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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

[ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन]

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[ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन]

युधिष्ठिर उवाच

इदं मे तत्त्वतो देव वक्तुमर्हस्यशेषतः ।
हिंसामकृत्वा यो मर्त्यो ब्रह्महत्यामवाप्नुयात् ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! मनुष्य ब्राह्मणकी हिंसा किये बिना ही ब्रह्महत्याके पापसे कैसे लिप्त हो जाता है, इस विषयको पूर्णतया ठीक-ठीक बतानेकी कृपा कीजिये ।।

श्रीभगवानुवाच

ब्राह्मणं स्वयमाहूय भिक्षार्थं वृत्तिकर्शितम् ।
ब्रूयान्नास्तीति यः पश्चात् तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
श्रीभगवान्‌ने कहा— राजन्! जो जीविकारहित ब्राह्मणको स्वयं ही भिक्षा देनेके लिये बुलाकर पीछे इनकार कर जाता है, उसे ब्रह्महत्यारा कहते हैं ।।

मध्यस्थस्येह विप्रस्य योऽनूचानस्य भारत ।
वृत्तिं हरति दुर्बुद्धिस्तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
भरतनन्दन! जो दुष्ट बुद्धिवाला पुरुष मध्यस्थ और ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणकी जीविका छीन लेता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।।

आश्रमे वाऽऽलये वापि ग्रामे वा नगरेऽपि वा ।
अग्निं यः प्रक्षिपेत् क्रुद्धस्तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
जो क्रोधमें भरकर किसी आश्रम, घर, गाँव अथवा नगरमें आग लगा देता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।।

गोकुलस्य तृषार्तस्य जलान्ते वसुधाधिप ।
उत्पादयति यो विघ्नं तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
पृथ्वीनाथ! प्याससे तड़पते हुए गोसमुदायको जो पानीके निकट पहुँचनेमें बाधा डालता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।।

यः प्रवृत्तां श्रुतिं सम्यक् शास्त्रं वा मुनिभिः कृतम् ।
दूषयत्यनभिज्ञाय तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
जो परम्परागत वैदिक श्रुतियों और ऋषिप्रणीत सच्छास्त्रोंपर बिना समझे-बूझे दोषारोपण करता है, उसे भी ब्रह्महत्यारा कहते हैं ।।

चक्षुषा वापि हीनस्य पङ्गोर्वापि जडस्य वा ।
हरेद् वै यस्तु सर्वस्वं तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ॥
जो अन्धे, पंगु और गूँगे मनुष्यका सर्वस्व हरण कर लेता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं ।।

गुरुं त्वंकृत्य हुंकृत्य अतिक्रम्य च शासनम्।
वर्तते यस्तु मूढात्मा तमाहुर्ब्रह्मघातकम्॥
जो मूर्खतावश गुरुको ‘तू’ कहकर पुकारता है, हुंकारके द्वारा उनका तिरस्कार करता है तथा उनकी आज्ञाका उल्लंघन करके मनमाना बर्ताव करता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं॥
यावत्सारो भवेद् दीनस्तन्नाशे यस्य दुःस्थितिः।
तत् सर्वस्वं हरेद् यो वै तमाहुर्ब्रह्मघातकम्॥
जो दीन मनुष्य किंचित् प्राप्त वस्तुओंको ही अपने लिये सार-सर्वस्व समझता है और उनके नाशसे जिसकी दुर्दशा हो जाती है, ऐसे मनुष्यका जो पुरुष सर्वस्व छीन लेता है, उसे भी ब्रह्मघाती कहते हैं॥

युधिष्ठिर उवाच
सर्वेषामपि दानानां यत् तु दानं विशिष्यते।
अभोज्यान्नांश्च ये विप्रास्तान् वदस्व सुरोत्तम॥
युधिष्ठिरने पूछा—भगवान्! जो दान सब दानोंसे श्रेष्ठ माना गया हो, उसको बतलाइये। सुरश्रेष्ठ! जिन ब्राह्मणोंका अन्न खाने योग्य न हो, उनका परिचय दीजिये॥

श्रीभगवानुवाच
अन्नमेव प्रशंसन्ति देवा ब्रह्मपुरस्सराः।
अन्नेन सदृशं दानं न भूतं न भविष्यति॥
श्रीभगवान्ने कहा—राजन्! ब्रह्मा आदि सभी देवता अन्नकी प्रशंसा करते हैं, अतः अन्नके समान दान न कोई हुआ है न होगा॥
अन्नमूर्जस्करं लोके ह्यन्नात् प्राणाः प्रतिष्ठिताः।
अभोज्यान्नान् मया राजन् वक्ष्यमाणान् निबोध मे॥
क्योंकि अन्न ही इस जगत्में बल देनेवाला है तथा अन्नके ही आधारपर प्राण टिके रहते हैं। राजन्! अब मैं उन लोगोंका परिचय दे रहा हूँ, जिनका अन्न ग्रहण करने योग्य नहीं माना गया है, ध्यान देकर सुनो॥
दीक्षितस्य कदर्यस्य क्रुद्धस्य निकृतस्य च।
अभिशप्तस्य षाण्ढस्य पाकभेदकरस्य च॥
चिकित्सकस्य दूतस्य तथा चोच्छिष्टभोजिनः।
उग्रान्नं सूतकान्नं च शूद्रोच्छेषणमेव च॥
द्विषदन्नं न भोक्तव्यं पतितान्नं च यच्छ्रुतम्।
यज्ञमें दीक्षित, कदर्य, क्रोधी, शठ, शापग्रस्त, नपुंसक, भोजनमें भेद करनेवाले, चिकित्सक, दूत, उच्छिष्टभोजी, वर्णसंकर तथा अशौचमें पड़े हुए मनुष्यका अन्न, शूद्रकी

