महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
ब्राह्मणशिरोमणि उतथ्यके प्रभावका वर्णन
चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
ब्राह्मणशिरोमणि उतथ्यके प्रभावका वर्णन
वायुरुवाच
इमां भूमिं द्विजातिभ्यो दित्सुर्वै दक्षिणां पुरा ।
अङ्गो नाम नृपो राजंस्ततश्चिन्तां मही ययौ ॥ १ ॥
**वायुदेवता कहते हैं—**राजन्! पहलेकी बात है, अंग नामवाले एक नरेशने इस पृथ्वीको ब्राह्मणोंके हाथमें दान कर देनेका विचार किया। यह जानकर पृथ्वीको बड़ी चिन्ता हुई ॥ १ ॥
धारिणीं सर्वभूतानामयं प्राप्य वरो नृपः ।
कथमिच्छति मां दातुं द्विजेभ्यो ब्रह्मणः सुताम् ॥ २ ॥
वह सोचने लगी—'मैं सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली और ब्रह्माजीकी पुत्री हूँ। मुझे पाकर यह श्रेष्ठ राजा ब्राह्मणोंको क्यों देना चाहता है ॥ २ ॥
साहं त्यक्त्वा गमिष्यामि भूमित्वं ब्रह्मणः पदम् ।
अयं सराष्ट्रो नृपतिर्मा भूदिति ततोऽगमत् ॥ ३ ॥
'यदि इसका ऐसा विचार है तो मैं भी भूमित्वका (लोकधारणरूप अपने धर्मका) त्याग करके ब्रह्मलोक चली जाऊँगी, जिससे यह राजा अपने राज्यसे नष्ट हो जाय'। ऐसा निश्चय करके पृथ्वी चली गयी ॥ ३ ॥
ततस्तां कश्यपो दृष्ट्वा व्रजन्तीं पृथिवीं तदा ।
प्रविवेश महीं सद्यो मुक्त्वाऽऽत्मानं समाहितः ॥ ४ ॥
पृथ्वीको जाते देख महर्षि कश्यप योगका आश्रय ले अपने शरीरको त्यागकर तत्काल भूमिके इस स्थूल विग्रहमें प्रविष्ट हो गये ॥ ४ ॥
ऋद्धा सा सर्वतो जज्ञे तृणौषधिसमन्विता ।
धर्मोत्तरा नष्टभया भूमिरासीत् ततो नृप ॥ ५ ॥
नरेश्वर! उनके प्रवेश करनेसे पृथ्वी पहलेकी अपेक्षा भी समृद्धिशालिनी हो गयी। चारों ओर घास-पात और अन्नकी अधिक उपज होने लगी। उत्तरोत्तर धर्म बढ़ने लगा और भयका नाश हो गया ॥ ५ ॥
एवं वर्षसहस्राणि दिव्यानि विपुलव्रतः ।
त्रिंशतः कश्यपो राजन् भूमिरासीदतन्द्रितः ॥ ६ ॥
राजन्! इस प्रकार आलस्यशून्य हो विशाल व्रतका पालन करनेवाले महर्षि कश्यप तीस हजार दिव्य वर्षोंतक पृथ्वीके रूपमें स्थित रहे ॥ ६ ॥
अथागम्य महाराज नमस्कृत्य च कश्यपम् ।
पृथिवी काश्यपी जज्ञे सुता तस्य महात्मनः ॥ ७ ॥ महाराज! तत्पश्चात् पृथ्वी ब्रह्मलोकसे लौटकर आयी और उन महात्मा कश्यपको प्रणाम करके उनकी पुत्री बनकर रहने लगी। तभीसे उसका नाम काश्यपी हुआ ॥ ७ ॥ एष राजन्नीदृशो वै ब्राह्मणः कश्यपोऽभवत् । अन्यं प्रब्रूहि वा त्वं च कश्यपात् क्षत्रियं वरम् ॥ ८ ॥ राजन्! ये कश्यपजी ब्राह्मण ही थे; जिनका ऐसा प्रभाव देखा गया है। तुम कश्यपसे भी श्रेष्ठ किसी अन्य क्षत्रियको जानते हो तो बताओ ॥ ८ ॥ तूष्णीं बभूव नृपतिः पवनस्त्वब्रवीत् पुनः । शृणु राजन्नुतथ्यस्य जातस्याङ्गिरसे कुले ॥ ९ ॥ भद्रा सोमस्य दुहिता रूपेण परमा मता । तस्यास्तुल्यं पतिं सोम उतथ्यं समपश्यत ॥ १० ॥ राजा कार्तवीर्य अर्जुन कोई उत्तर न दे सका। वह चुपचाप ही बैठा रहा। तब पवन देवता फिर कहने लगे—‘राजन्! अब तुम अंगिराके कुलमें उत्पन्न हुए उतथ्यका वृत्तान्त सुनो। सोमकी पुत्री भद्रा नामसे विख्यात थी। वह अपने समयकी सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी मानी जाती थी। चन्द्रमाने देखा, महर्षि उतथ्य ही मेरी पुत्रीके योग्य वर हैं ॥ ९-१० ॥ सा च तीव्रं तपस्तेपे महाभागा यशस्विनी । उतथ्यार्थे तु चार्वङ्गी परं नियममास्थिता ॥ ११ ॥ ‘सुन्दर अंगोंवाली महाभागा यशस्विनी भद्रा भी उतथ्यको पतिरूपमें प्राप्त करनेके लिये उत्तम नियमका आश्रय ले तीव्र तपस्या करने लगी ॥ ११ ॥ तत आहूय सोतथ्यं ददावत्रैर्यशस्विनीम् । भार्यार्थे स च जग्राह विधिवद् भूरिदक्षिणः ॥ १२ ॥ ‘तब कुछ दिनोंके बाद सोमके पिता महर्षि अत्रिने उतथ्यको बुलाकर अपनी यशस्विनी पौत्रीका हाथ उनके हाथमें दे दिया। प्रचुर दक्षिणा देनेवाले उतथ्यने अपनी पत्नी बनानेके लिये भद्राका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया ॥ १२ ॥ तां त्वकामयत श्रीमान् वरुणः पूर्वमेव ह । स चागम्य वनप्रस्थं यमुनायां जहार ताम् ॥ १३ ॥ ‘परंतु श्रीमान् वरुणदेव उस कन्याको पहलेसे ही चाहते थे। उन्होंने वनमें स्थित मुनिके आश्रमके निकट आकर यमुनामें स्नान करते समय भद्राका अपहरण कर लिया ॥ १३ ॥ जलेश्वरस्तु हृत्वा तामनयत् स्वं पुरं प्रति । परमाद्भुतसंकाशं षट्सहस्रशतह्रदम् ॥ १४ ॥ ‘जलेश्वर वरुण उस स्त्रीको हरकर अपने परम अद्भुत नगरमें ले आये; जहाँ छः हजार बिजलियोंका प्रकाश* छा रहा था ॥ १४ ॥ न हि रम्यतरं किंचित् तस्मादन्यत् पुरोत्तमम् ।
