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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

by महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा

DevanagariHindipublished534 pages

प्रस्तावना एवं मेवाड़ भौगोलिक-ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

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Published by Mahamahopadhyaya Rai Bahadur Sahitya-Vachaspati Dr. Gaurishankar Hirachand Ojha, D. Litt, Ajmer. Apply for Author's Publications to :- (i) The Author, Ajmer. (ii) Vyas & Sons, Book-Sellers, AJMER.

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राजपूताने का इतिहास. तीसरी जिल्द, तीसरा भाग प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास कर्त्ता महामहोपाध्याय राव बहादुर, साहित्यवाचस्पति डॉक्टर गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, डी० लिट्० (ऑनरेरी) म० चांदमल लड्ढा के प्रबन्ध से वैदिक यन्त्रालय, अजमेर में छपा सर्वाधिकार सुरक्षित वि० सं० १९९१. { मूल्य रु० ७,

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परलोकवासी महाराजकुमार मानसिंह

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प्रतापगढ़ राज्य के उन्नायक परम विद्यानुरागी पूर्ण पितृभक्त स्वर्गवासी महाराजकुमार मानसिंह की पवित्र स्मृति को सादर समर्पित

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BANASTHALI VIDYAPITH Central Library Accession No. - 13195. Date of Receipt - - - - - - - - -

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भूमिका इतिहास साहित्य का एक प्रधान अंग एवं जाति तथा समाज की वास्त- विक दशा का सच्चा द्योतक है। जाति, समाज एवं व्यक्ति के निर्माण और क्रमिक विकास में इसका बड़ा हाथ रहता है। कुछ समय पूर्व भारतवासी साहित्य के इस आवश्यक अंग की तरफ़ से प्रायः उदासीन रहते थे; परन्तु हर्ष का विषय है कि इधर इस रिक्त अंग की पूर्ति की ओर विद्वानों का ध्यान आकर्षित हुआ है और लोगों की प्रवृत्ति इसके पठन-पाठन की तरफ़ क्रमशः बढ़ रही है। जहां कुछ दिनों पहले हिन्दी के ऐतिहासिक ग्रंथों की गणना अंगुलियों पर की जा सकती थी, वहां अब उसमें आशा- प्रद उन्नति दृष्टिगोचर हो रही है। भारतवर्ष के इतिहास में वीरता, उदारता, दानशीलता, विद्याप्रेम, सांस्कृतिक महत्व आदि की दृष्टि से सीसोदिया जाति का प्रमुख स्थान है। सीसोदियों के मेवाड़ राज्य की गणना संसार के प्राचीनतम राज्यों में होती है, क्योंकि वहां गत चौदहसौ वर्षों से एक ही वंश का अक्षुण्ण रूप से राज्य चला आता है। प्रतापगढ़ राज्य के शासक इसी राजवंश की एक शाखा में हैं। आज से लगभग चारसौ पैंतीस वर्ष पूर्व मेवाड़ के महाराणा कुंभा के भाई क्षेमकर्ण के पुत्र सूरजमल ने इस राज्य की नींव डाली थी। तब से अबतक उसके वंशजों का यहां अधिकार चला आता है। बागड़ (डूंगरपुर-बांसवाड़ा), मालवा और मेवाड़ की सीमाओं से मिला हुआ होने से यह राज्य साधारण बोल-चाल में "कांठल" भी कहलाता है। पहाड़ियों तथा गहन वनों से आच्छादित होने के कारण पहले यहां भील, मीणां आदि की ही बस्ती विशेष रूप से थी और आय की दृष्टि से महत्वपूर्ण न-होने की वजह से इसको विजय करने की तरफ़ मुसलमान शासकों का ध्यान नहीं रहा।

