BharatKosha
Back to the archive

संतति शास्त्र

Santati Shastra

by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव

Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)

Devanagarihipublished302 pages

38. सन्तानपर दूषित वीर्यका प्रभाव

Page 198Permalink

सन्तानपर दूषित वीर्यका प्रभाव ।

१७७

६. पित्त और कफ से दूषित वीर्यकी उत्पन्न सन्तान अल्पायु, टेढ़े अंगवाली होती है । (१० क०)

१०. वात, पित्त और कफ तीनोंसे दूषित वीर्य सन्तान उत्पन्न नहीं करता । गर्भपात हो जाता है । (१० क०)

११. सिद्धियोंका कुरूप और काला रंग, यूरोपियनोंकी कंजी आखें, अमेरिकावालोंका ताम्रवर्ण, काबुलियोंका कोधी होना, वीर्यका दोष है ।

१२. गर्भाधान समयमें यदि पिताका बहुत ही थोड़ा वीर्य हो तो आसेवय अर्थात् थोड़े वीर्यवाला पुरुष उत्पन्न होता है । (सु० १० अ० २ श्लो० ४२)

१३. वीर्य-दोषके कारण गर्भमें कन्याका गर्भाशय नष्ट हो जाता है । पैंसी खीके स्तन नहीं निकलते और न उसे पुरुष समागमकी इच्छा होती है । पैंसी खीको पत्नी कहते हैं । (च० चि० अ० ३० श्लो० २३)

१४. जब पुरुष के बीजभागमें दोष उत्पन्न होता है, तब पित्त अर्थात् पितासे उत्पन्न होनेवाले अवयवोंमें विकार होता है । (१० क०)

१५. जब पुरुषके सन्तान-कारक अर्थात् सन्तान उत्पन्न करनेवाले बीजभागमें दोष उत्पन्न होता है तो पूति अर्थात् नमर्द सन्तान उत्पन्न होती है । (१० क०)

१६. जब पुरुष-कारक बीजभाग दूषित हो जाता है, तब पुरुषकृति, विशिष्ट पुरुष चिह्नोंसे रहित, दण्डपूति सन्तान होती है । (१० क०)

१७. वीर्यसे उत्पन्न होनेवाले जितने अवयव हैं, जब वीर्यमें उन अवयवोंका अंश, जिससे वे बनते हैं, दूषित हो

१२

Page 199Permalink

१७८

सन्तति-शास्त्र ।

जाता है तब वे श्रवयव विरुत अर्थात् देहे इत्यादि हां जाते हैं । (च० १० अ० ४ श्लो० १५)

१८. वीर्यमें जब हडिडियोंको बनानेवाला अंश दूषित हो जाता है तब वीनी सन्तान उत्पन्न होती । (१० क०)

१९. यदि गर्भाधान समयमें पिताका थोडा वीर्य गिरे तो ऐसे पितासे नरप० सन्तान उत्पन्न होती है ।

(च० १० अ० २ श्लो० १८)

२०. गर्भके जो श्रवयव वीर्यके जिस अंशसे उत्पन्न हों हैं उस वीर्यके उसी अंशके दूषित होने से गर्भके वेही श्रवयव दूषित हो जाते हैं । (च० १० अ० ४ श्लो० २५)

२१. वीर्य रक्त और गर्भाशयकारक अंश दूषित होनेसे स्त्री वन्ध्या कन्याको उत्पन्न करती है ।

(च० १० अ० ४ श्लो० ३९)

२२. वीर्यमें रज और गर्भाशय-कारक अंश दूषित हों तथा आनुवंशिक स्त्री-चिह्न प्रगटकर्ता बीजांश दूषित होनेसे गर्भिणी स्त्री—स्त्रीकी आकृतिवाली, योनि रहित पाला नामक सन्तान-उत्पन्न करती है । (च० १० अ० ४ श्लो० ४५)

२३. मिले हुए रजवीर्यमें जब वीर्य उत्पन्न करनेवाली वीर्यका अंश दूषित होने और आनुवंशिक पुरुष चिह्न कारक बीजांश दूषित होनेसे पुरुषकी सी आकृतिवाली नाम० कृष्णतिक नामक सन्तान उत्पन्न होती है । इसको पुरुष भ्रष्ट श्रवयव पुरुष नश कहते हैं ।

(च० १० अ० ४ श्लो० ५५)

वीर्य और सन्तानका बहुत बडा सम्बन्ध है । जिनने मनुष्योंके सन्तान होती है सबके लिये यह नहीं कहा जा सकता कि उनका वीर्य शुद्ध और नीरग है । यहाँ एक बहुत

39. माताके आचरणका सन्तानपर प्रभाव

Page 200Permalink

माताके आचरणका सन्तानपर प्रभाव ।

१७६

बड़ा प्रश्न यह होता है कि बात पिछ इत्यादिसे दूषित वीर्य-वाले पुरुष सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं या नहीं ?

