ६॥ धर्मकामाः स्थिता धर्मे सुकृतैर्धर्मसेतवः । यान् समाश्रित्य जीवन्ति प्रजाः सर्वाश्चतुर्विधाः ॥ ७ ॥ वे धर्मकी ही इच्छा रखनेवाले, पुण्यकर्मोंद्वारा धर्ममें ही स्थित रहनेवाले और धर्मके सेतु हैं। उन्हींका आश्रय लेकर चारों प्रकारकी सारी प्रजा जीवन धारण करती है॥ ७॥ पन्थानः सर्वनेतारो यज्ञवाहाः सनातनाः । पितृपैतामहीं गुर्वीमुद्वहन्ति धुरं सदा ॥ ८ ॥ ब्राह्मण ही सबके पथप्रदर्शक, नेता और सनातन यज्ञ-निर्वाहक हैं। वे बाप-दादोंकी चलायी हुई भारी धर्म-मर्यादाका भार सदा वहन करते हैं॥ ८॥ धुरि ये नावसीदन्ति विषये सद्गवा इव । पितृदेवातिथिमुखा हव्यकव्याग्रभोजिनः ॥ ९ ॥ जैसे अच्छे बैल बोझ ढोनेमें शिथिलता नहीं दिखाते, उसी प्रकार वे धर्मका भार वहन करनेमें कष्टका अनुभव नहीं करते हैं। वे ही देवता, पितर और अतिथियोंके मुख तथा हव्य-कव्यमें प्रथम भोजनके अधिकारी हैं॥ ९॥ भोजनादेव लोकांस्त्रींस्त्रायन्ते महतो भयात् । दीपः सर्वस्य लोकस्य चक्षुश्चक्षुष्मतामपि ॥ १० ॥ ब्राह्मण भोजनमात्र करके तीनों लोकोंकी महान् भयसे रक्षा करते हैं। वे सम्पूर्ण जगत्के लिये दीपकी भाँति प्रकाशक तथा नेत्रवालोंके भी नेत्र हैं॥ १०॥ सर्वशिक्षा श्रुतिधना निपुणा मोक्षदर्शिनः । गतिज्ञाः सर्वभूतानामध्यात्मगतिचिन्तकाः ॥ ११ ॥ ब्राह्मण सबको सीख देनेवाले हैं। वेद ही उनका धन है। वे शास्त्रज्ञानमें कुशल, मोक्षदर्शी, समस्त भूतोंकी गतिके ज्ञाता और अध्यात्म-तत्त्वका चिन्तन करनेवाले हैं॥ ११॥ आदिमध्यावसानानां ज्ञातारश्छिन्नसंशयाः । परावरविशेषज्ञा गन्तारः परमां गतिम् ॥ १२ ॥ ब्राह्मण आदि, मध्य और अन्तके ज्ञाता, संशयरहित, भूत-भविष्यका विशेष ज्ञान रखनेवाले तथा परम गतिको जानने और पानेवाले हैं॥ १२॥ विमुक्ता धूतपाप्मानो निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः । मानार्हा मानिता नित्यं ज्ञानविद्भिर्महात्मभिः ॥ १३ ॥ श्रेष्ठ ब्राह्मण सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त और निष्पाप हैं। उनके चित्तपर द्वन्द्वोंका प्रभाव नहीं पड़ता। वे सब प्रकारके परिग्रहका त्याग करनेवाले और सम्मान पानेके योग्य हैं। ज्ञानी महात्मा उन्हें सदा ही आदर देते हैं॥ १३॥

चन्दने मलपङ्के च भोजनेऽभोजने समाः । समं येषां दुकूलं च तथा क्षौमाजिनानि च ॥ १४ ॥ वे चन्दन और मलकी कीचड़में, भोजन और उपवासमें समान दृष्टि रखते हैं। उनके लिये साधारण वस्त्र, रेशमी वस्त्र और मृगछाला समान हैं ॥ १४ ॥

तिष्ठेयुरप्यभुञ्जाना बहूनि दिवसान्यपि । शोषयेयुश्च गात्राणि स्वाध्यायैः संयतेन्द्रियाः ॥ १५ ॥ वे बहुत दिनोंतक बिना खाये रह सकते हैं और अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर स्वाध्याय करते हुए शरीरको सुखा सकते हैं ॥ १५ ॥

अदैवं दैवतं कुर्युर्दैवतं चाप्यदैवतम् । लोकानन्यान् सृजेयुस्ते लोकपालांश्च कोपिताः ॥ १६ ॥ ब्राह्मण अपने तपोबलसे जो देवता नहीं है, उसे भी देवता बना सकते हैं। यदि वे क्रोधमें भर जायँ तो देवताओंको भी देवत्वसे भ्रष्ट कर सकते हैं। दूसरे-दूसरे लोक और लोकपालोंकी रचना कर सकते हैं ॥ १६ ॥

अपेयः सागरो येषामपि शापान्महात्मनाम् । येषां कोपाग्निरद्यापि दण्डके नोपशाम्यति ॥ १७ ॥ उन्हीं महात्माओंके शापसे समुद्रका पानी पीनेयोग्य नहीं रहा। उनकी क्रोधाग्नि दण्डकारण्यमें आजतक शान्त नहीं हुई ॥ १७ ॥

देवानापि ये देवाः कारणं कारणस्य च । प्रमाणस्य प्रमाणं च कस्तानभिभवेद् बुधः ॥ १८ ॥ वे देवताओंके भी देवता, कारणके भी कारण और प्रमाणके भी प्रमाण हैं। भला कौन मनुष्य बुद्धिमान् होकर भी ब्राह्मणोंका अपमान करेगा ॥ १८ ॥

येषां वृद्धश्च बालश्च सर्वः सम्मानमर्हति । तपोविद्याविशेषात्तु मानयन्ति परस्परम् ॥ १९ ॥ ब्राह्मणोंमें कोई बूढ़े हों या बालक सभी सम्मानके योग्य हैं। ब्राह्मणलोग आपसमें तप और विद्याकी अधिकता देखकर एक-दूसरेका सम्मान करते हैं ॥ १९ ॥

अविद्वान् ब्राह्मणो देवः पात्रं वै पावनं महत् । विद्वान् भूयस्तरो देवः पूर्णसागरसंनिभः ॥ २० ॥ विद्याहीन ब्राह्मण भी देवताके समान और परम पवित्र पात्र माना गया है। फिर जो विद्वान् है उसके लिये तो कहना ही क्या है। वह महान् देवताके समान है और भरे हुए महासागरके समान सद्गुण-सम्पन्न है ॥ २० ॥

अविद्वांश्चैव विद्वांश्च ब्राह्मणो दैवतं महत् । प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्दैवतं महत् ॥ २१ ॥