प्रासादैरप्सरोभिश्च दिव्यैः कामैश्च शोभितम् ॥ १५ ॥ ‘वरुणके उस नगरसे बढ़कर दूसरा कोई परम रमणीय एवं उत्तम नगर नहीं है। वह असंख्य महलों, अप्सराओं और दिव्य भोगोंसे सुशोभित होता है॥ १५॥ तत्र देवस्तया सार्धं रेमे राजन् जलेश्वरः। अथाख्यातमुतथ्याय ततः पत्न्यवमर्दनम् ॥ १६ ॥ ‘राजन्! जलके स्वामी वरुणदेव वहाँ भद्राके साथ रमण करने लगे। तदनन्तर नारदजीने उतथ्यको यह समाचार बताया कि ‘वरुणने आपकी पत्नीका अपहरण एवं उसके साथ बलात्कार किया है’॥ १६॥ तच्छ्रुत्वा नारदात् सर्वमुतथ्यो नारदं तदा। प्रोवाच गच्छ ब्रूहि त्वं वरुणं परुषं वचः ॥ १७ ॥ ‘नारदजीके मुखसे यह सारा समाचार सुनकर उतथ्यने उस समय नारदजीसे कहा—‘देवर्षे! आप वरुणके पास जाइये और उनसे मेरा यह कठोर संदेश कह सुनाइये॥ १७॥ मद्वाक्यान्मुञ्च मे भार्या कस्मात् तां हृतवानसि। लोकपालोऽसि लोकानां न लोकस्य विलोपकः ॥ १८ ॥ सोमेन दत्ता भार्या मे त्वया चापहृताद्य वै। इत्युक्तो वचनात् तस्य नारदेन जलेश्वरः ॥ १९ ॥ मुञ्च भार्यामुतथ्यस्य कस्मात् त्वं हृतवानसि। ‘वरुण! तुम मेरे कहनेसे मेरी पत्नीको छोड़ दो। तुमने क्यों उसका अपहरण किया है? तुम लोगोंके लिये लोकपाल बनाये गये हो, लोक-विनाशक नहीं। सोमने अपनी कन्या मुझे दी है, वह मेरी भार्या है। फिर आज तुमने उसका अपहरण कैसे किया?’ नारदजीने उतथ्यके कथनानुसार जलेश्वर वरुणसे यह कहा कि ‘आप उतथ्यकी स्त्रीको छोड़ दीजिये; आपने क्यों उसका अपहरण किया है?’॥ १८-१९ १/२ ॥ इति श्रुत्वा वचस्तस्य सोऽथ तं वरुणोऽब्रवीत् ॥ २० ॥ ममैषा सुप्रिया भार्या नैनामुत्स्रष्टुमुत्सहे। ‘नारदजीके मुखसे उतथ्यकी यह बात सुनकर वरुणने उनसे कहा—‘यह मेरी अत्यन्त प्यारी भार्या है। मैं इसे छोड़ नहीं सकता’॥ २० १/२ ॥ इत्युक्तो वरुणेनाथ नारदः प्राप्य तं मुनिम्। उतथ्यमब्रवीद् वाक्यं नातिहृष्टमना इव ॥ २१ ॥ ‘वरुणके इस प्रकार उत्तर देनेपर नारदजी उतथ्य मुनिके पास लौट गये और खिन्न-से होकर बोले—॥ २१॥ गले गृहीत्वा क्षिप्तोऽस्मि वरुणेन महामुने। न प्रयच्छति ते भार्यां यत् ते कार्यं कुरुष्व तत् ॥ २२ ॥
‘महामुने! वरुणने मेरा गला पकड़कर ढकेल दिया है। वे आपकी पत्नीको नहीं दे रहे हैं, अब आपको जो कुछ करना हो, वह कीजिये’ ।। २२ ।। नारदस्य वचः श्रुत्वा क्रुद्धः प्राज्वलदङ्गिराः । अपिबत् तेजसा वारि विष्टभ्य सुमहातपाः ।। २३ ।। ‘नारदजीकी बात सुनकर अंगिराके पुत्र उतथ्य क्रोधसे जल उठे। वे महान् तपस्वी तो थे ही, अपने तेजसे सारे जलको स्तम्भित करके पीने लगे ।। २३ ।। पीयमाने तु सर्वस्मिंस्तोयेऽपि सलिलेश्वरः । सुहृद्भिर्भिक्षमाणोऽपि नैवामुञ्चत तां तदा ।। २४ ।। ‘जब सारा जल पीया जाने लगा, तब सुहृदोंने जलेश्वर वरुणसे प्रार्थना की तो भी वे भद्राको न छोड़ सके ।। २४ ।। तत क्रुद्धोऽब्रवीद् भूमिमुतथ्यो ब्राह्मणोत्तमः । दर्शयस्व स्थलं भद्रे षट्सहस्रशतह्रदम् ।। २५ ।। ‘तब ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ उतथ्यने कुपित होकर पृथ्वीसे कहा—‘भद्रे! तू मुझे वह स्थान दिखा दे, जहाँ छः हजार बिजलियोंका प्रकाश छाया हुआ है’ ।। २५ ।। ततस्तदीरिणं जातं समुद्रस्यावसर्पतः । तस्माद् देशान्नदीं चैव प्रोवाचासौ द्विजोत्तमः ।। २६ ।। अदृश्या गच्छ भीरु त्वं सरस्वति मरुन् प्रति । अपुण्य एष भवतु देशस्त्यक्तस्त्वया शुभे ।। २७ ।। ‘समुद्रके सूखने या खिसक जानेसे वहाँका सारा स्थान ऊसर हो गया। उस देशसे होकर बहनेवाली सरस्वती नदीसे द्विजश्रेष्ठ उतथ्यने कहा—‘भीरु सरस्वति! तुम अदृश्य होकर मरु प्रदेशमें चली जाओ। शुभे! तुम्हारे द्वारा परित्यक्त होकर यह देश अपवित्र हो जाय’ ।। २६-२७ ।। तस्मिन् संशोषिते देशे भद्रामादाय वारिपः । अददाच्छरणं गत्वा भार्यामाङ्गिरसाय वै ।। २८ ।। ‘जब वह सारा प्रदेश सूख गया, तब जलेश्वर वरुण भद्राको साथ लेकर मुनिकी शरणमें आये और उन्होंने आंगिरसको उनकी भार्या दे दी ।। २८ ।। प्रतिगृह्य तु तां भार्यामुतथ्यः सुमनाऽभवत् । मुमोच च जगद् दुःखाद् वरुणं चैव हैहय ।। २९ ।। ‘हैहयराज! अपनी उस पत्नीको पाकर उतथ्य बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने सम्पूर्ण जगत् तथा वरुणको जलके कष्टसे मुक्त कर दिया ।। २९ ।। ततः स लब्ध्वा तां भार्यां वरुणं प्राह धर्मवित् । उतथ्यः सुमहातेजा यत् तच्छृणु नराधिप ।। ३० ।।
‘नरेश्वर! अपनी उस पत्नीको पाकर महातेजस्वी धर्मज्ञ उतथ्यने वरुणसे जो कुछ कहा, वह सुनो ॥ ३० ॥ मयैषा तपसा प्राप्ता क्रोशतस्ते जलाधिप । इत्युक्त्वा तामुपादाय स्वमेव भवनं ययौ ॥ ३१ ॥ ‘जलेश्वर! तुम्हारे चिल्लानेपर भी मैंने तपोबलसे अपनी इस पत्नीको प्राप्त कर लिया।’ ऐसा कहकर वे भद्राको साथ ले अपने घरको लौट गये ॥ ३१ ॥ एष राजन्नीदृशो वै उतथ्यो ब्राह्मणर्षभः । ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वमुतथ्यात् क्षत्रियं वरम् ॥ ३२ ॥ ‘राजन्! ये ब्राह्मणशिरोमणि उतथ्य ऐसे प्रभावशाली हैं। यह बात मैं कहता हूँ। यदि उतथ्यसे श्रेष्ठ कोई क्षत्रिय हो तो तुम उसे बताओ’ ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादो नाम चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायु देवता तथा कार्तवीर्य अर्जुनका संवादनामक एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५४ ॥
