संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
29. गर्भ कैसे रहता है ?
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सन्तति-शास्त्र ।
गरदनके उस सिरेपर पहुँचते हैं जो गर्भाशयसे मिली रहती है । और उधरसे रजके साथ कीड़े जो कि उसमें होते हैं, अरुडवाही नलियोंके छेदोंसे गर्भाशयमें पहुँचते हैं । जब ये दोनों रज वीर्यके कीड़े आपसमें गर्भाशयसे मिली हुई गरदनके सिरेपर पहुँच कर मिलते हैं, तब वीर्यका कीड़ा जो रजके कीड़ेसे छोटा होता है, तुरन्त रजके कीड़ेमें घुस जाता है; घुसते ही उसकी पूँछ कट जाती है और अगला भाग जिसको सर कहते हैं वह रजके कीड़ेमें मिल जाता है तथा गर्भाशयकी गरदनके सिरेसे दोनों कीड़ोंका मिला हुआ पदार्थ गर्भाशयमें पहुँचकर बढता है । यही वध्मेका पहिला स्वरूप है । परन्तु सबसे बड़ी बात इसमें यह है कि वीर्यका कीड़ा रजके कीड़ेमें कुदकर घुसता है । उसलिये वीर्यके कीड़ेमें चंचलता और कुदनेकी शक्ति जरूर होनी चाहिये । यदि ऐसा न हो, तो गर्भास्थापित होनेमें बाधा पड़ती है ।
२; वैयकका मत ।
१. संयोग होनेसे शरीरमें गरमी उत्पन्न होती है । इससे वायु उत्कट होकर गरमीके संबंधसे पुरुषका वीर्य निकलता है और योनिमें पहुँचकर रजसे मिल जाता है । इन दोनोंसे मिला हुआ पदार्थ गर्भाशयमें पहुँचता है । और वायुसे तत्काल घेरला किया हुआ जीवात्मा गर्भाशयमें प्रवेश होकर स्थित होता है । (सू० श० ३० ३ श्लो० २ व ३)
२. रज और वीर्य जैसे ही गर्भाशयमें मिलते हैं उसी समय जीवात्माका संयोग होकर गर्भ रहता है । (श० का०)
गर्भ स्थित होनेके तात्कालिक लक्षण ।
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३. स्त्री और पुरुष जब दोनों एक ही साथ स्वलित होते हैं, तब उधरसे रज आता है और इधरसे वीर्य पहुंचता है और दोनों गर्भाशयमें मिलकर गर्भ बनाते हैं । यदि स्त्री और पुरुष दोनों एक साथ स्वलित न हों, तो गर्भ नहीं बनता । (रति शास्त्र)
डाक्टरों मतसे यह बात सिद्ध होती है कि रज और वीर्य-के कड़े दोनों आपसमें मिलकर गर्भ उत्पन्न करते हैं । वैद्यक-का मत यह कहता है कि रजवीर्यके मिलनेपर जब जीवात्मा इनमें प्रवेश करता है, तब गर्भ रहता है । जीवात्माके प्रवेश होनेसे सतलव यह है कि रजवीर्यसे मिला हुआ पदार्थ सजीव हो जाता है डाक्टरों रीतिसे कौड़ों द्वारा और वैदिक रीतिसे रज-वीर्य मिले हुए पदार्थसे जीवात्मा द्वारा गर्भका स्थित होना सिद्ध है ।
(३०) गर्भ स्थित होनेके तात्कालिक लक्षण ।
प्रायः यह सन्देह ही रहा करता है कि अमुक समयके गर्भाधानसे गर्भ स्थित हुआ या नहीं ? इस विषयमें आचार्यों-के अनेक मत हैं ।
१. वैद्यक का मत ।
१. तात्काल गर्भधारण करनेवाली स्त्रीको थकावट, ग्लानि, प्यास साथलौका थक जाना, योनिका फरकना, और रज-वीर्यका बाहर न निकलना इत्यादि लक्षण होते हैं । (सु० श० अ० १२ श्लो० १२)
२. गर्भ धारण समयमें स्त्रीकी चेष्टा अत्यन्त मनोहर हो जाती है और लावण्यता अधिक बढ़ जाती है । (श० क०)
30. गर्भ स्थिति होनेका तत्कालिक लक्षण
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सन्तति-शास्त्र ।
२. विद्वानोंकी राय ।
१. जब गर्भ धारण होता है तब ज्योंही रज-वीर्य मिलकर गर्भाशयमें पहुँचता है त्यों ही खींची नाभिके नीचे थोडासा मीठा मीठा दर्द होता है । (रति शास्त्र )
१. गर्भ धारण समयमें वीर्य योनिसे बाहर नहीं निकलता और गर्भ धारण होते ही संयोगकी चाह जाती रहती है । (चक्रपाणि )
जब ऐसे लक्षण हों, तो समझ लेना चाहिये कि गर्भ धारण हो गया । ये लक्षण गर्भ धारण होनेके साथ ही साथ मालूम होते हैं ।
(३१) जीव गर्भमें कब आता है ?
