राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
४. महाराणा सांगा (खानवा युद्ध व क्षत्रिय एकता)
२१० 'प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास की देवलिया के बड़े जैन मंदिर की प्रशस्ति, जिसमें शाह वर्षा के पुत्र शाह वर्द्धमान-द्वारा मल्लिनाथ के मंदिर की प्रतिष्ठा होने का उल्लेख है और महारावत पृथ्वीसिंह और उसके कुंवर पहाड़सिंह के नाम दिये हैं¹। इससे प्रकट है कि वि० सं० १७७४ माघ सुदि १३ (ई० स० १७१८ ता० २ फ़रवरी) तक तो उक्त कुंवर विद्यमान था। (७) वि० सं० १७७४ माघ सुदि १३ (ई० स० १७१८ ता० २ फ़रवरी) रविवार की देवलिया के छोटे जैन मंदिर की प्रशस्ति, जिसमें देवलिया- निवासी हूंबड़ जाति के मात्रेश्वर गोत्रीय अमात्य शाह रहिआ और उसके पुत्र जीवराज आदि का अपने कुटुंब-सहित मूलनायक पार्श्वनाथ का बिंब स्थापित करने का उल्लेख है²। (८) वि० सं० १७७४ माघ सुदि १४ (ई० स० १७१८ ता० ३ फ़रवरी) का देवलिया के छोटे जैन मंदिर के बाहर का शिलालेख, जिसमें पर्यूषणों अर्थात् अष्टमी, चतुर्दशी और आदित्यवार को शराब की भट्ठियां निकालने और शराब पिलाने का निषेध किया गया है³। (१) देखो ऊपर पृ० २०५ टि० ३। (२) ・・・संवत् १७७४ वर्षे। शाके १६३६ प्रवर्त्तमान्ये। उत्तरा- यनगते श्रीसूर्ये। माहा मांगल्यप्रदे मासोत्तममासे। शुभकारिमाघमासे। शुक्लपक्ष्ये। त्रयोदशतिथौ। रविवासरे। श्रीमन्मालवदेशे। काठल मंडले। राणाश्रीहमीरवंशविभूषण। महाराजाधिराज। महारावत श्रीप्रथिसिंघजी विजयराज्ये। श्रीमद्देवगढ़ नगर वास्तव्य। हुवड ज्ञातीय। लघुशाखायां। मात्रेश्वर गोत्रे......अमात्यपद धारि। साह श्री रहिआ......लघुभ्राता। साहश्री जीवराज।......इत्यादि सकल कुटुंब युतेन। श्रीमद्देवगढ़ नगरे। मूलनायक श्रीविघ्नहर पार्श्वनाथस्य बिंब स्थापितं......॥ मूल शिलालेख की छाप से। (३) स्वस्त श्री संवत् १७७४ वर्षे। माहासु[द] १४ श्रीदेवगढ़ नगरे। महारावत श्रीश्रीप्रथीसंघजी वजेराज्ये। साह रहीआ जीवराज !
महारावत पृथ्वीसिंह. २११ (६) वि० सं० १७७५ मार्गशीर्ष वदि १२ (ई० स० १७१८ ता० ८ नवंबर ) का वांगाखेड़ी गांव का ताम्रपत्र, जिसमें उक्त गांव मेहत्ता रंगदेव को देने का उल्लेख है। ताम्रपत्र में लेखक का नाम विद्याशिरोमणि का पुत्र गोपाल दिया है और मेहत्ता द्वारिकादास, हारमेड़ राजसिंह और शाह जीवराज के द्वारा महारावत की आज्ञा होने पर उसके लिखे जाने का उल्लेख है। उसमें महारावत पृथ्वीसिंह को महाराजाधिराज, महाराज, महारावत और महारावतेंद्र लिखा है तथा उसके अंतिम भाग में उक्त महारावत की राणी वीरपुरी का पलथाणा में दस बीघा क्षेत्र देने का भी उल्लेख है १। महारावत पृथ्वीसिंह धर्मशील, दानी, उदार और विवेक-शील राजा था। मुग़ल साम्राज्य की स्थिति बिगड़ती हुई देख उसने पुराने वैमनस्य को मिटाकर उदयपुर के महाराणा संग्रामसिंह महारावत का व्यक्तित्व से पुनः मेल बढ़ाया, जिससे उसकी नीतिज्ञता का परिचय मिलता है। उसने वर्ष में कई दिन मादक पदार्थ शराब की बिक्री एवं शराब की भट्टी निकालने का निषेध किया था। इसी प्रकार उसने तथा पंच माहाजने । कलाल पासे पुंन्यार्थे धरमार्थे । पळाव्युं । ते समस्त कलाले राजी थई न इं पाल्यु छे तेनी वीगत वइ ॥ थोक ४ पळाव्या १ पजुसण सेतंवरी दिन ८ पालवा १ पजुसण दीगंवर दिन १० जुंमले दिन १८ । १ चउदस २४ आठम २४ वरस १ दन ४८ वरस १ ना दीतवार जे आवे ते पालवाणी विगते पले सही । दिन एतलामां हेइ कोई भाटी गालइ । तथा दारु पावइ ते श्री जीनो खूनी रूपीआ १५ भरे सही । मूल शिलालेख की छाप से । (१) ......स्वस्ति श्रीमन्महाराजाधिराज महाराज श्रीमहाराव- [ त ] श्रीमहरावतेंद्र श्री प्रथ्वीसिंहजी वचनातु......। मूल शिलालेख की छाप से ।
२१२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास वर्ष में कई दिन तेल की घानी चलाने की मनाही करवाई थी। स्वभावतः मुगलों की अधीनता उसको अप्रिय थी, क्योंकि देवलिया राज्य के शाही अधीनता में रहने पर भी जागीर आदि का कुछ अधिक लाभ नहीं हुआ था और धरियावद का पैतृक परगना भी छूट गया था। इसलिए अपने पिछले समय में उसने शाहंशाह के प्रतिकूल आचरण करना आरंभ किया। अपने पूर्वजों की भांति वह भी विद्वानों का आदर करता और निर्वाह के लिए उन्हें जीविका में गांव आदि देकर उनका सम्मान करता था, जैसा कि उसके दानपत्रों से प्रकट है। बादशाह फर्रुखसियर के राज्यकाल में उसके दिल्ली जाकर निशान, राघवराव का खिताब एवं टकसाल चलाने की इजाज़त भी प्राप्त करने का उल्लेख मिलता है, परन्तु उसके समय में टक- साल प्रचलित होना पाया नहीं जाता¹। कुछ स्थल पर ऐसा भी लिखा मिलता है कि रतलाम के राठोड़ों द्वारा कोटड़ी में थाना स्थापित करने पर उसका (१) कैप्टन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० ८० । मेजर के० डी० अर्सकिन-कृत "गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट” (पृ० १६८) में महारावत पृथ्वी- सिंह के बादशाह शाहआलम बहादुरशाह की सेवा में पहुंचने पर उसका अच्छा सम्मान होने एवं ख्यातों के आधार पर उस (पृथ्वीसिंह) को उक्त बादशाह द्वारा सिक्का बनाने का स्वत्व प्राप्त होने का उल्लेख है; परंतु कुछ स्थल पर महारावत पृथ्वीसिंह को बादशाह फर्रुखसियर द्वारा यह सम्मान मिलना