* कुछ लोग ‘षट्सहस्रशतह्रदम्’ का अर्थ यों करते हैं—वहाँ छः लाख तालाब शोभा पा रहे थे; परंतु ‘शतह्रदा’ शब्द बिजलीका वाचक है; अतः उपर्युक्त अर्थ किया गया है।
ब्रह्मर्षि अगस्त्य और वसिष्ठके प्रभावका वर्णन
पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
ब्रह्मर्षि अगस्त्य और वसिष्ठके प्रभावका वर्णन
भीष्म उवाच
इत्युक्तः स नृपस्तूष्णीमभूद् वायुस्ततोऽब्रवीत् ।
शृणु राजन्नगस्त्यस्य माहात्म्यं ब्राह्मणस्य ह ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! वायु देवताके ऐसा कहनेपर भी राजा कार्तवीर्य अर्जुन चुपचाप ही बैठे रह गया, कुछ बोल न सका। तब वायुदेव पुनः उससे बोले—'राजन्! अब ब्राह्मणजातीय अगस्त्यका माहात्म्य सुनो— ॥ १ ॥
असुरैर्निर्जिता देवा निरुत्साहाश्च ते कृताः ।
यज्ञांश्चैषां हृताः सर्वे पितॄणां च स्वधास्तथा ॥ २ ॥
कर्मेज्या मानवानां च दानवैर्हैहयर्षभ ।
भ्रष्टैश्वर्यास्ततो देवाश्चेरुः पृथिवीमिति श्रुतिः ॥ ३ ॥
'हैहयराज! प्राचीन समयमें असुरोंने देवताओंको परास्त करके उनका उत्साह नष्ट कर दिया। दानवोंने देवताओंके यज्ञ, पितरोंके श्राद्ध तथा मनुष्योंके कर्मानुष्ठान लुप्त कर दिये। तब अपने ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हुए देवतालोग पृथ्वीपर मारे-मारे फिरने लगे। ऐसा सुननेमें आया है ॥ २-३ ॥
ततः कदाचित् ते राजन् दीप्तमादित्यवर्चसम् ।
ददृशुस्तेजसा युक्तमगस्त्यं विपुलव्रतम् ॥ ४ ॥
'राजन्! तदनन्तर एक दिन देवताओंने सूर्यके समान प्रकाशमान, तेजस्वी, दीप्तिमान् और महान् व्रतधारी अगस्त्यको देखा ॥ ४ ॥
अभिवाद्य तु तं देवाः पृष्ट्वा कुशलमेव च ।
इदमूचुर्महात्मानं वाक्यं काले जनाधिप ॥ ५ ॥
'जनेश्वर! उन्हें प्रणाम करके देवताओंने उनका कुशल-समाचार पूछा और समयपर उन महात्मासे इस प्रकार कहा— ॥ ५ ॥
दानवैर्युधि भग्नाः स्म तथैश्वर्याच्च भ्रंशिताः ।
तदस्मान्नो भयात् तीव्रात् त्राहि त्वं मुनिपुङ्गव ॥ ६ ॥
'मुनिवर! दानवोंने हमें युद्धमें हराकर हमारा ऐश्वर्य छीन लिया है। इस तीव्र भयसे आप हमारी रक्षा करें' ॥ ६ ॥
इत्युक्तः स तदा देवैरगस्त्यः कुपितोऽभवत् ।
प्रजज्वाल च तेजस्वी कालाग्निरिव संक्षये ॥ ७ ॥
‘देवताओंके ऐसा कहनेपर तेजस्वी अगस्त्य मुनि कुपित हो गये और प्रलयकालके अग्निकी भाँति रोषसे जल उठे ॥ ७ ॥
तेन दीप्तांशुजालेन निर्दग्धा दानवास्तदा ।
अन्तरिक्षान्महाराज निपेतुस्ते सहस्रशः ॥ ८ ॥
‘महाराज! उनकी प्रज्वलित किरणोंके स्पर्शसे उस समय सहस्रों दानव दग्ध होकर आकाशसे पृथ्वीपर गिरने लगे ॥ ८ ॥
दह्यमानास्तु ते दैत्यास्तस्यागस्त्यस्य तेजसा ।
उभौ लोकौ परित्यज्य गताः काष्ठां तु दक्षिणाम् ॥ ९ ॥
‘अगस्त्यके तेजसे दग्ध होते हुए दैत्य दोनों लोकोंका परित्याग करके दक्षिण दिशाकी ओर चले गये ॥ ९ ॥
बलिस्तु यजते यज्ञमश्वमेधं महीं गतः ।
येऽन्येऽधस्था महीस्थाश्च ते न दग्धा महासुराः ॥ १० ॥
‘उस समय राजा बलि पृथ्वीपर आकर अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे। अतः जो दैत्य उनके साथ पृथ्वीपर थे और दूसरे जो पातालमें थे, वे ही दग्ध होनेसे बचे ॥ १० ॥
ततो लोकाः पुनः प्राप्ताः सुरैः शान्तभयैर्नृप ।
अथैनमब्रुवन् देवा भूमिष्ठानसुरान् जहि ॥ ११ ॥
‘नरेश्वर! तत्पश्चात् देवताओंका भय शान्त हो जानेपर वे पुनः अपने-अपने लोकमें चले आये। तदनन्तर देवताओंने अगस्त्यजीसे फिर कहा—‘अब आप पृथ्वीपर रहनेवाले असुरोंका भी नाश कर डालिये’ ॥ ११ ॥
इत्युक्तः प्राह देवान् स न शक्तोऽस्मि महीगतान् ।
दग्धुं तपो हि क्षीयेन्मे न शक्ष्यामीति पार्थिव ॥ १२ ॥
‘पृथ्वीनाथ! देवताओंके ऐसा कहनेपर अगस्त्यजी उनसे बोले—‘अब मैं भूतलनिवासी असुरोंको नहीं दग्ध कर सकता; क्योंकि ऐसा करनेसे मेरी तपस्या क्षीण हो जायगी। इसलिये यह कार्य मेरे लिये असम्भव है’ ॥ १२ ॥
एवं दग्धा भगवता दानवाः स्वेन तेजसा ।
अगस्त्येन तदा राजंस्तपसा भावितात्मना ॥ १३ ॥
‘राजन्! इस प्रकार शुद्ध अन्तःकरणवाले भगवान् अगस्त्यने अपने तप और तेजसे दानवोंको दग्ध कर दिया था ॥ १३ ॥
ईदृशश्चाप्यगस्त्यो हि कथितस्ते मयानघ ।
ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वमगस्त्यात् क्षत्रियं वरम् ॥ १४ ॥
‘निष्पाप नरेश! अगस्त्य ऐसे प्रभावशाली बताये गये हैं, जो ब्राह्मण ही हैं। यह बात मैं कहता हूँ, तुम अगस्त्य मुनिसे श्रेष्ठ किसी क्षत्रियको जानते हो तो बताओ’ ॥ १४ ॥