इस विषयमें कि गर्भ समयमें वचोमें जीव कब आता है अनेक विवाद हैं । कोई गर्भ धारण होनेके साथ ही, कोई चार मास के बाद, कोई चैतन्यता उत्पन्न होनेपर जीवका गर्भमें आना मानते हैं । इसी प्रकार अनेक मत हैं, परन्तु यदि यह बात मान ली जाय कि गर्भ धारण होनेके साथ ही साथ जीव नहीं आता, तो यहाँ एक बहुत बड़ी शंका यह होगी कि गर्भ फिर बढ़ता कैसे है ? क्योंकि निर्जीव पदार्थका वृद्धि-क्रम नहीं होता इसलिये यह बात माननी पड़ेगी कि सजीव गर्भाधान होता है या गर्भाधान होनेके साथ ही साथ गर्भ सजीव हो जाता है ।
१. वैदिक मत
१. गर्भाधानसे लेकर दस मास अर्थात् पैदा होनेतक गर्भ सजीव रहता है और सजीव ही उत्पन्न होता है ।
(क० म० ५ सू० ७८ म० ९ )
जीव गर्भमे कब आता है ?
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२. धर्मशास्त्रका मत ।
१. स्त्री और पुरुषके संयोगसे पुरुषका शुद्ध वीर्य योनिमें जाकर स्त्रीके शुद्ध रजसे मिलता है। उसी समय भूतात्मा, आप ही आकाश वायु जल पृथिवी और अग्नि अर्थात् पंच महाभूतोंके साथ गर्भाशयमें स्थित होता है ।
( या० य० ध० प्र० ७२ )
३. वैद्यकका मत ।
१. जब गर्भाशयमें रज-वीर्य और जीव इन तीनोंका संयोग ( मेल ) हो जाता है, तो उसको गर्भ कहते हैं; अर्थात् रज-वीर्य और जीव इनके मिलनेपर ही गर्भ स्थित होता है । ( च० श० अ० ४ श्लो० ३ )
२. जिस समय गर्भाशयमें रजवीर्यका मिश्रण होता है । उसी समय जीव उनके साथ उसमें प्रवेश करता है । जिस प्रकार सूर्यकी किरण और मणिके संयोगसे अग्नि प्रकट होती है, इसी प्रकार रज-वीर्यके मिलनेसे जीव प्रगट होता है । ( भा० प्र० ग० प्र० ३२ ३३ )
६. डाक्टरोंका मत ।
१. रज-वीर्यके कीड़े आपसमें मिलकर गर्भ उत्पन्न करते हैं, बिना इन जीवोंके मिले गर्भ नहीं रहता अर्थात् प्रारम्भसे ही गर्भ सजीव होता है ।
धर्मशास्त्र और वैद्यकसे यह बात मालूम होती है कि जब गर्भाशयमें रज-वीर्य मिलता है उस समय उनमें जीव आ जाता है । वेदसे भी यही स्पष्ट है कि गर्भ प्रारम्भ से ही सजीव होता है । डाकुरी मतका भी अभिप्राय यही है कि गर्भ सजीव स्थित होता है । अतएव सर्वसम्मतसे यह बात निश्चय है कि
31. गर्भमें जीव कवतक आता है ?
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सन्ततिशास्त्र ।
रज-चीर्थ्य मिलते ही जीवका संयोग मिले हुए पदार्थमें हो जाता है या यों कहो कि गर्भ सजीव ही स्थित होता है ।
(३२) प्रेम द्वारा उत्तम सन्तानकी उत्पत्ति ।
प्रेम ईश्वरका दिया हुआ एक उत्तम पदार्थ है । संसारी जीव प्रेमके फन्देमें फंसे दिखलाई पड़ते हैं, कारण यह है कि ईश्वरकी स्मृतिही प्रेममय है । अतएव विना प्रेमके निवाँह होता कठिन है । प्रेम मनसे उत्पन्न होता है, इसलिये मनको जो वस्तु मिय होती है उसीसे प्रेम होता है । सारे सम्बन्ध प्रेमके सामने भूटे हैं । इसलिये प्रेमका सम्बन्ध सबसे बलिष्ठ है । हर एक मनुष्य हर एक बातसे प्रेम नहीं रखता । एक जिससे प्रेम रखता है दूसरा उसको बुरा बतलाता है । इसका कारण मन ही है । प्रेम दो तरफ़का होता है ।
(१) वह जो थोड़ी देर तक रहे । इसको 'चर' प्रेम कहते हैं ।
(२) वह जो बराबर बना रहता है और बढ़ता जाता है जिसको 'अखण्ड' या 'अटल' प्रेम कहते हैं । किसी वस्तु-को देखकर प्रसन्न हो जाना और फिर उसकी परवाह न रखना या उससे अच्छी वस्तु पाकर भूल जाना, ऐसे प्रेमका सम्बन्ध हृदयसे अधिक और मस्तकसे कम रहता है । इसीको चर प्रेम कहते हैं । अखण्ड या अटल प्रेम वह है जो सौते, जागते एक समान रहता है, कभी कम नहीं होता, किन्तु बढ़ता ही जाता है । अच्छीसे अच्छी वस्तु प्रेमीके हृदयसे प्रेमको अपनी ओर नहीं खींच सकती । ऐसे प्रेमका सम्बन्ध मस्तकसे अधिक और हृदयसे कम होता है । चर प्रेममें स्वार्थ होता है, परन्तु अटल प्रेममें स्वार्थ नहीं होता । जहाँ सच्चा प्रेम है वहाँ स्वार्थ कहाँ ? प्रेम भी एक प्रकारका नहीं होता । प्रेमके अनेक प्रकार