जूठन, शत्रु का अन्न और जो पतितका अन्न माना गया है, उसे भी नहीं खाना चाहिये ।।
तथा च पिशुनस्यान्नं यज्ञविक्रयिणस्तथा ।।
शैलूषं तन्तुवायान्नं कृतघ्नस्यान्नमेव च ।
अम्बष्ठकनिषादानां रङ्गावतरकस्य च ।।
सुवर्णकर्तुर्वैणस्य शस्त्रविक्रयिणस्तथा ।
सूतानां शौण्डिकानां च वैद्यस्य रजकस्य च ।।
स्त्रीजितस्य नृशंसस्य तथा माहिषिकस्य च ।
अनिर्दशानां प्रेतानां गणिकानां तथैव च ।।
इसी प्रकार चुगलखोर, यज्ञका फल बेचनेवाले, नट और कपड़ा बुननेवाले जुलाहेका अन्न एवं कृतघ्नका अन्न, अम्बष्ठ, निषाद, रंगभूमिमें नाटक खेलनेवाले, सुनार, वीणा बजाकर जीनेवाले, हथियार बेचनेवाले, सूत, शराब बेचनेवाले, वैद्य, धोबी, स्त्रीके वशमें रहनेवाले, क्रूर और भैंस चरानेवालेका अन्न भी अग्राह्य माना गया है। जिनके यहाँ मरणाशौचके दस दिन न बीते हों, उनका तथा वेश्याओंका अन्न नहीं खाना चाहिये ।।
राजान्नं तेज आदत्ते शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम् ।
आयुः सुवर्णकारान्नं यशश्चर्मविक्रन्तिनः ।।
राजाका अन्न तेजका, शूद्रका अन्न ब्राह्मणत्वका, सुनारका अन्न आयुका और चमारका अन्न सुयशका नाश करता है ।।
गणान्नं गणिकान्नं च लोकेभ्यः परिकीर्तितम् ।
पूयं चिकित्सकस्यान्नं शुक्लं तु वृषलीपतेः ।।
विष्टा वार्धुषिक्स्यान्नं तस्मात् तत् परिवर्जयेत् ।
किसी समूहका और वेश्याका अन्न भी लोकनिन्दित माना गया है। वैद्यका अन्न पीब तथा व्यभिचारिणीके पतिका अन्न वीर्यके समान एवं व्याजखोरका अन्न विष्ठाके समान माना गया है, इसलिये उसका त्याग कर देना चाहिये ।।
अमत्यान्नमथैतेषां भुक्त्वा तु त्र्यहं क्षियेत् ।
मत्या भुक्त्वा सकृद् वापि प्राजापत्यं चरेद् द्विजः ।।
यदि अनजानमें इनका अन्न ग्रहण कर लिया गया हो तो तीन दिनतक उपवास करना चाहिये; किंतु जान-बूझकर एक बार भी इनका अन्न खा लेनेपर ब्राह्मणको प्राजापत्यव्रतका आचरण करना चाहिये ।।
दानानां च फलं यद् वै शृणु पाण्डव तत्त्वतः ।
जलदस्तृप्तिमाप्नोति सुखमक्षय्यमन्नदः ।।
पाण्डुनन्दन! अब मैं दानोंका यथार्थ फल बतला रहा हूँ, सुनो। जल-दान करनेवालेको तृप्ति होती है और अन्न देनेवालेको अक्षय सुख मिलता है ।।
तिलदश्च प्रजामिष्टां दीपश्चक्षुरुत्तमम् ।

भूमिदो भूमिमाप्नोति दीर्घमायुर्हिरण्यदः ॥ तिलका दान करनेवाला मनुष्य मनके अनुरूप संतान, दीप-दान करनेवाला पुरुष उत्तम नेत्र, भूमि देनेवाला भूमि और सुवर्ण-दान करनेवाला दीर्घ आयु पाता है ।।

गृहदोऽग्र्याणि वेश्मानि रूप्यदो रूपमुत्तमम् । वासोदश्चन्द्रसालोक्यमश्विसालोक्यमश्वदः ॥ गृह देनेवालेको सुन्दर भवन और चाँदी दान करनेवालेको उत्तम रूपकी प्राप्ति होती है। वस्त्र देनेवाला चन्द्रलोकमें और अश्वदान करनेवाला अश्विनीकुमारोंके लोकमें जाता है ।।

अनडुहः श्रियं जुष्टां गोदो गोलोकमश्रुते । यानशय्याप्रदो भार्यामैश्वर्यमभयप्रदः ॥ गाड़ी ढोनेवाले बैलका दान करनेवाला मनोऽनुकूल लक्ष्मीको पाता है और गो-दान करनेवाला पुरुष गोलोकके सुखका अनुभव करता है। सवारी और शय्या-दान करनेवाले पुरुषको स्त्रीकी तथा अभय दान देनेवालेको ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है ।।

धान्यदः शाश्वतं सौख्यं ब्रह्मदो ब्रह्मसाम्यताम् । सर्वेषामेव दानानां ब्रह्मदानं विशिष्यते ॥ धान्य दान करनेवाला मनुष्य शाश्वत सुख पाता है और वेद प्रदान करनेवाला पुरुष परब्रह्मकी समताको प्राप्त होता है। वेदका दान सब दानोंमें श्रेष्ठ है ।।

हिरण्यभूगवाश्वाजवस्त्रशय्यासनादिषु । योऽर्चितः प्रतिगृह्णाति दद्यादुचितमेव च । तावुभौ गच्छतः स्वर्गं नरकं च विपर्यये ॥ जो सोना, पृथ्वी, गौ, अश्व, बकरा, वस्त्र, शय्या और आसन आदि वस्तुओंको सम्मानपूर्वक ग्रहण करता है तथा जो दाता न्यायानुसार आदरपूर्वक दान करता है, वे दोनों ही स्वर्गमें जाते हैं; परंतु जो इसके विपरीत अनुचितरूपसे देते और लेते हैं, उन दोनोंको नरकमें गिरना पड़ता है ।।

अनृतं न वदेद् विद्वांस्तपस्तप्त्वा न विस्मयेत् । नार्तोऽप्यभिभवेद् विप्रान् न दत्त्वा परिकीर्तयेत् ॥ विद्वान् पुरुष कभी झूठ न बोले, तपस्या करके उसपर गर्व न करे, कष्टमें पड़ जानेपर भी ब्राह्मणोंका अनादर न करे तथा दान देकर उसका बखान न करे ।।

यज्ञोऽनृतेन क्षरति तपः क्षरति विस्मयात् । आयुर्विप्रावमानेन दानं तु परिकीर्तनात् ॥ झूठ बोलनेसे यज्ञका क्षय होता है, गर्व करनेसे तपस्याका क्षय होता है, ब्राह्मणके अपमानसे आयुका और अपने मुँहसे बखान करनेपर दानका नाश हो जाता है ।।

एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रमीयते । एकोऽनुभुङ्क्ते सुकृतमेकश्चाप्नोति दुष्कृतम् ॥

जीव अकेले जन्म लेता है, अकेले मरता है तथा अकेले ही पुण्यका फल भोगता है और अकेले ही पापका फल भोगता है ।।
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्ठसमं क्षितौ ।
विमुखा बान्धवा यान्ति धर्मस्तमनुवर्तते ।।
बन्धु-बान्धव मनुष्यके मरे हुए शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेके समान पृथ्वीपर डालकर मुँह फेरकर चल देते हैं। उस समय केवल धर्म ही जीवके पीछे-पीछे जाता है ।।
अनागतानि कार्याणि कर्तुं गणयते मनः ।
शारीरकं समुद्दिश्य स्मयते नूनमन्तकः ।।
तस्माद् धर्मसहायस्तु धर्मं संचिनुयात् सदा ।
धर्मेण हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम् ।।
मनुष्यका मन भविष्यके कार्योंको करनेका हिसाब लगाया करता है, किंतु काल उसके नाशवान् शरीरको लक्ष्य करके मुसकराता रहता है; इसलिये धर्मको ही सहायक मानकर सदा उसीके संग्रहमें लगे रहना चाहिये; क्योंकि धर्मकी सहायतासे मनुष्य दुस्तर नरकके पार हो जाता है ।।
येषां तडागानि बहूदकानि
सभाश्च कूपाश्च शुभाः प्रपाश्च ।
अन्नप्रदानं मधुरा च वाणी
यमस्य ते निर्विषया भवन्ति ।।
जिन्होंने अधिक जलसे भरे हुए अनेक सरोवर, धर्मशालाएँ, कुएँ और सुन्दर पौंसले बनवाये हैं तथा जो सदा अन्नका दान करते हैं और मीठी वाणी बोलते हैं, उनपर यमराजका जोर नहीं चलता ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