ब्राह्मण विद्वान् हो या अविद्वान् इस भूतलका महान् देवता है। जैसे अग्नि पञ्चभू-संस्कारपूर्वक स्थापित हो या न हो, वह महान् देवता ही है ॥ २१ ॥
श्मशाने ह्यपि तेजस्वी पावको नैव दुष्यति ।
हविर्यज्ञे च विधिवद् गृह एवातिशोभते ॥ २२ ॥
तेजस्वी अग्निदेव श्मशानमें हों तो भी दूषित नहीं होते। विधिवत् हविष्यसे सम्पादित होनेवाले यज्ञमें तथा घरमें भी उनकी अधिकाधिक शोभा होती है ॥ २२ ॥
एवं यद्यप्यनिष्टेषु वर्तते सर्वकर्मसु ।
सर्वथा ब्राह्मणो मान्यो दैवतं विद्धि तत्परम् ॥ २३ ॥
इस प्रकार यद्यपि ब्राह्मण सब प्रकारके अनिष्ट कर्मोंमें लगा हो तो भी वह सर्वथा माननीय है। उसे परम देवता समझो ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि
ब्राह्मणप्रशंसायामेकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ब्राह्मणकी प्रशंसाविषयक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५१ ॥

कार्तवीर्य अर्जुनको दत्तात्रेयजीसे चार वरदान प्राप्त होनेका एवं उनमें अभिमानकी उत्पत्तिका वर्णन तथा ब्राह्मणोंकी महिमाके विषयमें कार्तवीर्य अर्जुन और

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द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

कार्तवीर्य अर्जुनको दत्तात्रेयजीसे चार वरदान प्राप्त होनेका एवं उनमें अभिमानकी उत्पत्तिका वर्णन तथा ब्राह्मणोंकी महिमाके विषयमें कार्तवीर्य अर्जुन और वायुदेवताके संवादका उल्लेख

युधिष्ठिर उवाच

कां तु ब्राह्मणपूजायां व्युष्टिं दृष्ट्वा जनाधिप ।
कं वा कर्मोदयं मत्वा तानर्चसि महामते ॥ १ ॥

**युधिष्ठिरने कहा—**जनेश्वर! आप कौन-सा फल देखकर ब्राह्मणपूजामें लगे रहते हैं? महामते! अथवा किस कर्मका उदय सोचकर आप उन ब्राह्मणोंकी पूजा-अर्चा करते हैं? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
पवनस्य च संवादमर्जुनस्य च भारत ॥ २ ॥

**भीष्मजीने कहा—**भरतनन्दन! इस विषयमें विज्ञपुरुष कार्तवीर्य अर्जुन और वायुदेवताके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २ ॥

सहस्रभुजभृच्छ्रीमान् कार्तवीर्योऽभवत् प्रभुः ।
अस्य लोकस्य सर्वस्य माहिष्मत्यां महाबलः ॥ ३ ॥
स तु रत्नाकरवतीं सद्वीपां सागराम्बराम् ।
शशास पृथिवीं सर्वां हैहयः सत्यविक्रमः ॥ ४ ॥

**पूर्वकालकी बात है—**माहिष्मती नगरीमें सहस्र-भुजधारी परम कान्तिमान् कार्तवीर्य अर्जुन नामवाला एक हैहयवंशी राजा समस्त भूमण्डलका शासन करता था। वह महान् बलवान् और सत्यपराक्रमी था। इस लोकमें सर्वत्र उसीका आधिपत्य था ॥ ३-४ ॥

स्ववित्तं तेन दत्तं तु दत्तात्रेयाय कारणे ।
क्षत्रधर्मं पुरस्कृत्य विनयं श्रुतमेव च ॥ ५ ॥
आराधयामास च तं कृतवीर्यात्मजो मुनिम् ।

एक समय कृतवीर्यकुमार अर्जुनने क्षत्रिय-धर्मको सामने रखते हुए विनय और शास्त्रज्ञानके अनुसार बहुत दिनोंतक मुनिवर दत्तात्रेयकी आराधना की तथा किसी कारणवश अपना सारा धन उनकी सेवामें समर्पित कर दिया ॥ ५ ½ ॥

न्यमन्त्रयत संतुष्टो द्विजश्चैनं वरैस्त्रिभिः ।। ६ ।।
स वरैश्छन्दितस्तेन नृपो वचनमब्रवीत् ।
सहस्रबाहुर्भूयां वै चमूमध्ये गृहेऽन्यथा ।। ७ ।।
मम बाहुसहस्रं तु पश्यतां सैनिका रणे ।
विक्रमेण महीं कृत्स्नां जयेयं संशितव्रत ।। ८ ।।
तां च धर्मेण सम्प्राप्य पालयेयमतन्द्रितः ।
चतुर्थं तु वरं याचे त्वामहं द्विजसत्तम ।। ९ ।।
तं ममानुग्रहकृते दातुमर्हस्यनिन्दित ।
अनुशासन्तु मां सन्तो मिथ्योद्वृत्तं त्वदाश्रयम् ।। १० ।।

विप्रवर दत्तात्रेय उसके ऊपर बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने उसे तीन वर माँगनेकी आज्ञा दी। उनके द्वारा वर माँगनेकी आज्ञा मिलनेपर राजाने कहा—'भगवन्! मैं युद्धमें तो हजार भुजाओंसे युक्त रहूँ; किन्तु घरपर मेरी दो ही बाँहें रहें। रणभूमिमें सभी सैनिक मेरी एक हजार भुजाएँ देखें। कठोर व्रतका पालन करनेवाले गुरुदेव! मैं अपने पराक्रमसे सम्पूर्ण पृथ्वीको जीत लूँ। इस प्रकार पृथ्वीको धर्मके अनुसार प्राप्तकर मैं आलस्यरहित हो उसका पालन करूँ। द्विजश्रेष्ठ! इन तीन वरोंके सिवा एक चौथा वर भी मैं आपसे माँगता हूँ। अनिन्द्य महर्षे! मुझपर कृपा करनेके लिये आप वह वर भी अवश्य प्रदान करें। मैं आपका आश्रित भक्त हूँ। यदि कभी मैं सन्मार्गका परित्याग करके असत्य मार्गका आश्रय लूँ तो श्रेष्ठ पुरुष मुझे राहपर लानेके लिये शिक्षा दें' ।। ६—१० ।।

अध्याय (पृष्ठ 1469)

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भगवान् दत्तात्रेयकी कार्तवीर्यपर कृपा

इत्युक्तः स द्विजः प्राह तथास्त्विति नराधिपम् । एवं सम्भवंस्तस्य वरास्ते दीप्ततेजसः ॥ ११ ॥ उसके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर दत्तात्रेयजीने उस नरेशसे कहा—‘तथास्तु—ऐसा ही हो।’ फिर तो उस तेजस्वी राजाके लिये वे सभी वर उसी रूपमें सफल हुए ॥ ११ ॥