प्रेम द्वारा उत्तम सन्तानकी उत्पत्ति ।
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है। जब हम प्रेमको मनकी शक्ति मानेंगे तो इसपर भी विचार करना होगा कि मनुष्यको हर बातका प्रेमी होना चाहिये। क्योंकि मन प्रत्येक बात पर जाता है। इसमें सन्देह नहीं कि मन हर एक बातोंपर अवश्य जाता है, परन्तु वह सबका प्रेमी नहीं बनता। उसको अपनी इच्छाके अनुसार खास खास बातोंका प्रेम होना पड़ता है, जैसे माताका प्रेमी, जातिका प्रेमी, देशका प्रेमी, ईश्वरका प्रेमी और स्त्रीका प्रेमी इत्यादि।
शरीर-रचना-शास्त्रसे पता चलता है कि प्रेमका स्थान, सर है। जितने तरहके प्रेम हैं सबका स्थान सरमें अलग अलग बना हुआ है। जिसका जितना जिस प्रकारके प्रेमका स्थान बली है, मनुष्य उसका उतना ही प्रेम होता है। सरमें प्रेमके जितने स्थान हैं सब बली क्यों नहीं होते? इस विषयमें वैद्यक-का मत है कि गर्भाधान समयमें जिस बातसे माता पिता दोनोंको प्रेम होता है, सन्तान उस बातकी श्रद्धल प्रेमी हो जाती है। जिस बातमें उस समय केवल माता पिताको प्रेम होता है, सन्तानका अधूरा प्रेम उस बातसे रहता है। जिस बातसे उस समय मातापिता दोनोंका प्रेम नहीं होता, सन्तान उसकी कट्टर विरोधी हो जाती है। जिस बातसे उस समय केवल माता या पिताको प्रेम नहीं होता, सन्तानको उसमें विशेष रुचि नहीं होती। (रतिशास्त्र)
इससे स्पष्ट है कि गर्भाधान समयमें मातापिताका प्रेम जिस बातमें जितना होता है, वृत्तके सरमें उस प्रेमका स्थान उतना ही प्रबल और निर्बल होता है। इस कारण हर मनुष्य हर बातका प्रेमी नहीं होता।
एक बात सारे मनुष्य क्या, जीवमात्रमें दिखलाई पड़ती है कि सब लोग स्त्री-जातिके प्रेमी होते हैं और स्त्री-जाति पुरुष
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सन्तति-शास्त्र ।
जातिकी प्रेमी होती है। इसका कारण यह है कि गर्भाधान समयमें स्त्री जातिको पुरुष जाति और पुरुष जातिको स्त्री जातिसे प्रेम अवश्य होता है और इसी प्रेमके कारण सन्तानमें पैसे प्रेमका स्थान प्रबल हो जाता है। इसलिये हर स्त्री जाति पुरुष जाति और हर पुरुष जाति स्त्री जातिसे प्रेम करती है और दोनों एक दूसरेके प्रेमी होते हैं। सच्चा प्रेम विजलीसे भी अधिक वलवान् है। जब स्त्री-पुरुष एक दूसरेके प्रेमी होते हैं, तो उनमें कुछ प्रेमकी गहराई मालूम होती है। दोनोंमें एक दूसरेके चित्तको खींचनेकी शक्ति इतनी प्रबल होती है कि दोनोंकी आत्मा एक हो जाती है, इसीलिये 'दो शरीर और एक प्राणकी' कहावत प्रसिद्ध है।
प्रेमसे शरीरमें एक प्रकारकी शक्ति पैदा होती है। जिस प्रकार विजलीके नारको हाथमें लेनेसे उसकी शक्तिका कुछ ज्ञान होता है, इसी प्रकार प्रेमके फलसे जकड़े हुए प्रेमियोंके शरीरमें प्रेमकी शक्तिका प्रवाह चिन्तवन मावसे ही उमड़ पड़ता है। एक दूसरेकी प्रेममर्तिको देखते ही शरीरमें प्रेम-शक्तिका सञ्चार हो जाता है। एक दूसरेके प्रेममें लीन हुए स्त्री पुरुषोंके देखनेसे प्रेम और प्रेमीकी मर्यादा मालूम होती है। सच्चा प्रेम उनके हृदयको इतना कोमल बना देता है कि एक दूसरेके प्रति पात्र हो जाते हैं और प्रेमशक्ति उनके हृदयको पवित्र बना देती है। प्रेमीको प्रेमानन्दके सामने स्वर्गके सुख और रंजा महाराजोंके महलोंके वैभव तिनके समान जान पड़ते हैं।
प्रेम केवल प्रेम हीके लिये किया जाता है, इसका और कोई मतलब नहीं है। सच्चा प्रेम स्त्री और पुरुषके मनको एक कर देता है, विचारोंको मिला देता है और भावोंको एक करनेके
प्रेम द्वारा उत्तम सन्तानकी उत्पत्ति ।