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प्रतापगढ़ राज्य के इतिहास को हम तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं— १—मुग़लों से पूर्व का काल २—मुग़ल-काल ३—ब्रिटिश-काल मुग़लों से पूर्व का इस राज्य के नरेशों का जो इतिहास मिलता है वह इतना कम है कि उससे उनके व्यक्तित्व और कार्यों पर विशेष प्रकाश नहीं पड़ता; पर उससे इतना अवश्य पाया जाता है कि मेवाड़ से अलग हो जाने पर भी उन्होंने उसको अपनी मातृभूमि समझा, वीर-प्रसूता मेवाड़-भूमि का उनके हृदय में बड़ा आदर रहा और वे उसकी रक्षा के लिए सदा प्राणोत्सर्ग करने के लिए तत्पर रहते थे। भारतवर्ष में मुग़लों की प्रभुता स्थापित होने पर कितने ही अन्य राजाओं के समान प्रतापगढ़ राज्य के नरेशों ने भी मुग़लों की अधीनता स्वीकार कर ली और समय- समय पर उन्हें उनकी तरफ़ से उच्च सम्मान और मनसब आदि मिलते रहे। इस बीच मरहठों का आतंक बढ़ने पर प्रतापगढ़ भी उनके प्रभाव से मुक्त न रहा और यहां भी उनकी चौथ लगने लगी। ब्रिटिश-काल शांति, सुव्यवस्था और उन्नति का युग रहा है। ई० स० १८१८ में अंग्रेज़ सरकार के साथ सन्धि होने के बाद बाह्य और आन्तरिक झगड़ों की समाप्ति होकर राज्य उन्नति-पथ पर अग्रसर हुआ। विगत वर्षों में राज्य की राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति में बहुत अन्तर हो गया है। बहुत से प्रजा-हित के कार्यों का भी इसी काल में श्रीगणेश हुआ, जो भविष्य में सामूहिक दृष्टि से राज्य के लिए हितकर सिद्ध होंगे, फिर भी इस ओर अभी बहुत गुंजाइश है। प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास तैयार करने में निम्नलिखित चार प्रकार की सामग्री का उपयोग हुआ है— १—प्राचीन शिलालेख, दानपत्र और सिक्के २—बड़वे भाटों आदि की ख्यातें

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३ ३—शाही फ़रमान और अन्य राजकीय पत्र आदि ४—प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथ एवं संस्कृत, फ़ारसी, अंग्रेज़ी, हिन्दी और उर्दू की प्रकाशित पुस्तकें प्राचीन शिलालेख इस राज्य से केवल तीन मिले हैं, जिनमें से दो घोटार्सों गांव के विक्रम की ग्यारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ के आस-पास के और तीसरा गौतमेश्वर का विक्रम की सोलहवीं शताब्दी का है। वि० सं० की सत्रहवीं शताब्दी से बाद के शिलालेख और ताम्रपत्र प्रचुर मात्रा में मिले हैं, जिनमें ताम्रपत्रों की ही अधिकता है। बड़वे भाटों की बनाई हुई ख्यातें इस राज्य की कई हैं, जिनमें राजाओं की वंशावली के अतिरिक्त उनकी रानियों, कुंवरों आदि के नाम और उनका संक्षिप्त वृत्तान्त भी मिलता है। कहीं-कहीं राजाओं की गद्दी- नशीनी का वर्ष, मास आदि भी दिया है, पर उनमें दिये हुए रानियों आदि के नाम परस्पर एक-दूसरे से नहीं मिलते तथा संवत् एवं घटनाएं भी बहुधा इतिहास की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं। ऐसी दशा में उनका वास्तविक महत्व सन्दिग्ध ही है। इस राज्य के नरेशों में सर्वप्रथम महारावत हरिसिंह ने शाही दरबार से संबंध जोड़ा था। हरिसिंह से लगाकर पृथ्वीसिंह तक के कई शाही फ़रमान, शाहज़ादों के निशान आदि प्रतापगढ़ राज्य में विद्यमान हैं। इनके अतिरिक्त शाही अख़बारात में भी यहां के नरेशों का वृत्तांत मिलता है। मरहटा-काल के कुछ काग़ज़-पत्रों और अंग्रेज़ सरकार के साथ के पत्र- व्यवहारों से भी इस राज्य की तत्कालीन स्थिति और इतिहास पर कुछ प्रकाश पड़ता है। "हरिभूषण महाकाव्य" (संस्कृत) के अतिरिक्त इस राज्य के इतिहास से संबंध रखनेवाली और कोई प्राचीन पुस्तक नहीं मिली है। अपूर्ण होने पर भी उक्त महाकाव्य से हरिसिंह से पूर्व के नरेशों के इति- हास पर थोड़ा प्रकाश पड़ता है। उसमें दी हुई घटनाओं का मिलान भी अन्य ग्रन्थों से हो जाता है, परन्तु काव्य-ग्रंथ होने से कई स्थलों पर