ततः स रथमास्थाय ज्वलनार्कसमद्युतिम् । अब्रवीद् वीर्यसम्मोहात् को वास्ति सदृशो मम ॥ १२ ॥ धैर्येवीर्येयशःशौर्यैविक्रमेणौजसापि वा । तदनन्तर राजा कार्तवीर्य अर्जुन सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी रथपर बैठकर (सम्पूर्ण पृथ्वीपर विजय पानेके पश्चात्) बलके अभिमानसे मोहित हो कहने लगा—‘धैर्य, वीर्य, यश, शूरता, पराक्रम और ओजमें मेरे समान कौन है?’ ॥ १२ १/२ ॥

तद्वाक्यान्ते चान्तरिक्षे वागुवाचाशरीरिणी ॥ १३ ॥ न त्वं मूढ विजानीषे ब्राह्मणं क्षत्रियाद् वरम् । सहितो ब्राह्मणेनेह क्षत्रियः शास्ति वै प्रजाः ॥ १४ ॥ उसकी यह बात पूरी होते ही आकाशवाणी हुई—‘मूर्ख! तुझे पता नहीं है कि ब्राह्मण क्षत्रियसे भी श्रेष्ठ है। ब्राह्मणकी सहायतासे ही क्षत्रिय इस लोकमें प्रजाकी रक्षा करता है’ ॥ १३-१४ ॥

अर्जुन उवाच

कुर्यां भूतानि तुष्टोऽहं क्रुद्धो नाशं तथानये । कर्मणा मनसा वाचा न मत्तोऽस्ति वरो द्विजः ॥ १५ ॥ कार्तवीर्य अर्जुनने कहा—मैं प्रसन्न होनेपर प्राणियोंकी सृष्टि कर सकता हूँ और कुपित होनेपर उनका नाश कर सकता हूँ। मन, वाणी और क्रियाद्वारा कोई भी ब्राह्मण मुझसे श्रेष्ठ नहीं है ॥ १५ ॥

पूर्वो ब्रह्मोत्तरो वादो द्वितीयः क्षत्रियोत्तरः । त्वयोक्तौ हेतुयुक्तौ तौ विशेषस्तत्र दृश्यते ॥ १६ ॥ इस जगत्‌में ब्राह्मणकी ही प्रधानता है—यह कथन पूर्वपक्ष है, क्षत्रियकी श्रेष्ठता ही उत्तर या सिद्धान्तपक्ष है। आपने ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनोंको प्रजापालनरूपी हेतुसे युक्त बताया है; परंतु उनमें यह अन्तर देखा जाता है ॥ १६ ॥

ब्राह्मणाः संश्रिताः क्षत्रं न क्षत्रं ब्राह्मणाश्रितम् । श्रिता ब्रह्मोपधा विप्राः खादन्ति क्षत्रियान् भुवि ॥ १७ ॥ ब्राह्मण क्षत्रियोंके आश्रित रहकर जीविका चलाते हैं, किंतु क्षत्रिय कभी ब्राह्मणके आश्रयमें नहीं रहता। वेदोंके अध्ययनाध्यापनके ब्याजसे जीविका चलानेवाले ब्राह्मण इस भूतलपर क्षत्रियोंके ही सहारे भोजन पाते हैं ॥ १७ ॥

क्षत्रियेष्वाश्रितो धर्मः प्रजानां परिपालनम्।
क्षत्राद् वृत्तिर्ब्राह्मणानां तैः कथं ब्राह्मणो वरः ॥ १८ ॥
प्रजापालनरूपी धर्म क्षत्रियोंपर ही अवलम्बित है। क्षत्रियसे ही ब्राह्मणोंको जीविका प्राप्त होती है। फिर ब्राह्मण क्षत्रियसे श्रेष्ठ कैसे हो सकता है? ॥ १८ ॥

सर्वभूतप्रधानांस्तान् भैक्षवृत्तीनहं सदा।
आत्मसम्भावितान् विप्रान् स्थापय्याम्यात्मनो वशे ॥ १९ ॥
आजसे मैं सब प्राणियोंसे श्रेष्ठ कहे जानेवाले, सदा भीख माँगकर जीवन-निर्वाह करनेवाले और अपनेको सबसे उत्तम माननेवाले ब्राह्मणोंको अपने अधीन रखूँगा ॥ १९ ॥

कथितं त्वनयासत्यं गायत्र्या कन्यया दिवि।
विजेष्याम्यवशान् सर्वान् ब्राह्मणांश्चर्मवाससः ॥ २० ॥
न च मां च्यावयेद् राष्ट्रात् त्रिषु लोकेषु कश्चन।
देवो वा मानुषो वापि तस्माज्ज्येष्ठो द्विजादहम् ॥ २१ ॥
आकाशमें स्थित हुई इस गायत्री नामक कन्याने जो ब्राह्मणोंको क्षत्रियोंसे श्रेष्ठ बतलाया है, वह बिलकुल झूठ है। मृगछाला धारण करनेवाले सभी ब्राह्मण प्रायः विवश होते हैं, मैं इन सबको जीत लूँगा। तीनों लोकोंमें कोई भी देवता या मनुष्य ऐसा नहीं है, जो मुझे राज्यसे भ्रष्ट करे। अतः मैं ब्राह्मणसे श्रेष्ठ हूँ ॥ २०-२१ ॥

अद्य ब्रह्मोत्तरं लोकं करिष्ये क्षत्रियोत्तरम्।
न हि मे संयुगे कश्चित् सोढुमुत्सहते बलम् ॥ २२ ॥
संसारमें अबतक ब्राह्मण ही सबसे श्रेष्ठ माने जाते थे, किंतु आजसे मैं क्षत्रियोंकी प्रधानता स्थापित करूँगा। संग्राममें कोई भी मेरे बलको नहीं सह सकता ॥ २२ ॥

अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा वित्रस्ताभून्निशाचरी।
अथैनमन्तरिक्षस्थस्ततो वायुरभाषत ॥ २३ ॥
अर्जुनकी यह बात सुनकर निशाचरी भी भयभीत हो गयी। तदनन्तर अन्तरिक्षमें स्थित हुए वायु देवताने कहा— ॥ २३ ॥

त्यजैनं कलुषं भावं ब्राह्मणेभ्यो नमस्कुरु।
एतेषां कुर्वतः पापं राष्ट्रक्षोभो भविष्यति ॥ २४ ॥
'कार्तवीर्य! तुम इस कलुषित भावको त्याग दो और ब्राह्मणोंको नमस्कार करो। यदि इनकी बुराई करोगे तो तुम्हारे राज्यमें हलचल मच जायगी ॥ २४ ॥

अथवा त्वां महीपाल शमयिष्यन्ति वै द्विजाः।
निरसिष्यन्ति ते राष्ट्राद्धतोत्साहा महाबलाः ॥ २५ ॥
'अथवा महीपाल! महान् शक्तिशाली ब्राह्मण तुम्हें शान्त कर देंगे। यदि तुमने उनके उत्साहमें बाधा डाली तो वे तुम्हें राज्यसे बाहर निकाल देंगे' ॥ २५ ॥