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प्रयत्न करता है । जब दोनों के चित्तपर प्रेम अपना अधिकार इस प्रकार जमा लेता है तभी स्त्री पुरुष रूपवान और गुणवान सन्तान उत्पन्न करनेमें समर्थ होते हैं । प्रेमका कैसा महत्व है कि यदि स्त्री पुरुष के परस्पर प्रेमसे गर्भाधान हो तो सन्तान हर प्रकार से सुन्दर, गुणवान, सुशील निद्रोग और बुद्धिमान उत्पन्न होती है । कारण यह है कि गर्भाधानके समय रजवीर्य पर प्रेमका प्रभाव पड़ता है और यही प्रेम रूपवान और गुणवान सन्तान उत्पन्न करने का कारण है । प्रेमही से माता-पिता के गुण वच्चोंमें आते हैं । प्रेम ही प्रत्येक गुणों को उत्तेजितकर संजीवनी शक्ति उत्पन्न करता है । प्रेमही से वच्चोंमें मानसिक और शारीरिक शक्तियोंका विकास उत्तमतासे होता है इतना ही नहीं प्रेम वच्चे के शरीर को भी बढ़ाता है जिस प्रकार माता और गर्भका संवन्ध है इसी प्रकार प्रेम और गुणका संवन्ध है । अतएव जहाँ माता पिता प्रेमी होते हैं वहीं सर्व-गुण-संपन्न सन्तान उत्पन्न होती हैं । जहाँ स्त्री पतिसे प्रेम करती है और पति स्त्रीसे प्रेम नहीं करता या पति स्त्रीसे प्रेम करता है और स्त्री पतिसे प्रेम नहीं करती, वहाँका तो कहना ही क्या है । काली, कुवडी और कुरुप अनेक प्रकारकी सन्तान उत्पन्न होती है । जहाँ पुरुषकी ओरसे प्रेम होता है तो बच्चे के चेही अंग सुडौल होते हैं कि जो पिताके वीर्यसे बनते हैं । जहाँ स्त्रीकी ओरसे प्रेम होता है वहाँ चेही अंग सुडौल होंगे कि जो स्त्रीके रजसे बनेंगे । अतएव सारे अङ्गोंको सुन्दर, सुडौल बनानेके लिये माता-पिता दोनोंके ओरसे प्रेम होना आवश्यक हैं । जितनी जातियाँ हैं, सबमें स्त्री और पुरुषके प्रेमको प्रधान माना है । हिन्दू जातिमें विवाह जन्मपत्री मिलाकर होता है, प्रहर्मेत्री और गणमेत्री आदि देख जाते हैं । इस कारण कि इनमें आगे
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सन्तति शास्त्र ।
चलकर प्रेम कैसा होगा ? बहुतेरे इस बातको नहीं मानते कि जन्मपत्रीसे इस बातका पता क्या लगेगा कि स्त्री पुरुषमें प्रेम होगा या नहीं। यह एक मिथ्या बात है। जिन स्त्री पुरुषोंकी यह मैत्री और गण मैत्री ठीक है, चाहे उनमेंसे एक कुरूप ही क्यों न हो, वे दोनों अवश्य परस्पर प्रेमी होंगे। परन्तु वह स्त्री पुरुष कि जिनकी यहमैत्री और गण मैत्री ठीक नहीं हैं, दोनोंके सुन्दर और लावण्यता पूर्ण होते हुए भी प्रेम नहीं रहता। पहले हिन्दुओंमें स्वयंवरकी प्रथा थी। इसका भी यही मत-लव था कि कन्याका प्रेम जिसपर हो वही उसका पति हो। यूरोपमें कन्याएं स्वयं अपना पति ढूँढ़ लेती हैं। इससे भी यही तात्पर्य है कि जिससे प्रेम हो वही पतित्वमें वरण किया जाय। गर्भाधान समयका मन्द प्यार बालकोंकी मांस रज्जुको शिथिल बना देता है। उत्साहयुक्त प्यारसे अवयव दह और मनके तन्तु सतेज बनते हैं। जिस प्रकार संयोग समयमें प्रेम द्वारा माता पिताका हर्ष बढ़ता है उसी प्रकार सन्तान सुन्दर, सुडौल और उत्तम होती है। यदि संयोग-समयमें मातापिताका हर्ष पूर्ण प्रकाश नहीं पाता तो मध्यम गुणोंवाली सन्तान होती है। यदि हर्षका प्रकाश विलकुल न हुआ, तो अनेक प्रकारकी कुरूप और अंगहीन सन्तान उत्पन्न होती है।
प्रेम इस बातको नहीं चाहता कि स्त्री या पुरुष सुन्दर हों। प्रेम तो बदलेमें केवल प्रेम ही चाहता है। प्रायः देखा गया है कि रूपवती स्त्री और कुरूप पुरुष या कुरूप स्त्री और सर्वोत्तम सुन्दर पतिमें प्रेमकी धारा वेगसे बहती है। स्त्री और पुरुषके प्रेमकी, कि जिसका प्रभाव सन्तानपर पड़ता है, अनेक बार परीक्षा की जा चुकी है और इनमें प्रेमकी सत्यताकी भलक-दिललाई भी पड़ती है।
बच्चोंपर माता-पिताके मनोबलका प्रभाव । १६१
१. एक परिवारमें अच्छे खूबसूरत मोटे ताजे माता-पिता से जितने बच्चे हुए सब कुरूप और बुद्धिहीन थे जाँच करनेपर मालूम हुआ कि माता-पितामें अनबन रहती थी।
२. एक सुन्दर माता-पितासे जो पूरे जवान थे, डील डौल अच्छा था, उन्हें ठिगने कदकी सन्तान उत्पन्न हुई। जाँच करनेसे पता चला और खीने स्वीकार किया कि जब उस बच्चेका गर्भाधान हुआ था उस दिन स्त्री पुरुषमें लड़ाई हुई थी।