इस विषयमें सुश्रुत ने लिखा है कि वातापिच्छ इत्यादि दोष-सेदूषित वीर्यवाले सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकते; परन्तु इस विषयमें वैद्यकके दूसरे विद्वान् सन्तान उत्पन्न होना कहते हैं, जैसा कि ऊपर शरीरकल्पवृद्धमसे लिखा गया है । भाष्य-प्रकाशमें परिण्डित दत्तराम चौबेजाने सुश्रुतकी इस पंक्तिके विषयमें कि 'वातादि दोषसे युक्त वीर्यवाले सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकते ।' आदि पंक्तिसे वे यह अर्थ निकालते हैं कि 'वात इत्यादि से दूषित वीर्यवाले शुद्ध सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकते, किन्तु रोग इत्यादिसे युक्त अशुद्ध सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं । क्योंकि जन्मांध, बहरे, पंगू आदि ऐसे ही दूषित वीर्यसे उत्पन्न होते हैं ।'

जिन स्त्री-पुरुषोंके कुष्ठकी विशेषतासे रज-वीर्य दूषित होता है ऐसे रज-वीर्यसे कोठी सन्तान उत्पन्न होती है । ( भा० १० प्र० ) इससे स्पष्ट है कि वातादि दोषयुक्त वीर्यसे सन्तान होती तो अवश्य है, परन्तु रोगी और अल्पायु होती है ।

इस प्रकार वीर्य-दोषसे रोगी और अनेक प्रकारको सन्तान उत्पन्न होती है ।

(३६) माताके आचरणका सन्तानपर प्रभाव ।

आचरणसे शरीरमें श्रच्छाई और बुराई उत्पन्न होती है । जिस समय मनुष्य बुरीकी संगतमें पड़ता है या स्वयं उसके हृदयमें बुरे आचरणोंका प्रवाह बहने लगता है, तो ऐसी दशा-में बुरे आचरणोंका आश्रय लेना पड़ता है । जब माता द्वारा बुरे आचरण हो जाते हैं, तो गर्भके बालकपर उनका बहुत ही

Page 201Permalink

१८०

सूत्रति-शास्त्र ।

बुरा प्रभाव पड़ता है । इसके अनेक भेद हैं, जो रजस्वला होने से गर्भ उत्पन्न होनेतक होते हैं ।

१. दिनमें सोनेसे बहुत सोनेवाली, कज्जल लगानेसे अर्धी, रोनेसे नेत्र विकारवाली, स्नान और अनुलेपन करनेसे दुःखशील, तेल लगानेसे कुष्ठी, नाखून कतरनेसे खराब नाखूनवाली, दौड़कर चलनेसे चंचल, हँसनेसे काले दांतों तथा काले होठ, तालू और जीभवाली, बहुत बोलनेसे वकवादी, जीरका शब्द सुननेसे वहिरी, वालों में कंठी करनेसे गंजी, हवा अधिक खानेसे तथा कष्ट करनेसे भतवाली सन्तान उत्पन्न होती है । जब ये आन्वरण रजस्वला समयमें किये जावें और उसी ऋतु धर्मसे गर्भ रह जावे, तो उसका बहुत बुरा प्रभाव सन्तान पर होता है । (च० श० अ० २ श्ल० २३)

२ यदि गर्भवती अंगोंको फैलाकर सोचे और रात्रिमें फिरा करे तो उन्मत्त सन्तान होती है ।

(च० श० अ० ८ श्ल० ४१)

३ यदि कलह और लड़ाई करना गर्भवतीको अच्छा मालूम हो या करे तो भृंगी रोगवाली सन्तान होती है ।

(च० श० अ० ८ श्ल० ४१)

४. यदि गर्भवती बहुत सोच विचार किया करे, तो डरनेवाली, क्षीण श्रयवा अल्पायु सन्तान होती है ।

(च० श० अ० ८ श्ल० ४६)

५. यदि गर्भवती चोरी किया करे, तो आलसी, भगड़ा करनेवाली और बुरे कामोंमें लगी रहनेवाली सन्तान होती है ।

(च० श० अ० ८ श्ल० ४१)

Page 202Permalink

सन्तानपर माताकी इच्छाका प्रभाव ।

१८१

६. गर्भवतीके कोधी रहनेसे छली और चुगलखोर सन्तान उत्पन्न होती है । (च० श० अ० ८ श्ल० ४२)

७. बहुत सोनेवाली गर्भवतीसे तन्द्रावाली, मूर्ख या मन्दाग्नि रोगवाली सन्तान उत्पन्न होती है ।

(च० श० अ० ८ श्ल० ४५)

८. यदि गर्भवती बहुत चिड़ावे, ते उससे कानके रोगोंवाली सन्तान उत्पन्न होती है । (श० व०)

९. गर्भकी दशामें यदि स्त्री पुरुषसे संयोग कर लेवे और यदि पुत्र पैदा हो, तो बद्धचलन और कन्या हो, तो पार पुरुषके साथ गमन करनेवालो होती है । (श० क०)

१०. जैसा आचरण गर्भवतीका होता है उसीके अनुसार सन्तान उत्पन्न होती है । (श० क०)

इस प्रकार बुरे आचरणोंसे अनेक प्रकारकी सन्तान उत्पन्न होती है । अतएव माता-पिताको अपने अपने आचरणों पर विशेष ध्यान रखना चाहिये ।

(४०) सन्तानपर माताकी इच्छाका प्रभाव ।

इच्छा वह चीज है कि जिससे मनुष्य के हृदयका भाव मालूम होता है । जब मनुष्य किसी बातकी इच्छा करता है, तो उसको अपनी इच्छाके वशमें हो जाना पड़ता है । जबतक वह वस्तु उसको नहीं मिलती, उसके पानेकी लालसा लगी रहती है । गर्भवतीमें इच्छा-शक्ति अच्छी तरहसे चौथे महिनेमें उत्पन्न होती है । उस समयतक गर्भस्थित बालकका हृदय बल जाता है और माताकी इच्छामें बच्चेकी इच्छा भी मिली रहती है । अतएव माताकी इच्छाका बुरा भला प्रभाव सन्तानपर अनेक प्रकारसे पड़ता है ।