तं राजा कस्त्वमित्याह ततस्तं प्राह मारुतः।

वायुर्वे देवदूतोऽस्मि हितं त्वां प्रब्रवीम्यहम् ॥ २६ ॥
यह बात सुनकर कार्तवीर्यने पूछा—‘महानुभाव! आप कौन हैं?’ तब वायु देवताने उससे कहा—‘राजन्! मैं देवताओंका दूत वायु हूँ और तुम्हें हितकी बात बता रहा हूँ’ ॥ २६ ॥

अर्जुन उवाच
अहो त्वयायं विप्रेषु भक्तिरागः प्रदर्शितः ।
यादृशं पृथिवीभूतं तादृशं ब्रूहि मे द्विजम् ॥ २७ ॥
कार्तवीर्य अर्जुनने कहा— वायुदेव! ऐसी बात कहकर आपने ब्राह्मणोंके प्रति भक्ति और अनुरागका परिचय दिया है। अच्छा आपकी जानकारीमें यदि पृथिवीके समान क्षमाशील ब्राह्मण हो तो ऐसे द्विजको मुझे बताइये ॥ २७ ॥
वायोर्वा सदृशं किंचिद् ब्रूहि त्वं ब्राह्मणोत्तमम् ।
अपां वै सदृशं वह्नेः सूर्यस्य नभसोऽपि वा ॥ २८ ॥
अथवा यदि कोई जल, अग्नि, सूर्य, वायु एवं आकाशके समान श्रेष्ठ ब्राह्मण हो तो उसको भी बताइये ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादे ब्राह्मणमाहात्म्ये द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायुदेवता और अर्जुनके संवादके प्रसंगमें ब्राह्मणोंका माहात्म्यविषयक एक सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५२ ॥

वायुद्वारा उदाहरणसहित ब्राह्मणोंकी महत्ताका वर्णन

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त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

वायुद्वारा उदाहरणसहित ब्राह्मणोंकी महत्ताका वर्णन

वायुरुवाच

शृणु मूढ गुणान् कांश्चिद् ब्राह्मणानां महात्मनाम् ।
ये त्वया कीर्तिता राजंस्तेभ्योऽथ ब्राह्मणो वरः ॥ १ ॥
वायुने कहा— मूढ़! मैं महात्मा ब्राह्मणोंके कुछ गुणोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। राजन्! तुमने पृथ्वी, जल और अग्नि आदि जिन व्यक्तियोंका नाम लिया है, उन सबकी अपेक्षा ब्राह्मण श्रेष्ठ है ॥ १ ॥

त्यक्त्वा महीत्वं भूमीस्तु स्पर्धयाङ्गनृपस्य ह ।
नाशं जगाम तां विप्रो व्यस्तम्भयत कश्यपः ॥ २ ॥
एक समयकी बात है, राजा अंगके साथ स्पर्धा (लाग-डाट) होनेके कारण पृथ्वीकी अधिष्ठात्री देवी अपने लोक-धर्म धारणरूप शक्तिका परित्याग करके अदृश्य हो गयीं। उस समय विप्रवर कश्यपने अपने तपोबलसे इस स्थूल पृथ्वीको थाम रखा था ॥ २ ॥

अजेया ब्राह्मणा राजन् दिवि चेह च नित्यदा ।
अपिबत् तेजसा ह्यापः स्वयमेवाङ्गिराः पुरा ॥ ३ ॥
स ताः पिबन् क्षीरमिव नातृप्यत महामनाः ।
अपूरयन्महौघेन महीं सर्वां च पार्थिव ॥ ४ ॥
राजन्! ब्राह्मण इस मर्त्यलोक और स्वर्गलोकमें भी अजेय हैं। पहलेकी बात है, महामना अंगिरा मुनि जलको दूधकी भाँति पी गये थे। उस समय उन्हें पीनेसे तृप्ति ही नहीं होती थी। अतः पीते-पीते वे अपने तेजसे पृथ्वीका सारा जल पी गये। पृथिवीनाथ! तत्पश्चात् उन्होंने जलका महान् स्रोत बहाकर सम्पूर्ण पृथ्वीको भर दिया ॥ ३-४ ॥

तस्मिन्नहं च क्रुद्धे वै जगत् त्यक्त्वा ततो गतः ।
व्यतिष्ठमग्निहोत्रे च चिरमङ्गिरसो भयात् ॥ ५ ॥
वे ही अंगिरा मुनि एक बार मेरे ऊपर कुपित हो गये थे। उस समय उनके भयसे इस जगत्को त्यागकर मुझे दीर्घकालतक अग्निहोत्रकी अग्निमें निवास करना पड़ा था ॥ ५ ॥

अथ शप्तश्च भगवान् गौतमेन पुरन्दरः ।
अहल्यां कामयानो वै धर्मार्थं च न हिंसितः ॥ ६ ॥
महर्षि गौतमने ऐश्वर्यशाली इन्द्रको अहल्यापर आसक्त होनेके कारण शाप दे दिया था। केवल धर्मकी रक्षाके लिये उनके प्राण नहीं लिये ॥ ६ ॥

तथा समुद्रो नृपते पूर्णो मृष्टस्य वारिणः ।
ब्राह्मणैरभिशप्तश्च बभूव लवणोदकः ॥ ७ ॥

नरेश्वर! समुद्र पहले मीठे जलसे भरा रहता था, परंतु ब्राह्मणोंके शापसे उसका पानी खारा हो गया ॥ ७ ॥

सुवर्णवर्णो निर्धूमः सङ्गतोर्ध्वशिखः कविः । क्रुद्धेनाङ्गिरसा शप्तो गुणैरेतैर्विवर्जितः ॥ ८ ॥ अग्निका रंग पहले सोनेके समान था, उसमेंसे धुआँ नहीं निकलता था और उसकी लपट सदा ऊपर की ओर ही उठती थी, किंतु क्रोधमें भरे हुए अंगिरा ऋषिने उसे शाप दे दिया। इसलिये अब उसमें ये पूर्वोक्त गुण नहीं रह गये ॥ ८ ॥

महत्तश्रूर्णितान् पश्य ये हासन्त महोदधिम् । सुवर्णधारिणा नित्यमवशप्ता द्विजातिना ॥ ९ ॥ देखो, उत्तम (ब्राह्मण) वर्णधारी ब्रह्मर्षि कपिलके शापसे दग्ध हुए सगर पुत्रोंकी, जो यज्ञसम्बन्धी अश्वकी खोज करते हुए यहाँ समुद्रतक आये थे, ये राखके ढेर पड़े हुए हैं ॥ ९ ॥