[धर्म और शौचके लक्षण, संन्यासी और अतिथिके सत्कारके उपदेश, शिष्टाचार

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[धर्म और शौचके लक्षण, संन्यासी और अतिथिके सत्कारके उपदेश, शिष्टाचार
दानपात्र ब्राह्मण तथा अन्न-दानकी प्रशंसा]

युधिष्ठिर उवाच

अनेकान्तं बहुद्वारं धर्ममाहुर्मनीषिणः ।
किंलक्षणोऽसौ भवति तन्मे ब्रूहि जनार्दन ॥
युधिष्ठिरने पूछा— जनार्दन! मनीषी पुरुष धर्मको अनेक प्रकारका और बहुत-से द्वारवाला बतलाते हैं। वास्तवमें उसका लक्षण क्या है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें॥

श्रीभगवानुवाच

शृणु राजन् समासेन धर्मशौचविधिक्रमम् ।
अहिंसा शौचमक्रोधमानृशंस्यं दमः शमः ।
आर्जवं चैव राजेन्द्र निश्चितं धर्मलक्षणम् ॥
श्रीभगवान्ने कहा— राजन्! तुम धर्म और शौचकी विधिका क्रम संक्षेपसे सुनो। राजेन्द्र! अहिंसा, शौच, क्रोधका अभाव, क्रूरताका अभाव, दम, शम और सरलता—ये धर्मके निश्चित लक्षण हैं॥

ब्रह्मचर्यं तपः क्षान्तिर्मधुमांसस्य वर्जनम् ।
मर्यादायां स्थितिश्चैव शमः शौचस्य लक्षणम् ॥
ब्रह्मचर्य, तपस्या, क्षमा, मधु-मांसका त्याग, धर्म-मर्यादाके भीतर रहना और मनको वशमें रखना—ये सब शौच (पवित्रता)-के लक्षण हैं॥

बाल्ये विद्यां निषेवेत यौवने दारसंग्रहम् ।
वार्धके मौनमातिष्ठेत् सर्वदा धर्ममाचरेत् ॥
मनुष्यको चाहिये कि वह बचपनमें विद्याध्ययन करे, युवावस्था होनेपर स्त्रीके साथ विवाह करे और बुढ़ापेमें मुनिवृत्तिका आश्रय ले एवं धर्मका आचरण सदा ही सब अवस्थाओंमें करता रहे॥

ब्राह्मणान् नावमन्येत गुरून् परिवदेन्न च ।
यतीनामनुकूलः स्यादेष धर्मः सनातनः ॥
ब्राह्मणोंका अपमान न करे, गुरुजनोंकी निन्दा न करे और संन्यासी महात्माओंके अनुकूल बर्ताव करे—यह सनातन धर्म है॥

यतिर्गुरुर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः ।
पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वेषां पार्थिवो गुरुः ॥
ब्राह्मणोंका गुरु संन्यासी है, चारों वर्णोंका गुरु ब्राह्मण है, समस्त स्त्रियोंके लिये गुरु उनका पति है और सबका गुरु राजा है॥

एकदण्डी त्रिदण्डी वा शिखी वा मुण्डितोऽपि वा ।

काषायदण्डधारोऽपि यतिः पूज्यो न संशयः ।। संन्यासी एक दण्ड धारण करनेवाला हो या तीन दण्ड, बड़ी-बड़ी जटाएँ रखता हो या माथा मुँडाये रहता हो अथवा गेरुआ वस्त्र पहननेवाला हो, निःसंदेह उसका सत्कार करना चाहिये ।।

तस्मात् तु यत्नतः पूज्या मद्भक्ता मत्परायणाः । मयि संन्यस्तकर्माणः परत्र हितकाङ्क्षिभिः ।। इसलिये जो परलोकमें अपना कल्याण चाहते हों, उन पुरुषोंको उचित है कि वे मुझमें समस्त कर्मोंका अर्पण करनेवाले मेरे शरणागत भक्तोंका यत्नपूर्वक सत्कार करें ।।

प्रहरेन्न द्विजान् विप्रो गां न हन्यात् कदाचन । भ्रूणहत्यासमं चैव उभयं यो निषेवते ।। ब्राह्मणोंपर हाथ न छोड़े और गायको कभी न मारे। जो ब्राह्मण इन दोनोंपर प्रहार करता है, उसे भ्रूणहत्याके समान पाप लगता है ।।

नाग्निं मुखेनोपधमेन्न च पादौ प्रदापयेत् । नाधः कुर्यात् कदाचित् तु न पृष्ठं परितापयेत् ।। अग्निको मुँहसे न फूँके, पैरोंको आगपर न तपावे और आगको पैरसे न कुचले तथा पीठकी ओरसे अग्निका सेवन न करे ।।

श्वचण्डालादिभिः स्पृष्टो नाङ्गमग्नौ प्रतापयेत् । सर्वदेवमयो वह्निस्तस्माच्छुद्धः सदा स्पृशेत् ।। जो मनुष्य कुत्ते या चाण्डालसे छू गया हो, उसे अपना अंग अग्निमें नहीं तपाना चाहिये; क्योंकि अग्नि सर्वदेवतारूप है। अतः सदा शुद्ध होकर उसका स्पर्श करना चाहिये ।।

प्राप्तमूत्रपुरीषस्तु न स्पृशेद् वह्निमात्मवान् । यावत् तु धारयेद् वेगं तावदप्रयतो भवेत् ।। मल या मूत्रकी हाजत होनेपर बुद्धिमान् पुरुषको अग्निका स्पर्श नहीं करना चाहिये, क्योंकि जबतक यह मल-मूत्रका वेग धारण करता है, तबतक अशुद्ध रहता है ।।

युधिष्ठिर उवाच

कीदृशाः साधवो विप्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् । कीदृशेभ्यो हि दातव्यं तन्मे ब्रूहि जनार्दन ।। युधिष्ठिरने पूछा— जनार्दन! जिनको दान देनेसे महान् फलकी प्राप्ति होती है, वे श्रेष्ठ ब्राह्मण कैसे होते हैं तथा किस प्रकारके ब्राह्मणोंको दान देना चाहिये? यह मुझे बताइये ।।

श्रीभगवानुवाच

अक्रोधनाः सत्यपरा धर्मनित्या जितेन्द्रियाः ।

तादृशाः साधवो विप्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥
**श्रीभगवान्ने कहा—**राजन्! जो क्रोध न करनेवाले, सत्यपरायण, सदा धर्ममें लगे रहनेवाले और जितेन्द्रिय हों, वे ही श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं तथा उन्हींको दान देनेसे महान् फलकी प्राप्ति होती है॥

अमानिनः सर्वसहा दृष्टार्था विजितेन्द्रियाः ।
सर्वभूतहिता मैत्रास्तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥
जो अभिमानशून्य, सब कुछ सहनेवाले, शास्त्रीय अर्थके ज्ञाता, इन्द्रियजयी, सम्पूर्ण प्राणियोंके हितकारी, सबके साथ मैत्रीका भाव रखनेवाले हैं, उनको दिया हुआ दान महान् फलदायक है॥

अलुब्धाः शुचयो वैद्या ह्रीमन्तः सत्यवादिनः ।
स्वधर्मनिरता ये तु तेभ्यो दत्तं महाफलम् ॥
जो निर्लोभ, पवित्र, विद्वान्, संकोची, सत्यवादी और स्वधर्मपरायण हों, उनको दिया हुआ दान महान् फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है॥