इन बातोंसे सिद्ध है कि सन्तानके विषयमें प्रेमका बहुत बड़ा महत्व है। जितने अंशोंमें माता-पिता प्रेम द्वारा मनसे एक हो जाते हैं उतने ही अंशोंमें बालक श्रेष्ठ होता है। माता-पिता के प्रेममें जब मनकी स्थिति अच्छी हालतमें रहती है तब बालक सुन्दर उत्पन्न होता है। प्रेमसे गर्भाधान समयमें माता-पिता अपने चित्तको जिसमें लगावेंगे उसी 'वातकी प्रेमी सन्तान उत्पन्न होगी। इसलिये जैसी सन्तान उत्पन्न करना हो माता-पिताको प्रेमसे अपने अपने मनको गर्भाधानके समय उसीमें लगाना चाहिये। इस प्रकार केवल प्रेम द्वारा ही उत्तम सन्तान उत्पन्न हो सकती है।
(३३) बच्चोंपर माता-पिताके मनोबलका प्रभाव ।
मानस शास्त्रके विद्वानोंका मत है कि सृष्टि मनसे उत्पन्न होती है। इसलिये मनचाही सन्तान पैदा करना मनकी ताकतके बाहर नहीं है। मनकी शक्तिको ही मानस-शक्ति मनःशक्ति,
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सन्तति शास्त्र ।
इच्छाशक्ति और मनो-बल कहते हैं। यही सबका सर्वस्व है और यही सर्वप्रधान वस्तु है। मनकी शक्ति दो तरहकी होती है। एक प्रत्यक्ष, दूसरी छिपी हुई। सन्तान पैदा करनेमें कैसी मनकी शक्तिका प्रयोग होता है, इस विषयमें विद्वानोंका मत है कि 'इसमें छिपी हुई मनकी ताकत काममें आती है।' माता-पिताके मनकी ताकतके अनुसार शरीर और उसके सारे अवयव तथा मनकी वृत्ति बनती है। सन्तानके रूप रंगमें, शरीरके बननेमें और स्वास्थ्यमें, विचारोंकी बनावट और विगाड़का कारण केवल मनकी ताकत ही है। जिस तरह यदि आदमी गुस्सेमें आकर तसवीर खिंचवाता है, तो उसकी तसवीर क्रोधभरी जान पड़ती है, इसी प्रकार हँसते गाते, क्रूढ़ते और उछलते हुए मनुष्यकी तसवीर उसी प्रकारकी होती है। इसी तरह मनकी शक्ति, जोगमाधानके समय होती है या जिसका संचार गभावसामें हुआ करता है, उसीके अनुसार अच्छी आकृति, प्रकृति और स्वभाव इत्यादि बनते हैं।
मनकी शक्तिमें सब शक्तियाँ आ जाती हैं, जिनका सवन्ध मनसे है। मनकी शक्तिका काम रजो-दर्शनसे ही प्रारम्भ हो जाता है और बच्चे के दूध पीनेके समय तक विशेष रीति से रहता है यही समय माता पिता द्वारा बच्चेके उत्तम वा मध्यम बननेका होता है। इसके अनेक प्रमाण हैं।
१. रजोदर्शनके समय मनोबलका प्रभाव ।
१. मनकी शक्तिमें विकार न उत्पन्न होनेके लिये ही रजोवती-को एकान्तवास कहा गया है। इस विषयमें वैद्यका मत है कि काल करके चौथे दिन स्त्रीको पति आगच्छ
बच्चोंपर माता-पिताके मनोबलका प्रभाव । १६३
किसी सुन्दर पुरुषका दर्शन करना चाहिये । कारण यह है कि स्नान करके जैसे पुरुषका दर्शन स्त्री करता है उसीके रूप-रंगकी सन्तान उत्पन्न होती है । (श० क० )
इसमें एक प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि एक सज्जनकी स्त्री रजस्वला हुई । वह स्नान कर रही थी कि उसी समय में उसका भाई मिलनेके लिये आया । स्त्रीने स्नान करके तुरन्त ही अपने भाईसे भेंट की । संयोगवशात् उसी रजो-दर्शनसे गर्भ रह गया । सन्तान उत्पन्न हुई वह अपने मामाके रूप-रंग और आकृति की थीं ।
२. गर्भाधानके समय मनकी शक्तिका प्रभाव ।
१. इस विषयमें वैद्यकका मत है कि गर्भाधान समयमें जैसे रंग-रूपवाले स्त्री पुरुषका ध्यान या बच्चेकी भलाई बुराई या गुणोंपर माता-पिताका विचार चला जाता है, उसीके अनुसार सन्तान उत्पन्न होती । ( श० क० )
आप ग्रन्थोंका मत है कि गर्भाधानके समयमें जिस जीवमें स्त्रीका चित्त होगा अर्थात् जिस जीवका उसको ध्यान आ जावेगा उसीके अनुसार सन्तान उत्पन्न होगी । (च० श० अ०२ श्लोक० २४) भोज वैद्यने भी ऐसा ही कहा है । इसमें प्रमाण यह है कि—
१. गुजरात देशमें एक सज्जनके घर बन्दरके आकृतिवाली सन्तान उत्पन्न हुई । पिता बुद्धिमान थे । इस बातको अनेक डाक्टरोंसे कहा गया । जाँचसे पता लगा कि एक बन्दर माताके पास रहता था और वह उसे अत्यन्त स्नेहसे पालती थी । पूछनेपर माताने इस बातको स्वीकार किया कि गर्भाधान समयमें उसकी दृष्टि बन्दर पर पड़ी थीं ।