लिखा है। सीतामऊ राज्य के विद्याप्रेमी महाराजकुमार डॉक्टर रघुवीरसिंह, एम्० ए०, एल-एल० बी० ने लिखा है कि उपर्युक्त कथन की पुष्टि के लिए दूसरा कोई विश्वसनीय आधार नहीं मिलता। ऊपरी दृष्टि से भी यह कहा जा सकता है कि साम्राज्य के अधीन किसी भी राज्य को ऐसा अधिकार मिलना असम्भव है (मालवा इन ट्रान्ज़िशन; पृ० १२६ टिप्पण ४ । मालवा में युगान्तर; पृ० १४० टिप्पण २)। सर जॉन माल्कम ने, जो आज से लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व मालवे का उच्च अधिकारी था, परिश्रमपूर्वक मालवा के संबंध की सुविस्तृत रिपोर्ट तैयार कर भारत के तत्कालीन गवर्नर-जेनरल मार्किस ऑव् हेस्टिंग्स के पास भेजी थी। उसमें बादशाह मुहम्मदशाह के समय महारावत सालिमसिंह का सिक्का बनाने की आज्ञा प्राप्त करना लिखा है (पृ० २२५), पर यह कथन भी ठीक नहीं प्रतीत होता। सर माल्कम के समय महारावत पृथ्वीसिंह को शाहआलम अथवा फर्रुखसियर- द्वारा सिक्का ढालने की आज्ञा होने की बात प्रसिद्ध न थी। यदि यह बात प्रसिद्ध होती
महारावत संग्रामसिंह २१३ वहां के राठोड़ों से युद्ध हुआ था, जिसमें उनकी हार होकर उनका नक़ारा महारावत के हाथ लगा, जो रणजीत नक़ारा कहलाता है और अब तक प्रतापगढ़ राज्य में विद्यमान है १ । संग्रामसिंह महारावत पृथ्वीसिंह के कुंवर पहाड़सिंह का, जैसा कि ऊपर बत- लाया गया है, कुंवरपदे में ही परलोकवास हो गया था; अतएव उस- महारावत की गद्दीनशीनी (पृथ्वीसिंह) का देहांत होने पर कुंवर पहाड़सिंह और मृत्यु का पुत्र संग्रामसिंह, जिसको रामसिंह भी कहते थे, वि० सं० १७७५ (ई० स० १७१८) में देवलिया की गद्दी पर बैठा; परंतु उसने अधिक समय तक राज्य नहीं किया. तो वह अपनी रिपोर्ट में इसका उल्लेख अवश्य करता । मुहम्मदशाह हि० स० ११३१ (वि० सं० १७७६ = ई० स० १७१९) में दिल्ली का स्वामी हुआ और हि० स० ११६१ (वि० सं० १८०५ = ई० स० १७४८) में उसकी मृत्यु हुई । प्रतापगढ़ का स्वामी महारावत सालिमसिंह वि० सं० १८१४ (ई० स० १७५७) में गद्दी पर बैठा और वि० सं० १८३१ (ई० स० १७७४) में परलोक सिधारा । ऐसी अवस्था में सालिमसिंह को मुहम्मदशाह-द्वारा सिक्का बनाने की आज्ञा मिलने की बात भी स्वीकार करने योग्य नहीं है, क्योंकि सालिमसिंह मुहम्मदशाह का समकालीन न था। वस्तुतः सालिमशाही सिक्का, जिसकी बाबत उपर्युक्त वर्णन है, शाहआलम द्वितीय (वि० सं० १८१६-१८६३ = ई० स० १७५६-१८६६) के समय सन् जुलूस २५ हि० स० ११९६ में महारावत सामन्तसिंह के समय प्रतापगढ़ में बनना आरंभ हुआ, जिसपर शाहआलम का नाम होने और शाहआलम और सालिमसिंह नाम एकसा होने से वह 'शाहआलमशाही' के स्थान में 'सालिमशाही' प्रसिद्ध हो गया, जैसा कि हम ऊपर पृ० १४ में बतला चुके हैं। यह संभव है कि शाहआलम दूसरे के समय महारावत सालिम- सिंह ने सिक्का बनाने की आज्ञा प्राप्त की हो। फिर उसका देहांत हो जाने से, जैसा कि सिक्के पर उल्लेख है, उक्त बादशाह के २५ वें सन् जुलूस में महारावत सांमतसिंह ने यह सिक्का जारी किया हो । (१) कैप्टेन सी० ई० येट; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़; पृ० ८० । मेजर के० डी० अर्सकिन; गैज़ेटियर ऑव् प्रतापगढ़ स्टेट; पृ० १६८ ।
२१४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास और वि० सं० १७७६ (ई० स० १७१६) में उसकी निःसंतान मृत्यु हो गई। उसके समय के वि० सं० १७७६ आषाढ वदि २¹ (ई० स० १७१६ ता० २४ मई) और आषाढ वदि ६² (ई० स० १७१६ ता० ३१ मई) (१) श्री मन्महाराजाधिराज महारावतजी श्रीसंग्रामसिंहजी वचनातु जोशी रोड़ाजी सुप(ख)रामजी योग्य यत् षे (खे) त वीघा ९१ एकाणु श्री प्रथीसिंहजी तथा पहाड़सिंह दीधा है जे मे आ चंद्रार्क यावत उदक आघाटे पाले दीधी। जेरा विगत वीघा ६० वर मंडल अरधोदये चंद्र ग्रहणे दीधा वीघा ३१ अमलावदे पहाड़ जी निमिच जोमले ९१ [वीघा] जेम दीधी.........। दुए साह जीवराज मेता द्वारिकादास लिपि(खि)तं विद्या शिरोमणि राय संवत १७७६ वर्षे.......अषाढ़ वदि २....... मूल ताम्रपत्र की छाप से। (२) महारावतेंद्र श्रीसंग्रामसिंघजी वचनातु जोसी रोडाजी सुष- (ख)रामजी जोग्य यत् गाम अमलावद मांहे गोहरा वालु षे (खे)- त वीगा १३) अंके तेरे मा झालीजी थाने दीदु गोतमजी माहे दीदु जे मे आ चंद्रार्क यावत कृष्णार्पणे दीदु जी टकी लागत(त) बल- (त) माफ करे दीदाजी......लिषि(खि)तं विद्या शिरोमणि रायजी हुए सा जीवराज में [ह] ता द्वारकादासजी संवत १७७६ वर्षे असाड वदि ६ दीने। मूल ताम्रपत्र की छाप से। प्रतापगढ़ से प्राप्त शिलालेखों और ताम्रपत्रों की सूची में महारावत उम्मेदसिंह का संवत् १७७६ ज्येष्ठ सुदि ७ (ई० स० १७१६ ता० १५ मई) का एक ताम्रपत्र और बतलाया है; परंतु उसकी छाप अथवा प्रतिलिपि हमारे देखने में नहीं आई। ऐसी अवस्था में उक्त ताम्रपत्र की वास्तविकता के विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता। यदि वह ताम्रपत्र सही हो तो संवत् १७७६ (ई० स० १७१६) के आषाढ में संग्रामसिंह प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी नहीं हो सकता और उपर्युक्त दोनों ताम्रपत्र कृत्रिम ठहरेंगे;
इस चित्र में कोई पाठ (टेक्स्ट) मौजूद नहीं है, यह पृष्ठ पूर्णतः रिक्त (blank) है।
महारावत उम्मेदसिंह
महारावत उम्मेदसिंह २१५.