साङ्गांश्च चतुरो वेदान् योऽधीयेत दिने दिने ।
शूद्रान्नं यस्य नो देहे तत् पात्रमृषयो विदुः ॥
जो प्रतिदिन अंगोंसहित चारों वेदोंका स्वाध्याय करता हो और उसके उदरमें शूद्रका अन्न न पड़ा हो, उसको ऋषियोंने दानका उत्तम पात्र माना है॥

प्रज्ञाश्रुताभ्यां वृत्तेन शीलेन च समन्वितः ।
तारयेत् तत्कुलं सर्वमेकोऽपीह युधिष्ठिर ॥
युधिष्ठिर! यदि शुद्ध बुद्धि, शास्त्रीय ज्ञान, सदाचार और उत्तम शीलसे युक्त एक ब्राह्मण भी दान ग्रहण कर ले तो वह दाताके समस्त कुलका उद्धार कर देता है॥

गामश्वमन्नं वित्तं वा तद्विधे प्रतिपादयेत् ।
निशम्य तु गुणोपेतं ब्राह्मणं साधुसम्मत्तम् ।
दूरादाहृत्य सत्कृत्य तं प्रयत्नेन पूजयेत् ॥
ऐसे ब्राह्मणको गाय, घोड़ा, अन्न और धन देना चाहिये। सत्पुरुषोंद्वारा सम्मानित किसी गुणवान् ब्राह्मणका नाम सुनकर उसे दूरसे भी बुलाना और प्रयत्नपूर्वक उसका सत्कार तथा पूजन करना चाहिये॥

युधिष्ठिर उवाच

धर्माधर्मविधिस्त्वेवं भीष्मेण सम्प्रभाषितम् ।
भीष्मवाक्यात् सारभूतं वद धर्मं सुरेश्वर ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**देवेश्वर! धर्म और अधर्मकी इस विधिका भीष्मजीने विस्तारके साथ वर्णन किया था। आप उनके वचनोंमेंसे सारभूत धर्म छाँटकर बतलाइये॥

श्रीभगवानुवाच

अन्नेन धार्यते सर्वं जगदेतच्चराचरम् । अन्नात् प्रभवति प्राणः प्रत्यक्षं नास्ति संशयः ॥ श्रीभगवान् बोले— राजन्! समस्त चराचर जगत् अन्नके ही आधारपर टिका हुआ है। अन्नसे प्राणकी उत्पत्ति होती है, यह बात प्रत्यक्ष है; इसमें संशय नहीं है ॥

कलत्रं पीडयित्वा तु देशो काले च शक्तितः । दातव्यं भिक्षवे चान्नमात्मनो भूतिमिच्छता ॥ अतः अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको स्त्रीको कष्ट देकर अर्थात् उसके भोजनमेंसे बचाकर भी देश और कालका विचार करके भिक्षुकको शक्तिके अनुसार अवश्य अन्नदान करना चाहिये ॥

विप्रमध्वपरिश्रान्तं बालं वृद्धमथापि वा । अर्चयेद् गुरुवत् प्रीतो गृहस्थो गृहमागतम् ॥ ब्राह्मण बालक हो अथवा बूढ़ा, यदि वह रास्तेका थका-माँदा घरपर आ जाय तो गृहस्थ पुरुषको बड़ी प्रसन्नताके साथ गुरुकी भाँति उसका सत्कार करना चाहिये ॥

क्रोधमुत्पतितं हित्वा सुशीलो वीतमत्सरः । अर्चयेदतिथिं प्रीतः परत्र हितभूतये ॥ परलोकमें कल्याणकी प्राप्तिके लिये मनुष्यको अपने प्रकट हुए क्रोधको भी रोककर, मत्सरताका त्याग करके सुशीलता और प्रसन्नतापूर्वक अतिथिकी पूजा करनी चाहिये ॥

अतिथिं नावमन्येत नानृतां गिरमीरयेत् । न पृच्छेद् गोत्रचरणं नाधीतं वा कदाचन ॥ गृहस्थ पुरुष कभी अतिथिका अनादर न करे, उससे झूठी बात न कहे तथा उसके गोत्र, शाखा और अध्ययनके विषयमें भी कभी प्रश्न न करे ॥

चण्डालो वा श्वपाको वा काले यः कश्चिदागतः । अन्नेन पूजनीयः स्यात् परत्र हितमिच्छता ॥ भोजनके समयपर चाण्डाल या श्वपाक (महा चाण्डाल) भी घर आ जाय तो परलोकमें हित चाहनेवाले गृहस्थको अन्नके द्वारा उसका सत्कार करना चाहिये ॥

पिधाय तु गृहद्वारं भुङ्क्ते योऽन्नं प्रहृष्टवान् । स्वर्गद्वारपिधानं वै कृतं तेन युधिष्ठिर ॥ युधिष्ठिर! जो (किसी भिक्षुकके भयसे) अपने घरका दरवाजा बंद करके प्रसन्नतापूर्वक भोजन करता है, उसने मानो अपने लिये स्वर्गका दरवाजा बंद कर दिया है ॥

पितॄन् देवानृषीन् विप्रानतिथींश्च निराश्रयान् । यो नरः प्रीणयत्यन्नैस्तस्य पुण्यफलं महत् ॥

जो देवताओं, पितरों, ऋषियों, ब्राह्मणों, अतिथियों और निराश्रय मनुष्योंको अन्नसे तृप्त करता है, उसको महान् पुण्यफलकी प्राप्ति होती है।। कृत्वा तु पापं बहुशो यो दद्यादन्नमर्थिने । ब्राह्मणाय विशेषेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। जिसने अपने जीवनमें बहुत-से पाप किये हों, वह भी यदि याचक ब्राह्मणको विशेषरूपसे अन्नदान करता है तो सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है।। अन्नदः प्राणदो लोके प्राणदः सर्वदो भवेत् । तस्मादन्नं विशेषेण दातव्यं भूतिमिच्छता ।। संसारमें अन्न देनेवाला पुरुष प्राणदाता माना जाता है और जो प्राणदाता है, वही सब कुछ देनेवाला है। अतः कल्याण चाहनेवाले पुरुषको अन्नका दान विशेषरूपसे करना चाहिये।।

अन्नं ह्यमृतमित्याहुरन्नं प्रजननं स्मृतम् । अन्नप्रणाशे सीदन्ति शरीरे पञ्च धातवः ।। अन्नको अमृत कहते हैं और अन्न ही प्रजाको जन्म देनेवाला माना गया है। अन्नके नाश होनेपर शरीरके पाँचों धातुओंका नाश हो जाता है।।

बलं बलवतो नश्येदन्नहीनस्य देहिनः ।
तस्मादन्नं विशेषेण श्रद्धयाश्रद्धयापि वा ॥
बलवान् पुरुष भी यदि अन्नका त्याग कर दे तो उसका बल नष्ट हो जाता है। इसलिये श्रद्धासे हो या अश्रद्धासे, अधिक चेष्टा करके अन्न-दान देना चाहिये ।।