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४ उसमें मुख्य-मुख्य बातें छोड़ दी गई हैं या उलट-पुलट लिखी हैं। मुहणोत नैणसी की ख्यात से इस राज्य के वर्तमान नरेशों के प्रारम्भिक इतिहास की बहुत-कुछ पूर्ति होती है। कई फ़ारसी तवारीखों में भी यथाप्रसंग प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास आया है। अंग्रेज़ी इतिहासों में माल्कम की रिपोर्ट, टॉड-कृत "राजस्थान"। प्रतापगढ़ राज्य का गैज़ेटियर, लॉयल राजपूताना आदि पुस्तकें इस राज्य के इतिहास के लिए उपयोगी सिद्ध हुई हैं। हिन्दी भाषा की पुस्तकों में "वीरविनोद" और उर्दू की पुस्तकों में "वक़ाये राजपूताना" में इस राज्य का बहुत कुछ इतिहास मिलता है। इन पुस्तकों के अतिरिक्त महारावत हरिसिंह-निर्मित ग्रंथ तथा हरिसिंह और प्रतापसिंह के आश्रय में भिन्न-भिन्न विद्वानों-द्वारा रचित पुस्तकें भी इस राज्य के इतिहास के लिए उपयोगी हैं। प्रस्तुत ग्रंथ में प्रतापगढ़ राज्य के संक्षिप्त भौगोलिक परिचय एवं प्राचीन इतिहास के अतिरिक्त क्षेमकर्ण से लगाकर वर्तमान समय तक के प्रतापगढ़ के नरेशों का विस्तृत तथा सरदारों और प्रसिद्ध घरानों आदि का संक्षिप्त इतिहास है। इसके प्रणयन में मैंने ऊपरिलिखित सामग्री का पूरा- पूरा उपयोग किया है। यह सत्य है कि निरन्तर लड़ाई-झगड़ों में व्यस्त रहने के कारण प्रतापगढ़ के नरेशों का भी अन्य राजपूत राज्यों के राजाओं की भांति इतिहास सुरक्षित नहीं रह सका है, फिर भी जो कुछ इतिहास उपलब्ध है उससे उनके अतीत गौरव पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। जहां तक बना आधुनिक शोध को स्थान देकर मैंने इसे सर्वांगपूर्ण बनाने का प्रयत्न किया है। अंध परंपरागत जनश्रुतियां, ख्यातों तथा काव्यों आदि में लिखी हुई कल्पित और खुशामद भरी बातें वास्तविक इतिहास को कितना नष्ट-भ्रष्ट कर सकती हैं, इसका मैंने कई स्थल पर संकेत किया है और वही बातें ग्रहण की हैं, जिनकी अन्यत्र पुष्टि हो जाती है। जहां-जहां ऐतिहासिक त्रुटियां दिखाई पड़ीं, मैंने यथाशक्य उनका निरा- करण करने का प्रयत्न किया है। प्रतापगढ़ राज्य में अभी शोध के लिए पूरा स्थान है। इस राज्य के घोटासीं, वरमंडल, वीरपुर, खेरोट, गौतमेश्वर, अरणोद, अचूंडला, नीनोर

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विषय-सूची पहला अध्याय भूगोल सम्बन्धी वर्णन विषय पृष्ठाङ्क नाम ... ... ... ... १ स्थान और क्षेत्रफल ... ... ... १ सीमा ... ... ... ... २ पर्वत श्रेणियां ... ... ... २ नदियां ... ... ... ... २ झीलें ... ... ... ... ३ जलवायु और वर्षा ... ... ... ३ जमीन और पैदावार ... ... ... ३ जंगल ... ... ... ... ४ पशु-पक्षी ... ... ... ... ५ खानें ... ... ... ... ५ रेलवे ... ... ... ... ५ सड़कें ... ... ... ... ५ जनसंख्या ... ... ... ... ६ धर्म ... ... ... ... ६ जातियां ... ... ... ... ६ शिक्षा ... ... ... ... ७ पोशाक ... ... ... ... ७ भाषा ... ... ... ... ७