[हाशिया: महारावत के समय के ताम्रपत्र] के दो ताम्रपत्र मिले हैं, जिनसे पाया जाता है कि उपर्युक्त संवत् के आषाढ मास के पीछे उसका देहांत हुआ हो, जैसा कि ख्यातों में उल्लेख है¹। "वीरविनोद" में वि० सं० १७७४ (ई० स० १७१७) में उसकी गद्दीनशीनी और इसके छः महीने बाद मृत्यु होने का उल्लेख है², जो ठीक नहीं है; क्योंकि वि० सं० १७७५ मार्गशीर्ष वदि १२ (ई० स० १७१८ ता० ८ नवंबर) का तो महारावत पृथ्वीसिंह का ताम्रपत्र मिल चुका है, जिसका उल्लेख ऊपर आ गया है³। उम्मेदसिंह ऊपर लिखा जा चुका है कि महारावत संग्रामसिंह के कोई संतान नहीं थी। इसपर सरदारों आदि ने उस (संग्रामसिंह) के पितृव्य उम्मेद- [हाशिया: राज्यप्राप्ति और देहांत] सिंह को, जो महारावत पृथ्वीसिंह का छोटा पुत्र था, वि० सं० १७७६⁴ (ई० स० १७१६) में
परन्तु इन दोनों ताम्रपत्रों में उल्लिखित व्यक्ति विद्याशिरोमणि राय, शाह जीवराज और मेहता द्वारिकादास, महारावत संग्रामसिंह के समकालीन थे। ऐसी स्थिति में बिना किसी पुष्ट प्रमाण के इन दोनों ताम्रपत्रों की वास्तविकता में संदेह करना निर्मूल है। प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात और वहां से आई हुई प्राचीन ख्यात में महा- रावत संग्रामसिंह की रानियों के नाम नहीं हैं और उपर्युक्त प्राचीन ख्यात (पृ० १०) में उसकी बालक अवस्था में अविवाहित मृत्यु होना बतलाया है। (१) प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात; पृ० ७ । प्रतापगढ़ राज्य की एक पुरानी ख्यात; पृ० १०। (२) द्वितीय भाग, पृ० १०६३। (३) देखो ऊपर पृ० २११, टि० १ । (४) "वीरविनोद" (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में महारावत उम्मेदसिंह की गद्दीनशीनी का संवत् १७७४ (ई० स० १७१७) दिया है, जो ठीक नहीं है। वि० सं० १७७६ (ई० स० १७१६) के महारावत संग्रामसिंह के दानपत्र मिल चुके हैं, अतएव वि० सं० १७७४ (ई० स० १७१७) में उम्मेदसिंह का गद्दी पर बैठना संभव नहीं है।
२१६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास राजगद्दी पर बिठलाया । वह भी अधिक समय तक राज्यसुख का उपभोग न कर सका और वि० सं० १७७८¹ ( ई० स० १७२१ ) में उसकी मृत्यु हो गई । प्रतापगढ़ से प्राप्त शिलालेखों और ताम्रपत्रों की सूची में उस- ( उम्मेदसिंह ) का सबसे पहला लेख वि० सं० १७७६ ज्येष्ठ सुदि ७² ( ई० [महारावत के शिलालेख और दानपत्र] स० १७१६ ता० १५ मई ) और अंतिम लेख वि० सं० १७७७ माघ वदि ३०³ ( ई० स० १७२१ ता० १६ जनवरी ) का दिया है । वि० सं० १७७७ आषाढ सुदि १५⁴ ( ई० स० १७२० ता० ८ जुलाई ) के उसके ताम्रपत्र की छाप तथा उसी वर्ष के मार्गशीर्ष वदि ५⁵ ( ता० ८ नवम्बर ) बुधवार के ताम्रपत्र की प्रतिलिपि हमारे पास आई हैं, जिनसे उसका समय निश्चित करने के अतिरिक्त और कोई वृत्तांत ज्ञात नहीं होता । ( १ ) महारावत गोपालसिंह के सबसे पहले वि० सं० १७७८ वैशाख सुदि १ ( ई० स० १७२१ ता० १६ अप्रेल ) के दानपत्र का प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त शिलालेखों की सूची में उल्लेख है, जिससे स्पष्ट है कि वि० सं० १७७८ ( ई० स० १७२१ ) के प्रारंभ में गोपालसिंह प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी हो चुका था । इसकी पुष्टि उक्त महारावत के वि० सं० १७७८ श्रावण सुदि १३ ( ई० स० १७२१ ता० २६ जुलाई ) बुधवार के सेखड़ी गांव के गोसाईं गंगागिरि के नाम के दानपत्र से भी होती है, जिसमें उसके उदयपुर जाने और वहां यह दानपत्र लिखाने का उल्लेख है । ( २ ) देखो ऊपर पृ० २१४, टि० २ । ( ३ ) प्रतापगढ़ राज्य से प्राप्त शिलालेखों की सूची से । ( ४ ) जोशी रोड़ा सुखराम के नाम बसाइ में ३५ बीघा ज़मीन देने के संबंध के ताम्रपत्र की मूल छाप से । ( ५ ) भाट फत्ता के नाम के महारावत उम्मेदसिंह के ताम्रपत्र की प्रतिलिपि से । तिथि और वार का मिलान करने पर उस दिन ( मार्गशीर्ष वदि ५ को ) बुधवार के स्थान में मंगलवार आता है ।
महारावत उम्मेदसिंह २१७
वि० सं० १७७६ ज्येष्ठ सुदि ७ के ताम्रपत्र के संबंध में हम ऊपर अपना मत प्रकट कर चुके हैं¹। महारावत उम्मेदसिंह दानी राजा था। उसने अपने अल्प शासन- काल में कई व्यक्तियों को गांव और भूमि दी एवं भाट फत्ता [पार्श्व टिप्पणी: महारावत की रानियां और संतति] को कुंवरपदे की सेवा में वेलाली गांव, जो पहले मेहडु रणछोड़ चारण का था, देकर उसके एवज़ में रणछोड़ को संचई गांव दिया था। उक्त महारावत ने पुष्कर-यात्रा के अवसर पर भूमिदान भी किया था। प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात में उसके चार रानियां और एक कुंवरी अमृतकुंवरी होने का उल्लेख है²।