समो न त्वं द्विजातिभ्यः श्रेयो विद्धि नराधिप । गर्भस्थान् ब्राह्मणान् सम्यङ् नमस्यति किल प्रभुः ॥ १० ॥ राजन्! तुम ब्राह्मणोंकी समानता कदापि नहीं कर सकते। उनसे अपने कल्याणके उपाय जाननेका यत्न करो। राजा गर्भस्थ ब्राह्मणोंको भी भलीभाँति प्रणाम करता है ॥ १० ॥

दण्डकानां महद् राज्यं ब्राह्मणेन विनाशितम् । तालजंघं महाक्षत्रमौर्वेणैकेन नाशितम् ॥ ११ ॥ दण्डकारण्यका विशाल साम्राज्य एक ब्राह्मणने ही नष्ट कर दिया। तालजंघ नामवाले महान् क्षत्रियवंशका अकेले महात्मा और्वने संहार कर डाला ॥ ११ ॥

त्वया च विपुलं राज्यं बलं धर्मं श्रुतं तथा । दत्तात्रेयप्रसादेन प्राप्तं परमदुर्लभम् ॥ १२ ॥ स्वयं तुम्हें भी जो परम दुर्लभ विशाल राज्य, बल, धर्म तथा शास्त्रज्ञानकी प्राप्ति हुई है, वह विप्रवर दत्तात्रेयजीकी कृपासे ही सम्भव हुआ है ॥ १२ ॥

अग्निं त्वं यजसे नित्यं कस्माद् ब्राह्मणमर्जुन । स हि सर्वस्य लोकस्य हव्यवाट् किं न वेत्सि तम् ॥ १३ ॥ अर्जुन! अग्नि भी तो ब्राह्मण ही है। तुम प्रतिदिन उसका यजन क्यों करते हो? क्या तुम नहीं जानते कि अग्नि ही सम्पूर्ण लोकोंके हव्यवाहन (हविष्य पहुँचानेवाले) हैं ॥ १३ ॥

अथवा ब्राह्मणश्रेष्ठमनुभूतानुपालकम् । कर्तारं जीवलोकस्य कस्माज्जानन् विमुह्यसे ॥ १४ ॥ अथवा श्रेष्ठ ब्राह्मण प्रत्येक जीवकी रक्षा और जीव-जगत्‌की सृष्टि करनेवाला है। इस बातको जानते हुए भी तुम क्यों मोहमें पड़े हुए हो ॥ १४ ॥

तथा प्रजापतिर्ब्रह्मा अव्यक्तः प्रभुरव्ययः । येनेदं निखिलं विश्वं जनितं स्थावरं चरम् ॥ १५ ॥ जिन्होंने इस सम्पूर्ण चराचर जगत्की सृष्टि की है, वे अव्यक्तस्वरूप अविनाशी प्रजापति भगवान् ब्रह्माजी भी ब्राह्मण ही हैं ॥ १५ ॥

अण्डजातं तु ब्रह्माणं केचिदिच्छन्त्यपण्डिताः । अण्डाद् भिन्नाद् बभुः शैला दिशोऽम्भःपृथिवी दिवम् ॥ १६ ॥ कुछ मूर्ख मनुष्य ब्रह्माजीको भी अण्डसे उत्पन्न मानते हैं। (उनकी मान्यता है कि) फूटे हुए अण्डसे पर्वत, दिशाएँ, जल, पृथ्वी और स्वर्गकी उत्पत्ति हुई है ॥ १६ ॥

द्रष्टव्यं नैतदेवं हि कथं जायेदजो हि सः । स्मृतमाकाशमण्डं तु तस्माज्जातः पितामहः ॥ १७ ॥ परंतु ऐसा नहीं समझना चाहिये; क्योंकि जो अजन्मा है, वह जन्म कैसे ले सकता है? फिर भी जो उन्हें अण्डज कहा जाता है, उसका अभिप्राय यों समझना चाहिये। महाकाश ही यहाँ 'अण्ड' है, उससे पितामह प्रकट हुए हैं (इसलिये वे 'अण्डज' हैं) ॥ १७ ॥

तिष्ठेत् कथमिति ब्रूहि न किंचिद्धि तदा भवेत् । अहङ्कार इति प्रोक्तः सर्वतेजोगतः प्रभुः ॥ १८ ॥ यदि कहो, 'ब्रह्मा आकाशसे प्रकट हुए हैं तो किस आधारपर ठहरते हैं, यह बताइये; क्योंकि उस समय कोई दूसरा आधार नहीं रहता' तो इसके उत्तरमें निवेदन है कि ब्रह्मा वहाँ अहंकारस्वरूप बताये गये, जो सम्पूर्ण तेजोंमें व्याप्त एवं समर्थ बताये गये हैं ॥ १८ ॥

नास्त्यण्डमस्ति तु ब्रह्मा स राजा लोकभावनः । इत्युक्तः स तदा तूष्णीमभूद् वायुस्ततोऽब्रवीत् ॥ १९ ॥ वास्तवमें 'अण्ड' नामकी कोई वस्तु नहीं है। फिर भी ब्रह्माजीका अस्तित्व है, क्योंकि वे ही जगत्के उत्पादक हैं। उनके ऐसा कहनेपर राजा कार्तवीर्य अर्जुन चुप हो गये, तब वायु देवता पुनः उनसे बोले ॥ १९ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादे त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायुदेवता और कार्तवीर्य अर्जुनका संवादविषयक एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५३ ॥


ब्राह्मणशिरोमणि उतथ्यके प्रभावका वर्णन

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चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

ब्राह्मणशिरोमणि उतथ्यके प्रभावका वर्णन

वायुरुवाच

इमां भूमिं द्विजातिभ्यो दित्सुर्वै दक्षिणां पुरा ।
अङ्गो नाम नृपो राजंस्ततश्चिन्तां मही ययौ ॥ १ ॥
**वायुदेवता कहते हैं—**राजन्! पहलेकी बात है, अंग नामवाले एक नरेशने इस पृथ्वीको ब्राह्मणोंके हाथमें दान कर देनेका विचार किया। यह जानकर पृथ्वीको बड़ी चिन्ता हुई ॥ १ ॥

धारिणीं सर्वभूतानामयं प्राप्य वरो नृपः ।
कथमिच्छति मां दातुं द्विजेभ्यो ब्रह्मणः सुताम् ॥ २ ॥
वह सोचने लगी—'मैं सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली और ब्रह्माजीकी पुत्री हूँ। मुझे पाकर यह श्रेष्ठ राजा ब्राह्मणोंको क्यों देना चाहता है ॥ २ ॥

साहं त्यक्त्वा गमिष्यामि भूमित्वं ब्रह्मणः पदम् ।
अयं सराष्ट्रो नृपतिर्मा भूदिति ततोऽगमत् ॥ ३ ॥
'यदि इसका ऐसा विचार है तो मैं भी भूमित्वका (लोकधारणरूप अपने धर्मका) त्याग करके ब्रह्मलोक चली जाऊँगी, जिससे यह राजा अपने राज्यसे नष्ट हो जाय'। ऐसा निश्चय करके पृथ्वी चली गयी ॥ ३ ॥