भीष्म उवाच
इत्युक्तः स तदा तूष्णीमभूद् वायुस्ततोऽब्रवीत् । शृणु राजन् वसिष्ठस्य मुख्यं कर्म यशस्विनः ॥ १५ ॥ भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! उनके ऐसा कहनेपर भी कार्तवीर्य अर्जुन चुप ही रहा। तब वायु देवता फिर बोले—'राजन्! अब यशस्वी ब्राह्मण वसिष्ठ मुनिका श्रेष्ठ कर्म सुनो ॥ १५ ॥
आदित्याः सत्रमासन्त सरो वै मानसं प्रति । वसिष्ठं मनसा गत्वा ज्ञात्वा तत् तस्य गौरवम् ॥ १६ ॥ 'एक समय देवताओेंने वसिष्ठ मुनिके गौरवको जानकर मन-ही-मन उनकी शरण जाकर मानसरोवरके तटपर यज्ञ आरम्भ किया ॥ १६ ॥
यजमानांस्तु तान् दृष्ट्वा सर्वान् दीक्षानुकर्शितान् । हन्तुमैच्छन्त शैलाभाः खलिनो नाम दानवाः ॥ १७ ॥ 'समस्त देवता यज्ञकी दीक्षा लेकर दुबले हो रहे थे। उन्हें यज्ञ करते देख पर्वतके समान शरीरवाले 'खली' नामक दानवोंने उन सबको मार डालनेका विचार किया (फिर तो दोनों दलोंमें युद्ध छिड़ गया) ॥ १७ ॥
अदूरात् तु ततस्तेषां ब्रह्मदत्तवरं सरः । हताहता वै तत्रैते जीवन्त्याप्लुत्य दानवाः ॥ १८ ॥ 'उनके पास ही मानसरोवर था, जिसके लिये ब्रह्माजीके द्वारा दैत्योंको यह वरदान प्राप्त था कि 'इसमें डुबकी लगानेसे तुम्हें नूतन जीवन प्राप्त होगा'; अतः उस समय दानवोंमेंसे जो हताहत होते थे, उन्हें दूसरे दानव उठाकर सरोवरमें फेंक देते थे और वे उसके जलमें डुबकी लगाते ही जी उठते थे ॥ १८ ॥
ते प्रगृह्य महाघोरान् पर्वतान् परिघान् द्रुमान् । विक्षोभयन्तः सलिलमुत्थितं शतयोजनम् ॥ १९ ॥ अभ्यद्रवन्त देवांस्ते सहस्राणि दशैव हि । ततस्तैरर्दिता देवाः शरणं वासवं ययुः ॥ २० ॥ 'फिर सरोवरके जलको सौ योजन ऊँचे उछालते तथा हाथमें महाघोर पर्वत, परिघ एवं वृक्ष लिये हुए वे देवताओंपर टूट पड़ते थे। उन दानवोंकी संख्या दस हजारकी थी। जब उन्होंने देवताओंको अच्छी तरह पीड़ित किया, तब वे भागकर इन्द्रकी शरणमें गये ॥ १९-२० ॥
स च तैर्व्यथितः शक्रो वसिष्ठं शरणं ययौ । ततोऽभयं ददौ तेभ्यो वसिष्ठो भगवानृषिः ॥ २१ ॥ तदा तान् दुःखितान् ज्ञात्वा आनृशंस्यपरो मुनिः । अयत्नेनादहत् सर्वान् खलिनः स्वेन तेजसा ॥ २२ ॥
‘इन्द्रको भी उन दैत्योंसे भिड़कर महान् क्लेश उठाना पड़ा; अतः वे वसिष्ठजीकी शरणमें गये। तब उन भगवान् वसिष्ठ मुनिने, जो बड़े ही दयालु थे, देवताओंको दुखी जानकर उन्हें अभयदान दे दिया और बिना किसी प्रयत्नके ही अपने तेजसे उन समस्त खली नामके दानवोंको दग्ध कर डाला ।। २१-२२ ।।
कैलासं प्रस्थितां चैव नदीं गङ्गां महातपाः ।
आनयत् तत्सरो दिव्यं तया भिन्नं च तत्सरः ।। २३ ।।
सरो भिन्नं तया नद्या सरयूः सा ततोऽभवत् ।
हताश्च खलिनो यत्र स देशः खलिनोऽभवत् ।। २४ ।।
‘इतना ही नहीं—वे महातपस्वी मुनि कैलासकी ओर प्रस्थित हुई गंगा नदीको उस दिव्य सरोवरमें ले आये। गंगाजीने उसमें आते ही उस सरोवरका बाँध तोड़ डाला। गंगासे सरोवरका भेदन होनेपर जो स्रोत निकला, वही सरयू नदीके नामसे प्रसिद्ध हुआ। जिस स्थानपर खली नामक दानव मारे गये, वह देश खलिन नामसे विख्यात हुआ ।। २३-२४ ।।
एवं सेन्द्रा वसिष्ठेन रक्षितास्त्रिदिवौकसः ।
ब्रह्मदत्तवराश्चैव हता दैत्या महात्मना ।। २५ ।।
‘इस प्रकार महात्मा वसिष्ठने इन्द्रसहित देवताओंकी रक्षा की और ब्रह्माजीने जिनके लिये वर दिया था, ऐसे दैत्योंका भी संहार कर डाला ।। २५ ।।
एतत् कर्म वसिष्ठस्य कथितं हि मयानघ ।
ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वं वसिष्ठात् क्षत्रियं वरम् ।। २६ ।।
‘निष्पाप नरेश! मैंने ब्रह्मर्षि वसिष्ठजीके इस कर्मका वर्णन किया है। मैं कहता हूँ, ब्राह्मण श्रेष्ठ है। यदि वसिष्ठसे बड़ा कोई क्षत्रिय है तो बताओ’ ।। २६ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादे पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायु देवता और कार्तवीर्य अर्जुनका संवादविषयक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५५ ।।
अत्रि और च्यवन ऋषिके प्रभावका वर्णन
षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
अत्रि और च्यवन ऋषिके प्रभावका वर्णन
भीष्म उवाच
इत्युक्तस्त्वर्जुनस्तूष्णीमभूद् वायुस्तमब्रवीत् ।
शृणु मे हैहयश्रेष्ठ कर्मात्रेः सुमहात्मनः ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! उनके ऐसा कहनेपर भी जब कार्तवीर्य अर्जुन कोई उत्तर न देकर चुप ही बैठा रहा, तब वायु देवता पुनः इस प्रकार बोले—हैहयश्रेष्ठ! अब तुम मुझसे महात्मा अत्रिके महान् कर्मका वर्णन सुनो ॥ १ ॥
घोरे तमस्ययुध्यन्त सहिता देवदानवाः ।
अविध्यत शरैस्तत्र स्वर्भानुः सोमभास्करौ ॥ २ ॥