आदत्ते हि रसं सर्वमादित्यः स्वगभस्तिभिः ।
वायुस्तस्मात् समादाय रसं मेघेषु धारयेत् ॥
सूर्य अपनी किरणोंसे पृथ्वीका सारा रस खींचते हैं और हवा उसे लेकर बादलोंमें स्थापित कर देती है ।।

तत् तु मेघगतं भूमौ शक्रो वर्षति तादृशम् ।
तेन दिग्धा भवेद् देवी मही प्रीता च भारत ॥
भरतनन्दन! बादलोंमें पड़े हुए उस रसको इन्द्र पुनः इस पृथ्वीपर बरसाते हैं। उससे आप्लावित होकर पृथ्वी देवी तृप्त होती हैं ।।

तस्यां सस्यानि रोहन्ति यैर्जीवन्त्यखिलाः प्रजाः ।
मांसमेदोऽस्थिमज्जानां सम्भवस्तेभ्य एव हि ॥
तब उसमेंसे अन्नके पौधे उगते हैं, जिनसे सम्पूर्ण प्रजाका जीवन-निर्वाह होता है। मांस, मेद, अस्थि और मज्जाकी उत्पत्ति नाना प्रकारके अन्नसे ही होती है ।।

(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

[भोजनकी विधि, गौओंको घास डालनेका विधान और तिलका माहात्म्य तथा ब्राह्मणके लिये तिल और गन्ना पेरनेका निषेध]

⬅ विषय-सूची (TOC)

[भोजनकी विधि, गौओंको घास डालनेका विधान और तिलका माहात्म्य तथा ब्राह्मणके लिये तिल और गन्ना पेरनेका निषेध]

युधिष्ठिर उवाच

अन्नदानफलं श्रुत्वा प्रीतोऽस्मि मधुसूदन ।
भोजनस्य विधिं वक्तुं देवदेव त्वमर्हसि ।।
**युधिष्ठिरने कहा—**देवाधिदेव मधुसूदन! अन्न-दानका फल सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है, अब आप भोजनकी विधि बतानेकी कृपा कीजिये ।।

श्रीभगवानुवाच

भोजनस्य द्विजातीनां विधानं शृणु पाण्डव ।
स्नातः शुचिः शुचौ देशे निर्जने हुतपावकः ।।
मण्डलं कारयित्वा च चतुरस्रं द्विजोत्तमः ।
क्षत्रियश्चैत् ततो वृत्तं वैश्योऽर्धेन्दुसमाकृतम् ।।
**श्रीभगवान् बोले—**पाण्डुनन्दन! द्विजातियोंके भोजनका जो विधान है, उसे सुनो। श्रेष्ठ द्विजको उचित है कि वह स्नान करके पवित्र हो अग्निहोत्र करनेके बाद शुद्ध और एकान्त स्थानमें बैठकर ब्राह्मण हो तो चौकोना, क्षत्रिय हो तो गोलाकार और वैश्य हो तो अर्धचन्द्राकार मण्डल बनावे ।।

आर्द्रपादस्तु भुञ्जीयात् प्राङ्मुखश्चासने शुचौ ।
पादाभ्यां धरणीं स्पृष्ट्वा पादेनैकेन वा पुनः ।।
उसके बाद पैर धोकर उसी मण्डलमें बिछे हुए शुद्ध आसनके ऊपर पूर्वाभिमुख होकर बैठ जाय और दोनों पैरोंसे अथवा एक पैरके द्वारा पृथ्वीका स्पर्श किये रहे ।।

नैकवासास्तु भुञ्जीयान्न चान्तर्धाय वा द्विजः ।
न भिन्नपात्रे भुञ्जीत पर्णपृष्ठे तथैव च ।।
द्विज एक वस्त्र पहनकर तथा सारे शरीरको कपड़ेसे ढककर भी भोजन न करे। इसी प्रकार फूटे हुए बर्तनमें तथा उलटी पत्तलमें भी भोजन करना निषिद्ध है ।।

अन्नं पूर्वं नमस्कुर्यात् प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
नान्यदालोकयेदन्नान्न जुगुप्सेत तत्परः ।।
भोजन करनेवाले पुरुषको चाहिये कि प्रसन्नचित्त होकर पहले अन्नको नमस्कार करे। अन्नके सिवा दूसरी ओर दृष्टि न डाले तथा भोजन करते समय परोसे हुए अन्नकी निन्दा न करे ।।

जुगुप्सितं च यच्चान्नं राक्षसा एव भुञ्जते ।
पाणिना जलमुद्धृत्य कुर्यादन्नं प्रदक्षिणम् ।।

जिस अन्नकी निन्दा की जाती है, उसे राक्षस खाते हैं! भोजन आरम्भ करनेसे पहले हाथमें जल लेकर उसके द्वारा अन्नकी प्रदक्षिणा करे ।।

पञ्च प्राणाहुतीः कुर्यात् समन्त्रं तु पृथक् पृथक् ।।
फिर मन्त्र पढ़कर पृथक्-पृथक् पाँचों प्राणोंको अन्नकी आहुति दे ।।

यथा रसं न जानाति जिह्वा प्राणाहुतौ नृप ।
तथा समाहितः कुर्यात् प्राणाहुतिमतन्द्रितः ।।
राजन्! प्राणोंको आहुति देते समय स्थिरचित्त और सावधान होकर इस प्रकार प्राणोंको आहुति दे जिससे जिह्वाको रसका ज्ञान न हो ।।

विदित्वाऽन्नमथान्नादं पञ्च प्राणांश्च पाण्डव ।
यः कुर्यादाहुतीः पञ्च तेनेष्टाः पञ्च वायवः ।।
पाण्डुनन्दन! अन्न, अन्नाद और पाँचों प्राणोंके तत्त्वको जानकर जो प्राणाग्निहोत्र करता है, उसके द्वारा पञ्चवायुओंका यजन हो जाता है ।।

अतोऽन्यथा तु भुञ्जानो ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ।
तेनान्नेनासुरान् प्रेतान् राक्षसांस्तर्पयिष्यति ।।
इसके विपरीत भोजन करनेवाला मूर्ख ब्राह्मण अन्नके द्वारा असुर, प्रेत और राक्षसोंको ही तृप्त करता है ।।

वक्त्रप्रमाणान् पिण्डांश्च ग्रसेदेकैकशः पुनः ।
वक्त्राधिकं तु यत् पिण्डमात्मोच्छिष्टं तदुच्यते ।।
प्राणोंको आहुति देनेके पश्चात् अपने मुखमें पड़ने लायक एक-एक ग्रास अन्न उठाकर भोजन करे। जो ग्रास अपने मुखमें जानेकी अपेक्षा बड़ा होनेके कारण एक बारमें न खाया जा सके, उसमेंसे बचा हुआ ग्रास अपना उच्छिष्ट कहा जाता है ।।

पिण्डावशिष्टमन्यच्च वक्त्रान्निस्सृतमेव च ।
अभोज्यं तद् विजानीयाद् भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।
ग्राससे बचे हुए तथा मुँहसे निकले हुए अन्नको अखाद्य समझे और उसे खा लेनेपर चान्द्रायण-व्रतका आचरण करे ।।