ततस्तां कश्यपो दृष्ट्वा व्रजन्तीं पृथिवीं तदा ।
प्रविवेश महीं सद्यो मुक्त्वाऽऽत्मानं समाहितः ॥ ४ ॥
पृथ्वीको जाते देख महर्षि कश्यप योगका आश्रय ले अपने शरीरको त्यागकर तत्काल भूमिके इस स्थूल विग्रहमें प्रविष्ट हो गये ॥ ४ ॥

ऋद्धा सा सर्वतो जज्ञे तृणौषधिसमन्विता ।
धर्मोत्तरा नष्टभया भूमिरासीत् ततो नृप ॥ ५ ॥
नरेश्वर! उनके प्रवेश करनेसे पृथ्वी पहलेकी अपेक्षा भी समृद्धिशालिनी हो गयी। चारों ओर घास-पात और अन्नकी अधिक उपज होने लगी। उत्तरोत्तर धर्म बढ़ने लगा और भयका नाश हो गया ॥ ५ ॥

एवं वर्षसहस्राणि दिव्यानि विपुलव्रतः ।
त्रिंशतः कश्यपो राजन् भूमिरासीदतन्द्रितः ॥ ६ ॥
राजन्! इस प्रकार आलस्यशून्य हो विशाल व्रतका पालन करनेवाले महर्षि कश्यप तीस हजार दिव्य वर्षोंतक पृथ्वीके रूपमें स्थित रहे ॥ ६ ॥

अथागम्य महाराज नमस्कृत्य च कश्यपम् ।

पृथिवी काश्यपी जज्ञे सुता तस्य महात्मनः ॥ ७ ॥ महाराज! तत्पश्चात् पृथ्वी ब्रह्मलोकसे लौटकर आयी और उन महात्मा कश्यपको प्रणाम करके उनकी पुत्री बनकर रहने लगी। तभीसे उसका नाम काश्यपी हुआ ॥ ७ ॥ एष राजन्नीदृशो वै ब्राह्मणः कश्यपोऽभवत् । अन्यं प्रब्रूहि वा त्वं च कश्यपात् क्षत्रियं वरम् ॥ ८ ॥ राजन्! ये कश्यपजी ब्राह्मण ही थे; जिनका ऐसा प्रभाव देखा गया है। तुम कश्यपसे भी श्रेष्ठ किसी अन्य क्षत्रियको जानते हो तो बताओ ॥ ८ ॥ तूष्णीं बभूव नृपतिः पवनस्त्वब्रवीत् पुनः । शृणु राजन्नुतथ्यस्य जातस्याङ्गिरसे कुले ॥ ९ ॥ भद्रा सोमस्य दुहिता रूपेण परमा मता । तस्यास्तुल्यं पतिं सोम उतथ्यं समपश्यत ॥ १० ॥ राजा कार्तवीर्य अर्जुन कोई उत्तर न दे सका। वह चुपचाप ही बैठा रहा। तब पवन देवता फिर कहने लगे—‘राजन्! अब तुम अंगिराके कुलमें उत्पन्न हुए उतथ्यका वृत्तान्त सुनो। सोमकी पुत्री भद्रा नामसे विख्यात थी। वह अपने समयकी सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी मानी जाती थी। चन्द्रमाने देखा, महर्षि उतथ्य ही मेरी पुत्रीके योग्य वर हैं ॥ ९-१० ॥ सा च तीव्रं तपस्तेपे महाभागा यशस्विनी । उतथ्यार्थे तु चार्वङ्गी परं नियममास्थिता ॥ ११ ॥ ‘सुन्दर अंगोंवाली महाभागा यशस्विनी भद्रा भी उतथ्यको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये उत्तम नियमका आश्रय ले तीव्र तपस्या करने लगी ॥ ११ ॥ तत आहूय सोतथ्यं ददावत्रैर्यशस्विनीम् । भार्यार्थे स च जग्राह विधिवद् भूरिदक्षिणः ॥ १२ ॥ ‘तब कुछ दिनोंके बाद सोमके पिता महर्षि अत्रिने उतथ्यको बुलाकर अपनी यशस्विनी पौत्रीका हाथ उनके हाथमें दे दिया। प्रचुर दक्षिणा देनेवाले उतथ्यने अपनी पत्नी बनानेके लिये भद्राका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया ॥ १२ ॥ तां त्वकामयत श्रीमान् वरुणः पूर्वमेव ह । स चागम्य वनप्रस्थं यमुनायां जहार ताम् ॥ १३ ॥ ‘परंतु श्रीमान् वरुणदेव उस कन्याको पहलेसे ही चाहते थे। उन्होंने वनमें स्थित मुनिके आश्रमके निकट आकर यमुनामें स्नान करते समय भद्राका अपहरण कर लिया ॥ १३ ॥ जलेश्वरस्तु हृत्वा तामनयत् स्वं पुरं प्रति । परमाद्भुतसंकाशं षट्सहस्रशतह्रदम् ॥ १४ ॥ ‘जलेश्वर वरुण उस स्त्रीको हरकर अपने परम अद्भुत नगरमें ले आये; जहाँ छः हजार बिजलियोंका प्रकाश* छा रहा था ॥ १४ ॥ न हि रम्यतरं किंचित् तस्मादन्यत् पुरोत्तमम् ।