'प्राचीन कालमें एक बार देवता और दानव सब घोर अन्धकारमें एक-दूसरेके साथ युद्ध करते थे। वहाँ राहुने अपने बाणोंसे चन्द्रमा और सूर्यको घायल कर दिया था (इसलिये सब ओर घोर अन्धकार छा गया था) ॥ २ ॥
अथ ते तमसा ग्रस्ता निघ्न्यन्ते स्म दानवैः ।
देवा नृपतिशार्दूल सहैव बलिभिस्तदा ॥ ३ ॥
नृपश्रेष्ठ! फिर तो अन्धकारमें फँसे हुए देवतालोग कुछ सूझ न पड़नेके कारण एक साथ ही बलवान् दानवोंके हाथसे मारे जाने लगे ॥ ३ ॥
असुरैर्वध्यमानास्ते क्षीणप्राणा दिवौकसः ।
अपश्यन्त तपस्यन्तमत्रिं विप्रं तपोधनम् ॥ ४ ॥
अथैनमब्रुवन् देवाः शान्तक्रोधं जितेन्द्रियम् ।
असुरैरिषुभिर्विद्धौ चन्द्रादित्याविमावुभौ ॥ ५ ॥
वयं वध्यामहे चापि शत्रुभिस्तमसावृते ।
नाधिगच्छाम शान्तिं च भयात् त्रायस्व नः प्रभो ॥ ६ ॥
असुरोंकी मार खाकर देवताओंकी प्राणशक्ति क्षीण हो चली और वे भागकर तपस्यामें संलग्न हुए तपोधन विप्रवर अत्रि मुनिके पास गये। वहाँ उन्होंने उन क्रोधशून्य जितेन्द्रिय मुनिका दर्शन किया और इस प्रकार कहा—'प्रभो! असुरोंने अपने बाणोंद्वारा चन्द्रमा और सूर्यको घायल कर दिया है और अब घोर अन्धकार छा जानेके कारण हम भी शत्रुओंके हाथसे मारे जा रहे हैं। हमें तनिक भी शान्ति नहीं मिलती है। आप कृपा करके हमारी रक्षा कीजिये' ॥ ४—६ ॥
अत्रिरुवाच
कथं रक्षामि भवतस्तेऽब्रुवंश्चन्द्रमा भव । तिमिरघ्नश्च सविता दस्युहन्ता च नो भव ॥ ७ ॥ अत्रिने कहा—'मैं किस प्रकार आपलोगोंकी रक्षा करूँ? देवता बोले—'आप अन्धकारको नष्ट करनेवाले चन्द्रमा और सूर्यका रूप धारण कीजिये और हमारे शत्रु बने हुए इन डाकू दानवोंका नाश कर डालिये' ॥ ७ ॥
एवमुक्तस्तदात्रिर्वै तमोनुदभवच्छशी । अपश्यत् सौम्यभावाच्च सोमवत् प्रियदर्शनः ॥ ८ ॥ दृष्ट्वा नातिप्रभं सोमं तथा सूर्य च पार्थिव । प्रकाशमकरोत्रिस्तपसा स्वेन संयुगे ॥ ९ ॥ जगद् वितिमिरं चापि प्रदीप्तमकरोत् तदा ॥ १० ॥ पृथ्वीनाथ! देवताओंके ऐसा कहनेपर अत्रिने अन्धकारको दूर करनेवाले चन्द्रमाका रूप धारण किया और सोमके समान देखनेमें प्रिय लगने लगे। उन्होंने शान्तभावसे देवताओंकी ओर देखा। उस समय चन्द्रमा और सूर्यकी प्रभा मन्द देखकर अत्रिने अपनी तपस्यासे उस युद्धभूमिमें प्रकाश फैलाया तथा सम्पूर्ण जगत्को अन्धकारशून्य एवं आलोकित कर दिया ॥ ८—१० ॥
व्यजयच्छत्रुसंघांश्च देवानां स्वेन तेजसा । अत्रिणा दह्यमानांस्तान् दृष्ट्वा देवा महासुरान् ॥ ११ ॥ पराक्रमैस्तेऽपि तदा व्यघ्नन्नत्रिसुरक्षिताः । उद्भासितश्च सविता देवास्त्राता हतासुराः ॥ १२ ॥ उन्होंने अपने तेजसे ही देवताओंके शत्रुओंको परास्त कर दिया। अत्रिके तेजसे उन महान् असुरोंको दग्ध होते देख अत्रिसे सुरक्षित हुए देवताओंने भी उस समय पराक्रम करके उन दैत्योंको मार डाला। अत्रिने सूर्यको तेजस्वी बनाया, देवताओंका उद्धार किया और असुरोंको नष्ट कर दिया ॥ ११-१२ ॥
अत्रिणा त्वथ सामर्थ्यं कृतमुत्तमतेजसा । द्विजेनाग्निद्वितीयेन जपता चर्मवाससा ॥ १३ ॥ फलभक्षेण राजर्षे पश्य कर्मात्रिणा कृतम् । तस्यापि विस्तरेणोक्तं कर्मात्रेः सुमहात्मनः । ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वमत्रितः क्षत्रियं वरम् ॥ १४ ॥ अत्रि मुनि गायत्रीका जप करनेवाले, मृगचर्मधारी, फलाहारी, अग्निहोत्री और उत्तम तेजसे युक्त ब्राह्मण हैं। उन्होंने जो सामर्थ्य दिखलाया, जैसा महान् कर्म किया, उसपर दृष्टिपात करो। मैंने उन उत्तम महात्मा अत्रिका भी कर्म विस्तारपूर्वक बताया है। मैं कहता हूँ ब्राह्मण श्रेष्ठ है। तुम बताओ अत्रिसे श्रेष्ठ कौन क्षत्रिय है? ॥ १३-१४ ॥
इत्युक्तस्त्वर्जुनस्तूष्णीमभूद् वायुस्ततोऽब्रवीत् ।
शृणु राजन् महत्कर्म च्यवनस्य महात्मनः ॥ १५ ॥
उनके ऐसा कहनेपर भी अर्जुन चुप ही रहा। तब वायु देवता फिर कहने लगे—राजन्! अब महात्मा च्यवनके माहात्म्यका वर्णन सुनो ॥ १५ ॥
अश्विनोः प्रतिसंश्रुत्य च्यवनः पाकशासनम् ।
प्रोवाच सहितो देवैः सोमपावश्विनौ कुरु ॥ १६ ॥
पूर्वकालमें च्यवन मुनिने अश्विनीकुमारोंको सोमपान करानेकी प्रतिज्ञा करके इन्द्रसे कहा—'देवराज! आप दोनों अश्विनीकुमारोंको देवताओंके साथ सोमपानमें सम्मिलित कर लीजिये' ॥ १६ ॥
इन्द्र उवाच
अस्माभिर्निन्दितावेतौ भवेतां सोमपौ कथम् ।
देवैर्न सम्मितावेतौ तस्मान्मैवं वदस्व नः ॥ १७ ॥
इन्द्र बोले— विप्रवर! अश्विनीकुमार हमलोगोंके द्वारा निन्दित हैं। फिर ये सोमपानके अधिकारी कैसे हो सकते हैं। ये दोनों देवताओंके समान प्रतिष्ठित नहीं हैं; अतः उनके लिये इस तरहकी बात न कीजिये ॥ १७ ॥
अश्विभ्यां सह नेच्छामः सोमं पातुं महाव्रत ।
यदन्यद् वक्ष्यसे विप्र तत् करिष्यामि ते वचः ॥ १८ ॥