40. सन्तानपर माताकी इच्छाका प्रभाव

Page 203Permalink

१८२

सन्तति-शास्त्र ।

१. यदि गर्भवती मंथुन-प्राप्य हो अर्थात् उनको मंथुनको इच्छा हो तो निलंब, चिकलांग अथवा मेहरा, राडिया मन्तान उत्पन्न होती है । ( च० १० अ० ८ श्लो० ४१ )

२. यदि गर्भवती पराय धनके हरनेकी इच्छा करे, तो कुट्टन और हर्षवाली अथवा राडिया या ज्ञानानिया सन्तान होती है । ( च० १० अ० ८ श्लो० ४१ )

३. यदि गर्भवतीको मूत्ररका मांस प्राप्य हो अर्थात् उसके गनकी इच्छा हो, तो लाल नेत्रवाली, हत्यारी, कसाई तथा कुछ कुछ कठोर गेमवाली सन्तान उत्पन्न होती है । ( च० १० अ० ८ श्लो० ४२ )

४. अपनी इच्छाके अनुसार गर्भवतीको मनमाना पदार्थ न मिलनेसे गर्भका बालक, चीना, कुचडा, दूध, पागल, मूर्ख और नेत्रविकारवाला उत्पन्न होता है । इसलिये जिम वस्तुकी इच्छा हो वही स्त्रीको गर्भ समयमें देना चाहिये । यदि मनमाना पदार्थ मिल जाय तो प्रगल्भी-चिरंजीवी और उत्तम बालक उत्पन्न होता है । ( मु० १० श० ३ श्लो० ४१ )

५. जिन जिन द्रव्याँके सुगन्धको गर्भवती भोगनेको इच्छा करे उनके न मिलनेसे गर्भको वाधा पहुँचती है । इसलिये मनचाहा पदार्थ जरूर देना चाहिये । मनमाना पदार्थ मिलनेसे गुरगुरुक सन्तान होती है और न मिलनेसे बालक और माता दोनों भय रहता है । गर्भवतीकी इच्छा जिन जिन द्रव्याँसे संवन्ध रखने वाले पदार्थकी हो यदि वे न मिले तो उन्हीं २ अंगोंको हानि पहुँचती है । ( सु० १० श० ३ श्लो० २२ मे० २४ )

Page 204Permalink

सन्तानपर माताकी इच्छाका प्रभाव ।

१८३

६. यदि गर्भवतीको राजाके दर्शनकी इच्छा हो, तो अनवान् और भाग्यशाली सन्तान उत्पन्न होती है।

(सु० १० अ० ३ श्लो० २५)

७. उत्तम वस्त्र और आभूषणोंके पहनेकी इच्छा हो तो शौकीन सन्तान पैदा होती है। (सु० १० अ० ३ श्लो० २६)

८. यदि महात्मा और देवताओंके दर्शनकी इच्छा हो, तो धर्मशील और सत्पात्र सन्तान होती है।

(सु० १० अ० ३ श्लो० २७)

९. सर्प इत्यादि देखनेकी इच्छा यदि गर्भवती करे, तो हिंसा करनेवाली सन्तान उत्पन्न होती है।

(सु० १० अ० ३ श्लो० २८)

१०. यदि गोहका मांस खानेकी इच्छा हो, तो बहुत सोने-वाला और सखी वालक उत्पन्न होता है। (२८)

११. यदि गोमांस खानेकी इच्छा करे तो बलवान् और सारे क्रूरों को सहने वाली सन्तान उत्पन्न होती है।

(सु० १० अ० ३ श्लो० २९)

१२. मैसे का मांस खानेकी इच्छा गर्भवतीको हो, तो शूरवीर लाल नेत्रोंवाली योग्युक सन्तान उत्पन्न होती है। (२९)

१३. यदि सूअरके मांसकी इच्छा हो तो सोनेवाली और शूरवीर सन्तान उत्पन्न होती है। (सु० १० अ० ३ श्लो० ३०)

१४. यदि गर्भवतीकी इच्छा रास्ता चलनेकी हो, तो बड़ी बड़ी जंघाओं और बन में विचरनेवाली सन्तान उत्पन्न होती है। (३०)

१५. हिरनका मांस खानेकी इच्छा यदि हो, तो बड़ी जंघाओं-वाली सदा वनचारी सन्तान होती है। (३०)

Page 205Permalink

१८४

सन्तति-शास्त्र ।

१६. यदि गर्भवतीका चित्त साबरके मांसपर हो, तो उद्भिन्न-चित्तवाली सन्तान होती है। (२०)

१७. तीतरका मांस खानेकी इच्छा यदि गर्भवती करे, तो सदा डरनेवाली सन्तान उत्पन्न होती है। (२०)

१८. गर्भवती यदि शृंगारकी इच्छा करे, तो शौकीन सन्तान होती है। (श० क०)

१९. यदि गर्भवती को वदचलनीके लिये किसी मिष्ठसे मिलनेकी इच्छा हो, तो वदचलन पुत्र और यदि कन्या हो, तो वह कुकर्म करनेवाली होती है। (श० क०)

२०. किसी स्नेहीसे मिलनेकी इच्छा हो, तो मिलनसार सुहृद सन्तान होती है। (श० क०)