प्रासादैरप्सरोभिश्च दिव्यैः कामैश्च शोभितम् ॥ १५ ॥ ‘वरुणके उस नगरसे बढ़कर दूसरा कोई परम रमणीय एवं उत्तम नगर नहीं है। वह असंख्य महलों, अप्सराओं और दिव्य भोगोंसे सुशोभित होता है॥ १५॥ तत्र देवस्तया सार्धं रेमे राजन् जलेश्वरः। अथाख्यातमुतथ्याय ततः पत्न्यवमर्दनम् ॥ १६ ॥ ‘राजन्! जलके स्वामी वरुणदेव वहाँ भद्राके साथ रमण करने लगे। तदनन्तर नारदजीने उतथ्यको यह समाचार बताया कि ‘वरुणने आपकी पत्नीका अपहरण एवं उसके साथ बलात्कार किया है’॥ १६॥ तच्छ्रुत्वा नारदात् सर्वमुतथ्यो नारदं तदा। प्रोवाच गच्छ ब्रूहि त्वं वरुणं परुषं वचः ॥ १७ ॥ ‘नारदजीके मुखसे यह सारा समाचार सुनकर उतथ्यने उस समय नारदजीसे कहा—‘देवर्षे! आप वरुणके पास जाइये और उनसे मेरा यह कठोर संदेश कह सुनाइये॥ १७॥ मद्वाक्यान्मुञ्च मे भार्या कस्मात् तां हृतवानसि। लोकपालोऽसि लोकानां न लोकस्य विलोपकः ॥ १८ ॥ सोमेन दत्ता भार्या मे त्वया चापहृताद्य वै। इत्युक्तो वचनात् तस्य नारदेन जलेश्वरः ॥ १९ ॥ मुञ्च भार्यामुतथ्यस्य कस्मात् त्वं हृतवानसि। ‘वरुण! तुम मेरे कहनेसे मेरी पत्नीको छोड़ दो। तुमने क्यों उसका अपहरण किया है? तुम लोगोंके लिये लोकपाल बनाये गये हो, लोक-विनाशक नहीं। सोमने अपनी कन्या मुझे दी है, वह मेरी भार्या है। फिर आज तुमने उसका अपहरण कैसे किया?’ नारदजीने उतथ्यके कथनानुसार जलेश्वर वरुणसे यह कहा कि ‘आप उतथ्यकी स्त्रीको छोड़ दीजिये; आपने क्यों उसका अपहरण किया है?’॥ १८-१९ १/२ ॥ इति श्रुत्वा वचस्तस्य सोऽथ तं वरुणोऽब्रवीत् ॥ २० ॥ ममैषा सुप्रिया भार्या नैनामुत्स्रष्टुमुत्सहे। ‘नारदजीके मुखसे उतथ्यकी यह बात सुनकर वरुणने उनसे कहा—‘यह मेरी अत्यन्त प्यारी भार्या है। मैं इसे छोड़ नहीं सकता’॥ २० १/२ ॥ इत्युक्तो वरुणेनाथ नारदः प्राप्य तं मुनिम्। उतथ्यमब्रवीद् वाक्यं नातिहृष्टमना इव ॥ २१ ॥ ‘वरुणके इस प्रकार उत्तर देनेपर नारदजी उतथ्य मुनिके पास लौट गये और खिन्न-से होकर बोले—॥ २१॥ गले गृहीत्वा क्षिप्तोऽस्मि वरुणेन महामुने। न प्रयच्छति ते भार्यां यत् ते कार्यं कुरुष्व तत् ॥ २२ ॥

‘महामुने! वरुणने मेरा गला पकड़कर ढकेल दिया है। वे आपकी पत्नीको नहीं दे रहे हैं, अब आपको जो कुछ करना हो, वह कीजिये’ ।। २२ ।। नारदस्य वचः श्रुत्वा क्रुद्धः प्राज्वलदङ्गिराः । अपिबत् तेजसा वारि विष्टभ्य सुमहातपाः ।। २३ ।। ‘नारदजीकी बात सुनकर अंगिराके पुत्र उतथ्य क्रोधसे जल उठे। वे महान् तपस्वी तो थे ही, अपने तेजसे सारे जलको स्तम्भित करके पीने लगे ।। २३ ।। पीयमाने तु सर्वस्मिंस्तोयेऽपि सलिलेश्वरः । सुहृद्भिर्भिक्षमाणोऽपि नैवामुञ्चत तां तदा ।। २४ ।। ‘जब सारा जल पीया जाने लगा, तब सुहृदोंने जलेश्वर वरुणसे प्रार्थना की तो भी वे भद्राको न छोड़ सके ।। २४ ।। तत क्रुद्धोऽब्रवीद् भूमिमुतथ्यो ब्राह्मणोत्तमः । दर्शयस्व स्थलं भद्रे षट्सहस्रशतह्रदम् ।। २५ ।। ‘तब ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ उतथ्यने कुपित होकर पृथ्वीसे कहा—‘भद्रे! तू मुझे वह स्थान दिखा दे, जहाँ छः हजार बिजलियोंका प्रकाश छाया हुआ है’ ।। २५ ।। ततस्तदीरिणं जातं समुद्रस्यावसर्पतः । तस्माद् देशान्नदीं चैव प्रोवाचासौ द्विजोत्तमः ।। २६ ।। अदृश्या गच्छ भीरु त्वं सरस्वति मरुन् प्रति । अपुण्य एष भवतु देशस्त्यक्तस्त्वया शुभे ।। २७ ।। ‘समुद्रके सूखने या खिसक जानेसे वहाँका सारा स्थान ऊसर हो गया। उस देशसे होकर बहनेवाली सरस्वती नदीसे द्विजश्रेष्ठ उतथ्यने कहा—‘भीरु सरस्वति! तुम अदृश्य होकर मरु प्रदेशमें चली जाओ। शुभे! तुम्हारे द्वारा परित्यक्त होकर यह देश अपवित्र हो जाय’ ।। २६-२७ ।। तस्मिन् संशोषिते देशे भद्रामादाय वारिपः । अददाच्छरणं गत्वा भार्यामाङ्गिरसाय वै ।। २८ ।। ‘जब वह सारा प्रदेश सूख गया, तब जलेश्वर वरुण भद्राको साथ लेकर मुनिकी शरणमें आये और उन्होंने आंगिरसको उनकी भार्या दे दी ।। २८ ।। प्रतिगृह्य तु तां भार्यामुतथ्यः सुमनाऽभवत् । मुमोच च जगद् दुःखाद् वरुणं चैव हैहय ।। २९ ।। ‘हैहयराज! अपनी उस पत्नीको पाकर उतथ्य बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने सम्पूर्ण जगत् तथा वरुणको जलके कष्टसे मुक्त कर दिया ।। २९ ।। ततः स लब्ध्वा तां भार्यां वरुणं प्राह धर्मवित् । उतथ्यः सुमहातेजा यत् तच्छृणु नराधिप ।। ३० ।।

‘नरेश्वर! अपनी उस पत्नीको पाकर महातेजस्वी धर्मज्ञ उतथ्यने वरुणसे जो कुछ कहा, वह सुनो ॥ ३० ॥ मयैषा तपसा प्राप्ता क्रोशतस्ते जलाधिप । इत्युक्त्वा तामुपादाय स्वमेव भवनं ययौ ॥ ३१ ॥ ‘जलेश्वर! तुम्हारे चिल्लानेपर भी मैंने तपोबलसे अपनी इस पत्नीको प्राप्त कर लिया।’ ऐसा कहकर वे भद्राको साथ ले अपने घरको लौट गये ॥ ३१ ॥ एष राजन्नीदृशो वै उतथ्यो ब्राह्मणर्षभः । ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वमुतथ्यात् क्षत्रियं वरम् ॥ ३२ ॥ ‘राजन्! ये ब्राह्मणशिरोमणि उतथ्य ऐसे प्रभावशाली हैं। यह बात मैं कहता हूँ। यदि उतथ्यसे श्रेष्ठ कोई क्षत्रिय हो तो तुम उसे बताओ’ ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादो नाम चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायु देवता तथा कार्तवीर्य अर्जुनका संवादनामक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५४ ॥