( १ ) देखो ऊपर पृ० २१४, टि० २ । ( २ ) पृ० ७ । "जोधपुर राज्य की ख्यात" (द्वितीय भाग, पृ० ११६) में लिखा है कि सीसोदिया उम्मेदसिंह जगतसिंहोत की राठोड़ पत्नी देवलिया छूट जाने पर जोधपुर चली गई । उसके दो पुत्र सालिमसिंह और खुमाणसिंह थे । महाराजा अजीतसिंह उस( उम्मेदसिंह की पत्नी )का सहोदर भगिनी के समान आदर करता था । जब वि० सं० १७८१ आषाढ सुदि १३ ( ई० स० १७२४ ता० २३ जून ) को महाराजा अजीतसिंह अपने पुत्र वख्तसिंह-द्वारा मार डाला गया, तब उसके साथ उसकी जिन रानियों, सेवकों आदि ने अग्नि में जलकर प्राण विसर्जन किये उनमें उम्मेदसिंह की पत्नी भी थी । उक्त ख्यात का यह कथन कहां तक ठीक है, इसके विषय में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों से इसका समर्थन नहीं होता है । "जोधपुर राज्य की ख्यात" का यह कथन कि उम्मेदसिंह जगतसिंह का पुत्र था, निर्मूल है; कारण वहां जगतसिंह नाम का कोई राजा ही नहीं हुआ। प्रतापगढ़ राज्य के बड़वे की ख्यात से पाया जाता हैं कि वहां के महारावत उम्मेदसिंह के राठोड़ कुल की तीन रानियां थीं । संभव है कि उसकी इन रानियों में से कोई जोधपुर जाकर भी रही हो। वहां ऐसी भी प्रसिद्धि है कि महारावत उम्मेदसिंह की मृत्यु के समय उसकी एक राणी केसरकुंवरी ( कछवाहा राजावत कुशलसिंह की पुत्री ) अपने बालक-पुत्र सालिमसिंह को प्राणभय से कुछ लोगों के बहकाने पर जयपुर की तरफ लेकर चली गई । इसपर कल्याणपुरा के सरदार फ़तहसिंह की सम्मति से, उम्मेदसिंह का छोटा भाई गोपालसिंह देवलिया राज्य का स्वामी हो गया । इससे तो यही निष्कर्ष निकलता २८
२१८ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास गोपालसिंह वि० सं० १७७८ ( ई० स० १७२१ ) में अपने ज्येष्ठ भ्राता उम्मेदसिंह का परलोकवास होने पर महारावत गोपालसिंह प्रतापगढ़ राज्य का स्वामी राज्य-प्राप्ति हुआ और उसी वर्ष उसने उदयपुर जाकर¹ वहां के महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा) से मुलाक़ात कर अपनी गद्दीनशीनी की रसम को सुदृढ़ कर लिया, क्योंकि कुछ कारणों से उसको झगड़ा होने की आशंका थी। है कि उम्मेदसिंह का पुत्र सालिमसिंह बाल्यावस्था के कारण राज्याधिकार से वंचित रहा और उसका चाचा गोपालसिंह ( उम्मेदसिंह का भाई ) कुछ सरदारों को मिलाकर राज्य का स्वामी बन बैठा। मुंशी देवीप्रसाद-द्वारा संगृहीत जोधपुर के राजाओं, रानियों, कुंवरों, कुंवरियों आदि की नामावली की पुस्तक से पाया जाता है कि वि० सं० १७८१ आषाढ सुदि ६ ( ई० स० १७२४ ता० १६ जून ) को देवलिया की एक राजकुमारी से जोधपुर में ही महाराजा अजीतसिंह का विवाह हुआ था एवं इसके कुछ ( चार ) दिन बाद ही उक्त महाराजा अपने पुत्र बखतसिंह के हाथ से मारा गया। अनुमान होता है कि वह उम्मेद- सिंह की ही कोई पुत्री हो, जिसका नाम बड़वे की ख्यात में अमृतकुंवरी दिया है। ( १ ) श्रीममहाराजाधिराज महारावतजी श्रीगोपालसींघजी वचनातु गुसाई श्रीगंगागिरजी जोग्य यत् मोजे गाम १ सेखड़ी गांव भूमिहरा तथा टकरावद तीरेरी गाम नाथूखेड़ी पहेली रावत श्रीप्रथीसिंघजी संवत् १७७३ रा जेठ सुदि १५ रे दिन चढावी जींरे बदले रावत श्रीगोपालसिंघजी उदेपुर पधारया मेठे ज़दी गाम सेखड़ी कथकावल रहित लागत विलगट रहित उदक आघाट करे दीधी। मारा वंश रो कोई चोलण करसी नहीं। स्वदत्तं परदत्तं वा ये हरन्ति वसुंधरा षष्टि वर्ष सहस्राणि विष्ठायां जायते कृमिः । दुए शाह चंद्रभाणजी प्रेरक ठाकर फतेसिंघजी, लिखावत राव रिणछोड़दासजी मामा रामचंद्रजी उदेपुर मांहे हुकम थी लिखायो। संवत् १७७८ सावण सुदि १३ बुधे मूल ताम्रपत्र की प्रतिलिपि से ।
महारावत गोपालसिंह २१६ उन दिनों मुग़ल बादशाहत की स्थिति बहुत ही गंभीर हो रही थी। फ़र्रुख़सियर के सैयद बंधुओं-द्वारा बंदी बनाकर कठिन यातना देने के मुग़ल वादशाहत की तत्का- उपरांत मरवा डालने से मुग़ल साम्राज्य को बड़ा लीन स्थिति धक्का लगा और चारों तरफ़ अराजकता फैल गई। सैयदों ने औरंगज़ेब के वंशधरों में से ही रफ़ीउद्दरजात¹ और रफ़ीउद्दौला² को क्रमशः दिल्ली के तख़्त पर बैठाया, किन्तु सात महीनों में ही वे दोनों व्याधिग्रस्त होकर काल-कवलित हो गये। रफ़ीउद्दौला के समय कतिपय व्यक्तियों ने औरंगज़ेब के शाहज़ादे अकबर के पुत्र निकोसियर को आगरे में बादशाह बनाया, जहां वह क़ैद था, परंतु इसमें उनको सफलता न हुई और सैयद बंधुओं ने वहां पहुंच निकोसियर को पुनः क़ैद कर लिया तथा उसके सहायकों को दंड देकर अपना मार्ग निष्कंटक कर लिया। फिर उन्होंने रफ़ीउद्दौला के निःसंतान मर जाने पर बहादुरशाह के शाहज़ादे जहांशाह के पुत्र रोशनअख़्तर को वि० सं० १७७६ (ई० स० १७१६) में मुहम्मदशाह नाम रख बादशाह बनाया, परंतु सुव्यवस्था