२१. यदि श्रेष्ठ और पूज्य जनोंसे मिलनेकी इच्छा हो, तो सदाचारी सन्तान होती है। (श० क०)

२२. यदि गर्भवतीको खेल करनेकी इच्छा हो, हँसमुख सन्तान होती है। (श० क०)

२३. शिफार करनेकी इच्छा यदि हो, तो हँसक सन्तान होती है। (श० क०)

२४. यदि गर्भवतीकी लिखने पढ़नेकी इच्छा हो, तो गुणस सन्तान होती है। (श० क०)

२५. यदि नाच-गानेकी इच्छा हो, तो शृंगाररससे भरी हुई सन्तान होती है। (श० क०)

२६. यदि गर्भवतीको उत्तम फल खानेकी इच्छा हो, तो शुद्ध भोजन करनेवाली सन्तान होती है। (श० क०)

२७. फुलवारी और उपवनोंमें सैर करनेकी इच्छा हो, तो प्रसन्नाचित्तवाली सन्तान उत्पन्न होती है। (श० क०)

Page 206Permalink

माताके भोजनका सन्तानपर प्रभाव ।

१८५

२८. यदि हँसी दिह्मगीकी इच्छा हो, तो पुत्र होनेपर परस्त्री-प्रिय और यदि कन्या हो तो कुकर्म करनेवाली होती है ।

( ३० क० )

२९. यदि द्रव्य एकत्र करनेकी इच्छा गर्भवतीको हो, तो कंजूस सन्तान होती है ।

( ' १० क० )

इच्छा बहुत बड़ी चीज़ है । गर्भ समयमें इससे सावधान रहना चाहिये । जहाँतक हो सके उत्तम इच्छाका होना ठीक है, क्योंकि इच्छाका बहुत बड़ा प्रभाव बालकोंपर पड़ता है । माताकी जैसी इच्छा होती है उसीके अनुसार सन्तान भी उत्पन्न होती है ।

(४१) माताके भोजनका सन्तानपर प्रभाव ।

आहार वह वस्तु है कि जिससे शरीरका पोषण होता है । गर्भका बालक भी आहारके रससे पलता और पुष्ट होता है । अतएव माताका जैसा आहार होगा उसीके गुण दीपके अनुसार बच्चा भी होगा । आहारके गुणदीप बच्चोंमें अनेक प्रकार-से होते हैं ।

१. यदि गर्भवती मन्दिरा पीया करे, तो तृपात् अथवा विकल चित्तवाली सन्तान उत्पन्न होती है ।

( ३० ३० अ० ८ श्लो० ४२ )

२. गोहका मांस खानेसे शर्करा, पथरी, अथवा शनैर्मैह रोगवाली सन्तान होती है ।

( ४२ )

यदि गर्भवती मछली खाया करे, तो बहुत देरमें पलक भारनेवाली या देहीदण्डिवाली सन्तान उत्पन्न होती है ।

( ४२ )

41. माताके भोजनका सन्तानपर प्रभाव

Page 207Permalink

१८६

सन्तति-शास्त्र ।

४. मीठा भोजन खानेवाली गर्भवतीसे प्रमेह रोग वाली, गुरी या अत्यन्त मोटी सन्तान होती है । ( ३० )

५. गर्भवतीके खटाई खानेपर रक्त पित्तसे रोगी, कुष्ठि या नेत्र-रोगवाली सन्तान उत्पन्न होती है । ( ३३ )

६. नमक अधिक खानेवाली गर्भवती बली, पलित और खलित्य रोगग्रस्त सन्तान उत्पन्न होती है । ( ३२ )

७. यदि गर्भवती चरपर रसका अधिक सेवन करे, तो दुर्बल, थोडे वीर्य और उससे सन्तान न होनेवाला बालक उत्पन्न होता है । ( ३० )

८ कडुप रसके सेवन करनेवाली गर्भवतीसे शोपी, दुर्बल और सूखी हुई सन्तान उत्पन्न होती है । ( ३२ )

९. यदि गर्भवती कसैले रसका सेवन किया करे, तो काले रंगवाली या श्रफरा या उदावत रोगवाली सन्तान उत्पन्न होती है । ( ३२ )

१०. फीका भोज करनेसे निम्नज आलसी सन्तान होती है । ( रतिगन्त्र )

इस प्रकार विपरीत भोजनके होनेसे अनेक प्रकारके रोगों-से युक्त सन्तान उत्पन्न होती है । अतएव माता को अपने भोजनपर विशेष ध्यान रखना चाहिये, क्योंकि सन्तानके गुण-दोषमें आहार एक बहुत बड़ी चीज है । खाने हुए पदार्थसे रस बन कर गर्भका पोषण होता है । अतएव भोजनके गुण-दोषानुसार सन्तानके उत्पन्न होनेमें आश्चर्य ही क्या है ?