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सन्तति-शास्त्र ।
२ महाराष्ट्र देशमें माता-पिताने गर्भाधान समयमें अपने मनकी शक्तिको ज्योतिष-शास्त्रमें लगाकर बालक उत्पन्न किया। बालक बहुत बड़ा ज्योतिषी हुआ।
३. गर्भाधानके बाद मनकी शक्तिका प्रभाव।
१. गर्भाधान होनेतक तो मातापिता दोनोंके मनकी शक्तिका प्रभाव पड़ता है, परन्तु गर्भाधान होनेके बाद बच्चों-पर केवल माताकी ही मनशक्तिका प्रभाव रहता है। तीन मास तक तो कम परन्तु चौथे महिनेसे विशेष प्रभाव पड़ने लगता है। इसका कारण यह है कि बालक का हृदय चौथे महिनेमें बन जाता है। अतएव माताके हृदयमें जो बात उत्पन्न होती है ऐसे समयमें उसका बहुत बड़ा प्रभाव सन्तानपर पड़ता है।
(३० क०)
इसके अनेक उदाहरण हैं।
१ नेपोलियन बोनापार्ट यूरोपमें इतना युद्धवीर क्यों हुआ ? कारण यह था कि जब नेपोलियन गर्भमें था, तो उसकी माता अपने पतिके साथ लड़ाईमें काम करती थी। इस कारण वह संकट और साहससे काम करनेमें निर्भय हो गयी थी। वह घोड़ेपर सवार होती और उसके पतिके अधीन जितने मनुष्य थे सब पर हुकूमत रखती थी। इस वजहसे माताका यह गुण पुत्रमें विकास पाकर इतना बड़ा कि जिसकी वदौलत आजतक नेपोलियन युद्धवीर विख्यात है।
२ एक गर्भवती स्त्रीने अपने पतिसे भगड़ा किया। घरमें स्त्री पुरुष दो ही थे। कई महिनेतक दोनों नहीं चले।
बच्चोंपर माता-पिताके मनोबलका प्रभाव ।
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बच्चा पैदा हुआ, परन्तु वह सुस्त पड़ा रहता । बडे होने पर हर समय उसे गुस्सा रहता । उसे सबसे अलग बैठना पसन्द था । पिता ने इसकी जाँच की तो लड़ाई होना ही इसका कारण प्रतीत हुआ ।
३. अभिमन्युको गर्भमें ही चक्रव्यूहकी लड़ाई मालूम हो गई थी । कथा इस प्रकार है । कि जब अभिमन्यु पेटमें आ, तो उसकी माताके पेटमें दर्द उत्पन्न हुआ । उस समय अभिमन्युके पिता अर्जुनने अपनी स्त्री सुभद्रा देवीका चित्त बँटाने और दुःख भुलवानेके लिये चक्रव्यूहकी लड़ाईका हाल सुनाया था । सुनते सुनते सुभद्रा देवी सो गई । केवल पाँच फाटककी लड़ाईका हाल बालकने गर्भमें सुना । उतना ही हाल अभिमन्युको याद रहा और वह महाभारतमें चक्रव्यूहके पाँच फाटकतक लड़ा और छुटेपर मारा गया, क्योंकि उसको माताके सो जानेके कारण आगेकी लड़ाईका हाल मालूम न हो सका ।
४. महाराज युधिष्ठिर ऐसे न्यायमूर्ति क्यों हुए ? कारण यह था कि जब वे गर्भमें थे तो उनकी माता धर्मशास्त्र पढ़ती थी ।
५. महात्मा बुद्ध ऐसे दयालु क्यों हुए ? कारण यह था कि जब बुद्धदेव गर्भमें थे, तो उनकी माताको प्रजाका कष्ट दूर करनेके विषयमें बहुत कुछ विचार करना पड़ा था ।
४. शरीरके रंगपर मनका प्रभाव ।
१. एक हवशी ( अफ्रीकाका रहनेवाला काला आदमी ) ने अपने जातिकी स्त्रीसे विवाह किया, परन्तु वह स्त्रीको प्यारसे नहीं रखता था । उसका चित्त एक दूसरी सुन्दर और गोरी स्त्रीपर था । एक दिन हवशीने उस
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सन्तति-शास्त्र ।
सुन्दर स्त्रीसे संयोगकी प्रार्थना की परन्तु उसने स्वीकार नहीं किया। अन्तमें हवशीको अपनी व्याही स्त्रीसे सन्तुष्ट होना पड़ा। उसी दिन गर्भ रह गया। मातापिता दोनोंके काले होनेपर गोरे रंगकी सन्तान उत्पन्न हुई। कारण यह था कि पिताका चित्त गोरे रंगकी स्त्रीपर था और गर्भाधान समयमें भी वह उसीका ध्यान करता रहा।
१ एक यूरोपियन स्त्रीके कमरेमें ठीक पलकके सामने एक हवशीका चित्र लगा हुआ था। वह उसको नित्य देखा करती थी। गर्भ रह गया। गर्भांचक्षामें भी स्त्री उस चित्रको देखती रही। सन्तान उत्पन्न हुई तो उसका रङ्ग काला था। माता पिता गोरे रङ्गके थे और सन्तान काली हुई। इन दोनोंको इस बातका बड़ा शोक रहा और अनेक डाकूरीसे इस बातको उन्होंने कहा। एक डाकूरेने जाँच की तो यह पता लगा कि जिस हवशीके काले चित्रको स्त्री रोज देखती थी, उसके मनपर उसका इतना प्रभाव पड़ा कि बच्चा काले रङ्गका उत्पन्न हुआ।