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( २ ) विषय पृष्ठाङ्क लिपि ... ... ... ७ दस्तकारी ... ... ... ८ व्यापार ... ... ... ८ त्योहार ... ... ... ९ मेले ... ... ... ९ डाकखाने और तारघर ... ... ... ९ शिक्षा ... ... ... ९ अस्पताल ... ... ... १० ज़िले ... ... ... १० न्याय ... ... ... ११ शासन, जागीर और भोम आदि ... ... १२ सेना और पुलिस आदि ... ... ... १३ आय-व्यय ... ... ... १३ सिक्का ... ... ... १३ तोपों की सलामी और खिराज ... ... १५ प्रसिद्ध और प्राचीन स्थान ... ... १५ देवलिया ... ... ... १५ प्रतापगढ़ ... ... ... १८ जानागढ़ ... ... ... २० घोटार्सी ... ... ... २१ वीरपुर ... ... ... २४ खेरोट ... ... ... २५ अरणोद ... ... ... २५ गौतमेश्वर ... ... ... २५ भचूंडला ... ... ... २६ नीनोर ... ... ... २६

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( ३ ) विषय पृष्ठाङ्क ऐंगना ... ... ... २७ ─────────────────────────── दूसरा अध्याय सीसोदियों से पूर्व के राजवंश गुर्जर प्रतिहार ... ... ... ३० नागभट्ट ... ... ... ३२ ककुत्स्थ ... ... ... ३२ देवराज ... ... ... ३२ वत्सराज ... ... ... ३२ नागभट्ट (दूसरा) ... ... ... ३२ रामभद्र ... ... ... ३३ भोजदेव ... ... ... ३४ महेंद्रपाल ... ... ... ३४ महिपाल ... ... ... ३४ भोज (दूसरा) ... ... ... ३४ विनायकपाल ... ... ... ३५ महेंद्रपाल (दूसरा) ... ... ... ३५ देवपाल ... ... ... ३६ विजयपाल ... ... ... ३६ राज्यपाल ... ... ... ३६ त्रिलोचनपाल ... ... ... ३६ यशःपाल ... ... ... ३६ परमार तथा सोलंकी ... ... ... ३७ चाहमान शासक ... ... ... ३६ ───────────────────────────

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( ४ ) तीसरा अध्याय महारावत क्षेमकर्ण से विक्रमसिंह ( बीका ) तक विषय पृष्ठाङ्क क्षेमकर्ण से पूर्व के गुहिलवंशी नरेश ... ... ४३ क्षेमकर्ण ( क्षेमसिंह ) ... ... ... ४७ क्षेमकर्ण का जन्म ... ... ... ४७ महाराणा कुंभकर्ण और क्षेमकर्ण के बीच विरोध होना ४७ क्षेमकर्ण का मालवे के सुलतान के पास जाना ... ४८ क्षेमकर्ण का मेवाड़ पर मालवे के सुलतान को चढ़ा लाना ४६ खानसलह के अनुचर बहरी से क्षेमकर्ण का युद्ध ... ५० क्षेमकर्ण की मृत्यु ... ... ... ५१ क्षेमकर्ण की संतति ... ... ... ५३ क्षेमकर्ण का व्यक्तित्व ... ... ५३ सूरजमल ... ... ... ५४ सादड़ी का स्वामी होना ... ... ५४ रायमल का सारंगदेव को भैंसरोड़गढ़ की जागीर देना ५५ मालवे की सेना के साथ महाराणा के पक्ष में सूरजमल का युद्ध करना ... ... ५५ महाराणा के कुंवरों में पारस्परिक द्वेष की वृद्धि ... ५८ सारंगदेव का सूरजमल के पास जाकर रहना ... ६१ सूरजमल का मालवे की सेना के साथ जाकर महाराणा से युद्ध करना ... ... ६२ सूरजमल का मेवाड़ छोड़ना ... ... ६७ सूरजमल का देहान्त ... ... ७१ सूरजमल की राणियां और संतति ... ... ७१ सूरजमल का व्यक्तित्व ... ... ७३