स्थापित न हो सकी। यह अवसर मरहटों को अपनी शक्ति बढ़ाने में बड़ा लाभदायक सिद्ध हुआ और उनके उत्तरी भारत में आक्रमण होने लगे। (१) रफ़ीउद्दरजात, बादशाह बहादुरशाह के तीसरे शाहज़ादे रफ़ीउश्शान का पुत्र था। बादशाह फ़र्रुख़सियर को बंदी बनाने के पीछे सैयद बंधुओं ने हि० स० ११३१ ता० ६ रबीउस्सानी (वि० सं० १७७५ फाल्गुन सुदि १० = ई० स० १७१६ ता० १८ फ़रवरी) को उसको दिल्ली के तख़्त पर बिठाकर उसका नाम "शम्सुद्दीन अबुलबरक़त रफ़ीउद्दरजात" रखा। तख़्तनशीनी के समय वह रोगग्रस्त था, जिससे तीन मास बाद ही उसकी मृत्यु हुई। (२) रफ़ीउद्दौला, रफ़ीउद्दरजात का बड़ा भाई था। ता० २० रजब हि० ११३१ (वि० सं० १७७६ आषाढ वदि ६ = ई० स० १७१६ ता० २६ मई) को वह "शम्सुद्दीन रफ़ीउद्दौला मुहम्मद शाहजहांसानी" नाम से दिल्ली का स्वामी हुआ और उसी वर्ष ता० ७ ज़िल्काद (प्रथम आश्विन सुदि ६=ता० ११ सितंबर) को उसका देहांत हुआ।
२२० प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास मालवे में मरहटों का सबसे पहला आक्रमण वि० सं० १७५६^१ ( ई० स० १६६६ ) में बादशाह औरंगज़ेब की विद्यमानता में हुआ था, पर वह मरहटों का उत्थान आक्रमण केवल शाही इलाके में लूट-मारकर दक्षिण से बादशाह का ध्यान हटाने के लिए ही था । औरंगज़ेब के जीवन-काल में दक्षिण में मरहटों के साथ की लड़ाइयां जारी रहीं और उसकी मृत्यु के साथ ही उनमें कमी आ गई। पच्चीस वर्ष से दोनों दल निरन्तर युद्ध कर रहे थे। अब उनका थक जाना स्वाभाविक था। उन दिनों मरहटों में भी कुछ गृह-कलह उत्पन्न हो गया, पर वे शीघ्र ही चेत गये। इसके विपरीत मुग़ल साम्राज्य में ऐसी शिथिलता उत्पन्न हुई कि मुग़ल अपनी सत्ता को सुदृढ़ न कर सके। छत्रपति शिवाजी ने भारत में पुनः जिस हिन्दू- साम्राज्य की नींव डाली थी, उसको दृढ़ करने का वह उपयुक्त समय था; क्योंकि उन दिनों शिवाजी के संस्थापित सतारा राज्य के स्वामी शाहू का मंत्री पेशवा बाजीराव^२ बल्लाल योग्य व्यक्ति था। उसके समय में राजा शाहू (१) डॉ० रघुवीरसिंह; मालवा में युगांतर; पृ० ६०-१। यह आक्रमण मर- हटों के एक सेनापति कृष्णाजी सावंत ने किया था । उसके साथ उस समय पन्द्रह हज़ार सवार थे और नर्मदा नदी पारकर वह धामुनी इलाक़े में लूट मारकर वापिस चला गया। (२) पेशवा जाति के ब्राह्मण थे । औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद शाहज़ादे आज़मशाह ने मरहटा राजा शंभा के पुत्र शाहू को क़ैद से छोड़ दिया। फिर उसने सेना एकत्र कर सतारा पर अधिकार किया । तदनन्तर शाहू ने वि० सं० १७७१ ( ई० स० १७१४ ) में बालाजी विश्वनाथ को पेशवा (प्रधान) का पद दिया । उस- (बालाजी ) ने राजा शाहू के समय अपने अधिकारों को बढ़ा लिया । वि० सं० १७७७ ( ई० स० १७२० ) में बालाजी की मृत्यु हुई और उसका पुत्र बाजीराव बल्लाल पेशवा बना, जिसने मरहटों का प्रभाव उत्तरी भारत में फैलाकर मालवा पर अधिकार किया और राजपूताना तथा मुग़ल साम्राज्य पर मरहटों का आतंक स्थापित कर दिया। वि० सं० १७६७ वैशाख सुदि १ ( ई० स० १७४० ता० १६ अप्रेल ) को बाजीराव का देहांत होने पर उसका पुत्र बालाजी बाजीराव पेशवा बना, जिसने राजा शाहू के मरने पर (जब रामराजा का पुत्र शिवाजी (दूसरा) कोल्हापुर से गोद आकर सतारा राज्य का स्वामी बना) पूना में रहना स्थिर कर पृथक् राज्य की सृष्टि की और सतारा
महारावत गोपालसिंह २२१
केवल नाममात्र का शासक रह गया और पेशवा का प्रताप इतना बढ़ा कि दिल्ली के मुग़ल बादशाह भी उसको हर प्रकार से प्रसन्न रखने की चेष्टा करते थे। पेशवा के सेनापति मल्हारराव होल्कर¹, राणोजी सिंधिया² और पर शिवाजी का अधिकार रहा, परंतु वह सतारा के राजा को ही अपना मालिक मानता रहा। (१) होल्कर राज-वंश के लिए इतिहासकारों के भिन्न-भिन्न मत हैं। इस वंश में मल्हारराव होल्कर अठारहवीं शताब्दि में एक प्रसिद्ध व्यक्ति हुआ। मल्हारराव होल्कर का जन्म वि० सं० १७५० (ई० स० १६६३) के लगभग हुआ। उसका बाल्यकाल बड़ी विपत्ति में गुज़रा। उसका पिता उसको छोटी अवस्था में छोड़कर मर गया था, इसलिए उसका पालन-पोषण उसके मामा नारायणराव के यहां हुआ, जिसको उदयपुर के महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा) की तरफ़ से बूढ़ा की जागीर मिली थी। फिर वह अपने मामा के पास २५ सवारों की टोली का अफ़सर बना और बढ़ते-बढ़ते पेशवा के मुख्य सेनापतियों में हो गया। उसने केवल दक्षिण भारत के युद्धों में ही नहीं बल्कि उत्तर भारत की अनेक लड़ाइयों में समय-समय पर बड़ी वीरता दिखलाई थी। मालवा में पेशवा का अधिकार होने पर उसको वहां एक बड़ी आय की जागीर मिली। अनन्तर उसने अपने वंशजों के लिए इंदौर राज्य की स्थापना