(३२) गर्भवतीके लक्षण ।

जिन स्त्रियोंमें रजोधर्मकी खराबी है, जो दो दो तीन तीन मासतक रजस्वला नहीं होतीं, उनको गर्भाधान होनेका पता

42. गर्भवतीके लक्षण

Page 208Permalink

गर्भवतीके लक्षण ।

१८७

ही नहीं चलता । वे इसी विचारमें रहती हैं कि अभी रजस्त्राव- का समय नहीं आया है । यदि गर्भावधान हो गया तो अनेक कारणोंसे विश्वास ही नहीं होता । क्योंकि वे ऐसे ही लक्षणों- को ठीक मानती हैं कि जो रुग्णावस्थामें भी पाये जाते हैं । इसलिये उन लक्षणोंको भी जानना जरूरी है कि जो गर्भवतीमें होते हैं । इसके अनेक लक्षण हैं ।

१. वैद्यकका मत

१. स्तनोंके अगले भागका काला हो जाना, पेटपर वालोंकी सेली उठी सी दिखलाई देना, नंब्रोंकी पलकोंका विशेष रूपसे मिचना, बिना किसी दूसरे कारणके कै होना, सुगन्ध बुरी लगना, थूक अधिक आना, थकावट मालूम होना । (सु० ३० अ० ३७४० १३ वा १४ )

२. रज बन्द हो जाना, बार बार मुखमें पानी भर आना, अन्नसे अरुचि, कै, खटाई खानेकी इच्छा होना, शरीर- का भारी पड़ जाना, दोनों आखें मिचीसी जान पड़ना, स्तनोंमें दधका संचार होना, ओठ और स्तनोंका अगला भाग काला पड़ जाना, पैरों में थोड़ीसी सूजनका होना, कभी कभी रोमांच हो जाना । (च० ३० अ० २३४० २१ )

३. मैथुनकी चाह न होना, मुखका पीला पड़ जाना, स्तनों- का बढ़ना, न खाने योग्य वस्तुओंके खानेको चिन्त चाहना, बालकका उछलना, आलस्य, डकारोंका आना और अपच । (३० क० )

२. बिद्वानोंकी राय ।

१. गर्भमें बालकके हृदयकी धड़कन मालूम होती है । यह धड़कन घड़ीके समान हृदयपेशियोंके संकोचनसे होती

Page 209Permalink

१८८

सन्तति-शास्त्र ।

है । इस थड्कनके मालूम करनेसे बालकका गर्भाशयमें होना निश्चय होता है । यदि यह थड्कन न हो तो मूढ़ गर्भ ( False pregnancy ) समझना चाहिये । ऐसी थड्कन माताकी वार्ड कोखके बीचमें सुनाई पड़ती है । इसकी बाल बालकके सवल और निर्वल होनेपर है । ऊपर जितने लक्षण कहे गये हैं वे सब मूढ़गर्भमें होते हैं; परन्तु उसमें हृदयकी थड्कन नहीं होती । इसीसे गर्भका निश्चय ठीक तीरसे होता है ।

(३३) गर्भमें क्या है ?

उन लोगोंके लिये कि जो आस्त्रके मर्मको जानते हैं, यह मालूम कर लेना कि गर्भमें क्या है, कुछ कठिन नहीं । परन्तु वे लोग जिन्होंने कभी ऐसे विषयपर विचार नहीं किया, जो सदैव इससे अलग रहे, जिन्होंने स्वयंमें भी अपने गार्हस्थ्य-जीवनपर दृष्टि नहीं डाली, उनके लिये तो यह अत्यन्त कठिन विषय है । इसके लक्षण प्रारंभसे ही प्रकट होने हैं; परन्तु दो तीन महीने बाद वे अच्छी तरह मालूम होने लगते हैं । इसमें आचर्य्याके अनेक मत हैं ।

१. वैद्यकका मत ।

१. गर्भाधान समयमें रक्त-वीर्य मिल कर जब गर्भ धारण होता है, यदि उस समय नाभिकी दहिनी ओर थोड़ासा हटकर कुछ दूर हो, तो पुत्र; और यदि नाभिकी बाई ओर कुछ हटकर दूर हो, तो कन्या तथा नाभिके नीचे हो, तो नपुंसकका गर्भ समझना चाहिये । (ततिशास्त्र)

२ दूसरे महीनेमें गर्भ तीन प्रकारसे जाहिर होता है ।

(३०-१०-३०-२-१०-१८)

43. गर्भमें क्या है ?

Page 210Permalink

गर्भमें क्या है ?

१८६

१. वन अर्थात् गोल आकारका गर्भ मालूम हो, तो पुत्रका गर्भ समझना चाहिये।

२. पिंड अर्थात् लम्बे आकारकी मांसपेशी हो तो कन्या का गर्भ जानना चाहिये।

३. अर्बुद अर्थात् गोल, कुछ चिपटा हुआ पिंड सरीखा हो, तो नपुंसकका गर्भ समझना चाहिये।

वागभट्ट और भावप्रकाशमें भी ऐसा ही कहा है।

३. स्त्रीकी सबसे प्रायः अर्थात् धारणादि सब क्रियाएँ वायु अंगसे अधिक हों, गर्भवतीको पुरुष संग अप्रिय मालूम हो, शयन, पान, भोजन, शील और चेष्टा सब अत्यन्त स्त्री जनोको जो उचित हैं वैसी ही हो, वायु पसलीकी तरफ गर्भका संचय अधिक हो, गर्भ वतीके आकार का न हो, वायु स्तनसे पहले दध निकले, तो ऐसे गर्भसे कन्या उत्पन्न होती है।

४. प्रथम दहिने स्तनमें दूध आना, पहले दहिने अंगसे चलना और काम करना, जैसे चलनेमें दहिना पैर पहले उठाना और काम करनेमें पहले दहिना हाथ बढ़ाना, पुरुष नामावली वस्तुओंकी इच्छा करना और दहिनी कुक्षिका ऊँचा होना, इन लक्षणोंसे पुत्र होता है।

(वा०श० अ० १ श्लो० ७०-७२)