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( ५ ) विषय पृष्ठाङ्क बाघसिंह ... ... ... ... ७४ राज्यप्राप्ति ... ... ... ७४ बाघसिंह का खानवे के युद्ध में महाराणा के साथ रहना ७४ बाघसिंह का मालवे में जाना ... ... ७५ बहादुरशाह की चित्तौड़ पर चढ़ाइयां ... ७६ चित्तौड़ की रक्षार्थ बहादुरशाह से लड़कर बाघसिंह का मारा जाना ७८ बाघसिंह की राणियां और संतति ... ... ८३ रावत बाघसिंह का व्यक्तित्व ... ... ८४ रायसिंह ... ... ... ... ८५ राज्यप्राप्ति ... ... ... ८५ धाय पन्ना का बनवीर के डर से उदयसिंह को रायसिंह के पास ले जाना ... ८५ बनवीर को चित्तौड़ से निकालने के लिए रावत रायसिंह का महाराणा की सहायतार्थ जाना ८७ रायसिंह का देहान्त और उसकी संतति ... ८८ विक्रमसिंह ( बीका ) ... ... ... ६० राज्यप्राप्ति ... ... ... ६० सादड़ी की जागीर छूट जाने पर विक्रमसिंह का कांठल में जाना ... ... ६० हाजीखां की सहायतार्थ महाराणा के साथ कुंवर तेजसिंह को भेजना ... ... ... ६१ विक्रमसिंह का सुहागपुरा, खरोट, कोटड़ी, नीनोर, दलोट और पलथाना पर अधिकार करना ६४ ख्यातें और देवी मीणी की स्मृति में देवलिया बसाने की कथा ६६ कांधल को धमोतर, सुरताणसिंह को ढोढरयाखेड़ा और विजयसिंह को खरोट की जागीर देना ... ६७

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( ६ ) विषय पृष्ठाङ्क बांसवाड़ा के स्वामी प्रतापसिंह की तरफ़ रहकर डूंगरपुर के महारावल आसकरण से युद्ध करना ९८ विक्रमसिंह का देहान्त ... ... १०१ विक्रमसिंह की राणियां और सन्तति ... १०२ विक्रमसिंह का व्यक्तित्व ... ... १०२ चौथा अध्याय महारावत तेजसिंह से प्रतापसिंह तक तेजसिंह ... ... ... ... १०४ राज्यप्राप्ति ... ... ... १०४ हल्दीघाटी के युद्ध में महारावत के काका कांधल का महाराणा के पक्ष में लड़कर काम आना ... १०४ प्रतापगढ़ राज्य की तत्कालीन स्थिति ... १०५ महारावल का पंवार हरराव आदि से युद्ध करना ... १०६ महारावत का देहान्त ... ... १०६ महारावत की राणियां और संतति आदि ... १०७ भानुसिंह ... ... ... ... १०८ राज्यप्राप्ति ... ... ... १०८ भानुसिंह और शक्तावत जोधसिंह सीसोदिया के बीच विरोध होना ... ... ... १०६ महारावत भानुसिंह और शक्तावत जोधसिंह के बीच युद्ध होना ... ... ... ११० महारावत भानुसिंह के ताम्रपत्र ... ... ११६ महारावत की राणियां ... ... ११७ महारावत भानुसिंह का व्यक्तित्व ... ... ११८