३ रोम देशमें एक प्रतिष्ठित मनुष्य कुरूप और छोटे डीलका था। उसकी स्त्री सुन्दर और अच्छे कदकी थी। इनसे सन्तान हुई वह पिता सरीखी थी। मातापिताको यह चिन्ता हुई कि कहाँ ऐसा न हो कि सारी सन्तानें इसी प्रकारकी हों। अनेक डाकूरीसे सम्मति ली गई। एक डाकूरेने यह कहा कि स्त्रीका चित्त लम्बे और खूब-सुरत मनुष्योंपर होना चाहिये। इस विचारसे उसने तीन अत्यन्त सुन्दर पुतले बनवाकर अपने कमरेमें रखे। स्त्रीकी निगाह हर समय उन पुतलोंपर ही पड़ती थी।
बन्धांपर माता-पिताके मनावलका प्रभाव ।
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संयोग वश गर्भ रह गया । उन्हीं पुतलोंके समान रङ्ग रूपकी सन्तान उत्पन्न हुई । कारण यह था कि गर्भाधान समयमें स्त्रीको उन पुतलोंका ही ध्यान रहा करता था ।
५. शरीरकी सुन्दरता और अँगोंपर मनका प्रभाव ।
१. किसी प्रतिष्ठित घरमें एक कुबडी नित्य मिक्षा माँगने आया करती थी । उसको कहानी कहनेका बड़ा शौक था । जब वह आती तो घरकी सारी स्त्रियाँ उसे घेर लेतीं और कहानी सुन कर जाने देतीं । इनमेंसे एक स्त्री उसको बहुत चाहती थी और वही नित्य मिक्षा भी देती थी । दैव संयोगसे उस स्त्रीको गर्भ रह गया और उस मिक्षा माँगनेवाली स्त्रीके समान सन्तान हुई । कारण यह था कि माता उस स्त्रीको रोज देखती थी और उसका प्रेम उसपर था । अतएव उसका आकार माताके हृदयपर गर्भाधान समयमें भी जमा रहा, इसी कारण उसीके अनुसार सन्तान हुई ।
२. एक घरमें दो स्त्री पुरुष थे । एक स्त्री और आगई, वह कानी और कुरुपा थी । उसी बीचमें गर्भाधान हो गया । सन्तान उत्पन्न हुई तो बच्चेको भी एक आंख थी । कारण पूछनेसे मालूम हुआ कि जिस दिन गर्भाधान हुआ था उस रोज थोड़ी ही देर पहले दोनों स्त्रियाँ पास पास बैठी बातचीत कर रही थीं । गर्भाधान समयमें माताको उस कानी स्त्रीका ध्यान रहा था, इसीलिये ऐसी सन्तानका जन्म हुआ ।
३. अमेरिकाके एक निवासीने दो सुन्दर चित्र खरीदे और अपने सोनेके कमरमें रखवा दिये । दोनों स्त्रीपुरुषका-
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सन्तति-शास्त्र ।
इन चित्रोंसे बड़ा स्नेह था। स्त्रीको गर्भ रह गया। उन्हीं चित्रोंके समान सुन्दर सन्तान हुई। कारण यह था कि दोनों ह्रीपुरष चित्रोंसे स्नेह रखते थे और गर्भाधान समयमें दोनोंको उनका ध्यान था।
६. बच्चेके स्वास्थ्यपर मनका प्रभाव ।
१. एक गृहस्थके घरमें बच्चा बीमार था और मानाके पास ही मोता था। दैव संयोगसे उस दिन माताको गर्भ रह गया। उससे जो सन्तान हुई वह सदा रोगी रहनी थी, कारण कि गर्भाधान समयमें मानापिताका चित्त बच्चेके रोगकी ओर था।
२. एक स्त्रीके शरीरमें दर्द था और उसी दिन उसका पति परदेशसे आया। दैव संयोग उस दिन गर्भ रह गया। पुत्र उत्पन्न हुआ वह सदा रोगी रहता था। कारण यह था कि मानापिता दोनोंके चित्तपर रोगका न्याल जमा हुआ था।
७. सन्तान उत्पन्न हो जानेपर मनकी शक्तिका प्रभाव ।
१. जिस समयतक बालक दूध पीता है तबतक बच्चेकी आत्मा माताकी आत्मापर अवलम्बित रहनी है। माताकी आत्माका और दूधका बहुत बड़ा सम्बन्ध रहता है। इसी प्रकार विचार और आत्माका बहुत बड़ा सम्बन्ध है, इस कारण माताके विचारोंका असर दूधपर होता है और उसीके अनुसार सन्तान होती है। जो मानपर नोवी होती हैं उनके बच्चे भी अवश्य कौधी होते हैं। जिन माताओंको मिरगी इत्यादिका रोग है उनके बच्चोंको भी अवश्य मिरगी आती है। बहुतेरे
बच्चोंपर माता-पिताके मनोबलका प्रभाव ।
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इस बात को नहीं मानते, परन्तु इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि यदि शेरनी का दूध बच्चेको पिला दिया जाय, तो बच्चा अत्यन्त क्रोधी हो जायगा, परन्तु गाय का दूध पिलानेसे बच्चा क्रोधी नहीं होता, कारण यह है कि शेरनीकी प्रकृति ऐसी है कि वह हर समय क्रोधमें रहती है और क्रोधका असर दूध में रहता है। अतएव यह मानना पड़ेगा कि माताके अच्छे बुरे गुणोंका असर दूधमें अवश्य रहता है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि—