* कुछ लोग ‘षट्सहस्रशतह्रदम्’ का अर्थ यों करते हैं—वहाँ छः लाख तालाब शोभा पा रहे थे; परंतु ‘शतह्रदा’ शब्द बिजलीका वाचक है; अतः उपर्युक्त अर्थ किया गया है।

ब्रह्मर्षि अगस्त्य और वसिष्ठके प्रभावका वर्णन

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पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

ब्रह्मर्षि अगस्त्य और वसिष्ठके प्रभावका वर्णन

भीष्म उवाच

इत्युक्तः स नृपस्तूष्णीमभूद् वायुस्ततोऽब्रवीत् ।
शृणु राजन्नगस्त्यस्य माहात्म्यं ब्राह्मणस्य ह ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! वायु देवताके ऐसा कहनेपर भी राजा कार्तवीर्य अर्जुन चुपचाप ही बैठे रह गया, कुछ बोल न सका। तब वायुदेव पुनः उससे बोले—'राजन्! अब ब्राह्मणजातीय अगस्त्यका माहात्म्य सुनो— ॥ १ ॥

असुरैर्निर्जिता देवा निरुत्साहाश्च ते कृताः ।
यज्ञांश्चैषां हृताः सर्वे पितॄणां च स्वधास्तथा ॥ २ ॥
कर्मेज्या मानवानां च दानवैर्हैहयर्षभ ।
भ्रष्टैश्वर्यास्ततो देवाश्चेरुः पृथिवीमिति श्रुतिः ॥ ३ ॥
'हैहयराज! प्राचीन समयमें असुरोंने देवताओंको परास्त करके उनका उत्साह नष्ट कर दिया। दानवोंने देवताओंके यज्ञ, पितरोंके श्राद्ध तथा मनुष्योंके कर्मानुष्ठान लुप्त कर दिये। तब अपने ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हुए देवतालोग पृथ्वीपर मारे-मारे फिरने लगे। ऐसा सुननेमें आया है ॥ २-३ ॥

ततः कदाचित् ते राजन् दीप्तमादित्यवर्चसम् ।
ददृशुस्तेजसा युक्तमगस्त्यं विपुलव्रतम् ॥ ४ ॥
'राजन्! तदनन्तर एक दिन देवताओंने सूर्यके समान प्रकाशमान, तेजस्वी, दीप्तिमान् और महान् व्रतधारी अगस्त्यको देखा ॥ ४ ॥

अभिवाद्य तु तं देवाः पृष्ट्वा कुशलमेव च ।
इदमूचुर्महात्मानं वाक्यं काले जनाधिप ॥ ५ ॥
'जनेश्वर! उन्हें प्रणाम करके देवताओंने उनका कुशल-समाचार पूछा और समयपर उन महात्मासे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥

दानवैर्युधि भग्नाः स्म तथैश्वर्याच्च भ्रंशिताः ।
तदस्मान्नो भयात् तीव्रात् त्राहि त्वं मुनिपुङ्गव ॥ ६ ॥
'मुनिवर! दानवोंने हमें युद्धमें हराकर हमारा ऐश्वर्य छीन लिया है। इस तीव्र भयसे आप हमारी रक्षा करें' ॥ ६ ॥

इत्युक्तः स तदा देवैरगस्त्यः कुपितोऽभवत् ।
प्रजज्वाल च तेजस्वी कालाग्निरिव संक्षये ॥ ७ ॥

‘देवताओंके ऐसा कहनेपर तेजस्वी अगस्त्य मुनि कुपित हो गये और प्रलयकालके अग्निकी भाँति रोषसे जल उठे ॥ ७ ॥

तेन दीप्तांशुजालेन निर्दग्धा दानवास्तदा ।
अन्तरिक्षान्महाराज निपेतुस्ते सहस्रशः ॥ ८ ॥
‘महाराज! उनकी प्रज्वलित किरणोंके स्पर्शसे उस समय सहस्रों दानव दग्ध होकर आकाशसे पृथ्वीपर गिरने लगे ॥ ८ ॥

दह्यमानास्तु ते दैत्यास्तस्यागस्त्यस्य तेजसा ।
उभौ लोकौ परित्यज्य गताः काष्ठां तु दक्षिणाम् ॥ ९ ॥
‘अगस्त्यके तेजसे दग्ध होते हुए दैत्य दोनों लोकोंका परित्याग करके दक्षिण दिशाकी ओर चले गये ॥ ९ ॥

बलिस्तु यजते यज्ञमश्वमेधं महीं गतः ।
येऽन्येऽधस्था महीस्थाश्च ते न दग्धा महासुराः ॥ १० ॥
‘उस समय राजा बलि पृथ्वीपर आकर अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे। अतः जो दैत्य उनके साथ पृथ्वीपर थे और दूसरे जो पातालमें थे, वे ही दग्ध होनेसे बचे ॥ १० ॥

ततो लोकाः पुनः प्राप्ताः सुरैः शान्तभयैर्नृप ।
अथैनमब्रुवन् देवा भूमिष्ठानसुरान् जहि ॥ ११ ॥
‘नरेश्वर! तत्पश्चात् देवताओंका भय शान्त हो जानेपर वे पुनः अपने-अपने लोकमें चले आये। तदनन्तर देवताओंने अगस्त्यजीसे फिर कहा—‘अब आप पृथ्वीपर रहनेवाले असुरोंका भी नाश कर डालिये’ ॥ ११ ॥

इत्युक्तः प्राह देवान् स न शक्तोऽस्मि महीगतान् ।
दग्धुं तपो हि क्षीयेन्मे न शक्ष्यामीति पार्थिव ॥ १२ ॥
‘पृथ्वीनाथ! देवताओंके ऐसा कहनेपर अगस्त्यजी उनसे बोले—‘अब मैं भूतलनिवासी असुरोंको नहीं दग्ध कर सकता; क्योंकि ऐसा करनेसे मेरी तपस्या क्षीण हो जायगी। इसलिये यह कार्य मेरे लिये असम्भव है’ ॥ १२ ॥

एवं दग्धा भगवता दानवाः स्वेन तेजसा ।
अगस्त्येन तदा राजंस्तपसा भावितात्मना ॥ १३ ॥
‘राजन्! इस प्रकार शुद्ध अन्तःकरणवाले भगवान् अगस्त्यने अपने तप और तेजसे दानवोंको दग्ध कर दिया था ॥ १३ ॥

ईदृशश्चाप्यगस्त्यो हि कथितस्ते मयानघ ।
ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वमगस्त्यात् क्षत्रियं वरम् ॥ १४ ॥
‘निष्पाप नरेश! अगस्त्य ऐसे प्रभावशाली बताये गये हैं, जो ब्राह्मण ही हैं। यह बात मैं कहता हूँ, तुम अगस्त्य मुनिसे श्रेष्ठ किसी क्षत्रियको जानते हो तो बताओ’ ॥ १४ ॥

भीष्म उवाच