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देवला, बोरदिया आदि स्थानों में प्राचीन काल के मंदिरों के भग्नावशेष और बावड़ियां आदि विद्यमान हैं, जिनसे प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में यह इलाक़ा सुसमृद्ध था । प्रतापगढ़ राज्य में खुदाई का काम बिल्कुल नहीं हुआ है और न प्राचीन इतिहास की सामग्री की खोज ही हुई है । यदि खुदाई और शोध का कार्य हो तो और भी सामग्री मिल सकती है । ऐसी दशा में प्रतापगढ़ राज्य के सर्वांगपूर्ण इतिहास लिखने का श्रेय किसी भावी इतिहास-लेखक को ही मिलेगा, लेकिन उस समय भी मेरा यह इतिहास, मुझे विश्वास है, इतिहास-लेखकों के पथ-प्रदर्शक का काम करेगा । भूल मनुष्य मात्र से होती है । इसका मैं अपवाद नहीं हूं, और फिर इस समय मेरी वृद्धावस्था है । जो त्रुटियां मेरी दृष्टि में आईं उनके लिए पुस्तक के अंत में शुद्धिपत्र लगा दिया गया है । और भी जो त्रुटियां रह जाएं उनके लिए कृपालु पाठक मुझे क्षमा प्रदान करेंगे । सप्रमाण सूचना मिलने पर उनका द्वितीय आवृत्ति के समय सुधार कर दिया जायगा । वर्तमान प्रतापगढ़-नरेश महारावत सर रामसिंहजी बहादुर, के० सी० एस० आई० ने राज्य में उपलब्ध इतिहास संबंधी समस्त सामग्री मेरे पास भिजवाने की कृपा की, जिसके लिए मैं उनका हृदय से अनुगृहीत हूं। सीतामऊ राज्य के विद्याप्रेमी महाराजकुमार डॉक्टर रघुवीरसिंह, एम० ए०, एल-एल० बी०, डी० लिट्० का भी मैं अत्यंत आभारी हूं, क्योंकि उन्होंने अपने संग्रह से प्रतापगढ़ के संबंध के शाही फ़रमानों और अख़बारात का अंग्रेज़ी खुलासा मेरे पास भिजवाने का कष्ट उठाया है । प्रतापगढ़ राज्य की रघुनाथ संस्कृत पाठशाला के प्रधानाध्यापक पंडित जगन्नाथ शास्त्री तथा कामदार ख़ासगी शाह मन्नालाल पाडलिया भी मेरे धन्यवाद-भाजन हैं, क्योंकि उनके द्वारा मुझे राज्य से इतिहास-संबंधी सामग्री एवं समय-समय पर सत्परामर्श मिलता रहा है । मैं उन ग्रन्थकर्ताओं का भी अत्यन्त कृतज्ञ हूं, जिनकी रचनाओं का मैंने इस इतिहास के लिखने में उपयोग किया है और जिनका उल्लेख मैंने यथास्थान टिप्पणों में कर दिया है।

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६ अंत में मैं पं० नाथूलाल व्यास एवं काशी-निवासी श्री हृदयनारायण सरीन, बी० ए० (जो गत छः वर्षों से मेरे सहकारी हैं) का नामोल्लेख करना आवश्यक समझता हूं, क्योंकि आरंभ से ही उन्होंने मेरे इस इति- हास के प्रणयन में बड़ी लगन के साथ कार्य किया है। मुझे अपने पुत्र प्रोफ़ेसर रामेश्वर ओझा, एम० ए० तथा निजी इतिहास-विभाग के कार्य- कर्त्ता पं० चिरंजीलाल व्यास से भी पूरा-पूरा सहयोग प्राप्त हुआ है, अतएव उनका नामोल्लेख करना भी आवश्यक है। अजमेर, चैत्र कृष्णा सप्तमी वि० सं० १६६७ } गौरीशंकर हीराचन्द ओझा

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( ७ ) विषय पृष्ठाङ्क सिंहा ... ... ... ... ११८ राज्यप्राप्ति ... ... ... ११८ महाराणा अमरसिंह का महारावत के लिए टीका भेजना ११६ बसाड़ और अरणोद परगने का फ़रमान कुंवर कर्णसिंह के नाम होना ... ... ... १२० महाबतखां का देवलिया में जाकर रहना ... १२१ महारावत सिंहा का परलोकवास ... ... १२३ महारावत की राणियां और संतति ... ... १२४ महारावत का व्यक्तित्व ... ... १२६ जसवंतसिंह ... ... ... १२६ राज्य-प्राप्ति ... ... ... १२६ उदयपुर के महाराणा जगतसिंह ( प्रथम ) से महारावत का विरोध होना ... ... १२७ महाराणा जगतसिंह का महारावत को उदयपुर में बुलाकर मरवाना १३० महारावत की सन्तति आदि ... ... १३८ हरिसिंह ... ... ... ... १४१ राज्यप्राप्ति ... ... ... १४१ महाराणा का देवलिया पर सेना भेजना ... १४१ महारावत का शाही सेना के साथ जाकर देवलिया पर अधिकार करना ... ... ... १४३ महारावत को शाही दरबार से ख़िलअत आदि मिलना १४६ महारावत की शाहज़ादे मुराद के साथ नियुक्ति १४८ शाहज़ादे दारांशिकोह और मुराद का महारावत को अपनी-अपनी तरफ़ मिलाने का प्रयत्न करना १४६ दाराशिकोह को परास्त कर शाहज़ादे मुराद का महारावत को सुखेरीखेड़ा देना ... ... १५२