स्वमुच्छिष्टं तु यो भुङ्क्ते यो भुङ्क्ते मुक्तभोजनम् ।।
चान्द्रायणं चरेत् कृच्छ्रं प्राजापत्यमथापि वा ।
जो अपना जूठा खाता है तथा एक बार खाकर छोड़े हुए भोजनको फिर ग्रहण करता है, उसको चान्द्रायण, कृच्छ्र अथवा प्राजापत्य-व्रतका आचरण करना चाहिये ।।

स्त्रीपात्रभुङ्नरः पापः स्त्रीणामुच्छिष्टभुक्तथा ।
तया सह च यो भुङ्क्ते स भुङ्क्ते मद्यमेव हि ।
न तस्य निष्कृतिर्दृष्टा मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।।

जो पापी स्त्रीके भोजन किये हुए पात्रमें भोजन करता है, स्त्रीका जूठा खाता है तथा स्त्रीके साथ एक बर्तनमें भोजन करता है, वह मानो मदिरा पान करता है। तत्त्वदर्शी मुनियोंने उस पापसे छूटनेका कोई प्रायश्चित्त ही नहीं देखा है ।।

पिबतः पतिते तोये भोजने मखनिस्सृते ।
अभोज्यं तद् विजानीयाद् भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।।
यदि पानी पीते-पीते उसकी बूँद मुँहसे निकलकर भोजनमें गिर पड़े तो वह खानेयोग्य नहीं रह जाता। जो उसे खा लेता है, उस पुरुषको चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।।

पीतशेषं तु तन्नाम न पेयं पाण्डुनन्दन ।
पिबेद् यदि हि तन्मोहाद् द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ।।
पाण्डुनन्दन! इसी प्रकार पीनेसे बचा हुआ पानी भी पुनः पीनेके योग्य नहीं रहता। यदि कोई ब्राह्मण मोहवश उसको पी ले तो उसे चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।।

मौनी वाप्यथवा भूमौ नावलोक्य दिशस्तथा ।
भुञ्जीत विधिवद् विप्रो न चोच्छिष्टं प्रदापयेत् ।।
ब्राह्मणको उचित है कि वह मौन होकर पृथ्वी या दिशाओंकी ओर न देखते हुए विधिवत् भोजन करे, किसीको अपना जूठा न दे ।।

सदा चात्यशनं नाद्यान्नातिहीनं च कर्हिचित् ।
यथान्नेन व्यथा न स्यात् तथा भुञ्जीत नित्यशः ।।
कभी भी न तो बहुत अधिक और न कम ही भोजन करे। प्रतिदिन उतना ही अन्न खाय, जिससे अपनेको कष्ट न हो ।।

केशकीटोपपन्नं च मुखमारुतवीजितम् ।
अभोज्यं तद् विजानीयाद् भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ।।
जिस भोजनमें बाल या कोई कीड़ा पड़ा हो, जिसे मुँहसे फूँककर ठंडा किया गया हो, उसको अखाद्य समझना चाहिये। ऐसे अन्नको भोजन कर लेनेपर चान्द्रायण-व्रतका आचरण करना चाहिये ।।

उत्थाय च पुनः स्पृष्टं पादस्पृष्टं च लङ्घितम् ।
अन्नं तद् राक्षसं विद्यात् तस्मात् तत् परिवर्जयेत् ।।
भोजनके स्थानसे उठ जानेके बाद जिसे फिर छू दिया गया हो, जो पैरसे छू गया या लाँघ दिया गया हो, वह राक्षसके खानेयोग्य अन्न है; ऐसा समझकर उसका त्याग कर देना चाहिये ।।

यद्युत्तिष्ठत्यनाचान्तो भुक्तवानासनात् ततः ।
स्नानं सद्यः प्रकुर्वीत सोऽन्यथाप्रयतो भवेत् ।।

यदि आचमन किये बिना ही भोजन करनेवाला द्विज भोजनके आसनसे उठ जाय तो उसे तुरंत स्नान करना चाहिये, अन्यथा वह अपवित्र ही रहता है।।

युधिष्ठिर उवाच

तृणमुष्टिविधानं च तिलमाहात्म्यमेव च ।
इक्षोः सोमसमुद्भूतिं वक्तुमर्हसि मानद ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! गौओंके आगे घासकी मुट्ठी डालनेका विधान और तिलका माहात्म्य क्या है तथा गन्नेसे चन्द्रमाकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई है—यह बतानेकी कृपा कीजिये।।

श्रीभगवानुवाच

पितरो वृषभा ज्ञेया गावो लोकस्य मातरः ।
तासां तु पूजया राजन् पूजिताः पितृदेवताः ॥
श्रीभगवान्ने कहा— राजन्! बैलोंको जगत्‌का पिता समझना चाहिये और गौएँ संसारकी माताएँ हैं, उनकी पूजा करनेसे सम्पूर्ण पितरों और देवताओंकी पूजा हो जाती है।।

सभा प्रपा गृहाश्चापि देवतायतनानि च ।
शुद्ध्यन्ति शकृता यासां किं भूतमधिकं ततः ॥
जिनके गोबरसे लीपनेपर सभा-भवन, पौंसले, घर और देवमन्दिर भी शुद्ध हो जाते हैं, उन गौओंसे बढ़कर और कौन प्राणी हो सकता है? ।।

ग्रासमुष्टिं परगवे दद्यात् संवत्सरं तु यः ।
अकृत्वा स्वयमाहारं प्राप्तस्तत् सार्वकालिकम् ॥
जो मनुष्य एक सालतक स्वयं भोजन करनेके पहले प्रतिदिन दूसरेकी गायको मुट्ठीभर घास खिलाया करता है, उसको प्रत्येक समय गौकी सेवा करनेका फल प्राप्त होता है ।।

गावो मे मातरः सर्वाः पितरश्चैव गोवृषाः ।
ग्रासमुष्टिं मया दत्तं प्रतिगृह्णीत मातरः ॥
गोमाताके सामने घास रखकर इस प्रकार कहना चाहिये—'संसारकी समस्त गौएँ मेरी माताएँ और सम्पूर्ण वृषभ मेरे पिता हैं। गोमाताओ! मैंने तुम्हारी सेवामें यह घासकी मुट्ठी अर्पण की है, इसे स्वीकार करो' ।।

इत्युक्त्वानेन मन्त्रेण गायत्र्या वा समाहितः ।
अभिमन्त्र्य ग्रासमुष्टिं तस्य पुण्यफलं शृणु ॥
यह मन्त्र पढ़कर अथवा गायत्रीका उच्चारण करके एकाग्रचित्तसे घासको अभिमन्त्रित करके गौको खिला दे। ऐसा करनेसे जिस पुण्यफलकी प्राप्ति होती है, उसे सुनो ।।