की। वि० सं० १८२३ (ई० स० १७६६) में उसका देहांत हुआ। होल गांव में रहने से यह राजवंश होल्कर कहलाता है। (२) सिंधिया वंश के राजा नागवंशी क्षत्रिय हैं। महाराष्ट्र में सिंदे गांव में निवास होने से वे सिंदे (सिंधिया) कहलाने लगे। इस वंश की एक कन्या का विवाह प्रसिद्ध राजा शिवाजी के पौत्र राजा शाहू से हुआ था। मध्यभारत में ग्वालियर का विशाल राज्य सिंधिया के अधिकार में है, जिसका संस्थापक राणोजी सिंधिया था। प्रारंभ में वह पेशवा के छोटे नौकरों में था, परंतु धीरे-धीरे उच्च पद पर पहुंचा और पेशवा के प्रधान सेनापतियों में हो गया। उसने मालवा में मरहटा राज्य स्थापित करने में पूर्ण वीरता दिखलाई थी। वह पेशवा की तरफ़ से संपूर्ण अधिकारों के साथ दिल्ली के बादशाह के पास भेजा गया था, जहां उसने पेशवा और मुग़ल साम्राज्य के साथ होनेवाले संधिपत्र पर पेशवा के प्रतिनिधि की हैसियत से हस्ताक्षर किये थे। वि० सं० १८०२ श्रावण सुदि २ (ई० स० १७४५ ता० १६ जुलाई) को शुजालपुर में राणोजी की मृत्यु हुई। फिर उसका पुत्र जयआपा अपने पिता की संपत्ति का अधि- कारी हुआ, जिसको जोधपुर के महाराजा विजयसिंह ने वि० सं० १८१२ (ई० स० १७५५) में छल से मरवाया।
२२२ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास आनंदराव¹ पंवार युद्ध-निपुण थे, जिन्होंने थोड़े समय में ही भारत में मरहटों का आतंक जमा दिया। शाही सेना के साथ दक्षिण में निरन्तर पच्चीस वर्ष तक युद्ध में संलग्न रहने के कारण मरहटों की आर्थिक स्थिति संतोषप्रद नहीं रही थी एवं वे ऋणग्रस्त भी थे, इसलिए प्रारंभ में उन्होंने उत्तर भारत के आक्रमणों में धन बटोरने की ही नीति रखी और फिर उन्होंने मालवे में चढ़कर वहां पर अधिकार किया, जैसा आगे बतलाया जायगा। मुग़ल साम्राज्य की निर्बलता के समय राजपूताना के राजाओं की भी अपने-अपने राज्य बढ़ाने की लालसा जाग उठी। उनमें उदयपुर, जयपुर और जोधपुर के नरेशों के नाम उल्लेखनीय हैं, [आंवेर और जोधपुर] पर उदयपुर के महाराणा तो स्वयं शाही दरबार में [के राजाओं की शक्ति बढ़ना] कभी न गये, जिससे मुग़ल साम्राज्य की राजनीति में उनका कुछ हाथ न रहा। आंवेर (जयपुर) के महाराजा सवाई जयसिंह तथा जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह का वि० सं० १७६५ (ई० स० १७०८) के पीछे मुग़ल साम्राज्य के उलट-फेर में बड़ा हाथ रहा, जिससे उनकी शक्ति बढ़ गई। उस समय के मुग़लों के इतिहास में आंवेर और जोधपुर के नरेशों का महत्वपूर्ण स्थान है। बादशाह की तरफ़ से मरहटों के आक्रमणों को रोकने के लिए जयसिंह को मालवे² (१) धार के परमार राजा मालवे के प्रसिद्ध परमारों के वंशधर हैं। महाराष्ट्र में उनका निवास होने से वे मरहटा कहलाये। इस राज्य का संस्थापक उदाजी पंवार हुआ, जो सतारा के राजा शाहू का बड़ा विश्वासपात्र सेवक था। पेशवा बाजीराव के उन्नतिकाल में उसका उक्त पेशवा से मतभेद रहता था, इसलिए मरहटा-राज्य के विस्तार में पूर्ण रूप से भाग लेने पर भी उसको कोई बड़ी जागीर नहीं मिली और अपनी जागीर से भी उसे संबंध त्यागना पड़ा। फिर पेशवा ने वि० सं० १७८६ (ई० स० १७३२) के लगभग उसका सब अधिकार उसके छोटे भाई आनंदराव को दिया, जो अपने भाई के समान वीर था। वि० सं० १८०६ (ई० स० १७४६) में उसकी मृत्यु होना पाया जाता है। (२) सवाई जयसिंह की मालवे की प्रथम सूबेदारी लगभग पांच वर्ष तक
महारावत गोपालसिंह २२३ और अजीतसिंह को गुजरात¹ का भार सौंपा गया । अजीतसिंह तथा बादशाहों के बीच मन-मुटाव बना ही रहता था । अंत में वह इसी कारण से अपने छोटे कुंवर वख्तसिंह-द्वारा वि० सं० १७८१ (ई० स० १७२४) में मारा गया² । फिर उसका ज्येष्ठ कुंवर अभयसिंह जोधपुर राज्य का स्वामी हुआ, जो साम्राज्य-भक्त बना रहा। मुहम्मदशाह के समय वह गुजरात का सूबेदार भी बनाया गया³, परंतु अपने कर्मचारियों की लूट-खसोट के कारण वहां सुव्यवस्था स्थापित न कर सका । फिर भी गुजरात की तरफ़ से मरहटों को उसने आगे नहीं बढ़ने दिया । वि० सं० १७६५ (.