१. जो बच्चे धायाँके यहाँ पाले जाते हैं, जवानी और बुढ़ापे तक चाहे वे कैसेही क्यों न हो जायँ, परन्तु उनमें धायाँके गुण दोष अवश्य आ जाते हैं।
२. बंगालमें एक प्रतिष्ठितके घर सन् १८६५ ई० में एक बालक उत्पन्न हुआ। माता चार दिन बाद मर गई। एक अहीरिनने उसे पाला। इसके यहाँ सब चोरी किया करते थे। तीन वर्षतक बालकने इसका दूध पिया। इसके बाद लड़का पिताके घर रहने लगा। पिताजी सीधे सादे थे, परन्तु बालक बड़ा होनेपर चोरोंके समुदाय का सरदार बना।
मानसशास्त्रके विद्वानोंका यह सिद्धान्त बहुत ठीक है कि संसारमें जो कुछ होता है वह मनःशक्तिके प्रभावसे। यही कारण है कि एक माता से उत्पन्न हुए बालकोंकी सूरत और प्रकृति दूसरेसे नहीं मिलती। एक भाई पापी है, तो दूसरा धर्मात्मा, एक कुरूप तो दूसरा रूपवान। इन सब का कारण मनःशक्ति हैं इसलिये सन्तानके सुधारनेके लिये माता पिताको अपने मनकी शक्ति ठीक रखनी चाहिये।
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सन्ततिशास्त्र ।
(३४) गर्भकी वायुका सन्तानपर प्रभाव ।
गर्भाशय वन्धनेके रहने का स्थान है । जब यहाँ पर किसी प्रकारसे वायुका उत्पात हो जाता है, तब अनेक प्रकारकी रोगी सन्तान उत्पन्न होती है । इसके अनेक भेद हैं ।
१. गर्भाधान होनेपर गर्भमें वायुसे मिले हुए रज वीर्यके दो भाग हो जानेसे इसके एक भागमें वीर्य और दूसरे भागमें रज अधिक हो, तो एक कन्या और एक पुत्र उत्पन्न होता है । रज-वीर्य मिले पदार्थमें जब अधिक वीर्य हो तो उसके दो भाग हो जाने से दो पुत्र और जब रज अधिक हो तो दो भाग हो जानेसे दो कन्याएँ उत्पन्न होती हैं । जब वही हुई वायुसे मिले हुए रजवीर्यके कई टुकड़े हो जावें, तो कर्मवश एक ही बार बहुत सी सन्तानें उत्पन्न होती हैं ।
(च० श० अ० २ शी० ११ सं १३ )
२. वायु द्वारा मिले हुए रज-वीर्यके दो भाग हो जानेपर बड़े भागसे जो बालक होगा वह पुष्ट और छोटे टुकड़ोंसे निर्बल और क्षीण देहवाली सन्तान होगी ।
(च० श० अ० २ श्लो० १५ )
३. यदि वायु गर्भके शुक्राशयको चिगाड़ दे, तो उससे जो पुत्र उत्पन्न होता है उसको पवनेन्द्री नपुंसक कहते हैं ।
(च० श० अ० २ श्लो० १७ )
४. यदि वायु शुक्राशयके द्वारको रोक दे तो सस्कारवाही नपुंसक पैदा होता है ।
(च० श० अ० २ श्ली० १८ )
५. वायु और अग्निके दोषसे जिसके दोनों अण्डकोष नष्ट
हर्ष शोकादिका सन्तानपर प्रभाव ।
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हो गप हो तो उसको वातिक पण्ड ( वातजनित नामदं ) कहते हैं । ( च० २० अ० २ श्लो० २० )
६. वायुके कोपसे गर्भका बालक कुबड़ा, पंगुल, लूला गूँगा और मिनमिता हो जाता है ।
( सु० २० अ० २ श्लो० ५५ )
इस प्रकार गर्भकी वायुके प्रकोपसे अनेकप्रकारकी सन्तान उत्पन्न होती है ।
( २५ ) गर्भ समयके हर्ष, शोक, चिन्ता और इच्छाका सन्तानपर प्रभाव ।
यह बात प्रसिद्ध है कि गर्भाधानके समयमें माता-पिताका मन जैसा होगा उसीके गुण-दोषके अनुसार सन्तान होगी; क्योंकि माता-पिताके हाथोंमें सन्तानके आत्माकी एक पेंसी कुंजी है कि जिससे वे बच्चेको अपनी इच्छाके अनुसार बना सकते हैं । गर्भाधान समयमें शोक और चिन्तासे अनेक प्रकारकी सन्तानें उत्पन्न होती हैं ।
१. संयोग-समयके शोक चिन्ता और स्त्री पुष्पमें अनवन होनेके कारण बदसूरत, कुबडी, अंगहीन, सुस्त, बुरे स्वभाववाली, ढ़ेरी, ठिगनी और दुर्बल सन्तान उत्पन्न होती है । ( रतिशान्त्र )
२. प्रसव्त्तारहित संयोग करनेपर माता-पिताके थोड़े रज-वीर्यसे यदि गर्भ रह जावे तो पुत्र होनेपर नरपण्ड ( हिजड़ा ) और कन्या होनेपर नारीपण्ड ( हिजड़ी ) उत्पन्न होती है । ( च० २० अ० २ श्लो० १८ )
३. शोकयुक्त मातापिताके संयोगसे सदैव शोकमें रहने-