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( ८ ) विषय : पृष्ठाङ्क औरंगज़ेब का बसाड़ और गयासपुर के परगने महाराणा को देना ... ... ... १५३ सहायता के लिए दाराशिकोह का महारावत के नाम निशान भेजना ... ... ... १५४ महाराणा राजसिंह का देवलिया पर सेना भेजना ... १५५ महाराणा राजसिंह के पास महारावत का उपस्थित होना १५६ महारावत को पुनः गयासपुर और बसाड़ आदि परगने मिलना १५८ महारावत का परलोकवास ... ... १६३ महारावत की संतति ... ... १६४ महारावत के बनवाये हुए महल और उसके समय के लोकोपयोगी कार्य ... ... १६७ महारावत के समय के ताम्रपत्र और शिलालेख ... १६७ महारावत का साहित्यानुराग ... ... १७० महारावत का व्यक्तित्व ... ... १७५ प्रतापसिंह ... ... ... १७७ राज्यप्राप्ति ... ... ... १७७ महारावत को खिलअत तथा मंसब मिलना ... १७७ शाहीदरबार से महाराणा राजसिंह और महारावत की तकरार की जांच के लिए शेख इनायतुल्ला की नियुक्ति ... १७७ मेवाड़ पर बादशाह औरंगज़ेब की चढ़ाई और महारावत के नाम फ़रमान पहुंचना ... १७८ शाहज़ादे मुअज्जम का महारावत के नाम निशान भेजना १८२ महारावत का प्रतापगढ़ का क़स्वा आबाद करना ... १८३ महाराणा अमरसिंह ( दूसरा ) का महारावत से छेड़-छाड़ करना १८३ महारावत की पिपलोदे पर चढ़ाई ... ... १८४ महारावत का शेरबुलंदखां को अपने यहां आश्रय देना १८५

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( ६ ) विषय पृष्ठाङ्क बादशाह का महारावत को शाही दरबार में बुलाना १८५ महाराजा अजीतसिंह और सवाई जयसिंह का देवलिया जाना १८६ किशनगढ़ के राजा राजसिंह का देवलिया जाकर रहना १८७ महारावत का परलोकवास ... ... १८८ महारावत की राणियां और संतति ... ... १८६ महारावत के समय के लोकोपयोगी कार्य ... १९० महारावत का विद्यानुराग ... ... १९१ महारावत के समय के शिलालेख और दानपत्र ... १९१ महारावत का व्यक्तित्व ... ... १९३ ——— पांचवां अध्याय महारावत पृथ्वीसिंह से सामन्तसिंह तक पृथ्वीसिंह ... ... ... १९७ राज्यप्राप्ति ... ... ... १९७ महारावत की पुत्री का जोधपुर के महाराजा के साथ विवाह होना ... ... १९७ महारावत के नाम वसाड़ का पुनः फ़रमान और उसके मंसब में वृद्धि होना ... १९८ जहांदारशाह के पास से वसाड़ परगने का फ़रमान होना १९६ महारावत के नाम बादशाह फ़र्रुख़सियर का फ़रमान २०० महारावत का शाही इलाके में लूट-मार करना ... २०१ महारावत का अपने कुंवर पहाड़सिंह को उदयपुर भेजना २०२ आंबेर और बूंदी के नरेशों का बादशाह से महारावत की शिकायत करना ... ... २०३ शिकायतों की जांच के लिए कुतुबुलमुल्क का भेजा जाना २०४