५. नपुंसक सन्तानके लक्षण—

१. ऊपर कहे हुए कन्या और पुत्रके लक्षण मिले होनेसे नपुंसक सन्तान उत्पन्न होती है। (इस बातको चरक, सुश्रुत और वागभट्ट तीनोंने माना है।)

२. पेटके दोनों पँसवाड़े ऊँचे होने तथा पेट आगेको निकलनेसे।

(शु० श० अ० ३ श्लो० ४९)

Page 211Permalink

१६०

सन्तति-शास्त्र ।

३ पेट के बीचका भाग ऊँचा होनेसे । ( वा० श० अ० १ )

६. जोड़ली—जोड़ुर्घा सन्तानके लक्षण ।

१. पेट दोनों तरफसे उभरा और बीचमें नीचा होनेसे दो सन्तान होती हैं । ( सु० श० ग्र० ३ श्लो० ५० )

२. एक ओर श्रथात् दहिनी ओर पेटका उभार और बाई ओर जरा नीचे होनेमें। एक कन्या एक पुत्र होता है । ( श० क० )

३. दोनों ओर बराबरके उभारसे यदि अधिक उभार हो, तो दोनों पुत्र, यदि उभार नीचा हो, तो दो कन्याएँ होती हैं । ( श० क० )

४ दोसे अधिक सन्तान होनेवालीके लक्षण ।

१ जो लक्षण दो बच्चे होनेवालीके होते हैं वेही कई बच्चे होनेवालीके भी होने हैं । ( श० क० )

इस प्रकार गर्भके बालककी परीक्षा हों सकती हैं ।

(४४) मूढ़गर्भ ।

गर्भकी उत्पत्तिका स्थान गर्भाशय है । यह एक ऐसी पवित्र भूमि है कि जहाँसे बच्चा नौ मास निवास करके बाहर होता है । गर्भ दो प्रकारका होता है। सच्चा और भूटा । सच्चा गर्भ वह है कि जिससे बच्चा उत्पन्न होता है । भूटा गर्भ वह है कि जिसमें बच्चा नहीं रहता, केवल मांसपिंड होता है। ऐसे गर्भको ( False Pregnancy ) कहते हैं ।

जब किसीको भूटा गर्भ होता है, तो स्त्रियाँ उसे सच्चा गर्भ समझ लेती हैं । ऐसा इस कारण होता है । कि जितने लक्षण सच्चे गर्भमें होते हैं वे ही भूटे गर्भमें भी होते हैं । जैसे रजो-धर्मका बन्द हो जाना, जी मचलाना, कै होना, भोजनमें श्रद्धा,

44. मूढ़ गर्भ

Page 212Permalink

मृदुगर्भ ।

१६१

आत्मस्य और पेटका बढ़ना इत्यादि । ऐसा गर्भ कैसे उत्पन्न होता है ? इस विषयमें वैद्यकका मत है कि—अतुल्लान करके स्त्री यदि स्वप्नमें पुरुषसे प्रसंग करे, तो वायु रजको लेकर गर्भाशयमें गर्भ सरीखा पिंड बना देती है । ऐसा गर्भ हर महीने बढ़ता है और सारे लक्षण सच्चे गर्भकेसे प्रतीत होते हैं और पिताके गुणोंसे रहित मांस पिंड सरीखा उत्पन्न होता है । किसी किसी स्त्रीके इस प्रकार होता है कि जब दो स्त्रियाँ आपसमें संयोगकी चाहसे मैथुन करें और इनका वीर्यपात हो, तो एकका वीर्य और दूसरीका रज मिलकर गर्भाशयमें यदि पहुँच जावे, तो बिना हॉर्डियोंका लोथड़ासा, पिताके गुणोंसे वर्जित, गर्भ बन जाता है ।

( सु० ५० अ० २ श्लो० ५१ मे० ३ )

पैसे गर्भमें माताके रजसे उत्पन्न होनेवाले गुण होते हैं, परन्तु पिताके गुण नहीं होते । कारण यह है कि ऐसा गर्भ केवल माताके रजसे ही उत्पन्न होता है । पिताके वीर्यके अंशसे बच्चेमें बाल, रोप, हड्डी, नाखून, दाँत, बारीक रंग, नस, नाड़ी, और वीर्य इत्यादि स्त्रि पदार्थ बनने हैं । अतएव पिताका वीर्य सामिलित न होनेसे ये बातें नहीं होतीं, केवल लोथड़ासा रहता है ।

पेसा गर्भ विशेष रीतिसे युवा विधवाओं, कुमारियों तथा ऐसी स्त्रियोंको कि जिनका संबन्ध पतिसे नहीं हुआ है, या बहुत दिनोंसे छूट गया है या जो अन्यन्त कामातुर हैं, उन्हींको रहता है । इसलिये सब गर्भके चिह्न मालूम होने लगे, तो यह पहचान कर लेनी चाहिये कि गर्भ सच्चा है या नहीं । स्त्रीके शारीरिक लक्षणोंसे इसकी पहचान नहीं हो सकती, क्योंकि मृदुगर्भमें सारे लक्षण सच्चे गर्भकेसे होती हैं । सबसे बड़ी

Page 213Permalink

१६२

सन्तति-शास्त्र ।

पहचान यह है कि बालकके हृदयकी धड़कन घड़ीके समान टिक-टिकका शब्द बालकके हृदयपेणियोंके संकोचनसे होता है। इसके सुनाई पड़नेसे बालकका गर्भाणियमें होता निश्चय होता है। यह शब्द माताकी बाईं कोखके बीचमें सुन पड़ता है। इसकी चाल प्रायः एक मिनटमें १६० बारतक होती है। कन्याके गर्भमें अधिक और पुत्रमें कम होती है। जब ऐसा न हो, तो मृदुगर्भ समझना चाहिये। इस प्रकार परीक्षा करके सब्जे और मृदुगर्भका निश्चय करना कर्तव्य है। इसके अतिरिक्त और कई प्रकारसे परीक्षा हो सकती है।

(४५) गर्भ रह जानेपर कवतक संयोग करना चाहिये ?

यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है। लोग इसपर बहुत कम ध्यान देते हैं। खास कारण इसका यह है कि गर्भाधान हो जानेपर लोगोंको मालूम ही नहीं होता कि गर्भ रह गया है या नहीं। इसके अलावा स्वार्थवश विषय-वासनामें फँसकर लोग कुछ भी विचार नहीं करते। इस विषयमें अनेक मत देखे जाने हैं।

१. धर्मशास्त्रका मत ।

१ गर्भवतीके साथ दो मासतक भोग करना चाहिये ।

(त्रा० ४०)

२ गर्भवतीके साथ छ् मासतक मनुष्य विषय कर सकता है ।

(अत्रिस्तुति० १६३)

२. वैद्यकका मत ।

१. गर्भवतीके साथ दो मासतक संयोग करनेमें कोई हर्ज नहीं होता, यदि स्त्रीको कुछ रोग न हो। (१० क०)

45. गर्भ रह जानेपर कवचक संयोग करना चाहिये ?

Page 214Permalink

गर्भ रह जानेपर कतचका संयोग करना चाहिये ? १६३

इस विषयमें दो मत उपस्थित हैं। एक तो यह कि दो मास तक गर्भवतीसे संयोग करना चाहिये, दूसरा यह कि छ मासतक। इसमें सबसे बड़ी बात तो यह देखना है कि छ मासतक संयोग करनेमें कितनी हानि है। यह बात प्रसिद्ध है और वास्तवमें ठीक है कि संयोग करनेसे स्त्रीकी ताकत कम होती है। इसके अतिरिक्त गर्भावस्था में स्त्री मैथुनप्रिय होगी तो सन्तानपर माताके आचरणका दोष पड़ेगा। वैद्यकका मत है कि गर्भकी दशामे यदि स्त्री पुरुषसे संयोग करे और यदि पुत्र पैदा हो तो वदचलन और यदि कन्या हो, तो परपुरुषके साथ गमन करनेवाली होती है। ( १० क० )

प्रायः ऐसा भी होता है कि गर्भ रह गया है और बार बार संयोग हो रहा है। ऐसी दशामें गर्भाशयमें एक सप्ताह तक का मिला हुआ रज-वीर्य अनेक उपद्रवोंसे बाहर निकल आता है। गर्भसाव हो जानेका भी भय रहता है और खासकर आजकलकी स्त्रियोंमें तो निर्बलताके कारण ऐसा होना और भी सम्भव है।

यहांपर हमारे पाठक यह प्रश्न कर सकते हैं कि धर्मशास्त्रकी आज्ञा छ मासतक संयोग करनेकी है, परन्तु यहां यह बात विचार करने योग्य है कि धर्मशास्त्र धर्मके विषयको प्रतिपादन करता है। धर्मशास्त्रमें शारीरिक अर्थात् शरीरकी व्यवस्था नहीं कही गयी है। धर्मशास्त्रका मत है कि प्रातः काल सूर्य उदय होनेके पहले स्नान करना चाहिये, परन्तु एक ऐसा व्यक्ति कि जो हमेशा रोगी रहता हो कैसे कर सकता है। इस विषयमें वैद्यकका मत है कि रोगीको प्रातः काल स्नान न करना चाहिये। इन प्रमाणोंसे स्पष्ट है कि धर्मशास्त्रने धर्म-प्रकरण लेकर और वैद्यकने शारीरिक लेकर लिखा

१३

Page 215Permalink

१८४

सन्ततिशास्त्र ।

है। इसलिये शरीरके ही अनुसार धर्म होना चाहिये। इस बातके माननेमें कि गर्भाधान होनेके छ मास बादतक संयोग किया जाय, अनेक वाधार्थ पड़ती हैं। स्त्री और बच्चेका निर्बल हो जाना, गर्भस्त्राव आदि कारणोंसे छ मास तक गर्भवतीसे संयोग करनेका नियम अनुचित है। इसलिये वैद्यक मतके अनुसार दो मासतक यदि इच्छा हो, तो गर्भवतीसे संयोग करना चाहिये।

जो लोग इससे अधिक दिनोंतक त्रिग्य-वासनामें फँसकर संयोग करने हैं उनसे स्त्री और गर्भके बालकको अनेक प्रकारकी हानि उठानी पड़ती है। यहाँतक कि गर्भवती और बालक दोनोंकी जान जाने तककी नौबत आ पहुँचती है।