महान् व्रतधारी विप्रवर! हमलोग अश्विनीकुमारोंके साथ सोमपान करना नहीं चाहते हैं। अतः इसको छोड़कर आप और जिस कामके लिये मुझे आज्ञा देंगे, उसे अवश्य मैं पूर्ण करूँगा ॥ १८ ॥
च्यवन उवाच
पिबेतामश्विनौ सोमं भवद्भिः सहिताविमौ ।
उभावेतावपि सुरौ सूर्यपुत्रौ सुरेश्वर ॥ १९ ॥
च्यवन बोले— देवराज! अश्विनीकुमार भी सूर्यके पुत्र होनेके कारण देवता ही हैं। अतः ये आप सब लोगोंके साथ निश्चय ही सोमपान कर सकते हैं ॥ १९ ॥
क्रियतां मद्वचो देवा यथा वै समुदाहृतम् ।
एतद् वः कुर्वतां श्रेयो भवेन्नैतदकुर्वताम् ॥ २० ॥
देवताओ! मैंने जैसी बात कही है, उसे आपलोग स्वीकार करें। ऐसा करनेमें ही आपलोगोंकी भलाई है; अन्यथा इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा ॥ २० ॥
इन्द्र उवाच
अश्विभ्यां सह सोमं वै न पास्यामि द्विजोत्तम ।
पिबन्त्वन्ये यथाकामं नाहं पातुमिहोत्सहे ॥ २१ ॥
**इन्द्रने कहा—**द्विजश्रेष्ठ! निश्चय ही मैं दोनों अश्विनीकुमारोंके साथ सोमपान नहीं करूँगा। अन्य देवताओंकी इच्छा हो तो उनके साथ सोमरस पीयें। मैं तो नहीं पी सकता॥ २१॥
च्यवन उवाच
न चेत् करिष्यसि वचो मयोक्तं बलसूदन ।
मया प्रमथितः सद्यः सोमं पास्यसि वै मखे ॥ २२ ॥
**च्यवनने कहा—**बलसूदन! यदि तुम सीधी तरह मेरी कही हुई बात नहीं मानोगे तो यज्ञमें मेरे द्वारा तुम्हारा अभिमान चूर्ण कर दिया जायगा, फिर तो तत्काल ही तुम सोमरस पीने लगोगे॥ २२॥
वायुरुवाच
ततः कर्म समारब्धं हिताय सहसाश्विनोः ।
च्यवनेन ततो मन्त्रैरभिभूताः सुराऽभवन् ॥ २३ ॥
**वायुदेवता कहते हैं—**तदनन्तर च्यवन मुनिने अश्विनीकुमारोंके हितके लिये सहसा यज्ञ आरम्भ किया। उनके मन्त्रबलसे समस्त देवता प्रभावित हो गये॥ २३॥
तत् तु कर्म समारब्धं दृष्ट्वेन्द्रः क्रोधमूर्च्छितः ।
उद्यम्य विपुलं शैलं च्यवनं समुपाद्रवत् ॥ २४ ॥
उस यज्ञकर्मका आरम्भ होता देख इन्द्र क्रोधसे मूर्च्छित हो उठे और हाथमें एक विशाल पर्वत लेकर वे च्यवन मुनिकी ओर दौड़े॥ २४॥
तथा वज्रेण भगवानमर्षाकुललोचनः ।
तमापतन्तं दृष्ट्वैव च्यवनस्तपसान्वितः ॥ २५ ॥
अद्भिः सिक्त्वास्तम्भयत् तं सवज्रं सहपर्वतम् ।
उस समय उनके नेत्र अमर्षसे आकुल हो रहे थे। भगवान् इन्द्रने वज्रके द्वारा भी मुनिपर आक्रमण किया। उनको आक्रमण करते देख तपस्वी च्यवनने जलका छींटा देकर वज्र और पर्वतसहित इन्द्रको स्तम्भित कर दिया—जडवत् बना दिया॥ २५½॥
अथेन्द्रस्य महाघोरं सोऽसृजच्छत्रुमेव हि ॥ २६ ॥
मदं नामाहुतिमयं व्यादितास्यं महामुनिः ।
तस्य दन्तसहस्रं तु बभूव शतयोजनम् ॥ २७ ॥
द्वियोजनशतास्तस्य दंष्ट्राः परमदारुणाः ।
हनुस्तस्याभवद् भूमावास्यं चास्यास्पृशद् दिवम् ॥ २८ ॥
जिह्वामूले स्थितास्तस्य सर्वे देवाः सवासवाः ।
तिमेरास्यमनुप्राप्ता यथा मत्स्या महार्णवे ॥ २९ ॥
इसके बाद उन महामुनिने अग्निमें आहुति डालकर इन्द्रके लिये एक अत्यन्त भयंकर शत्रु उत्पन्न किया, जिसका नाम मद था। वह मुँह फैलाकर खड़ा हो गया। उसकी ठोढ़ीका भाग जमीनमें सटा हुआ था और ऊपरवाला ओठ आकाशको छू रहा था। उसके मुँहके भीतर एक हजार दाँत थे, जो सौ-सौ योजन ऊँचे थे और उसकी भयंकर दाढ़ें दो-दो सौ योजन लंबी थीं। उस समय इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता उसकी जिह्वाकी जड़में आ गये, ठीक उसी तरह जैसे महासागरमें बहुत-से मत्स्य तिमि नामक महामत्स्यके मुखमें पड़ गये हों॥ २६—२९॥
ते सम्मन्त्र्य ततो देवा मदस्यास्यसमीपगाः।
अब्रुवन् सहिताः शक्रं प्रणमास्मै द्विजातये॥ ३०॥
अश्विभ्यां सह सोमं च पिबाम विगतज्वराः।
फिर तो मदके मुखमें पड़े हुए देवताओंने आपसमें सलाह करके इन्द्रसे कहा—'देवराज! आप विप्रवर च्यवनको प्रणाम कीजिये (इनसे विरोध करना अच्छा नहीं है)। हमलोग निश्चिन्त होकर अश्विनीकुमारोंके साथ सोमपान करेंगे'॥ ३० १/२॥
ततः स प्रणतः शक्रश्चकार च्यवनस्य तत्॥ ३१॥
च्यवनः कृतवानेतावश्विनौ सोमपायिनौ।
ततः प्रत्याहरत् कर्म मदं च व्यभजन्मुनिः॥ ३२॥
अक्षेषु मृगयायां च पाने स्त्रीषु च वीर्यवान्॥ ३३॥
यह सुनकर इन्द्रने महामुनि च्यवनके चरणोंमें प्रणाम किया और उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। फिर च्यवनने अश्विनीकुमारोंको सोमरसका भागी बनाया और अपना यज्ञ समाप्त कर दिया। इसके बाद शक्तिशाली मुनिने जुआ, शिकार, मदिरा और स्त्रियोंमें मदको बाँट दिया॥ ३१—३३॥
एतैर्दोषैर्नरा राजन् क्षयं यान्ति न संशयः।
तस्मादेतान् नरो नित्यं दूरतः परिवर्जयेत्॥ ३४॥
राजन्! इन दोषोंसे युक्त मनुष्य अवश्य ही नाशको प्राप्त होते हैं, इसमें संशय नहीं है। अतः इन्हें सदाके लिये दूरसे ही त्याग देना चाहिये॥ ३४॥
एतत् ते च्यवनस्यापि कर्म राजन् प्रकीर्तितम्।
ब्रवीम्यहं ब्रूहि वा त्वं क्षत्रियं ब्राह्मणाद् वरम्॥ ३५॥