यत् कृतं दुष्कृतं तेन ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा ।

तस्य नश्यति तत् सर्वं दुःस्वप्नं च विनश्यति ।।
उस पुरुषने जान-बूझकर या अनजानमें जो-जो पाप किये होते हैं, वह सब नष्ट हो जाते हैं तथा उसको कभी बुरे स्वप्न नहीं दिखायी देते ।।
तिलाः पवित्राः पापघ्ना नारायणसमुद्भवाः ।
तिलान् श्राद्धे प्रशंसन्ति दानं चेदमनुत्तमम् ।।
तिल बड़े पवित्र और पापनाशक होते हैं, भगवान् नारायणसे उनकी उत्पत्ति हुई है। इसलिये श्राद्धमें तिलकी बड़ी प्रशंसा की गयी है और तिलका दान अत्यन्त उत्तम दान बताया गया है ।।
तिलान् दद्यात् तिलान् भक्ष्यात् तिलान् प्रातरुपस्पृशेत् ।
तिलं तिलमिति ब्रूयात् तिलाः पापहरा हि ते ।।
तिल दान करे, तिल भक्षण करे और सबेरे तिलका उबटन लगाकर स्नान करे तथा सदा ही अपने मुँहसे ‘तिल-तिल’ का उच्चारण किया करे; क्योंकि तिल सब पापोंको नष्ट करनेवाले होते हैं ।।
तिलान् न पीडयेद् विप्रो यन्त्रचक्रे स्वयं नृप ।
पीडयन् हि द्विजो मोहान्नरकं याति रौरवम् ।।
राजन्! ब्राह्मणको स्वयं तिल पेरनेकी मशीनमें तिल डालकर तेल नहीं पेरना चाहिये। जो मोहवश स्वयं ही तिल पेरता है, वह रौरव नरकमें पड़ता है ।।
इक्षुवंशोद्भवः सोमः सोमवंशोद्भवा द्विजाः ।
तस्मान्न पीडयेदिक्षुं यन्त्रचक्रे द्विजोत्तमः ।।
युधिष्ठिर! चन्द्रमा इक्षु (गन्ने)-के वंशमें उत्पन्न हुआ है और ब्राह्मण चन्द्रमाके वंशमें उत्पन्न हुए हैं। इसलिये ब्राह्मणको कोल्हूमें गन्ना नहीं पेरना चाहिये ।।
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)

[आपद्धर्म, श्रेष्ठ और निन्द्य ब्राह्मण, श्राद्धका उत्तम काल और मानव-धर्म-सारका वर्णन]

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[आपद्धर्म, श्रेष्ठ और निन्द्य ब्राह्मण, श्राद्धका उत्तम काल और मानव-धर्म-सारका वर्णन]

युधिष्ठिर उवाच

समुच्चयं च धर्माणां भोज्याभोज्यं तथैव च ।
श्रुतं मया त्वत्प्रसादादापद्धर्मं वदस्व मे ।।
युधिष्ठिरने कहा— भगवन्! आपकी कृपासे मैंने सब धर्मोंके संग्रहका एवं भोजनके योग्य और भोजनके अयोग्य अन्नका विषय भी सुन लिया। अब कृपा करके आपद्धर्मका वर्णन कीजिये ।।

श्रीभगवानुवाच

दुर्भिक्षे राष्ट्रसम्बाधेऽप्याशौचे मृतसूतके ।
धर्मकालेऽध्वनि तथा नियमो येन लुप्यते ।।
दूराध्वगमनात् खिन्नो द्विजालाभेऽथ शूद्रतः ।
अकृतान्नं तु यत् किंचिद् गृह्णीयादात्मवृत्तये ।।
श्रीभगवान् बोले— राजन्! जब देशमें अकाल पड़ा हो, राष्ट्रके ऊपर कोई आपत्ति आयी हो, जन्म या मृत्युका सूतक हो तथा कड़ी धूपमें रास्ता चलना पड़ा हो और इन सब कारणोंसे नियमका निर्वाह न हो सके तथा दूरका मार्ग तै करनेके कारण विशेष थकावट आ गयी हो, उस अवस्थामें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यके न मिलनेपर शूद्रसे भी जीवन-निर्वाहके लिये थोड़ा-सा कच्चा अन्न लिया जा सकता है ।।

आतुरो दुःखितो वापि तथार्तो वा बुभुक्षितः ।
भुञ्जन्नविधिना विप्रः प्रायश्चित्तायते न च ।।
रोगी, दुखी, पीड़ित और भूखा ब्राह्मण यदि विधि-विधानके बिना भोजन कर ले तो भी उसे प्रायश्चित्त नहीं लगता ।।

अष्टौ तान्यव्रतघ्नानि आपो मूलं घृतं पयः ।
हविर्ब्राह्मणकाम्या च गुरोर्वचनमौषधम् ।।
जल, मूल, घी, दूध, हवि, ब्राह्मणकी इच्छा पूर्ण करना, गुरुकी आज्ञाका पालन और ओषधि—इन आठोंके सेवनसे व्रतका भंग नहीं होता ।।

अशक्तो विधिवत् कर्तुं प्रायश्चित्तानि यो नरः ।
विदुषां वचनेनापि दानेनापि विशुद्ध्यति ।।
जो मनुष्य विधिपूर्वक प्रायश्चित्त करनेमें असमर्थ हो, वह विद्वानोंके वचनसे तथा दानके द्वारा भी शुद्ध हो सकता है ।।

अनृतावृतुकाले वा दिवा रात्रौ तथापि वा ।
प्रोषितस्तु स्त्रियं गच्छेत् प्रायश्चित्तीयते न च ।।

परदेशमें रहनेवाला पुरुष यदि कुछ कालके लिये घर आवे तो वह ऋतुकालमें तथा उससे भिन्न समयमें भी, रातमें या दिनमें भी अपनी स्त्रीके साथ समागम करनेपर प्रायश्चित्तका भागी नहीं होता ।।

युधिष्ठिर उवाच

प्रशस्याः कीदृशा विप्रा निन्द्याश्चापि सुरेश्वर ।
अष्टकायाश्च कः कालस्तन्मे कथय सुव्रत ।।
युधिष्ठिरने पूछा— उत्तम व्रतका पालन करनेवाले देवेश्वर! कैसे ब्राह्मण प्रशंसाके योग्य होते हैं और कैसे निन्दाके योग्य? तथा अष्टका-श्राद्धका कौन-सा समय है? यह मुझे बताइये ।।

श्रीभगवानुवाच

कुलीनः कर्मकृद् वैद्यस्तथा चाप्यानृशंस्यवान् ।
श्रीमानृजुः सत्यवादी पात्राः सर्व इमे द्विजाः ।।
श्रीभगवान्ने कहा— राजन्! उत्तम कुलमें उत्पन्न, शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले, विद्वान्, दयालु, श्रीसम्पन्न, सरल और सत्यवादी—ये सभी ब्राह्मण सुपात्र (प्रशंसाके योग्य) माने जाते हैं ।।

एते चाग्रासनस्थास्ते भुञ्जानाः प्रथमं द्विजाः ।
तस्यां पङ्क्तयां तु ये चान्ये तान् पुनन्त्येव दर्शनात् ।।
ये आगेके आसनपर बैठकर सबसे पहले भोजन करनेके अधिकारी हैं तथा उस पंक्तिमें जितने लोग बैठे होते हैं, उन सबको ये अपने दर्शनमात्रसे पवित्र कर देते हैं ।।

मद्भक्ता ये द्विजश्रेष्ठा मद्गता मत्परायणाः ।
तान् पङ्क्तिपावनान् विद्धि पूज्यांश्चैव विशेषतः ।।
जो श्रेष्ठ ब्राह्मण मुझमें मन लगानेवाले और मेरे शरणागत भक्त हों, उन्हें पङ्क्तिपावन समझो। वे विशेषरूपसे पूजा करनेके योग्य हैं ।।