(४६) गर्भवतीके कर्तव्य ।

आज कल स्त्रियोंकी दशा शोचनीय हो रही है। गर्भवती होनेपर इनका ध्यान अपने कर्तव्योंकी ओर जरा भी नहीं जाता। वे नहीं समझतीं कि गर्भ धारण करनेपर उनपर कितनी जिम्मेदारी आ जाती है। गर्भवतीको हमेशा अपना स्वास्थ्य उत्तम रखनेका यत्न करना चाहिये। प्रायः देखा जाता है कि गर्भवती अपने खानेपीनेपर बहुत कम ध्यान रखती हैं। ऐसी दशामें जहाँ तक हो सोजन मधुर और जल्दी पचनेवाला होना चाहिये। पहलेके दो महीनोंमें भूख कम लगती है, मिट्टी इत्यादि खानेकी रुचि तो अवश्य होती है। यदि इन दिनों थोड़ा सोजन किया जाय तो फोई हानि नहीं है। दो महीनेके पीछे भूख स्वयं बढ़ती है। इसलिये दिनरातमें कई बार थोड़ा थोड़ा सोजन करना चाहिये। चौथा महीना लगनेके साथ ही कुछ अधिक सोजनकी जरूरत पड़ती है। प्रकृति भी इन दिनोंमें

46. गर्भवतीके कर्तव्य

Page 216Permalink

गर्भवतीके कर्तव्य ।

१६५

क्रे और जी मचलाना बन्द करके भूख बढ़ाती है। ऐसे समयमें बच्चेका हृदय तैयार हो जाता है, इसलिये माताको अपने हृदय और बच्चे दोनोंके हृदयका पालन करना पड़ता है। यही समय बालकके शरीर बढ़नेका भी होता है। अतएव माता जितना श्रद्धा और अधिक भोजन करती है, उतना ही उत्तम और अधिक रस बनकर बच्चेकी बाढ़में सहायता पहुँचता है और उसका पोषण करता है।

गरिष्ठ, कड़ा, खड़ा, कसैला और फीका भोजन न होना चाहिये। चरबी बढ़नेवाले पदार्थ जैसे घी और मिठाई इत्यादि अधिक न खाना चाहिये। चरबी बढ़नेसे शरीर मोटा पड़ जाता है। इससे सबसे बड़ी हानि यह होती है कि पैदा होते समयमें बच्चा फँस जाता है। प्रायः इसी कारण अनेक बार बच्चोंकी मृत्यु भी देखी गई है।

गर्भवतीको यह सलाह कभी न देनी चाहिये कि वह मांस खावे या शराब पीवे। इससे दुष्ट प्रकृतिकी सन्तान उत्पन्न होती है। प्रत्येक मातापिताको अमूल्य रत्न उत्पन्न करनेकी लालसा रखनी चाहिये।

प्राज्ञ कलके पहनावेकी दशा भी विचार करने योग्य है। स्त्रियाँ सभ्य ललनार्प बननेके लिये सुस्त और बदनसे जकड़ा हुआ कल पहनती हैं। यदि गर्भ-समयको छोड़कर और समयोंमें पहना जाय, तो इतना हर्ज नहीं है, परन्तु गर्भावस्थामें इससे बड़ी हानि होती है। पेट भिचने और काखोंके दबनेसे बड़ा कष्ट होता है, बच्चेकी बाढ़ रुक जाती है तथा स्थानसे दल जानेका भय रहता है।

जिन स्त्रियोंका पेट बड़ा होता है उनका गर्भ नीचेको लटक आता है और बच्चेको महान् कष्ट होता है। इसलिये एक

Page 217Permalink

१६६

सन्तति-शास्त्र ।

बीता चाँड़ा उदर पड़ा, जो मुलायम कपड़ेका हो, बांधन चाहिये।

खियाँ गर्भावस्थामें अपने विचारोंको ठीक नहीं रखतीं। अनेक बुरे विचारोंसे पाला पड़ता है। याद रहे कि जैसे विचार गर्भावस्थामें माताके होते हैं उसीके अनुसार सन्तान उत्पन्न होती है।

रहन-सहनके लिये तो पूछना ही क्या। ऐसे समयमें निश्चय करके असावधानी की जाती है। नीचे ऊपर चढ़ना उतरना, दौड़ना कूदना, परिश्रम और नाचना। यह सब वर्जित है। इससे गर्भपात होनेका भय रहता है। शोक, चिन्ता, भय और क्रोध इतसे बच्चेके मस्तक और स्नायुओंपर धक्का पहुँचता है और दिमाग नियल पड़ जाता है। यह भी न होना चाहिये कि गर्भवती दिन रात पड़ी हो रहे, इससे अनेक प्रकारके शब्दों बुरे विचार उत्पन्न होते हैं। ग्लानि रहती है और पाचन शक्ति बिगड़ जाती है। इसलिये कुछ थोड़ा चलना फिरना आनन्दक है। गर्भवतीका रात्रिमें दस घंटोंसे कम न सोना चाहिये। प्रायः खियाँ चित्त होकर कम सोती हैं। ढेरतक करवट लेकर सोना हानि पहुँचाता है। इससे बच्चा एक और झुक जाता है। थोड़ी देर करवटसे सोना हानि नहीं करता। बाकी समयमें आरामके साथ चित्त होकर सोना चाहिये। सोनेका कमरा साफ़ और ओढने-बिछौने मुलायम होने चाहिये। गर्भवतीको रोगोंकी सेवामें न रहना चाहिये, क्योंकि रोगी निरोग मनुष्य की प्राणशक्ति खोचता है और अपनी रोगशक्तिको दूसरेके शरीरमें प्रवेग करता है। इसलिये गर्भवती और बच्चा दोनोंके रोगी हो जानेका भय रहता है। शरीरमें मस्तक एक काम करनेवाली चीज़ है, परन्तु खियाँ इसकी कुछ भी परवाह नहीं करतीं। मस्तक और दूसरी इन्द्रियोंका बहुत बड़ा सम्बन्ध है।