नरेश्वर! यह तुमसे च्यवन मुनिका महान् कर्म भी बताया गया। मैं कहता हूँ—ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं अथवा तुम, बताओ कौन-सा क्षत्रिय ब्राह्मणसे श्रेष्ठ है?॥ ३५॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादे
षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायु देवता और अर्जुनका संवादविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५६ ॥
कप नामक दानवोंके द्वारा स्वर्गलोकपर अधिकार जमा लेनेपर ब्राह्मणोंका कपोंको भस्म कर देना, वायुदेव और कार्तवीर्य अर्जुनके संवादका उपसंहार
सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
कप नामक दानवोंके द्वारा स्वर्गलोकपर अधिकार जमा लेनेपर ब्राह्मणोंका कपोंको भस्म कर देना, वायुदेव और कार्तवीर्य अर्जुनके संवादका उपसंहार
भीष्म उवाच
तूष्णीमासीदर्जुनस्तु पवनस्त्वब्रवीत् पुनः ।
शृणु मे ब्राह्मणेष्वेव मुख्यं कर्म जनाधिप ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! इतनेपर भी कार्तवीर्य चुप ही रहा। तब वायु देवताने फिर कहा—नरेश्वर! ब्राह्मणोंके और भी जो श्रेष्ठ कर्म हैं, उनका वर्णन सुनो ॥ १ ॥
मदस्यास्यमनुप्राप्ता यदा सेन्द्रा दिवौकसः ।
तदैव च्यवनेनेह हृता तेषां वसुन्धरा ॥ २ ॥
जब इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता मदके मुखमें पड़ गये थे, उसी समय च्यवनने उनके अधिकारकी सारी भूमि हर ली थी (तथा कप नामक दानवोंने उनके स्वर्गलोकपर अधिकार जमा लिया था) ॥ २ ॥
उभौ लोकौ हृतौ मत्वा ते देवा दुःखिताऽभवन् ।
शोकार्ताश्च महात्मानं ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥ ३ ॥
अपने दोनों लोकोंका अपहरण हुआ जान वे देवता बहुत दुःखी हो गये और शोकसे आतुर हो महात्मा ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ ३ ॥
देवा ऊचुः
मदास्यव्यतिषक्तानामस्माकं लोकपूजित ।
च्यवनेन हृता भूमिः कपैश्चैव दिवं प्रभो ॥ ४ ॥
**देवता बोले—**लोकपूजित प्रभो! जिस समय हम मदके मुखमें पड़ गये थे, उस समय च्यवनने हमारी भूमि हर ली थी और कप नामक दानवोंने स्वर्गलोकपर अधिकार कर लिया ॥ ४ ॥
ब्रह्मोवाच
गच्छध्वं शरणं विप्रानाशु सेन्द्रा दिवौकसः ।
प्रसाद्य तानुभौ लोकाववाप्स्यथ यथा पुरा ॥ ५ ॥
**ब्रह्माजीने कहा—**इन्द्रसहित देवताओ! तुमलोग शीघ्र ही ब्राह्मणोंकी शरणमें जाओ। उन्हें प्रसन्न कर लेनेपर तुमलोग पहलेकी भाँति दोनों लोक प्राप्त कर लोगे ॥ ५ ॥
ते ययुः शरणं विप्रानूचुस्ते कान् जयामहे ।
इत्युक्तास्ते द्विजान् प्राहुर्जयतेह कपानिति ॥ ६ ॥
तब देवतालोग ब्राह्मणोंकी शरणमें गये। ब्राह्मणोंने पूछा—‘हम किनको जीतें?’ उनके इस तरह पूछनेपर देवताओंने ब्राह्मणोंसे कहा—‘आपलोग कप नामक दानवोंको परास्त कीजिये’ ॥ ६ ॥
भूगतान् हि विजेतारो वयमित्यब्रुवन् द्विजाः ।
ततः कर्म समारब्धं ब्राह्मणैः कपनाशनम् ॥ ७ ॥
तब ब्राह्मणोंने कहा—‘हम उन दानवोंको पृथ्वीपर लाकर परास्त करेंगे।’ तदनन्तर ब्राह्मणोंने कपविनाशक कर्म आरम्भ किया ॥ ७ ॥
तच्छ्रुत्वा प्रेषितो दूतो ब्राह्मणेभ्यो धनी कपैः ।
स च तान् ब्राह्मणानाह धनी कपवचो यथा ॥ ८ ॥
इसका समाचार सुनकर कपोंने ब्राह्मणोंके पास अपना धनी नामक दूत भेजा, उसने उन ब्राह्मणोंसे कपोंका संदेश इस प्रकार कहा— ॥ ८ ॥
भवद्भिः सदृशाः सर्वे कपाः किमिह वर्तते ।
सर्वे वेदविदः प्राज्ञाः सर्वे च क्रतुयाजिनः ॥ ९ ॥
सर्वे सत्यव्रताश्चैव सर्वे तुल्या महर्षिभिः ।
श्रीश्चैव रमते तेषु धारयन्ति श्रियं च ते ॥ १० ॥
‘ब्राह्मणो! समस्त कप नामक दानव आपलोगोंके ही समान हैं। फिर उनके विरुद्ध यहाँ क्या हो रहा है? सभी कप वेदोंके ज्ञाता और विद्वान् हैं। सब-के-सब यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं। सभी सत्यप्रतिज्ञ हैं और सब-के-सब महर्षियोंके तुल्य हैं। श्री उनके यहाँ रमण करती है और वे श्रीको धारण करते हैं’ ॥ ९-१० ॥
वृथादारान् न गच्छन्ति वृथामांसं न भुञ्जते ।
दीप्तमग्निं जुह्वते च गुरूणां वचने स्थिताः ॥ ११ ॥
‘वे परायी स्त्रियोंसे समागम नहीं करते। मांसको व्यर्थ समझकर उसे कभी नहीं खाते हैं। प्रज्वलित अग्निमें आहुति देते और गुरुजनोंकी आज्ञामें स्थित रहते हैं ॥ ११ ॥
सर्वे च नियतात्मानो बालानां संविभागिनः ।
उपेत्य शनकैर्यान्ति न सेवन्ति रजस्वलाम् ।
स्वर्गतिं चैव गच्छन्ति तथैव शुभकर्मिणः ॥ १२ ॥
‘वे सभी अपने मनको संयममें रखते हैं। बालकोंको उनका भाग बाँट देते हैं। निकट आकर धीरे-धीरे चलते हैं। रजस्वला स्त्रीका कभी सेवन नहीं करते। शुभकर्म करते हैं और स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥ १२ ॥