ई० स० १७०८) में उदयपुर, जयपुर और जोधपुर के नरेशों ने एकता के सूत्र में बंधे रहने के लिए संधि भी की⁴; किन्तु जयसिंह की राजनैतिक ई० स० १७१३ फ़रवरी से ई० स० १७१७ नवंबर (वि० सं० १७६६-१७७४) तक रही थी (डॉ० रघुवीरसिंह; मालवा इन् ट्रान्ज़िशन; पृ० ६६-१०१) । (१) गुजरात की सूबेदारी महाराजा अजीतसिंह को वि० सं० १७७१ (ई० स० १७१५) में मिली थी, और वह लगभग दो वर्ष अर्थात् वि० सं० १७७३ (ई० स० १७१६) तक वहां का सूबेदार रहा था (बंबई गैज़ेटियर; भा० १, खं० १, पृ० २६६) । (२) टॉड; राजस्थान, जि० २, पृ० ८४६-६७, १०२८-२६ । जोधपुर राज्य की ख्यात; जि० २, पृ० ११५ । वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ८४२ । (३) महाराजा अभयसिंह वि० सं० १७८७ (ई० स० १७३०) में गुजरात का सूबेदार हुआ और वि० सं० १७६४ (ई० स० १७३७) तक वह सूबा उसके नाम पर रहा । वि० सं० १७६० (ई० स० १७३३) के पीछे उक्त महाराजा गुजरात में नहीं गया और उसके कर्मचारी भंडारी रत्नसी आदि ही वहां का प्रबन्ध करते रहे (वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० ८४४-७) । (४) देखो मेरा उदयपुर राज्य का इतिहास, जि० २, पृ० ६०४-५ । इस सन्धि का आशय मुख्यतः उदयपुर की राजकुमारी का महत्व प्रमाणित करना था । मुग़ल बाद- शाहों के साथ कुछ राजपूताने के राज्यों ने वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर लिया था, जिस- पर महाराणा प्रतापसिंह ने जयपुर आदि राज्यों से विवाह-सम्बन्ध बन्द कर दिया । उसको पुनः जारी करने के लिए यह इक़रारनामा जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह से लिखवाया गया था । वस्तुतः इस संधिपत्र से कोई राजनैतिक महत्व सिद्ध नहीं हुआ और उदयपुर तथा जयपुर राज्य को इस इक़रार के कारण जयसिंह की मृत्यु के बाद
२२४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास चालों से वह कागज़ का रही टुकड़ा ही रही। स्वार्थपरता और पारस्परिक वैमनस्य से जयपुर और जोधपुर के नरेश शीघ्र ही उपर्युक्त संधि से पराङ्- मुख हो गये एवं एक दूसरे का विनाश चाहने लगे। उदयपुर का महाराणा उनके पारस्परिक वैमनस्य को मिटाने का प्रयत्न करता था, पर वह बढ़ता ही गया। इससे कहा जा सकता है कि राजपूताना के राज्यों में उस समय कोई राजा नेतृत्व के योग्य नहीं था। इसका परिणाम यह हुआ कि आपसी द्वेष से राजपूताना के राज्यों की दशा हीन हो गई। इस अशांतिमय वातावरण में छोटे-छोटे राज्यों का अस्तित्व लुप्त होने की पूरी संभावना थी। अस्तु, संगठन-शक्ति की भावना छोटे-छोटे महारावत को धरियावद राज्यों में भी जागृत होकर वे बड़े राज्यों का सहारा का परगना मिलना ढूंढने लगे। उदयपुर राज्य, प्रतापगढ़ राज्य के समीप होने एवं वहां के राजाओं के एक ही वंश के होने के कारण उनमें कभी मेल और कभी-कभी वैमनस्य भी हो जाता था; किंतु आपत्तिकाल के समय देवलिया राज्य, उदयपुर राज्य को सहायता देकर अपने कर्त्तव्य का पालन करता था। इसके एवज़ में वहां के रावत को धरियावद की जागीर मिली थी, जो महारावत हरिसिंह के समय जाती रही। ऊपर बतलाया जा चुका है कि महारावत पृथ्वीसिंह ने उदयपुर राज्य से पुनः अपना राजनैतिक संबंध जोड़ा था और धरियावद का परगना पीछा मिलने की बात स्थिर हो गई थी, परंतु उक्त महारावत और उसके कुंवर का देहांत हो जाने एवं वहां उसके दो उत्तराधिकारियों के थोड़े समय तक ही राज्य करने से धरियावद का परगना नहीं मिल सका था। महारावत गोपालसिंह ने राज्यासन पर बैठते ही पुनः धरियावद का परगना प्राप्त करने के लिए प्रयत्न आरंभ किया और अपने कुंवर सालिमसिंह को उदयपुर भेजा¹। इसी प्रकार उसने पेशवा बाजीराव का अभ्युदय देख उससे दुःखदायी परिणाम भोगना पड़ा, जिसका हम उदयपुर राज्य के इतिहास में विस्तृत रूप से उल्लेख कर चुके हैं। (१) "वीरविनोद" (द्वितीय भाग, पृ० १०६३) में उपर्युक्त धरियावद का परगना
महारावत गोपालसिंह २२५ भी मित्रता कर ली', क्योंकि देवलिया राज्य मालवे से मिला हुआ होने से उसको मरहटों से भी अच्छा सम्बन्ध रखने की आवश्यकता थी। वि० सं० १७८७ (ई० स० १७३०) में डूंगरपुर के महारावल रामसिंह का देहांत होने पर उसका कुंवर शिवसिंह वहां की गद्दी पर बैठा। उस समय उदयपुर राज्य की सेना ने डूंगरपुर पहुंच वहां घेरा डाल दिया और चार लाख रुपयों आदि का रुक्का लिखवाकर वहां से लौटी²। प्रतापगढ़ राज्य की ख्यातों में लिखा है कि महाराणा की सेना के डूंगरपुर को घेर लेने पर महारावत गोपालसिंह ने महाराणा की सेना के आदमियों से बात-चीत कर वहां का घेरा उठवाया³। इस कथन का समर्थन उदयपुर और डूंगरपुर राज्य की ख्यातों से नहीं होता, परन्तु यह संभव है कि महाराणा संग्रामसिंह (दूसरा) और उक्त महारावत का अच्छा संबंध होने से उसने डूंगरपुर के स्वामी शिवसिंह तथा महा- राणा के बीच संधि करवाकर वहां का घेरा उठवा दिया हो। महाराणा अरिसिंह (वि० सं० १८१७ से १८२६ = ई० स० १७६१ से १७७३) के राज्य- काल में महारावत सालिमसिंह को मेवाड़ के गृह-युद्ध के समय की गई सेवा के उपलक्ष्य में मिलने का उल्लेख है, परंतु यह बात ठीक नहीं है; क्योंकि वहां महारावत पृथ्वीसिंह को मिली हुई 'रावत-राव' की उपाधि प्रयोग में लाने की महाराणा अरिसिंह की सनद् तो दी गई, किंतु धरियावद परगने की कोई सनद नहीं दी और न धरियावद परगना मिलने का संवत् और मास दिया है। यदि वस्तुतः धरियावद का परगना सालिमसिंह को मिला होता तो उसकी सनद् अवश्य उद्धृत की जाती एवं वर्ष तथा मास भी दिया जाता। हमारा अनुमान है कि मेवाड़ में महाराणा अरिसिंह के समय होनेवाले गृह- युद्ध के कई वर्ष पूर्व धरियावद का परगना महारावत गोपालसिंह को मिल चुका था, जिसके कारण ही गोपालसिंह ने उदयपुर में विशेष रूप से आना-जाना जारी किया। (१) वीरविनोद; द्वितीय भाग, पृ० १०६५ । (२) वही; द्वितीय भाग, पृ० १०११ । (३) वही; द्वितीय भाग, पृ० १०६३ । २६