निन्द्यान् शृणु द्विजान् राजन्नपि वा वेदपारगान् ।।
ब्राह्मणच्छद्मना लोके चरतः पापकारिणः ।
राजन्! अब निन्दाके योग्य ब्राह्मणोंका वर्णन सुनो। जो ब्राह्मण संसारमें कपटपूर्ण बर्ताव करते हैं, वे वेदोंके पारगामी विद्वान् होनेपर भी पापाचारी ही माने जाते हैं ।।

अनग्निरनधीयानः प्रतिग्रहरुचिस्तु यः ।।
यतस्ततस्तु भुञ्जानस्तं विद्याद् ब्रह्मदूषकम् ।
जो अग्निहोत्र और स्वाध्याय न करता हो, सदा दान लेनेकी ही रुचि रखता हो और जहाँ-कहीं भी भोजन कर लेता हो, उसको ब्राह्मणजातिका कलंक समझना चाहिये ।।

मृतसूतकपुष्टाङ्गो यश्च शूद्रान्नभुग् द्विजः ।

अहं चापि न जानामि गतिं तस्य नराधिप ।।
शूद्रान्नपुष्टाङ्गोऽप्यधीयानो हि नित्यशः ।
जपतो जुह्वतो वापि गतिरूर्ध्वं न विद्यते ।।
नरेश्वर! जिसका शरीर मरणाशौचका अन्न खाकर मोटा हुआ हो, जो शूद्रका अन्न भोजन करता हो और शूद्रके ही अन्नके रससे पुष्ट हुआ हो, उस ब्राह्मणकी किस प्रकार गति होती है, मैं नहीं जानता; क्योंकि प्रतिदिन स्वाध्याय, जप और होम करनेपर भी उसकी उत्तम गति नहीं होती ।।

आहिताग्निश्च यो विप्रः शूद्रान्नान्न निवर्तते ।
पञ्च तस्य प्रणश्यन्ति आत्मा ब्रह्म त्रयोऽग्नयः ।।
जो ब्राह्मण प्रतिदिन अग्निहोत्र करनेपर भी शूद्रके अन्नसे बचा न रहता हो, उसके आत्मा, वेदाध्ययन और तीनों अग्नि—इन पाँचोंका नाश हो जाता है ।।

शूद्रप्रेषणकर्तुश्च ब्राह्मणस्य विशेषतः ।
भूमावन्नं प्रदातव्यं श्वशृगालसमो हि सः ।।
शूद्रकी सेवा करनेवाले ब्राह्मणको खानेके लिये विशेषतः जमीनपर ही अन्न डाल देना चाहिये; क्योंकि वह कुत्ते और गीदड़के ही समान होता है ।।

प्रेतभूतं तु यः शूद्रं ब्राह्मणो ज्ञानदुर्बलः ।
अनुगच्छेन्नीयमानं त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् ।।
जो ब्राह्मण मूर्खतावश मरे हुए शूद्रके शवके पीछे-पीछे श्मशानभूमिमें जाता है, उसको तीन रातका अशौच लगता है ।।

त्रिरात्रे तु ततः पूर्णे नदीं गत्वा समुद्रगाम् ।
प्राणायामशतं कृत्वा घृतं प्राश्य विशुद्ध्यति ।।
तीन रात पूर्ण होनेपर किसी समुद्रमें मिलनेवाली नदीके भीतर स्नान करके सौ बार प्राणायाम करे और घी पीवे तो वह शुद्ध होता है ।।

अनाथं ब्राह्मणं प्रेतं ये वहन्ति द्विजोत्तमाः ।
पदे पदेऽश्वमेधस्य फलं ते प्राप्नुवन्ति हि ।।
जो श्रेष्ठ द्विज किसी अनाथ ब्राह्मणके शवको श्मशानमें ले जाते हैं, उन्हें पग-पगपर अश्वमेध-यज्ञका फल मिलता है ।।

न तेषामशुभं किंचित् पापं वा शुभकर्मणाम् ।
जलावगाहनादेव सद्यः शौचं विधीयते ।।
उन शुभ कर्म करनेवालोंको किसी प्रकारका अशुभ या पाप नहीं लगता। वे जलमें स्नान करनेमात्रसे तत्काल शुद्ध हो जाते हैं ।।

शूद्रवेश्मनि विप्रेण क्षीरं वा यदि वा दधि ।
निवृत्तेन न भोक्तव्यं विद्धि शूद्रान्नमेव तत् ।।

निवृत्तिमार्गपरायण ब्राह्मणको शूद्रके घरमें दूध या दही भी नहीं खाना चाहिये। उसे भी शूद्रान्न ही समझना चाहिये ।।
विप्राणां भोक्तुकामानामत्यन्तं चान्नकाङ्क्षिणाम् ।
यो विघ्नं कुरुते मर्त्यस्ततो नान्योऽस्ति पापकृत् ॥
अत्यन्त भूखे होनेके कारण अन्नकी इच्छावाले ब्राह्मणोंके भोजनमें जो मनुष्य विघ्न डालता है, उससे बढ़कर पापी दूसरा कोई नहीं है ।।
सर्वे च वेदाः सह षड्भिरङ्गैः
सांख्यं पुराणं च कुले च जन्म ।
नैतानि सर्वाणि गतिर्भवन्ति
शीलव्यपेतस्य नृप द्विजस्य ॥
राजन्! यदि ब्राह्मण शील एवं सदाचारसे रहित हो जाय तो छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेद, सांख्य, पुराण और उत्तम कुलका जन्म—ये सब मिलकर भी उसे सद्गति नहीं दे सकते ।।
ग्रहोपरागे विषुवेऽयनान्ते
पित्र्ये मघासु स्वसुते च जाते ।
गयेषु पिण्डेषु च पाण्डुपुत्र
दत्तं भवेन्निष्क्सहस्रतुल्यम् ॥
पाण्डुनन्दन! ग्रहणके समय, विषुवयोगमें, अयन समाप्त होनेपर, पितृकर्म (श्राद्ध आदि)-में, मघा-नक्षत्रमें, अपने यहाँ पुत्रका जन्म होनेपर तथा गयामें पिण्डदान करते समय जो दान दिया जाता है, वह एक हजार स्वर्णमुद्राके दान देनेके समान होता है ।।
वैशाखमासस्य तु या तृतीया-
नवद्यासौ कार्तिकशुक्लपक्षे ।
नभस्यमासस्य च कृष्णपक्षे
त्रयोदशी पञ्चदशी च माघे ॥
उपप्लवे चन्द्रमसो रवेश्च
श्राद्धस्य कालो ह्ययनद्वये च ।
पानीयमप्यत्र तिलैर्विमिश्रं
दद्यात् पितृभ्यः प्रयतो मनुष्यः ।
श्राद्धं कृतं तेन समा सहस्रं
रहस्यमेतत् पितरो वदन्ति ॥
वैशाखमासकी शुक्ला तृतीया, कार्तिक शुक्लपक्षकी तृतीया, भाद्रपद मासकी कृष्णा त्रयोदशी, माघकी अमावास्या, चन्द्रमा और सूर्यका ग्रहण तथा उत्तरायण और दक्षिणायनके प्रारम्भिक दिन—ये श्राद्धके उत्तम काल हैं। इन दिनोंमें मनुष्य पवित्रचित्त होकर यदि