अभुक्तवत्सु नाश्नन्ति गर्भिणीवृद्धकादिषु ।
पूर्वाह्नेषु न दीव्यन्ति दिवा चैव न शेरते ॥ १३ ॥
'गर्भवती स्त्री और वृद्ध आदिके भोजन करनेसे पहले भोजन नहीं करते हैं। पूर्वाह्नमें जुआ नहीं खेलते और दिनमें नींद नहीं लेते हैं ।। १३ ।। एतैश्चान्यैश्च बहुभिर्गुणैर्युक्तान् कथं कपान् । विजेष्यथ निवर्तध्वं निवृत्तानां सुखं हि वः ।। १४ ।। 'इनसे तथा अन्य बहुत-से गुणोंद्वारा संयुक्त हुए कप नामक दानवोंको आपलोग क्यों पराजित करना चाहते हैं? इस अवांछनीय कार्यसे निवृत्त होइये, क्योंकि निवृत्त होनेसे ही आपलोगोंको सुख मिलेगा' ।। १४ ।।
ब्राह्मणा ऊचुः कपान्वयं विजेष्यामो ये देवास्ते वयं स्मृताः । तस्माद् वध्याः कपाऽस्माकं धनिन् याहि यथाऽऽगतम् ।। १५ ।। तब ब्राह्मणोंने कहा—जो देवता हैं, वे हमलोग हैं; अतः देवद्रोही कप हमारे लिये वध्य हैं। इसलिये हम कपोंके कुलको पराजित करेंगे। धनी! तुम जैसे आये हो उसी तरह लौट जाओ ।। १५ ।। धनी गत्वा कपानाह न वो विप्राः प्रियंकराः । गृहीत्वास्त्राण्यतो विप्रान् कपाः सर्वे समाद्रवन् ।। १६ ।। धनीने जाकर कपोंसे कहा—'ब्राह्मणलोग आपका प्रिय करनेको उद्यत नहीं हैं।' यह सुनकर अस्त्र-शस्त्र हाथमें ले सभी कप ब्राह्मणोंपर टूट पड़े ।। १६ ।। समुदग्रध्वजान् दृष्ट्वा कपान् सर्वे द्विजातयः । व्यसृजन् ज्वलितानग्नीन् कपानां प्राणनाशनान् ।। १७ ।। उनकी ऊँची ध्वजाएँ फहरा रही थीं। कपोंको आक्रमण करते देख सभी ब्राह्मण उन कपोंपर प्रज्वलित एवं प्राणनाशक अग्निका प्रहार करने लगे ।। १७ ।। ब्रह्मसृष्टा हव्यभुजः कपान् हत्वा सनातनाः । नभसीव यथाभ्राणि व्यराजन्त नराधिप ।। १८ ।। नरेश्वर! ब्राह्मणोंके छोड़े हुए सनातन अग्निदेव उन कपोंका संहार करके आकाशमें बादलोंके समान प्रकाशित होने लगे ।। १८ ।। हत्वा वै दानवान् देवाः सर्वे सम्भूय संयुगे । तेनाभ्यजानन् हि तदा ब्राह्मणैर्निहतान् कपान् ।। १९ ।। उस समय सब देवताओंने युद्धमें संगठित होकर दानवोंका संहार कर डाला। किंतु उस समय उन्हें यह मालूम नहीं था कि ब्राह्मणोंने कपोंका विनाश कर डाला है ।। १९ ।। अथागम्य महातेजा नारदोऽकथयद् विभो । यथा हता महाभागैस्तेजसा ब्राह्मणैः कपाः ।। २० ।।
प्रभो! तदनन्तर महातेजस्वी नारदजीने आकर यह बात बतायी कि किस प्रकार महाभाग ब्राह्मणोंने अपने तेजसे कपोंका नाश किया है ॥ २० ॥
नारदस्य वचः श्रुत्वा प्रीताः सर्वे दिवौकसः ।
प्रशंसुर्द्विजांश्चापि ब्राह्मणांश्च यशस्विनः ॥ २१ ॥
नारदजीकी बात सुनकर सब देवता बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने द्विजों और यशस्वी ब्राह्मणोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ २१ ॥
तेषां तेजस्तथा वीर्यं देवानां ववृधे ततः ।
अवाप्नुवंश्चामरत्वं त्रिषु लोकेषु पूजितम् ॥ २२ ॥
तदनन्तर देवताओंके तेज और पराक्रमकी वृद्धि होने लगी। उन्होंने तीनों लोकोंमें सम्मानित होकर अमरत्व प्राप्त कर लिया ॥ २२ ॥
इत्युक्तवचनं वायुमर्जुनः प्रत्युवाच ह ।
प्रतिपूज्य महाबाहो यत् तच्छृणु युधिष्ठिर ॥ २३ ॥
महाबाहु युधिष्ठिर! जब वायुने इस प्रकार ब्राह्मणोंका महत्त्व बतलाया, तब कार्तवीर्य अर्जुनने उनके वचनोंकी प्रशंसा करके जो उत्तर दिया, उसे सुनो ॥ २३ ॥
अर्जुन उवाच
जीवाम्यहं ब्राह्मणार्थं सर्वथा सततं प्रभो ।
ब्रह्मण्यो ब्राह्मणेभ्यश्च प्रणमामि च नित्यशः ॥ २४ ॥
अर्जुन बोला— प्रभो! मैं सब प्रकारसे और सदा ब्राह्मणोंके लिये ही जीवन धारण करता हूँ, ब्राह्मणोंका भक्त हूँ और प्रतिदिन ब्राह्मणोंको प्रणाम करता हूँ ॥ २४ ॥
दत्तात्रेयप्रसादाच्च मया प्राप्तमिदं बलम् ।
लोके च परमा कीर्तिर्धर्मश्चाचरितो महान् ॥ २५ ॥
विप्रवर दत्तात्रेयजीकी कृपासे मुझे इस लोकमें महान् बल, उत्तम कीर्ति और महान् धर्मकी प्राप्ति हुई है ॥ २५ ॥
अहो ब्राह्मणकर्माणि मया मारुत तत्त्वतः ।
त्वया प्रोक्तानि कात्स्न्र्येन श्रुतानि प्रयतेन च ॥ २६ ॥
वायुदेव! बड़े हर्षकी बात है कि आपने मुझसे ब्राह्मणोंके अद्भुत कर्मोंका यथावत् वर्णन किया और मैंने ध्यान देकर उन सबको श्रवण किया है ॥ २६ ॥
वायुरुवाच
ब्राह्मणान् क्षात्रधर्मेण पालयस्वेन्द्रियाणि च ।
भृगुभ्यस्ते भयं घोरं तत् तु कालाद् भविष्यति ॥ २७ ॥
वायुने कहा— राजन्! तुम क्षत्रिय-धर्मके अनुसार ब्राह्मणोंकी रक्षा और इन्द्रियोंका संयम करो। तुम्हें भृगुवंशी ब्राह्मणोंसे घोर भय प्राप्त होनेवाला है; परंतु यह दीर्घकालके
पश्चात् सम्भव होगा॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पवनार्जुनसंवादे
सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें वायुदेव और अर्जुनका संवादविषयक एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५७ ॥