२२६ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास मालवे में होनेवाले मरहटों के आक्रमणों को शाही सेना ने रोकने का यथासाध्य प्रयत्न किया और आंबेर का स्वामी सवाई जयसिंह भी मालवे के लिए मरहटों की इस कार्य के लिए नियत किया गया, परंतु इसमें लड़ाइयां सफलता नहीं हुई और मरहटों की शक्ति बढ़ती गई। इस असफलता का मुख्य कारण शाही अफ़- सरों का पारस्परिक मनोमालिन्य, ईर्ष्या और स्वार्थ-परायणता ही थी। उस समय स्वामी-सेवक के भाव नष्ट होने लगे थे और शाही अफ़सरों में से अधिकांश विद्रोही होकर स्वतंत्र राज्य स्थापित करने की चेष्टा में थे। ऐसी स्थिति में असफलता होना स्वाभाविक था। मालवे की भांति उन दिनों मरहटों के गुजरात में भी आक्रमण होने लगे, जिससे स्थायी शांति का होना कठिन हो गया। प्रतापगढ़ राज्य मालवा के अंतर्गत था और उसके चारों तरफ़ संघर्ष मच रहा था, तथापि वह महारावत गोपालसिंह के कुशल- शासन से अक्षुण्ण रहा। इतिहास के प्रसङ्ग को मिलाने के लिए संक्षेप में हम यहां मालवे में बादशाह मुहम्मदशाह के समय जो उलट-फेर हुए, उनका वर्णन करते हैं- फ़र्रुख़सियर की मृत्यु के पीछे सैयदों ने निज़ामुल्मुल्क को वि० सं० १७७५ फाल्गुन सुदि १२ (ई० स० १७१६ ता० २० फ़रवरी) को मालवे का सूबेदार बनाया। ई० स० १७२२ ता० ३० अगस्त (वि० सं० १७७६ भाद्रपद वदि ३०) तक वह वहां का सूबेदार रहा। फिर बादशाह मुहम्मद- शाह के समय सैयदों का दमन होने के पीछे निज़ामुल्मुल्क तो वज़ीर बनाया गया और राजा गिरधर बहादुर मालवे का सूबेदार नियत हुआ, परंतु वह पूरा एक वर्ष भी वहां न रहने पाया था कि बादशाह ने निज़ामुल्मुल्क पर ही मालवे का भार डाल दिया। निज़ामुल्मुल्क की शक्ति उस समय बहुत बढ़ गई थी, जिसको बादशाह ने भयावह जान पुनः राजा गिरधर बहादुर की वि० सं० १७८२ प्रथम आषाढ सुदि ३ (ई० स० १७२५ ता० २ जून) को मालवे के सूबे पर नियुक्ति की। राजा गिरधर बहादुर इलाहाबाद के सूबेदार छबीलेराम नागर (ब्राह्मण) का भतीजा था
महारावत गोपालसिंह २२७
और साम्राज्य-भक्त था । उसने मालवा में मरहटों का प्रभाव न बढ़ने देने के लिए स्तुत्य प्रयत्न किया और अंत में वह आमझरा में मरहटों से युद्ध करता हुआ ई० स० १७२८ ता० २६ नवंबर ( वि० सं० १७८५ मार्गशीर्ष शुदि ६) को मारा गया । उसके बाद उसका पुत्र भवानीराम मालवे का सूबेदार बनाया गया । उसने भी मरहटों को मालवा में न बढ़ने देने का उद्योग किया, किन्तु आवश्यक सहायता न मिलने से वह असफल रहा । मालवा ही नहीं अपितु गुजरात में भी मरहटों के आक्रमण होते देख वादशाह मुहम्मदशाह को बड़ी चिंता हुई । वि० सं० १७८६ ( ई० स० १७२६ ) में उसने सवाई जयसिंह को दूसरी बार मालवे का सूवेदार बनाया और सैन्य-संगठन के लिए तेरह लाख रुपयें भी दिये, परन्तु वह अपनी मेल-मिलाप की नीति से कुछ दे-दिलाकर मरहटों का वहां से कब्ज़ा उठाना चाहता था । उस समय मालवा में मरहटे मुकासा नामक कर उगाह्ते थे, इसलिए वहां से उनका यह अधिकार उठाने एवं उनके आक्रमणों को रोकने के लिए जब वह (जयसिंह) मालवे की तरफ़ आगे बढ़ा तो उसके साथ वहां के प्रायः सब राजा उपस्थित हो गये¹। फिर वह उज्जैन से मांडू की तरफ़ बढ़ा और ई० स० १७३० के जनवरी ( वि० सं० १७८६ माघ ) मास में उसने वह क़िला मरहटों से खाली करवा लिया² । महाराजा जयसिंह का विचार मरहटों से मालवा खाली करवाकर उसे अपने राज्य में मिलाने का था। इस बात को ताड़कर राजपूताना के नरेश । उस- से शंकित रहते थे, क्योंकि उन्हीं दिनों उसने बूंदी से राव बुधसिंह को हटाकर दलेलसिंह को वहां का स्वामी बना दिया था³ और रामपूरे का परगना भी चंद्रावतों ( सीसोदियों की एक शाखा ) से ज़ब्त करवाकर
( १ ) डॉ० रघुवीरसिंह; मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० १७८। मालवा में युगान्तर; पृ० २०० । सूर्यमल; वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३१३७-३८ । ( २ ) सूर्यमल; वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३१३८ । डॉ० रघुवीरसिंह; मालवा में युगान्तर; पृ० २०१ । मालवा इन ट्रांज़िशन; पृ० १७८ । ( ३ ) वंशभास्कर; चतुर्थ भाग, पृ० ३१३२-३६ ।